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शनिवार, 22 सितंबर 2018

ब्लॉग का मुखप्रष्ठ

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  07,   अंक  :  11-12,  जुलाई-अगस्त 2018 


प्रधान संपादिका : मध्यमा गुप्ता
संपादक :  डॉ. उमेश महादोषी (मोबाइल : 09458929004)
संपादन परामर्श :  डॉ. सुरेश सपन 
ई मेल :  aviramsahityaki@gmail.com 


शुल्क, प्रकाशन आदि संबंधी जानकारी इसी ब्लॉग के ‘अविराम का प्रकाशन’लेवल/खंड में दी गयी है।


छायाचित्र : जितेन्द्र कुमार 



 ।।सामग्री।।
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अविराम विस्तारित : 

काव्य रचनाएँ {कविता अनवरत} :  इस अंक में सर्वश्री श्रीकृष्ण कुमार त्रिवेदी, श्रीराम दवे, संदीप राशिनकर एवं श्री हितेश व्यास की काव्य रचनाएँ।

लघुकथाएँ {कथा प्रवाह} : इस अंक में सर्वश्री (स्व.) पारस दासोत, भगीरथ, बी.एल. आच्छा एवं वं श्री संतोष सुपेकर की लघुकथाएँ।

हाइकु व सम्बंधित विधाएँ {हाइकु व सम्बन्धित विधाएँ} :  इस अंक में डॉ. सुधा गुप्ता  के हाइकु।

क्षणिकाएँ {क्षणिकाएँ एवं क्षणिका विमर्श {क्षणिका विमर्श} : 
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श्रीकृष्ण ‘सरल’ जन्म शताब्दी वर्ष {जन्म शताब्दी वर्ष में श्रीकृष्ण ‘सरल’ का स्मरणइस अंक में सरल जी के स्मरण क्रम में उनकी कुछ काव्य रचनाएँ 

किताबें {किताबें} :  इस अंक में डॉ.बलराम अग्रवाल की लघुकथा समालोचना पुस्तक ‘हिन्दी लघुकथा का मनोविज्ञान’ एवं सुश्री ज्योत्स्ना ‘कपिल’ के कहानी संग्रह 'प्यासी नदी बहती रही' की डॉ. उमेश महादोषी द्वारा एवं सुश्री कमलेश चौरसिया के कविता संग्रह 'पानी का पाट' की अपने जीवन काल डॉ.सतीश दुबे द्वारा लिखित समीक्षा।


गतिविधियाँ {गतिविधियाँ} : विगत अवधि में सम्पन्न कुछ साहित्यिक गतिविधियों के समाचार। 

अन्य स्तम्भ, जिनमें इस बार नई पोस्ट नहीं लगाई गई है इन पर पुरानी पोस्ट पढ़ी जा सकती हैं। 

सम्पादकीय पृष्ठ {सम्पादकीय पृष्ठ}:  
जनक व अन्य सम्बंधित छंद {जनक व अन्य सम्बन्धित छन्द} : 
व्यंग्य रचनाएँ {व्यंग्य वाण} :  
कहानी {कथा कहानी} :
लघुकथा : अगली पीढ़ी  {लघुकथा : अगली पीढ़ी} :
माँ की स्मृतियां {माँ की स्मृतियां} :  
बाल अविराम {बाल अविराम} :
संभावना {संभावना} :  
अविराम के अंक {अविराम के अंक} :
स्मरण-संस्मरण {स्मरण-संस्मरण} : 
साक्षात्कार {अविराम वार्ता} :  
अविराम विमर्श {अविराम विमर्श} :
लघुकथा विमर्श {लघुकथा विमर्श} : 
हमारे सरोकार {सरोकार} : 
लघु पत्रिकाएँ {लघु पत्रिकाएँ} : 
हमारे युवा {हमारे युवा} :  
अविराम के अंक {अविराम के अंक} : 

अविराम की समीक्षा {अविराम की समीक्षा} : 
अविराम के रचनाकार {अविराम के रचनाकार} :

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक  :  11-12,  जुलाई-अगस्त 2018 


।।कविता अनवरत।।



श्रीकृष्ण कुमार त्रिवेदी





गीत
मेरे दरवाजे का बबूल
झुकता है झोंके खा-खाकर,
कहता जाने क्या हँस-हँसकर,
मैं नहीं समझ पाता हूँ कुछ
वह तन जाता है इठलाकर।
तन जाते उसके शूल-शूल।
मेरे दरवाजे का बबूल।।

मैं एकाकी, यह एकाकी,
एक-दूसरे के साथी,
कितने दिन से कर रहे बात
पर बात बहुत अब भी बाकी।
कितनी ही बातें गये भूल।
मेरे दरवाजे का बबूल।।

इसकी डालें ऊपर उठतीं,
फिर शर्माकर नीचे झुकतीं,
मेरे भावों की अनुगामिन
वे संग-संग उठतीं-गिरतीं।
बहलाते मन ये पीत फूल।
मेरे दरवाजे का बबूल।।

हर शाम बैठ इसके नीचे,
सोचा करता आँखें मींचे,
मैं गायक यह मेरा श्रोता
इसने मेरे सरगम सींचे।
हम जग-सरिता के पृथक कूल।
मेरे दरवाजे का बबूल।।

पथ के दावेदार
दूर हो गए जो भी पथ से,
पथ के दावेदार हो गए।

चौराहे सब रीते-रीते
निर्जनता का मौन न रीते,
पीर सुहागिन हुई तमिस्रा
क्षण-क्षण हार-हारकर जीते।
छूट गए जो अँधियारे में,
मन के पहरेदार हो गए।


छायाचित्र : अभिशक्ति गुप्ता 
बंधन भारी हुए समय के
थक बैठे मधुमास उमर के,
कैसी आँख-मिचौनी खेली
मूक हुए क्रन्दन दिन भर के।
ऐसी भाषा पढ़ी प्राण ने,
शब्दकोश बेकार हो गए।

पूजा का सामान कहाँ है!
बस काँटों का हार यहाँ है,
मंदिर तक आ गया मगर अब
सौरभ का शृंगार कहाँ है?
साँसों का नैवेद्य न त्यागो,
आँसू वंदनवार हो गए।

  • द्वीपान्तर, ला. ब. शास्त्री मार्ग, फतेहपुर-212601, उ.प्र./फो. 05180-222828 

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक  :  11-12,  जुलाई-अगस्त 2018 


।।कविता अनवरत।।   


श्रीराम दवे




कविताएँ
उनकी खुशी

वस्त्र बदल लिए हैं
बहेलियों ने
उनके चेहरों पर
मुस्कानें चिपकी हैं
हाथों में प्रलोभन है
जाल हैं
काँटे हैं
बंदूकों में भरी गोलियाँ हैं
और
फितरतें हैं तरह-तरह की
तुम बचना...

देखना कहीं कि
तुम्हारे जवान होते बच्चे
उनकी निगाह में न आ पाएँ
उन्हें अच्छे नहीं लगते
गुटरगूँ करते/किलकारियाँ करते
चौकड़िया भरते और
अपना काम करते बच्चे
उन्हें बचाना...

जब आँखों का पानी मर चुका हो
तब पैदा होती है उनकी खुशी
उन्हें तुम्हारी खुशी से
कोई वास्ता नहीं है
शिकार करना-
ध्वस्त करना और
इतिहास में काले हरफ लिखना
उनकी खुशी है
तुम याद रखना...

उनकी जरूरतें

वह दिन भर
छतरियाँ सुधारता है
लेकिन उसने नहीं खरीदी
कोई छतरी कभी अपने लिए
धूप और बरसात
उसकी सगी भी तो नहीं है

फुटपाथ पर बैठा
जूता सुधारने वाला
नहीं खरीदता है
कोई नया जूता अपने लिए
उसके पाँव भी चाहते तो होंगे
कभी वे भी नए जूतों में कुनमुनाएँ

फूल बेचने वाली
कभी नहीं बाँधती
फूलों की नई वेणी अपने बालों में
भले ही खफा रहता हो उसका मरद
जूड़े में बँधी बासी वेणी के फूलों से

अपने-अपने कामों में
मसरूफ ये लोग
जानते हैं कि उनकी जरूरतें ये नहीं है
उनकी जरूरतें क्या हैं
नहीं जानते हैं
छतरियाँ सुधरवाने वाले 
जूते ठीक करवाने वाले
जूते ठीक करवाने वाले और
फूलों की वेणियाँ खरीदने वाले।

रामदुलारियाँ

एक और रामदुलारी
चिट्ठी छोड़कर चली गयी
अपने मैके
कभी वापस नहीं आने के लिए

क्यों चली जाती हैं
रामदुलारियाँ अपने मैके
बसी-बसायी/जमी-जमायी
गृहस्थियाँ छोड़कर
शायद नहीं चाहतीं वे
रोज-रोज उनके कानों में कोई
ज़हर बुझे तीर छोड़े

जो नहीं जा पाती हैं/अपने मैके
वे कुतुबमीनार से
घासलेट की वैतरणी से
सल्फास की गोलियाँ और 
छत के पंखों के रास्ते
अनाम/अनदेखे मैके की ओर
चल देती हैं
ताकि/वे भी ला सकें अगले जन्म में
अपनी देह के साथ
वह सब कुछ भी
जिससे उनके मर्दों को प्यार है
वास्ता है
और रामदुलारियों से चिढ़...
आत्मीय यदि तुम हो

हिमालय यदि तुम हो

मैं वाष्प से भरा बादल हूँ
तुमसे टकराना - पानी बन जाना
मेरी प्रवृत्ति है

वसुधा यदि तुम हो
मैं टपकी हुई बूँद हूँ
तुमसे टकराकर - तुममें मिल जाना
मेरी नियति है
आत्मीय यदि तुम हो
मैं समग्र समर्पित हूँ
तुम्हारे समक्ष समर्पित होना
रेखाचित्र : (स्व.) बी.मोहन  नेगी 

मेरी आत्मीयता है।

उस ओर

उस ओर मत जाना
बंधु मेरे 
वहाँ आग है
हवाएँ कैद हैं
और पानी सूख गया है
ज़मीन की आँख का

वहाँ बैठी है
निर्जन बसन्त में
एक कोकिल अभी भी
जिसकी कूहक
उसके हलक में फँसी हुई है
और
इतिहास पुरुष
उसके सामने खड़ा है-
याचक की मुद्रा में

मत जाना बन्धु मेरे, 
उस ओर- तुम!

  • 26, निर्माण नगर, रवीन्द्रनगर के पास, उज्जैन-456010, म.प्र./मो. 09425915010

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक  :  11-12,  जुलाई-अगस्त 2018 


।।कविता अनवरत।।   

संदीप राशिनकर




कविताएँ
ठिठुरते समय में

बर्फबारी के
इस सर्दीले दौर में
जहाँ 
जमती जा रही हैं
बर्फ़ की परतें
घरों पर
पेड़-पौधों पर/गाड़ियों पर
और तो और
मेरे, तेरे-उसके
आपसी संबंधों पर भी!
ऐसे सहमते/जमते,
ठिठुरते समय में
मैंने 
बचा रखी है
संवेदना के कोने में
थोड़ी सी
रिश्तों की गर्माहट
जो वक्त आने पर
गला सके, तोड़ सके
जमी हुई बर्फ़
यहाँ, वहाँ
न जाने 
कहाँ-कहाँ!!

याद
कह नहीं सकता
और न ही
कर सकता हूँ वादा
कि तुम्हें
सुबह, दोपहर, शाम
करूँगा याद,
कि 
पल-पल गुज़ारूँगा
तुम्हारी याद में!
किन्तु
रेखाचित्र : रमेश गौतम 
दिला सकता हूँ तुम्हें
इस बात का यकीं
कि तुम्हें
भूलूँगा कभी नहीं!!

गौरेय्या

कैलेन्डर देखा
बीस मार्च- ‘‘गौरेय्या दिवस’’
इक्कीस मार्च- ‘‘कविता दिवस’’
सच ही तो है
गौरेय्या आती है
तब ही तो सिरजती है कविता
गौरेय्या के पंखों पर सवार
आसमां को नाप
उतरती है कविता
कागज़ पर हौले से!
गौरेय्या का होना
कविता का होना है
गर कहीं भी
उतरती है कविता
तो सच मानिए
कहीं आसपास ही होगी
गौरेय्या भी!!
  • 11-बी, राजेन्द्र नगर, इन्दौर-452012, म.प्र./मो. 09425314422

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक  :  11-12,  जुलाई-अगस्त 2018 


।।कविता अनवरत।।   


हितेश व्यास






ग़ज़ल 

सारी उम्र बनाते रहते हम मिट्टी के घर
सारी उम्र सजाते रहते हम मिट्टी के घर

सचमुच की ये दुनिया उजड़ी जाने कितनी बार
सारी उम्र बचाते रहते हम मिट्टी के घर

रेखाचित्र : डॉ. सुरेंद्र वर्मा 

खाम खयाली में ही काटा हमने ये जीवन
सारी उम्र मिटाते रहते हम मिट्टी के घर

पानी का बस एक बुलबुला जीवन का सच है
सारी उम्र बताते रहते हम मिट्टी के घर

ताजमहल की हमने यारो ऐसे रक्षा की
सारी उम्र लुटाते रहते हम मिट्टी के घर
  • 6 ए/705, कल्पतरु सेरेनिटी, महादेव नगर, माँजरी, पुर्ण-412307, महा./मो. 09730987500

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  07,   अंक  :  11-12,   जुलाई-अगस्त 2018 


।।कथा प्रवाह।।


स्व. पारस दासोत





भूख

     अपने दौड़ते हुए बेटे को पकड़कर,...
     वह बोली- ‘‘नाश मिटे! तुझको मैंने कितनी बार बोला, ‘‘दौड़ा मत कर, कूदा मत कर! तू समझता क्यों नहीं!’’
     यह सब देख-सुनकर उसकी पड़ौसिन बोली-
     ‘‘अरी बहिन, बच्चा है, दौड़ने-कूदने दो! बहिन, क्या तुम्हें मालूम नहीं, दौड़ने-कूदने से भूख अच्छी लगती है! स्वास्थ्य अच्छा रहता है!’’
     .......
     वह, अपने बेटे को, पड़ोसिन से कुछ न कहते हुए, इस तरह पीट रही थी, मानो वह, उसे समझा रही हो-
     ‘‘भूख, दौड़ने-कूदने से अच्छी नहीं, अधिक लगती है!’’

आइ लव यू

     ‘‘ब्यूटी पार्लर पर अपना मेकअप होने के बाद,...
     उसने, जैसे ही इस बार अपने को आइने में देखा, विस्मय स्वर से बोली- ‘‘ये ऽ ऽ....! ये मैं! नहीं, यह मैं नहीं, मेरी सौतन है।’’
     और उसने, शीघ्र ही अपना मेकअप वॉश-बेसिन पर पहुँचकर पोंछ डाला।
     मैंने देखा-
     वह, आइने में उभरे अपने अक्श को, ‘आइ लव यू’ बोलकर चूम रही थी।


  • परिवार संपर्क : श्री कुलदीप दासोत, प्लॉट नं.129, गली नं.9 (बी), मोतीनगर, क्वींस रोड, वैशाली, जयपुर-301021 (राज.)

अविराम विस्तारित

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।।कथा प्रवाह।।




भगीरथ 




चेहरा                                              
        आयशा शीशे में निहार रही है, अपने आपको। भौहों पर पेंसिल फेर ली। हाँ, अब कुछ बात बनी। लेकिन, नहीं लिपिस्टिक जरा सी फैल गई, उसे पौंछ डाला, रंग जरा गहरा है, इसमें तो वह सोफिस्टिकेटेड नहीं लगेगी। हल्का गुलाबी ओठ के रंग से मैच करता ही ठीक रहेगा। उसने देखा गालों की हड्डियाँ कुछ ज्यादा उभरी हैं, बेहतर होगा उन पर रूज़ फैला ले तो यही शिखर चौंधिया देंगे। जूड़े को सम्भालते वक्त ख्याल आया कि यह स्टाइल बहुत पारम्परिक है, और ध्यान आकृष्ट करने में बिल्कुल नाकाम रहेगी। बेहतर होगा मॉड स्टाइल अपना ले, पर इसके खतरे भी हैं; फिर तो लोगों के ध्यान के केन्द्र में रहेगी। तब गली-कूचे, बस-स्टेंड कहीं भी सुरक्षित महसूस नहीं कर पायेगी। इससे तो अच्छा है, हल्के से बालों को छितरा लिया जाये, ताकि उनमें एक तरह की उन्मुक्तता रहती है। और नारी में उन्मुक्तता कौन नहीं पंसद करता, बालों में कंघी फेरते, उसने एक झटके से बाल ऊपर फेंके, यह क्या! उसे तीन-चार बाल अपनी पूरी लम्बाई में धूप से उजले नजर आये, डाई करने की बजाय उन्हें उखाड़ फैंका जाये। आखिर कुछ संघर्ष के बाद बाल उखाड़ फैंके, मानो उम्र को दरकिनार कर दिया हो ।
      हम हमेशा  युवा और सुन्दर दिखना चाहते हैं। चेहरा ही हमारी पहचान बनकर रह गया है। आयशा यह जानती है; फिर भी उसने आँखों के काजल को जरा गहरा कर दिया, ताकि आँखें बड़ी और सुन्दर दिखाई पड़ें और जरा चंचल भी प्रतीत हो। आखिरी नजर डालते उसे महसूस हुआ कि वह अब आयशा नहीं रही। 

  • 228, नयाबाजार कालोनी रावतभाटा, राजस्थान पिन- 323307

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  07,   अंक  :  11-12,   जुलाई-अगस्त 2018 


।।कथा प्रवाह।।

    
बी. एल. आच्छा





संगमरमरी आतिथ्य

      बहुत दिनों से उनका आग्रह था। नये घर को देख लूँ। सीमेण्ट-कंक्रीट की सड़क को पारकर उनके बँगले पहुँचा। घंटी बजने के बावजूद बड़ी देर से दरवाजा खुला। संयोग से नौकर ने नहीं खोला। वे बोले- ‘‘आइए, आज आए तो सही।’’
      ‘‘मकान तो बहुत शानदार बनाया है।’’
      ‘‘हाँ, चालीस-साठ का है। अब तो जमीनें ही आसमान पर हैं।’’
      ‘‘पर, आपने तो आसमान में ही तीसरी मंजिल तान दी है।’’
      ‘‘अरे, अपन बनाते हैं, तो फिर अच्छा ही। यह देखिए, हॉल तो पूरे ग्रेनाइट का है।’’
      ‘‘बहुत सुन्दर।’’
      ‘‘लाइटिंग भी सब मॉडर्न है, अधिकतर इण्डिया से बाहर का।’’
      ‘‘खूबसूरत।’’
     ‘‘इस झीने को आर्किटेक्ट ने कलात्मकता दे दी है।’’
      ‘‘देखते ही बनता है।’’
      फिर वे एक-एक कमरा, लेट-बाथ की आधुनिकता को नुमाइश की तरह पेश करते रहे। मैंने कहा- ‘‘मार्बल तो उम्दा क्वालिटी का है।’’
      वे बोले- ‘‘माल मंे तो कोई कसर छोड़ी ही नहीं है।’’
      बड़ी देर बाद ड्राइंग रूम में बैठे हुए उन्होंने सोफे से एक मीटर दूर रखी सेन्ट्रल टेबल की ओर इशारा करते हुए कहा- ‘‘ये लीजिए न!’’
      दूर ट्रे में सजे सूखे मेवे दूरी की वजह से मुँह में गीले नहीं हो पाये। मुझसे इतनी दूर का जवानी आतिथ्य निभाया नहीं गया। बोल दिया, ‘‘अभी लंच लेकर ही आया हूँ।’’
     ‘‘अच्छा, चाय तो चलेगी?’’ अब मैं क्या बोलता? चाय की प्रतीक्षा के बीच वे बोले- ‘‘कैसा लगा हमारा मकान?’’
      मुझसे रहा न गया। बोला- ‘‘इमारतों के मार्बल तो ‘ताजमहल’ सरीखे लगते हैं, प्रेम दिख जाये तो सुहाने हो जाते हैं घर।’’


  • 36, क्लीमेन्स रोड, सखना स्टोर्स के पीछे, पुरुषवाकम् चेन्नई-600007, तमिलनाडु/मो. 09425083335