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रविवार, 30 सितंबर 2018

किताबें

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  8,   अंक  :  01-02, सितम्बर-अक्टूबर  2018


{लेखकों/प्रकाशकों से अनुरोध है कृपया समीक्षा भेजने के साथ पुस्तक की एक प्रति (एक से अधिक नहीं) हमारे अवलोकनार्थ अवश्य  डा. उमेश महादोषी, 121, इन्द्रापुरम, निकट बी.डी.ए. कालौनी, बदायूं रोड, बरेली, उ.प्र. के पते पर भेजें। समीक्षाएँ ई मेल द्वारा कृतिदेव 010 या यूनिकोड मंगल फॉन्ट में वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल के रूप में ही भेजें।स्कैन करके या पीडीएफ में भेजी रचनाओं का उपयोग सम्भव नहीं होगा। मुद्रित अविराम साहित्यिकी में समीक्षाओं का प्रकाशन फ़िलहाल स्थगित कर दिया गया है। बिना प्रति भेजे समीक्षा प्रकाशित नहीं की जाएगी। 


डॉ. उमेश महादोषी




सौन्दर्य बोध के सूत्रों को प्रतिबिम्बित करती लघुकथाएँ

       लघुकथा लेखन के यथार्थ को समझने, निरन्तर सीखने और सूक्ष्म चिंतन के साथ आगे बढ़ने वाले नई पीढ़ी के श्रेष्ठ लघुकथाकारों  में एक प्रमुख नाम है डॉ. संध्या तिवारी। ‘ततः किम्’ डॉ. संध्या का प्रभावशाली लघुकथा संग्रह है, जिसमें उनकी 71 लघुकथाएँ शामिल हैं। इनमें से अनेक में सटीक बिम्बों का उपयोग विशेष रूप से प्रभावित करता है। संध्याजी पुराने विषयों को भी नए जैसे रूप में प्रस्तुत करने में सक्षम हैं। सृजन शैली पर कविता का प्रभाव है, लेकिन यह प्रभाव कथा पर हावी नहीं है। उनकी काव्यात्मकता लघुकथा के सौंदर्य को बढ़ाने का काम करती है। जीवन के अनेक पहलुओं
को समझकर लघुता में व्यापकता के साथ प्रस्तुत करने में वह सक्षम हैं। उनके पात्रों का व्यक्तित्व और भाषा बहुत तेज-तर्रार नहीं होती, लेकिन अपनी बात कहने की सामर्थ्य उनमें भरपूर होती है। बेहद सरल, सहज और सधे शब्दों में कही गयी बात पाठक के अन्तर्मन में सीधे और पूरी तीव्रता के साथ उतर जाती है। उनके कथ्य भावपूर्ण स्वरूप में उद्भूत होते हैं, उन्हें पारिभाषिक शब्दावली में बाँधना मुश्किल और अनावश्यक लगता है। यदि यह कहा जाये तो कहीं अधिक सही होगा कि उनकी लघुकथाओं में कथा की स्पष्ट और दैहिक उपस्थिति के बावजूद कथ्य कविता की सुगन्ध सरीखे होते हैं। 
       नारी विमर्श संध्याजी का प्रिय विषय है। संग्रह में नारी से जुड़ी समस्याओं और उसकी सामाजिक स्थिति से जुड़ी लघुकथाओं की संख्या काफी अधिक है, इनमें से कविता, जहन्नुम, बिना सिर वाली लड़की, सिलवट, बया और बन्दर, दिठौना, कठिना, कौआ हड़उनी आदि जैसी लघुकथाओं को लम्बे समय तक याद किया जायेगा। दलित विमर्श पर उनकी लघुकथा ‘चप्पल के बहाने’ विशेष ध्यान आकर्षित करती है। असहिष्णुता के मुद्दे पर बुद्धिजीवियों के शोर-शराबे पर ‘मैं तो नाचूँगी गूलर तले’ बेहद मारक लघुकथा है। संग्रह की अन्य लघुकथाओं मे से भी अधिकांश प्रभावशाली हैं। नई पीढ़ी के अन्य लघुकथाकारों के सापेक्ष डॉ. संध्या तिवारी अपने पहले ही संग्रह के माध्यम से विशेष पहचान बनाने में सफल हैं। उनकी कई लघुकथाएँ सार्वकालिक लघुकथाओं की श्रेणी में रखे जाने योग्य है। उनके शीर्षक बहुत आकर्षक और कथ्य को प्रभावी बनाने वाले होते हैं। इस संग्रह को नई पीढ़ी की लघुकथा में सौन्दर्य बोध के सूत्रों के प्रतिबिम्बन के लिए भी देखा जा सकता है। उम्मीद है आने वाले समय में उनकी और भी बेहतरीन लघुकथाएँ सामने आयेंगी।
ततः किम् : लघुकथा संग्रह : डॉ. संध्या तिवारी। प्रकाशक : पोएट्री बुक बाजार, एफएफ-1679, लेखराज डालर, इन्द्रानगर, लखनऊ-16, उ.प्र.। मूल्य: रु. 140/- मात्र।

  • 121, इन्द्रापुरम, निकट बीडीए कॉलोनी, बदायूँ रोड, बरेली-247001, उ.प्र./मो. 09458929004

शनिवार, 22 सितंबर 2018

किताबें

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक  :  11-12,  जुलाई-अगस्त 2018


{लेखकों/प्रकाशकों से अनुरोध है कृपया समीक्षा भेजने के साथ पुस्तक की एक प्रति (एक से अधिक नहीं) हमारे अवलोकनार्थ डा. उमेश महादोषी, 121, इन्द्रापुरम, निकट बी.डी.ए. कालौनी, बदायूं रोड, बरेली, उ.प्र. के पते पर अवश्य भेजें। समीक्षाएँ ई मेल द्वारा कृतिदेव 010 या यूनिकोड मंगल फॉन्ट में वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल के रूप में ही भेजें।स्कैन करके या पीडीएफ में भेजी रचनाओं का उपयोग सम्भव नहीं होगा। बिना पुस्तक भेजे समीक्षा-प्रकाशन संभव नहीं होगा। मुद्रित अविराम साहित्यिकी में समीक्षाओं का प्रकाशन फ़िलहाल स्थगित कर दिया गया है।}

डॉ. उमेश महादोषी




नई पीढ़ी की प्रेमाभिव्यक्ति की कहानियाँ



        नई पीढ़ी के कथाकारों में अभिव्यक्ति को पाठकों तक ले जाने की तीव्र आकांक्षा आज के संसाधन सम्पन्न युग के अनुरूप है। अवसर भी आसानी से उपलब्ध हैं, ऐेसे में नए रचनाकारों के संग्रह काफी संख्या में आ रहे हैं। ज्योत्स्ना ‘कपिल’ ने लघुकथा के साथ कहानी के क्षेत्र में भी पदार्पण किया। लघुकथा से पहले कहानी-संग्रह लाने का निर्णय अच्छा है। 50-60 लघुकथाओं के सापेक्ष सात कहानियों में उनकी क्षमताओं की कहीं अधिक मजबूत गवाही है। ‘प्यासी नदी बहती रही’ में उनकी सात में से छै कहानियों के केन्द्र में प्रेमाभिव्यक्ति है। प्रेमाभिव्यक्ति से इतर एक मात्र कहानी ‘वो चेहरा’ भूत-प्रेत में विश्वास रखने वालों पर बेहद सरल अन्दाज में किया गया तंज है।

      ‘टीस’ में एक लेखक और उसकी फैन एक महिला पाठक के मध्य पनपे भावुक प्रेम की अभिव्यक्ति है। यह
एक यथार्थपरक रचना है, लेकिन इस तरह के भावुक प्रेम की सीमाओं को भी लेखिका ने अपनी रचनात्मकता में शामिल किया है। संग्रह की शीर्षक कथा ‘प्यासी नदी बहती रही’ में प्रेम में त्याग, उपेक्षा और अन्ततः उसके अहसास को चित्रित किया गया है। यह सकारात्मक पारिवारिक प्रेम का प्रभावशाली चित्र है। ‘गंधहीन रजनीगंधा’ में प्रेम के नाम पर कार्पोरेट कल्चर का लेखा-जोखा है। इसे एक प्रेम कथा की वजाय कार्पोरेट कल्चर में व्याप्त व्यापारिक ईर्ष्या की कथा कहा जाये तो अधिक उचित होगा, जहाँ किसी की प्रतिभा का लाभ उठाने के साथ उसके शोषण की प्रवृत्ति स्थापित है। ‘ख्वाहिशों का खण्डहर’ में प्रेम में छलावे का रूप देखने को मिलता है। यह अत्यधिक भावुक विश्वास का परिणाम है। प्रेम में सामान्यतः विश्वास का अतिरेक धोखे का आधार तैयार करता है। प्रेम का यह रूप समाज का हिस्सा बन चुका है। यह भावुक प्रेम की कमजोरी ही है कि देख-समझकर भी विश्वास का अतिरेक कम नहीं होता। आये दिन लड़कियाँ छली जा रही हैं। ‘कशिश’ में एक सकारात्मक प्रेम का रूप दिखाया गया है। कथानायक अविनाश का नीरा के प्रति प्रेम वास्तविक और गहरा है, लेकिन वह स्वयं को नीरा के योग्य बनाने की कोशिश में अपने प्रेम को व्यक्त करने में इतनी देर कर देता है कि तब तक नीरा की शादी कहीं और तय हो जाती है। भले आधुनिक दृष्टि इस कथा में अभी भी अपने परिपक्व स्वरूप तक नहीं पहुँच सकी है, लेकिन वर्तमान कालखण्ड में यथार्थ इसी बिन्दु के इर्द-गिर्द स्थित है। एक बार शादी तय हो जाने के बाद अपने परिवार के मान-सम्मान का प्रश्न सर्वोपरि माना जाता है। परिवार का समर्थन किसी लड़की के पक्ष में तय हो चुके रिश्ते को उसके प्रेम के लिए तोड़ देने की स्थिति तक सामान्यतः नहीं जा पाता। संग्रह की अंतिम कहानी ‘कोई नाम न दो’ सबसे लम्बी कहानी तो है ही, इसे इसी संग्रह की कहानी ‘टीस’ का विस्तार भी कहा जा सकता है। इस कथा में बार-बार यह प्रश्न उठता है, क्या शारीरिक आकर्षण के बिना प्रेम नहीं हो सकता और क्या बिना नाम दिए प्रेम का रिश्ता भावनात्मक रूप से बनाया और बढ़ाया नहीं जा सकता? प्रश्न अपनी जगह उचित है, लेकिन इस कथा में दर्शायी गई ईमानदारी और संयम का निर्वाह कितनी बार वास्तव में हो पाता है? जहाँ कदम-कदम पर ‘ख्वाहिशों का खण्डहर’ दोहराने का जोखिम मौजूद हो, वहाँ कुछ मर्यादाओं की सीमाओं पर विचार करने से किसी को आहत नहीं होना चाहिए। हाँ, एक सकारात्मक विमर्श के प्रस्ताव के लिए इस कहानी को अच्छे अंक दिए जा सकते हैं। 
      निसंदेह नई पीढ़ी की अपनी प्रेम दृष्टि है, जिसकी कुछ झलक इन कथाओं में दिखाई देती है। ज्योत्स्ना ‘कपिल’ ऊर्जावान कथाकार के रूप में उभर रही हैं, उनके व्यक्तित्व की ऊर्जा उनकी रचनाओं में भी है। सामाजिक आवश्यकताओं के फलक की समग्रता को पहचानते हुए विषय-वैविध्य के साथ वह आगे बढ़ें, कथाजगत को उनसे काफी कुछ मिलने की उम्मीद है।
प्यासी नदी बहती रही : कहानी संग्रह : ज्योत्स्ना ‘कपिल’। प्रकाशक : अयन प्रकाशन, 1/20, महरौली, नई दिल्ली-30। मूल्य : रु. 220/- मात्र। सं. : 2017।
  • 121, इन्द्रापुरम, निकट बी.डी.ए. कॉलोनी, बदायूँ रोड, बरेली-243001, उ.प्र./मो. 09458929004

मंगलवार, 29 मई 2018

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक  :  07-08,  मार्च-अप्रैल 2018 



।।हाइकु।।


उमेश महादोषी



हाइकु

01.

कुछ हो न हो
श्वांस में सुगन्ध हो
ये उमंग हो!

02.

कुआँ ही कुआँ
ज़हर का उफान 
और ये धुआँ

03.

खनक सुनी
और सुनता रहा
भागता कहाँ।

04.

किन्तु अकेला
मैं भीड़ की देह में
काल चक्र-सा!

05.

भुलाऊँ तुम्हें
और भूलता हुआ 
रेखाचित्र : (स्व.) बी. मोहन नेगी 
कहाँ जाऊँ मैं!

06.

घड़ा था भरा
छलका तो ऐसा कि
बूँद  न बची!

07.
आहट तेरी
सुनूँ बेखबर-सा
और मैं हसूँ! 
  • 121, इन्द्रापुरम, निकट बी.डी.ए. कॉलोनी, बदायूँ रोड, बरेली-243001, उ.प्र./मो. 09458929004

सरोकार

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक  :  09-10,  मई-जून 2018 


हमारे सरोकार 


उमेश महादोषी





महाराणा प्रताप की शौर्यगाथा को पुनर्जीवित करता संग्रहालय
      हल्दीघाटी के बारे में अब तक मैंने केवल किताबों में ही पड़ा था। इसलिए जब इस बार सितम्बर (14-16) 2017 में श्री श्यामप्रकाश देवपुरा जी के निमंत्रण पर श्रीनाथद्वारा जाने का अवसर मिला, तो हल्दीघाटी की पवित्र भूमि के दर्शन करने का लोभ संवरण नहीं कर पाया। श्रीनाथद्वारा में अग्रज श्री माधव नागदाजी से मुलाकात हुई और उन्हें अपनी मनोभावना से अवगत कराया तो उन्होंने अपना स्नेह उड़ेलते हुए कहा, आप समय निर्धारित कर लो, मैं गाड़ी लेकर आ जाऊँगा और स्वयं आपको हल्दीघाटी के दर्शन कराके लाऊँगा। इस प्रकार 16 सितम्बर को नागदाजी के स्नेहाबलम्बन से हल्दीघाटी की पावन भूमि का दर्शन-लाभ करने सौभाग्य
मिल गया। जाते समय बेहद सुहावना मौसस सोने पर सुहागा जैसा लग था। रास्ते में हरी-भरी पहाड़ियों के मध्य से गुजरते हुए लग ही नहीं रहा था कि मैं रेगिस्तानी समझे जाने वाले राजस्थान प्रदेश का भ्रमण कर रहा हूँ। जैसे ही हम अरावली पहाड़ियों के पीली मिट्टी से युक्त भाग में संकरे रास्ते पर पहुँचे, नागदाजी ने बताया, हम लोग हल्दीघाटी पहुँच चुके हैं। मैंने कहा, सर, हम यहाँ थोड़ी देर रुक लें। मेरा मन उस भूमि और वहाँ के
हल्दीघाटी स्थित चेतक स्मारक
(छायाचित्र : माधव नागदा)
हो रहा था। नागदा साहब ने जहाँ गाड़ी रोकी, वहाँ एक सुन्दर गुफा थी, जिसमें एक मन्दिर भी है। नागदाजी बोले, इस गुफा को तो मैं भी पहली बार देख रहा हूँ। संभवतः यह रामेश्वर मन्दिर कहलाता है और इसके अन्दर जाकर सुप्रसिद्ध प्रताप गुफा स्थित है, जहाँ महाराणा प्रताप गुप्त मंत्रणा किया करते थे। पन्द्रह-बीस मिनट वहाँ रुकने के बाद हम बादशाही बाग होते हुए चेतक स्मारक की ओर बढ़ गये। बादशाही बाग वह स्थान है, जहाँ मुगल सेना ठहरी थी। चेतक स्मारक के दर्शन करने के बाद हम महाराणा प्रताप संग्रहालय देखने पहुँचे। रक्ततलाई, जहाँ हल्दीघाटी का भीषण युद्ध हुआ था और वर्तमान में एक झील के रूप में स्थित है, के दर्शन भी इसी मार्ग पर स्थित होने के कारण हमें सहज सुलभ हो गए। 

      यद्यपि हल्दीघाटी के क्षेत्र में चेतक स्मारक, रक्त तलाई, मायरा की गुफा, बादशाही बाग, मचींद, चावण्ड, आदि कई दर्शनीय स्थल हैं, लेकिन महाराणा प्रताप के बारे में एकमुश्त जानकारी देने और उनकी गाथा को जीवंत रूप में प्रस्तुत करने के कारण विशेष आकर्षण का केन्द्र है महाराणा प्रताप संग्रहालय। यह संग्रहालय एक प्राइवेट और महाराणा प्रताप की स्मृतियों को संजोने वाला समर्पित उद्यम है। इसके संकल्पक-संस्थापक- संचालक एक सेवानिवृत अध्यापक हैं, जिन्होंने अपने जीवन की सम्पूर्ण पूँजी लगाकर अनेक व्यवधानों और मुश्किलों से जूझते हुए न सिर्फ इसे स्थापित किया, बल्कि हल्दीघाटी की भावनामय और देशभक्ति के ज्वार को जगाने वाली पवित्र भूमि को पर्यटकों के माध्यम से देश के तमाम हिस्सों से जोड़ने का काम भी किया है। पर्यटक इस भूमि को प्रणाम करने पहले भी आते थे, लेकिन उन्हें इस भूमि के इतिहास और महान गाथा से परिचित कराने का कोई माध्यम नहीं था, परिणामस्वरूप वे निराश होकर लौटते थे। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि पर्यटकों के आने का कोई लाभ इस क्षेत्र को भी नहीं मिल पाता था। संग्रहालय की स्थापना से, इसमें काम करने वाले शताधिक लोगों को तो रोजगार मिला ही है, क्षेत्र में होनेवाली गुलाब की खेती और गुलाब से बनने वाले उत्पादों की बिक्री एवं अन्य कार्यों के लिए भी अवसर पैदा हो रहे हैं। इसका सकारात्मक प्रभाव स्थानीय लोगों की जीविका के विकास पर भी पड़ना स्वाभाविक है। और एक बात, अज्ञात कारणों से आजादी के इतने
माधव नागदा  के साथ
डॉ. मोहनलाल श्रीमाली जी
 
वर्षों के बाद भी जो काम सरकारों, स्वयंसेवी संस्थानों और राजनैतिक संगठनों ने नहीं किया, वह काम एक व्यक्ति, एक परिवार ने कर दिखाया है। संग्रहालय के ऐसे कर्मठ और दृढ़ इच्छाशक्ति के धनी संस्थापक डॉ. मोहनलाल श्रीमाली जी से भेंट का सौभाग्य भी हमें मिल गया। दरअसल लौटने से पहले हम लोग संग्रहालय में स्थित रेस्तरां में चाय पीने के लिए घुसे तो वहाँ श्रीमालीजी भोजन कर रहे थे। वह नागदा साहब के मित्र भी हैं सो उन्होंने नागदाजी को देखते ही अपने पास की कुर्सियों पर बुला लिया और आग्रहपूर्वक हमें चाय पिलवाई। नागदाजी ने मेरा परिचय कराया और बातों का सिलसिला आरम्भ हुआ तो लगभग पौने घंटे से अधिक का समय यूँ ही बीत गया। अपने पाठकों के लिए संग्रहालय की स्थापना और उसके पीछे श्रीमाली जी की भावना, समर्पण और योगदान को साझा करना मुझे सामाजिक दृष्टि से अत्यंत उपयोगी लग रहा है।

      19 अक्टूबर 1949 (अभिलेखों में 03 जुलाई 1951) को जन्में बी.ए. व बी.एड. तक शिक्षित डॉ. मोहन लाल श्रीमाली सरकारी शिक्षक थे। अपनी शिक्षा एवं शिक्षा के क्षेत्र में आने का पूरा श्रेय स्वनामधन्य स्वतंत्रता सेनानी श्री बलवन्त सिंह मेहताजी को देते हुए कहते हैं, ‘‘मेहता साहब महाराणा प्रताप के परम भक्त थे। हल्दीघाटी से जुड़ी मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि के दृष्टिगत उन्होंने मुझे प्रेरित किया कि मैं हल्दीघाटी को ही अपना कर्मक्षेत्र
संग्रहालय प्रांगण में मेवाड़ी संस्कृति की एक झाँकी
(छायाचित्र : उमेश महादोषी)
बनाऊँ। इसीलिए उन्होंने मुझे शिक्षा के क्षेत्र में आने में मदद की। उन दिनों पर्यटकों के मार्गदर्शन के लिए हल्दीघाटी के पाँच कि.मी. के पूरे क्षेत्र में कोई सुविधा नहीं थी। मेहता साहब ने इस कमी को पूरा करने के लिए मुझे कहा। 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी ने इस क्षेत्र का दौरा किया, तब यहाँ एक छोटे-से भवन का निर्माण कराया गया, जिसे बाद में पर्यटन विभाग को अन्तरित करके ‘मिड वे’ रेस्तरां में बदल दिया गया। लेकिन पर्यटन विभाग उसे चला नहीं पाया और उसे चलाने के लिए मेरे पिता श्री जमुनालाल श्रीमाली जी से अनुरोध किया। भवन का कोई किराया न लेने का वादा किया गया। पिताजी के अथक परिश्रम से जब वह कुछ चलने लगा तो भवन का किराया माँगा गया। लेकिन आय इतनी नहीं थी कि हम किराया दे पाते। अतः उसे बन्द करना पड़ा। लेकिन उस दौरान पर्यटकों को होने वाली परेशानियों से रूबरू होने और सरकार द्वारा इस क्षेत्र की निरंतर उपेक्षा ने मुझे कुछ करने को प्रेरित किया। शिक्षा विभाग में मेरे परिश्रम और ईमानदारी से किए गए कार्यों, जिनमें सरकारी मदद से कुछ स्कूलों का निर्माण भी शामिल था, के दृष्टिगत कई प्रशासनिक अधिकारियों, जिलाधिकारी रहे श्री सुभाष गर्ग, शिक्षा निदेशक रहे श्री ललित पंवार आदि ने मेरा उत्साह बढ़ाया। अन्ततः मैंने महाराणा प्रताप संग्रहालय बनाने की योजना बनाई। भूमि मेरे पास थी, लेकिन निर्माण के लिए धन नहीं था। बैंक से ऋण मिला नहीं। लेकिन इच्छाशक्ति और संकल्प था। पारिवारिक जमीन बेची, पत्नी के आभूषण बेचे और स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति से मिला धन, सब लगा दिया। बाद में एक प्राइवेट बैंक से लगभग 30 लाख का ऋण मिला। इस प्रकार 1997 में आरम्भ किये गये इस संग्रहालय का उद्घाटन 2003 में महामहिम राज्यपाल श्री अंशुमान सिंह जी के कर-कमलों से सम्पन्न हुआ। यद्यपि विकास एवं निर्माण कार्य अभी भी जारी है।’’

   
कैप्शन जोसंग्रहालय प्रांगण में
हल्दीघाटी की यशोगाथा को दर्शाती एक झाँकी

(छायाचित्र : उमेश महादोषी)
  श्रीमालीजी के अनुसार, आरम्भ में पर्यटक संग्रहालय देखने में संकोच करते थे। उस समय दस रुपये प्रवेश शुल्क था। प्रबंधकगण पर्यटकों को इस आश्वासन पर संग्रहालय देखने को तैयार करते थे कि प्रवेश शुल्क संग्रहालय पसंद आने पर देखने के बाद दीजियेगा। लोगों को संग्रहालय अच्छा लगता और वे जाते समय शुल्क देकर जाते। इस प्रकार पर्यटकों का रुझान बढ़ता गया। पहले साल दर्शनार्थियों की संख्या दस हजार थी, जो अब तक एक लाख प्रति वर्ष तक पहुँच चुकी है। अक्टूबर-दिसम्बर व जन्माष्टमी आदि प्रमुख त्यौहारों के समय बड़ी संख्या में आते हैं। वर्तमान में संग्रहालय का शुल्क एक सौ रुपये प्रति दर्शनार्थी है।

     डॉ. मोहनलाल श्रीमाली द्वारा स्थापित यह संग्रहालय उनकी सात बीघा पैतृक भूमि पर चेतक स्मारक से थोड़ी ही दूरी पर खमनोर और बलीचा गाँवों के मध्य स्थित है। संग्रहालय में महाराणा प्रताप की स्मृतियों और धरोहर को बड़ी सिद्दत के साथ संजोया गया है। थियेटर भवन में प्रवेश करते ही स्वागत कक्ष में महाराणा प्रताप से जुड़े चित्रों और फाइबर निर्मित एक वृहद मानचित्र पर हल्दीघाटी के प्रमुख स्थलों और मार्गों का सांकेतिक प्रदर्शन किया गया है। एक संक्षिप्त फिल्म के माध्यम से इसी कक्ष में पर्यटकों को संग्रहालय की जानकारी दी जाती है। अगले कक्ष (थिएटर हॉल) में महाराणा प्रताप की शौर्यगाथा को लगभग 15 मिनट की फिल्म के माध्यम से दिखाया जाता है। आगे बढ़ने पर महाराणा से जुड़े कई प्रसंगों और घटनाओं को फाइबर से बनी विद्युत-सुसज्जित जीवंत झाँकियों के माध्यम से दर्शाया गया है। इस सबको आधुनिक स्वचालित तकनीक के माध्यम से इस प्रकार संचालित किया जाता है कि दर्शक मंत्रमुग्ध होकर देखता रहता है। संग्रहालय के इस प्रमुख भाग से बाहर आने पर गुलाब के उत्पादों की निर्माण-प्रक्रिया एवं स्थानीय संस्कृति को दर्शाने वाली कलात्मक मूर्तियों के साथ महाराणा प्रताप और हल्दीघाटी के युद्ध से जुड़े योद्धाओं व प्रसंगों को भी बड़ी और जीवंत मूर्तियों के माध्यम से खुले प्रांगण में प्रदर्शित किया गया है। इस प्रकार समूचा संग्रहालय हल्दीघाटी के युद्ध, महाराणा प्रताप के शौर्य और मेवाड़ी सांस्कृतिक धरोहर का एक यादगार और सजीव परिदृश्य प्रस्तुत करता है। प्रांगण में  गुलाब के स्थानीय उत्पाद पर्यटकों को बिक्री हेतु भी उपलब्ध हैं। संग्रहालय में पर्यटकों के भोजन एवं जलपान हेतु एक साफ-सुथरा रेस्तरां भी है। प्रवेश से लेकर विदा होने के क्षण तक दर्शक देशभक्ति और मेवाड़ की संस्कृति के प्रति सम्मोहित-सा बना रहता है।
      इतनी बड़ी परियोजना के निर्माण और संचालन में कठिनाइयाँ भी अवश्य आती हैं। निर्माण और स्थापना की कठिनाइयाँ तो आकर चलीं जाती हैं, लेकिन संचालन और भविष्य की आवश्यकताओं से जुड़ी चुनौतियों से जूझना बड़ा प्रश्न होता है। इस सन्दर्भ में डॉ. श्रीमालीजी का कहना है, पर्यटकों की बढ़ती संख्या और रुचि के दृष्टिगत स्थान की कमी और थियेटर की अल्पक्षमता सबसे बड़ी मुश्किल है। चूँकि सरकारी सहभागिता कीमत को कई गुना बढ़ा देती है, इसलिए सरकारी सहभागिता और मदद के बिना ही वह इसका विस्तार करना चाहते
डॉ. उमेश महादोषी  के साथ 
डॉ. मोहनलाल श्रीमाली जी
हैं। थियेटर की वर्तमान क्षमता 50 दर्शक से बढ़ाकर दोगुनी करना बहुत आवश्यक हो चुका है। अन्य सुविधाओं को भी समानुपात में बढ़ाना होगा। इसके लिए सरकार से दस बीघा भूमि कीमत देकर खरीदना चाहते हैं, जो नहीं मिल पा रही है। दूसरी बात, दक्षिण भारत व अन्य अहिन्दीभाषी क्षेत्रों से आने वाले पर्यटकों को समस्त जानकारी उनकी अपनी भाषा में मिल सके, इसकी अत्याधुनिक डिजीटल तकनीक भारत से बाहर उपलब्ध है, उसे लाने के प्रयास भी करने हैं। 

     एक समय पूरनपुर जिला पीलीभीत (उ.प्र.) में रहने वाले स्वनामधन्य महाकवि (स्व) पं. रामभरोसे लाल ‘पंकज’ जी ने ‘हिन्दूपति महाराणा प्रताप’ महाकाव्य लिखकर महाराणा प्रताप की स्मृतियों को बड़े स्तर पर संजोया था और उस पर सरकारी अनुग्रह स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। स्वक्षमताओं से किया जाने वाला श्रीमालीजी का यह कार्य भी निसंदेह महाराणा प्रताप की स्मृतियों को राष्ट्रीय फलक पर पुनर्जीवित करने वाला है। सरकारों को बिना हस्तक्षेप के उनका यथावांछित सहयोग करना ही चाहिए।

  • 121, इन्द्रापुरम, निकट बी.डी.ए. कॉलोनी, बदायूँ रोड, बरेली-243001, उ.प्र./मो. 09458929004

किताबें

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक  :  09-10,  मई-जून 2018

{लेखकों/प्रकाशकों से अनुरोध है कृपया समीक्षा भेजने के साथ पुस्तक की एक प्रति (एक से अधिक नहीं) हमारे अवलोकनार्थ डा. उमेश महादोषी, 121, इन्द्रापुरम, निकट बी.डी.ए. कालौनी, बदायूं रोड, बरेली, उ.प्र. के पते पर भेजें। समीक्षाएँ ई मेल द्वारा कृतिदेव 010 या यूनिकोड मंगल फॉन्ट में वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल के रूप में ही भेजें।स्कैन करके या पीडीएफ में भेजी रचनाओं का उपयोग सम्भव नहीं होगा } 


डॉ. उमेश महादोषी



सकारात्मक चिंतन की रचनात्मक कहानियाँ

प्रतापसिंह सोढ़ी जी को देशभर में मूलतः एक लघुकथाकार के रूप में पहचाना जाता है, लेकिन वे एक कहानीकार भी हैं और कवि भी। लघुकथाओं की तरह उनकी कहानियाँ भी प्रभावित करती हैं। लघुकथा हो या कहानी, सामाजिक सरोकारों के साथ पारिवारिक-सामाजिक रिश्तों की सोंधी गंध उनकी रचनात्मकता के केन्द्र में प्रायः उपस्थित रहती है। कहानी संग्रह ‘हम सब गुनहगार हैं’ में सोढ़ी जी की बारह मौलिक कहानियों के साथ छः लघुकथाएँ भी
संग्रहीत हैं। इन कहानियों में भाषागत सहजता-सरलता तो है ही, जीवन मूल्यों से जुड़ी भाव-प्रवणता भी पाठक मन को बाँधे रखती है। इनमें से अधिकांश कहानियों का सम्बन्ध आर्थिक रूप से निम्न एवं निम्न-मध्यम वर्ग के परिवेश से है। उस परिवेश की तमाम अच्छाइयों-बुराइयों के सजीव चित्रण के मध्य सकारात्मक भाव-चिंतन का प्रभावी सम्प्रेषण देखने को मिलता है। 
      संग्रह की पहली कहानी ‘उमंग के क्षण’ एक ऐसे ट्रक ड्राइवर गरमीत की कहानी है, जो आम ड्राइवरों के चाल-चलन और व्यवहार से इतर अपनी पूरी कमाई पत्नी के हाथ पर रखता है और परिवार के साथ खुश रहता है। इस बार ट्रक रास्ते में पलट जाने के कारण वह घर पर सही समय पर नहीं पहुँच पाया। तमाम शंका-आशंकाओं के बीच घर में उसकी पत्नी बेहद पेरशान होती है। वह गुरुद्वारे मन्नत माँगने जाती है, लौटने पर उसकी पड़ोसन शुभ समाचार देती है कि उसके ‘वो’ आये थे और ट्रक के पलटने व स्वयं के सकुशल होने की सूचना देकर गये हैं। पति की कुशल जानकर पत्नी खुशी की उमंग से भर जाती है। शराब के नशे में डूबते साथी ड्राइवरों के तंज भरे मजाकों के बीच गरमीत के आत्मनियंत्रण और उसके घर पर सही समय पर न पहुँचने से परेशान पत्नी की बेचैनी के दृश्य कथा को प्रभावशाली बनाते हैं।
      ‘सिद्धि की गुड़िया’ बाल्यावस्था में पनपे प्रेम के विछोह की भावपूर्ण कथा है। ‘नपे तुले कदम’ एक ऐसे निम्नवर्गीय ब्राह्मण लड़के की कहानी है, जो अपने घर व शहर से भागकर दूसरे शहर में गन्ने के रस की चर्खी पर नौकरी करता है और इस बात से डरता है कि उसके घर वालों को यह पता न चल जाये कि वह किसी की दुकान पर झूठे बर्तन धोता है। लेकिन जब वह नौकरी बदलता है तो घरों में काम करने वाली एक लड़की से प्रेम-विवाह करके अपने जीवन को व्यवस्थित कर लेता है। अब उसके मन से सारा डर निकल चुका है और वह जातिगत भेदभाव की भावना से दूर निडरता के साथ जीना सीख जाता है। प्रेम-डगर पर जीवन की सहजता-सरलता मिल जाये तो उसे निडरता के साथ अपनाने का सन्देश देती एक सकारात्मक कथा है। संग्रह की शीर्षक कथा ‘हम सब गुनहगार हैं’ पति-पत्नी के गहरे प्रेमान्त की कथा होने के साथ हमारे समाज के पिछड़े तबके, विशेषतः मुस्लिम समाज में बीमारियों का विशेषज्ञ डॉक्टरों से इलाज कराने की वजाय नीम-हकीमों के साथ मन्नतों और गंडे-तावीजों के लिए बाबाओं-पीरों-फकीरों के पीछे दौड़ने के दुष्प्रभावों को रेखांकित करती है।
      जीवन का कुछ अर्थ अपने लिए भी होता है, लेकिन उस अर्थ वाला अध्याय समाप्त हो जाये तो भी जीवन पलायन के लिए नहीं होता। जीवन का दूसरा अर्थ अपनी जिम्मेवारियों एवं स्वयं से जुड़े निकट संबन्धियों की खुशियों के लिए भी होता है। एक ट्रक दुर्घटना के कारण अपनी टाँगे गंवाने पर डॉक्टर से मौत माँगते ‘एहसास’ के जयदयाल को जब इस बात का एहसास होता है तो उसकी जीने की मर चुकी इच्छा पुनः जाग उठती है। ‘बीस साल बाद’ की अनु, ‘सांवली’ की सांवली, ‘मर्द’ की मंगली भी जीवन के दूसरे अर्थ का अध्याय खोलकर ही जीवन-संघर्ष को अपनाती हैं। ‘नई कमीज’ व ‘अपना खून’ कहानियों में ‘पारिवारिक रिश्तों’ की सोंधी गंध पाठक मन को अच्छी लगती है। ‘मायूस आँख बन्द होंठ’ अधूरे प्रेम की प्रभावशाली कहानी है। कई निम्न आयवर्ग के शोरशराबे का कारण बनते परिवारों के मध्य एक शालीन परिवार रहने आ जाता है, जिससे सभी प्रसन्न हैं। उस परिवार की लड़की घर की खिड़की से रोजाना झाँकती है, जिसे देखकर कथानायक सत्यजीत आकर्षित हो जाता है। वह उसका परिचय जानना और घनिष्ठता बढ़ाना चाहता है। लेकिन यह काम कैसे करे, इसी कशमकश में काफी समय निकल जाता है। एक दिन वह उसे पत्र लिखने का निर्णय करता है, लेकिन उसी दिन वह परिवार उस घर को छोड़कर जाने लगता है साथ ही सत्यजीत को पता चलता है कि उस लड़की को थ्रॉट कैंसर है। सत्यजीत का सपना टूट जाता है। ‘एक कप चाय में शायरी’ एक बुजुर्ग शायर की व्यथा-कथा है, जिसे एक कप चाय पिलाकर होटल में एक होटलवाला उसका कलाम इसलिए पढ़वाना चाहता है कि इससे उसके होटल में ग्राहकों की संख्या बढ़ जायेगी। संग्रह में गुरुबख्श सिंह की पंजाबी कहानी का सोढ़ी जी द्वारा अनुवाद (स्त्री मोहरा है पुरुष की शतरंज का) भी शामिल किया गया है, जो पुरुषों द्वारा स्त्री को उपयोग करने के प्रसंग की एक प्रभावशाली कथा है। संग्रह में शामिल सोढ़ी जी की छः लघुकथाएँ बहुचर्चित और पठनीय हैं।
      कुल मिलाकर संग्रह की कहानियाँ सकारात्मक चिंतन की पठनीय दस्तावेज हैं। 

हम सब गुनहगार हैं : कहानी संग्रह : प्रतापसिंह सोढ़ी। प्रका.: रिसर्च लिंक प्रकाशन, 81, सर्वसुविधा नगर एक्यटेंशन, कनाड़िया रोड, इन्दौर-452016, म.प्र.। मूल्य: रु. 120/- मात्र। सं.: 2017।

सोमवार, 30 अप्रैल 2018

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक  :  07-08,  मार्च-अप्रैल 2017


।।जनक छंद ।।


उमेश महादोषी



जनक छंद

01.

मुस्काता शिव देखता
निर्धनता की बाढ़ में
मैकू कैसे तैरता

02.

आँख-आँख में शोर है
सपनों की घुसपैठिया 
काटे देखो डोर है

03.

सर्पीली पगडंडियाँ
अरु हरियाते खेत वे
निगल गईं ये मंडियाँ

04.

ताला लटका द्वार पर
चाबी लेकर उड़ रहा
कौआ है बाजार पर

05.

बगुला बैठा ताक में
पर मछली को ले उड़ा
बाज मुआं आकाश में

06.

आँखों में लहरा रहीं
इठलाती लहरें सघन
तन-मन से टकरा रहीं

07.

छायाचित्र :
डॉ. बलराम अग्रवाल
 

पतझड़ के आह्वान का
मंत्र मिला तुमको मगर
बिन बसन्त किस काम का

08.

धारा का मुख मोड़कर
सींच रहे निज खेत तुम
जनहित चुनरी ओढ़कर!

09.

इस आतंकी जोर से
चिड़ियां सारी गुम हुईं
हथियारों के शोर से

10.

लक्ष्मण रेखा लाँघ तू
शस्त्र उठा पर हाथ में
निसिचर को ललकार तू
  • 121, इन्द्रापुरम, निकट बी.डी.ए. कॉलोनी, बदायूँ रोड, बरेली-243001, उ.प्र./मो. 09458929004

सरोकार

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक  :  07-08,  मार्च-अप्रैल 2018 


हमारे सरोकार 



डॉ. उमेश महादोषी




वैचारिक भँवर में राष्ट्रीयता का प्रश्न
पिछले दिनों राष्ट्रीय सन्दर्भ में कई तरह की चिन्ताएँ उभरकर सामने आई हैं। एक काम करने वाली सरकार को जनहित व राष्ट्रहित के काम करने से रोकने के कई कठोर प्रयासों के साथ हमने देखा है कि एक स्तर विशेष (केन्द्रीय) पर सरकार बदल जाने के कारण मात्र से लोग अपने ही राष्ट्र के खिलाफ किस तरह खड़े हो जाते हैं, जबकि नई सरकार के स्तर पर सामाजिक दृष्टि से कोई विशेष नकारात्मक कार्यवाही सामने न आई हो! किसी सरकार विशेष के खिलाफ खड़े होने की बात समझ में आ सकती है लेकिन सरकार के विरोध के नाम पर राष्ट्र के खिलाफ खड़े होने की कार्यवाही कुछ तो संकेत करती है। ऐसी कार्यवाही रातोंरात एवं किसी सरकार या राजनैतिक दल विशेष का विरोध करने मात्र के लिए नहीं हो सकती! लगता है कि पिछली सरकारों के दौरान देश के अन्दर काफी कुछ ऐसा होता रहा है जिसका आंशिक परिणाम आज सामने है। चीजों को नियंत्रित नहीं किया गया तो भविष्य में देश के समक्ष किसी बड़े संकट के खड़े होने की प्रबल संभावना है। राष्ट्रीय प्रतिबद्धता वाले किसी भी व्यक्ति के लिए यह घोर चिन्ता का विषय है। चूंकि विरोध का प्रश्न राष्ट्रीय अस्मिता पर चोट पहुँचाने वाला है, अतः सामाजिक-राष्ट्रीय अवधारणा को समझते हुए उसके सन्दर्भ में इस स्थिति की वास्तविकता पर विचार करना जरूरी है।
     राष्ट्रीय अवधारणा के पीछे दो प्रमुख पहलू हैं- एक तो मानवीय जीवन में वैयक्तिकता के सूक्ष्मांश के साथ सामूहिक जीवन के आकर्षण (सामाजिकता और राष्ट्रीयता) का स्वाभाविक विपुल अंश होता है। दूसरे, सामूहिक (सामाजिक, राष्ट्रीय और उससे भी आगे सम्पूर्ण मनुष्य जाति) सन्दर्भों में मनुष्य का प्रतिक्रियात्मक स्वभाव हर स्तर पर जीवन-व्यवहार की सीमाएँ तय करता है। मनुष्य के जन्म और उससे आगे के जीवन व्यवहार के साथ हम इसे समझने का प्रयास करते हैं।
     मनुष्य (अपितु हर जीव) के जन्म की एक सुनिश्चित प्रक्रिया होती है, उसमें प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष योगदान करने वाले अनेक होते हैं। उस जन्म से प्रभावित होने और उसे प्रभावित करने वालों का भी एक बड़ा समूह होता है, जिसमें जन्म में योगकर्ताओं के साथ-साथ अनेकानेक अन्य भी शामिल होते हैं। प्रभाव की प्रकृति एवं संपर्क जनित दूसरी चीजों में ऊर्जा की मात्रा व सहधर्मिता के स्तरों के अनुरूप समूह भी कई स्तरों पर संगठनात्मक रूपाकार गृहण करता है। इनमें घर-परिवार, समाज, राष्ट्र और अखिल विश्व आदि रूप शामिल होते हैं। इस तरह ‘मनुष्य’ का (और अन्य जीवों का भी) का जन्म व्यक्तिगत घटना नहीं है। इसी तरह मनुष्य की मृत्यु भी व्यक्तिगत घटना नहीं है। सत्य तो यह है कि मानवीय जीवन में सामान्यतः जन्म से मृत्यु तक कुछ भी व्यक्तिगत नहीं है (यहाँ मैं रिक्तता की बात नहीं कर रहा हूँ। जीवन से चीजों का निकल जाना रिक्तता पैदा करता है, यह मूल स्थिति नहीं होती है)। हर एक का जीवन किन्हीं न किन्हीं सूत्रों के माध्यम से दूसरे/दूसरों के जीवन से जुड़ा हुआ है। ऐसी स्थिति में मनुष्य के जीवन को मूलतः समधर्मी सहजीवन के रूप में समझा जाना चाहिए, जिसमें सामाजिकता मौलिक व स्वाभाविक रूप से स्थित होती है। यही सामाजिकता सार्वभौमिक तन्त्र द्वारा नियंत्रित भौगोलिक सीमाओं की परिधि में सहज-स्वाभाविक स्वीकार्यता के अधीन एक राष्ट्र का रूप धारण कर लेती है। राष्ट्र की सीमाओं में हर मनुष्य की समधर्मी सहजीवन के अनिवार्य अनुशासन को ग्रहण करने की क्षमताओं और अभ्यस्तता के अनुकूलन से जुड़ी चीजों से मिलने वाली पहचान उभरती है, जो अन्ततः सांस्कृतिक ताने-बाने के रूप में स्थापित होती है। इसी ताने-बाने में अन्य चीजों के साथ सहिष्णुता से असहिष्णुता की ओर जाने वाली एक मापक जैसी अन्तःधारा बहती है, जिस पर उस राष्ट्र के लोगों के सामान्य चरित्र को मापा जा सकता है। यह माप उस राष्ट्र के निवासियों की अपने लोगों के प्रति लगाव को जितना प्रदर्शित करती है, उतना ही राष्ट्र या दूसरी क्षेत्रीय सीमाओं से बाहर अन्यों के प्रति उनके आचार-व्यवहार को भी दर्शाती है। इस आचार-व्यवहार में सामान्यतः स्वपक्षीय दृढ़ता होती है, जिसकी मात्रा प्रमुखतः तीन बातों पर निर्भर करती है, एक- अपने सांस्कृतिक ताने-बाने और परिस्थितियों के प्रति अभ्यस्तता एवं अनुकूलन के सन्दर्भ में अन्य संस्कृतियों एवं उनके लोगों के प्रति ग्राह्यता कितनी है। दूसरे- इस ग्राह्यता के प्रति अन्य राष्ट्र या क्षेत्रीय सीमाओं के लोगों की क्या प्रतिक्रिया है। और तीसरे- अपने लोगों की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों, विकास, सुरक्षा आदि से जुड़ी आवश्यकताओं एवं उनके सन्दर्भ में हमारी और दूसरों की सापेक्षिक प्रतिक्रियाओं का क्या स्तर है। इस प्रकार कुछ राष्ट्रों के लोग एक-दूसरे के लोगों के आचरण के प्रति अपेक्षाकृत अधिक सहिष्णु हो सकते हैं, उनमें परस्पर सम्मान की भावना काफी अधिक हो सकती है जबकि कुछ अन्य राष्ट्रों के लोगों के मध्य विपरीत स्थिति हो सकती है। निश्चित रूप से समूहगत सीमाओं के बाहर सहधर्मिता और निर्भरता के बावजूद पाई जाने वाली प्रतिस्पर्धा राष्ट्रीय सीमाओं के बाहर बहुत स्पष्ट, कभी-कभी तो विकराल रूप में देखने को मिलती है। स्पष्ट है, राष्ट्रीय सीमाओं के पक्ष को नकारा नहीं जा सकता। 
      यहाँ एक और तथ्य उभरता है कि मनुष्य और मनुष्य के मध्य सहधर्मिता के बावजूद एक स्पष्ट विभेद होता है, वह उतना ही सत्य है, जितना स्वयं मनुष्य का होना। राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर इस विभेद को समाप्त करने के संकल्प लिए जा सकते हैं। लेकिन राष्टीªय सीमाओं के बाहर अखिल विश्व स्तर पर हम इस विभेद को यथासंभव न्यून करने के प्रयास कर सकते हैं, विभेद के रहते हुए भी मनुष्य को मनुष्य के साथ खड़ा कर सकने के प्रयास कर सकते हैं, लेकिन इसे पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकते। राष्ट्रीय सीमाओं के इधर-उधर का पारस्परिक व्यवहार सदैव सापेक्षिक और प्रतिक्रियात्मक होता है। कुछ सूक्ष्म स्तरों को अपवाद के तौर पर छोड़ दें, तो यह एक जैविक सिद्धान्त जैसा है। इसलिए हमें स्वीकार करना होगा कि विश्व स्तर पर मनुष्य और मनुष्य के मध्य का यह विभेद मनुष्य के जीवन व्यापार का एक अहं आधार है। इसमें ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’’ की अवधारणा भी स्थित है और सम्पूर्ण विश्व पर आधिपत्य स्थापित करके स्वेच्छाचारी नियंत्रण की महत्वाकांक्षा भी। हर नकारात्मकता का विरोध और सकारात्मकता की प्राप्ति के प्रयास इसके साथ ही करने होंगे। इसलिए राष्ट्रीय सीमाओं की समाप्ति के विचार के विरुद्ध हमें उन्हें संपुष्ट करने के विचार की श्रेष्ठता एवं राष्ट्रों की संप्रभुता के सम्मान को स्थापित-प्रसारित करने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए। आज राष्ट्रीय सीमाओं के विरुद्ध जो भी गतिविधियाँ चल रही हैं, वे विचारधाराओं के विस्तार की प्रक्रिया का अंग मात्र हैं, जिनका उद्देश्य अन्ततः वृहद सीमाओं वाली महाशक्ति, जिसमें कुछ प्रभावशाली मानव समूह अन्यों को गुलाम बनाकर अपनी कुण्ठाओं को तृप्त करना चाहते हैं, के निर्माण की आकांक्षा से अधिक कुछ नहीं है। यह कैसे भी सकारात्मकताओं की स्थापना-प्रक्रिया नहीं है। कम शक्तिशाली राष्ट्रों के भावुक प्रवृत्ति वाले लोगों के मध्य व्यक्तिगत अपेक्षाओं-महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति की लालसा के वशीभूत कुछ चालाक किस्म के लोग विस्तारवादी परिधि में स्वैच्छिक बन्दी बनकर स्वदेशी भावुक जनों को भी उसी परिधि में खींचने व राष्ट्रीय विचार को विभक्त करने का कार्य करते हैं। ऐसे में प्रतिक्रियास्वरूप राष्ट्रीय विचारधारा के पक्ष में थोड़ी सी भी सुरक्षात्मक सक्रियता आती है तो उसमें कट्टरपन के काल्पनिक प्रतिबिम्ब दिखाने के षणयंत्र किए जाते हैं। इसलिए आवश्यक हो जाता है कि भावावेशी उत्तेजना पर नियंत्रण रखकर ही राष्ट्रीयता को संपोषित किया जाये।
      भारत सदैव अन्य राष्ट्रों और संस्कृतियों के प्रति उदार व सहिष्णु रहा है। इसके लिए आवश्यक ऊर्जा, साहस व प्रेरणा भी हमारे इस देश को अपने आन्तरिक संगठन से मिलती रही है, जो स्वयं अनेकों संस्कृतियों से मिलकर बना है। इसके अन्तस में विद्यमान अनेकानेक संस्कृतियाँ समग्रतः एक महासंस्कृति के रूप में प्रवाहित हो रही हैं, जिसमें तमाम अन्य राष्ट्र और उनकी संस्कृतियाँ अपना चेहरा देख सकती हैं। स्वाभाविक रूप से हमारी महासंस्कृति किसी राष्ट्र या संस्कृति के लिए संकट का कारण नहीं हो सकती, कभी बनी भी नहीं है। हमारे देश ने जो कुछ भी प्राप्त किया है, उसे पूरी ईमानदारी और अपने सामान्य मानवीय उद्यम से प्राप्त किया है। इसने दूसरों से कभी कुछ छीनना नहीं सीखा, ईर्ष्या भाव नहीं रखा। इसके बावजूद हमारी महासंस्कृति, उसकी अवयव संस्कृतियों और उसमें आस्थावान हमारे लोगों को निशाना बनाया जाता रहा है। हमारे देश की भौगोलिक-सांस्कृतिक-सामाजिक स्थिति का आकर्षण कई विचारधाराओं एवं संस्कृतियों के लोगों के अन्दर भारत के प्रति सम्मान का कारण बनने के स्थान पर ईष्या का कारण बनता रहा है। इन विस्तारवादी बाहरी शक्तियों ने हमसे हमारी सकारात्मकताओं को ग्रहण करने के स्थान पर येनकेन उन्हें नष्ट करने के प्रयास कहीं अधिक किए हैं। ऐसे लोग सदैव इस सुन्दर देश पर नियंत्रण और यहाँ के लोगों और संसाधनों को अपने अधीन रखना चाहते रहे हैं। वे अपने उद्देश्यों में सफल भी होते रहे हैं। आज लम्बे संघर्ष के बाद गुलामी और कई बाह्य नियंत्रणों से हमने अपने-आपको आजाद कर लिया है, तो कुछ दूसरी शक्तियाँ दूसरे तरीकों से हम पर नियंत्रण करना चाह रही हैं। आज हमारे भोलेभाले लोगों को विभिन्न दृष्टियों से बरगलाया जाता है, कुछ चालाक लालची लोगों का उपयोग करके हमारी मौलिक राष्ट्रीय विचारधारा और उसकी शक्ति को तोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं। बाहर से आईं कुछ विचारधाराएँ, जिनमें वास्तविक सकारात्मकता नाम मात्र को भी नहीं है, जिनका खूनी चरित्र और हमारे लोगों को गुलाम बनाने की प्रवृत्ति अनेकों बार प्रदर्शित हुई है, स्वयं को हम पर थोपने व हमें लगातार बाँटने के कार्य में लगी हुई हैं। मुझे यह बात लगातार परेशान करती है कि हमारे ही कई प्रतिभावान और ऊर्जावान लोग अपनी सुसंपन्न संस्कृति और विचारधारा के विरुद्ध कुसंस्कृति व खूनी विचारधाराओं की गुलामी को हम पर थोपने की ओर दृढ़तापूर्वक बढ़ रहे हैं। हमें इस स्थिति और इसके पीछे के कारणों पर विचार करना चाहिए।
      हमारा समाज अनेक छोटे-छोटे समूहों में बँटा हुआ है। एक समूह कुछ अनुचित करता है तो दूसरे समूह में उसकी प्रतिक्रिया होती है। बाहरी शक्तियाँ और कुछ अपने ही लोग इसके लिए पूरे समाज एवं राष्ट्र को जिम्मेवार प्रचारित करने लग जाते हैं। इसके बेहद घातक परिणाम सामने आते हैं। इस तरह की परिस्थितियों में, जब राष्ट्र के समक्ष विघटन या पारस्परिक वैमनस्य की प्रक्रिया सौहार्द एवं वैचारिक समरसता की सीमाओं को छिन्न-भिन्न करके राष्ट्र की प्रगति एवं विकास में बाधक बनने लगे तो हमें आत्मावलोचन करना ही चाहिए। जिम्मेवार कारणों की पहचान व विश्लेषण करके उनके प्रभावों को समझना और उनके निदान पर संवेदनशीलता के साथ दृढ़तापूर्वक विचार करना चाहिए। इन कारणों को यदि हम समूहों में बाँटकर देखें तो कम से कम चार प्रकार के कारण हमें प्रमुखतः दृष्टव्य होते हैं- एक, हमारी अपनी आन्तरिक कमजोरियाँ; दो, दूसरों को भावुकता एवं अदूरदर्शितापूर्ण तरीके से दिए गए अवसर; तीन, अपनी संस्कृति एवं विचार के मौलिक सत्य को आंतरिक व बाह्य शक्तियों द्वारा प्रदूषित होने देना, उन्हें रोकने के ठोस प्रयासों व इच्छाशक्ति का अभाव तथा चार, अपनी संस्कृति एवं विचार को युगकालीन आवश्यकताओं के सन्दर्भ में अद्यतन व संपोषित करने के वास्तविक प्रयासों एवं उनके सम्प्रेषण एवं प्रसार संबन्धी सक्रियता की कमी। 
      इन बिन्दुओं पर वास्तविक स्थिति का आकलन बेहद मुश्किल काम है और उससे भी मुश्किल काम है स्थितियों को समझकर उद्देश्य प्राप्ति के रास्तों की पहचान और उन पर चलकर चीजों को ठीक करना। यह कठिनाई प्रमुखतः हर बिन्दु पर मतभिन्नता, उसकी दृढ़ता और उस दृढ़ता से जनित व्यक्तिगत अहं एवं सत्तापिपासा के रास्ते कठोर मनभिन्नता के साथ अपने ही लालची लोगों के माध्यम से बाहरी षणयंत्रों के कारण भी है। मनभिन्नता की गहराती लकीरों ने आज समय को बेहद मुश्किल बना दिया है। चीजों का विरोध आज चेहरों के विरोध में बदल चुका है। लोगों के लिए आज अच्छी-बुरी चीजों का अर्थ नहीं रह गया है। अर्थ है तो पक्ष-विपक्ष में खड़े चेहरों का। बिना वस्तुस्थिति को समझे ही विरोध करना आज रीति बन चुका है। आजकल ऐसे उदाहरण नित्य देखने को मिलते हैं। लेकिन इतिहास इस बात का भी साक्षी है कि समय-समय पर विखण्डन की स्थितियों को सम्हालने के लिए विशेष शक्ति का उदय हुआ और उस शक्ति की प्रेरणाओं व प्रयासों से हमारा समाज पुनः अखण्ड स्थिति में पहुँचा। जब सकारात्मकता की हवा चलती है तो तमाम नकारात्मक प्रवृत्तियाँ और उनके प्रवर्तक अलग-थलग पड़कर निष्प्रभावी हो जाते हैं। आज किसी ऐसी ही शक्ति की आवश्यकता है, जो आम जन को अपनी दूरगामी दृष्टि और अहं व मोह से रहित तार्किक एवं बहुआयामी सतत संघर्ष के माध्यम से यह अहसास करवा सके कि यदि हमने समय रहते अपने मूल चरित्र को उसकी समग्र और अद्यतन प्रासंगिकता के साथ ग्रहण नहीं किया, तो दूसरों पर नियंत्रण की महत्वाकांक्षा में डूबी अहंकारी शक्तियाँ शीघ्र ही हमें अस्तित्वविहीन कर देंगी। 
       यहाँ ‘अहं व मोह से रहित तार्किक एवं बहुआयामी सतत संघर्ष’ के सन्दर्भ को थोड़ा स्पष्ट करना जरूरी है। कुछ सकारात्मक मुद्दों पर आंदोलनो के रूप में अनेकानेक प्रयासों का हश्र हम देख चुके हैं। अधिकांश आंदोलनों को अन्ततः सत्ताप्राति की ओर बढ़ते एवं उस तक पहुँचने के साथ समाप्त हो जाते, यहाँ तक कि अपना चरित्र भी गंवाते देखा है। कुछ आन्दोलन दो-चार कदम चलकर छोटी-छोटी सफलताओं को ही अपना गन्तव्य मानकर ठहर जाते हैं। हमारी आजादी का आन्दोलन, जयप्रकाश आन्दोलन और अभी-अभी कथित भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना जी के नेतृत्व में किया गया आन्दोलन, सबके हश्र हमारे सामने हैं। आजादी के आन्दोलन के सन्दर्भ में मुझे लगता है आजादी गन्तव्य का एक (पहला) पड़ाव मात्र होना चाहिए थी। उसके बाद अपने लोगों की मानसिकता एवं चरित्र को गुलामी के वातावरण और परिस्थितियों के प्रभाव से मुक्त कराने तथा अपनी मौलिक राष्ट्रीय अवधारणा को ग्रहण करने के लिए लोगों को तैयार करना प्रमुख काम होना चाहिए था। यह काम उस आन्दोलन ने नहीं किया। अपितु आजादी के संघर्ष से निकले कुछ चालाक लोगों के हाथ में सत्ता सौंपकर उन्हें एक भ्रष्टाचारी एवं अकर्मण्य तन्त्र की स्थापना के लिए खुला छोड़ दिया गया। उस तन्त्र की कमजोरियों व संरक्षण का लाभ उठाकर हमारे देश में राष्ट्रविरोधी तत्व किस तरह शक्ति संचय करते रहे हैं, इसके परिणाम आज दिखाई देने लगे हैं। आजादी का पूरा आन्दोलन विदेशी नियंत्रण से मुक्ति एवं सत्ता प्राप्ति तक सीमित होकर रह गया। आश्चर्यजनक है कि उस आन्दोलन के प्रतिभासंपन्न लोगों ने अंग्रेजी शासन और उससे पूर्व के मुगलिया शासनों के कारण भारतीय जनमानस में आये नकारात्मक प्रभावों व प्रवृत्तियों तथा अवशिष्ट राष्ट्रविरोधी तत्वों  व विचारों का नोटिस तक लेने की आवश्यकता नहीं समझी। जयप्रकाश आन्दोलन भी मुझे नहीं लगता समाज के लिए अपेक्षानुरूप कुछ विशेष कर पाया। उस आदोलन में दिए गए ‘सम्पूर्ण क्रान्ति’ के नारे में जिन सात क्रान्तियों (राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक व आध्यात्मिक) को शामिल किया गया था, उनके छोटे से अंश मात्र पर भी तो काम नहीं हो सका। पूरा आन्दोलन केवल और केवल केन्द्रीय सत्ता को उखाड़ फेंकने तक सीमित होकर रह गया। वह भी छोटे से समय अन्तराल मात्र के लिए। अन्ना आंदोलन का हश्र तो सबसे अधिक चौंकाने वाला है, जिसका नायक बिना कोई सकारात्मक परिणाम दिए आश्चर्यजनक रूप से फूले हुए गुब्बारे से हवा निकल जाने वाली स्थिति में पहुँच चुका है। इसके पीछे अपनों के द्वारा ही कोई ब्लैकमेलिंग की स्थिति है या आन्दोलन ही पर्दे के पीछे के किसी स्रोत विशेष से प्रायोजित था, सब कुछ अँधेरे में है। लगता है जैसे आन्दोलनकारी मानकर चले थे कि भ्रष्टाचार सिर्फ वही है, जिसे वह अपनी सुविधा के लिए भ्रष्टाचार मानते हैं और वह भी सिर्फ और सिर्फ सरकारों के स्तर पर होता है, जिसे वे एक-दो सप्ताह में लाख-दो लाख की भीड़ एकत्र कर समाप्त कर देंगे। इसे एक राजनैतिक चाल से अलग और क्या माना जा सकता है! संभव है अन्ना जी का उपयोग करने के बाद उनकी सक्रियता का अन्त कैसे और किस रूप में किया जायेगा, यह भी पहले ही सुनिश्चित कर लिया गया हो। यदि आन्दोलनकारियों के पास धैर्य और दूरगामी सोच के साथ वास्तविक सामाजिक उद्देश्य होते तो यह आन्दोलन ऐसी स्थिति में पहुँचने की ओर अग्रसर हो सकता था, जहाँ आठ-दस वर्ष के संघर्ष के माध्यम से कई बड़े सामाजिक उद्देश्य प्राप्त किए जा सकते थे। इस आन्दोलन की परिणति ने भविष्य में किसी भी बड़े आन्दोलन की संभावनाओं को गम्भीर क्षति पहुँचाई है। हर आन्दोलन के अग्रेताओं को सोचना चाहिए कि सत्ता प्राप्ति सामाजिक उद्देश्यों की प्राप्ति का रास्ता नहीं होती, अपितु जनमानस के चरित्र एवं सामाजिक चिन्तन, मान्यताओं व स्वीकार्यताओं में बदलावों के माध्यम से सत्ताओं को अपने चरित्र में बदलाव लाने के लिए प्रभावी रूप से प्रेरित करके ही वास्तविक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसे परिवर्तन की अपनी सहज स्वीकार्यता भी होगी और उसके दीर्घकालीन प्रभाव भी। निसन्देह इसके लिए बड़े धैर्य की आवश्यकता होगी। ऐसा कोई परिवर्तन जब भी आयेगा लम्बे किन्तु सघन संघर्ष से ही आयेगा, जिसमें उद्देश्य के प्रति समर्पण होगा, जो अहं, मोह और व्यक्तिगत अपेक्षाओं की प्राप्ति के लालच से सर्वदा दूर होगा। जनतंत्र में लोगों के बदले बिना सरकारों का चरित्र नहीं बदल सकता, इसलिए किसी भी परिवर्तनगामी कार्यवाही का प्राथमिक उद्देश्य लोगों को बदलना होना चाहिए। और लोगों को बदलने की प्रक्रिया का कोई शार्टकट नहीं होता। यह प्रक्रिया परिवर्तन के कई पड़ावों से होकर गुजरती है। कोई एक पड़ाव वास्तविक परिवर्तनगामी आन्दोलन का गन्तव्य नहीं हो सकता।
      जहाँ तक हमारी आन्तरिक कमजोरियों का प्रश्न है, हमारी सामाजिक संरचना और समाज के विभिन्न अवयव समूहों से सम्बद्ध लोगों के असमान सामाजिक एवं आर्थिक विकास के साथ सामाजिक भेदभाव की परम्पराओं व नीतियों ने हमारे सामाजिक-राष्ट्रीय ढाँचे को अपूरणीय क्षति पहुँचाई है। यह एक कठोर सत्य है कि हम अपनी सामाजिक संरचना को मानवीय गुणवत्ता की दृष्टि से अपेक्षा एवं आवश्यकतानुरूप उच्चीकृत एवं अद्यतन नहीं कर पाये हैं। इसके पीछे के जो भी कारण हैं, उनके विश्लेषण एवं सुधार के लिए व्यापक रूप से मान्य प्रयासों की आवश्यकता है। निसन्देह हमारे समाज की संरचना बहुधर्मी, बहुजातीय, बहुभाषी, बहुवैचारिक है। तमाम संरचनात्मक अवयवों के अन्दर भी सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टि से अनेक उप अवयव हैं। यद्यपि मानवीय एवं सामाजिक समानता की दृष्टियों से देखा जाये तो विभिन्न अवयवों-उप अवयवों के मध्य हितों का टकराव नहीं होना चाहिए, किन्तु कुछ समूहों के अनावश्यक अहं एवं श्रेष्ठता बोध के चलते गंभीर टकराव होते हैं। दुर्भाग्य से हमारे समाज के मार्गदर्शक माने जाने वाले सामाजिक, बौद्धिक, राजनैतिक नेताओं एवं विशेषतः आध्यात्मिक व्यक्तित्वों ने जिस संवेदनशीलता, सदाशयता, निष्पक्षता से मानवीय मूल्यों को सर्वोपरि रखकर सामाजिक समरसता के रास्ते पर समाज व राष्ट्र को ले जाना चाहिए था, वे अपने कर्तव्य पालन में असफल रहे हैं। ऐसे प्रयासों के लिए यदि कुछ सामाजिक आन्दोलन हुए भी हैं तो वे भी पूर्णतः विफल रहे हैं। अधिकांश आन्दोलन अपने ही कुछ कार्यकर्ताओं व नेताओं की स्वार्थपूर्ति का साधन बनकर रह गये हैं। इस दिशा में समुचित लक्ष्य पाने के लिए विशुद्धतः विशाल सामाजिक संगठन, जो ‘अहं व मोह से रहित तार्किक एवं बहुआयामी सतत संघर्ष’ के लिए प्रतिबद्ध भी हो और सक्षम भी, की आवश्यकता है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एक ऐसा संगठन है, जो अपनी स्वीकार्यता का दायरा बढ़ा सके और अपनी कुछ गतिविधियों को व्यापक आन्दोलन का आकार दे सके तो वह हमारे राष्ट्र को सामाजिक-सांस्कृतिक विघटन की प्रक्रिया से निकाल कर वैचारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक अखंडता की ओर ले जाने में सक्षम है। देश में किसी अन्य संगठन के पास इतनी व्यापक प्रतिबद्धता, गहन समर्पण, संघर्ष की क्षमता एवं संरचनात्मक ढांचा है ही नहीं कि उसके बारे में सोचा जा सके। चूँकि अन्य अनेक सामयिक आन्दोलनों का हश्र लोग देख चुके हैं, अतः किसी नई संगठनात्मक संरचना के बारे में सोचना भी संभव नहीं है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने काफी कुछ किया है व वर्तमान में काफी कुछ कर रहा है, लेकिन उसने जो कुछ किया है, उसके सापेक्ष बहुत बड़ा अंश शेष है, जिसको अपेक्षित परिणति तक ले जा पाना स्वीकार्यता के दायरे को बिना बढ़ाये एवं अपने अन्तःस्वरूप को एक आन्दोलनात्मक ऊर्जा से जोड़े बिना संभव नहीं है। सामाजिक विषमता को दूर तथा जरूरतमंदों की प्राथमिक जरूरतों को पूरी किए बिना हम अपने लोगों को राष्ट्रविरोधी विचारधाराओं एवं उन्हें संचालित करने वाले तत्वों के चंगुल से बचा नहीं सकेंगे। हमारी सबसे बड़ी आवश्यकता है कि हम अपने तमाम लोगों को समान मानवीय अधिकारों के दायरे में ला सकें।
     हमारा समाज अपनी सहिष्णुता के लिए विश्व भर में जाना जाता रहा है। हम हर किसी को अपना स्वीकार कर लेते हैं। हम हर किसी को अपने घर में स्थान दे देते हैं, लेकिन दुर्भाग्य से हमारी यह अच्छाई हमारे लिए ही लगातार पीड़ा और विघटन का कारण बनती चली गई है। आने वाले व्यापारी बनकर आते हैं, शासक बन जाते हैं। निवेशक बनकर आते हैं, सरकारों में दखल देने लग जाते हैं। मानवीय उन्नयन के नाम पर विचार लेकर आते हैं, वैचारिक-सांस्कृतिक प्रदूषण फैलाने लग जाते हैं। बुराइयों एवं असमानता से संघर्ष के नाम पर हमारे लोगों को खूनी रास्ते पर चलने के लिए उकसाते हैं। लड़ाते हैं, विभाजित करते हैं। विकास की चाकलेट दिखाकर धर्म परिवर्तन कराने लग जाते हैं। साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में साझेदारी के नाम पर आकर हमारी सुरक्षा में सेंधमारी करते हैं। हमने कभी नहीं सोचा कि जो देश अपनी संस्कृति एवं सामाजिक-वैचारिक अखंडता के लिए प्रतिबद्ध हैं, वे दूसरों की अच्छी या बुरी कैसी भी वैचारिकता को अपने घर में स्थान नहीं देते। दूसरों को अपने घर में बराबरी का सम्मान देने में भी वे हजार बार सोचते हैं। दूसरों की विचारधारा को किस दृष्टि से देखते हैं, यह बताने की आवश्यकता नहीं है। मैं यह नहीं कहता कि हम भी उन जैसे ही हो जायें, लेकिन किसी को अपनाते समय, किसी को घर में स्थान देते समय, किसी के विचार को सुनते समय तमाम चीजों के बारे में सचेत तो रहें, दूसरों के उद्देश्य पर दृष्टि रखें, दूसरों के किसी भी तरह के संभावित/प्रस्तावित योगदान का अपने राष्ट्रीय सन्दर्भों में परीक्षण करें। हम जानने का प्रयास करें कि कोई हमारे साथ क्यों खड़ा होना चाहता है? हमें विश्लेषण करना चाहिए कि कैसे अनेकों संस्थाएं गैर सरकारी संगठनों के नाम पर देश को तोड़ने के काम में लगी हैं। हमारे ही कई लोगों को ये संस्थाएँ महान बनाकर प्रस्तुत करती हैं, सरकारों में दखल देकर उन्हें उच्च स्तरों पर सम्मानित करवाकर राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय व्यक्तित्व के रूप में स्थापित करती हैं, फिर उनके जरिए हमें अस्थिर और विभाजित करने वाली करने वाली गतिविधियों को चलाती हैं। हमारे देश में अनेक राष्ट्रनिरपेक्ष (जो कई बार तो राष्ट्रीय सन्दर्भों में समस्या बन जाते हैं।) लोगों को महान व्यक्तित्व के रूप में जानने-मानने की व्यापक रीति-सी स्थापित होती चली गई है। क्या यह चिंताजनक नहीं है? यदि हम सहिष्णुता और सहृदयता के नाम पर घुसपैठियों को घर में घुसायेंगे तो हमारा क्या हश्र होगा, हमारे सामाजिक व राजनैतिक, दोनों स्तरों के नेतृत्व को सोचना चाहिए और देश में चल रही अनेक संस्थाओं और रातोंरात महान बन गए व्यक्तियों की सम्पूर्ण पृष्ठभूमि, उनके वैचारिक दृष्टिकोंण और गतिविधियों की व्यापक समीक्षा होनी चाहिए। जहाँ सामाजिक विघटन की प्रेरक एवं राष्ट्रविरोधी संलिप्तताएँ पाई जायें, वहाँ उन्हें बेनकाब किया जाये। लेकिन समान्तर रूप से सबसे अधिक आवश्यकता इस बात की है कि एक सतत आन्दोलनबद्ध कार्यवाही के रूप में ऐसी चीजों के प्रति जनता को भी जागरूक बनाया जाये।
      समूचा विश्व जानता है कि भारतीय संस्कृति मानवीय जीवन के सबसे अधिक सामाजिक प्रतिबद्धता, कलात्मक सौन्दर्य, संवेदनात्मक समझ व लोकहितकारी वैज्ञानिक आधारों पर खड़ी है। मानवता को समृद्ध करने वाले मूल्य हमारी संस्कृति में सबसे अधिक और सबसे सघन व प्रभावशाली रूप में विद्यमान हैं। लेकिन हमारी आन्तरिक कमजोरियों और स्वभावगत विनम्रता के चलते विधर्मी और विदेशी शक्तियों ने हमारे ऊपर शासन करते हुए हमारी संस्कृति को न केवल प्रदूषित किया, अपितु उसे नष्ट करने का हर संभव प्रयास किया है। हमारे विचार और दर्शन को विघटित एवं विवादित बनाने वाली कार्यवाहियाँ हुई हैं। हमारा कमजोर हो चुका सामाजिक एवं राजनैतिक नेतृत्व हमारी सांस्कृतिक, वैचारिक एवं राष्ट्रीय अखंडता को बचाकर रख पाने में अक्षम सिद्ध हुआ। आजादी के बाद, जैसे सशक्त नेतृत्व की आवश्यकता हमारे राष्ट्र को थी, वैसा नेतृत्व कुछ स्वभावगत, कुछ परिस्थतियोंवश और कुछ दबावों के चलते हमें मिल नहीं पाया। यदि कभी अल्पकालिक रूप से समर्थ राजनैतिक नेतृत्व मिला भी तो सांस्कृतिक-वैचारिक नेतृत्व अपेक्षानुरूप नहीं मिल पाया। हमने कभी यह समझने की आवश्यकता नहीं समझी कि सक्षम राजनैतिक नेतृत्व कभी भी सक्षम सामाजिक, सांस्कृतिक-वैचारिक नेतृत्व के सहयोग के बिना राष्ट्र को अपेक्षित दिशा और शक्ति प्रदान नहीं कर सकता। एक लम्बे अन्तराल के बाद आज देश को सक्षम-समर्पित एवं लोकप्रतिबद्ध राजनैतिक नेतृत्व मिला है तो सामाजिक व सांस्कृतिक-वैचारिक क्षेत्रों से उसे अपेक्षित सहयोग मिलना तो दूर, इन क्षेत्रों से लगातार क्रूरतापूर्ण और विचलित करने वाली कार्यवाहियों का सामना करना पड़ रहा है। यह बेहद शर्मनाक है कि सामाजिक व सांस्कृतिक-वैचारिक क्षेत्रों के अनेक प्रमुख माने जाने वाले लोग स्वार्थवश राष्ट्र के विरुद्ध लगातार षणयंत्रों में सहभागी बनते प्रतीत हो रहे हैं। ये लोग काफी कुछ अपने उद्देश्यों में सफल हो पा रहे हैं तो इसके पीछे भी प्रमुख कारण यही है कि आज हमारे लोग, विशेषतः पिछले पचास-साठ वर्षों में पैदा हुई पीढ़ी के लोग हमारी मौलिक सांस्कृतिक-वैचारिक दृष्टि और दर्शन के मर्म को समझते नहीं हैं। इस दिशा में व्यापक जन-जागरण की आवश्यकता है। जाने-अनजाने में राजनैतिक-आर्थिक जागरूकता पर देश में कुछ काम हुआ है, कुछ काम सामाजिक जागरूकता पर भी हुआ है लेकिन सांस्कृतिक-वैचारिक जागरूकता पर अपेक्षित सकारात्मक काम नहीं हुआ है। अपितु इस दिशा में नकारात्मक काम कहीं अधिक हुआ है। किसी भी समाज व राष्ट्र का वास्तविक विकास और समृद्धि सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक एवं वैचारिक विकास व समृद्धि का एक संयुक्त पैकेज होता है। जब तक इन सभी पक्षों पर एक साथ सकारात्मक काम नहीं होगा, तब तक हमारे लोग अपनी अखंडता के महत्व की समझ और उसे बनाए रखने की प्रतिबद्धता के साथ संबद्ध नहीं हो पायेंगे। दुर्भाग्य से पूरे देश में इस दिशा में ठोस प्रयासों एवं इच्छा शक्ति का अभाव ही दिखाई देता है।
     यदि हम अपनी आंतरिक कमजोरियों को दूर करने का संकल्प ले सकें, दूसरों के गुप्त सामाजिक, सांस्कृतिक-वैचारिक व राजनैतिक आक्रमणों से सावधान रह पायें और अपनी मौलिक दृष्टि और दर्शन को प्रदूषण से बचाकर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक एवं वैचारिक विकास व समृद्धि के संयुक्त पैकेज पर आधारित विकास और समृद्धि के मंत्र को स्वीकार व क्रियान्वित कर सकें, तो हमारी युगकालीन सामाजिक-राष्ट्रीय आवश्यकताओं को अद्यतन व संपोषित करने की दृष्टि एवं सक्रियता हमें स्वयमेव मिल जायेगी। लेकिन इस तथ्य को जन-जागरण के मंच के रूप में व्यापक स्तर पर हम स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं, यह बेहद चिंतनीय स्थिति है। कम से कम राष्ट्रीय विचारधारा के पोषक संगठनों एवं व्यक्तियों के साथ वर्तमान सरकार से भी इस दिशा में ठोस एवं व्यापक पहल करने की अपेक्षा है। 
     हमें यह बात समझ लेनी होगी कि यदि हम अपने राष्ट्र के प्रति समर्पित नहीं होंगे, उसके प्रति निष्ठावान नहीं होंगे तो हम अपने मानवीय अधिकारों और जीवन की निर्वाधता के लिए आवश्यक न्यूनतम आजादी को भी बचाकर नहीं रख पायेंगे।
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किताबें

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक  :  07-08,  अप्रैल-जून 2018

{लेखकों/प्रकाशकों से अनुरोध है कृपया समीक्षा भेजने के साथ पुस्तक की एक प्रति (एक से अधिक नहीं) हमारे अवलोकनार्थ डा. उमेश महादोषी, 121, इन्द्रापुरम, निकट बी.डी.ए. कालौनी, बदायूं रोड, बरेली, उ.प्र. के पते पर भेजें। समीक्षाएँ ई मेल द्वारा कृतिदेव 010 या यूनिकोड मंगल फॉन्ट में वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल के रूप में ही भेजें।स्कैन करके या पीडीएफ में भेजी रचनाओं का उपयोग सम्भव नहीं होगा } 


डॉ. उमेश महादोषी



कविता की रचनात्मकता है आग का रहस्य 




‘‘जिसके स्पर्श से/जिसकी अनुभूति से/जिसके स्मरण मात्र से/आनन्द द्विगुणित हो जाता हो/भला उसको अनावृत कर देने पर/किसे क्या हासिल हो सकता है’’ की समझ के साथ ‘‘शब्दहीन/वाक्यहीन और/संशयहीन हो जाने तक...’’ जिसकी अनुभूति की जा सकती है, उस प्रेम के व्याकरण में शेष क्या रह जाता है! यही प्रेम तो है, जो जीवन को उसकी सम्पूर्णता में जीने की प्रेरणा के साथ हमें मनुष्यता और सामाजिकता की राह भी दिखाता है। कविता में मनुष्यता और सामाजिकता की बात करना मनुष्य से प्रेम करना ही होता है। ‘आग तुम रहस्य तो
 नहीं’ संग्रह में श्रीराम दवे की कविता इसी पायदान पर खड़ी दिखाई देती है। इसीलिए उनका कवि मनुष्यता और सामाजिकता के रास्ते पर चलते हुए मनुष्य के खिलाफ होने वाली कार्यवाहियों को देखकर चुप नहीं रहता। वह बोलता है हर उस चीज के
खिलाफ, जो उसकी दृष्टि में मनुष्य, मनुष्यता और मानवीय संवेदना के खिलाफ है। वह बोलता है- बड़े बाँधों के लिए टिहरी, हरसूद जैसे शहरों के जलदाह, ओजोन पर्त में छेद कर देने वाले अनियमित व अन्धाधुंध विकास, प्रतिभाओं को हतोत्साहित करने वाली कार्यवाहियों, तानाशाहों और तानाशाही प्रवृत्तियों, मानवीय विचारों को रोकने वाले धार्मिक कट्टरपन के साथ अनेकानेक सामाजिक विसंगतियों के खिलाफ। सुविधाओं के लबादे ओढ़कर साध ली जाने वाली चुप्पी कवि को पसन्द नहीं। चुप्पी साध लेने वालों से उसे वे लोग अच्छे लगते हैं, जो हाल-चाल लेने के बहाने ही सही, कुछ बोलते तो हैं। ‘‘फिर भी अच्छे हैं वे लोग/जो खैनी मसलते-मसलते या/बीड़ी का अद्दा सुलगाते/‘केसन हो भय्या/जे केसन जमाना आयी गवा हे’/जैसे जुमलों से/चुप्पी की वज्रकाया को/तोड़ते रहने की कोशिश तो करते हैं’’। दरअसल बोलना संवेदना को ऊर्जा देना भी होता है और संवेदना बेजान चीजों में भी कविता को उकेर देती है। शायद इसीलिए दवेजी गोपनीय, अनुपात जैसे शब्दों ओटला, बुहारी, कुन्दा, इमारत, सींग, चीजें, हिचकियाँ जैसी चीजों मे भी कविता खोज लेते हैं। 
      व्यवस्था को उसकी स्वभावगत संवेदनहीनता के लिए वह आड़े हाथों लेते हैं। दुर्घटनाओं के सन्दर्भ में उन आँकड़ेबाजों पर उनका तंज गहरे तक चोट करने वाला है, जो ‘कितने मरे, कितने घायल, कितने लापता’ जैसे आँकड़े तो जुटाते हैं लेकिन रोने-सुबकने वालों की संख्या से कोई वास्ता नहीं रखते। यह हमारी व्यवस्था का शर्मनाक किन्तु वास्तविक रूप है- ‘‘संभव है उन्हें/सुबकने वालों/जोर-जोर से रोने वालों/और/रो-रोकर निढाल हो चुके लोगों के/आँकड़ों की जरूरत नहीं हो!’’ 
      व्यवस्था का यह रूप कहीं न कहीं हमारे समाज में व्यक्तियों की सामान्य मानसिकता को भी प्रतिबिम्बित करता है। प्रायः हम व्यवस्था पर तो तंज कसते हैं, लेकिन व्यक्तिपरक मानसिकता और उससे जनित विसंगतियो को अनदेखा कर देते हैं। कुछ साहित्यकारों ने ऐसी सामाजिक विसंगतियों पर विशेष रूप से कलम चलाई है। यह कबीर-वृत्ति दबे साहब की भी कविताओं में देखने को मिलती है। सफाई वाला, रिक्शे वाला, घरेलू काम करने वाली बाई, दूध वाला, अखबार वाला और आटा चक्की वाला- इन सबके अच्छे-से नाम होते हैं, इनके काम और व्यवहार भी अच्छे हों तो भी इनको इनके नाम से संबोधित करने या पहचानने की बजाय सिर्फ और सिर्फ इन्हें इनके काम से पहचाना-पुकारा जाता है। क्या यह सम्मान का शोषण नहीं है! दवे साहब ने ऐसे प्रश्नों को भी बड़ी सिद्दत से उठाया है। शायद इन प्रश्नों से रूबरू होने के कारण ही वह प्रेमचंद की सार्वकालिकता को कविता में रचनात्मक रूप से रेखांकित करना नहीं भूल पाये। एक रचनाकार की ऊर्जा मनुष्यता के लिए आग जैसी होती है, जो कुछ चीजों को भस्म करती है तो कुछ चीजों को निरंतरता-व्यापकता देती है- ‘‘सदियों से चली आ रही/और भस्मीभूत कर रही आग/संवारती भी है शक्लें/संडासी और चिमटों की हों/बड़ी-छोटी मशीनों की/या किसी नश्वर देह की‘‘। निसन्देह आग एक रहस्य है और यह रहस्य कविता की रचनात्मकता है, मनुष्यता का संरक्षण है। श्रीराम दवेजी की इन कविताओं का यही सार है। 
आग तुम रहस्य तो नहीं : कविता संग्रह : श्रीराम दवे। प्रकाशक : सुखमणि प्रकाशन, 5, सुखशांति नगर, बिचौली, हप्सी रोड, इन्दौर। मूल्य: रु. 150/- मात्र। सं.: 2011।
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