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रविवार, 30 सितंबर 2018

श्रीकृष्ण 'सरल' जन्म-शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में विशेष सामग्री

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  08,   अंक  :  01-02,   सितम्बर-अक्टूबर 2018




श्रीकृष्ण सरल जी 
श्रीकृष्ण 'सरल' स्मरण 

महान साहित्य मनीषी और तपस्वी महाकवि श्रीकृष्ण ‘सरल’जी के जीवन और कर्मगाथा से जुड़े कुछ प्रसंग हमने पिछले कुछ अंकों में  प्रस्तुत किये थे।  इस कड़ी में प्रस्तुत है-  श्री अशोक वक्त जी का आलेख ‘सरल महाकाव्यों में शहीद माताओं का पुण्य स्मरण’। आशा है नई पीढ़ी तक उनकी स्मृतियों की सुगन्ध का एक झोंका अवश्य ही पहुँचाने में हम सफल होंगे। -संतोष सुपेकर, अविराम साहित्यिकी के श्रीकृष्ण ‘सरल’ स्मरण विशेषांक के विशेष संपादक}




अशोक वक्त



सरल महाकाव्यों में शहीद माताओं का पुण्य स्मरण


      अपने साहित्य में सरलजी ने नारी की आदर्श छवि प्रस्तुत की है। उनकी महाकाव्य यात्रा का आरम्भ ही एक महान नारी के स्तवन से हुआ था, जिसने क्रान्तिनायक भगतसिंह को जन्म दिया था। सिंह जननी विद्यावती देवी का महान चरित भगतसिंह महाकाव्य में रेखांकित हुआ है। नारी की महिमा का चित्रण सरलजी ने अनेक स्थानों पर किया है। मादाम कामा पर उन्होंने अपना आठवाँ महाकाव्य लिखा और वह भी 70 वर्ष की अवस्था में। फिर जीवन की सांझ में उन्होंने रामायण की सीता पर एक और महाकाव्य लिखा- ‘सरल सीतायन’। नारी चरित्र को केन्द्र में रखकर लिखे गए इन दो महाकाव्यों के अलावा अपने अन्य महाकाव्यों में भी जहाँ कहीं अवसर मिला, उन्होंने नारी चेतना को रेखांकित किया है। उन्होंने अपने लेखन के लिए जो राष्ट्रीयता का परिवेश चुना था, उसमें समकालीन सामाजिक स्थितियों में महिलाओं की समस्याओं और संक्रमण का चित्रण करने का अवकाश उनके पास नहीं था, अतः प्रासंगिक रूप से ही, जहाँ कहीं उनके काव्यनायकों की यशश्वी गाथाओं में नारी की महत्वपूर्ण भूमिका का सन्दर्भ आया है, सरलजी ने उसे विशेष रूप से उभारने के प्रयास किए हैं।
      अपने प्रथम महाकाव्य ‘सरदार भगतसिंह’ की रचना के आरम्भ से ही वे मातृशक्ति से अभिभूत रहे। महाकाव्य लिखने से पहले वह सिंह-जननी से मिले थे और महाकाव्य पूर्ण होने पर उनके द्वारा ही लोकार्पण सम्पन्न करवाया था। महाकाव्य का आरम्भ भी भगतसिंह से नहीं, अपितु विद्यावती देवी से ही हुआ है और ‘सिंह जननी’ शीर्षक से शहीद माता से भेंटवार्ता का मार्मिक चित्र कवि ने प्रस्तुत किया है, जिसमें वीरपुत्र की वीर माँ की प्रेरक छवि से साक्षात्कार होता है। फिर ‘बुढ़िया पुराण’ शीर्षक से नारी-मनोविज्ञान और वात्सल्य का वर्णन हुआ है। दूसरे सर्ग में माँ के साथ ही चाची की गोद में भगतसिंह को राष्ट्रीयता के जो संस्कार मिले, उसका मार्मिक वर्णन है। भगतसिंह के बचपन में, घर में दो चाची अपने रणबाँकुरे पतियों की वियोगिनी बनी स्वतंत्रता संग्राम के लिए नई पौध को संस्कारित कर रही थीं, जिनके प्रेरक चित्र सरलजी ने ‘गृहणी या तपस्विनी’ शीर्षक चौथे सर्ग में प्रस्तुत किए हैं। ‘मक्खन की टिकिया या बम का गोला’ में भी क्रान्तिनायक के दुलार में माँ और चाची के महनीय चरित्र प्रकाशित हुए हैं। वास्तव में भगतसिंह महाकाव्य के आरम्भिक सर्ग वीर नारियों की आदर्श छवि का अंकन करते हैं, जिनके स्नेह-संस्कार की छाया में सिंह शावक के मन में आजादी की चिंगारी सुलगी थी। अठारहवें सर्ग में युवा भगतसिंह के ‘अन्तर्द्वन्द्व’ में नारी और परिणय का निषेध कर आजादी के लिए लड़ने के संकल्प की विजय का चित्रण है। क्रान्तिनायकों के जीवन में पत्नी, प्रेयसी आदि के रूप के लिए सरल साहित्य में अधिक अवकाश नहीं था। क्रान्तिकारियों द्वारा अपने निजी जीवन में नारी का यह निषेध परिस्थितिजन्य था और इसी रूप में सरलजी ने उसका चित्रण किया है। स्वतंत्रता समर के जिन वीरों के विवाह हो गए थे, उनकी जीवनसंगिनियों ने जो त्याग-तपस्या की है, उस मूक कहानी का एक मार्मिक चित्र ‘शहीद भगतसिंह’ महाकाव्य में अमर शहीद भाई बालमुकुन्द की पत्नी सती रामरखी के रूप में कवि ने प्रस्तुत किया है। भाईजी कारावास में थे और नई ब्याहता पत्नी रामरखी बस राम के आसरे पर ही बाहर थीं, सरलजी ने कहा है- ‘‘जब ग्रहण लगे ग्रहपति को तो फिर खिली-खिली धूप कहाँ/दर्पण ही अंधा हो जाए तो फिर मुख देखे रूप कहाँ/इसलिए खिन्न है रामरखी सचमुच ही इस युग की सीता/पति काराग्रह में घुटा करे, गृह में क्या सुख ले परिणीता।’’ 
      जब रामरखी को अपने पति को फाँसी दिए जाने का सन्देश मिला तो उसने वीरांगना का बाना पहन लिया और कलेजे पर पत्थर रखकर कहा कि मैं स्वयं शव लेने आती हूँ। घर से चलने के पहले, आँगन में तुलसी के बिरवे से लिपट गई और भाव-विह्वलता में वहीं प्राण त्याग दिए। रामरखी को सती कहकर सरलजी ने उनके प्राणार्पण का हृदयस्पर्शी चित्रण किया है और भारतीय नारी की महत्ता को उजागर किया है- ‘‘क्यों न हृदय यह स्वीकार करे, नारी गौरव-गरिमा नर की/मन-वचन-कर्म से यह सदेह छाया है उसके अन्तर की/जग के मरुथल में जीवन की नारी ज्वलंत परिभाषा है/ममता की, त्याग-तपस्या की, यह श्रद्धा की परिभाषा है।’’
      रामरखी का पति के बलिदान के साथ प्राणर्पण वास्तव में पतिपरायणा के साथ ही देशभक्ति का भी परिचायक है। रामरखी के इस मूक आत्मार्पण के बाद ‘सरदार भगतसिंह’ महाकाव्य में, स्वतंत्रता समर में प्रत्यक्ष योगदान करने वाली जिस वीरांगना का चित्र प्रस्तुत हुआ है, वे क्रान्तिकारी भगवतीचरण वोरा की जीवनसंगिनी और अन्य क्रान्तिकारियों की दुर्गा भाभी हैं। दुर्गा भाभी ने ही स्वांग बनाकर दिल्ली से कलकत्ता तक पुलिस की आँख में धूल झोंककर भगतसिंह को सुरक्षित पहुँचाया था। भगतसिंह आला अफसर बने थे, गोद में अपने नन्हें पुत्र शचीन्द्र को लिए हुए दुर्गा भाभी ने उनकी पत्नी का रूप धर कर असीम साहस और बलिदानी भावना का परिचय दिया था। जरा-सा भी शक होने पर माँ और बेटे पुलिस की गोली का शिकार बन सकते थे, पर उस दिन तो दुर्गा भाभी, सचमुच दुर्गा बन गई थीं- ‘‘संकल्प मचलते जब नारी उर में ज्वलंत/युग करवट लेता इतिहास बदलते हैं/इसके स्नेहिल उर में ढलते सौ-सौ बसंत/इसके उर में मान के सपने पलते हैं।/नारी दुर्गा का रूप सदा धरती आई/इस धरती पर जब ऐसा अवसर आया है/इस समय स्वयं दुर्गा नारी बनकर निकली/श्री भगतसिंह के सर पर शीतल छाया है।’’
      वे भगतसिंह के लिए मातृतुल्य भाभी थीं, जिन्होंने विपत्ति में प्राण जोखिम में डालकर पत्नी का अभिनय किया था। जब भगतसिंह दिल्ली असेम्बली में बम के धमाके करने निकले थे, तब दुर्गा भाभी से ‘अंतिम विदा’ में माँ के स्वरूप की ही वन्दना यहाँ की गई है। भगतसिंह कहते हैं- ‘‘माँ नहीं यहाँ तुम्हीं माँ हो, दो विदा मुझे/स्नेहिल उर का पावन आशीष लुटाओ तुम।/जो दूध पिया है माँ का, उसकी लाज रखूँ/माँ बनकर भाभी मन में यही मनाओ तुम।’’
      दुर्गा भाभी और सुशीला दीदी की स्नेहिल विदा के बाद लाड़ला क्रान्तिकारी बलिदानी राह पर चला गया। उसके आँखों से ओझल होने तक, करुणा का जो बाँध जैसे-तैसे बँधा था, वह भरभरा कर ढह गया और आँसू की गंगा प्रवाहित हो उठी। इस मार्मिक प्रसंग के अन्त में सरलजी ने नारी-मन की सहज करुणा का हृदयद्रावक चित्रण किया है- ‘‘फिर चरणों की वंदना नमित नयनों से कर/वह चला गया कर्त्तव्य और बलि के पथ पर।/सावन की बोझिल बदली से ये नयन/इधर अब बरस पड़े झर-झर-झर-झर-झर-झर।’’ 
      महाकाव्य के अन्त में, एक बार फिर शहीद जननी का अत्यन्त प्रखर राष्ट्रवादी स्वरूप सरलजी ने साकार कर दिया है। भगतसिंह ने जब स्वयं को फाँसी दिए जाने का सन्देश अपनी माँ को भेजा था, तब चरम करुणा से विलगित क्षणों में विलक्षण साहस और धीरज के साथ विद्यावती देवी ने देशभक्ति की मिसाल पेश की थी। सरलजी के शब्दों में, माँ कहती है- ‘‘देखूँ उसका रूप मुक्ति अरुणोदय की लाली में/मेरा लाल मुझको मिले धरती की खुशहाली में/माँ होकर भी कहती हूँ मैं, लाल भले झूले/आजादी की मंजिल को बलिदान किन्तु यह छू ले।’’
      मातृत्व के उदात्त बलिदानी स्वरूप को भगतसिंह की माँ के रूप में कवि ने जीवन्त कर दिया है। माँ के साथ ही वीरांगना चाचियों के चरित में भी त्याग, तपस्या और करुणा के स्वर उभरते हैं। रामरखी का प्राणार्पण नारी के सहज सतीत्व को आलोकित कर जाता है। दुर्गा भाभी के रूप में स्वयं नारी के स्वतंत्रता-समर में प्रेरक संचरण का प्रेरक चित्र उभरता है। इस तरह महाकाव्य में स्वतंत्रता-समर के युग की नारी के त्याग, करुणा और बलिदानी भावना से परिपूर्ण आदर्श चरित्र का साक्षात्कार होता है। यथार्थ का एक और करुणा कातर पहलू ‘शहीद चन्द्रशेखर आजाद’ महाकाव्य में उभरा है। चन्द्रशेखर बनारस में, पढ़ाई छोड़कर स्वातंत्र्य समर में कूद पड़े थे। तब भाभरा गाँव में, अकेली विधवा माँ ने कैसे दिन काटे होंगे, उसका मार्मिक चित्र कवि ने प्रस्तुत किया है- ‘‘लाड़ले की विविध लीलाएँ उसे जब याद आतीं/कौंध जाती वेदना, कस कर कलेजा थाम लेती/ज्योति आँखों की भटकती थी अँधेरे के वनों में/छोड़ती निश्वास, अपने लाल का वह नाम लेती।’’
      अकेली, असहाय माँ ने, आजादी के लिए लड़ते लाड़ले के वियोग में एक-एक पल जो पथरायापन जिया होगा, उसका मूल्य भला आजादी के इतिहास में कौन आँक सकता है। नारी की करुणाकातर, विवश और दुखियारे रूप की पहली अभिव्यक्ति महाकाव्य में माँ के माध्यम से ही हुई है- ‘‘याचना करती, कुशल उसकी मना, अशरण-शरण प्रभु/लौट आए, लाल मेरा, युक्ति वह उसको सिखाना/मैं अकेली ही बहुत हूँ झेलने दारुण व्यथाएँ/तू किसी माँ को दुर्दिन नहीं ऐसे दिखाना।’’
     ‘‘जय सुभाष’’ महाकाव्य के प्रथम सर्ग में सरलजी ने स्वयं सुभाष की वाणी में मातृ-महिमा की वन्दना करते हुए त्रिभुवन की सब सम्पदा को माँ की ममता के सामने नगण्य बतलाया है- ‘‘वह सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण क्षण होगा माँ/जब मुझको अपनी माँ की याद नहीं आए।/माँ के ऋण से ऋणमुक्त स्वयं को समझे जो/उस मानव का जीवन क्यों जीवन कहलाए।/माँ की ममता जिसको अनुप्राणित करे नहीं/वह जीवन, जीवन नहीं, बोझ सचमुच भारी।’’
      बलिदान की वेला में शहीदों से अपनी माँ का स्मरण कराते हुए कवि ने उन संस्कारों को श्रेय दिया है, जो क्रान्तिकारियों ने बचपन में माँ की गोद में प्राप्त किए थे। अशफाक की कुर्बानी के समय यही भावना व्यक्त हुई है- ‘‘जब माँ से रुख्सत चाही, आँखें भर आईं/बोला अम्मी ग़म करें नहीं, मैं जाता हूँ/जो दूध आपका पिया, शान उसकी रखने/जिन्दगी वतन के खातिर भेंट चढ़ाता हूँ/जो नसीहतें आपने मुझे दीं बचपन में/अंजाम उन्हीं सब ही का, यह कुर्बानी है/वायसे-फख्र है सबको मेरी खिदमत/इस वक्त जरा भी गम करना बेमानी है।’’
      कवि की दृष्टि में नारी के जीवन की चरम सार्थकता मातृत्व में ही निहित रहती है। ‘विवेक श्री’ महाकाव्य का आरम्भ कवि की मातृत्व के प्रति श्रद्धा-भावना से ही होता है- ‘‘मातृत्व सार्थकता है नारी जीवन की/कोमल फूलों की जैसे सुरभि हुआ करती/परितृप्ति हुआ करती सुन्दर नयनों की/अन्तर प्रदेश को लेकिन सुरभि छुआ करती/मातृत्व किसी नारी का उसी भाँति होता/भूमिका बीज की जैसे सफल अंकुरण है/जिस तरह प्यास की परिणति तृप्ति हुआ करती/जिस तरह किसी काया में होता जीवन है।’’
      सरलजी ने प्रायः अपने सभी महाकाव्यों के नायकों के जीवन में उनकी माँ के स्नेह और संस्कार के महत्व का चित्रण किया है। माँ की ममता की कोमलता और दृढ़ता को लक्ष्य करते हुए ‘स्वराज्य तिलक’ में कवि ने कहा है- ‘‘नारी उर में ममता-दृढ़ता दोनों पलती/आशंका से भी वह विचलित हो जाती है/यदि दृढ़ता पर उतरे, पर्वत को मात करे/जिसका जैसा हो समय, रूप दिखलाती है/संतान-वत्सला ऐसी होती आई माँ/उनके पथ में वह अपने प्राण विछा देंगी/संतान पक्ष का कोई अहित करे कैसे/वह क्रुद्ध सिंहनी जैसा रूप दिखा देंगी।’’
      ‘स्वराज्य तिलक’ में एक अनाम नारी की मातृछवि ‘अग्निपथ’ शीर्षक से प्रस्तुत की गई है, जिसे कवि के शब्दों में सब ‘माताजी’ के नाम से ही जानते-पुकारते थे और वे कलकत्ता में आदर्श विद्यालय चलाती थीं। माताजी की दुःख भरी कहानी का उल्लेख करते हुए कवि ने बताया है कि महाराष्ट्र की एक विधवा देव-दर्शन के लिए काठमाण्डू गई और नेपाल नरेश से प्रणय-विवाह हो गया। दरबारी षणयंत्र में नेपाल-नरेश की हत्या के बाद माताजी कलकत्ता में आ बसी थीं। माताजी लोकमान्य तिलक को अपना आदर्श मानती थीं और कलकत्ता कांग्रेस के समय तिलक को सशस्त्र क्रान्ति का पथ अपनाने का परामर्श उन्होंने दिया था। इस प्रसंग के बारे में सरलजी ने भूमिका में लिखा है- ‘‘कलकत्ता की माताजी द्वारा नेपाल में बन्दूकों का कारखाना खुलवाने की प्रेरणा श्री तिलक को देना कल्पित बात नहीं है। लोगों के पास उसके प्रमाण हैं।’’ सरलजी ने लिखा है तो अवश्य उन्होंने यह प्रमाण देखे होंगे, पर अगर ऐसे प्रमाणों के समुचित सन्दर्भ भी सरलजी ने प्रस्तुत कर दिए होते तो राष्ट्रनायकों के जीवन विषयक अनुसंधान में बड़ी सहायता मिल सकती थी। अब सरलजी के नहीं रहने पर उन लोगों से भी सम्पर्क नहीं किया जा सकता, जिनके पास प्रमाण होने के उल्लेख कवि ने किए हैं। बहरहाल, इस छोटी-सी घटना को अपने महाकाव्य में शामिल करके कवि ने नारी की महत्ता के वर्णन का एक और अवसर प्राप्त किया है। माताजी ने नेपाल से अपने विश्वस्त लोगों को जापान भेजकर प्रशिक्षण दिलवाने और नेपाल में बन्दूक बनाने का कारखाना खोलने का प्रस्ताव लोकमान्य के समक्ष रखा था। महाकाव्य में माताजी तिलकजी से कहती हैं- ‘‘जो भी व्यय होगा इस समग्र आयोजन में/दायित्व सभी मेरा, वह वहन करूँगी मैं।/पीछे  न हटूँगी, रण में पड़े कूदना यदि/लक्ष्मी बनकर रण में भी जूझ मरूँगी मैं।’’
      शायद माताजी जैसी देशभक्त नारी का स्मरण करते हुए ही कवि ने माण्डले जेल जाने से पूर्व काव्यनायक लोकमान्य तिलक से कहलवाया है- ‘‘नारियाँ यहाँ देवियाँ यहाँ की ललनाएँ/ममता-समता की वे साकार रूप जैसी/स्नेहिल शीतल छाया जैसी होती हैं यदि वे/तो होती हैं वे दाहक तेज धूप जैसी।/अनुराग-आग दोनों उनके उर में पलते/जब जैसा अवसर आता रूप दिखातीं वे/वे कलियों-सी कोमल, लपटों से अधिक उग्र/बलिदानी लिपि में गौरव लेख लिखातीं वे।’’
      स्वातंत्र्य-संग्राम के वीरों के जीवन पर रचित महाकाव्यों में नारी के त्याग और आदर्शमय प्रेरक जीवन के अनेक प्रसंग मौजूद हैं, परन्तु प्रेम और श्रंगार के प्रसंग गिने-चुने हैं, क्योंकि सरलजी के काव्यनायक आजादी के दीवाने, बलिपंथी हैं, जिनके जीवन में प्रियतमा के रूप में नारी की कल्पना का भी निषेध था। जैसाकि महाकाव्य में चन्द्रशेखर आजाद कहते हैं- ‘‘मेरे जीवन में नारी केवल माँ है।’’ अपने बलिदानी संकल्प के रहते क्रांतिनायकों को माया-ममता के सब सम्बन्ध छोड़ने पड़े थे, तब प्रणय और परिणय के बन्धन की प्रायः कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसी के अनुरूप, प्रिया रूप में नारी के निषेध का चित्रण ही अधिकांश महाकाव्यों में हुआ है। आजाद अपनी प्रणय निवेदिता से कह देते हैं- ‘‘तपते जीवन को माँ शीतल छाया है/माँ से महानता ने भी बल पाया है/आना है तो अगले जीवन में आना/माँ बन कर मुझको गले लगाना।’’
  • 55, राजस्व कॉलोनी, उज्जैन-456010, म.प्र.

शनिवार, 22 सितंबर 2018

श्रीकृष्ण 'सरल' जन्म-शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में विशेष सामग्री

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  07,   अंक  :  11-12,   जुलाई-अगस्त 2018 


श्रीकृष्ण 'सरल' स्मरण 


श्रीकृष्ण ‘सरल’ : काव्यांजलि
{देश के क्रान्तिकारी शहीदों के यशोगान को समर्पित महाकवि सरलजी के जन्मशताब्दी वर्ष के आयोजन क्रम में इस अंक में प्रस्तुत हैं उनकी कुछ प्रतिनिधि कविताएँ। सभी कविताएँ व सभी चित्र / रेखाचित्र ‘क्रान्ति गंगा’ से लिए गए हैं। प्रस्तुति : प्रदीप शर्मा ‘सरल’/संतोष सुपेकर} 



जन्मभूमि को  प्रणाम

भूमि मालवा की...
भूमि मालवा की यह अपने 
गौरव से गम्भीर है,
ठीक कहा है, इसमें पग-पग
महान क्रांतिकारी दुर्गा भाभी के साथ सरल जी 
रोटी, डग-डग नीर है।

हर दिन शुभ दिन, सरल सलौनी
सदा यहाँ की रात है,
घूँघट-की-सी हँसी, मालवा
की भीनी बरसात है।

आव-भगत में भूमि यहाँ की 
रही सदा तल्लीन है,
तन से तो काली है, पर यह
मन से नहीं मलीन है।

इसके मन की उज्ज्वलता के 
द्योतक फूल कपास के,
इसके अधिवासी प्रतीक सब
मदमाते मधुमास के।

सैनिक 

मारने और मरने का काम कौन लेता
यह कठिन काम जो करता, वह सैनिक होता,
जैसे चाहे, जब चाहे मौत चली आए
जो नहीं तनिक भी डरता, वह सैनिक होता।

यह नहीं कि वह वेतन-भोगी ही होता है
वह मातृभूमि का होता सही पुजारी है,
अर्चन के हित अपने जीवन को दीप बना
उसने माँ की आरती सदैव उतारी है।

पैसा पाने के लिए कौन जीवन देगा
जीवन तो धरती-माँ के लिए दिया जाता,
धरती के रखवाले सैनिक के द्वारा ही
है जीवन का सच्चा सम्मान किया जाता।

यह नहीं कि वह अपनी ही कुर्बानी देता
दुख के सागर में वह परिवार छोड़ जाता,
जब अपनी धरती-माता की सुनता पुकार
तिनके जैसे सारे सम्बन्ध तोड़ जाता।

सैनिक, सैनिक होता है, वह कुछ और नहीं
वह नहीं किसी का भाई पुत्र और पति है,
कर्त्तव्य-सजग प्रहरी वह धरती माता का
जो पुरस्कार उसका सर्वाेच्च, वीर-गति है।

सैनिक का रिश्ता होता अपनी धरती से
वह और सभी रिश्तों से ऊपर होता है,
जब जाग रहा होता सैनिक, हम सोते हैं
वह हमें जगाने, चिर-निद्रा में सोता है।

मैं अमर शहीदों का चारण

मैं अमर शहीदों का चारण, उनके यश गाया करता हूँ
जो कर्ज राष्ट्र ने खाया है, मैं उसे चुकाया करता हूँ।

यह सच है, याद शहीदों की हम लोगों ने दफनाई है
सरदार भगत सिंह को जन्म देने वाली 
पूज्य माताश्री विद्द्यावती  जी के साथ
सरल जी
 

यह सच है, उनकी लाशों पर चलकर आज़ादी आई है,
यह सच है, हिन्दुस्तान आज जिन्दा उनकी कुर्बानी से
यह सच अपना मस्तक ऊँचा उनकी बलिदान कहानी से।

वे अगर न होते तो भारत मुर्दों का देश कहा जाता,
जीवन ऐसा बोझा होता जो हमसे नहीं सहा जाता,
यह सच है दाग गुलामी के उनने लोहू सो धोए हैं,
हम लोग बीज बोते, उनने धरती में मस्तक बोए हैं।

इस पीढ़ी में, उस पीढ़ी के, मैं भाव जगाया करता हूँ।
मैं अमर शहीदों का चारण, उनके यश गाया करता हूँ।

यह सच उनके जीवन में भी रंगीन बहारें आई थीं,
जीवन की स्वप्निल निधियाँ भी उनने जीवन में पाई थीं,
पर, माँ के आँसू लख उनने सब सरस फुहारें लौटा दीं,
काँटों के पथ का वरण किया, रंगीन बहारें लौटा दीं।

उनने धरती की सेवा के वादे न किए लम्बे-चौड़े,
माँ के अर्चन हित फूल नहीं, वे निज मस्तक लेकर दौड़े,
महान क्रांतिकारी
चंद्र सिंह गढ़वाली  
भारत का खून नहीं पतला, वे खून बहा कर दिखा गए,
जग के इतिहासों में अपनी गौरव-गाथाएँ लिखा गए।

उन गाथाओं से सर्द खून को, मैं गरमाया करता हूँ।
मैं अमर शहीदों का चारण, उनके यश गाया करता हूँ।

है अमर शहीदों की पूजा, हर एक राष्ट्र की परंपरा
उनसे है माँ की कोख धन्य, उनको पाकर है धन्य धरा,
गिरता है उनका रक्त जहाँ, वे ठौर तीर्थ कहलाते हैं,
वे रक्त-बीज, अपने जैसों की नई फसल दे जाते हैं।

इसलिए राष्ट्र-कर्त्तव्य, शहीदों का समुचित सम्मान करे,
मस्तक देने वाले लोगों पर वह युग-युग अभिमान करे,
होता है ऐसा नहीं जहाँ, वह राष्ट्र नहीं टिक पाता है,
आजादी खण्डित हो जाती, सम्मान सभी बिक जाता है।

यह धर्म-कर्म यह मर्म, सभी को मैं समझाया करता हूँ।
मैं अमर शहीदों का चारण, उनके यश गाया करता हूँ।
पूजे न शहीद गए तो फिर, यह पंथ कौन अपनाएगा?
तोपों के मुँह से कौन अकड़ अपनी छातियाँ अड़ाएगा?
चूमेगा फन्दे कौन, गोलियाँ कौन वक्ष पर खाएगा?
अपने हाथों अपने मस्तक फिर आगे कौन बढ़ाएगा?
महान क्रांतिकारी वासुदेव बलवंत फड़के  

पूजे न शहीद गए तो फिर आजादी कौन बचाएगा?
फिर कौन मौत की छाया में जीवन के रास रचाएगा?
पूजे न शहीद गए तो फिर यह बीज कहाँ से आएगा?
धरती को माँ कहकर, मिट्टी माथे से कौन लगाएगा?
मैं चौराहे-चौराहे पर, ये प्रश्न उठाया करता हूँ।
मैं अमर शहीदों का चारण, उनके यश गाया करता हूँ।
जो कर्ज राष्ट्र ने खाया है, मैं उसे चुकाया करता हूँ।

जिसे देश से प्यार नहीं हैं

जिसे देश से प्यार नहीं है
जीने का अधिकार नहीं है।

जीने को तो पशु भी जीते
महान क्रांतिकारी सरदार किशन सिंह जी
 (सरदार भगत सिंह के पिताश्री )
अपना पेट भरा करते हैं
कुछ दिन इस दुनिया में रहकर
वे अन्ततः मरा करते हैं।
ऐसे जीवन और मरण को,
होता यह संसार नहीं है
जीने का अधिकार नहीं हैं।
मानव वह है स्वयं जिए जो
और दूसरों को जीने दे,
जीवन-रस जो खुद पीता वह
उसे दूसरों को पीने दे।
साथ नहीं दे जो औरों का
क्या वह जीवन भार नहीं है?
जीने का अधिकार नहीं हैं।
साँसें गिनने को आगे भी
साँसों का उपयोग करो कुछ 
काम आ सके जो समाज के 
तुम ऐसा उद्योग करो कुछ।
क्या उसको सरिता कह सकते
जिसम़ें बहती धार नहीं है?
जीने का अधिकार नहीं हैं।

शहीद

देते प्राणों का दान देश के हित शहीद
पूजा की सच्ची विधि वे ही अपनाते हैं,
हम पूजा के हित थाल सजाते फूलों का
वे अपने हाथों, अपने शीष चढ़ाते हैं।

जो हैं शहीद, सम्मान देश का होते वे
उत्प्रेरक होतीं उनसे कई पीढ़ियॉं हैं,
उनकी यादें, साधारण यादें नहीं कभी
यश-गौरव की मंज़िल के लिए सीढ़ियाँ हैं।

कर्त्तव्य राष्ट्र का होता आया यह पावन
महान क्रांतिकारी
गणेश दामोदर सावरकर 
अपने शहीद वीरों का वह जयगान करे,
सम्मान देश को दिया जिन्हांेने जीवन दे
उनकी यादों का राष्ट्र सदा सम्मान करे।

जो देश पूजता अपने अमर शहीदों को
वह देश, विश्व में ऊँचा आदर पाता है,
वह देश हमेशा ही धिक्कारा जाता, जो
अपने शहीद वीरों की याद भुलाता है।

प्राणों को हमने सदा अकिंचन समझा है
सब कुछ समझा हमने धरती की माटी को,
जिससे स्वदेश का गौरव उठे और ऊँचा
जीवित रक्खा हमने उस हर परिपाटी को।

चुपचाप दे गए प्राण देश-धरती के हित
हैं हुए यहाँ ऐसे भी अगणित बलिदानी,
कब खिले, झड़े कब, कोई जान नहीं पाया
उन वन-फूलों की महक न हमने पहचानी।
महान क्रांतिकारी
संतोष कुमार मित्र 

यह तथ्य बहुत आवश्यक है हम सबको ही
सोचें, खाना-पीना ही नहीं जिंद़गी है,
हम जिएँ देश के लिए, देश के लिए मरें
वन्दगी वतन की हो, वह सही वन्दगी है।

क्या बात करें उनकी, जो अपने लिए जिए
 वे हैं प्रणम्य, जो देश-धरा के लिए मरे,

वे नहीं, मरी केवल उनकी भौतिकता ही
सदियों के सूखेपन में भी वे हरे-भरे।

वे हैं शहीद, लगता जैसे वे यहीं-कहीं
यादों में हर दम कौंध-कौंध जाते हैं वे,
जब कभी हमारे कदम भटकने लगते हैं
तो सही रास्ता हमको दिखलाते हैं वे।

हमको अभीष्ट यदि, बलिदानी फिर पैदा हांे
बलिदान हुए जो, उनको नहीं भुलाएँ हम,
सिर देने वालों की पंक्तियाँ खड़ी हांेगी
उनकी यादें साँसों पर अगर झुलाएँ हम।
महान क्रांतिकारी
रामचंद्र सरवटे

जीवन शहीद का व्यर्थ नहीं जाया करता
म़र रहे राष्ट्र को वह जीवन दे जाता है,
जो किसी शत्रु के लिए प्रलय बन सकता है
वह जन-जन को ऐसा यौवन दे जाता है।

आँसू

जो चमक कपोलों पर ढुलके मोती में है
वह चमक किसी मोती में कभी नहीं होती,
सागर का मोती, सागर साथ नहीं लाता
अन्तर उंडेल कर ले आता कपोल मोती।

रोदन से, भारी मन हलका हो जाता है
रोदन में भी आनन्द निराला होता है,
महान क्रांतिकारी
नरसिंह दास 
हर आँसू धोता है मन की वेदना प्रखर
ताजगी और वह हर्ष अनोखा बोता है।
आँसू कपोल पर लुढ़क-लुढ़क जब बह उठते
लगता हिम-गिरि से गंगाजल बह उठता है,
हैं कौन-कौन से भाव हृदय में घुमड़ रहे
हर आँसू जैसे यह सब कुछ कह उठता है।

सन्देह नहीं, आँसू पानी तो होते ही
वे तरल आग हैं, और जला सकते हैं वे,
उनमें इतनी क्षमता, भूचाल उठा सकते
उनमें क्षमता, पत्थर पिघला सकते हैं वे।

आँसू दुख के ही नहीं, खुशी के भी होते
जब खुशी बहुत बढ़ जाती, रोते ही बनता,
आधिक्य खुशी का, कहीं न पागल कर डाले
अतिशय खुशियों को, रोकर धोते ही बनता।

भावातिरेक से भी रोना आ जाता है
ऐसे रोदन को कोई रोक नहीं पाता,
रोने वाला, निरुपाय खड़ा रह जाता है
आगमन आँसुओं का, वह रोक नहीं पाता।

जो व्यक्ति फफककर जीवन में रोया न कभी
उसके जीवन में कुछ अभाव रह जाता है,
दुख प्रकट न हो, भारी अनर्थ होकर रहता
रो पड़ने से, वह सारा दुख बह जाता है।

इतिहास आँसुओं ने रच डाले कई-कई
हो विवश शक्ति उनने अपनी दिखलाई है,
वे रहे महाभारत की संरचना करते
सोने की लंका भी उनने जलवाई है।

मुझमें ज्योति और जीवन है
महान क्रांतिकारी संजीव चंद्र रे   

मुझमें ज्योति और जीवन है
मुझमे यौवन ही यौवन है।
मुझमें ज्योति और जीवन है।

मुझे बुझा कर देखे कोई
बुझने वाला दीप नहीं मैं,
जो तट पर मिल जाया करती
ऐसी सस्ती सीप नहीं मैं।
शब्द-शब्द मेरा मोती है,
गहन अर्थ ही सच्चा धन है।
मुझमें ज्योति और जीवन है।।

रुक जाने को चला नहीं मैं
चलते जाना जीवन-क्रम है,
बुझ जाने को जला नहीं मैं
जलते जाना नित्य-नियम है।
मैं पर्याय उजाले का हूँ,
अँधियारे से चिर-अनबन है।
मुझमें ज्योति और जीवन है।।

हलकी बहुत मानसिकता यह
शिकवे या शिकायतें करना,
हलकी बहुत मानसिकता यह
हलकेपन पर कभी उतरना।
आने नहीं दिया मैंने यह,
महान क्रांतिकारी धर्मपाल
(यशपाल के अनुज)
अपने मन में हलकापन है।
मुझमें ज्योति और जीवन है।।

वर्ष, मास, दिन रहा भुनाता
हर क्षण का उपयोग किया है,
तुम हिसाब कर लो, देखोगे
लिया बहुत कम, अधिक दिया है।
यही गणित मेरे जीवन का,
यही रहा मेरा चिन्तन है।
मुझमें ज्योति और जीवन है।

सरल अभिलाषा 

नहीं महाकवि और न कवि ही, लोगों द्वारा कहलाऊँ
सरल शहीदों का चारण था, कहकर याद किया जाऊँ

लोग वाह वाही बटोरते, जब बटोरते वे पैसा
भूखे पेट लिखा करता वह, दीवाना था वह ऐसा।

लोग कहें बंदूक कलम थी, वह सन्नद्ध सिपाही था
शौर्य-वीरता का गायक वह, वह काँटों का राही था
लिख बलिदान कथाएँ वह, लोगों को जाग्रत करता था
उनकी शिथिल शिराओं में, उफनाता लावा भरता था।

लोग कहें वह दीवाना था, जिसे देश की ही धुन थी
देश उठे ऊँचे से ऊँचा, मन में यह उधेड़-बुन थी
कभी किसी के मन में उसने, कुंठा बीज नहीं बोया
वीरों की यश गाथाओं से, हर कलंक उसने धोया।

मन्दिर रहा समूचा भारत, मानव उसको ईश्वर था
देश-धरा समृद्ध रहे यह, यही प्रार्थना का स्वर था
भारत-माता की अच्छी मूरत ही रही सदा मन में
महाशक्ति हो अपना भारत, यही साध थी जीवन में।

अन्यायों को ललकारा, ललकारा अत्याचारों को
रहा घुड़कता गद्दारों को, चोरों को बटमारों को।
रहा पुजारी माटी का वह, मार्ग न वह यह छोड़ सका,
हिला न पाया, कोई भी आघात न उसको तोड़ सका।

कोई भाव अगर आया तो, यही भाव मन में आया,
पाले रहा दर्द धरती का, गीतों में भी वह गाया-
हे ईश्वर! यह भारत मेरा, दुनिया में आदर पाए,
महान क्रांतिकारी 

डॉ. नारायण राव  सावरकर 


गौरवशाली जो अतीत था, वही लौटकर फिर आए।

भारत-वासी भाई-भाई, रहें प्यार से हिलमिल कर,
कीर्ति कौमुदी फैलाएँ वे, फूलों जैसे खिल-खिल कर।
सबके मन में एक भाव हो, अच्छा अपना भारत हो,
सबकी आँखों में उजले से उजला सपना भारत हो।

खून की ज्वाला

कौन कहता है, हमारी बाहुओं में बल नहीं है
कौन कहता है, हमारे खून में ज्वाला नहीं ह,ै
कौन कहता है, प्रणय के ही पुजारी हम रहे हैं
कौन कहता है, प्रलय हमने कभी पाला नहीं है।
कौन कहता है, अहिंसा भीरुता का आवरण है
कौन कहता है, समर में हम न लड़ना जानते हैं,
कौन कहता, शान्ति का सन्देश जो देते रहे, वे
तोप की, तलवार की भाषा न पढ़ना जानते हैं।

विश्व के इतिहास में अध्याय तुम पढ़ लो हमारा
चमकते स्वर्णाक्षरों में लिखा ‘भारतवर्ष’ होगा,
एक पन्ने पर अहिंसा की लिखी वाणी मिलेगी
दूसरे पर गरजता संघर्ष का उत्कर्ष होगा।

प्रतिध्वनित पदचाप से करते रहे हम विश्व-प्रांगण
स्निग्ध प्रिय सम्बन्ध भी बन्धुत्व के जोड़े गए हैं,
किन्तु जिसने भी उठाई आँख है इस मातृ-भू पर
दाँत भी उस आततायी के यहाँ तोड़े गए हैं।

कौन है वह साहसी, जो कर सके अवरोध गति का
बढ़ गए जो पाँव, मंजिल तक कभी रुकते नहीं हैं,
क्यों न जाने है हमारे खून में कुछ बात ऐसी
शीश कट जाते हमारे, किन्तु वे झुकते नहीं हैं।

शत्रुओं की छातियों में हिन्द के नर-नाहरों के
युद्धरत भाले दुधारे, क्रुद्ध हो भोंके गए हैं,
नारियाँ भी कम नहीं, बलिदान गरिमा में नरों से
महान क्रांतिकारी
डॉ. भगवान दास माहोर 
पुत्र पति भाई, समर की आग में झोंके गए हैं।

है नहीं वीरांगनाओं की कमी इस देश में कुछ
वीरता की ज्वाल-सी, रणभूमि में ये घूमती हैं,
छाँह भी सम्मान की, कोई न छू सकता कभी है
लाल लपटों को विहँस कर ये स्वयं ही चूमती हैं।

बाल-वीरों की कथाएँ, विश्व को बतला रहे हैं
झिलमिलाते नील नभ के वक्ष पर अंकित सितारे,
बाप से बेटा सवाया ही यहाँ होता रहा है
दाँत शेरों के गिना करते यहाँ बालक हमारे।

इसलिए संकल्प हम दोहरा रहे दृढ़ चेतना से
देश का सम्मान हम निज प्राण देकर भी रखेंगे,
सूलियों के फूल भी चुनने पड़े तो हम चुनेंगे
देश के हित मौत के भी फल खुशी से हम चखेंगे।




ग़ज़ल

सरल जी का एक रेखाचित्र  







मौत आई तू सुबकदोश मैं होलूँ, तो चलूँ
राज बाकी हैं बहुत, मैं उन्हें खोलूँ, तो चलूँ।

मत समझ लेना तू, जीने की हवस बाकी है
गुल नए और तसब्बुर के पिरोलूँ तो चलूँ।

खार नफरत के ही मिलते रहे जमाने में
सरल जी की सहधर्मिणी
श्रीमती नर्मदा सरल जी 
बोल कुछ प्यार के प्यारे से बोलूँ, तो चलूँ।

दाग लोगों के दिलों के ही हैं झाँके मैंने
दिल का दामन जो खुद अपना ही मैं धोलूँ, तो चलूँ।

दे नहीं पाया मैं मरहम किसी के जख़्मों को
कम से कम चश्म ही ग़म से जो भिगोलूँ, तो चलूँ।

जूझता ही मैं ज़माने से रहा हूँ हरदम
लोरियाँ गा, मैं तेरी गोद में सोलूँ, तो चलूँ।

मंगलवार, 29 मई 2018

श्रीकृष्ण 'सरल' जन्म-शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में विशेष सामग्री

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक  :  09-10,  मई-जून 2018 



श्रीकृष्ण 'सरल' स्मरण 


श्रीकृष्ण सरल जी 
{वर्ष 2018 स्वयं को अमर शहीदों का चारण कहने वाले महान तपस्वी राष्ट्रकवि श्रीयुत् श्रीकृष्ण ‘सरल’ का जन्मशताब्दी वर्ष है। 01 जनवरी 1919 को जन्मे सरलजी किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं, तदापि कहना प्रासंगिक होगा कि महान स्वाधीनता सेनानी नेताजी सुभाष चन्द्र बोस, सरदार भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव, चन्द्रशेखर आजाद से लेकर अनेकानेक ज्ञात-अज्ञात शहीदों पर शोधकार्य करके महाकाव्यों का सृजन और अपनी जमीन-जायदाद बेचकर स्वयं के व्यय पर उनका प्रकाशन-वितरण करवाने वाले सरलजी का व्यक्तित्व अपने शहीद-प्रेम के कारण अपने समकालीनों में बहुत ऊपर स्थित है। 1965 में अमरशहीद भगतसिंह की पूज्य माताजी श्रीमती विद्यादेवी को उज्जैन लाकर उनका धूमधाम से स्वागत करने वाले सरलजी का यह कथन ‘प्रकाशक लोग पुस्तकें बेचकर जायदाद बनाते हैं, मैंने जायदाद बेचकर पुस्तकें बनाई हैं’ उन्हें राष्ट्रकवियों की प्रथम पंक्ति में लाकर खड़ा करता है। उन्हें स्वाधीनता संग्रामियों का वंशज उचित ही कहा गया है। 

      ऐसे महान साहित्य मनीषी और तपस्वी व्यक्तित्व के जीवन और कर्मगाथा से जुड़े कुछ प्रसंग हम प्रस्तुत स्तम्भ में इस वर्ष में रखने का प्रयास कर रहे हैं। दूसरी कड़ी में प्रस्तुत है-  सरल जी के कुछ संस्मरण। आशा है नई पीढ़ी तक उनकी स्मृतियों की सुगन्ध का एक झोंका अवश्य ही पहुँचाने में हम सफल होंगे। -संतोष सुपेकर, अविराम साहित्यिकी के श्रीकृष्ण ‘सरल’ स्मरण विशेषांक के विशेष संपादक}

मेरी सृजन संस्मृतियाँ : श्रीकृष्ण सरल
महाकाव्य लेखन की प्रेरणा
      ग्वालियर हाई कोर्ट के सामने वाली सड़क पर स्थित जब मैं प्रोफेसर श्री गुरुप्रसाद टंडन के आवास पर पहुँचा, तो वहाँ उनके पूज्य पिता-श्री स्वनाम-धन्य राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन से भेंट हो गई। मेरा परिचय जानकर उन्होंने कहा- ‘‘मैं आपको जानता हूँ। आपकी कृति ‘कवि और सैनिक’ मैंने पड़ी है, जो भूमिका-लेखन के लिए आपने गुरुप्रसाद को दे रखी है।’’ बात को आगे चलाने के उद्देश्य से मैंने कहा-
      ‘‘मैं कितना सौभाग्यशाली हूँ जो मुझ अकिंचन कवि के काव्य संकलन की पाण्डुलिपि आप जैसे विद्वान ने पढ़ी है। वह आपके पढ़ने योग्य तो नहीं थी।’’
      ‘‘नहीं, ऐसी बात नहीं है। पुस्तक मुझे बहुत पसन्द आई और मैं तो आपको परामर्श देना चाहूँगा कि अब आप महाकाव्य-लेखन प्रारम्भ कर दें, क्योंकि आपकी लेखन-शैली प्रबन्धात्मक है और मेरा विश्वास है कि आप अच्छा महाकाव्य लिख सकेंगे।’’
      हिन्दी के एक दिग्गज विद्वान, एक महान साधक द्वारा अपने लेखन की प्रशंसा सुनकर जिस हर्ष की अनुभूति मुझे हुई, वह अभूतपूर्व थी। उनके कथन के प्रति आभार व्यक्त करते हुए मैंने कहा-
      ‘‘आपके इस प्रोत्साहन को मैंने आशीर्वाद के रूप में ग्रहण किया है। महाकाव्य-लेखन के लिए किसी योग्य चरित्नायक का नाम भी बताने का कष्ट करें।’’
      ‘‘ किसी पौराणिक महापुरुष पर लिखने के स्थान पर आप किसी शहीद पर महाकाव्य लिखें। यदि आप ऐसा कर सके, तो एक प्रगतिशील विषय पर लिखने का श्रेय भी आपको मिलेगा और भारत की आजादी के सन्दर्भ में शहीदों का जो कर्ज हमारे राष्ट्र पर चढ़ा हुआ है, उसे उतारने का अवसर भी आपको मिलेगा।’’
      ‘‘जब इतनी कृपा की है तो किसी शहीद का नाम भी मुझे सुझा दीजिए, जो महाकाव्य-लेखन के लिए सब प्रकार से उपयुक्त हो।’’
      ‘‘मेरे मानस पर तो शहीद भगतसिंह छाया हुआ है। अपने क्रान्तिकारी-जीवन में वह दो बार मुझसे मिला था। मैं उसकी विनम्रता, अलौकिक प्रतिभा और संघर्ष-भावना का प्रशंसक रहा हूँ। उसकी आत्माहुति तो देश के लिए गर्व की बात है ही।’’
      ‘‘मैं प्रयत्न करूँगा कि मैं शहीद भगतसिंह पर अपना पहला महाकाव्य लिख सकूँ। यदि मैं ऐसा कर सका तो इसे आपके आशीर्वाद का प्रतिफल ही समझूँगा।’’
      यह थी राजर्षि पुरुषोत्तमदास टंडन जैसे महामानव से मिली महाकाव्य-लेखन की प्रेरणा। उनसे प्रेरणा पाकर भी मैं चार-पाँच वर्षों तक महाकाव्य-लेखन की दिशा में कुछ कर नहीं सका। यदि देश में एक विशेष घटना न होती तो मेरा महाकाव्य-लेखन टलता ही जाता। सन् 1962 में हमारे पड़ोसी देश चीन ने हमारे देश पर आक्रमण कर दिया था। मेरे कवि-रूप को चुनौती मिली और एक वीर-काव्य लिखने का मैंने संकल्प कर डाला।

शहीद भगतसिंह की माँ के सानिध्य में  
      घटना उस समय की है जब सन् 1962 ई. में शहीद भगतसिंह की माता श्रीमती विद्यावती के दर्शन करने मैं पंजाब स्थित उनके गाँव खटकर कलां जा पहुँचा। शहीद की माता से ढेर सारा स्नेह और जानकारी लेकर मैं विदा होने लगा, तो उन्होंने कहा- ‘‘बेटे तुमसे मेरी दो अपेक्षाएँ हैं, क्या तुम उन्हें पूरा करोगे?’’
      माताजी के मुँह से यह बात सुनकर मेरे मन में हलचल होने लगी। मैं सोच रहा था कि पता नहीं माताजी की क्या अपेक्षाएँ हैं और मैं उन्हें पूर्ण कर सकूँगा या नहीं! मुझे सोचने का अधिक समय नहीं मिला। माताजी ने अपनी इच्छाएँ व्यक्त कर दीं। वे बोलीं-
      ‘‘बेटे, मेरी पहली अपेक्षा तो यह है कि तुम मुझसे निरंतर संपर्क बनाए रखना। हर महीने तुम्हारा कम से कम एक पत्र तो मेरे पास आना ही चाहिए और एक वर्ष में दो बार तुम्हें मुझसे मिलना ही चाहिए।’’
      मैंने वचन दे दिया।
      उन्होंने अपनी दूसरी इच्छा बताते हुए कहा- ‘‘मुझे लगता है कि मेरे दिन गिने-चुने हैं। तुम मेरे बेटे पर जो ग्रन्थ लिखने वाले हो, वह बहुत जल्दी लिखना और बहुत जल्दी छपवा लेना। भगवान के घर जाने के पहले मैं उस ग्रन्थ को देख लेना चाहती हूँ।‘‘
      माताजी की इस इच्छा के उत्तर में मैंने कहा- ‘‘माताजी! जहाँ तक लेखन का प्रश्न है, वह मेरे बस की बात है। मैं आपको वचन देता हूँ कि लेखन को ही अधिक समय देकर मैं महाकाव्य के लेखन को शीघ्र पूरा कर लूँगा। जहाँ तक उसके प्रकाशन का प्रश्न है, वह मेरे बस की बात नहीं है, उसकी व्यवस्था तो प्रकाशक लोग ही कर सकेंगे। फिर भी मैं प्रयास करूँगा कि किसी प्रकाशक को राजी करके मैं उसका प्रकाशन भी शीघ्र ही करा लूँ।’’
      माताजी मेरे इस कथन का अर्थ नहीं लगा सकीं। वे यह नहीं जानती थीं कि लिखने वाले अलग होते हैं और छापने वाले अलग। मेरे इस कथन को सुनकर उन्हें कुछ निराशा हुई और वे बोलीं- ‘‘तो क्या तुम्हारा ग्रन्थ मुझे देखने को नहीं मिलेगा?’’
      कुछ क्षण मौन रहने के पश्चात उन्होंने कहना प्रारम्भ कर दिया-
      ‘‘भगतसिंह को फाँसी लगने के पहले मैं जेल में उससे मुलाकात करने गई। अपने बेटों से मिलने सुखदेव और राजगुरु की माताएँ भी वहाँ पहुँचीं। हम तीनों माताएँ अपने शहीद होने वाले बेटों की आखिरी झलक पाने के लिए अधीर थीं। और भी बहुत से लोग उनसे आखिरी मुलाकात करने के लिए जेल के फाटक के बाहर मौजूद थे। जेल के अधिकारियों ने अपना निर्णय सुना दिया कि अभियुक्तों की माताओं के अतिरिक्त अन्य लोग उनसे नहीं मिल सकेंगे। थोड़ी देर पश्चात भगतसिंह ने भी जेल के अन्दर से अपना निर्णय भेज दिया। उसने कहा कि यदि सरकार अपने देशवासियों से हमें नहीं मिलने देती, तो अपनी माताओं से मिलना भी हमें स्वीकार नहीं है। उसका तर्क था कि देशवासी हमें हमेशा ही अपनों जैसे सगे रहे हैं और जीवन की अंतिम घड़ियों में केवल अपने रक्त-सम्बन्धियों से मिलकर हम उन्हें यह अनुभव करने का अवसर नहीं देंगे कि हमने उन्हें पराया समझा है। अपने बेटों का यह निर्णय सुनकर हम लोग उनसे अन्तिम बार मिले बिना ही वापिस आ गए। हम लोग उनके निर्णय से गर्वित तो थे, पर हर्षित नहीं थे। मेरे उस बेटे ने अपने जीवन के अंतिम समय में मुझे निराश किया था। मेरे एक बेटे तुम हो जो मेरे अंतिम दिनों में मुझे निराश करने चले हो। क्या तुम ऐसा कुछ नहीं कर सकते कि मेरे शहीद हुए बेटे से मुझे मिला दो। मेरे बेटे पर जो ग्रन्थ तुम लिखोगे, उसको देखकर ही मैं समझ लूँगी कि मैंने अपने बेटे से आखिरी मुलाकात कर ली।’’
      माताजी का वक्तव्य समाप्त हो चुका था। उनके चेहरे पर गंभीर भाव थे। उनके समीप ही खड़ी हुई उनकी एक पुत्रवधू श्रीमती लीला रणवीरसिंह अपना धैर्य खो बैठी। उनके नेत्रों से आँसुओं की झड़ी लग गई। माताजी ने उन्हें अपने हृदय से लगाकर अपने दुपट्टे के पल्ले से उनके आँसू पोंछे। मैं इस समय तक किंकर्तव्यविमूढ़ बना खड़ा रहा था। मुझसे कुछ कहते नहीं बना। माताजी के चरणों पर गिरकर मैंने भी उनका पाद-प्राक्षालन किया। माताजी ने मुझे उठाकर अपने हृदय से लगाया और मेरे सर पर प्यार से हाथ फेरने लगी। रुँधे कंठ से मैंने कहा- ‘‘माताजी, मैं आपको वचन देता हूँ कि किसी न किसी प्रकार मैं आपके बेटे पर लिखा गया महाकाव्य बहुत शीघ्र ही आपके हाथों में दे दूँगा।’’
      माताजी को यह आश्वासन देकर और उनके अनेकों आशीर्वाद और ढेर सारा दुलार लेकर मैंने उनसे विदा ली।
     उज्जैन पहुँचकर मैं साधना में लीन हो गया। कॉलेज के अध्यापन से बचा हुआ समय मैं महाकाव्य लेखन के लिए देने लगा। स्वयं को क्रान्तिकारी-जीवन में ढालने का प्रयत्न किया। घी-दूध मिठाइयों का परित्याग कर दिया। चटाई बिछाकर भूमि-शयन करने लगा। कवि-सम्मेलनों में जाना छोड़ दिया। विश्वविद्यालय से मिलने वाला स-पारिश्रमिक कार्य भी अस्वीकार करने लगा। मेरा यह व्यवहार देखकर लोग मुझ पर हँसते थे।
      मैं देर रात तक लिखता रहता था और लिखते-लिखते वहीं भूमि पर लुढ़क कर सो जाता था। शहीद-माता को दिया हुआ वचन मुझे चिन्तित किए हुए था। वही चिन्ता स्वप्न के रूप में उभर आती थी। स्वप्न में निरंतर माताजी के साथ ही रहता था। वे पूछती- ‘‘क्यों बेटे! लेखन कहाँ तक पहुँच गया?’’
      माताजी को अपने लेखन की प्रगति के विषय में बताता और महाकाव्य के कुछ अंश उन्हें सुनाता भी था। अक्सर ही मैं उन्हें पल्ले से अपने आँसू पोंछते हुए पाता था। नींद खुलने पर मैं फिर लिखने बैठ जाता और तब तक लिखता रहता, जब तक अपने लेखन से मुझे संतोष नहीं हो जाता था।
      यह तो सपनों के संसार की बात थी। मैं पत्र लिखकर माताजी को लेखन की प्रगति बताता रहता था। लेखन-क्रम में मैं एक बार फिर माताजी से मिलने गया। मैं कुछ घटनाओं पर उनका अभिमत जानना चाहता था।
     एक वर्ष से ऊपर का समय लगा और महाकाव्य-लेखन पूर्ण हो गया। माताजी को यह खुशखबरी लिख भेजी। उन्हें यह भी लिखा कि मैं उसे शीघ्र ही छपवा भी लूँगा।
      मैं अपना काम समाप्त कर चुका था। प्रकाशकों का काम शेष था। मुझे आशा थी कि शहीदेआजम भगतसिंह पर लिखा गया महाकाव्य प्रकाशित कराने में कोई कठिनाई नहीं होगी। मैं तो यहाँ तक आशान्वित था कि उसे प्रकाशित करने के लिए प्रकाशकों में होड़ लग जाएगी। 
      महाकाव्य की पाण्डुलिपि लेकर दिल्ली पहुँचा। प्रकाशकों से मिला। कोई कहता- ‘‘हिन्दी की कविता तो बिकती ही नहीं है। इतना बड़ा महाकाव्य छापकर हम व्यर्थ अपना पैसा नहीं फँसाएँगे।’’ दूसरा कहता- ‘‘हमारी तिजोरी में कई पाण्डुलिपियाँ रखी हुई हैं। आप भी छोड़ जाइए। उन सब के छपने के पश्चात ही आपकी कृति का क्रम आ सकेगा। दो-चार साल तो आपको प्रतीक्षा करनी ही चाहिए।’’
      मैं पाण्डुलिपि लेकर किसी अन्य प्रकाशक के पास जा पहुँचता। वह कहता-
      ‘‘अगर आप इसे छपवाना ही चाहते हैं तो इसकी छपाई का पूरा पैसा हमें पेशगी दे दीजिए। हम अपने प्रकाशन का नाम डाल देंगे। हमारे प्रकाशन के नाम से आपकी पुस्तक चमक जाएगी। पुस्तक बिकने पर हम आपका पैसा आपको लौटा देंगे।’’
      मैं वहाँ से चल देता और इन्हीं उत्तरों जैसा ही कोई उत्तर पाता। कई शहरों में घूमा। ऐसा लगा जैसे भारतवर्ष के सभी प्रकाशक एक-दूसरे के भाई-बन्द हैं। मुँह लटकाए हुए मैं उज्जैन लौट आया। सोचता था जिस देश में शहीदों की यह कद्र है, उस देश का क्या होगा?
      शहीद की माता को दिया हुआ वचन प्रतिपल चिन्तित किए रहता था। एक दिन परिवार के सदस्यों को अपने सामने बिठाया और अपनी समस्या उनके सामने रख दी। परिवार में दो छोटे बच्चे भी थे, जिनमें से एक प्राथमिक विद्यालय में और दूसरा माध्यमिक विद्यालय में पढ़ता था। उन लोगों ने आश्वासन दिया कि हम लोग अपनी आवश्यकताओं को कम से कम कर देंगे और कोई ऐसी वस्तु नहीं माँगेंगे, जिसमें आपको पैसा खर्च करना पड़े। बच्चों की ओर से यह आश्वासन बहुत बड़ा आश्वासन था। पत्नी ने कहा- ‘‘मेरे पास सोने-चाँदी के जितने आभूषण हैं, उन्हें आप बेच दीजिए और शहीद भगतसिंह पर लिखी हुई किताब छपवा लीजिए।’’
      आखिर मैंने पत्नी को यह त्रास दे ही दिया। उनके सारे आभूषण बेच दिए गए। पुस्तक तो परीक्षा लेने पर तुली हुई थी। घर का अन्य सामान भी बेचना पड़ा। दस रुपया सैकड़ा प्रतिमास ब्याज-दर से एक साहूकार से कर्ज भी लिया। एक दिन कॉलेज से जब घर लौटा तो दोनों बच्चों ने मेरे हाथ में कुछ रुपये रख दिये। मैंने पूछा- ‘‘ये कहाँ से आए?’’ उन्होंने कहा- आपकी पुस्तक की छपाई में यह हमारा योगदान है। पत्नी ने स्थिति स्पष्ट की-
     ‘‘कबाड़े का सामान खरीदने वाला इधर से निकला था। इन लोगों ने अपने सारे कपड़े बेच दिए। गर्म कपड़े भी नहीं बचाए। जो कपड़े पहने हैं, वे ही कपड़े रह गए हैं।’’ बच्चों का यह त्याग और योगदान देखकर मन प्रफुल्ल हो गया। दुष्परिणाम उन्हीं को भुगतना पड़ा, जब सर्दियों के दिनों में वे ठिठुरते हुए स्कूल जाते और आते थे। उनका साथ देने के लिए हम लोगों ने भी अधिकांश वस्त्रों से विदा ले ली।
      पुस्तक द्वारा ली गई परीक्षा में हम लोग खरे उतरे। भगतसिंह महाकाव्य प्रकाशित हो गया। उसे छपा हुआ देखकर सभी लोग खुशी के मारे फूले नहीं समाते थे। शहीद-माता को सूचना दे दी गई। उनसे यह भी निवेदन कर दिया गया कि आप उज्जैन पहुँचकर ग्रन्थ का विमोचन करने की कृपा करें। यह निवेदन एक औपचारिक निवेदन था। एक प्रतिशत भी आशा नहीं थी कि वे उज्जैन पहुँच सकेंगी। मैं स्वयं उनकी हालत देख आया था। अपने मकान के एक कमरे से दूसरे कमरे तक भी वे चलकर नहीं जा सकती थीं। उनका उत्तर आ गया। लिखा था- ‘‘बेटे! मैं तुम्हारे ग्रन्थ की भेंट स्वीकार करने उज्जैन पहुँच रही हूँ।’’
      उज्जैन के उत्साह को जैसे करंट ने छू लिया हो। माताजी के स्वागत के लिए एक समिति बन गई। इस समिति की यह विशेषता थी कि सभी विचारधाराओं के लोग अपने भेदभाव भूलकर पहली बार मंच पर एक-साथ बैठे।
      माताजी उज्जैन पहुँची। लोग पगला उठे। उनका स्वागत ऐतिहासिक स्वागत बन गया। उज्जैन को राष्ट्रपतियों और प्रधामंत्रियों के स्वागत का गौरव प्राप्त हो चुका था, लेकिन भगतसिंह की माताजी के स्वागत ने पिछले सभी स्वागत पीछे छोड़ दिए। दूर-दूर तक के गाँव खाली हो गए थे और उनके निवासी माताजी के दर्शन के लिए उज्जैन पहुँच चुके थे। जिस बग्घी में बिठाकर माताजी का जुलूस निकाला गया था, वह सात बार हार-फूलों से भर गई थी। लोगों में होड़ थी। वे पुलिस के डंडे खाने को तैयार थे, लेकिन अपने हाथों से माताजी के चरण छूए बिना हटने को तैयार नहीं। माताजी ने छोटे बच्चों को पैर नहीं छूने दिए। हर बच्चे के सिर पर हाथ फेर कर और आशीर्वाद देकर ही उसे विदा करती थीं। साधु-सन्यासियों को भी माताजी ने पैर नहीं छूने दिए। वे अपना मस्तक झुकाकर और दोनों हाथ जोड़कर स्वयं ही उन्हें प्रणाम करती थीं। लोगों को प्रणाम करते-करते उनकर दोनों भुजाएँ बुरी तरह सूज गई थीं।
      संध्या समय आयोजित आम-सभा का वातावरण पगलाया हुआ था। माताजी ने अपने घर पर जो स्नेह मुझे दिया था, उसके कुछ संस्मरण मैंने लोगों को सुनाए। वह घटना भी मैंने लोगों को सुनाई, जब माताजी अपने फाँसी पाने वाले बेटे से अंतिम भेंट किए बिना ही जेल से लौट आईं थीं। लोगों की आँखों से आँसुओं की धाराएँ बह रही थीं।
      आखिर रंगीन आवरण में लपेटी हुई भगतसिंह महाकाव्य की एक प्रति मैंने अनावरण हेतु माताजी की ओर बढ़ा दी। अपने हाथ आगे बढ़ाने के स्थान पर उन्होंने पीछे खींच लिए। मैं आश्चर्यचकित था। सभी लोग हैरान थे कि माताजी ने पुस्तक लेने से इनकार क्यों कर दिया। स्थिति माताजी ने ही स्पष्ट की। मेरी ओर मुखातिब होकर बोलीं-
      ‘‘तुम्हें पहले चन्द्रशेखर आजाद पर ग्रन्थ लिखना चाहिए था, क्योंकि भगतसिंह से पहले वह शहीद हुआ था। मेरे मुलाहिजे से तुमने पहले भगतसिंह पर ग्रन्थ लिख डाला। अगर तुम अपने नगर वालों के सामने यह वादा करो कि तुम्हारा अगला ग्रन्थ चन्द्रशेखर आजाद पर होगा, तो मैं इस ग्रन्थ की भेंट स्वीकार करूँगी, अन्यथा नहीं।’’
      माताजी की इस महानता को देख कर सभी लोग मुग्ध हो गए। बहुत देर तक उनकी जय के नारे लगते रहे। इसी बीच मैंने किसी से एक चाकू प्राप्त कर लिया और भावावेश में अपना अँगूठा चीरकर माताजी के माथे पर अपने रक्त का तिलक लगाया और उन्हें वचन दिया कि मेरा आगामी महाकाव्य चन्द्रशेखर आजाद पर ही होगा। माताजी ने आश्वस्त होकर भगतसिंह आजाद महाकाव्य का विमोचन कर उसका लोकार्पण किया और विमोचित प्रति को चूमकर उसे अपनी गोद में रख लिया। महाकाव्य की ओर देखती हुई, उन्होंने अपना सम्बोधन प्रारम्भ किया-  
      ‘‘मैंने जिसे लाहोर में खोया था, उसे उज्जैन में पा लिया है। मुझे लगता है कि ग्रन्थ के रूप में मेरा बेटा भगतसिंह ही मेरी गोद में बैठा हुआ है। जब मैं इसकी पंक्तियाँ पढ़ती हूँ, तो मुझे लगता है कि जैसे मेरा बेटा मुझसे बातें कर रहा है।’’
      सैकड़ों समीक्षकों की प्रशंसा से मेरा जो मन नहीं भरता, वह माताजी के इस मूल्यांकन से भर गया। अपनी साधना से कहीं बड़ा पुरस्कार मुझे मिल गया था।
      इस प्रकार प्रारम्भ हो गया मेरा महाकाव्य-लेखन और सात की संख्या पार करके मैं आठ तक आ पहुँचा हूँ। यह तो स्वाभाविक ही है कि निरन्तर लेखन के कारण कहीं न कहीं स्वयं को और परिवार को तो कष्ट होगा ही और इसकी अनुभूति हम सबने खूब की लेकिन मैं कभी पस्त नहीं हुआ, कुंठित नहीं हुआ और टूटा नहीं। टूटता कैसे, मैंने कभी किसी क्रान्तिकारी को टूटते नहीं देखा।
      मेरी सृजित-संस्मृतियाँ एक बड़े उपन्यास का रूप ले सकती हैं, लेकिन मैं केवल दो घटनाओं का उल्लेख और करूँगा, जो सुभाष-लेखन के क्रम में घटित हुईं।

मेरे गाल पर एक जोर का तमाचा पड़ा
      बात उस समय की है जब नेताजी सुभाषचन्द्र बोस पर प्रामाणिक रूप से कुछ लिख सकने के लिए मैं उन सभी देशों का भ्रमण करने के लिए गया, जहाँ-जहाँ नेताजी ने भारत की आजादी के प्रयत्न किए थे। इस क्रम में मैं बर्मा की राजधानी रंगून भी पहुँचा।
      रंगून के विमान-स्थल से बाहर निकलकर जब शहर में जाने के लिए टैक्सी रोकी, तो टैक्सी वाले ने मुझे शहर में ले जाने से इनकार कर दिया और पूछा कि ‘‘क्या आपके पास शहर में जाने के लिए कलॅक्टर का अनुमति-पत्र है?’’ मैंने उससे कहा कि मेरे पास रंगून के कलॅक्टर का अनुमति-पत्र तो नहीं है पर अन्तर्राष्ट्रीय पासपोर्ट अवश्य है। वह बोला- ‘‘आपका पासपोर्ट हमारे काम का नहीं है। पहले आप यहाँ के कलॅक्टर को फोन करके उन्हें स्थिति से सूचित कीजिए और अनुमति-पत्र मिलने पर ही टैक्सी को रोकिए।’’
      विमान-स्थल के टेलीफोन से मैंने कलॅक्टर कार्यालय को फोन किया। कलॅक्टर महोदय ने निर्देश दिया कि आप वहीं प्रतीक्षा करें, हम अपने एक अफसर को आपसे मिलने भेज रहे हैं। थोड़ी देर पश्चात उनका अफसर मेरे पास पहुँच गया। उससे कुछ इस प्रकार बातचीत हुई- ‘‘मैं हिन्दुस्तान का एक लेखक हूँ। क्रान्तिकारियों के जीवन पर लिखता हूँ। हमारे देश के एक क्रान्तिकारी सुभाषचन्द्र बोस पर भी मुझे लिखना है। उन्होंने कुछ समय यहाँ रंगून में रहकर भारत की आजादी के लिए प्रयत्न किए थे। मैं उनसे सम्बन्धित स्थान यहाँ देखना चाहता हूँ, इसलिए आपसे नगर-भ्रमण का अनुमति-पत्र देने की प्रार्थना कर रहा हूँ।’’
      ‘‘ठीक है, हम आपको अनुमति-पत्र तो दे देंगे, पर हमारी दो शर्तें हैं, क्या उन्हें मानेंगे?’’
      ‘‘आप अपनी शर्तें बताइए!’’
      ‘‘हमारी पहली शर्त है कि आप पूर्ण रूप से अनुशासन में रहेंगे।’’
      ‘‘आपकी यह शर्त मुझे स्वीकार है।’’
      ‘‘हमारी दूसरी शर्त यह है कि आप रंगून नगर में केवल एक स्थान को चुन लीजिए। हम उस स्थान के अलावा कोई दूसरा स्थान आपको नहीं देखने देंगे।’’
      ‘‘आपकी यह शर्त विचित्र है। खैर, मैं आपकी यह शर्त भी स्वीकार करता हूँ। आप मुझे नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का मिलिट्री हेडक्वार्टर देखने की अनुमति दे दीजिए।’’
      ‘‘वह भी आप हमारे अनुशासन में देख सकेंगे।’’
      ‘‘अधिकारी महोदय ने पुलिस को फोन किया। पुलिस की एक लॉरी वहाँ पहुँची। मुझे उस गाड़ी में बैठाया गया। गाड़ी में आए पुलिस इन्सपेक्टर को अधिकारी ने कुछ समझाया। मेरे आसपास बन्दूकधारी सिपाही बैठाए गए और पुलिस इन्सपेक्टर मेरे सामने वाली बैंच पर भरा हुआ रिवाल्वर लेकर बैठा। मुझे बड़ा विचित्र लग रहा था। गाड़ी चल दी। थोड़ी देर पश्चात पुलिस की गाड़ी एक भवन के सामने रुकी। पुलिस इन्सपेक्टर बोला- ‘‘सुभाषचन्द्र बोस का मिलिट्री हेडक्वार्टर आ गया है। गाड़ी से नीचे उतरकर देखा। एक विशाल भवन मेरे सामने था। मैं कल्पना लोक में खो गया-
      यह वही सौभाग्यशाली भवन है, जहाँ भारत-मुक्ति की योजनाएँ बनती थीं और देश के दीवाने देश की आजादी की शमां पर परवाने बनने के लिए आतुर रहते थे। यह बड़ी सौभाग्सशाली भूमि है जिसकी मिट्टी नेताजी सुभाषचन्द्र बोस के चरणों से पवित्र हो चुकी है। क्यों न मैं यहाँ की थोड़ी-सी मिट्टी उठाकर अपने साथ ले चलूँ? मैं गर्व के साथ वह मिट्टी अपने मित्रों को दिखाऊँगा और कहूँगा- ‘‘देखो, मैं नेताजी के चरणों से पवित्र हुई मिट्टी लाया हूँ। आप सभी इसके दर्शन करें- 
      इस विचार से मैंने मुट्ठी भर मिट्टी उठा ली। मेरे ऐसा करने पर तत्काल ही पुलिस इन्सपेक्टर ने मुझे टोकते हुए कहा- ‘‘मिट्टी वापस पटक दीजिए।’’
      कुछ क्षण तक मैंने मिट्टी अपने हाथ में ही रखी। इस पर इन्सपेक्टर नाराज होकर बोला- ‘‘आपने हमारे अनुशासन में रहने का वचन दिया है। मिट्टी ज़मीन पर पटक दीजिए।’’
      मैंने मिट्टी फेंक दी और बोला- ‘‘क्या मैं आपसे एक प्रश्न पूछ सकता हूँ?
      ‘‘हाँ पूछिए।’’
      ‘‘आपने मिट्टी जैसी माामूली चीज ले जाने की अनुमति मुझे क्यों नहीं दी?’’
      ‘‘मेरा प्रश्न सुनकर पुलिस इन्सपेक्टर का चेहरा तमतमा गया। अपने चेहरे पर घृणा और क्रोध के मिश्रित भाव लाते हुए उसने कहा-
      ‘‘मिट्टी को मामूली चीज आप हिन्दुस्तानी लोग समझते हैं, हम नहीं।’’
      बहुत तीखा प्रहार किया था उसने। मैं तिलमिला गया। गलती मेरी ही थी। मैं इस प्रहार से सम्हल भी नहीं पाया था कि उसने दूसरा प्रहार कर दिया- ‘‘जब आप लोग अपने देश की मिट्टी की कद्र नहीं कर सकते, तो हमारे देश की मिट्टी की क्या कद्र करेंगे?’’
      ‘‘यह मामूली प्रहार नहीं था। यह उस बर्मी पुलिस इन्सपेक्टर द्वारा जड़ा गया मेरे गाल पर जोर का तमाचा था। मुझे वह कथन याद आ गया जब हमारी उत्तरी सीमा के बहुत बड़े भू-भाग पर चीनी आक्रमकों ने अपना अधिकार जमा लिया और जब हमने अपने नेताओं से उस भू-भाग को वापिस ले लेने के लिए कहा तो उनका उत्तर था-
      ‘‘इतने विशाल देश का कुछ भाग, जो बिलकुल अनुर्वर, अनुपजाऊ और अनुपयोगी था, यदि चला भी गया तो हमारे देश का क्या बिगड़ता है।’’

नेताजी के प्रभाव ने प्राण रक्षा की
      अपने विदेश-प्रवास में एक अन्य उल्लेखनीय घटना उस समय घटी जब हाँगकाँग टूरिस्ट लॉज पहुँचकर मैंने वहाँ के मैनेजर से कहा-
      ‘‘मुझे चीनी भाषा का एक दुभाषिया चाहिए, जो चीनी भाषा के अतिरिक्त हिन्दी या अंग्रेजी भाषा में मुझसे बात कर सके। मैंने मैनेजर को बताया कि मैं नेताजी सुभाषचन्द्र बोस पर कुछ तथ्यों का संकलन करने यहाँ आया हूँ। 
      मैनेजर नेताजी के नाम का उल्लेख सुनकर बहुत प्रसन्न हुआ। वह थाईलैण्ड का रहने वाला था और वह नेताजी का परमभक्त था। उसने टेलीफोन करके मेरे सामने एक दुभाषिया बुला दिया। वह अंग्रेजी जानता था। मैंने उससे बात की-
      ‘‘मैं यहाँ के कुछ चीनी कवियों से मिलना चाहता हूँ। या तो आप मुझे उनके पास ले चलिए या उनमें से कुछ को मेरे पास ले आइये।’’
      दुभाषिया गया और दो चीनी कवियों को मेरे पास ले आया। मैंने उनसे बात की-
      ‘‘वह बड़ा दुर्भाग्यपूर्ण समय था जब सन् 1962 ई. में चीन देश ने हमारे देश पर आक्रमण किया था। उस समय भारतीय कवियों ने चीन के विरुद्ध बहुत कविताएँ लिखी थीं। मैंने सबसे ज्यादा कविताएँ लिखी थीं। यह स्वाभाविक ही है कि आप लोगों ने भी भारत के विरुद्व कविताएँ अवश्य लिखी होंगी। मैं चाहता हूँ कि हम लोग बैठकर उस तरह की कविताएँ सुनें-सुनाएँ।’’ मेरे कथन को सुनकर उन चीनी कवियों ने आपस में एक-दूसरे को देखा। उनके चेहरों पर कुटिल मुस्कान दिखाई दे रही थी। उनमें से एक ने कहा- ‘‘हम लोग तो अभी नौसिखिए हैं। हमारे वरिष्ठ कवियों ने इस प्रकार की कविताएँ अवश्य लिखी हैं। यदि आप चाहें तो हम लोग उनको यहाँ ले आते हैं। फिर हम लोग किसी पार्क में चलकर एक-दूसरे की कविताएँ सुनेंगे-सुनाएँगे।’’
      मैंने उनका प्रस्ताव मान लिया। वे लोग चले गए। मैं अपने कमरे में पहुँचकर कुछ लिखा-पढ़ी करने लगा। थोड़ी देर पश्चात होटल का मैनेजर मेरे कमरे पर पहुँचा और बोला- ‘‘मैं आपसे कुछ गोपनीय बात करना चाहता हूँ। आप कमरे का दरवाजा बन्द कर लीजिए।’’
      मैंने कमरे का दरवाजा बन्द करके पूछा- 
      ‘‘कहिए, आप क्या कहना चाहते हैं? आप इतने घबराये हुए क्यों हैं?’’
      बातचीत आरम्भ हुई-
      ‘‘क्या आपने चीनी दुभाषिए के अलावा और किसी को मिलने बुलाया था?’’
      ‘‘जी हाँ, मैंने कुछ चीनी कवियों को बुलाया है। उनके आने पर उनके साथ बाहर जाने की बात भी ठहरी है। उनके आने पर आप मुझे सूचित कर दीजिए।’’
      ‘‘वे लोग एक जीप में बैठ कर आए भी थे और मैंने झूठ बोल कर उन्हें लौटा भी दिया है। जो लोग आए थे वे कवि थे या नहीं, पर मैं इतना अवश्य जानता हूँ कि वे लोग यहाँ के कुख्यात गुण्डे थे और उनमें से कुछ तो कातिल भी थे। क्रोध के आवेश में वे आपके विषय में पूछ रहे थे कि हिन्दुस्तानी कवि कहाँ है। क्या आपने उन लोगों की शान के खिलाफ कुछ बात कही थी?’’
      ‘‘मैंने तो सिर्फ इतना ही कहा था कि भारत-चीन युद्ध के दिनों में मैंने चीन के विरुद्ध बहुत सारी कविताएँ लिखीं थीं।’’
      ‘‘यह तो उनके आक्रोश के लिए काफी था। अपने राष्ट्र का अपमान वे कैसे सहते! यदि वे आपको अपने साथ ले जाते तो यह निश्चय मानिए कि आप मेरे लॉज में जीवित वापस नहीं आ सकते थे। आप नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का काम लेकर आए हैं, इस कारण आपकी रक्षा करना मैंने अपना कर्तव्य समझा। मेरा तो परामर्श है कि आप मेरा यह लॉज ही नहीं, तीन घण्टे के अन्दर हाँगकाँग भी छोड़ दीजिए, तीन घंटे पश्चात वे आपको लेने दुबारा आ जाएँगे।’’
      ‘‘आपने मेरे लिए जो कुछ किया, उसके लिए मैं आपका कृतज्ञ हूँ, लेकिन टोकियो के लिए मेरा टिकिट कल का है। मैं आज हाँगकाँग कैसे छोड़ सकता हूँ।’’ 
      ‘‘मैं इसका भी प्रबन्ध किए देता हूँ। मेरी पहचान सब दूर है।’’
      और सचमुच ही उन मैनेजर महोदय ने मेरे उसी दिन के टिकिट का प्रबन्ध कर दिया। इतना ही नहीं, मेरी सुरक्षा के लिए उन्होंने अपना सहायक मेरे साथ भेज दिया, जिसने मुझे टोकियो जाने वाले विमान में बिठाकर ही विदा ली। नेताजी के प्रभाव ने मेरे प्राणों की रक्षा की।
      अपने लेखन के क्रम में इस तरह के कड़वे अनुभव मुझे बहुत हुए हैं। ऐसा नहीं कि मुझे कड़वे अनुभव ही हुए हों। मेरे जीवन के साथ बहुत मीठे-मीठे अनुभव भी जुड़े हुए हैं। मैंने कहीं लिखा भी है-
कड़वे घूँट मिले पीने को/तो मिठास भी बहुत मिली है,
कभी धूप ने झुलसाया, तो/कभी-कभी चाँदनी खिली है।
पर यह सच है, अपने मन को/कुंठाओं ने कभी न घेरा,
रात न उतनी सघन रही है/जितना उजला रहा सवेरा।
      तो अभी केवल इतना ही। शेष फिर कभी।   

(‘राष्ट्रकवि सरल स्मारिका’ से साभार)