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शनिवार, 22 सितंबर 2018

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक  :  11-12,  जुलाई-अगस्त 2018 


।।कविता अनवरत।।   


श्रीराम दवे




कविताएँ
उनकी खुशी

वस्त्र बदल लिए हैं
बहेलियों ने
उनके चेहरों पर
मुस्कानें चिपकी हैं
हाथों में प्रलोभन है
जाल हैं
काँटे हैं
बंदूकों में भरी गोलियाँ हैं
और
फितरतें हैं तरह-तरह की
तुम बचना...

देखना कहीं कि
तुम्हारे जवान होते बच्चे
उनकी निगाह में न आ पाएँ
उन्हें अच्छे नहीं लगते
गुटरगूँ करते/किलकारियाँ करते
चौकड़िया भरते और
अपना काम करते बच्चे
उन्हें बचाना...

जब आँखों का पानी मर चुका हो
तब पैदा होती है उनकी खुशी
उन्हें तुम्हारी खुशी से
कोई वास्ता नहीं है
शिकार करना-
ध्वस्त करना और
इतिहास में काले हरफ लिखना
उनकी खुशी है
तुम याद रखना...

उनकी जरूरतें

वह दिन भर
छतरियाँ सुधारता है
लेकिन उसने नहीं खरीदी
कोई छतरी कभी अपने लिए
धूप और बरसात
उसकी सगी भी तो नहीं है

फुटपाथ पर बैठा
जूता सुधारने वाला
नहीं खरीदता है
कोई नया जूता अपने लिए
उसके पाँव भी चाहते तो होंगे
कभी वे भी नए जूतों में कुनमुनाएँ

फूल बेचने वाली
कभी नहीं बाँधती
फूलों की नई वेणी अपने बालों में
भले ही खफा रहता हो उसका मरद
जूड़े में बँधी बासी वेणी के फूलों से

अपने-अपने कामों में
मसरूफ ये लोग
जानते हैं कि उनकी जरूरतें ये नहीं है
उनकी जरूरतें क्या हैं
नहीं जानते हैं
छतरियाँ सुधरवाने वाले 
जूते ठीक करवाने वाले
जूते ठीक करवाने वाले और
फूलों की वेणियाँ खरीदने वाले।

रामदुलारियाँ

एक और रामदुलारी
चिट्ठी छोड़कर चली गयी
अपने मैके
कभी वापस नहीं आने के लिए

क्यों चली जाती हैं
रामदुलारियाँ अपने मैके
बसी-बसायी/जमी-जमायी
गृहस्थियाँ छोड़कर
शायद नहीं चाहतीं वे
रोज-रोज उनके कानों में कोई
ज़हर बुझे तीर छोड़े

जो नहीं जा पाती हैं/अपने मैके
वे कुतुबमीनार से
घासलेट की वैतरणी से
सल्फास की गोलियाँ और 
छत के पंखों के रास्ते
अनाम/अनदेखे मैके की ओर
चल देती हैं
ताकि/वे भी ला सकें अगले जन्म में
अपनी देह के साथ
वह सब कुछ भी
जिससे उनके मर्दों को प्यार है
वास्ता है
और रामदुलारियों से चिढ़...
आत्मीय यदि तुम हो

हिमालय यदि तुम हो

मैं वाष्प से भरा बादल हूँ
तुमसे टकराना - पानी बन जाना
मेरी प्रवृत्ति है

वसुधा यदि तुम हो
मैं टपकी हुई बूँद हूँ
तुमसे टकराकर - तुममें मिल जाना
मेरी नियति है
आत्मीय यदि तुम हो
मैं समग्र समर्पित हूँ
तुम्हारे समक्ष समर्पित होना
रेखाचित्र : (स्व.) बी.मोहन  नेगी 

मेरी आत्मीयता है।

उस ओर

उस ओर मत जाना
बंधु मेरे 
वहाँ आग है
हवाएँ कैद हैं
और पानी सूख गया है
ज़मीन की आँख का

वहाँ बैठी है
निर्जन बसन्त में
एक कोकिल अभी भी
जिसकी कूहक
उसके हलक में फँसी हुई है
और
इतिहास पुरुष
उसके सामने खड़ा है-
याचक की मुद्रा में

मत जाना बन्धु मेरे, 
उस ओर- तुम!

  • 26, निर्माण नगर, रवीन्द्रनगर के पास, उज्जैन-456010, म.प्र./मो. 09425915010

सोमवार, 30 अप्रैल 2018

किताबें

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक  :  07-08,  अप्रैल-जून 2018

{लेखकों/प्रकाशकों से अनुरोध है कृपया समीक्षा भेजने के साथ पुस्तक की एक प्रति (एक से अधिक नहीं) हमारे अवलोकनार्थ डा. उमेश महादोषी, 121, इन्द्रापुरम, निकट बी.डी.ए. कालौनी, बदायूं रोड, बरेली, उ.प्र. के पते पर भेजें। समीक्षाएँ ई मेल द्वारा कृतिदेव 010 या यूनिकोड मंगल फॉन्ट में वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल के रूप में ही भेजें।स्कैन करके या पीडीएफ में भेजी रचनाओं का उपयोग सम्भव नहीं होगा } 


डॉ. उमेश महादोषी



कविता की रचनात्मकता है आग का रहस्य 




‘‘जिसके स्पर्श से/जिसकी अनुभूति से/जिसके स्मरण मात्र से/आनन्द द्विगुणित हो जाता हो/भला उसको अनावृत कर देने पर/किसे क्या हासिल हो सकता है’’ की समझ के साथ ‘‘शब्दहीन/वाक्यहीन और/संशयहीन हो जाने तक...’’ जिसकी अनुभूति की जा सकती है, उस प्रेम के व्याकरण में शेष क्या रह जाता है! यही प्रेम तो है, जो जीवन को उसकी सम्पूर्णता में जीने की प्रेरणा के साथ हमें मनुष्यता और सामाजिकता की राह भी दिखाता है। कविता में मनुष्यता और सामाजिकता की बात करना मनुष्य से प्रेम करना ही होता है। ‘आग तुम रहस्य तो
 नहीं’ संग्रह में श्रीराम दवे की कविता इसी पायदान पर खड़ी दिखाई देती है। इसीलिए उनका कवि मनुष्यता और सामाजिकता के रास्ते पर चलते हुए मनुष्य के खिलाफ होने वाली कार्यवाहियों को देखकर चुप नहीं रहता। वह बोलता है हर उस चीज के
खिलाफ, जो उसकी दृष्टि में मनुष्य, मनुष्यता और मानवीय संवेदना के खिलाफ है। वह बोलता है- बड़े बाँधों के लिए टिहरी, हरसूद जैसे शहरों के जलदाह, ओजोन पर्त में छेद कर देने वाले अनियमित व अन्धाधुंध विकास, प्रतिभाओं को हतोत्साहित करने वाली कार्यवाहियों, तानाशाहों और तानाशाही प्रवृत्तियों, मानवीय विचारों को रोकने वाले धार्मिक कट्टरपन के साथ अनेकानेक सामाजिक विसंगतियों के खिलाफ। सुविधाओं के लबादे ओढ़कर साध ली जाने वाली चुप्पी कवि को पसन्द नहीं। चुप्पी साध लेने वालों से उसे वे लोग अच्छे लगते हैं, जो हाल-चाल लेने के बहाने ही सही, कुछ बोलते तो हैं। ‘‘फिर भी अच्छे हैं वे लोग/जो खैनी मसलते-मसलते या/बीड़ी का अद्दा सुलगाते/‘केसन हो भय्या/जे केसन जमाना आयी गवा हे’/जैसे जुमलों से/चुप्पी की वज्रकाया को/तोड़ते रहने की कोशिश तो करते हैं’’। दरअसल बोलना संवेदना को ऊर्जा देना भी होता है और संवेदना बेजान चीजों में भी कविता को उकेर देती है। शायद इसीलिए दवेजी गोपनीय, अनुपात जैसे शब्दों ओटला, बुहारी, कुन्दा, इमारत, सींग, चीजें, हिचकियाँ जैसी चीजों मे भी कविता खोज लेते हैं। 
      व्यवस्था को उसकी स्वभावगत संवेदनहीनता के लिए वह आड़े हाथों लेते हैं। दुर्घटनाओं के सन्दर्भ में उन आँकड़ेबाजों पर उनका तंज गहरे तक चोट करने वाला है, जो ‘कितने मरे, कितने घायल, कितने लापता’ जैसे आँकड़े तो जुटाते हैं लेकिन रोने-सुबकने वालों की संख्या से कोई वास्ता नहीं रखते। यह हमारी व्यवस्था का शर्मनाक किन्तु वास्तविक रूप है- ‘‘संभव है उन्हें/सुबकने वालों/जोर-जोर से रोने वालों/और/रो-रोकर निढाल हो चुके लोगों के/आँकड़ों की जरूरत नहीं हो!’’ 
      व्यवस्था का यह रूप कहीं न कहीं हमारे समाज में व्यक्तियों की सामान्य मानसिकता को भी प्रतिबिम्बित करता है। प्रायः हम व्यवस्था पर तो तंज कसते हैं, लेकिन व्यक्तिपरक मानसिकता और उससे जनित विसंगतियो को अनदेखा कर देते हैं। कुछ साहित्यकारों ने ऐसी सामाजिक विसंगतियों पर विशेष रूप से कलम चलाई है। यह कबीर-वृत्ति दबे साहब की भी कविताओं में देखने को मिलती है। सफाई वाला, रिक्शे वाला, घरेलू काम करने वाली बाई, दूध वाला, अखबार वाला और आटा चक्की वाला- इन सबके अच्छे-से नाम होते हैं, इनके काम और व्यवहार भी अच्छे हों तो भी इनको इनके नाम से संबोधित करने या पहचानने की बजाय सिर्फ और सिर्फ इन्हें इनके काम से पहचाना-पुकारा जाता है। क्या यह सम्मान का शोषण नहीं है! दवे साहब ने ऐसे प्रश्नों को भी बड़ी सिद्दत से उठाया है। शायद इन प्रश्नों से रूबरू होने के कारण ही वह प्रेमचंद की सार्वकालिकता को कविता में रचनात्मक रूप से रेखांकित करना नहीं भूल पाये। एक रचनाकार की ऊर्जा मनुष्यता के लिए आग जैसी होती है, जो कुछ चीजों को भस्म करती है तो कुछ चीजों को निरंतरता-व्यापकता देती है- ‘‘सदियों से चली आ रही/और भस्मीभूत कर रही आग/संवारती भी है शक्लें/संडासी और चिमटों की हों/बड़ी-छोटी मशीनों की/या किसी नश्वर देह की‘‘। निसन्देह आग एक रहस्य है और यह रहस्य कविता की रचनात्मकता है, मनुष्यता का संरक्षण है। श्रीराम दवेजी की इन कविताओं का यही सार है। 
आग तुम रहस्य तो नहीं : कविता संग्रह : श्रीराम दवे। प्रकाशक : सुखमणि प्रकाशन, 5, सुखशांति नगर, बिचौली, हप्सी रोड, इन्दौर। मूल्य: रु. 150/- मात्र। सं.: 2011।
  • 121, इन्द्रापुरम, निकट बी.डी.ए. कॉलोनी, बदायूँ रोड, बरेली, उ.प्र./मो. 09458929004