आपका परिचय

शुक्रवार, 29 अगस्त 2014

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन :  वर्ष  : 3,   अंक  : 11-12, जुलाई-अगस्त  2014


।। कथा प्रवाह ।।

सामग्री :  इस अंक में डॉ. योगेन्द्र नाथ शर्मा ‘अरुण’, श्री पारस दासोत, श्री रामेश्वर काम्बोज हिमांशु,  श्री कृष्ण चन्द्र महादेविया,  श्री कुंवर प्रेमिल,  सुश्री शोभा रस्तोगी ‘शोभा’,  श्री सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा , सुश्री शुभदा पाण्डेय व श्री  अनन्त आलोक की लघुकथाएँ। 


डॉ. योगेन्द्र नाथ शर्मा ‘अरुण’



अधिकार
     भारत से चल कर जब बोस्टन पहुंचा, तो हवाई अड्डे पर पत्नी के लिए ‘व्हील चेयर’ तैयार थी! मैंने व्हील चेयर थामे व्यक्ति से अंग्रेजी में पूछा- ‘कहाँ के हैं आप’, तो अंग्रेजी में जवाब मिला- ‘अफ्रीका’। मैंने बड़े जोश में कहा- ‘साउथ अफ्रीका?’ तो उसने मुझे ख़ुशी से देख कर कहा- ‘या’ और हमें लेकर सामान उतारने के लिए हवाई अड्डे की ‘बेल्ट’ पर ले आया!
    मैं सामान बाहर ले जाने के लिए ‘ट्रॉली’ लेने आगे बढ़ा तो देखा कि ट्रॉलियों में ‘लॉक’ लगा हुआ है! उसने मुझे देखा तो बोला- ‘पुट फोर डॉलर्स टू गेट ट्रॉली’। मैंने पूछा ‘व्हाई?’ तो उसने बताया कि बोस्टन एयरपोर्ट पर ट्रॉली लेने के लिए चार डॉलर देने होते हैं!
     मुझे परेशान देख कर अंग्रेजी में उसने पूछा- ‘क्या बात है, आप को क्या परेशानी है?’ मैंने अंग्रेजी में बताया- ‘मेरे पास तो चार डॉलर्स नहीं हैं, सौ डॉलर का नोट मेरे पास है, इसको मैं कहाँ से तुड़ाऊँ?’
     अफरीकी व्यक्ति ने रास्ता सुझाया- ‘‘आपका बेटा आपको लेने हवाई अड्डे पर आ रहा है ना? अभी मैं आपके लिए चार डॉलर डाल कर ट्रॉली ले लेता हूँ, आप मेरे साथ बाहर जा कर मुझे अपने बेटे से मेरे ये चार डॉलर दिलवा देना!’’
     मेरे सामने और कोई रास्ता था ही नहीं और बेटा हमें लेने आ ही रहा था, सो मैंने उसे ‘वचन’ सा दे दिया कि
रेखा चित्र :  दासोत 
मैं अपने बेटे से उसे ये चार डॉलर जरूर दिल दूंगा! वह मेरे साथ ट्रॉलियों के पास आया और वेक मशीन में एक-एक करके उसने चार डॉलर डाल कर ट्रॉली ले ली! ट्रॉली लेकर वह मेरे साथ ‘बेल्ट’ पर आया और हमारे सारे सामान को उठवा कर ट्रॉली पर रक्खा! हम उसके साथ बाहर आ गए!

    बाहर मेरा बेटा अपनी पत्नी, बेटे और बेटी के साथ जैसे ही हमें मिला तो जान में जान आ गई! मैंने बेटे को बताया कि साथ आए इस आदमी ने हमारी बहुत मदद की है! बेटे ने खुश हो कर उसे बीस डॉलर का नोट दिया तो उसने बेहद खुश होकर ‘थैंक्स’ कहा, लेकिन गया नहीं, बल्कि वहीं खड़ा रहा तो बेटे ने अंग्रेजी में पूछा, ‘‘क्या बात है?’’ तो उसने अंग्रेजी में ही कहा- ‘‘मैंने आपके पिता को ट्रॉली के लिए चार डॉलर उधार दिए थे, वो आपने नहीं दिए?’’ मैंने कहा- ‘‘बीस डॉलर तो दिए हैं न?’’ तो कड़क कर वो बोला- ‘‘ये तो ट्रिप है, पर वो पैसा तो मैंने आपको दिया था, वो मुझे लेना ही है!’’
     बेटे ने पांच डॉलर का नोट दिया तो बोला- ‘‘नो,नो, ओन्ली फोर डॉलर्स, मैंने पांच नहीं, सिर्फ ‘चार डॉलर्स’ ही दिए थे!’’ जैसे ही बेटे ने एक एक के चार नोट उसे दिए, उसने ले कर हँसते हुए कहा- ‘थैंक्स’ और चला गया!
  • 74/3, न्यू नेहरू नगर, रूड़की-247667, जिला: हरिद्वार, उत्तराखंड / मोबाइल : 09412070351



पारस दासोत



{सुप्रसिद्ध वरिष्ठ लघुकथाकार एवं चित्रकार श्री पारस दासोत का लघुकथा संग्रह ‘मेरी अलंकारिक लघुकथाएँ’ इसी वर्ष प्रकाशित हुआ है। उनके इस संग्रह से प्रस्तुत हैं उनकी दो प्रतिनिधि लघुकथाएँ।}

भारत

      ‘दौड़ प्रतियोगिता’ में सम्मिलित होने के लिये,....
      उसने, मास्टर को हाथ जोड़ते हुए निवेदन किया-
      ‘‘गुरुजी! मैं भी दौड़ूँगा!’’
      ‘‘तू ऽऽ...! तू दौड़ेगा! अच्छा तो, यह अपना चोला उतार!’’
      उसने, शीघ्र ही अपना कुर्ता उतार दिया।
      उसके शरीर पर छनी बनियान देखकर, सब ठिलठिला पड़े।
      ..........  
      देखो-रे-देखो! इसकी बनियान तो, देश का नक्शा बनी हुई है!’’
रेखा चित्र : पारस दासोत 

      एक मास्टर ने उसका मजाक उड़ाया। 
      ‘‘अरे ऽऽ...! देश तो राज्यों और जिलों में भी बँटा हुआ है!’’
      दूसरे मास्टर ने मजाक आगे बढ़ाया।
      इस बीच,
      उसके पास ही बैठे एक मास्टर ने, उससे पूछा-
      ‘‘क्यों रे ऽऽ...! तेरा नाम क्या है?’’
      ‘‘गुरुजी, मेरा नाम! मेरा नाम भारत है।’’
      उसने सहज उत्तर दिया।
      थोड़ी देर बाद,
      भारत, तालियों की गड़गड़ाहट के बीच, सबसे आगे था।

कुआँ और कुआँ

     हरिजन लड़की के साथ हुए बलात्कार के कारण,... 
     लम्बी लड़ाई का परिणाम ये हुआ, ‘‘दो हरिजनों की दिन-दहाड़े हत्या कर दी गई।’’ खून बहा, पर गुस्सा शान्त नहीं हुआ। 
     दोनों लाशें, गाँव के हरिजन कुएँ में डाल दी गईं। कुएँ का पानी लाल हो गया। 
     कुछ ही दिनों में महाजन कुएँ का पानी भी लाल हो गया। पूरे गाँव में दहशत छा गयी...। गोताखोरों को कुएँ में उतारा गया। कछुओं, मेढ़कों के सिवा कुछ भी हाथ न लगा।
     ‘‘करें...तो क्या करे...?’’ चारों ओर से चिंता के स्वर उभरने लगे।
      .........
     ‘‘हमें, अपना कुआँ, पानी उलीचकर साफ करना चाहिए।’’  एक साहूकार ने सलाह दी।
     यह सब देख-सुनकर....भीड़ से दूर खड़ा मास्टर बोला-
     ‘‘यदि इस कुएँ को साफ करना है.... तो आओ! आओ मेरे साथ....।’’
     मास्टर के कदम, हरिजन कुएँ की ओर बढ़ रहे थे। 

  • प्लाट नं.129, गली नं.9 (बी), मोती नगर, क्वींस रोड, वैशाली, जयपुर-21 / मोबाइल : 09413687579



रामेश्वर काम्बोज हिमांशु






{सुप्रसिद्ध लघुकथाकार एवं कवि श्री रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ जी के लघुकथा संग्रह ‘असभ्य नगर एवं अन्य लघुकथाएँ’ का दूसरा संस्करण गत वर्ष प्रकाशित हुआ था। इस संग्रह से प्रस्तुत हैं उनकी दो प्रतिनिधि लघुकथाएँ।}

चक्रव्यूह

     ‘‘मँझले को देखो न, कितना कमज़ोर हो गया है।’’ सुबह पत्नी ने कहा।
     ‘‘देख तो मैं भी रहा हूँ। पर करूँ भी तो क्या? कलकत्ता में रहे हैं। वहाँ गरम कपड़ों की ज्यादा ज़रूरत नहीं पड़ी। अधिक न भी हों तो तीनों बच्चों के लिए एक-एक फुल स्वेटर ज़रूरी है। मैं चप्पल पहनकर ही आफिस जा रहा हूँ। कम-से-कम दो सौ रुपए हाथ में हों, तब मँझले का इलाज फिर
छाया चित्र : उमेश महादोषी 
शुरू कराऊँ।’’

     ‘‘मैं पिछले आठ साल से देख रही हूँ कि आपके पास महीने के अन्तिम दिनों में दो रुपए भी नहीं बचते।’’ पत्नी तुनक उठी।
     कोई खांसी-जुकाम का इलाज तो कराना नहीं। लंग्स की खराबी है। साल-भर दवाई खिलाकर देख ली। रत्ती-भर फर्क नहीं पड़ा। संतुलित भोजन भी कहाँ मिल पाता है मंझले को।
     मैंने देखा, पत्नी की आँखें भर आईं- ‘‘तीनों बेटों में मँझला ही तो सुन्दर भी लगता है।....’’ उसने एक ओर मुँह घुमा लिया। मैं बिना खाए ही आफिस चला गया। मँझले का झुरता हुआ चेहरा दिन-भर मेरी आँखों में तैरता रहा। शाम को बोझिल कदमों से घर लौटा। पिताजी का पत्र आया था कि एक हज़ार रुपए भेज दूँ। अब उनको क्या उत्तर दूँ? महीने-भर की कमाई है आठ सौ रुपए। कहीं डाका डालूँ या चोरी करूँ? साल-भर में भी कभी एक हज़ार रुपए नहीं जुड़ पाए। वे बूढ़ी आँखें आए दिन पोस्टमैन की प्रतीक्षा करती होंगी कि मैं हज़ार न भेजता, तीन-चार सौ ही भेज देता।
     एक पीली रोशनी मेरी आँखों के आगे पसर रही है जिसमें जर्जर पिताजी मचिया पर पड़े कराह रहे हैं और अस्थि-पंजर सा मेरा मँझला बेटा सूखी खपच्ची टांगों से गिरता-पड़ता कहीं दूर भागा जा रहा है। और मैं धरती पर पाँव टिकाने में भी खुद को असमर्थ पा रहा हूँ।

लौटते हुए

     नीरज ने गली में घुसते समय पीछे मुड़कर देखा- कहीं कोई उसे देख तो नहीं रहा है? धीरे-धीरे चलते हुए उसने दरवाज़ों पर नज़र डाली। एक दरवाज़े की सीढ़ियों पर बैठे मिचमिची आँखों वाले अधेड़ ने उसको इशारे से पास बुलाया।
     वह सिटपिटाया। जीभ जैसे तालू से चिपक गई। अधेड़ उसके पास खिसककर फुसफुसाया- ‘‘आइए साहब, मनपसंद मिलेगा। तबियत हरी हो जायेगी।’’
     ‘‘मैं....’’ बोलते नीरज अटका।
     ‘‘समझ गया, जनाब, नए हैं। पचास रुपये निकालिए।’’ मिचमिची आँखों ने बीड़ी का धुआँ उगलते हुए कहा।
     झिझकते हुए नीरज का हाथ जेब से निकला ही था कि अधेड़ ने पचास का नोट बाज की तरह झपटा और उसे सीढ़ियों की ओर ठेल दिया।
     सीढ़ियाँ चढ़ते ही कई अदाएँ उसको गिरफ्त में लेने के लिए आगे बढ़ीं। उसकी टाँगे बुरी तरह काँप रही थीं। उसने चुपचाप खड़ी बड़ी-बड़ी आँखों वाली युवती की तरफ दृष्टि उठाई। वह आगे बढ़ी और लगभग खींचते हुए उसे कोठरी में लेती गई।
     पलंग पर बैठने का संकेत करके उसने पर्दा खींच दिया और फिर खुद भी उसके पास बैठ गई।
रेखा चित्र : उमेश महादोषी 

     नीरज चुप। दिमांग में भयंकर तनाव। भयंकर हड़कम्प। बात कैसे शुरू करे।
     ‘‘क्यों, मैं पसन्द नहीं हूँ क्या?’’ उसने रुखाई से पूछा।
     वह सकपकाकर एक तरफ को खिसक गया।
     ‘‘किस काम से आए हैं मेरे राजा?’’ उसने नीरज पर आँखें गढ़ा दीं।
     ‘‘मुझे मेरी पत्नी पर शक है।’’ वह अचकचाया- ‘‘मैं उसके साथ... पति की तरह नहीं रह पा रहा हूँ। किसी और से कह भी नहीं सकता। तुम लोगों को अनुभव होगा, इसीलिए यहाँ आया हूँ। मैं कैसे जानूँ कि मेरी पत्नी बदचलन है या नहीं?’’
     ‘‘बड़ी-बड़ी आँखें पल-भर को धधक उठीं। फिर अचानक गम्भीर हो गईं- ‘‘एक बात पूछूँ तुमसे?’’
     ‘‘पूछो।’’ उसने माथे पर छलक आया पसीना पोंछा।
     ‘‘तुम्हारी पत्नी अगर तुमको इस कोठे से उतरता हुआ देख ले, तो क्या सोचेगी?’’ उसने होंठ चबाये।
     ‘‘....’’ नीरज बगलें झाँकने लगा।
     ‘‘बोलो! यही न कि तुमने किसी से मुँह काला किया है; जबकि यह सच नहीं है।’’ बड़ी-बड़ी आँखों वाली युवती के चेहरे पर कड़वाहट उभर आई।
     नीरज की ज़ुबान पर जैसे ताला पड़ गया।
     ‘‘सुनो, पत्नी पर विश्वास करना सीखो। मुझे देखो...’’ उसकी आँखें भर आईं- ‘‘पति के शक ने मुझे इस कोठे पर पहुँचा दिया। अगर तुम्हारा शक झूठा हुआ तो क्या करोगे?’’
     नीरज भीतर तक दहल गया। उसने कृतज्ञता-भरी दृष्टि बड़ी-बड़ी आँखों पर डाली और बिजली की तेज़ी से सीढ़ियाँ उतरकर गली में आ गया।
  • एफ-305, छठा तल, मैक्स हाइट, सेक्टर-62, कुण्डली-131023, सोनीपत (हरियाणा) / मोबाइल : 09313727493



कृष्ण चन्द्र महादेविया




उदास आँखें

     ‘‘माताजी....ऐ माताजी...!’’ एस.डी.ओ. चौहान ने खेत पर काम करती दो महिलाओं में साठ-पेंसठ की महिला को पुकारा, जो घर के पास खेतों में मैला फेंकने में लगी थी।
    ‘‘क्या है?’’ महिला ने घूरते हुए कठोर स्वर में कहा।
    ‘‘मैं पानी वाले महकमे से आया हूँ और थांथी ठाकर से आपके खेत में निकले पानी वारे बात करनी थी।’’
    ‘‘तुझे पता नहीं, उसका बेटा हुआ है! आज छः दिन हुए हैं, तेरह दिन के बाद आना।’’ कठोर स्वर से महिला ने फिर कहा।
    ‘‘किन्तु माता जी, वह है कहाँ?’’
    ‘‘दिखता नहीं, तेरे सामने खुले कमरे में आराम कर रहा है। उसे उठाना मत, न ही बात करना। उसे हवा लग
रेखा चित्र : बी.मोहन नेगी 
जायेगी।’’

     हैरान एस.डी.ओ. चौहान ने आगे बढ़कर कमरे में झांका। थांथी ठाकर सोया था और उसके पास नवजात बच्चा लिटाया था। उसके पास ही मेवों से भरी थाली और बड़ा सा दूध का गिलास रखा था। एस.डी.ओ. चौहान अवाक् देखता रह गया। कुछ देर झांकने के बाद उसने पीछे हटकर महिला से जिज्ञासावश पूछा- ‘‘माताजी, थाथी की पत्नी कहाँ है?’’   
     तुझे दिखती नहीं, ये जो काम कर रही है मेरे साथ। गोबर से भरा किलटा उठाये युवती की ओर संकेत करते उस उम्रदराज महिला ने कहा।
     युवती ने अब मासूमियत और उदास आँखों से एस.डी.ओ. चौहान की ओर देखा। कमजोरी के कारण वह धीरे-धीरे चलती गोबर का किलटा उठाकर कुछ दूरी पर खेत में फेंकती थी। एस.डी.ओ. चौहान को नवप्रसूता युवती पर बहुत दया आई। उसके दिल में आया कि इस खूसट औरत को चार थप्पड़ जड़ दे और खूब खरी-खोटी सुनाए। किन्तु वह अजनबी पहाड़ी इलाके में मन मसोस कर रह गया। जिसे आराम करना चाहिए, वह काम करती है और जिसे काम करना चाहिए, वह आराम से सोता है। चौहान आक्रोशित सा लौट आया। किन्तु उसकी आँखों के सामने मासूम और उदास आँखों में उसकी बिटिया जैसी युवती बार-बार दिखाई देने लगी थी।
  • पत्रालय महादेव, सुन्दरनगर, जिला मण्डी-175018, हि.प्र. / मोबाइल :  08988152163



कुंवर प्रेमिल




दो पाटन के बीच

     कुछेक भिखारी एक जगह मिल बैठे। एक भिखारी बोला- ‘‘आज कुल दो रूपये की हुई कमाई, ऐसे कैसे काम चलेगा भाई।’’
     दूसरा बोला-लोगों ने अपने घरों के सामने बोर्ड टांग रखे हैं- ‘यहां भिखारियों को भीख नहीं दी जाती है।’
     ‘‘अजी घंटों रिरियाते रहो, कोई घर से निकलता ही नहीं।’’
     ‘‘कुत्तों से सावधान, लिखकर भी हमें डराया जाता है।’’
     ‘‘अजी, फिल्म वालों ने भी आंखें मूंद ली हैं.... तुम एक पैसा दोगे, वो दस लाख देगा... जैसे गाने भी कोई लिखता-गाता नहीं। सबने मिलकर भिखारियों के खिलाफ मोर्चा बांध लिया है, क्या किया जाए आखिर।’’
     यह सब सुनते-सुनते एक पढ़ा-लिखा भिखारी बोला- ‘‘यह सब मंदी और महंगाई की मार है प्रभु, जब दो पाटन के बीच में सरकार ही फंसी हो तो हमारी झोली में कौन माई का लाल टका डालेगा- ऐं।’’
     इसके बाद गहन चुप्पी छा गई।

  • एम.आई.जी.-8, विजयनगर, जबलपुर-482002, म.प्र. / मोबाइल :  09301822782



शोभा रस्तोगी ‘शोभा’




{नई पीढ़ी के प्रतिभावान लघुकथाकारों में शोभा रस्तोगी ‘शोभा’ ने तेजी से अपनी जगह बनाई है। हाल ही में उनका एक लघुकथा संग्रह ‘दिन अपने लिए’ प्रकाशित हुआ है। इस संग्रह से प्रस्तुत हैं उनकी दो प्रतिनिधि लघुकथाएँ।}

प्रेस्टिज इश्यू

     ‘‘ओफ्फोह! करीने से रखिए फूलमालाएँ डैड बॉडी के पास। व्हाट! पुरानी चादी? हटाओ इसे। नई धुली, वेल प्रैस्ड बोम्बे डाइंग की बैडशीट्स बिछाएँ.... वीडियो कवरेज हो रही है। देखिए! आप सभी रिश्तेदार अपने कपड़े ठीक करें। और चेहरा कुछ मुस्काता हुआ.... आई मीन, थोड़ा दुःख के साथ, ...बाकी ठीक है। साहब की माँ एक्सपायर हुई हैं। लगना चाहिए भई।’’ वीडियोग्राफर कवरेज के दौरान हिदायतें दे रहा था।
     ‘‘अरे, ये काली साड़ी... नो-नो... सफेद पहनिए।’’ मृतका की ग्रामीण चचेरी बहन को रोका उसने।
     ‘‘पर सफेद साड़ी तो....’’ वह झिझकी।
     ‘‘तो किराये पर ले लो। बड़ी बात है। साहब के ऑफिस में, मित्रों में, .... हर जगह यह वीडियो दिखाई जाएगी। बॉस का प्रेस्टिज इश्यू है न!’’ वीडियोग्राफर बोला।

पंख
     ‘‘ममा! परसों मेरा वर्थ-डे है। धूम मचेगी। ग्रेंड पार्टी होगी।’’ बिटिया उत्साहित थी।
     ‘‘हाँ-हाँ। बड़ी हो गयी, पर बच्चों की सी पुलक है। चल। कहीं जाना है मुझे।’’ स्कूटी पर बिठा मैं उसे अनाथालय ले आई।
     अनाथालय की इमारत साधारण थी। किन्तु साफ-स्वच्छ। खुले कमरे, कंपाउण्ड, कक्षाएँ।
     ‘‘इतनी सारी शील्ड्स, मैडल्स?’’
     ‘‘हमारे बच्चों ने जीते हैं।’’
     ‘‘कहाँ से लाते हैं आप इन बच्चों को?’’
     ‘‘रेलवे स्टेशन, बस अड्डे, होटल्स।’’
     ‘‘इनके धर्म?’’
     ‘‘जैसा ये नाम बताते हैं... जिस धर्म को अपनाना चाहते हैं।’’
छाया चित्र : डॉ. बलराम अग्रवाल 

     ‘‘यह बात वाकई जमी आपकी।’’
     ‘‘यहाँ आप अपने बच्चों की पुरानी नई-चीजें दान में दे सकते हैं। स्टेशनरी, बर्तन, बिस्तर, कपड़े, खिलौने आदि।’’
     ‘‘ममा! मेरे ज्यामेट्री बॉक्स, कलर्स, स्टोरी बुक्स रखे हैं। यहाँ दे जाएँगे।’’ बेटी उल्लसित थी।
     उनके वॉचमैन से मैंने कुछ चॉकलेट्स मंगवाईं। बेटी ने अपने हाथ से बच्चों को दीं।
     ‘‘दीदी, थैंक्यू। थेंक्यू दीदी।’’ बच्चे खुश थे।
     बेटी के मुख पर आनंद की ऐसी पनीली परत मैंने आज तक नहीं देखी। लौटते हुए कहा मैंने, ‘‘चलो, तुम्हारे वर्थ-डे की तैयारी करें।’’ पल भर को चुप हो गई वह। उसके चेहरे पर सोने से विचार चप्पू चला रहे थे।
     ‘‘हम यहीं अनाथ बच्चों के साथ पार्टी करें तो?’’
     ‘‘फिर तेरी पार्टी....?’’
     ‘‘मैं अपने फ्रेंड्स को यहीं बुला लूँगी। स्नेक्स पार्टी रख लेंगे। ज़्यादा खर्च भी नहीं आएगा।’’ यकायक मेरे बेटी बड़ी हो गयी।
     ‘‘ओ.के.। एज यू विश।’’ मेरी कल्पना को पंख मिल गए।
  • आर जेड डी-208-बी, डी.डी.ए. पार्क रोड, राज नगर-2, पालम कालोनी, नई दिल्ली-110077 / मोबाइल : 09650267277 



सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा     





कानून                

     भरी बस के साथ उमस भरी गर्मी। न्यूट्रल लेकर चालक बार-बार एक्सीलेटर दबाता पर बस को चलाता नहीं था। लोगों से ठुसी हुई बस में उसे अभी और सवारियों की जरूरत थी। होती देर और गर्मी ने मेरी बैचेनी को बढ़ा दिया। इन सब परेशानियों से बेखबर मेरे बगल की सीट पर बैठे दढ़ियल ने बीड़ी सुलगा ली। पहला कश भरकर जैसे ही उसने धुआं अपनी नाक से बाहर उगला, मुझे लगा कि मेरा दम घुट जायेगा। मुझसे बर्दाश्त नहीं हुआ तो मैं बोला, ‘‘मेरे भाई, बस में धूम्र-पान का जुर्माना सौ रूपये लग जाता है।’’
    उसकी तीखी नजरें मुझे ऐसे घूरने लगीं जैसे मैंने उसके मौलिक अधकारों पर कैंची चला दी हो। उसने मुझे चेताया, ‘‘वो देखो ड्राइवर भी तो सूटे मार रहा है, उसे रोकने के बाद मुझे जुर्माने की धमकी देना।’’
    मैंने ड्राइवर की ओर दृष्टि फेरी। मुसाफिर की बात ठीक थी। ड्राइवर भी पूरी मस्ती से मुँह में लगी बीड़ी का धूआँ उगल रहा था।        
    मैं उसे रोकने के लिए अपने स्थान से उठने को हुआ था कि मेरे अचेतन ने मुझे टोक दिया, ‘‘ड्राइवर इस बस
छाया चित्र : आदित्य अग्रवाल 
का सबसे खास आदमी है, अगर मैंने उसे कानून का पाठ पढ़ाने की कोशिश की तो निश्चय ही मेरी खिल्ली उड़ेगी। हो सकता है अपमानित भी होना पड़े, क्या पता मुझे बस से ही उतार दिया जाये। पर मेरे बगल में बैठा आम मुसाफिर कानून की परवाह न करे, यह मुझे हजम नहीं हुई। मैंने कहा, ‘‘उसे बाद में देख लेगें, पहले तुम बताओ कि अगर बस में जेब-कतरे सवार होकर सवारियों की जेब काटने लगें तो क्या तुम भी वही करने लगोगे?’’ 

     मुसाफ़िर ने हिकारत-भरी एक और नजर मुझ पर डाली और इत्मिनान से एक और भरपूर सूटा भरकर धुएँ के बादल उगलने के साथ कहा, ‘‘हो तो डरपोक पर बातें खूब बना लेते हो, इतनी समझ और पैदा कर लो कि बेमतलब की बातों की कोई अहमियत नहीं होती ........!’’ 
    मैं कोई प्रतिक्रिया व्यक्त करता इससे पहले ही वह फिर भन्नाया, ‘‘जाओ जुर्माना करने वाले को बुला लाओ, उससे निबटने के बाद तुमसे भी निबट लेगें’’
    मेरी समझ ने तुरन्त काम किया, ‘‘मैं चुपचाप बस से उतर कर घर पहुँचने का कोई और साधन ढूंढ़ लूँ, तभी मुन्ने का होम-वर्क करवा पाऊँगा, नहीं तो बेइज्जती तय है।’’ 

  • डी-184, श्याम आर्क एक्सटेंशन साहिबाबाद-201005, जिला गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश / मोबाइल :  09911127277



शुभदा पाण्डेय







उदारता की लिपि

     आशीष के कम्प्यूटर की दुकान पर मैं अक्सर जाया करता था। वह वहाँ पुराना कर्मचारी था। कार्य में प्रवीण किंतु कुछ घमंडी भी था। अपनी अहमियत जताने के लिए वह तुरन्त होने वाले काम में भी देर लगाया करता। 
     पर मैं क्या करता? काम रहता तो जाना ही पड़ता।
छाया चित्र : रामेश्वर काम्बोज हिमांशु 

     एक दिन मैं गया तो वह नहीं मिला। मालिक नन्दनाथ से पूछा तो पता चला, उसके पिता बीमार हैं। सुनकर अच्छा नहीं लगा। कई दिनों तक यही संवाद मिलता रहा।
    एक दिन पता चला, उसके पिता नहीं रहे। पता नहीं क्यों मैं बहुत दुखी हुआ। हमारे बीच कोई मित्रता भी नहीं थी। ग्राहक ही था मैं वहाँ, पर लगा बिचारा कितना दुखी होगा। पन्द्रह दिन बाद दुकान पर वह मिला। मैंने देखते ही गले से लगा लिया और अपनत्व के प्रवाह में, पिछली बातें बह गईं।
    मन से उसने सहयोग दिया। हम एक-दूसरे से कुछ भी नहीं कहे, पर अब जब मैं आता तो वह मेरा काम फौरन कर देता, पर इससे मुझे इतनी खुशी नहीं होती, जितनी उसे गले लगाकर। आखिर उदारता की कोई लिपि नहीं होती।
  • असम विश्वविद्यालय, शिलचर-788011, असम / मोबाइल :  09435376047



अनन्त आलोक




प्रसाद

     धोंगू अब धोंगू नहीं रह गया था, धनीराम हो गया था। उसके चारों पुत्र सरकारी नौकर हो गये थे। दो बड़े बेटे तो पहले ही आर्मी ऑफीसर हो गये थे और छोटे पुत्रों को भी अच्छी नौकरी मिल गई थी। आज वह बहुत खुश है। उसने घर पर सत्यनारायण भगवान की कथा रखवाई है। चारों पुत्र और परिवार के अन्य सदस्य खुशी-खुशी मेहमानों की खातिरदारी में लगे हुए हैं। घर भर मेहमानों की उपस्थिति में पण्डित ने प्रभु की आरती उतारी। पण्डित जी ने प्रभु को पंचामृत और प्रसाद का भोग लगाया और श्रोताओं में बांटने को कहा। धनीराम ने विनम्र आग्रह किया, ‘‘पण्डित जी पहले आप प्रसाद ग्रहण करें तो बाकी लोगों में बंटवा दूं।’’ 
    ‘‘अरे धोंगू तुम पगला गये हो का! नीच जाति के घर मा बना प्रसाद हम कइसे ग्रहण कर सकत हैं भई! हमार धरम भ्रष्ट होए जई।’’
     धनीराम को पण्डित की बात से कोई ज्यादा आश्चर्य तो नहीं हुआ, क्योंकि इस बात का उसे आभास था।
छाया चित्र : ज्योत्सना शर्मा 
लेकिन उसके मन में क्रोध जरूर आया। अपमान के घूंट पीते हुए उसने बस इतना कहा, ‘‘पण्डित जी, अभी-अभी आपने इसी प्रसाद का भोग भगवान को लगाया, यानि भगवान यह प्रसाद ग्रहण कर सकता है लेकिन आप नहीं! क्या आप भगवान से बड़े हैं? इससे पहले कि मेरे पुत्रों को इस बात का पता चले, कृपया आप यहाँ से चले जाएं। शायद आप जानते नहीं कि प्रभु की नज़र में तो हम सब एक हैं ही, कानून की नज़र में भी एक हैं और जो बात आपने इतने लोगों के बीच कही उसके लिए आपको सजा भी हो सकती है।’’

    ‘‘अरे नहीं धोंगू, अइसी कोन बात नहीं, तुम तो जानत हो हमार गांव में इ सब होता ही है। भइया अब माफ कर देवो, इ लीजिए पहिले परसाद हम ही खाए लेत हैं। सच्ची कहें हमार मन में कुछो न है, वो तो हमार पिताजी एइसा कहत हैं बस। हम तो...’’ इतना कह पण्डित ने प्रसाद अपने मुँह में डालते हुए थाली धनीराम को पकड़ा दी। उपस्थित श्रोताओं ने जोर से नारा लगाया- ‘‘सत्यनारायण भगवान की जय... पण्डित जी की जय।’’ धनीराम के मन का सारा मैल एक पल में साफ हो गया। उसने दक्षिणा पण्डित जी के हाथ में रखते हुए पण्डित जी के चरण स्पर्श करते हुए हाथ जोड़कर कहा, ‘‘कहा-सुना माफ करना पण्डित जी।’’ धनीराम की आँखों से आंसू झराझर झरने लगे।
     पण्डित ने धनीराम के हाथों को हाथ में लेते हुए उसे गले लगा लिया।
  • साहित्यालोक, ददाहू, तहसील नाहन, जिला सिरमौर-173022, हि.प्र. / मोबा. :  9418740772

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन :  वर्ष  : 3,   अंक  : 11-12,  जुलाई-अगस्त 2014

।। क्षणिका ।।

सामग्री : इस अंक में सर्व श्री केशव शरण, विश्वेश्वर शरण चतुर्वेदी व  अशोक आनन की क्षणिकाएँ। 


केशव शरण




{सुप्रसिद्ध कवि-क्षणिकाकार श्री केशव शरण जी की लघु कविताओं का संग्रह ‘दूरी मिट गयी’ हाल ही में प्रकाशित हुआ है। हमारी दृष्टि में इस संग्रह की अधिकांश रचनाओं को क्षणिका की श्रेणी में रखा जा सकता है। प्रस्तुत हैं इसी संग्रह से केशव जी की कुछ प्रतिनिधि क्षणिकाएं। इन रचनाओं में क्षणिका के सांप्रतिक स्वरूप और शिल्प को देखा जा सकता है।}

बारह क्षणिकाएँ

01. दूरी मिट गयी
मैं असंख्य पग चला
तुम्हारी ओर
मगर कुछ नहीं हुआ
तुमने एक पग बढ़ाया
मेरी ओर
और दूरी
मिट गयी

02. बयान
एक आदमी 
बयान देता है
रेखा चित्र : उमेश महादोषी 
और सब देने लगते हैं बयान

एक आदमी 
बलिदान देता है
और चुप हो जाते हैं सब

03. चार दिन और
चार दिन और
चिड़ियों को निहार लो
वे क्या कह रही हैं
कॉपी में उतार लो
फूलों और पेड़ों के चित्र
चित्त में संवार लो

चार दिन और
फिर रेगिस्तान में बहार लो

04.विकल्प
कांटे, कंकड़ न चुभें
इस डर से जूता पहना

अब जूता काटता है

क्या कोई और रास्ता है

05. रामलीला
सीता को समाना है
भू में
राम को समाना है
सरयू में
लेकिन देखता हूँ कि
रामलीला हो गयी समाप्त
राजगद्दी और नगर-भ्रमण के पश्चात

06. सिर्फ़ कहने को
रेखा चित्र : डॉ. सुरेन्द्र वर्मा 

जिस चांद को
अब निहार पा रहा हूं
वह अब भी सुदूरतर है

सिर्फ़ कहने को
पीली कोठी की मुंडेर पर है

07. डॉक्टर और मरीज़
हर नया डॉक्टर
एक नयी आशा जगाता है
हर नया डॉक्टर
देवदूत नज़र आता है
या उससे भी बड़ी चीज़

इतना झेल रहा है मर्ज़ को मरीज़

08. बनारस की खूबियां
बनारसी साड़ियां
और वृद्धाश्रम
बनारस की खूबियां हैं
कितने लोग आते हैं घूमने
जो जाते वक्त
बनारसी साड़ियां ले जाते हैं
और छोड़ जाते हैं वृद्धा को
गुमशुदा

09. गुल को क्या पता था
गुल जानता था
बाग़ है, मौसम है
तितलियां हैं
गुल को क्या पता था
गुलचीं भी है
गुलशन में

10. जाने मैं क्या
छाता ताने
मैं अपने को 
साफ़ पानी से बचा रहा हूं
और गंदे पानी में चल रहा हूं
संभल-संभलकर

जाने, मैं पागल कि जोकर
कि सयाना

11. भैंस के आगे
भैंस से
आगे निकल जाओ
नहीं तो भैंस को आगे निकल जाने दो

मड़िया मारकर आ रही है वह दलदल में
और तुम नयी धुली शर्ट-पैंट पहनकर
जा रहे हो विद्वत मंडल में
छाया चित्र : उमेश महादोषी 

12. तितली
तितली
इस खूबसूरत शै ने
मुझे छला है कितनी बार
हथेलियां मेरी
खरोंचों से भर गयी हैं तब

और वह उड़कर
दूसरे फूल पर जा बैठी है

  • एस 2/564, सिकरौल, वाराणसी कैन्ट-221002 (उ0प्र0) / मोबाइल : 09415295137



विश्वेश्वर शरण चतुर्वेदी





दो क्षणिकाएं

01.
फिर मन उद्भ्रान्त हुआ
किसी एक उपग्रह सा
मैं तुमको ‘ध्रुव’ मान
बहुत घूमा हूँ
छाया चित्र : उमेश महादोषी 

02.
तुम
तितलियों से बेहतर
तुम 
नागिनों से बढ़कर
पर हम भी, तुम समझ लो
फ़नकार आदमी हैं

  • 164/10-2, मौ. बाजार कला, उझानी-243639, जिला बदायूँ (उ.प्र.) / मोबाइल :  09997833538



अशोक आनन





क्षणिका

दीवारें
जिन्होंने 
सदा लोगों को जोड़ा
वे पुल
कब के ढह गए
लेकिन-
जिन्होंने सदा लोगों को बाँटा 
वे दीवारें
अब भी ज्यों की त्यों खड़ी हैं।

  • मक्सी-465106, जिला- शाजापुर, म.प्र. / मोबाइल : 09981240575

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन :  वर्ष  : 3,   अंक  : 11-12, जुलाई-अगस्त 2014

।।हाइकु।।

सामग्री : श्री राजेद्र परदेसी, श्री राजेन्द्र बहादुर सिंह ‘राजन’ व डॉ. रंजीत रविशैलम के हाइकु। 


राजेन्द्र परदेसी




पाँच हाइकु

01.
पंख नोचती
बदन टटोलती
आदम भूख
02.
थरथराते
बाजों के चंगुल में
विवश पक्षी
03.
रेखा चित्र : राजेन्द्र परदेसी 
असत्य जीता
विश्वास को तोड़ता
ताल ठोंकता
04.
बेवश सभी
डगमगाती नाव
संभाले कौन
05.
मंजिल नहीं 
उपजती हो जहाँ
ईर्ष्या की पौध

  • 44, शिव विहार, फरीदी नगर, लखनऊ-226015 (उ.प्र.)



राजेन्द्र बहादुर सिंह ‘राजन’




पांच हाइकु

01.
क्या बतलाएं
संसद में खो गयीं
संवेदनाएं।
02.
जब भी होती
मूसलाधार वर्षा
झोंपड़ी रोती।
03.
घटा सुहानी
 : उमेश महादोषी 

घुंघुरू बांध नाची
बरखा रानी।
04.
महात्मा वट
शीतल छाया देते
बिखेरे लट।
05.
मन कांपता
रावण अनगिन
राम लापता।

  • ग्राम-फत्तेपुर, पोस्ट-बेनीकामा, जिला-रायबरेली-229402 (उ.प्र.) / मोबाइल : 08601551022



डॉ. रंजीत रविशैलम

चार हाइकु

01.
नोट खाकर
बाघ की हुई मृत्यु
भूखा मानव
02.
असीम भार
रेखा चित्र : डॉ. सुरेन्द्र वर्मा 

अगाध ममता से
जन्मा वर्तमान
03.
ढूँढ़ा सुराग
पुलिस कर्मियों ने
मधुशाला में
04.
तलाश करो 
वह वीर सेनानी
गढ़ मूर्ति में

  • रविशैलम, कट्टाचाकूझी (Kattachalkuzhi), पोस्ट-अट्टारमूला (Attaramoola), बलरामपुरम (Balarampuram), तिरुवनन्तपुरम (Thiruvananthpuram)-695501 / मोबाइल :  08281494226 

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन :  वर्ष  : 3,   अंक  : 11-12  :  जुलाई-अगस्त  2014

।। जनक छंद ।। 

सामग्री : पं. ज्वालाप्रसाद शांडिल्य ‘दिव्य’ के बारह जनक छंद। 


पं. ज्वालाप्रसाद शांडिल्य ‘दिव्य’



{पं. ज्वालाप्रसाद शांडिल्य ‘दिव्य’ का जनक छंद संग्रह ‘मन के नयन हजार हैं’ हाल ही में प्रकाशित हुआ है। प्रस्तुत हैं इस संग्रह से ‘दिव्य’ जी के कुछ जनक छंद।}

बारह जनक छन्द

01.
स्वाभिमान को खो नहीं
चाहत पूरी हो नहीं
अंधे आगे रो नहीं
02.
ग्रहण किये परिवेश को 
देश और परदेश में
भूलो मत निज देश को
03.
आभायुक्त विशेष है
जन्मभूमि सुखधाम की
भारत देश विशेष है
04.
होवे शमन कलेश का
चलन चलें अवधेश का
मान बढ़े तब देश का
05.
प्रभा उगे ऊष्मा लिये
ओज तेज प्रतिभा बढ़े
बढ़े चलें गरिमा लिये
06.
नित्य दगा दे आदमी
ठगा-ठगा है आदमी
खूब भला है आदमी
07.
लगे शक्ल से आदमी
चाल-चलन से भेड़िया
छाया चित्र : उमेश महादोषी 
दीख रहा है आदमी
08.
घात-घात पर घात हो
गम ढोते हैं रात-दिन
पल-पल दृग बरसात हो
09.
दर्द लिये हर भोर है
फिर भी जीवित आदमी
बेचैनी हर ओर है
10.
साहस और उमंग हो
उद्धत हो जीवन कला
खुशहाली का रंग हो
11.
अधिकारों की बाढ़ है
कमर तोड़ती देश की
स्वारथ बुद्धि प्रगाढ़ है
12.
मनके नयन हजार हैं
राजा-रंक-फकीर तक
इसके सभी शिकार हैं

  • 251/1, दयानन्द नगरी, ज्वालापुर, हरिद्वार-249407 (उत्तराखण्ड) / मोबाइल :  09927614628

बाल अविराम

अविराम  ब्लॉग संकलन :  वर्ष  : 3,   अंक  : 11-12 , जुलाई-अगस्त 2014



।। बाल अविराम ।।


सामग्री :  डॉ. सुरेन्द्र दत्त सेमल्टी की बाल कविता बाल चित्रकार राधिका शर्मा के चित्र के साथ। 


डॉ. सुरेन्द्र दत्त सेमल्टी


वृक्षदेव

सबसे श्रेष्ठ हैं वृक्षदेव।
देते नित आम सन्तरा सेव।
मिलती इनसे शुद्ध हवा,
सभी रोगों की तन्त दवा।
इनसे पाते लकड़ी घास,
और भी कई तरह की आश।
भू-क्षरण भी वृक्ष रोकते,
वर्षा जल जड़ों से सोखते।
तब धरा-गर्भ में टिकता जल,
चित्र : राधिका शर्मा 

होता समस्याओं का हल।
पर्यावरण भी होता निर्मल,
शुभ होता है इससे हर कल।
प्रत्यक्ष देव हैं ये सब पेड़,
पलती भैंसें बकरी भेड़।
कई उद्योगों का आधार,
इनसे बनते हैं घर-द्वार।
ईंधन के भी काम में आते,
इन्हें बीनने जंगल जाते।
रोजगार भी इनसे मिलता,
इन्हें देख चेहरा है खिलता।
शहर-गांव के जनों को जगायें,
आवो मिल सब वृक्ष लगायें।

  • प्रभारी प्रधानाचार्य, राज. इं. कालेज, रणसोलीधार (चन्द्रवदनी), पो.आ. पुजार गांव वाया हिंडोला खाल, जिला टिहरी गढ़वाल-249122, उ.खंड / मोबाइल : 09690450659

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन :  वर्ष  : 3,   अंक  : 11-12,  जुलाई-अगस्त  2014


।। व्यंग्य वाण ।।

सामग्री :  श्री दिनेश रस्तोगी की दो व्यंग्य गजलें।


दिनेश रस्तोगी




दो व्यंग्य गज़लें

01.                   
मंत्री जी और साला  है।
भूत के हाथ में भाला है।
काली मांद का कारिन्दा,
उसका दिल भी काला है।
राजघाट के एक तरफ,
राजनीति का नाला है।
लोकतंत्र है नाम मगर,
सब गड़बड़ घोटाला है।
शोषण की शिकार है जो,
उसके मुंह पर ताला है।
इस करबट या उस करबट,
रेखा चित्र : डॉ. सुरेन्द्र वर्मा 

ऊंट बैठने .....वाला है।
जिससे हम समझे महफूज़,
पड़ा उसी से ....पाला है।

02.
बुद्धिमानों! आपदा का दौर है।
मूर्ख होने का मज़ा कुछ और है।
हुये होंगे तब के सब नेता महान,
आजकल तो गुंडई सिरमौर है।
खा के क्या अपना बनाओगे उसे,
जिस्म से जो पास, दिल इंदौर है।
उम्र दफना कर कमाते जितना हो,
एक मंत्री के वो मुंह का कौर है।
इस प्रदूषण ने कर दिया सारा उलट,
अब न वो बारिश,न अब वो बौर है।
क्या निकालें बाल की हम खाल अब,
जब कि सिर में अब न उनका ठौर है।

  • निधि निलयम, 8-बी, अभिरूप; साउथ सिटी, शाहजहांपुर (उ.प्र.)242226 / मोबाइल : 09450414473



अविराम विस्तारित

अविराम का ब्लॉग :  वर्ष :03, अंक : 09-10,  मई-जून 2014 

।।संभावना।।

सामग्री : सुश्री कमलेश सूद अपनी दो कविताओं के साथ।


कमलेश सूद



दो कविताएँ 

अच्छाई

अच्छाई-
एक सुगन्ध है
सुरभि सी फैलती है
चहुँ ओर 
सुबह की धूप जैसी 
देती है शीतलता
और बनकर चिड़िया
चहकती है, महकती है
बन कस्तूरी।
छाया चित्र :  उमेश महादोषी 


अहम्

आज भी पुरुष
वही पुरानी चादर 
ताने हुए अहम् की
तना हुआ है।

सदियों से
नारी की 
कोमल भावनाओं, वेदनाओं और
संवेदनाओं को वह
महसूसता ही नहीं।

अपने अहम् की धुरी की
करता है परिक्रमा
और सुविधानुसार बदलता है रंग
गिरगिट की तरह।
  • वार्ड नं. 3, घुघर रोड, पालमपुर-176061 (हि.प्र.) / मोबा. :  09418835456

अविराम विमर्श

अविराम  ब्लॉग संकलन :  वर्ष : 3,  अंक : 11-12,  जुलाई-अगस्त 2014 

।।विमर्श।।
  
सामग्री : मारीशस के वरिष्ठ साहित्यकार श्री राज हीरामन जी के साथ मॉरीशस व विश्व के अन्य हिस्सों में हिन्दी साहित्य की स्थिति एवं हीरामन जी के अपने साहित्य के बारे में श्री राजेन्द्र परदेसी जी की बापचीत।


मॉरीशस ने अपनी हिन्दी में सृजन करना सीख लिया है : राज हीरामन

श्री राज हीरामन 

{मॉरीशस के वरिष्ठ साहित्यकार श्री राज हीरामन के साथ मॉरीशस व विश्व के अन्य हिस्सों में हिन्दी साहित्य की स्थिति एवं हीरामन जी के अपने साहित्य के बारे में पिछले दिनों श्री राजेन्द्र परदेसी जी ने एक बातचीत की। यहां प्रस्तुत हैं उस बातचीत के कुछ प्रमुख अंश।}


श्री राजेन्द्र परदेसी 
राजेन्द्र परदेसी :  युवा पीढ़ी आप के व्यक्तिगत जीवन के बारे में कुछ विशेष जानना
चाहेगी, जैसे आपका जन्म-स्थान वहाँ का वातावरण आदि।

राज हीरामन :   मेरा जन्म 11 जनवरी 1953 को एक गरीब परिवार में हुआ। पिता को देखा नहीं, माँ मज़दूरी करती थी। 10 बच्चों में मैं अंतिम संतान था। माध्यमिक स्तर की शिक्षा प्राप्त की। आरम्भ में मज़दूरी की फिर पुलिस कान्स्टेबल और बाद में प्राथमिक और माध्यमिक स्तर का अध्यापक बना। रूस में पत्रकारिता की। स्थानीय रेडियो, टी.वी पर सालों तक पत्रकार रहा, “स्वदेश”, हिन्दी साप्ताहिक का सम्पादन किया। दो बेटियाँ लण्डन में शिक्षा प्राप्त कर रही हैं। उनकी माँ का स्वर्गवास हो चुका है, अकेला रहता हूँ। देर से पर 1997 में लिखना शुरू किया और पहली पुस्तक छपी। अब तक 21 पुस्तकें प्रकाशित। प्रकाशनाधीन कई कहानी संग्रह और तेरा गाँव बड़ा त्याज्य (यात्रा संस्मरण)।

राजेन्द्र परदेसी :  वे कौन थे, जिनसे आप प्रेरणा पाते हैं, जिनसे प्रभावित होकर आप रचना कर्म की दिशा में प्रस्तुत हुए हैं और होते रहते हैं?

राज हीरामन :   मेरी स्वर्गीय पत्नी, जिन्होंने सारे प्रेम-पत्र कविता में लिखे थे। उनका संकलन करके मुझे भेंट किया था। शादी के बाद और उनके चले जाने के बाद भी मैं लिखता ही आ रहा हूँ। कुंवर बेचेन, जब मॉरीशस पधारे थे और मेरे कमरे में रहते थे। शाम को दिन की लिखी कविता उनकी मेज़ पर रख देता था। वे रात को अपने कार्यक्रमों के बाद लौटते तो कविता देखते और लिख देते, ‘सुन्दर’ या ‘अति सुन्दर’। जब तक वे रहे हैं रोज़ ही कविता लिखता। उनके जाने के बाद भी लिखने की आदत बनी रही। कुंवर बेचेन ने मेरी क्षणिकाएँ पढ़ी और मुझे पत्र लिखा ‘आप अगर अब तक लघुकथाएँ न लिखते हो तो आप इन्हीं विचारों को उसमें पिरो सकते हैं।’ तब से अब तक मेरी तीसरी लघुकथा की पुस्तक छपने जा रही है।

राजेन्द्र परदेसी :  मॉरीशस के साहित्यिक वातावरण के विषय में आपकी क्या धारणा है?

राज हीरामन :   हिन्दी जैसे आप भारतीयों को विरासत में मिली है वैसे हम मॉरीशसवासियों को नहीं मिली। बहुत ही संघर्ष के बाद हमें हिन्दी प्राप्त हुई है। इसीलिए जैसे आपकी मातृ भाषा हिन्दी है। हमारे लिए हिन्दी दर्द है। संस्कार की भाषा है। मॉरीशस ने एक अपनी हिन्दी में सृजन करना सीख लिया है। वह प्रवासी हिन्दी ही... हमारी हिन्दी है। दर्द की भाषा है... सम्मान की भाषा है। इज़्जत की भाषा है। इसीलिए यहाँ एक अनुकूल वातावरण बनाने में हम कामयाब हुए हैं। हमारे यहाँ हिन्दी-सृजन खूब हो रहा है।

राजेन्द्र परदेसी:  मॉरीशस में प्रचार-प्रसार की स्थिति के बारे में कुछ बताइए।
राज हीरामन :   बच्चा 5 साल से विश्वविद्यालय स्तर तक हिन्दी निःशुल्क पढ़ रहा है। साथ ही पीएच. डी. तक के लिए हिन्दी में प्रावधान है। हिन्दी के प्रचार-प्रसार के लिए आर्य समाज/सनातन सभाएँ/आर्य रविवेद प्रचारिणी सभा/ हिन्दी प्रचारिणी सभा आदि स्वैच्छिक संस्थाएँ कर्म कर रही है। भारत-मॉरीशस सरकार हमारे देश में हिन्दी सचिवालय की स्थापना कर रही है और वह छः वर्षों से कार्यरत है। हिन्दी-प्रकाशन भी तेज़ी पर हैं।
राजेन्द्र परदेसी:  हिन्दी के प्रति साहित्य सृजताओं से अलग अन्य लोगों की सोच क्या है?

राज हीरामन :   जहाँ यह हिन्दी भाषा के साहित्यकारों की चिंता है, वहाँ यह उन लोगों की भी चिंता है, जिन्हें हिन्दी नहीं आती पर इसके प्रति उद्गार व्यक्त करते हैं, कि हमारे मुल्क में हिन्दी का भविष्य क्या है? क्या यह इतनी सारी महाशक्तियों के दबाव में पनप सकती है? कि हमारे देश में हिन्दी साहित्य जो आज कुछ नामी और अच्छे साहित्यकारों की वजह से एनटिक और संवाद में गण्य है,इस का भविष्य कैसा होगा? क्या आने वाली पीढ़ी तैयार हो रही है? या कोई उनकी तैयारी के बारे में सोच भी रहा है?

राजेन्द्र परदेसी :  मॉरीशस की साहित्यिक संस्थाएँ साहित्य के प्रति कहां तक प्रतिबद्ध है?

राज हीरामन :   हमारे यहाँ साहित्यिक संस्थाएँ न के बराबर हैं। धार्मिक संस्थाएँ ही हिन्दी प्रचार-प्रसार करती आ रही हैं। हिन्दी प्रचारिणी सभा ही एक ऐसी संस्था है जो सिर्फ़ और सिर्फ़ हिन्दी का कार्य कर रही है। पर ऐसा नहीं है कि हिन्दी साहित्य का कार्य नहीं हो रहा है। साहित्य सृजन यहाँ  ज़ोरों से चल रहा है। यद्यपि यहाँ प्रकाशन की सुविधाएँ अधिकतर नहीं है और महंगी है। फिर भी मॉरीशस ही ऐसा देश है जहाँ भारत से बाहर सबसे अधिक हिन्दी सृजन हो रहा है और हिन्दी प्रकाशन भी सबसे अधिक हो रहा है।

राजेन्द्र परदेसी : आपकी मातृ भाषा हिन्दी तो नहीं है, फिर भी आप हिन्दी के प्रति आपका लगाव क्यों हो रहा है?
राज हीरामन :   क्योंकि यह हमारा संस्कार है। यह हमारे बाप-दादों पर जो कोड़े अंग्रेज़ों ने बरसाए थे, वह दर्द ही हमारे लिए हिन्दी भाषा है। यह एक बहुत ही अहम धरोहर की भाषा है। यह हमारे भौंहों में बसती है। यह हमारे दिल में/हृदय में बसती है। हमारे खेतों की भाषा है/ प्रेम करने की भाषा है। संस्कार रूपी सांस्कृतिक चादर है हिन्दी। हिन्दी बोलना हमारे लिए वरदान है।

राजेन्द्र परदेसी :   साहित्य की किस विधा में आपकी विशेष रुचि है? और आप इस के अतिरिक्त किन-किन विधाओं में अपनी भावनाएं व्यक्त करते हैं?

राज हीरामन :   मेरी विशेष रुचि कविता है। मैंने कविता में ही प्रेम पत्र लिखना आरम्भ किया था। बाद में उन पत्रों का एक संकलन मेरे पत्नी के नाम पर है- ‘कविताएँ जो छप न सकीं’। पाँच काव्य संकलनों के प्रकाशन के बाद ही मेरा पहला कहानी-संग्रह छपा था। आजकल कहानी के साथ लघुकथा भी लिख रहा हूं। दो कहानी संग्रहों और दो लघुकथा-संग्रहों का प्रकाशन हो चुका है। हायकु, यात्रा-संस्मरण और डायरी भी लिख रहा हूं।

राजेन्द्र परदेसी :   मॉरीशस में साहित्य सृजन की क्या स्थिति है? आप इससे संतुष्ट हैं?

राज हीरामन :  मॉरीशस वह देश है, जहाँ भारत से बाहर सबसे अधिक हिन्दी धुरन्धर हैं। पूजानन्द नेमा, राज हीरामन, धनराज शम्भु, भानुमति नागदान, सुमति सन्धु, कुछ ऐसे रचनाकार है। कुछ दिनों पहले पूजानंद नेमा और पिछले साल भानुमति नागदान जी का स्वर्गवास हो चुका है। अभिमन्यु अनत को अगले सप्ताह साहित्य अकादमी का सर्वश्रेष्ठ सर्वाेत्तम सम्मान प्राप्त होने जा रहा है। उन्होंने अब तक हिन्दी में 85 पुस्तकों की रचना की है। जिनमें 60 उपन्यास हैं। रामदेव धुरंधर भी स्तरीय साहित्य लिख रहा है। बात संतुष्टि की नहीं है। एक गहरी चिन्ता है। आने वाले पीढ़ी के रचनाकार आगे आ नहीं रहे हैं अर्थात उनकी तैयारी नहीं हो रही है।

राजेन्द्र परदेसी :   आपके विचार से साहित्यकारों को प्रेरित करने के लिए कैसा वातावरण होना चाहिए?

राज हीरामन :   स्वच्छ वातावरण। ईमानदारी का वातावरण। सहानुभूति का वातावरण। सहिष्णुता का वातावरण। आक्रोश का वातावरण। शांत वातावरण ज़रूरी नहीं है। एकांत वातावरण ज़रूरी नहीं। नदी का कल-कल करता पानी। भौंरे का गुंजन, पहाड़-नदियाँ, उठती लहरें, हरे-भरे सुगंधित फूल की भी आवश्यकता नहीं! आज की माँग कुछ और है। आज आदमी अन्तर से बीमार है। तनावग्रस्त है! मानसिकता बिगड़ी हुई है। बच्चों के पालन-पोषण में फर्क आने के सहारे बदल रहा है। और ये सारी बातें लिखने के लिए आप हसीन होंठों से प्रेरित नहीं हो सकते।

राजेन्द्र परदेसी :   विश्व के स्तर पर हिन्दी भाषा और साहित्य के प्रचार एवं प्रसार की दिशा में जो प्रयास हुए उन से आप कहाँ तक संतुष्ट हैं? कोई सुझाव भी देना चाहेंगे?

राज हीरामन :   हिन्दी भारत की भाषा है न! जहाँ 700 वर्ष मुगलों और 200 साल तक अंग्रेज़ों ने राज किया। तोड़ा। तहस-नहस किया। चुराया और रोका। इसके बावजूद भी हिन्दी को कोई रोक नहीं पा रहा है। कल यह बाज़ार की भाषा बन जाती है तो हिन्दी की धारा में से लोग बह जाएँगे और इनका पता तक नहीं चलेगा। यह उसी तरह है जैसे गांधी के कदमों पर चलने वाले नेलसन मंडेला, उनका पाँच बार नाम लेने वाले को तो शांति का नोबल पुरस्कार मिल गया पर स्वयं गांधी को यह सम्मान नहीं मिला। क्यों? क्योंकि वे भारत के थे। इसलिए।
      अभिमन्यु अनत को जो मेरे देश का है, उन्हें साहित्य अकादमी को सर्वाेच्य सम्मान मिलता है। यह हिन्दी और हिन्दी की अंतरार्ष्ट्रीयता ही तो है। भारत के बाहर यहाँ सबसे अधिक हिन्दी रचनाकारों के प्रकाशन हो रहे हैं। यह अंतरार्ष्ट्रीयता ही तो है। मॉरीशस में हिन्दी सचिवालय का सक्रिय होना। सब संकेत देता है कि भारत को छोड़ दुनिया के अन्य देश भी हिन्दी के विकास के लिए कटिबद्ध हैं। दिलो-जान से वे हिन्दी को चाहते हैं और जी-जान से उसके लिए काम कर रहे हैं। हिन्दी को राष्ट्र संघ में ले जाने की ज़रूरत है। हमें हिन्दी को उस गद्दी बैठाने के लिए चंदा की धन-राशि की ज़रूरत पड़ेगी। लगन, श्रद्धा और हिन्दी को गले लगाने की आवश्यकता है।

राजेन्द्र परदेसी :   अपने अनुभवों के आधार पर आप नयी पीढ़ी को क्या कहना चाहेंगे?

राज हीरामन :  सभी यही कहते हैं। आज का युवा कल का नेता। क्या युवा वर्ग यह समझ रहा है कि भावी में उसकी क्या भूमिका रहेगी? और इसके लिए क्या और कितना करना पड़ेगा? भावी पीढ़ी खोखली नज़र आ रही है। नशाखोरी में कितने ही जीवन बर्बाद हो रहे हैं। ज़िम्मेदारी, कर्त्तव्य, शिष्टाचार आदि का तो कोई एहसास ही नहीं रहा। अभी हाल ही में मैं पटना में था मेरे मित्र हरिदेश अपने पत्नी के साथ मुझे मिलने आया और रॉची लौटते ही एम.पी. मनोनित हुआ। तब मैंने लिखा- ‘‘गांधी, जेपी, राम मनोहर लोहिया तुममें जन्मे हैं? आज युवा पीढ़ी में हम गांधी, जेपी, टेगौर, दयानंद, विवेकानंद, लोहिया के पुनर्जन्म की आशा डाल सकते हैं?
   ‘‘आज की द्रौपदी को/दुर्योधन की प्रतीक्षा है/वह इसका विरोध भी करती है/कि कृष्ण उसके बदले/अपनी नाक न डाले।’’
     क्या आज की युवा पीढ़ी मेरी इस क्षणिका को झुठला सकती है? वह गांधी नहीं बन सके तो अपने को उनके चरण छूने के काबिल बनाए। काबिलयत बेशुमार है। उसका सही प्रयोग करे और ज़माने को बदल डाले।


  • राज हीरामन,  Morcellement Swan, Beau Manguiers, Pereybere, Grand Bay, Mauritius / मोबाइल :  230-59109094 / ई मेल : rajheeramun@gmail.com


  • राजेन्द्र परदेसी :  44, शिव विहार, फरीदी नगर, लखनऊ-226015 (उ.प्र.) भारत / मोबाइल :  09415045584