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मंगलवार, 29 मई 2018

सरोकार

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक  :  09-10,  मई-जून 2018 


हमारे सरोकार 


उमेश महादोषी





महाराणा प्रताप की शौर्यगाथा को पुनर्जीवित करता संग्रहालय
      हल्दीघाटी के बारे में अब तक मैंने केवल किताबों में ही पड़ा था। इसलिए जब इस बार सितम्बर (14-16) 2017 में श्री श्यामप्रकाश देवपुरा जी के निमंत्रण पर श्रीनाथद्वारा जाने का अवसर मिला, तो हल्दीघाटी की पवित्र भूमि के दर्शन करने का लोभ संवरण नहीं कर पाया। श्रीनाथद्वारा में अग्रज श्री माधव नागदाजी से मुलाकात हुई और उन्हें अपनी मनोभावना से अवगत कराया तो उन्होंने अपना स्नेह उड़ेलते हुए कहा, आप समय निर्धारित कर लो, मैं गाड़ी लेकर आ जाऊँगा और स्वयं आपको हल्दीघाटी के दर्शन कराके लाऊँगा। इस प्रकार 16 सितम्बर को नागदाजी के स्नेहाबलम्बन से हल्दीघाटी की पावन भूमि का दर्शन-लाभ करने सौभाग्य
मिल गया। जाते समय बेहद सुहावना मौसस सोने पर सुहागा जैसा लग था। रास्ते में हरी-भरी पहाड़ियों के मध्य से गुजरते हुए लग ही नहीं रहा था कि मैं रेगिस्तानी समझे जाने वाले राजस्थान प्रदेश का भ्रमण कर रहा हूँ। जैसे ही हम अरावली पहाड़ियों के पीली मिट्टी से युक्त भाग में संकरे रास्ते पर पहुँचे, नागदाजी ने बताया, हम लोग हल्दीघाटी पहुँच चुके हैं। मैंने कहा, सर, हम यहाँ थोड़ी देर रुक लें। मेरा मन उस भूमि और वहाँ के
हल्दीघाटी स्थित चेतक स्मारक
(छायाचित्र : माधव नागदा)
हो रहा था। नागदा साहब ने जहाँ गाड़ी रोकी, वहाँ एक सुन्दर गुफा थी, जिसमें एक मन्दिर भी है। नागदाजी बोले, इस गुफा को तो मैं भी पहली बार देख रहा हूँ। संभवतः यह रामेश्वर मन्दिर कहलाता है और इसके अन्दर जाकर सुप्रसिद्ध प्रताप गुफा स्थित है, जहाँ महाराणा प्रताप गुप्त मंत्रणा किया करते थे। पन्द्रह-बीस मिनट वहाँ रुकने के बाद हम बादशाही बाग होते हुए चेतक स्मारक की ओर बढ़ गये। बादशाही बाग वह स्थान है, जहाँ मुगल सेना ठहरी थी। चेतक स्मारक के दर्शन करने के बाद हम महाराणा प्रताप संग्रहालय देखने पहुँचे। रक्ततलाई, जहाँ हल्दीघाटी का भीषण युद्ध हुआ था और वर्तमान में एक झील के रूप में स्थित है, के दर्शन भी इसी मार्ग पर स्थित होने के कारण हमें सहज सुलभ हो गए। 

      यद्यपि हल्दीघाटी के क्षेत्र में चेतक स्मारक, रक्त तलाई, मायरा की गुफा, बादशाही बाग, मचींद, चावण्ड, आदि कई दर्शनीय स्थल हैं, लेकिन महाराणा प्रताप के बारे में एकमुश्त जानकारी देने और उनकी गाथा को जीवंत रूप में प्रस्तुत करने के कारण विशेष आकर्षण का केन्द्र है महाराणा प्रताप संग्रहालय। यह संग्रहालय एक प्राइवेट और महाराणा प्रताप की स्मृतियों को संजोने वाला समर्पित उद्यम है। इसके संकल्पक-संस्थापक- संचालक एक सेवानिवृत अध्यापक हैं, जिन्होंने अपने जीवन की सम्पूर्ण पूँजी लगाकर अनेक व्यवधानों और मुश्किलों से जूझते हुए न सिर्फ इसे स्थापित किया, बल्कि हल्दीघाटी की भावनामय और देशभक्ति के ज्वार को जगाने वाली पवित्र भूमि को पर्यटकों के माध्यम से देश के तमाम हिस्सों से जोड़ने का काम भी किया है। पर्यटक इस भूमि को प्रणाम करने पहले भी आते थे, लेकिन उन्हें इस भूमि के इतिहास और महान गाथा से परिचित कराने का कोई माध्यम नहीं था, परिणामस्वरूप वे निराश होकर लौटते थे। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि पर्यटकों के आने का कोई लाभ इस क्षेत्र को भी नहीं मिल पाता था। संग्रहालय की स्थापना से, इसमें काम करने वाले शताधिक लोगों को तो रोजगार मिला ही है, क्षेत्र में होनेवाली गुलाब की खेती और गुलाब से बनने वाले उत्पादों की बिक्री एवं अन्य कार्यों के लिए भी अवसर पैदा हो रहे हैं। इसका सकारात्मक प्रभाव स्थानीय लोगों की जीविका के विकास पर भी पड़ना स्वाभाविक है। और एक बात, अज्ञात कारणों से आजादी के इतने
माधव नागदा  के साथ
डॉ. मोहनलाल श्रीमाली जी
 
वर्षों के बाद भी जो काम सरकारों, स्वयंसेवी संस्थानों और राजनैतिक संगठनों ने नहीं किया, वह काम एक व्यक्ति, एक परिवार ने कर दिखाया है। संग्रहालय के ऐसे कर्मठ और दृढ़ इच्छाशक्ति के धनी संस्थापक डॉ. मोहनलाल श्रीमाली जी से भेंट का सौभाग्य भी हमें मिल गया। दरअसल लौटने से पहले हम लोग संग्रहालय में स्थित रेस्तरां में चाय पीने के लिए घुसे तो वहाँ श्रीमालीजी भोजन कर रहे थे। वह नागदा साहब के मित्र भी हैं सो उन्होंने नागदाजी को देखते ही अपने पास की कुर्सियों पर बुला लिया और आग्रहपूर्वक हमें चाय पिलवाई। नागदाजी ने मेरा परिचय कराया और बातों का सिलसिला आरम्भ हुआ तो लगभग पौने घंटे से अधिक का समय यूँ ही बीत गया। अपने पाठकों के लिए संग्रहालय की स्थापना और उसके पीछे श्रीमाली जी की भावना, समर्पण और योगदान को साझा करना मुझे सामाजिक दृष्टि से अत्यंत उपयोगी लग रहा है।

      19 अक्टूबर 1949 (अभिलेखों में 03 जुलाई 1951) को जन्में बी.ए. व बी.एड. तक शिक्षित डॉ. मोहन लाल श्रीमाली सरकारी शिक्षक थे। अपनी शिक्षा एवं शिक्षा के क्षेत्र में आने का पूरा श्रेय स्वनामधन्य स्वतंत्रता सेनानी श्री बलवन्त सिंह मेहताजी को देते हुए कहते हैं, ‘‘मेहता साहब महाराणा प्रताप के परम भक्त थे। हल्दीघाटी से जुड़ी मेरी पारिवारिक पृष्ठभूमि के दृष्टिगत उन्होंने मुझे प्रेरित किया कि मैं हल्दीघाटी को ही अपना कर्मक्षेत्र
संग्रहालय प्रांगण में मेवाड़ी संस्कृति की एक झाँकी
(छायाचित्र : उमेश महादोषी)
बनाऊँ। इसीलिए उन्होंने मुझे शिक्षा के क्षेत्र में आने में मदद की। उन दिनों पर्यटकों के मार्गदर्शन के लिए हल्दीघाटी के पाँच कि.मी. के पूरे क्षेत्र में कोई सुविधा नहीं थी। मेहता साहब ने इस कमी को पूरा करने के लिए मुझे कहा। 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी ने इस क्षेत्र का दौरा किया, तब यहाँ एक छोटे-से भवन का निर्माण कराया गया, जिसे बाद में पर्यटन विभाग को अन्तरित करके ‘मिड वे’ रेस्तरां में बदल दिया गया। लेकिन पर्यटन विभाग उसे चला नहीं पाया और उसे चलाने के लिए मेरे पिता श्री जमुनालाल श्रीमाली जी से अनुरोध किया। भवन का कोई किराया न लेने का वादा किया गया। पिताजी के अथक परिश्रम से जब वह कुछ चलने लगा तो भवन का किराया माँगा गया। लेकिन आय इतनी नहीं थी कि हम किराया दे पाते। अतः उसे बन्द करना पड़ा। लेकिन उस दौरान पर्यटकों को होने वाली परेशानियों से रूबरू होने और सरकार द्वारा इस क्षेत्र की निरंतर उपेक्षा ने मुझे कुछ करने को प्रेरित किया। शिक्षा विभाग में मेरे परिश्रम और ईमानदारी से किए गए कार्यों, जिनमें सरकारी मदद से कुछ स्कूलों का निर्माण भी शामिल था, के दृष्टिगत कई प्रशासनिक अधिकारियों, जिलाधिकारी रहे श्री सुभाष गर्ग, शिक्षा निदेशक रहे श्री ललित पंवार आदि ने मेरा उत्साह बढ़ाया। अन्ततः मैंने महाराणा प्रताप संग्रहालय बनाने की योजना बनाई। भूमि मेरे पास थी, लेकिन निर्माण के लिए धन नहीं था। बैंक से ऋण मिला नहीं। लेकिन इच्छाशक्ति और संकल्प था। पारिवारिक जमीन बेची, पत्नी के आभूषण बेचे और स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति से मिला धन, सब लगा दिया। बाद में एक प्राइवेट बैंक से लगभग 30 लाख का ऋण मिला। इस प्रकार 1997 में आरम्भ किये गये इस संग्रहालय का उद्घाटन 2003 में महामहिम राज्यपाल श्री अंशुमान सिंह जी के कर-कमलों से सम्पन्न हुआ। यद्यपि विकास एवं निर्माण कार्य अभी भी जारी है।’’

   
कैप्शन जोसंग्रहालय प्रांगण में
हल्दीघाटी की यशोगाथा को दर्शाती एक झाँकी

(छायाचित्र : उमेश महादोषी)
  श्रीमालीजी के अनुसार, आरम्भ में पर्यटक संग्रहालय देखने में संकोच करते थे। उस समय दस रुपये प्रवेश शुल्क था। प्रबंधकगण पर्यटकों को इस आश्वासन पर संग्रहालय देखने को तैयार करते थे कि प्रवेश शुल्क संग्रहालय पसंद आने पर देखने के बाद दीजियेगा। लोगों को संग्रहालय अच्छा लगता और वे जाते समय शुल्क देकर जाते। इस प्रकार पर्यटकों का रुझान बढ़ता गया। पहले साल दर्शनार्थियों की संख्या दस हजार थी, जो अब तक एक लाख प्रति वर्ष तक पहुँच चुकी है। अक्टूबर-दिसम्बर व जन्माष्टमी आदि प्रमुख त्यौहारों के समय बड़ी संख्या में आते हैं। वर्तमान में संग्रहालय का शुल्क एक सौ रुपये प्रति दर्शनार्थी है।

     डॉ. मोहनलाल श्रीमाली द्वारा स्थापित यह संग्रहालय उनकी सात बीघा पैतृक भूमि पर चेतक स्मारक से थोड़ी ही दूरी पर खमनोर और बलीचा गाँवों के मध्य स्थित है। संग्रहालय में महाराणा प्रताप की स्मृतियों और धरोहर को बड़ी सिद्दत के साथ संजोया गया है। थियेटर भवन में प्रवेश करते ही स्वागत कक्ष में महाराणा प्रताप से जुड़े चित्रों और फाइबर निर्मित एक वृहद मानचित्र पर हल्दीघाटी के प्रमुख स्थलों और मार्गों का सांकेतिक प्रदर्शन किया गया है। एक संक्षिप्त फिल्म के माध्यम से इसी कक्ष में पर्यटकों को संग्रहालय की जानकारी दी जाती है। अगले कक्ष (थिएटर हॉल) में महाराणा प्रताप की शौर्यगाथा को लगभग 15 मिनट की फिल्म के माध्यम से दिखाया जाता है। आगे बढ़ने पर महाराणा से जुड़े कई प्रसंगों और घटनाओं को फाइबर से बनी विद्युत-सुसज्जित जीवंत झाँकियों के माध्यम से दर्शाया गया है। इस सबको आधुनिक स्वचालित तकनीक के माध्यम से इस प्रकार संचालित किया जाता है कि दर्शक मंत्रमुग्ध होकर देखता रहता है। संग्रहालय के इस प्रमुख भाग से बाहर आने पर गुलाब के उत्पादों की निर्माण-प्रक्रिया एवं स्थानीय संस्कृति को दर्शाने वाली कलात्मक मूर्तियों के साथ महाराणा प्रताप और हल्दीघाटी के युद्ध से जुड़े योद्धाओं व प्रसंगों को भी बड़ी और जीवंत मूर्तियों के माध्यम से खुले प्रांगण में प्रदर्शित किया गया है। इस प्रकार समूचा संग्रहालय हल्दीघाटी के युद्ध, महाराणा प्रताप के शौर्य और मेवाड़ी सांस्कृतिक धरोहर का एक यादगार और सजीव परिदृश्य प्रस्तुत करता है। प्रांगण में  गुलाब के स्थानीय उत्पाद पर्यटकों को बिक्री हेतु भी उपलब्ध हैं। संग्रहालय में पर्यटकों के भोजन एवं जलपान हेतु एक साफ-सुथरा रेस्तरां भी है। प्रवेश से लेकर विदा होने के क्षण तक दर्शक देशभक्ति और मेवाड़ की संस्कृति के प्रति सम्मोहित-सा बना रहता है।
      इतनी बड़ी परियोजना के निर्माण और संचालन में कठिनाइयाँ भी अवश्य आती हैं। निर्माण और स्थापना की कठिनाइयाँ तो आकर चलीं जाती हैं, लेकिन संचालन और भविष्य की आवश्यकताओं से जुड़ी चुनौतियों से जूझना बड़ा प्रश्न होता है। इस सन्दर्भ में डॉ. श्रीमालीजी का कहना है, पर्यटकों की बढ़ती संख्या और रुचि के दृष्टिगत स्थान की कमी और थियेटर की अल्पक्षमता सबसे बड़ी मुश्किल है। चूँकि सरकारी सहभागिता कीमत को कई गुना बढ़ा देती है, इसलिए सरकारी सहभागिता और मदद के बिना ही वह इसका विस्तार करना चाहते
डॉ. उमेश महादोषी  के साथ 
डॉ. मोहनलाल श्रीमाली जी
हैं। थियेटर की वर्तमान क्षमता 50 दर्शक से बढ़ाकर दोगुनी करना बहुत आवश्यक हो चुका है। अन्य सुविधाओं को भी समानुपात में बढ़ाना होगा। इसके लिए सरकार से दस बीघा भूमि कीमत देकर खरीदना चाहते हैं, जो नहीं मिल पा रही है। दूसरी बात, दक्षिण भारत व अन्य अहिन्दीभाषी क्षेत्रों से आने वाले पर्यटकों को समस्त जानकारी उनकी अपनी भाषा में मिल सके, इसकी अत्याधुनिक डिजीटल तकनीक भारत से बाहर उपलब्ध है, उसे लाने के प्रयास भी करने हैं। 

     एक समय पूरनपुर जिला पीलीभीत (उ.प्र.) में रहने वाले स्वनामधन्य महाकवि (स्व) पं. रामभरोसे लाल ‘पंकज’ जी ने ‘हिन्दूपति महाराणा प्रताप’ महाकाव्य लिखकर महाराणा प्रताप की स्मृतियों को बड़े स्तर पर संजोया था और उस पर सरकारी अनुग्रह स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। स्वक्षमताओं से किया जाने वाला श्रीमालीजी का यह कार्य भी निसंदेह महाराणा प्रताप की स्मृतियों को राष्ट्रीय फलक पर पुनर्जीवित करने वाला है। सरकारों को बिना हस्तक्षेप के उनका यथावांछित सहयोग करना ही चाहिए।

  • 121, इन्द्रापुरम, निकट बी.डी.ए. कॉलोनी, बदायूँ रोड, बरेली-243001, उ.प्र./मो. 09458929004

सोमवार, 30 अप्रैल 2018

सरोकार

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक  :  07-08,  मार्च-अप्रैल 2018 


हमारे सरोकार 



डॉ. उमेश महादोषी




वैचारिक भँवर में राष्ट्रीयता का प्रश्न
पिछले दिनों राष्ट्रीय सन्दर्भ में कई तरह की चिन्ताएँ उभरकर सामने आई हैं। एक काम करने वाली सरकार को जनहित व राष्ट्रहित के काम करने से रोकने के कई कठोर प्रयासों के साथ हमने देखा है कि एक स्तर विशेष (केन्द्रीय) पर सरकार बदल जाने के कारण मात्र से लोग अपने ही राष्ट्र के खिलाफ किस तरह खड़े हो जाते हैं, जबकि नई सरकार के स्तर पर सामाजिक दृष्टि से कोई विशेष नकारात्मक कार्यवाही सामने न आई हो! किसी सरकार विशेष के खिलाफ खड़े होने की बात समझ में आ सकती है लेकिन सरकार के विरोध के नाम पर राष्ट्र के खिलाफ खड़े होने की कार्यवाही कुछ तो संकेत करती है। ऐसी कार्यवाही रातोंरात एवं किसी सरकार या राजनैतिक दल विशेष का विरोध करने मात्र के लिए नहीं हो सकती! लगता है कि पिछली सरकारों के दौरान देश के अन्दर काफी कुछ ऐसा होता रहा है जिसका आंशिक परिणाम आज सामने है। चीजों को नियंत्रित नहीं किया गया तो भविष्य में देश के समक्ष किसी बड़े संकट के खड़े होने की प्रबल संभावना है। राष्ट्रीय प्रतिबद्धता वाले किसी भी व्यक्ति के लिए यह घोर चिन्ता का विषय है। चूंकि विरोध का प्रश्न राष्ट्रीय अस्मिता पर चोट पहुँचाने वाला है, अतः सामाजिक-राष्ट्रीय अवधारणा को समझते हुए उसके सन्दर्भ में इस स्थिति की वास्तविकता पर विचार करना जरूरी है।
     राष्ट्रीय अवधारणा के पीछे दो प्रमुख पहलू हैं- एक तो मानवीय जीवन में वैयक्तिकता के सूक्ष्मांश के साथ सामूहिक जीवन के आकर्षण (सामाजिकता और राष्ट्रीयता) का स्वाभाविक विपुल अंश होता है। दूसरे, सामूहिक (सामाजिक, राष्ट्रीय और उससे भी आगे सम्पूर्ण मनुष्य जाति) सन्दर्भों में मनुष्य का प्रतिक्रियात्मक स्वभाव हर स्तर पर जीवन-व्यवहार की सीमाएँ तय करता है। मनुष्य के जन्म और उससे आगे के जीवन व्यवहार के साथ हम इसे समझने का प्रयास करते हैं।
     मनुष्य (अपितु हर जीव) के जन्म की एक सुनिश्चित प्रक्रिया होती है, उसमें प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष योगदान करने वाले अनेक होते हैं। उस जन्म से प्रभावित होने और उसे प्रभावित करने वालों का भी एक बड़ा समूह होता है, जिसमें जन्म में योगकर्ताओं के साथ-साथ अनेकानेक अन्य भी शामिल होते हैं। प्रभाव की प्रकृति एवं संपर्क जनित दूसरी चीजों में ऊर्जा की मात्रा व सहधर्मिता के स्तरों के अनुरूप समूह भी कई स्तरों पर संगठनात्मक रूपाकार गृहण करता है। इनमें घर-परिवार, समाज, राष्ट्र और अखिल विश्व आदि रूप शामिल होते हैं। इस तरह ‘मनुष्य’ का (और अन्य जीवों का भी) का जन्म व्यक्तिगत घटना नहीं है। इसी तरह मनुष्य की मृत्यु भी व्यक्तिगत घटना नहीं है। सत्य तो यह है कि मानवीय जीवन में सामान्यतः जन्म से मृत्यु तक कुछ भी व्यक्तिगत नहीं है (यहाँ मैं रिक्तता की बात नहीं कर रहा हूँ। जीवन से चीजों का निकल जाना रिक्तता पैदा करता है, यह मूल स्थिति नहीं होती है)। हर एक का जीवन किन्हीं न किन्हीं सूत्रों के माध्यम से दूसरे/दूसरों के जीवन से जुड़ा हुआ है। ऐसी स्थिति में मनुष्य के जीवन को मूलतः समधर्मी सहजीवन के रूप में समझा जाना चाहिए, जिसमें सामाजिकता मौलिक व स्वाभाविक रूप से स्थित होती है। यही सामाजिकता सार्वभौमिक तन्त्र द्वारा नियंत्रित भौगोलिक सीमाओं की परिधि में सहज-स्वाभाविक स्वीकार्यता के अधीन एक राष्ट्र का रूप धारण कर लेती है। राष्ट्र की सीमाओं में हर मनुष्य की समधर्मी सहजीवन के अनिवार्य अनुशासन को ग्रहण करने की क्षमताओं और अभ्यस्तता के अनुकूलन से जुड़ी चीजों से मिलने वाली पहचान उभरती है, जो अन्ततः सांस्कृतिक ताने-बाने के रूप में स्थापित होती है। इसी ताने-बाने में अन्य चीजों के साथ सहिष्णुता से असहिष्णुता की ओर जाने वाली एक मापक जैसी अन्तःधारा बहती है, जिस पर उस राष्ट्र के लोगों के सामान्य चरित्र को मापा जा सकता है। यह माप उस राष्ट्र के निवासियों की अपने लोगों के प्रति लगाव को जितना प्रदर्शित करती है, उतना ही राष्ट्र या दूसरी क्षेत्रीय सीमाओं से बाहर अन्यों के प्रति उनके आचार-व्यवहार को भी दर्शाती है। इस आचार-व्यवहार में सामान्यतः स्वपक्षीय दृढ़ता होती है, जिसकी मात्रा प्रमुखतः तीन बातों पर निर्भर करती है, एक- अपने सांस्कृतिक ताने-बाने और परिस्थितियों के प्रति अभ्यस्तता एवं अनुकूलन के सन्दर्भ में अन्य संस्कृतियों एवं उनके लोगों के प्रति ग्राह्यता कितनी है। दूसरे- इस ग्राह्यता के प्रति अन्य राष्ट्र या क्षेत्रीय सीमाओं के लोगों की क्या प्रतिक्रिया है। और तीसरे- अपने लोगों की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों, विकास, सुरक्षा आदि से जुड़ी आवश्यकताओं एवं उनके सन्दर्भ में हमारी और दूसरों की सापेक्षिक प्रतिक्रियाओं का क्या स्तर है। इस प्रकार कुछ राष्ट्रों के लोग एक-दूसरे के लोगों के आचरण के प्रति अपेक्षाकृत अधिक सहिष्णु हो सकते हैं, उनमें परस्पर सम्मान की भावना काफी अधिक हो सकती है जबकि कुछ अन्य राष्ट्रों के लोगों के मध्य विपरीत स्थिति हो सकती है। निश्चित रूप से समूहगत सीमाओं के बाहर सहधर्मिता और निर्भरता के बावजूद पाई जाने वाली प्रतिस्पर्धा राष्ट्रीय सीमाओं के बाहर बहुत स्पष्ट, कभी-कभी तो विकराल रूप में देखने को मिलती है। स्पष्ट है, राष्ट्रीय सीमाओं के पक्ष को नकारा नहीं जा सकता। 
      यहाँ एक और तथ्य उभरता है कि मनुष्य और मनुष्य के मध्य सहधर्मिता के बावजूद एक स्पष्ट विभेद होता है, वह उतना ही सत्य है, जितना स्वयं मनुष्य का होना। राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर इस विभेद को समाप्त करने के संकल्प लिए जा सकते हैं। लेकिन राष्टीªय सीमाओं के बाहर अखिल विश्व स्तर पर हम इस विभेद को यथासंभव न्यून करने के प्रयास कर सकते हैं, विभेद के रहते हुए भी मनुष्य को मनुष्य के साथ खड़ा कर सकने के प्रयास कर सकते हैं, लेकिन इसे पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकते। राष्ट्रीय सीमाओं के इधर-उधर का पारस्परिक व्यवहार सदैव सापेक्षिक और प्रतिक्रियात्मक होता है। कुछ सूक्ष्म स्तरों को अपवाद के तौर पर छोड़ दें, तो यह एक जैविक सिद्धान्त जैसा है। इसलिए हमें स्वीकार करना होगा कि विश्व स्तर पर मनुष्य और मनुष्य के मध्य का यह विभेद मनुष्य के जीवन व्यापार का एक अहं आधार है। इसमें ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’’ की अवधारणा भी स्थित है और सम्पूर्ण विश्व पर आधिपत्य स्थापित करके स्वेच्छाचारी नियंत्रण की महत्वाकांक्षा भी। हर नकारात्मकता का विरोध और सकारात्मकता की प्राप्ति के प्रयास इसके साथ ही करने होंगे। इसलिए राष्ट्रीय सीमाओं की समाप्ति के विचार के विरुद्ध हमें उन्हें संपुष्ट करने के विचार की श्रेष्ठता एवं राष्ट्रों की संप्रभुता के सम्मान को स्थापित-प्रसारित करने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए। आज राष्ट्रीय सीमाओं के विरुद्ध जो भी गतिविधियाँ चल रही हैं, वे विचारधाराओं के विस्तार की प्रक्रिया का अंग मात्र हैं, जिनका उद्देश्य अन्ततः वृहद सीमाओं वाली महाशक्ति, जिसमें कुछ प्रभावशाली मानव समूह अन्यों को गुलाम बनाकर अपनी कुण्ठाओं को तृप्त करना चाहते हैं, के निर्माण की आकांक्षा से अधिक कुछ नहीं है। यह कैसे भी सकारात्मकताओं की स्थापना-प्रक्रिया नहीं है। कम शक्तिशाली राष्ट्रों के भावुक प्रवृत्ति वाले लोगों के मध्य व्यक्तिगत अपेक्षाओं-महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति की लालसा के वशीभूत कुछ चालाक किस्म के लोग विस्तारवादी परिधि में स्वैच्छिक बन्दी बनकर स्वदेशी भावुक जनों को भी उसी परिधि में खींचने व राष्ट्रीय विचार को विभक्त करने का कार्य करते हैं। ऐसे में प्रतिक्रियास्वरूप राष्ट्रीय विचारधारा के पक्ष में थोड़ी सी भी सुरक्षात्मक सक्रियता आती है तो उसमें कट्टरपन के काल्पनिक प्रतिबिम्ब दिखाने के षणयंत्र किए जाते हैं। इसलिए आवश्यक हो जाता है कि भावावेशी उत्तेजना पर नियंत्रण रखकर ही राष्ट्रीयता को संपोषित किया जाये।
      भारत सदैव अन्य राष्ट्रों और संस्कृतियों के प्रति उदार व सहिष्णु रहा है। इसके लिए आवश्यक ऊर्जा, साहस व प्रेरणा भी हमारे इस देश को अपने आन्तरिक संगठन से मिलती रही है, जो स्वयं अनेकों संस्कृतियों से मिलकर बना है। इसके अन्तस में विद्यमान अनेकानेक संस्कृतियाँ समग्रतः एक महासंस्कृति के रूप में प्रवाहित हो रही हैं, जिसमें तमाम अन्य राष्ट्र और उनकी संस्कृतियाँ अपना चेहरा देख सकती हैं। स्वाभाविक रूप से हमारी महासंस्कृति किसी राष्ट्र या संस्कृति के लिए संकट का कारण नहीं हो सकती, कभी बनी भी नहीं है। हमारे देश ने जो कुछ भी प्राप्त किया है, उसे पूरी ईमानदारी और अपने सामान्य मानवीय उद्यम से प्राप्त किया है। इसने दूसरों से कभी कुछ छीनना नहीं सीखा, ईर्ष्या भाव नहीं रखा। इसके बावजूद हमारी महासंस्कृति, उसकी अवयव संस्कृतियों और उसमें आस्थावान हमारे लोगों को निशाना बनाया जाता रहा है। हमारे देश की भौगोलिक-सांस्कृतिक-सामाजिक स्थिति का आकर्षण कई विचारधाराओं एवं संस्कृतियों के लोगों के अन्दर भारत के प्रति सम्मान का कारण बनने के स्थान पर ईष्या का कारण बनता रहा है। इन विस्तारवादी बाहरी शक्तियों ने हमसे हमारी सकारात्मकताओं को ग्रहण करने के स्थान पर येनकेन उन्हें नष्ट करने के प्रयास कहीं अधिक किए हैं। ऐसे लोग सदैव इस सुन्दर देश पर नियंत्रण और यहाँ के लोगों और संसाधनों को अपने अधीन रखना चाहते रहे हैं। वे अपने उद्देश्यों में सफल भी होते रहे हैं। आज लम्बे संघर्ष के बाद गुलामी और कई बाह्य नियंत्रणों से हमने अपने-आपको आजाद कर लिया है, तो कुछ दूसरी शक्तियाँ दूसरे तरीकों से हम पर नियंत्रण करना चाह रही हैं। आज हमारे भोलेभाले लोगों को विभिन्न दृष्टियों से बरगलाया जाता है, कुछ चालाक लालची लोगों का उपयोग करके हमारी मौलिक राष्ट्रीय विचारधारा और उसकी शक्ति को तोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं। बाहर से आईं कुछ विचारधाराएँ, जिनमें वास्तविक सकारात्मकता नाम मात्र को भी नहीं है, जिनका खूनी चरित्र और हमारे लोगों को गुलाम बनाने की प्रवृत्ति अनेकों बार प्रदर्शित हुई है, स्वयं को हम पर थोपने व हमें लगातार बाँटने के कार्य में लगी हुई हैं। मुझे यह बात लगातार परेशान करती है कि हमारे ही कई प्रतिभावान और ऊर्जावान लोग अपनी सुसंपन्न संस्कृति और विचारधारा के विरुद्ध कुसंस्कृति व खूनी विचारधाराओं की गुलामी को हम पर थोपने की ओर दृढ़तापूर्वक बढ़ रहे हैं। हमें इस स्थिति और इसके पीछे के कारणों पर विचार करना चाहिए।
      हमारा समाज अनेक छोटे-छोटे समूहों में बँटा हुआ है। एक समूह कुछ अनुचित करता है तो दूसरे समूह में उसकी प्रतिक्रिया होती है। बाहरी शक्तियाँ और कुछ अपने ही लोग इसके लिए पूरे समाज एवं राष्ट्र को जिम्मेवार प्रचारित करने लग जाते हैं। इसके बेहद घातक परिणाम सामने आते हैं। इस तरह की परिस्थितियों में, जब राष्ट्र के समक्ष विघटन या पारस्परिक वैमनस्य की प्रक्रिया सौहार्द एवं वैचारिक समरसता की सीमाओं को छिन्न-भिन्न करके राष्ट्र की प्रगति एवं विकास में बाधक बनने लगे तो हमें आत्मावलोचन करना ही चाहिए। जिम्मेवार कारणों की पहचान व विश्लेषण करके उनके प्रभावों को समझना और उनके निदान पर संवेदनशीलता के साथ दृढ़तापूर्वक विचार करना चाहिए। इन कारणों को यदि हम समूहों में बाँटकर देखें तो कम से कम चार प्रकार के कारण हमें प्रमुखतः दृष्टव्य होते हैं- एक, हमारी अपनी आन्तरिक कमजोरियाँ; दो, दूसरों को भावुकता एवं अदूरदर्शितापूर्ण तरीके से दिए गए अवसर; तीन, अपनी संस्कृति एवं विचार के मौलिक सत्य को आंतरिक व बाह्य शक्तियों द्वारा प्रदूषित होने देना, उन्हें रोकने के ठोस प्रयासों व इच्छाशक्ति का अभाव तथा चार, अपनी संस्कृति एवं विचार को युगकालीन आवश्यकताओं के सन्दर्भ में अद्यतन व संपोषित करने के वास्तविक प्रयासों एवं उनके सम्प्रेषण एवं प्रसार संबन्धी सक्रियता की कमी। 
      इन बिन्दुओं पर वास्तविक स्थिति का आकलन बेहद मुश्किल काम है और उससे भी मुश्किल काम है स्थितियों को समझकर उद्देश्य प्राप्ति के रास्तों की पहचान और उन पर चलकर चीजों को ठीक करना। यह कठिनाई प्रमुखतः हर बिन्दु पर मतभिन्नता, उसकी दृढ़ता और उस दृढ़ता से जनित व्यक्तिगत अहं एवं सत्तापिपासा के रास्ते कठोर मनभिन्नता के साथ अपने ही लालची लोगों के माध्यम से बाहरी षणयंत्रों के कारण भी है। मनभिन्नता की गहराती लकीरों ने आज समय को बेहद मुश्किल बना दिया है। चीजों का विरोध आज चेहरों के विरोध में बदल चुका है। लोगों के लिए आज अच्छी-बुरी चीजों का अर्थ नहीं रह गया है। अर्थ है तो पक्ष-विपक्ष में खड़े चेहरों का। बिना वस्तुस्थिति को समझे ही विरोध करना आज रीति बन चुका है। आजकल ऐसे उदाहरण नित्य देखने को मिलते हैं। लेकिन इतिहास इस बात का भी साक्षी है कि समय-समय पर विखण्डन की स्थितियों को सम्हालने के लिए विशेष शक्ति का उदय हुआ और उस शक्ति की प्रेरणाओं व प्रयासों से हमारा समाज पुनः अखण्ड स्थिति में पहुँचा। जब सकारात्मकता की हवा चलती है तो तमाम नकारात्मक प्रवृत्तियाँ और उनके प्रवर्तक अलग-थलग पड़कर निष्प्रभावी हो जाते हैं। आज किसी ऐसी ही शक्ति की आवश्यकता है, जो आम जन को अपनी दूरगामी दृष्टि और अहं व मोह से रहित तार्किक एवं बहुआयामी सतत संघर्ष के माध्यम से यह अहसास करवा सके कि यदि हमने समय रहते अपने मूल चरित्र को उसकी समग्र और अद्यतन प्रासंगिकता के साथ ग्रहण नहीं किया, तो दूसरों पर नियंत्रण की महत्वाकांक्षा में डूबी अहंकारी शक्तियाँ शीघ्र ही हमें अस्तित्वविहीन कर देंगी। 
       यहाँ ‘अहं व मोह से रहित तार्किक एवं बहुआयामी सतत संघर्ष’ के सन्दर्भ को थोड़ा स्पष्ट करना जरूरी है। कुछ सकारात्मक मुद्दों पर आंदोलनो के रूप में अनेकानेक प्रयासों का हश्र हम देख चुके हैं। अधिकांश आंदोलनों को अन्ततः सत्ताप्राति की ओर बढ़ते एवं उस तक पहुँचने के साथ समाप्त हो जाते, यहाँ तक कि अपना चरित्र भी गंवाते देखा है। कुछ आन्दोलन दो-चार कदम चलकर छोटी-छोटी सफलताओं को ही अपना गन्तव्य मानकर ठहर जाते हैं। हमारी आजादी का आन्दोलन, जयप्रकाश आन्दोलन और अभी-अभी कथित भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना जी के नेतृत्व में किया गया आन्दोलन, सबके हश्र हमारे सामने हैं। आजादी के आन्दोलन के सन्दर्भ में मुझे लगता है आजादी गन्तव्य का एक (पहला) पड़ाव मात्र होना चाहिए थी। उसके बाद अपने लोगों की मानसिकता एवं चरित्र को गुलामी के वातावरण और परिस्थितियों के प्रभाव से मुक्त कराने तथा अपनी मौलिक राष्ट्रीय अवधारणा को ग्रहण करने के लिए लोगों को तैयार करना प्रमुख काम होना चाहिए था। यह काम उस आन्दोलन ने नहीं किया। अपितु आजादी के संघर्ष से निकले कुछ चालाक लोगों के हाथ में सत्ता सौंपकर उन्हें एक भ्रष्टाचारी एवं अकर्मण्य तन्त्र की स्थापना के लिए खुला छोड़ दिया गया। उस तन्त्र की कमजोरियों व संरक्षण का लाभ उठाकर हमारे देश में राष्ट्रविरोधी तत्व किस तरह शक्ति संचय करते रहे हैं, इसके परिणाम आज दिखाई देने लगे हैं। आजादी का पूरा आन्दोलन विदेशी नियंत्रण से मुक्ति एवं सत्ता प्राप्ति तक सीमित होकर रह गया। आश्चर्यजनक है कि उस आन्दोलन के प्रतिभासंपन्न लोगों ने अंग्रेजी शासन और उससे पूर्व के मुगलिया शासनों के कारण भारतीय जनमानस में आये नकारात्मक प्रभावों व प्रवृत्तियों तथा अवशिष्ट राष्ट्रविरोधी तत्वों  व विचारों का नोटिस तक लेने की आवश्यकता नहीं समझी। जयप्रकाश आन्दोलन भी मुझे नहीं लगता समाज के लिए अपेक्षानुरूप कुछ विशेष कर पाया। उस आदोलन में दिए गए ‘सम्पूर्ण क्रान्ति’ के नारे में जिन सात क्रान्तियों (राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक व आध्यात्मिक) को शामिल किया गया था, उनके छोटे से अंश मात्र पर भी तो काम नहीं हो सका। पूरा आन्दोलन केवल और केवल केन्द्रीय सत्ता को उखाड़ फेंकने तक सीमित होकर रह गया। वह भी छोटे से समय अन्तराल मात्र के लिए। अन्ना आंदोलन का हश्र तो सबसे अधिक चौंकाने वाला है, जिसका नायक बिना कोई सकारात्मक परिणाम दिए आश्चर्यजनक रूप से फूले हुए गुब्बारे से हवा निकल जाने वाली स्थिति में पहुँच चुका है। इसके पीछे अपनों के द्वारा ही कोई ब्लैकमेलिंग की स्थिति है या आन्दोलन ही पर्दे के पीछे के किसी स्रोत विशेष से प्रायोजित था, सब कुछ अँधेरे में है। लगता है जैसे आन्दोलनकारी मानकर चले थे कि भ्रष्टाचार सिर्फ वही है, जिसे वह अपनी सुविधा के लिए भ्रष्टाचार मानते हैं और वह भी सिर्फ और सिर्फ सरकारों के स्तर पर होता है, जिसे वे एक-दो सप्ताह में लाख-दो लाख की भीड़ एकत्र कर समाप्त कर देंगे। इसे एक राजनैतिक चाल से अलग और क्या माना जा सकता है! संभव है अन्ना जी का उपयोग करने के बाद उनकी सक्रियता का अन्त कैसे और किस रूप में किया जायेगा, यह भी पहले ही सुनिश्चित कर लिया गया हो। यदि आन्दोलनकारियों के पास धैर्य और दूरगामी सोच के साथ वास्तविक सामाजिक उद्देश्य होते तो यह आन्दोलन ऐसी स्थिति में पहुँचने की ओर अग्रसर हो सकता था, जहाँ आठ-दस वर्ष के संघर्ष के माध्यम से कई बड़े सामाजिक उद्देश्य प्राप्त किए जा सकते थे। इस आन्दोलन की परिणति ने भविष्य में किसी भी बड़े आन्दोलन की संभावनाओं को गम्भीर क्षति पहुँचाई है। हर आन्दोलन के अग्रेताओं को सोचना चाहिए कि सत्ता प्राप्ति सामाजिक उद्देश्यों की प्राप्ति का रास्ता नहीं होती, अपितु जनमानस के चरित्र एवं सामाजिक चिन्तन, मान्यताओं व स्वीकार्यताओं में बदलावों के माध्यम से सत्ताओं को अपने चरित्र में बदलाव लाने के लिए प्रभावी रूप से प्रेरित करके ही वास्तविक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसे परिवर्तन की अपनी सहज स्वीकार्यता भी होगी और उसके दीर्घकालीन प्रभाव भी। निसन्देह इसके लिए बड़े धैर्य की आवश्यकता होगी। ऐसा कोई परिवर्तन जब भी आयेगा लम्बे किन्तु सघन संघर्ष से ही आयेगा, जिसमें उद्देश्य के प्रति समर्पण होगा, जो अहं, मोह और व्यक्तिगत अपेक्षाओं की प्राप्ति के लालच से सर्वदा दूर होगा। जनतंत्र में लोगों के बदले बिना सरकारों का चरित्र नहीं बदल सकता, इसलिए किसी भी परिवर्तनगामी कार्यवाही का प्राथमिक उद्देश्य लोगों को बदलना होना चाहिए। और लोगों को बदलने की प्रक्रिया का कोई शार्टकट नहीं होता। यह प्रक्रिया परिवर्तन के कई पड़ावों से होकर गुजरती है। कोई एक पड़ाव वास्तविक परिवर्तनगामी आन्दोलन का गन्तव्य नहीं हो सकता।
      जहाँ तक हमारी आन्तरिक कमजोरियों का प्रश्न है, हमारी सामाजिक संरचना और समाज के विभिन्न अवयव समूहों से सम्बद्ध लोगों के असमान सामाजिक एवं आर्थिक विकास के साथ सामाजिक भेदभाव की परम्पराओं व नीतियों ने हमारे सामाजिक-राष्ट्रीय ढाँचे को अपूरणीय क्षति पहुँचाई है। यह एक कठोर सत्य है कि हम अपनी सामाजिक संरचना को मानवीय गुणवत्ता की दृष्टि से अपेक्षा एवं आवश्यकतानुरूप उच्चीकृत एवं अद्यतन नहीं कर पाये हैं। इसके पीछे के जो भी कारण हैं, उनके विश्लेषण एवं सुधार के लिए व्यापक रूप से मान्य प्रयासों की आवश्यकता है। निसन्देह हमारे समाज की संरचना बहुधर्मी, बहुजातीय, बहुभाषी, बहुवैचारिक है। तमाम संरचनात्मक अवयवों के अन्दर भी सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टि से अनेक उप अवयव हैं। यद्यपि मानवीय एवं सामाजिक समानता की दृष्टियों से देखा जाये तो विभिन्न अवयवों-उप अवयवों के मध्य हितों का टकराव नहीं होना चाहिए, किन्तु कुछ समूहों के अनावश्यक अहं एवं श्रेष्ठता बोध के चलते गंभीर टकराव होते हैं। दुर्भाग्य से हमारे समाज के मार्गदर्शक माने जाने वाले सामाजिक, बौद्धिक, राजनैतिक नेताओं एवं विशेषतः आध्यात्मिक व्यक्तित्वों ने जिस संवेदनशीलता, सदाशयता, निष्पक्षता से मानवीय मूल्यों को सर्वोपरि रखकर सामाजिक समरसता के रास्ते पर समाज व राष्ट्र को ले जाना चाहिए था, वे अपने कर्तव्य पालन में असफल रहे हैं। ऐसे प्रयासों के लिए यदि कुछ सामाजिक आन्दोलन हुए भी हैं तो वे भी पूर्णतः विफल रहे हैं। अधिकांश आन्दोलन अपने ही कुछ कार्यकर्ताओं व नेताओं की स्वार्थपूर्ति का साधन बनकर रह गये हैं। इस दिशा में समुचित लक्ष्य पाने के लिए विशुद्धतः विशाल सामाजिक संगठन, जो ‘अहं व मोह से रहित तार्किक एवं बहुआयामी सतत संघर्ष’ के लिए प्रतिबद्ध भी हो और सक्षम भी, की आवश्यकता है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एक ऐसा संगठन है, जो अपनी स्वीकार्यता का दायरा बढ़ा सके और अपनी कुछ गतिविधियों को व्यापक आन्दोलन का आकार दे सके तो वह हमारे राष्ट्र को सामाजिक-सांस्कृतिक विघटन की प्रक्रिया से निकाल कर वैचारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक अखंडता की ओर ले जाने में सक्षम है। देश में किसी अन्य संगठन के पास इतनी व्यापक प्रतिबद्धता, गहन समर्पण, संघर्ष की क्षमता एवं संरचनात्मक ढांचा है ही नहीं कि उसके बारे में सोचा जा सके। चूँकि अन्य अनेक सामयिक आन्दोलनों का हश्र लोग देख चुके हैं, अतः किसी नई संगठनात्मक संरचना के बारे में सोचना भी संभव नहीं है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने काफी कुछ किया है व वर्तमान में काफी कुछ कर रहा है, लेकिन उसने जो कुछ किया है, उसके सापेक्ष बहुत बड़ा अंश शेष है, जिसको अपेक्षित परिणति तक ले जा पाना स्वीकार्यता के दायरे को बिना बढ़ाये एवं अपने अन्तःस्वरूप को एक आन्दोलनात्मक ऊर्जा से जोड़े बिना संभव नहीं है। सामाजिक विषमता को दूर तथा जरूरतमंदों की प्राथमिक जरूरतों को पूरी किए बिना हम अपने लोगों को राष्ट्रविरोधी विचारधाराओं एवं उन्हें संचालित करने वाले तत्वों के चंगुल से बचा नहीं सकेंगे। हमारी सबसे बड़ी आवश्यकता है कि हम अपने तमाम लोगों को समान मानवीय अधिकारों के दायरे में ला सकें।
     हमारा समाज अपनी सहिष्णुता के लिए विश्व भर में जाना जाता रहा है। हम हर किसी को अपना स्वीकार कर लेते हैं। हम हर किसी को अपने घर में स्थान दे देते हैं, लेकिन दुर्भाग्य से हमारी यह अच्छाई हमारे लिए ही लगातार पीड़ा और विघटन का कारण बनती चली गई है। आने वाले व्यापारी बनकर आते हैं, शासक बन जाते हैं। निवेशक बनकर आते हैं, सरकारों में दखल देने लग जाते हैं। मानवीय उन्नयन के नाम पर विचार लेकर आते हैं, वैचारिक-सांस्कृतिक प्रदूषण फैलाने लग जाते हैं। बुराइयों एवं असमानता से संघर्ष के नाम पर हमारे लोगों को खूनी रास्ते पर चलने के लिए उकसाते हैं। लड़ाते हैं, विभाजित करते हैं। विकास की चाकलेट दिखाकर धर्म परिवर्तन कराने लग जाते हैं। साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में साझेदारी के नाम पर आकर हमारी सुरक्षा में सेंधमारी करते हैं। हमने कभी नहीं सोचा कि जो देश अपनी संस्कृति एवं सामाजिक-वैचारिक अखंडता के लिए प्रतिबद्ध हैं, वे दूसरों की अच्छी या बुरी कैसी भी वैचारिकता को अपने घर में स्थान नहीं देते। दूसरों को अपने घर में बराबरी का सम्मान देने में भी वे हजार बार सोचते हैं। दूसरों की विचारधारा को किस दृष्टि से देखते हैं, यह बताने की आवश्यकता नहीं है। मैं यह नहीं कहता कि हम भी उन जैसे ही हो जायें, लेकिन किसी को अपनाते समय, किसी को घर में स्थान देते समय, किसी के विचार को सुनते समय तमाम चीजों के बारे में सचेत तो रहें, दूसरों के उद्देश्य पर दृष्टि रखें, दूसरों के किसी भी तरह के संभावित/प्रस्तावित योगदान का अपने राष्ट्रीय सन्दर्भों में परीक्षण करें। हम जानने का प्रयास करें कि कोई हमारे साथ क्यों खड़ा होना चाहता है? हमें विश्लेषण करना चाहिए कि कैसे अनेकों संस्थाएं गैर सरकारी संगठनों के नाम पर देश को तोड़ने के काम में लगी हैं। हमारे ही कई लोगों को ये संस्थाएँ महान बनाकर प्रस्तुत करती हैं, सरकारों में दखल देकर उन्हें उच्च स्तरों पर सम्मानित करवाकर राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय व्यक्तित्व के रूप में स्थापित करती हैं, फिर उनके जरिए हमें अस्थिर और विभाजित करने वाली करने वाली गतिविधियों को चलाती हैं। हमारे देश में अनेक राष्ट्रनिरपेक्ष (जो कई बार तो राष्ट्रीय सन्दर्भों में समस्या बन जाते हैं।) लोगों को महान व्यक्तित्व के रूप में जानने-मानने की व्यापक रीति-सी स्थापित होती चली गई है। क्या यह चिंताजनक नहीं है? यदि हम सहिष्णुता और सहृदयता के नाम पर घुसपैठियों को घर में घुसायेंगे तो हमारा क्या हश्र होगा, हमारे सामाजिक व राजनैतिक, दोनों स्तरों के नेतृत्व को सोचना चाहिए और देश में चल रही अनेक संस्थाओं और रातोंरात महान बन गए व्यक्तियों की सम्पूर्ण पृष्ठभूमि, उनके वैचारिक दृष्टिकोंण और गतिविधियों की व्यापक समीक्षा होनी चाहिए। जहाँ सामाजिक विघटन की प्रेरक एवं राष्ट्रविरोधी संलिप्तताएँ पाई जायें, वहाँ उन्हें बेनकाब किया जाये। लेकिन समान्तर रूप से सबसे अधिक आवश्यकता इस बात की है कि एक सतत आन्दोलनबद्ध कार्यवाही के रूप में ऐसी चीजों के प्रति जनता को भी जागरूक बनाया जाये।
      समूचा विश्व जानता है कि भारतीय संस्कृति मानवीय जीवन के सबसे अधिक सामाजिक प्रतिबद्धता, कलात्मक सौन्दर्य, संवेदनात्मक समझ व लोकहितकारी वैज्ञानिक आधारों पर खड़ी है। मानवता को समृद्ध करने वाले मूल्य हमारी संस्कृति में सबसे अधिक और सबसे सघन व प्रभावशाली रूप में विद्यमान हैं। लेकिन हमारी आन्तरिक कमजोरियों और स्वभावगत विनम्रता के चलते विधर्मी और विदेशी शक्तियों ने हमारे ऊपर शासन करते हुए हमारी संस्कृति को न केवल प्रदूषित किया, अपितु उसे नष्ट करने का हर संभव प्रयास किया है। हमारे विचार और दर्शन को विघटित एवं विवादित बनाने वाली कार्यवाहियाँ हुई हैं। हमारा कमजोर हो चुका सामाजिक एवं राजनैतिक नेतृत्व हमारी सांस्कृतिक, वैचारिक एवं राष्ट्रीय अखंडता को बचाकर रख पाने में अक्षम सिद्ध हुआ। आजादी के बाद, जैसे सशक्त नेतृत्व की आवश्यकता हमारे राष्ट्र को थी, वैसा नेतृत्व कुछ स्वभावगत, कुछ परिस्थतियोंवश और कुछ दबावों के चलते हमें मिल नहीं पाया। यदि कभी अल्पकालिक रूप से समर्थ राजनैतिक नेतृत्व मिला भी तो सांस्कृतिक-वैचारिक नेतृत्व अपेक्षानुरूप नहीं मिल पाया। हमने कभी यह समझने की आवश्यकता नहीं समझी कि सक्षम राजनैतिक नेतृत्व कभी भी सक्षम सामाजिक, सांस्कृतिक-वैचारिक नेतृत्व के सहयोग के बिना राष्ट्र को अपेक्षित दिशा और शक्ति प्रदान नहीं कर सकता। एक लम्बे अन्तराल के बाद आज देश को सक्षम-समर्पित एवं लोकप्रतिबद्ध राजनैतिक नेतृत्व मिला है तो सामाजिक व सांस्कृतिक-वैचारिक क्षेत्रों से उसे अपेक्षित सहयोग मिलना तो दूर, इन क्षेत्रों से लगातार क्रूरतापूर्ण और विचलित करने वाली कार्यवाहियों का सामना करना पड़ रहा है। यह बेहद शर्मनाक है कि सामाजिक व सांस्कृतिक-वैचारिक क्षेत्रों के अनेक प्रमुख माने जाने वाले लोग स्वार्थवश राष्ट्र के विरुद्ध लगातार षणयंत्रों में सहभागी बनते प्रतीत हो रहे हैं। ये लोग काफी कुछ अपने उद्देश्यों में सफल हो पा रहे हैं तो इसके पीछे भी प्रमुख कारण यही है कि आज हमारे लोग, विशेषतः पिछले पचास-साठ वर्षों में पैदा हुई पीढ़ी के लोग हमारी मौलिक सांस्कृतिक-वैचारिक दृष्टि और दर्शन के मर्म को समझते नहीं हैं। इस दिशा में व्यापक जन-जागरण की आवश्यकता है। जाने-अनजाने में राजनैतिक-आर्थिक जागरूकता पर देश में कुछ काम हुआ है, कुछ काम सामाजिक जागरूकता पर भी हुआ है लेकिन सांस्कृतिक-वैचारिक जागरूकता पर अपेक्षित सकारात्मक काम नहीं हुआ है। अपितु इस दिशा में नकारात्मक काम कहीं अधिक हुआ है। किसी भी समाज व राष्ट्र का वास्तविक विकास और समृद्धि सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक एवं वैचारिक विकास व समृद्धि का एक संयुक्त पैकेज होता है। जब तक इन सभी पक्षों पर एक साथ सकारात्मक काम नहीं होगा, तब तक हमारे लोग अपनी अखंडता के महत्व की समझ और उसे बनाए रखने की प्रतिबद्धता के साथ संबद्ध नहीं हो पायेंगे। दुर्भाग्य से पूरे देश में इस दिशा में ठोस प्रयासों एवं इच्छा शक्ति का अभाव ही दिखाई देता है।
     यदि हम अपनी आंतरिक कमजोरियों को दूर करने का संकल्प ले सकें, दूसरों के गुप्त सामाजिक, सांस्कृतिक-वैचारिक व राजनैतिक आक्रमणों से सावधान रह पायें और अपनी मौलिक दृष्टि और दर्शन को प्रदूषण से बचाकर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक एवं वैचारिक विकास व समृद्धि के संयुक्त पैकेज पर आधारित विकास और समृद्धि के मंत्र को स्वीकार व क्रियान्वित कर सकें, तो हमारी युगकालीन सामाजिक-राष्ट्रीय आवश्यकताओं को अद्यतन व संपोषित करने की दृष्टि एवं सक्रियता हमें स्वयमेव मिल जायेगी। लेकिन इस तथ्य को जन-जागरण के मंच के रूप में व्यापक स्तर पर हम स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं, यह बेहद चिंतनीय स्थिति है। कम से कम राष्ट्रीय विचारधारा के पोषक संगठनों एवं व्यक्तियों के साथ वर्तमान सरकार से भी इस दिशा में ठोस एवं व्यापक पहल करने की अपेक्षा है। 
     हमें यह बात समझ लेनी होगी कि यदि हम अपने राष्ट्र के प्रति समर्पित नहीं होंगे, उसके प्रति निष्ठावान नहीं होंगे तो हम अपने मानवीय अधिकारों और जीवन की निर्वाधता के लिए आवश्यक न्यूनतम आजादी को भी बचाकर नहीं रख पायेंगे।
  • 121, इन्द्रापुरम, निकट बी.डी.ए. कॉलोनी, बदायूँ रोड, बरेली-243001, उ.प्र./मोबा. 09458929004

मंगलवार, 31 जुलाई 2012

सरोकार



रचना रस्तोगी  
प्राइवेट डेंटल एवं सरकारी डेंटल कोलिजों में
 इलाज के नाम पर  जिन्दा मनुष्यों पर 
अत्याचार क्यों? 

       यह शीर्षक पढ़कर आप निश्चित रूप से चौंक गये होंगे कि एक ओर 
जहाँ सरकार एवं कई जानी मानी हस्तियां पशुओं पक्षियों  के जीवन 
जीने के अधिकार के प्रति ना केवल जागरूक हैं बल्कि उनके अधिकार
की रक्षा के लिये संघर्षरत भी हैं और उसी का परिणाम है कि अब पशुओं
 का जीव विज्ञान प्रयोगशालाओं में विच्छेदन पर प्रतिबन्ध लग गया है,
और ऐसा नही प्रतिबन्ध पहले भी था लेकिन सजा का प्रावधान अभी हुआ 
है इसलिये इस कानून की तरह मान्यता मिल गयी है / इसी प्रकार भारत 
सरकार एवं राज्य सरकारों ने भी जिन्दा मनुष्यों के बीमारी की अवस्था में
 इलाज के लिये एक नियम  बनाया है ,कि इलाज करने के लिये डाक्टर वही
 मान्य होगा जो कि चाहे आयुर्वेदिक कायुन्सिल, होमियोपेथिक कायुन्सिल
 या मेडिकल कायुन्सिल या डेंटल कायुन्सिल में रजिस्टर्ड हो यहाँ तक कि
 यूनानी कायुन्सिल भी भारत में स्थापित है /अगर कोई व्यक्ति जो सम्बंधित 
कायुन्सिलों में रजिस्टर्ड नही है और चिकित्सा करता पकड़ा जाता है तो
 यह अपराध दंडनीय है/ लेकिन आपको यह पता चले कि अगर सरकारी 
सरंक्षण में ही झोला छाप प्रेक्टिस चल रही हो तो आप क्या कहेंगे ?
        सारे मेडिकल कोलिजों में चाहे वे सरकारी होँ या प्राईवेट ही क्यों ना होँ, 
उनमे मरीज का इलाज करने की आज्ञा केवल दो ही लोगों के पास है एक होते 
हैं टीचर जो छात्रों को चिकित्सा शिक्षा का ज्ञान देते हैं और दूसरे होते हैं 
सीनियर रेजिडेंट्स डाक्टर जो सम्बंधित पीजी कोर्स पास कर चुके हैं और 
सम्बंधित विषय में  मेडिकल कायुन्सिल में रजिस्टर्ड हो चुके हैं इनके अलावा 
मेडिकल कोलिजों में जूनियर रेजिडेंट्स होते हैं जो अभी पीजी कोर्स में 
शिक्षणरत हैं लेकिन मरीज का इलाज करने के लिये अनुमन्य नही हैं और 
दूसरे होते हैं एमबीबीएस  छात्र जिनका अभी इलाज से कोई मतलब नही है 
जब तक कि वे इंटर्नशिप पूरी करके कायुन्सिल में रजिस्टर्ड नही हो जाते/
यहाँ तक आपको बात समझ में आ गयी है और हर मेडिकल कोलिज में दो 
काम होते हैं एक शिक्षण और एक चिकित्सा जैसे मेरठ का मेडिकल कोलिज
 और दूसरा उसमे स्थित एक अस्तपताल यानी पढ़ाई और चिकित्सा अलग
 अलग संस्थाओं से /
         अब देखिये डेंटल  कोलिजों का हाल यहाँ तीसरे वर्ष से ही विद्यार्थी सीधे
 सीधे मरीज पर अपना हाथ साफ करता है और इंटर्नशिप तक यह कार्य 
बदस्तूर जारी रहता है और यदि पीजी भी करता है तो भी यही सब/और 
और तो और यूनिवर्सिटी की वार्षिक परीक्षाओं में भी जिन्दे मनुष्य पर
 इलाज करके दिखाया जाता है अगर इलाज ठीक हुआ तो विद्यार्थी पास 
वरना अगर इलाज गड़बड़ तो विद्यार्थी फेल / मैंने यही प्रश्न उठाया है कि
 इलाज सही या गड़बड़ किसका हुआ ?  क्या मरीज वहाँ अपना इलाज करने
 गया था या विद्यार्थी को इलाज सिखाने /
       डेंटल कायुन्सिल में भी नियम यही है कि इलाज केवल रजिस्टर्ड
 चिकित्सक ही करेगा तो फिर झोला छापों को क्यों पकड़ते हो ? टीचरों 
को तनख्वाह मिलती है पढ़ाने और  इलाज करने की लेकिन इलाज करता
है विद्यार्थी ही / सरकारी और प्राईवेट मेडिकल कोलिज में डेंटल विभाग है 
और वहाँ भी इलाज सरकारी चिकित्सक ही करते हैं जबकि शायद दो टीचर 
हैं  और उनके ही नाम पर ओ पी डी भी है क्योंकि यहाँ सिस्टम ठीक है और 
इलाज टीचर ही कर रहे हैं. लेकिन सरकारी डेंटल कोलिजों और प्राईवेट
 डेंटल कोलिजों में मरीज पर हाथ साफ़ विद्यार्थी कर रहे हैं और भी खुले 
आम/  डेंटल कायुन्सिल और केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की आपसी सूझबूझ 
और प्राईवेट  डेंटल कोलिजों के मेनेजमेंट के साथ उनके एक बहुत मधुर 
गठबंधन का खामियाजा उठाता है गरीब मरीज/उदहारण के तौर पर एक  
यूनिवर्सिटी के अंतर्गत कई प्राइवेट डेंटल कोलिज हैं और बिना यूनिवर्सिटी 
की अनुमति के डेंटल कायुन्सिल मान्यता हेतु संस्तुति प्रदान नही करती 
और कायुन्सिल की संस्तुति के बिना केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय मान्यता 
प्रदान नही करता लेकिन सबसे पहले राज्य सरकार प्राईवेट डेंटल कोलिज 
प्रबंधन ट्रस्ट से एक अनुबंध कराती है कि प्राईवेट डेंटल  कोलिज में सभी 
मरीजों का उपचार मुफ्त या बहुत ही कम मूल्य पर (इसकी मुझे जानकारी 
नही है)में होगा ना केवल डेंटल रोगों का ही बल्कि मेडिकल के रोगियों का भी/
 इसी कारण पर राज्य सरकार उस ट्रस्ट को डेंटल कोलिज खोलने की 
अनापत्ति सर्टिफिकेट प्रदान करती है/ डेंटल शिक्षा की पढ़ाई डेंटल कायुन्सिल
 के निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुसार चलाने की जिम्मेदारी एवं परीक्षा कराने 
की जिम्मेदारी सम्बंधित यूनिवर्सिटी की होती है लेकिन आपको दुःख होगा 
कि यूनिवर्सिटी इस काम में इतनी उदासीन रहती हैं कि जैसे पढ़ाई से उनका 
कोई लेना देना नही कहने को यूनिवर्सिटी हर वर्ष एक इंस्पेक्शन कराती है  
जिसमे वह अपने निरीक्षकों को भेजती है और निरीक्षण  कैसे होता है बताने 
की जरुरत ही नही है अगर ईमानदारी से होता तो शायद एक भी डेंटल कोलिज
 अनुमन्य नही होता/डेंटल कायुन्सिल भी हर वर्ष निरीक्षण कराती है और
 निरीक्षण भी लगभग वैसा ही होता है जैसे यूनिवर्सिटी का /हर प्राईवेट डेंटल  
कोलिज में एक सौ बिस्तरों वाला अत्याधुनिक उपकरणों से सुसज्जित एक 
अत्य आधुनिक अस्तपताल वो भी कार्यशील अवस्था में होना अनिवार्य है 
और उसने मरीजों की हर समय सत्तर प्रतिशत उपस्थति अनिवार्य भी होती है/
 लेकिन कितनी होती है ?और डेंटल कायुन्सिल के ही इन्स्पेक्टर इस 
मेडिकल अस्तपताल का इंस्पेक्शन करने आते हैं यानी डेंटल डाक्टरों को 
मेडिकल औजारों उपकरणों की अत्य आधुनिक जानकारी अवश्य होनी चाहिये
 तभी तो वे उनकी कार्यशीलता को परख सकेंगे ? लेकिन डेंटल कायुन्सिल कोई
 भी मेडिकल डाक्टर इन सौ बिस्तरों वाले अस्तपताल का निरीक्षण कराने नही 
भेजती और नाही डेंटल निरीक्षकों को इस बाबत कोई ट्रेनिंग ही देती  है/ अब 
सोचिये मरीज का इलाज कैसे होता होगा ? 
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सोचने को मजबूर 
विषय -
(१) भारत सरकार,राज्य सरकारों,डेंटल कायुन्सिल आफ इण्डिया,युजीसी
 एवं सम्बंधित यूनिवर्सिटीज से अनुमति एवं मान्यता प्राप्त डेंटल कोलिजों 
में मरीज का शिक्षणरत  एवं  अनरजिस्टर्ड (जिनको अभी मरीज का उपचार 
करने की अनुमति नही है ) विद्यार्थियों द्वारा इलाज  
(२) यूनिवर्सिटी की बीडीएस एवं एमडीएस  की अंतिम वर्ष की वार्षिक 
मौखिक एवं प्रेक्टिकल परीक्षाओं में विद्यार्थियों का सीधे सीधे मरीज पर 
उपचार करके एक्सटर्नल परीक्षक को दिखाना 
(३)शिक्षण एवं उपचार का यह तरीका निश्चित रूप से मनुष्य के मौलिक
 जिन्दा रहने एवं स्वस्थ बने रहने में बाधक बनने के कारण उसका 
मानवाधिकार  का उलग्घं एवं उसकी जिंदगी से खिलवाड़ करने का अपराध
 ही क्यों ना माना जाय 
अभी हाल में ही एक फ़िल्मी कलाकार ने मेडिकल व्यवसाय पर आपत्ति
 दर्ज कराई थी और संसदीय कमेटी ने उनको दिल्ली बुलाया भी था लेकिन 
जरा इस ओर भी ध्यान दें, उपरोक्त  सन्दर्भ में यह बताना आवश्यक है कि 
भारत में इस समय लगभग तीन सौ पचास सम्बंधित कार्यालयों से मान्यता
 प्राप्त डेंटल कोलिज जिनमे अधिकाँश प्राईवेट मेनेजमेंट द्वारा संचालित हैं और
 काफी कम राज्य सरकारों द्वारा संचालित हैं और जिनसे भारत में लगभग तीस 
पैंतीस से लेकर चालीस  हजार डेंटल चिकित्सक (ग्रेजुएट एवं पोस्ट ग्रेजुएट 
दोनों मिलाकर) प्रति वर्ष तैयार होते हैं / इनकी संख्या कम ज्यादा भी हो सकती
 है लेकिन मेरे अनुमान में इतनी ही संख्या संभावित है / और कुछ डेंटल कोलिज 
अभी बीडीएस  और एमडीएस  पाठ्यक्रम संचालित करने की आज्ञा एवं मान्यता
 प्राप्त करने के अंतिम दौर में हैं जिससे भारत में डेंटल कोलिजों की संख्या एवं
 डेंटल चिकित्सकों की संख्या में निश्चित रूप से बढ़ोतरी ही  होगी / लेकिन यह 
सब किसके मूल्य पर हो रहा है उस पर भी ध्यान देने की बहुत ज्यादा जरुरत है 
क्योंकि भारतीय नागरिक इन डेंटल कोलिजों में एक  विशेषज्ञ से इलाज के लिये
 जाता है नाकि अपने ऊपर इलाज का परीक्षण के लिये जाता है / एक छात्र 
बीडीएस कोर्स की चार वर्ष की  सम्बंधित यूनिवर्सिटी  द्वारा संचालित मौखिक एवं लिखित परीक्षाओं को उत्तीर्ण करके और एक वर्ष की अनिवार्य इंटर्नशिप को पूरा 
करके ही यूनिवर्सिटी से डिग्री प्राप्त करने का अधिकारी  बनता है और इस डिग्री के 
आधार पर ही उसका अपने प्रदेश में स्थित डेंटल कायुन्सिल के कार्यालय में 
पंजीकरण होता है और उसको एक रजिस्ट्रेशन नंबर भी मिलता है, इतना सब 
होकर ही वह छात्र अब डेंटल सर्जन कहा जाता है और भारतीय  नागरिकों के 
डेंटल इलाज करने के योग्य माना जाता है, इस पंजीकरण से पहले उसको किसी 
भी सूरत में मरीज के इलाज करने की अनुमति नही होती है और अगर 
पंजीकरण से पहले अगर वह डेंटिस्ट मरीज का इलाज करता पकड़ा जाता है 
तो वह दंड का भागी माना जायेगा / इसी क्रम में अगर वह डेंटल ग्रेजुएट आगे 
पढ़ना चाहता है तो भी उसको एक प्रारम्भिक परीक्षा उत्तीर्ण करके तीन वर्षीय 
एमडीएस कोर्स में प्रवेश मिलता है जिसमे उसका एक डेंटिस्ट के रूप में 
पंजीकरण होना अनिवार्य है और जब वह तीन वर्षीय एमडीएस परीक्षा उत्तीर्ण
 कर लेता है तो भी उसका विशेषज्ञ के रूप में डेंटल कायुन्सिल में पंजीकरण 
कराना अनिवार्य होता है, यानी जिस विषय में वह एमडीएस डिग्री प्राप्त करता
 है उस विषय से सम्बंधित इलाज भी कायुन्सिल में विशेषज्ञ के रूप में 
पंजीकरण के बाद ही कर सकता है /यानी कायुन्सिल में विशेषज्ञ के रूप में 
पंजीकरण से पहले उसका एक  विशेषज्ञ के रूप में मरीज का इलाज करना 
उसको दंड का भागी बनाता है /मेरी जानकारी में शायद यही नियम है /
      ऐसा नही है कि ये नियम केवल डेंटल कायुन्सिल में ही मान्य है / 
मेडिकल कायुन्सिल भी एक एमबीबीएस छात्र को साढ़े चार वर्ष के 
पाठ्यक्रम एवं एक वर्षीय अनिवार्य इंटर्नशिप के बाद ही मेडिकल 
कायुन्सिल में रजिस्ट्रेशन के लिये पात्र मानती है यानी केवल एमबीबीएस 
की डिग्री ही पर्याप्त नही बल्कि मेडिकल कायुन्सिल में मेडिकल प्रेक्टिशनर
 के रूप में पंजीकरण भी अनिवार्य है और आगे यदि छात्र एमडी एमएस 
कोर्स की पढ़ाई करना चाहता है तो भो कायुन्सिल में एमबीबीएस का
 पंजीकरण अनिवार्य है और वहाँ भी तीन वर्ष के अध्यन के बाद पोस्ट 
ग्रेजुएट डिग्री लेने के बाद भी विशेषज्ञ के रूप में कायुन्सिल में रजिस्ट्रेशन
 अनिवार्य है/ कहने का तात्पर्य यह है कि बिना रजिस्ट्रेशन के कोई भी
 चिकित्सक मरीज का उपचार नही कर सकता /और पोस्ट ग्रेजुएशन के बाद
 भी एमएस या एमडी  डिग्रीधारी सुपेर्स्पेशियेलिती का कोर्स जैसे डीएम 
या एमसीएच आदि भी करना चाहता है तो भी प्रक्रिया यही अपनाई जाती है/ 
पूरे एमबीबीएस कोर्स की पढ़ाई के दौरान छात्र केवल अपने अध्यापकों और 
सीनियर रेजिडेंट्स के द्वारा की गयी चिकित्सा पद्धति को बारीकी से देखता 
समझता है और वार्षिक परीक्षा में बैठता है लेकिन कहीं भी किसी भी स्तर 
पर वह छात्र किसी भी मरीज के उपचार को करने का अधिकारी नही है और 
करता भी नही है / यही क्रम पोस्ट ग्रेजुएशन पाठ्यक्रम में भी है ऐसा नही है
 कि अगर कोई छात्र नेत्र चिकित्सा में एमएस कर रहा है तो वह अपने 
अध्यापकों को किसी मरीज की आंख का आपेरशन करके दिखायेगा और 
पूछेगा कि ठीक हुआ कि नही ? या यूनिवर्सिटी की अंतिम वर्ष की परीक्षा में 
एक्सटर्नल को किसी मरीज की आंख का आपरेशन करके दिखायेगा और 
एक्सटर्नल छात्र द्वारा किये इलाज देखकर उसको फेल पास करेगा ? और 
यदि जनरल सर्जरी में एमएस कर रहा है तो अपने तीन साल तक अपने 
अध्यापकों या परीक्षा में एक्सटर्नल  को किसी मरीज के गाल ब्लेडर या 
अपेंडिक्स का आपेरशन करके दिखायेगा? अगर कार्डियोलोजी में डीएम 
कर रहा है तो मरीज में पेसमेकर लगाकर दिखायेगा या अगर न्यूरो सर्जरी 
में एमसीएच कर रहा है परीक्षा में दिमाग का आपेरशन करके दिखायेगा ? 
क्योंकि मेडिकल कायुन्सिल उसको ऐसा करने की अनुमति प्रदान नही 
करती / पूरी पढ़ाई के दौरान वह अपने अध्यापकों या सीनियर रेजिडेंट्स को
 ही काम करते देखता है उन्ही से सीखता है, उन्ही से पढ़ता है क्योंकि अभी 
वह छात्र मेडिकल कायुन्सिल में उस विषय के विशेषज्ञ के रूप में पंजीकृत 
नही है /  लेकिन जब एक भारतीय नागरिक मरीज बनकर किसी डेंटल 
कोलिज में जाता है तो उसका उपचार जानते है कौन करता है ? एक तीसरे
 वर्ष का बीडीएस का छात्र जिसने अभी तृतीय वर्ष के अकादमिक कोर्स  में 
सम्मिलित जनरल मेडिसिन और जनरल सर्जरी तक भी पढ़ाई नही की है 
वह भी मरीज का डेंटल उपचार ही नही करता बल्कि उसको दवा तक भी 
लिखकर देता है, जिसका ना उसको ज्ञान है और नाही उसने पढ़ा ही है ? 
बीडीएस  चतुर्थ वर्ष का छात्र और इन्टर्न सभी उस मरीज का उपचार करते
 है जबकि इन्टर्न भी अभी केवल छात्र अवस्था में ही है और डेंटल कायुन्सिल
 में डेंटिस्ट एक्ट के तहत रजिस्टर्ड भी नही है, प्रश्न यही है कि क्या वह छात्र
 मरीज के उपचार करने या मरीज को दवा लिखकर  देने का अधिकारी बनता
 है ?  यही क्रम एमडीएस पाठ्यक्रम में भी अपनाया जाता है / डेंटल इलाज में
 मरीज का दांत निकाला जाता है, दांत में चाँदी भारी जाती है, दांतों की सफाई
भी होती है, मसूड़ों का आपेरशन भी होता है, कृतिम दांत भी बनाये जाते हैं, 
रूट केनाल इलाज  भी होता है और भी कई इलाज है जैसे टेढ़े मेढ़े  दांतों को  
सीधा करने का तार लगाकर सीधा  करना इत्यादि. जिनको छात्र अवस्था के 
दौरान छात्र चाहे बीडीएस के होँ या एमडीएस के ही क्यों ना होँ ,  खुले आम 
करते हैं और अपने अध्यापकों को करके दिखाते है और पूछते हैं कि ठीक 
हुआ कि नही ? अगर ठीक हुआ तो बात अलग हुई और अगर इलाज गलत हो
 गया तो कौन मरा ?  दांत गलत निकल गया या चांदी गलत भारी गयी या
मसूड़े का आपेरशन  गलत हो गया तो सत्यानाश किसका हुआ ?  और 
सबसे बड़ी बात वहाँ मरीज अपने इलाज के लिये आया है या अपने ऊपर 
किसी को इलाज सिखाने के लिये आया है ?  क्या यह मरीज के  जिन्दा
 बने रहने के  मौलिक  अधिकार का अतिक्रमण नही है ? क्या यह  
मरीज  की जिंदगी से खिलवाड़ नही है ?  नियम अनुसार मरीज का 
इलाज  हर कीमत पर एक रजिस्टर्ड डाक्टर ही कर सकता है, कोई भी कानून
 जिन्दा मरीज पर परीक्षण करने की आज्ञा नही देता है / 
       यूनिवर्सिटी द्वारा संचालित बीडीएस  एमडीएस  अंतिम वर्षीय मौखिक
 एवं प्रेक्टिकल परीक्षा में विद्यार्थी सीधे सीधे मरीज का उपचार करके
एक्सटर्नल को दिखाता है, अगर इलाज  का तरीका एक्सटर्नल को उचित
 लगा तो छात्र उत्तीर्ण अगर इलाज ठीक नही हुआ तो छात्र फेल, अगर छात्र 
फेल हो गया तो भी उसके पास पुनः परीक्षा में बैठने का अवसर तो है, छः 
महीने बाद परीक्षा में सम्मिलित होकर उत्तीर्ण हो सकता है लेकिन जिस 
मरीज का इलाज गड़बड़ हुआ है उसका दर्द उसकी पीढ़ा कौन देखे? अगर 
दांत गलत निकल गया या चांदी गलत भरी गयी या मसूड़े का आपेरशन 
गलत हो  गया तो यह तो मरीज का हुआ? यानी किसी भी सूरत में मरीज 
के ऊपर परीक्षण कैसे जायज ठहराया जा सकता है ?
अब आगे देखिये और क्या क्या होता है, मरीज के साथ? सभी जानते हैं
 कि एक्स रे  विकिरण स्वास्थय  के लिये हानिकारक होते हैं, अगर किसी
मरीज को ज्यादा एक्स रे विकिरण दे दिए  जाते हैं तो मरीज का स्वास्थ्य
 खराब हो सकता है ? चूंकि डेंटल कोलिजों को डेंटल एक्स रे से पैसे मिलते 
हैं इसलिये भी कभी लालचवश या कभी उपचार के सन्दर्भ में भी मरीजों के 
डेंटल एक्स रे किये जाते हैं? ना तो छात्र को ही पता कि कितना रेडियेशन 
वह खुद खा रहा है और ना ही मरीज को पता कि क्यों उसका एक्स रे खीचा 
जा रहा है और कितना रेडियेशन मरीज खा रहा है ? अभी हाल में समाचार 
पत्रों में छपा था कि अमेरिका के डाक्टरों ने पाया है कि अगर डेंटल एक्स रे 
ज्यादा किये जाते हैं तो उसे मरीज को  ब्रेन ट्यूमर की सम्भावना दुगनी हो 
जाती है और अमेरिका के डाक्टरों ने यह भी पाया कि जिन मरीजों को ब्रेन 
ट्यूमर देखे थे उनमे से अधिक ने वर्ष में दो बार अपने डेंटल एक्स रे करवाए 
थे ? लेकिन डेंटल कोलिजों में इस सन्दर्भ में कोई जागरूकता  ही नही है, 
बीडीएस के तीसरे वर्ष, चतुर्थ वर्ष का छात्र और इन्टर्न सभी दमादम एक्स
 रे खीचते मिलेंगे नातो उनके पास कोई रक्षा कवच स्वयं का होता है और 
नाही मरीज के लिये ही ? अब कोई मरीज डेंटल कोलिजों में इलाज के लिये 
आया है या अन्य कोई बीमारी लेने  के लिये? इसका उत्तर शायद किसी भी 
डेंटल कोलिज के पास नही है और चूंकि पढ़ाई के दौरान छात्रों का शिक्षण ही 
जब  स्तरहीन हो तब येही छात्र अपनी प्रेक्टिस में भी इन्ही सिद्धांतों को 
अपनाते हैं / हर डेंटल क्लिनिक पर डेंटल एक्स रे खीचे जाते हैं  जिसका 
रेडियेशन ना केवल मरीज ,बल्कि मरीज के तीमारदार और स्वयं डेंटिस्ट 
खुद भी खाते हैं लेकिन किया क्या जा सकता है क्योंकि पढ़ाई ही नही कराई 
गयी है और डेंटल कोलिज में मरीज पर हाथ साफ़ ज्यादा इलाज पर कम 
ध्यान रहता है क्योंकि छात्रों को एक निश्चित कोटा भरना होता है, जैसे छात्र को 
पूरे दो वर्ष की पढ़ाई यानी तीसरे और चौथे वर्ष में सौ दांत निकालने हैं, दस 
मरीजों के जबड़े बनाने हैं, या अमुक संख्या में सफाई करनी है या अमुक संख्या
 के मरीजों के दांतों में तार लगान हैं या इतने रूट केनाल  करने हैं आदि आदि/
      डेंटल कायुन्सिल ने लगभग लगभग प्रत्येक  प्रायवेट डेंटल कोलिजों को प्रति 
वर्ष सौ प्रवेश बीडीएस पाठ्यक्रम हेतु  मान्यता दी  हुई है और हर मान्यता प्राप्त 
कोलिज को पोस्ट ग्रेजुएशन  हेतु हर विषय में तीन या चार या पांच सीटें एमडीएस
 में प्रवेश की मान्यता प्रदान की हुई है जिसके अनुपालन में अगर टीचरों की 
संख्या देखें तो सौ छात्र बीडीएस और चार छात्र एमडीएस के ऊपर केवल छः 
या सात टीचरों का स्टाफ ही मान्य किया हुआ है,  इसी से खुद ही डेंटल 
कायुन्सिल की नीयत स्पष्ट हो जाती है कि इलाज टीचरों ने नही बल्कि छात्रों
ने ही करना है / डेंटल कायुन्सिल के नियम कुछ ऐसे हैं जिनसे ऐसा प्रतीत 
होता है कि डेंटल कोलिज में पढ़ाई छात्रों को नही बल्कि टीचरों को ज्यादा 
करनी है/टीचरों के लिये वर्ष में दो बार की विषयात्मक  कोंफिरेंस में 
सम्मिलित होना , जरनलों में पेपर पब्लिश करना और इस कामों के लिये
 टीचरों को कुछ अंक दिए जाते हैं जिनसे उनकी कोलिज में नौकरी बनाये 
रखने के लिये प्राईवेट कोलिजों का दबाब बना रहे, कोई भी नियम ऐसा नही 
है जिसमे यह कहा गया हो कि एक टीचर को इतने घंटे पढ़ाना है जरुरी है, 
या इतने घंटे मरीज देखना जरुरी है या इतने मरीज को इलाज करना जरुरी है? 
टीचरों के लिये यह जरुरी है कि सप्ताह में चार दिन जरुर आना है और कुछ का
 तो पता ही नही कि कब आते हैं और कब नही ? इसके पीछे तर्क यह कि टीचर
 मिलते ही नही है और इस कारण प्राईवेट डेंटल कोलिजों में टीचरों की 
रिटायरमेंट आयु  सत्तर वर्ष कर दी गयी है , अब यह क्या किसी के गले उतर 
सकता है कि भारत में जहाँ बेरोजगारी का ग्राफ दिन रात बढ़ रहा हो वहाँ टीचर
 ना मिलें, लेकिन रखना ही उनको है जिनको कायुन्सिल का आशीरवाद प्राप्त हो  
तो क्या किया जा सकता है ? चूंकि डेंटल कोलिज में टीचरों को केवल पेपर
 पब्लिश करना और कोंफिरें अटेंड करना या कायुन्सिल का इंस्पेक्शन 
 करना या एक्सटर्नल के रूप में अन्य डेंटल कोलिजों में जाकर पैसे कमाना 
ही मुख्य काम रह गया है इस कारण मरीज देखने का काम  तो केवल छात्र 
ही करेंगे ? सरकार ने डेंटल कोलिज आखिर टीचरों के वेतन के लिये खोले थे
या मरीजो के उपचार के लिये या इलाज की गुणवता बनाये रखने के लिये? 
अगर टीचर कम है तो बीडीएस  की सीटें कम करो और एमडीएस की भी 
कम करो लेकिन मरीज का उपचार एक नौसिखिया वो भी एक छात्र और 
वो भी बिना पंजीकृत  किये हुए  कोई कैसे कर सकता है और कैसे अनुमति 
दी जा सकती है? कोई टीचर कम नही है केवल कहने भर का है थोड़े से नियम
 सरल करो तो  बहुत मिलेंगे ?
         चूंकि डेंटल कोलिजों में इलाज छात्र ही करते है इसलिये टीचर ज्यादातर 
कार्यलयों में ही बैठकर समय व्यतीत करते हैं, एक बात गौर करने की है कि 
डेंटल चिकित्सक को सदैव हाथों से ही काम करना होता है क्योंकि वह कोई 
फिजिशियन नही है कि केवल दवाई लिखकर ही इतिश्री कर लेगा,  दांत 
निकालना, चाँदी भरना, दांतों की सफाई करना ,रूट केनाल  करना, ये सब 
काम हाथों से ही करना होता है / ठीक है उपकरण जरुर प्रयोग होते हैं लेकिन 
उपकरण भी तो हाथ से ही पकड़ेंगे? डेंटल उपकरण बहुत सेनिस्टिव होते हैं 
और कमप्रेस्ड हवा के पेशर से बहुत तेजी की स्पीड से चलते हैं जिनसे कभी 
कभी होशियार डेंटल डाक्टरों  द्वारा भी मरीज के मूह में चोट पहुँच जाती है 
लेकिन उसके बाबजूद सब कुछ जानते हुए भी सेंसिटिव  उपकरणों को तीसरे 
चौथे वर्ष के बीडीएस छात्रों को मरीज पर चलाने की अनुमति देना क्या तर्क 
संगत प्रतीत होता दिखता है/ सत्तर वर्ष में व्यक्ति शायद भारत में बूढ़ा ही कहा 
जाता है, और सत्तर वर्ष के व्यक्ति का शरीर शिथिल भी पड़ ही जाता है और
डेंटल चिकत्सा में हाथ और दिमाग दोनों का प्रयोग होता  है तो भी चिकित्सीय
 शिक्षा प्रणाली जिसने हाथ का काम  ज्यादा हो सत्तर वर्ष  की रिटायर्मेंट आयु 
समझ से परे ही मानी जायेगी यह स्पष्ट संकेत देती है कि उस चिकित्सक को 
कोई काम नही करना बस कार्यालय में ही बैठना भर है / अब ऐसे डेंटल टीचर 
भला  किस काम के हैं?जो नातो पढ़ाएं और नाही कोई काम करें और नाही 
मरीज का उपचार ही करें बस कन्फिरेंस  में जाना ही उनकी डयूटी रह जाती है /
       डेंटल कोलिज में मरीज टीचर के पेपर पब्लिकेशन देखने या टीचर की 
कन्फिरेंस अटेंड करने की संख्या देखने नही बल्कि अपना उपचार कराने जाता 
है और इस सन्दर्भ में मरीज को छात्रों के हवाले कर दिया जाता है जहाँ उस 
मरीज पर डेंटल छात्र अपना अनुभव प्राप्त करता है और यूनिवर्सिटी वार्षिक
 परीक्षा में मरीज एक परीक्षण का माध्यम बनता है /
        भारत सरकार ने अब हाई स्कूल से लेकर उच्च शिक्षा स्तर तक की 
सभी पाठ्यक्रमों में जंतुओं के विच्छेदन पर प्रतिबन्ध लगा रखा है, अगर
 कोई संस्थान ऐसा करते पकड़ा जाता है तो ना केवल उस पर आर्थिक  
जुर्माना ही होगा बल्कि सजा का भी प्रावधान किया हुआ है/ अगर सड़क
 चलते पशुओं पर भी कोई अत्याचार करता पकड़ा जाता है तो भी दंड 
का पशु क्रूरता अधिनियम के तहत कार्यवाही होगी / यहाँ तक कि  
मनुष्यों  को तो छोडो  अब चूहों पर भी कोई परीक्षण नही किया जा 
सकता अगर मानवरक्षार्थ भी  कोई परीक्षण आवश्यक है तो बाकेयेदा
 सरकार से अनुमति लेनी पड़ेगी/ मेडिकल कोलिजों तक में भी इलाज
 टीचर ही करते है और छात्र केवल अनुसरण ही करते है शायद ऐसा 
नही है कि कोई अंडरग्रेजुएट या पोस्टग्रेजुएट छात्र जिसका अभी 
कायुन्सिल में पंजीकरण नही हुआ हो, वह किसी भी स्थति में इलाज के 
लिये मान्य है / सारे ही मेडिकल कोलिजों में चाहे वे प्राइवेट होँ या सरकारी 
ही क्यों ना होँ .इलाज टीचर या सीनियर रेजिडेंट्स ही करते दिखेंगे नाकि 
कि छात्र ही इलाज  या आपेरशन करेंगे/ लेकिन डेंटल कोलिजों में छात्रों 
को सीधे सीधे मरीज सौप देना शायद मरीज के साथ अन्याय ही नही 
बल्कि अपराध ही कहा जायेगा/ दांत भी शरीर का एक बहुत ही महत्पूर्ण 
अंग है और जबड़े की हड्डी भी, और जीवित मरीज अपना उपचार कराने 
डेंटल कोलिजों में जाता है नाकि अपने ऊपर कोई परीक्षण कराने / 
       एक छात्र जिसने अभी तक जनरल मेडिसिन भी नही पढ़ी, जनरल 
सरजरी भी नही पढ़ी क्योंकि तीसरे वर्ष की वार्षिक परीक्षा में ही इन 
विषयों की परीक्षा में बैठेगा उसको सीधे मरीज देखने ही नही बल्कि 
उपचार करने की अनुमति  देना जरुर मरीज के लिये कष्टदायक होता है /
डेंटल कायुन्सिल से प्रार्थना  है कि इस सन्दर्भ में थोडा सा ध्यान  देने के 
कृपा करें/ डेंटल कायुन्सिल की कार्यप्रणाली पर मेरा कोई प्रश्न नही है 
लेकिन मरीज के स्वास्थय की दृष्टि से जो कुछ हो रहा है वह जरुर 
आपत्तिजनक  है/
     सम्बंधित यूनिवर्सिटी का भी यह धर्म बनता है कि छात्रों को डिग्री 
यूनिवर्सिटी देती है नाकि कायुन्सिल और छात्रों के भविष्य के साथ खिलवाड़ 
ना होने देना यूनिवर्सिटी का भी धर्म है/  सम्बंधित यूनिवर्सिटी अगर देखे कि 
सौ बीडीएस  छात्रों और एक विषय के चार पीजी छात्रों पर क्या छः टीचरों या 
सात टीचरों का स्टाफ क्या पर्याप्त  है? कायुन्सिल केवल शिक्षा का स्तर ही
 देखने के लिये अधिकारी है  जबकि शिक्षण कार्य यूनिवर्सिटी का है, परन्तु 
यूनिवर्सिटी अभी तक शायद यह नही देख पायी होगी कि इलाज टीचर नही 
बल्कि छात्र करते हैं /  छः सात टीचरों का स्टाफ आखिर कितने छात्रों पर 
निगाह रख सकता है जबकि एक क्लिनिकल पोस्टिंग में तीसरे वर्ष के भी
 छात्र हैं, चतुर्थ वर्ष के भी ,इन्टर्न  के भी और ये सब अभी छात्रावस्था में ही
 है और साथ में पोस्ट गेजुएट कोर्सों  के तीन साल के भी छात्र. इतने सरे 
छात्रों पर क्या कोई टीचर कितना ध्यान रख सकता है जबकि प्राईवेट डेंटल
 कोलिजों में टीचर की नौकरी ही एक तरह से हर समय मेनेजमेंट के हाथ 
में रहती है क्योंकि टीचर का ना कोई प्रोविडेंट फंड कटता है और नाही कोई 
ग्रेजुएटी   ही मिलनी है.टीचर का दिमाग तो पेपर पब्लिकेशन और कन्फिरेंस 
अटेंड करने या फिर एक्सटर्नल  एक्जामिनर बनने की कोशिश में ही लगा  
रहता है  /जिससे शिक्षण कार्य निश्चित रूप से प्रभावित होता होगा/ अगर नही 
होता है तो बहुत ही अच्छी बात है लेकिन मरीज कोई परीक्षण की वस्तु नही 
बल्कि जीता जगता इंसान है इसलिये इलाज तो उसका  पंजीकृत चिकित्सक  
से होना ही चाहिये चूंकि इंटर्नशिप से पहले छात्र पंजीकृत नही हो सकता 
इसलिये उसका एक्स रे करना और मरीज का इलाज करना निश्चित रूप से 
शायद मरीज के जिन्दा बने रहने  के अधिकार को प्रभावित करता है /
        भारत सरकार ने सभी चिकत्सकों को दवा की मार्केटिंग या बनाने 
वाली कंपनियों या मेडिकल औजार बनाने वाली कंपनियों  या इम्प्लांट 
बनाने वाली कंपनियों से किसी  भी तरह के उपहार लेने पर प्रतिबंध लगाया
 हुआ है लेकिन अधिकांश डेंटल अकादमिक जरनलों में इन्ही कंपनियों के
 विज्ञापन  छपे रहते हैं जिनसे यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि जरनल इन्ही 
कंपनियों से प्रायोजित है यहाँ तक कि मिड टर्म या फुल टर्म कोंफिरेंसों तक 
के आवेदन प्रपत्रों पर इन्ही कंपनियों के विज्ञापन छपे रहते हैं/  नियमानुसार 
कोई भी कंपनी टीवी पर दवा का विज्ञापन नही डे सकती लेकिन कुछ दवाओं 
मंजनों या क्रीमों के विज्ञापन टीवी पर दिखाए जाते हैं /एक तरफ यह कहना कि 
दवा को एक रजिस्टर्ड  डाक्टर ही कि लिख सकता है और पर्चे पर लिखी दवा 
को ही केमिस्ट बेच सकता है तो ये विज्ञापन मरीजों के लिये हैं या डाक्टरों के 
लिये यह सरकार को स्पष्ट करना चाहिये/
आखिर भारत में मरीजों के हेसियत क्या है? भारत सरकार ने आज तक यही 
स्पष्ट नही किया कि एक बीडीएस डिग्रीधारी डेंटिस्ट की सीमायें क्या हैं? यानि 
एक सामान्य बी डी एस डिग्रीधारी डेंटिस्ट किन किन इलाजों को करने के लिये 
मान्य है? और चूंकि अब  एमडीएस डिग्रीधारी भी बहुत हैं और एमडीएस भी 
अब नौ विषयों में होता है तो सरकार ने यह भी स्पष्ट नही किया कि क्या एक
विषय से उत्तीर्ण एमडीएस डिग्रीधारी पोस्ट ग्रेजुएट डेंटिस्ट अगर अन्य किसी 
सुपर स्पेशिएलिटी कोर्स के अंतर्गत आने वाले इलाज को करता है तो उसपर 
दंड का क्या प्रावधान है ? अगर बीडीएस और एमडीएस डिग्रीधारी दोनों एक 
जैसे काम कर सकते हैं तो फिर एमडीएस का फायेदा ही क्या है ? आजकल 
डेंटल इम्प्लांट  डालने का भी नया फेशन शुरू हुआ है लेकिन अभी तह यही पता
 नही कि इनको डालने की योग्यता किस विषय वाले डेंटिस्ट को है? क्या एक 
सामान्य बीडीएस धारी डेंटिस्ट डेंटल इम्प्लांट डाल सकता है यह आज तक
 डेंटल कायुन्सिल ने स्पष्ट नही किया? होटलों में डेंटल इम्प्लांट डालने की विधि
 सिखाई जाती है क्या यही इलाज का नया तरीका इजाद हुआ है ?
       कोई भी चिकित्सा केम्प  सम्बंधित क्षेत्र के मुख्यचिकित्सा  अधिकारी की 
लिखित अनुमति  के बिना नही लगाया जा सकता/ सबसे ज्यादा केम्प  भी आँखों 
और दांतों के रोगों के ही लगते हैं लेकिन क्या  वहाँ खुले वातावरण में औजारों 
के पूर्ण स्टर्लायिजेशन का ध्यान रखा जाता है क्योंकि अक्सर देखा जाता है कि 
सेवलोन मिले  पानी के गिलास में कुछ डेंटल मिरर रख दिए जाते हैं और उनसे 
मरीजों के मुख परीक्षा चलते रहते हैं / क्या यही परीक्षण की गुणवत्ता है?
    अतः मानवाधिकार आयोग को इस तरफ ध्यान जरुर देना चाहिये कि आखिर
मरीज के साथ कितना बड़ा खिलवाड़ चल रहा है? मेरा उद्देश्य किसी संस्था को 
दोषी ठहराने का नाही बल्कि समाज के ठेकेदारों को थोड़ा सा दर्द मरीज का भी 
अहसास कराने का जरुर है, क्योंकि गरीबी के कारण ही मरीज ऐसे चिकित्सा 
संस्थानों में जाकर अपने ऊपर परीक्षण करवाकर आता है/ अगर मरीजों का
इलाज नौसिखिये छात्रों द्वारा  होना ही उनकी नियति है तो कम से कम सभी 
ऐसे चिकित्सा  संस्थानों को अपने संस्थानों के गेट पर यह घोषणा लिखवा 
देनी चाहिये कि यहाँ इलाज छात्रों द्वारा किया जाता है, कम से कम फिर कोई
 गिला शिकवा तो नही रहेगा ? 

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