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शनिवार, 27 अगस्त 2016

अविराम विमर्श

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  5,   अंक  :  05-12,  जनवरी-अगस्त  2016


।।अविराम विमर्श।।

सामग्री :  इस अंक में डॉ. पुरुषोत्तम दुबे का आलेख- ‘‘हिन्दी लघुकथा : स्थापना के सोपान’’ तथा डॉ. जितेन्द्र ‘जीतू’ का आलेख- ‘‘सांस्कृतिक बदलाववाद और लघुकथा की स्थिति का नारको टेस्ट’’


डॉ. पुरुषोत्तम दुबे



हिन्दी लघुकथा : स्थापना के सोपान 
मान्यता के बहुत समीप होना और विधा का नाम अर्जित कर लेना, इन दो बातों में बड़ा अंतर है। मान्यता पाठकों से जन्म लेती है प्रत्युत् विधा आलोचकों के मध्य गहन मनन-चिंतन और चर्चा-परिचर्चाओं के प्रतिफलन से अपनी अस्मिता में ढलती है। क्या हिन्दी लघुकथा का जरूरत से ज्यादा लिखा जाना ही हिन्दी लघुकथा विधा के स्थापित होने की गारण्टी है? वर्षों से लिखा चला आ रहा हिन्दी व्यंग्य साहित्य अद्यतन विधा की संज्ञा पा सकने में असमर्थ रहा है, इसे हिन्दी साहित्य की सद्यःस्फुट धारा में स्थान दिया गया है।
     हिन्दी लघुकथा लेखन की उपलब्धियों पर बात करें तो आज हिन्दी लघुकथा की रचनाशीलता हिन्दी के अलावा हिन्दीतर प्रान्तों में बहुतायत में विकासशील है। बल्कि कहें, कि हिन्दी लघुकथा लेखन अकेले भारतव्यापी न रहकर देश की सीमाओं के उस पार से भी आ रहा है। तो ऐसे में, हिन्दी लघुकथा की स्थापना का सवाल वर्तमान में जस का तस क्यों अटका हुआ है? भारत विश्रुत पत्रिकाएँ, चाहे फिर ‘सारिका’ रही हो अथवा ‘कथादेश’, ‘हंस’, ‘बरोह’, ‘नवनीत’, ‘कादम्बिनी’ या फिर आज और नई जुड़ने वाली पत्रिकाओं में ‘साक्षात्कार’, ‘नया ज्ञानोदय’, ‘समावर्तन’, ‘वीणा’ प्रभृति पत्रिकाएँ हैं जिनमें अनिवार्यतः हिन्दी लघुकथा का प्रकाशन हो रहा है। यही क्या लघुकथा को ‘विधा’ ठहराने की बात है? अलहदा इसके, एक दलील यह भी है कि यह आसानी से पढ़ ली जाती है, इसकी क्षणिक अनुभूति है और इसमें तेज मारक क्षमता है। हिन्दी लघुकथा के सम्बन्ध में “विरुदावलियों” के ऐसे बोल लघुकथाकारों के मध्य से ही निकले हैं। लेकिन गहराई इस तर्क में है कि अभी तक हिन्दी साहित्य के जो मान्य विद्वान, पण्डित, आलोचक हैं, उन्होंने हिन्दी लघुकथा की ओर गम्भीरतापूर्वक ध्यान नहीं दिया है। फिर, सवाल यह भी सामने आता है कि हिन्दी की उपन्यास, कविता और कहानी ऐसी विधाएँ हैं जिनके पास पूर्णकालिक रचनाकार हैं और आलोचक भी। रचनाकारों के समान्तर यदि विधाओं के आलोचक भी विधाओं से संलग्न हुए मिलते हैं तब विधाओं के स्थापन्न का प्रश्न स्वमेव हल होता है।
     कहा यह भी जाता है कि वर्तमान में लघुकथा की स्थापना का सवाल बेमानी है। परन्तु इसके पीछे वही पुराना और लिजलिजा वक्तव्य...कि वर्तमान में लघुकथा तादाद में लिखी जा रही है, लेकिन जो बात लघुकथा की ऐतिहासिकता गोकि कहें कि विधागत स्थापना के पीछे लघुकथा लेखन के तारतम्य में ‘रचनात्मक संस्कार’ की होनी चाहिए, वह नहीं हो पा रही है।
     अभी लघुकथा लेखन के सम्बन्ध में कुछ नीतिगत अथवा सैद्धान्तिक पक्षों पर काम करना आवश्यक है। लघुकथा लेखन की सीमा के निर्धारण में बात को रबर-केंचुआ-छंद की तरह खींचा जा रहा है। साहित्य की प्रायः हर मान्य विधा का धर्म उसके मानकीकरण में निहित है। हिन्दी लघुकथा में मनुष्य और उसके परिवेश का अंकन उस सीमा तक नहीं पाया है, जो कसौटी का आदर्श है।
     और भी अनेक मसले हैं, जिनपर एकदम से नहीं, तो भी, उत्तरोत्तर विचार किया जा सकता है। बड़ी जरूरत है हिन्दी लघुकथा पर एक वैचारिक ‘संसद’ चलाने की। ऐसी बयार कहीं से भी बहे, मगर झंझावात की शक्ल में नहीं, अपितु लघुकथा स्थापन की दिशा में प्राण-शक्ति रोपने की शक्ल में। होना यह चाहिए कि जो फिलवक्त नहीं हो रहा है, गोया कि जो-जो लघुकथाकार अपनी-अपनी लघुकथाओं के संग्रह की थाल सजाकर लघुकथा-मंदिर में अपनी प्रविष्टि दर्ज कराए, वो-वो सर्वप्रथम स्वयं से यही निर्णय लेवें कि अपनी-अपनी किताब में बतौर ‘प्राक्कथन’ हिन्दी लघुकथा की स्थापना की चिन्ता को लेकर जिम्मेदारी के साथ लिखें। दिशा-दिशा से आने वाली निज के द्वारा लिखी गई ऐसी भूमिकाओं के समुच्चय से तपे हुए कुन्दन की तरह निकली बातें लघुकथा की विधागत स्थापना विषयक मसौदे तैयार करती मिलेंगी।
     अतीत का कालचक्र ‘सन् 1980’ अभी भी हमारी पहुँच से बाहर नहीं है। 1980 को बीते हुए पेंतीस बरस का समय अभी हमारी सोच की गिरफ्त में है। विराट काल की गणना की तुलना में पेंतीस वर्षीय इस अल्प कालावधि को दूरबीन से देखे बगैर भी हम लघुकथा विषयक स्थापना को साध सकते हैं। आधुनिक समय में इंटरनेट की सुविधा ने पारस्परिक वार्तालाप को आसान बना दिया है। अब किसी भी प्रकार की चर्चा-परिचर्चाओं के लिए ‘कॉफी हाउसों’ अथवा साहित्यिक सभागारों की जरूरतें निघट चुकी हैं। आजकल तो इंटरनेट पर बात रखो, और बात पर सहमत-असहमत के रेकॉर्ड संचित कर लो। पर इस बात के लिए अपने से किए एक संकल्प का अनुसरण करना होगा। किसी काम के लिए फिक्रजदा होकर काम को निपटाया जा सकता है। तो देर क्यों? रखिए पैर इंटरनेट की दहलीज पर और लिख डालिए लघुकथा के स्थापन्न विषयक अपने विचार। विचारों का सम्प्रेषण लघुकथाकारों की सामुदायिक भावना के फलस्वरूप होगा, तो नियति भी जरूर अपना काम करेगी। मात्र और मात्र आलोचना की राह चलकर लघुकथा की स्थापना का सवाल हल नहीं किया जा सकता। लघुकथाकारों की बोर्जुआ पीढ़ी; गोकि जिनके पास लघुकथा की बारीकियों को गिनाने का खासा अनुभव है; को आगे आना होगा, अपने अनुभवों की बानगी निकालनी होगी ताकि लघुकथा की स्थापना की कोई उचित सूरत बने।
     अतीत में, हिन्दी कहानी की स्थापना को लेकर बहुतेरी जंग लड़ी गईं। कहानी, फिर नई कहानी, फिर समकालीन कहानी, फिर आंचलिक कहानी, फिर समान्तर कहानी। और स्थिति यह है कि कहानी के ये सभी विभाजन आज स्वीकार्य हैं और कहानी के नाम-विभाजन की प्रत्येक संज्ञा स्थापना की पटरी पर सवार है। फिर ऐसा ही काम हिन्दी लघुकथा की स्थापना के हित में क्यों नहीं?
     आज लघुकथा को लिखने वाले बहुसंख्यक लघुकथाकार हैं। शायद सुई की नोंक के बराबर भी कोई कथानक वर्तमानकालीन लघुकथाकारों से छूटा नहीं है। तब यह सम्भव ही नहीं है कि लघुकथा के स्थापना बाबत दावे खारिज हों। अपनी ओर से, कोई चार सुझाव यहाँ देना मैं मौजूँ समझता हूँ। सम्भवतः मेरे द्वारा दिये जा रहे ये सुझाव लघुकथा-स्थापना की गाँठें खोलने में सहायक बन सकें।
     पहला सुझाव है-आचार, विचार और रुचि की प्रक्रिया, यानी कि लघुकथा लेखन के प्रति लघुकथाकार कितना आग्रही (पजेसिव) रहा है। दूसरा-आचार, विचार और रुचि में संशोधन, अर्थात् पहले की तुलना में लघुकथा लेखन की गहराई का ग्राफ कितना ऊँचा हुआ है? तीसरा-लेखन की दुनिया में लिखा गया जितना भी सर्वश्रेष्ठ है, उसकी अनुगामिता कितनी हुई है? तथा, चौथा-बीसवीं सदी के पश्चात् इक्कीसवीं सदी में आ रही सभ्यता के बौद्धिक अंशों से आज का लघुकथाकार कितना प्रभावित है?
उक्त चार बातों पर समेकित दृष्टि के बूते पर ही हिन्दी लघुकथा की विवेचना करनी होगी। जिससे लघुकथा लेखन की विकासगत स्थिति को उसके ऐतिहासिक क्रम से देखा जा सके। समय की पुकार है कि हिन्दी लघुकथा अपनी संरचना में काम आये समस्त अंगों से जानी जाए। कथ्य, प्रस्तुति, भाषा, शिल्प, संवेदन, आस्वादन प्रभृति के जरिए लघुकथा का पाठक लघुकथा के समीप आए। तादात्म्य, जहाँ होगा, स्थापना की मोहर वहीं लगेगी।

  • शशीपुष्प, 74 जे/ए (स्कीम नं. 71), इन्दौर-452009 म.प्र./मोबाइल 09407186940



डॉ. जितेन्द्र ‘जीतू’



सांस्कृतिक बदलाववाद और लघुकथा की स्थिति का नारको टेस्ट
       समकालीन हिन्दी लघुकथा को देश की सांस्कृतिक परिस्थितियों ने पूर्ण रूप से प्रभावित किया है। देश की संस्कृति क्या थी और क्या से क्या हो गयी है, यह जानना बहुत जरूरी है।
     यह संयोग नहीं है कि संस्कृति आज एक विशाल और व्यापक उद्योग के रूप में विकसित हो रही है। संस्कृति की परिभाषा और उसका कर्म भी बदल गया है। आज संस्कृति वह नहीं रह गई है जिसे टी. एस. इलियट ने कभी मनुष्य की पूरी कार्य शैली, व्यवहार, जीवन के प्रति दृष्टिकोण तथा सामाजिक चेतना केे रूप में परिभाषित किया था। हालांकि टी. एस. इलियट भी जानते थे कि ऐसा व्यक्ति जो संास्कृतिक कार्य में योगदान करता है, जरूरी नहीं है कि वह स्वयं सुसंस्कृत हो। आज ऐसा ही हो रहा है, संस्कृति का कार्य व्यक्ति या समाज को ‘सुसंस्कृत’ बनाना नहीं रह गया है।
     देश की यह संस्कृति कोई एक दिन में नहीं बदली। इसके पीछे परिवर्तन की एक पूरी प्रक्रिया शामिल है। इस समय भारत के लोगों के बारे में कहा जा सकता है कि वे सांस्कृतिक उन्मूलन और आत्म विसर्जन के रास्ते पर तेजी से बढ़ रहे हैं। आज का मूल मन्त्र है- पश्चिम की ओर देखो।
     संस्कृति किसी भी राष्ट्र की पहचान होती है और जब यही संस्कृति न रहे तो पहचान का संकट उत्पन्न हो जाता है। वास्तविकता यह है कि दुनिया में इस समय एक ही संस्कृति की धूम है, जो वैश्वीकरण के पीछे खड़ी है। यह मुनाफे, खुदगर्जी और निर्ममता की संस्कृति है। निश्चय ही वैश्वीकरण के लिए दुनिया भर की परम्परागत संस्कृतियों ने शुरू में थोड़ी समस्या पैदा की थी। पश्चिम की कई वस्तुओं और सेवाओं को अपनी जगह बनाने में कठिनाई हुई, क्योंकि स्थानीय चुनौतियों और संस्कारों की भिन्नता थी। अन्ततः बड़ी पूंजी के चमकीले आतंक के आगे कुछ भी न ठहर सका।
     सन् सत्तर के बाद से संस्कृति में जो परिवर्तन आये, उन्हें लघुकथाकारों ने अपनी लघुकथाओं के माध्यम से उकेरा। ये परिवर्तन इतने गहरे थे कि इस परिवर्तन ने मां-बाप की स्थिति को भी शोचनीय बना डाला। इस सम्बन्ध में डॉ. तारा निगम की निम्न लघुकथा ‘सेवा’ उल्लेखनीय हैः 
     ‘‘वह रोज मंदिर में आता, भगवान को प्रणाम कर कुछ स्तुति गाता, फिर देर तक भगवान की मूर्ति के पैर दबाता। उसकी श्रद्धा देख मुझे अच्छा लगता और मैं सोचती, जो पत्थर की मूर्ति के प्रति इतना सेवा भाव रखता है, वो जीवितों के प्रति कितना दयालु होगा।
     एक दिन मुझसे रहा नहीं गया। मैंने उससे पूछा- भाई, आप रोज इतनी देर तक मूर्ति के पैर दबाते हैं तो अपने माता-पिता के पैर कितनी देर तक दबाते होंगे?
     मेरे सवाल से चौंक गया वो। बोला, उनके पैर मैं कैसे दबाऊंगा?
     क्यों? क्या माता-पिता नहीं है? माफ करना, मुझसे भूल हुई।
     ‘‘नहीं, नहीं, ऐसी बात नहीं, दरअसल वे दोनों तो वृद्धाश्रम में रहते हैं।’’
     अपने देश में संस्कृति की स्थिति आज यह है कि यह अब ‘कल्चर’ के नाम से जाना जाता है और जाना भी क्या जाता है, नाक-भौं चढ़ाकर ‘इंडियन कल्चर’ (?) का जिक्र किया जाता है। 
     हम अपने आस पास के लोगों, घटनाओं और राजनैतिक वक्तव्यों में एक ऐसी संस्कृति की छाया देख सकते हैं, जिससे हम अब तक परिचित थे। विश्व बाज़ार में आम जनता के बुनियादी मूल्यबोध और रूचियों को उजाड़कर एक नकली आस्वाद प्रत्यारोपित कर दिया है। वह हमें अपनी छाया में हंसा और रूला रहा है। मनुष्य खुद अपनी हँसी और अपने आँसू भूलता जा रहा है। दूसरी तरफ, हमारी संस्कृतियाँ सामन्ती रूढ़ियों में पहले से ज्यादा जकड़ गई हैं, धर्म अब नैतिक प्रेरणा से दूर एक मनोरंजन है या हिंसक उन्माद।
     इस नई संस्कृति के पैरोकारों की कोई कमी नहीं है। सांस्कृतिक दुनिया में बाज़ार के ऊपर उठने का अर्थ है कला का नीचे गिरना। हम देख सकते हैं कि आर्थिक मन्दी में भी दिखावे और चमक-दमक में कोई कसर नहीं है, ग्लानि का युग बीत गया है।
इस नई संस्कृति ने मानो पूरे भारत को बाजार में बदल दिया है। सारा भारत बाजारमय हो गया है। हम देख सकते है कि बच्चों के खिलौनों की शक्ल बदल गई है। जीवन के तौर-तरीके बदल गये हैं। इन सबके साथ आदमी की सामाजिकता विलुप्त होती जा रही है। हम सांस्कृतिक उन्मूलन और आत्मविसर्जन का जितना अंदाजा लगा रहे हैं, उससे ज्यादा है। संस्कृति का प्रश्न मुख्यतः एक मध्यमवर्गीय प्रश्न है। मध्यमवर्ग को ही संस्कृति की ज्यादा चिन्ता होती है और अन्धानुकरण में भी वह सबसे आगे होता है। कहा जाता है, वैश्वीकरण ने मध्यमवर्ग का आकार बढ़ा दिया है, उसके स्वप्न ऊंचे कर दिये हैं। आज उच्च वर्ग की वास्तविक आमदनी, मूल्यविहीनता, ताकत और शान-शौकत का अनुमान तक कठिन है पर अब मध्यमवर्ग का भी एक हिस्सा काफी ऊँचे पायदान पर है, जहां से आम पब्लिक जरा भी नहीं दिखती।
     यही नहीं, बदलती संस्कृति के पदचापों की आवाज बच्चों के आंगन में भी आसानी से सुनी जा सकती है। उनका खानपान, रहन-सहन इतना बदल गया है कि उनके और मां-बाप के बीच एक पीढ़ी का नहीं, मानो कई पीढ़ी का अंतर आ गया हो। टी. वी. संस्कृति से रजी-कजी आज के बच्चों की बदलती सोच को डॉ. कमल मुसद्दी की निम्न लघुकथा ‘ब्रेकिंग न्यूज’ प्रमुखता के साथ उद्घाटित करती है:
     ‘‘बच्चों के जोर-जोर से चीखने, झगड़ने और रोने की आवाजों पर मां दौड़कर आई तो देखा कि रितिक के रोबोट की गर्दन और धड़ अलग-अलग पड़े हैं। रितिक आक्रोश भरे रूदन के साथ मुदित के सुपरमैन को कैंची से काट रहा है, साथ ही बड़बड़ाता जा रहा है, ‘तूने मेरा रोबोट तोड़ा, मैं इसके टुकड़े-टुकड़े कर डालूंगा।’’
     मां ने रितिक को डांट कर सुपरमैन छीनना चाहा तो वह मचल गया, ‘‘मैं इसके तीन सौ टुकड़े करके ही मानूंगा। इसने मेरे रोबोट की गर्दन तोड़ी है।’’
     मां मुदित से बोली, ‘‘क्यों तोड़ा तूने इसका रोबोट, बता...?’’ वह चीखा, ‘‘नहीं तोड़ा मैंने।’’
     रितिक चीखा, ‘‘यह झूठ बोल रहा है?’’
     मां ने फिर मुदित को डांटा, ‘‘क्यों झूठ बोलता है तू?’’
     इस पर मुदित और आक्रामक होकर बोला, ‘‘मैं झूठ नहीं बोल रहा, नहीं बोल रहा मैं झूठ...।’’ रोते हुए ही बोला, ‘‘तुम चाहो तो मेरा नार्को टेस्ट करा लो।’’ हतप्रभ मां कुछ देर निशब्द रही... फिर गहरी सांस लेकर खिलौनों के टुकड़े बटोरने लगी।’’
     बाजारवाद ने व्यक्ति के मानस को भी बदलने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। इंसान वैसा नहीं रहा जैसा कि कभी हुआ करता था। 
     इस संस्कृति में न प्रेमचन्द युग के ‘हृदयपरिवर्तन’ की गुजंाइश है और न ही मुक्तिबोध युग के ‘आत्मसंघर्ष’ की। ये दोनों चीजें मानवीय अन्तःकरण में होती है, जो मध्यमवर्ग खोता जा रहा है। मध्यमवर्गीय लोग अब दुख-कष्ट में ज्यादा देर नहीं रह सकते। उन्हें ज़्यादा विलासिता, दौलत, उपभोक्ता सामान, पहचानहीनता की भीड़ में पहचान या प्रतिष्ठा चाहिये। उनके पास अपने हर भले और बुरे के लिए अपना तर्क है। वे हमेशा आत्म-महिमामंडन और दूसरों के ख.डन के लिये तैयार मिलेंगे। वे जिनका विरोध करेंगे, उससे आत्मीयता भी रखंेगे। वे अपने शत्रु के आत्मीय विरोधी होंगे, ताकि गुंजाइश बनी रहे। विकास की अंधी दौड़ ने सभी रिश्ते-नातों को भुला दिया है। 
     मूल्यबोध से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है येन-केन प्रकारेण विकास। सह-अस्तित्व से अधिक चिन्ता है सिर्फ अपने फायदे और बोलबाले की। योग्यता से अधिक बड़ी कसौटी है वफादारी। न्याय से अधिक जरूरी है स्वजन-पोषण। पैसा सबका राजा है। इस विश्वास ने आदमी में लालच बढ़ाया है। इसके साथ उसकी असुरक्षा भी बढ़ी है- कहीं भी हत्या, नरसंहार या आत्मघाती हमला सम्भव है।.... भोले आदमी अन्य ग्रह पर चले जाएं। अब ऐसे व्यक्तियों की जरूरत है, जो प्रबन्धन में होशियार हैं, जुगाड़ा टेक्नोलोजी में मास्टर हैं, मंत्रियों या सत्ताधारियों की चापलूसी करके अपना काम निकालना जानते हैं एवं निर्मम हैं। वे महत्वकांक्षी ही होने चाहिए। आज के ज्ञान में स्वार्थहीनता, राष्ट्रीय भावना, ईमानदारी, जनता से प्रेम जैसे मूल्यों के लिए जगह नहीं है। अब जो कम्पनी मुनाफा नहीं देती और जो रिश्ता फायदा नहीं पहुँचाता, उसे बने नहीं रहना है। 
     सरकार के सामने भी समस्या खड़ी हो गयी है। वह इस नये माहौल में सबको कैसे सुख-सुविधा और जीने की आम जरूरतें प्रदान करे जबकि हर आदमी जल्दी में है और जल्दी से जल्दी अमीर बनना चाहता है। 
     सर्वविदित है कि लोकतांत्रिक कही जाने वाली सरकारें भारी खर्च करके भी आम आदमी को न अच्छी शिक्षा दे पा रही हैं, न सही चिकित्सा और न ही जरूरी सेवाएं। इसलिए ही देश-विदेश की निजी कम्पनियां अपने कठोर अनुशासन के साथ छाती जा रही हैं। दरअसल, निजीकरण लोकतंत्र की विफलता की देन है। नतीजतन सरकारें हों या व्यक्ति उनकी बुनियादी दृष्टि बन गयी है- जिसमें फायदा नहीं, उसमें हम शामिल नहीं। अब जहां से फायदे की उम्मीद नहीं होती, चाहे वह सरकारी संस्थान हो, सरकारी सहायता प्राप्त संस्थान हो, कोई सेवा कार्य हो या आत्मीय रिश्ता, वहां से हाथ खींच लिया जाता है।
     यह संतोष की बात है कि इस नये माहौल को लघुकथाकारों ने बहुत जल्दी पकड़ लिया। आज ऐसी अनेकों लघुकथाएं हैं जो इस संस्कृति को दर्शाती हैं और समाज को प्रतिबिम्बित करती हैं।
     एक छोटे से सवाल के साथ यह कहानी यहीं खत्म करते हैं। यह बताइये कि किसी एक इंसान के शरीर में यदि उसकी सिर्फ नाक पनप रही है और बाकी अंग सूखे जा रहे हैं, तो क्या आप उसकी इस अद्भुत तरक्की का जश्न मनायेंगे? उससे कहेंगे ‘‘यार तुम्हारा हाथ पांव, सिर-पेट सूख कर कांटा हो गया तो क्या, तुम्हारी नाक तो हाथी की सूँड की तरह फल-फूल रही है, बधाई हो! या फिर आप उससे कहेंगे कि ‘‘महोदय आप अत्यन्त बीमार हैं, आपको जल्दी उपचार की जरूरत है, आपकी नाक आपके बाकी शरीर को पनपने नहीं दे रही है। शायद यह कैंसर जैसी कोई भीषण बीमारी है। फैसला आपको करना है।
     इस नयी संस्कृति को दर्शाती लघुकथा ‘शर्त’ (डॉ. तारिक असलम ‘तस्नीम’) यहां प्रस्तुत है:
     ‘‘मिसेज लीला, अब तो दोनों बच्चों की शादी एक साथ कर डालो। रवि तीस का और नीलू सत्ताइस की होने को है। कब तक इंतजार करोगी यूं ही। जल्दी से शगुन की मिठाई का स्वाद चखा दो।’
     ‘चिंता तो मुझे भी हो रही है, कुलकर्णी बहिन। मैं भी सोचती हूँ कब तक बेचारे दोनों इस तरह रात-रात भर क्लबों-पार्टियों में घूम-घूमकर ‘टाइम पास’ करते रहेंगे। मेरी तो कोई इच्छा नहीं है। बस, रवि के लिए कोई सुन्दर, सुशील, खानदानी, घरेलू लड़की मिल जाये जो रवि से एडजस्ट कर ले। नीला के नाज-नखरे उठाने वाला कोई ‘जोरू का... मिल जाये तो मैं चिंतामुक्त हो जाऊं।’’ 


  • कविकुल, खरवन्दा निवास, स्टेशन रोड, बिजनौर-246701 (उ.प्र.)/मोबा. 09412567854

बुधवार, 6 जनवरी 2016

अविराम विमर्श

अविराम  ब्लॉग संकलन :  वर्ष : 5,  अंक : 01-04,  सितम्बर-दिसम्बर 2015 



।।अविराम विमर्श।।

सामग्री :  इस अंक में डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय का आलेख- ‘‘आंचलिक कथासाहित्य की प्रेरक वृत्ति और शक्ति (डॉ. सतीश दुबे की औपन्यासिक कृतियाँ ‘कुर्राटी’ तथा ‘डेरा-बस्ती का सफरनामा’ के विशेष सन्दर्भ में)’’ तथा डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’ द्वारा ‘‘सामाजिक-मानवीय परिप्रेक्ष्य में ऑनर किलिंग’’ विषय पर आयोजित बहस (प्रतिभागी- इन्दिरा किसलय, डॉ.रामकिंकर सिन्हा, कविता विकास एवं विनोद सागर)


डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय
आंचलिक कथासाहित्य की प्रेरक वृत्ति और शक्ति
(डॉ. सतीश दुबे की औपन्यासिक कृतियाँ ‘कुर्राटी’ तथा ‘डेरा-बस्ती का सफरनामा’ के विशेष सन्दर्भ में)
      आंचलिक कथा-साहित्य में सामाजिक विसंगतियों, सांस्कृतिक-अवधारणाओं एवं लोक जीवन की तनावग्रस्त रीति-रिवाजों तथा परम्पराओं को उकेरने का प्रयास हुआ है। वस्तुतः आंचलिक कथा-साहित्य की प्रेरक वृत्ति और शक्ति आंचलिकता में निहित है। कथाकार अंचल विशेष के परिवेश से प्रेरित और प्रभावित होकर कथा-सृजन में जुटता है तथा आंचलिकता के माध्यम से राष्ट्रीयता को जीवंतता प्रदान करने का सद्प्रयास करता है। राष्ट्रीय अस्मिता की खोज ही कथा और कथाकार का अभीष्ट बनता है। यही कारण है कि लोक भावभूमि और लोकजीवन के वैशिष्ट्य को आंचलिकता के धरातल पर कथाकार चित्रित करता हुआ वैविध्य अंतर्निहित ऐक्य स्थापन में भी सफल सिद्ध होता है। लोकजीवन के तनाव को राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में चित्रित करना तथा उसे जनमानस के लिए ग्राह्य बनाना ही कथाकार का उद्देश्य होता है। लोकसंस्कृति का चित्रांकन संास्कृतिक परंपरा की अभिवृद्धि और समृद्धि का द्योतन करता है जिसका सीधा संबंध आंचलिक-कथा से होता है। जनमानस की अभिलाषाओं, आशाओं एवं आकांक्षाओं को मद्देनजर रखते हुए मानवता के प्रति उत्कृष्ट लगाव तथा स्थानीय जीवन और प्रकृति के प्रति गहरे अनुराग ने कथाकारों को कथासाहित्य-सृजन के लिए उत्साहित किया है।
     नया समाज, उसकी नई समस्याएँ एवं उससे उत्पन्न तनावग्रस्त स्थितियों-परिस्थितियों को चित्रांकित करने वाले समकालीन कथाकारों में आंचलिकता के फलक पर प्रस्तुत करने वाले कथाकार रेणु, विवेकीराय, डॉ. सत्यनारायण उपाध्याय, डॉ. नवलकिशोर, डॉ. रामदरश मिश्र आदि हैं, जिन्होंने लोकतत्व और लोकजीवन का सांस्कृतिक परिवेश में यथार्थवादी चित्रांकन प्रस्तुत किया है। समकालीन जीवन, उसके परिवर्तित स्वरूप एवं लोक परम्पराओं से प्रसूत नए मानमूल्यों की कथासाहित्य में उतारने और उभारने का जो कार्य हो रहा है, उनमें एक नाम डॉ. सतीश दुबे का भी जुड़ गया है जिनकी औपन्यासिक कृतियाँ ‘कुर्राटी’ और ‘डेरा-बस्ती का सफरनामा’ हैं। ‘कुर्राटी’ में भील आदिवासी की सामाजिक और सांस्कृतिक विकास और उत्थान की प्रक्रिया को आदिवासी युवा पीढ़ी को संदर्भित करते हुए कथानक का तानाबाना बुना गया है, जिसमें झाबुआ को केन्द्र में रखा गया है। दूसरी कृति ‘डेरा-बस्ती का सफरनामा’ है, जिसमें बांछड़ा समाज में प्रचलित कन्या देह व्यापार की परम्परा को सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों में निरीक्षण-परीक्षण किया गया है, जिसके मूल में स्त्री की विवशता और अस्मिता को रेखांकित किया गया है। अतएव दोनों उपन्यास आँचलिक परिवेशगत परिस्थितियों में मानवीय सरोकारों का विचारोत्तेजक धरातल पर चित्रांकन करते हैं। 
      ‘कुर्राटी’ का कथाकार लोकजीवन में आए हुए तनाव से उत्पन्न समस्याओं के प्रति सजग है, सतर्क है एवं सावधान है क्योंकि शोषण के प्रति सम्प्रति भील समाज भी अपनी आवाज उठाने में सक्षम है। व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई लड़ रहा है। युवा पीढ़ी अब दिग्भ्रमित नहीं रही तथा आँचलिकता नए रूप में परिलक्षित होती है। कहा गया है कि ‘‘मेरा आशय यह कदापि नहीं है कि सुदूर-वन्य या ग्रामीण क्षेत्रों का दलित या जनजातीय समाज हाथ-पर-हाथ धरे बैठा है। सच तो यह है कि वह पूरे परिदृश्य से खूब परिचित है। अपने अधिकारों के प्रति सजगता एवं शोषण के विरुद्ध मोर्चेबंदी की चेतना का उसमें जबरदस्त विकास हुआ है। राजनैतिक सोच दलबन्दी के कारण भले ही संकुचित हो गई हो, किन्तु व्यक्तिगत सोच का दायरा बढ़ा है। दरअसल, यही सोच समस्याओं के निदान हेतु कारगर सिद्ध हो सकती है। मेरा आप युवापीढ़ी से अनुरोध है कि शिक्षाकाल समाप्त होने के बाद परिवर्तित सामाजिक स्थिति में भी आप अपने घर-गाँव से जुड़े रहें तथा बौद्धिक स्तर पर ही नहीं, व्यावहारिक स्तर पर भी समस्याओं को समझकर सम्मानजनक हल ढूंढ़ने का प्रयास करें।’’ (पृ.174)
      उल्लेखनीय है कि प्रमुख पात्र के माध्यम से परम्परागत स्थापित समाज और नए बसे समाज के बीच द्वन्द्वात्मक स्थिति, नैसर्गिक जीवन को खंडित करने वाली परिस्थिति तथा लोकजीवन के सांस्कृतिक चैतन्यता को कथाकार ने उभारने का प्र्रयास किया है जिसके मूल में सम्भ्रांतिक जीवन और उसके परिवर्तित स्वरूपों के खोज की अहम् भूमिका है। लोक-विश्वास में आस्था है, परम्परा के प्रति अनुराग और लगाव है। नागराज और दादा के संवाद से स्पष्ट है कि शासन और प्रशासन दोनों स्तरों पर भ्रष्टाचार जोरों पर है और यह लाइलाज है, दूर करना समसामयिक परिवेश में बहुत ही मुश्किल है। साक्ष्य है यह कथन, ‘‘लाखों का बजट रहता है हरिजन आदिवासियों के लिए। सरकार के पास पैसा-ही-पैसा है। उनको व्यवसाय दिलाना, उनके बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के लिए कोडी-कटोर छात्रावास आश्रम है, वहाँ के लिए बिस्तर बर्तन से लेकर गादी-गोदड़े तक खरीदे जाते हैं। सबकी खरीद में सबको मिलता  है। कभी-कभी तो माल खरीदा भी नहीं जाता और स्टॉक इन्ट्री होकर पेमेन्ट हो जाता है। हमको सब मालूम रहता है, और मालूम होते हुए भी पाप की पहली सीढ़ी हम बनते हैं। उस पर भी हक्क का ना मिले तो दुःख तो होगा ना!’’ (पृ.18)
      भीलों की शैक्षणिक एवं सामाजिक चेतना को झाबुआ के परिपार्श्व में रखकर लोकजीवन और लोकसंस्कृति का दिग्दर्शन कराया गया है तथा उससे संदर्भित लोकगीत, कथा, त्यौहार, उत्सव, क्रीड़ा, पूजा-अर्चना आदि को भी यथा प्रसंग विवेचित किया गया है। सोमल्या परम्परागत जीवन शैली में विश्वास रखने वाले परिवारजनों को सुशिक्षित समाज से परिचित कराने में हीनता महसूस करना आदि तथ्यों को भी रेखांकित किया गया है। कथाकार ने भीलों की तांत्रिक-साधना के बारे में प्रचलित धारणा तथा उपलब्ध तथ्यों को आधार मानकर अपने कथ्य को प्रमाणित किया है क्योंकि भील धार्मिक दृष्टि से विभिन्न सम्प्रदायों में विभक्त है। एक वर्ग विशेष शैव मतानुयायी है। तांत्रिक साधना इनमें बहुत प्रचलित है। भैरव तथा भैरवी के आराधक मौके-बेमौके तांत्रिक वेषभूषा में उन्माद के चरम पर मांदल ढोल की उत्तेजक धुनों पर विभिन्न मुद्राओं में नृत्य करते हैं। तांत्रिक की परम्परा को बड़वे या भौपा किसी न किसी रूप में बनाए रखे हैं। विभिन्न दैविक तथा दैहिक कष्टों का निदान इन्हीे के द्वारा किया जाता है। (पृ. 51) आँचलिकता की तरंगें सम्पूर्ण उपन्यास में प्रवाहित होती देखी गई हैं।
      शिक्षा के क्षेत्र में छात्रवृत्ति का सबको दिलाना, वितरण व्यवस्था में दोष, जबरदस्त भीलों में शैक्षिक ऊर्जा का संचार, महाविद्यालयीन शिक्षा का स्तर, आत्म विश्वास की क्षमता-दक्षता आदि का भी संकेत मिलता है। दलबदल, घोटाला, घेराव, बन्द, रास्ता रोको, मण्डल-कमण्डल, गुटबाजी, फिरका परस्ती, हड़ताल, भ्रष्टाचार, पक्षपात, भाई-भतीजावाद आदि नारे सिद्धान्त की लड़ाई या देश की प्रगति के लिए नहीं- सत्ता, कुर्सी, स्वार्थसिद्धि, अस्तित्वरक्षा, कुनबा-परस्ती के लिए गढ़े गए हैं- को भी रेखांकित किया गया है जो राष्ट्रीय चरित्र का द्योतक करते हैं। नागराज द्वारा भोले-भीलड़े की मदद करना तथा अन्ततः उसकी पहल पर कुर्राटी मारकर भाग जाने में सफल होना आदि तथ्यों ने नैतिक मूल्यों की स्थापना का संकेत दिया है। नागराज के कानों में मंगल्या बेस्ता के ये शब्द गूंजते रहे कि ‘‘शाब, थोड़ी-सी मदद मिल जाए तो कुर्राटी मारकर हम भी कहीं भी पहुंच जायें।’’ (पृ. 176) सम्प्रति इसी छोटी-सी मदद की समस्त पिछड़े क्षेत्रों में आवश्यकता है जिसके द्वारा गरीबी, अशिक्षा, रोजी-रोजगार, बीमारी, आवासीय समस्या, पानी की समस्या आदि से निजात पाया जा सकता है। यही राष्ट्रीय और प्रादेशिक लक्ष्य प्राप्ति हेतु आवश्यक भी है जिसके द्वारा प्रत्येक शोषित-पीडि़त एवं गरीब व्यक्ति कुर्राटी मारकर अपना व्यवस्थित जीवनयापन कर सके। यही सही मायने में राजधर्म, राष्ट्रधर्म एवं मानवधर्म भी है - यही उपन्यास और उपन्यासकार का अभीष्ट भी है। 
      दूसरी क्रान्ति - ‘डेरा-बस्ती का सफरनामा’ प्राकृतिक सुषमा के सुरम्य हरे-भरे वातावरण के मध्य, विशेष प्रकार की जिन्दगी जीने वाले बांछड़ा समाज में व्याप्त अनैतिक क्रियाकलाप एवं स्त्रियों के दैहिक शोषण और उत्पीड़न पर आधृत कथानक का जीता-जागता साक्ष्य है जिसमें कहा गया है कि यह सामाजिक व्यवस्था का ऐसा अभिशप्त समाज है, जहाँ औरत के लिए देह-व्यापार प्रथा के अनुसार बाध्यता है। यहाँ देह व्यापार या धन्धे पर बिठाने के लिए कोखजाई बेटी की माँ रस्म अदायगी, पिता दलाली तथा भाई येन-केन प्रकारेण व्यापार में मदद करता है। मालवा के लोक जीवन में किसी स्त्री को जलील करने के लिए ‘रामजणी’ और ‘वैश्या’ के बाद जिस उच्चतम विशेषण शब्द का प्रयोग किया जाता है, वह है बांछड़ी। (पृ. 13) समकालीन जीवन और उसकी जटिलताओं का लोकतत्व और लोकजीवन से संदर्भित क्रियाकलापों का अन्वेषण कथाकार ने यथार्थवादी फलक पर किया है। बांछड़ा-समाज में प्रचलित अवधारणाएं, मान्यताएं, रीति-रिवाजों, सामाजिक मर्यादाएं एवं सांस्कृतिक पक्षों को उजागर करते हुए नारी की दयनीय एवं विवश स्थिति को संवेदनात्मक धरातल पर चित्रित किया गया है जिसमें विविध प्रकार की यातनाएं भोगनी पड़ी हैं।
      बाँछड़ा समाज की विकृत संस्कृति, विकृति आकृति एवं प्रवृत्ति को समसामयिक परिवेश में सुधारने की आवश्यकता है, जनजागरण अभियान चलाने की महती आवश्यकता है तथा शासन-प्रशासन एवं समाज को संवेदनशीलता और सहानुभूति के धरातल पर उनके जख्मों पर मरहम लगाते हुए सम्मानपूर्वक जीवन जीने को प्रेरित करना है, प्रोत्साहित करना है एवं उन्हें सहयोग देना है ताकि एक स्वस्थ समाज एवं समरस समाज की स्थापना हो सके- यही युगधर्म भी है। माँ द्वारा अपनी कोख से उत्पन्न बेटी को प्रथा निर्वाह हेतु रखैल रूप में बेच देना और ग्राहक द्वारा छोड़ दिए जाने पर बेटी द्वारा देह-व्यापार की ओर प्रवृत्त होना सामाजिक विकृति और विकृत मानसिकता का परिचायक है। यह तथ्य भी विचारणीय है कि देह-व्यापार की मजबूरी का यह मुद्दा किसी एक जाति-विशेष से नहीं हमारे जीवन-मूल्यों की सांस्कृतिक परम्परा और नारी की आदर्श छवि से जुड़ा हुआ है जो अद्यतन परिवेश में चिंता और चिंतन की अपेक्षा रखता है।
      सामाजिकता और सांस्कृतिक चैतन्यता को एकमेव करने की प्रबलेच्छा ने कथा-सृजनशीलता को प्रभावित किया है। आंचलिक कथा-साहित्य की तनावग्रस्तताओं ने सामाजिकता को बुरी तरह से प्रभावित किया है लेकिन विकृति ने संस्कृति को पूरी तरह ध्वस्त नहीं किया है, अभी आस्था और विश्वास के साथ उनमें बदलाव लाया जा सकता है। कथाकार ने अपने द्वारा उठाए गए जीवित प्रश्न का समाधान इन पंक्तियों में प्रस्तुत किया है- ‘‘उपेक्षित और नाकारा वर्ग को मुख्य धारा से सम्बद्ध करने में दो बिन्दु मददगार हो सकते हैं। पहला धर्म और धार्मिक प्रतीकों के प्रति आस्था, जो प्रकारान्तर से उनमें निहित नैतिक बोध से परिचित कराती है और दूसरा, नई पीढ़ी की युवा महिलाओं में बदनामी के कारागृह से मुक्ति की छटपटाहट।’’ (पृ. 156) परम्परागत मान्यताओं को बाधा और अवरोध न मानकर एक चुनौती के रूप में स्वीकारते हुए परिवर्तनगामी स्थितियों और परिस्थितियों को एक अभियान आन्दोलन का रूप देने की आवश्यकता है।
      शास्त्रीय परम्परा में कथा-साहित्य के छः तत्व माने गए हैं जिनमें कथानक, पात्र और चरित्र-चित्रण, कथोपकथन या संवाद, वातावरण या देशकाल परिस्थिति, भाषा-शैली एवं उद्देश्य हैं। यहाँ तात्विक विवेचन की अपेक्षा समीक्षात्मक विश्लेषण अपेक्षित है। दोनों उपन्यासों की कथाएँ उपन्यासकार के निकटस्थ समाज से उपजी हैं जिसमें समाज के अँचल विशेष को परोक्षतः नायकत्व प्रदान किया गया है। ‘कुर्राटी’ में झाबुआ के आदिवासी युवापीढ़ी भीलों की सामाजिक और शैक्षणिक चेतना को कथानक के रूप में नायकत्व प्रदान किया गया है जबकि ‘डेरा-बस्ती का सफरनामा’ बाँछड़ा समाज का प्रतिनिधित्व करने में सफल रहा है। मानवीय मूल्यों के प्रति आस्था एवं विश्वास तथा सामाजिक बदलाव के प्रति रुचि-रुझान ने कथाकार को आदिवासी भील समाज और बाँछड़ा समाज से संवेदनशीलता के स्तर पर जुड़ने को प्रेरित किया है, प्रोत्साहित किया है जिसकी चरम परिणति इन उपन्यासों की सर्जना में देखने को मिली है।
      इन उपन्यासों में परिवेश के बहुआयामी चित्रांकन के साथ-साथ मानवीय मूल्यों के क्षरण की चिंता भी देखी गई है जो कथाकार की अभिनव उपलब्धि कही जा सकती है। अंचल विशेष की सम्पूर्ण विशिष्टताओं के साथ बोली, त्यौहार, उत्सव, समारोह, लोकगीत, लोकपर्व एवं परिवेशगत जनरीतियों का जीवंत चित्रण निश्चय ही औपन्यासिक प्रवृत्ति का द्योतक सिद्ध हुआ है। अंचल विशेष की समस्या जनसामान्य की समस्या बन गई है तथा प्रकारान्तर से वही राष्ट्रीय समस्या भी है। संक्रमणकालीन स्थिति और परिस्थिति से जूझता हुआ ‘बांछड़ा’ और ‘भील’ समाज धूमिल और दिशाहीन स्थिति से गुजरते हुए सम्प्रति पंकजीवन मुक्ति हेतु व्यग्र है, व्याकुल है क्योंकि आदिवासियों-दलितों पर बेवजह अत्याचार और उनके द्वारा चुपचाप सहते रहने का जमाना अब कोसों दूर पीछे रह गया है। समग्रतः कहा जा सकता है कि कथाकार की अभीष्ट प्राप्ति सामाजिक और सांस्कृतिक चैतन्यता और उससे उत्पन्न विसंगतियों के प्रस्तुतीकरण में निहित है। इन उपन्यासों में सामाजिक और सांस्कृतिक विडम्बनाओं के परिप्रेक्ष्य में आंचलिक परिवेशगत वृत्ति और शक्ति को रेखांकित करते हुए चुनौती भरे प्रश्न उठाए गए हैं जिसके लिए डॉ.सतीश दुबे की प्रज्ञा की अनुशंसा करते हुए उनकी साहित्य-साधना हेतु अनेकानेक धन्यवाद!

  • 8/29 ए, शिवपुरी, अलीगढ़-202001 (उ.प्र.)/मोबाइल: 09897452431



बहस संयोजक :  डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’
सामाजिक-मानवीय परिप्रेक्ष्य में ऑनर किलिंग
साहित्य में कई तरह के सामाजिक सरोकारों को लेकर आन्दोलनात्मक बहसें, चिन्तन और चर्चाएं होती रही हैं। बहस का एक सामाजिक मुद्दा ‘ऑनर किलिंग’ यानी ‘अपने सम्मान की रक्षा के नाम पर परिजनों की हत्या कर देना’है। इस सन्दर्भ में सम्मान से जुड़े जिन कारणों से हत्यायें की जाती हैं, के परिप्रेक्ष्य में इस तथ्य पर विचार किया जाना जरूरी है कि सम्मान का प्रश्न (चाहे जितना भी बड़ा हो) क्या किसी के जीवन से ऊपर हो सकता है? माना कि हमारी सामाजिक व्यवस्था के वर्तमान ढांचे में बहुत सी चीजें स्वीकार्य नहीं हैं और वे किसी परिवार या व्यक्ति के सम्मान को बहुत हद तक ठेस भी पहुंचाती हैं, लेकिन क्या ऐसी चीजों का कोई ऐसा हल नहीं ढूंढ़ा जा सकता कि जीवन सर्वोपरि बना रहे? अविराम साहित्यिकी में ‘बहस’ की दूसरी कड़ी का आरम्भ इसी विषय पर करने का निश्चय करते हुए हमने साहित्यकारों-पाठकों से उनके विचार इन प्रश्नों के सन्दर्भ में आमंत्रित किए थे- 1. समाज के हर तबके का शैक्षणिक व आर्थिक विकास हो रहा है और विभिन्न जाति समूहों के मध्य अन्तर्सम्बन्ध भी विकसित हो रहे हैं, पुरानी परम्पराएं टूट रही हैं और नए मूल्यों के प्रति स्वीकार्यता भी बढ़ रही है, फिर भी ऑनर किलिंग की घटनाएं बढ़ रही हैं। अनुभवों और चिंतन के आधार पर इस परिदृश्य को आप कैसे देखते हैं? 2. विभिन्न जाति समूहों के मध्य बन रहे अन्तर्सम्बन्धों की मिकेनिज्म (प्रक्रिया) आपको कैसी लगती है? कहीं इस मिकेनिज्म की प्रकृति तो ऑनर किलिंग का कारण नहीं बन रही है? 3. सामान्यतः ‘ऑनर किलिंग’ की घटनाओं के मूल में जातियों-समूहों-समुदायों के मध्य की विषमताएं होती हैं। साहित्य इन विषमताओं को आइना दिखाता रहा है। इस दृष्टि से साहित्य इस समस्या के निदान में क्या भूमिका निभा सकता है? 4. समाज के विभिन्न समूहों के पारस्परिक सरोकार और उनमें विकसित हो रही नई व्यवहार दृष्टि के सूत्र ऑनर किलिंग के कारणों का समाधान प्रस्तुत करने में कोई भूमिका क्यों नहीं निभा पा रहे हैं? 5. ‘ऑनर किलिंग’ की घटनाओं को सरकार के स्तर पर कठोर कानून के माध्यम से क्या रोका जा सकता है? आप सरकार की भूमिका को किस तरह देखते हैं? 6. ‘ऑनर किलिंग’ की घटनाओं को रोकने के लिए साहित्यकार के रूप में आप तेजी से बदलते मूल्यों में विश्वास करने वाली नई पीढ़ी की भूमिका को किस प्रकार देखते हैं? 
    प्राप्त विचारों में से जिन चार लेखकों के विचार प्रस्तुति हेतु उपयुक्त लगे, वे यहाँ प्रस्तुत हैं। कुछेक मित्रों ने कुछ और समय चाहा, लेकिन अंक के प्रकाशन में बिलम्ब करना संभव नहीं था। संपादक से बात करके यह विकल्प खुला रखा गया है कि यदि किसी मित्र का आलेख विलम्ब से प्राप्त होता है, तो उसे आगामी किसी अंक में एक सामान्य आलेख के रूप में शामिल कर लिया जायेगा। पर यह चिन्तनीय अवश्य है कि सामाजिक सरोकारों से जुड़े विषयों पर चर्चा के लिए लघु पत्रिकाओं के पाठकों/लेखकों के पास समय की कमी है। क्या लघु पत्रिकाओं को समाज से जुड़ी चीजों पर चर्चा की ओर ले जाने का प्रयास इनके पाठकों और लेखकों को नहीं करना चाहिए? फिलहाल प्रस्तुत है एक महत्वपूर्ण विषय पर प्रतीकात्मक चर्चा।

इन्दिरा किसलय



वोट बैंक की राजनीति शह देती है

औद्योगिक क्रान्ति के बाद महाबली बाजार ने मात्र मुनाफे की भाषा का आविष्कार किया और संचार क्रान्ति ने ग्लोबल विलेज की संकल्पना साकार की। ऐसे में सांस्कृतिक संवाद, आक्रमण और अतिक्रमण होना ही था। इस पृष्ठभूमि पर भारत में कुछ परंपराएँ ध्वस्त हुई, कुछ शिथिल तो कई कुनमुनाती हुई पड़ी रहीं। विभिन्न जाति समूहों के बीच रोटी-बेटी के संबंध बने, जो श्रेष्यकर कहे जा सकते हैं।
    यह संक्रमण काल है। ऑनर किलिंग बदस्तूर जारी है। इसका अर्थ इतना सा है कि समाज में सतह पर जो बदलाव नज़र आता है, वह कुछ ही वर्गों या इलाकों में आया है, सर्वत्र नहीं। दरअसल पूरा समाज एक स्वीकृत मान्यता पर नहीं चलता। उसके कई तल होते हैं। आर्थिक स्तर, जातीय श्रेष्ठता, विरासत का अहं और क्षेत्र विशेष की मान्यताएँ इसे संचालित करती हैं। ऑनर किलिंग को जाति, समुदाय या कबीलों में वर्चस्व की लड़ाई, इलाकाई रंजिश, निजी खुन्नस या वंश, गोत्र, परंपरा के नाम पर जानलेवा अहंकार का प्रफल कहा जाना चाहिए।
     साहित्य से परिवर्तन की आकांक्षा, मेघों से वर्षा की चाह जैसी स्वाभाविक है। पर साहित्य की प्रकृति माचिस की तीली की तरह नहीं होती,कि बाती को छूकर तत्काल उजाला कर दे। सामाजिक परिवर्तन, कछुए की चाल चलते हैं। वर्तमान में जिस स्तर पर साहित्य ने अवसरवाद का झंडा ऊँचा किया है, गंभीर वैचारिकी और सामाजिक प्रतिबद्धता धूल चाटने लगी है।
     बेशक समाज के कई समूहों में विज्ञानवादी व्यवहार दृष्टि और पारस्परिक सरोकार विकसित हुए। पर यह नूतन दर्शन हाफ हार्टेडली अपनाया गया! न पुराने का मोह छूटा न नये का आकर्षण। जैसे कोई युवती जीन्स टॉप और पेंसिल हील वाले सैंडिल धारण करे और पाजेब बिछुए पहनकर मांग में सिन्दूर की लंबी रेखा खींच दे।
     सरकार और कानून किसी भी सामाजिक विकृति को जड़ से नहीं उखाड़ सकते। क्योंकि वोट बैंक की राजनीति ही है जिसकी शह पर ‘खाप’ जैसे संगठन बेखौफ फतवे जारी करते हैं। राज्य सरकारें, दिखावे के लिए, हल्ला मचाकर चुप हो जाती हैं और मीडिया चौबीस घंटे बीन बजाकर रुख बदल लेता है।
     जब तक पंचायतों के माध्यम से गांव किसी भी सत्तारूढ़ पार्टी के हमराज़, हमकदम, हमनिवाला बने रहेंगे, ऑनर किलिंग का खात्मा नामुमकिन है।
     इस सन्दर्भ में नई पीढ़ी की भूमिका, निश्चय ही अहम है। वह चरम व्यक्तिवाद की गिरफ्त में है। कुछ क्रान्तिकारी युवा पहल करना चाहें तो बेबसी उनके कदम रोक लेती है क्योंकि उन्हें पता है कि शहर कोतवाल और चोर की हथकड़ी का नंबर एक है। गांवों में कबीले, कट्टरवाद के तहत लामबन्द होते हैं तथा शहर में पैसा और रसूख बोलता है।
     निष्कर्षतः एकाकी प्रयास से कुछ न होगा। साहित्य, मीडिया, युवा, महिलाएँ, कानून और स्वयंसेवी संगठन मिलकर, समवेत स्वर में प्रयास करें, तो ही परिवर्तन हेतु जमीन तैयार होगी और सड़ी गली मान्यताओं को दो गज जमीन के नीचे दफ्न किया जा सकेगा।

  • 58/101, बल्लालेश्वर मार्ग, रेणुका विहार, रामेश्वरी रिंग रोड, नागपुर-440027(महा.) / मो.: 09371023625 



डॉ.रामकिंकर सिन्हा




जनमानस को तैयार करके ही समाधान संभव है
01. ‘ऑनर किलिंग’ की घटनाएँ इसलिए बढ़ रही हैं कि लोगों में शैक्षणिक एवं आर्थिक विकास तो हो रहा है, पर मानसिक विकास नहीं। स्त्रियों के प्रति हमारा दृष्टिकोण एकदम पुरातन पंथी है। उन्हें हम गुलामों से अधिक कुछ नहीं समझते, उन्हें स्वतंत्रता नहीं दे सकते कि वह अपनी पसंद के लड़के से विवाह संबंध स्थापित कर सके। लड़का दूसरी जाति का हो तब तो यह प्रायः असंभव ही है। झूठे जातीय स्वाभिमान का भाव इतना बढ़ गया है कि पुरुष सत्तात्मक समाज भौतिकता और दिखावे की चकाचौंध में पहले तो आंकलन ही नहीं कर पाता है कि उनकी लड़की की किसी दूसरी जाति के लड़के से घनिष्ठता बढ़ रही है और जब इस संबंध के पराकाष्ठा पर पहुँचने की जानकारी हो जाती है, तो लड़की के घर के अभिभावक हताश होकर उहापोह की स्थिति में लड़की के साथ ‘ऑनर किलिंग’ का अमानुषीय खेल खेलते हैं।
02. विभिन्न जाति समूहों के बीच अन्तर्संबंध की प्रक्रिया मात्र झूठे आत्मसम्मान और भौतिक समृद्धि को लेकर है। मेरी समझ से इसमें स्त्रियों की सामाजिक स्थिति बदले और उनकी भावनाओं का सम्मान हो, इसको लेकर कहीं कोई भाव कार्य नहीं कर रहा है। इसलिए मुझे यह ‘ऑनर किलिंग’ का कारण नहीं लगता है।
03. यह सच है कि साहित्य जातियों-समूहों-समुदायों की विषमताओं को युगों से आइना दिखाता आ रहा है, पर वर्त्तमान में ऐसी प्रवृत्तियों की रफ्तार अत्यन्त धीमी है। साहित्य इस समस्या के निदान में अपनी भूमिका बखूबी निभा सकता है, बशर्तें कि साहित्यकार इस समस्या को केन्द्र बनाकर इसके उन्मूलन हेतु रचनाएँ लिखें, क्योंकि यह पीढि़यों तक चलने वाला कार्य है। खुलापन और व्यक्तियों के मेलजोल तो बदलते परिवेश में रुकेंगे नहीं, उन्हें चिन्तन के स्तर पर ऊँचा बनाने का कार्य साहित्य ही कर सकता है।
04. ऐसा इसलिए नहीं हो पा रहा है कि समूहों के पारस्परिक सरोकार और उनमें विकसित होने वाली नई व्यवहार दृष्टि में ‘ऑनर किलिंग’ कोई विषय है ही नहीं। लोग स्वेच्छाचारी हो गये हैं और नैतिकता तथा सामाजिक दृष्टिबोध के अभाव में इसे कोई सामाजिक समस्या मानता ही नहीं। लोग सोचते हैं कि जिसकी समस्या है वही इसका समाधान भी खोजे, हम व्यर्थ में इस पचड़े में क्यों पड़ें? इसका नतीजा यह होता है कि ये समस्या जिनपर भी पड़ती है वे आनन-फानन में झूठे आत्मसम्मान की रक्षा के लिए विक्षिप्तों की तरह ‘ऑनर किलिंग’ का अत्यन्त दारुणकृत्य कर बैठते हैं।
05. हर्गिज नहीं। आज तक कानून के माध्यम से किसी भी सामाजिक समस्या का निदान नहीं हुआ है जिसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण दहेज रोकने के लिए बने कानून हैं। सरकार समाज को विश्वास में लेकर ही ऐसी समस्याओं पर अंकुश लगाने के बारे में सोच सकती है। जब तक बैठकों, विचार गोष्ठियों, सभाओं, सेमिनारों, आंदोलनों आदि के माध्यम से जनमानस को तैयार नहीं किया जाता तब तक कोई भी सरकार इतने नाजुक विषय को छूने की भी हिम्मत नहीं कर सकती।
06. आज के तेजी से बदलते मूल्यों में विश्वास करने वाली नई पीढ़ी की भूमिका इस संबंध में अत्यन्त उदासीन है। नई पीढ़ी के सामने बस उनका अपना खुद का भविष्य है कि पढ़-लिख कर हजारों-लाखों रुपयों का पैकेज़ मिल जाए जिससे वे वैभव-विलास से भरपूर जीवन बिता सकें। नई पीढ़ी को इससे कोई मतलब नहीं है कि कौन क्या है? किस समस्या का कैसे समाधान हो सकता है? इसका कारण यह है कि उसका सामाजिक और नैतिक स्तर अत्यन्त सामान्य है और चूँकि वह वर्त्तमान शिक्षा-पद्धति की उपज है जहाँ भौतिक समृद्धि और व्यक्तिगत सफलता पाने के लिए आदमी कुछ भी कर सकता है, पर नैतिक शिक्षा, सामाजिक शिक्षा और मानवीय संवेदनाओं से शून्य पीढ़ी के पास इतनी ऊँची सोच कहाँ कि वह ऐसी घटनाओं के बारे में कुछ सोचे, विचारे और करे।

  • सनशाइन प्ले एंड पब्लिक स्कूल, ब्लॉक रोड, पेटोल पंप के पीछे, पो. जपला, जिला पलामू-822116,झारखंड / मो. 07631146532



कविता विकास




शिक्षा का अभाव बड़ी सीमा तक जिम्मेवार है 

समाज के तथाकथित ठेकेदार जिन्होंने समाज का ठेका ले रखा है, अपने सम्मान की रक्षा में कुछ भी करवा सकते हैं। अमानवीय अत्याचार तो इनके लिए बहुत छोटी बात है और किसी की जान लेना कोई बड़ी बात भी नहीं। एक समय में सामंतवादी प्रथा का इतना दबदबा था कि अपनी साख बनाये रखने के लिए ये पूरा का पूरा क़स्बा मिटा डालते थे पर झुकने या समझौता करने जैसी कोई बात इनके शब्दकोश में नहीं होते थे। समय बहुत बदला। गुलामी की ज़ंजीरें टूटीं। पर कुछ स्थानों में अपने नियम-क़ानून आज भी चलते हैं। उनके लिए न्यायालय बहुत दूर हैं। समाज के ऐसे वर्ग देश की मुख्यधारा से कटे हुए हैं। उनमंे शिक्षा का घोर अभाव है। निम्न जातियों में भी जो सबसे उच्च हैं वो अपना दबदबा  कायम रखने के लिए कभी अंतर्जातीय विवाह नहीं पसंद करते। इससे वे अपनी मांन्यताओं या परम्पराओं को विखंडित होना मानते हैं। मूल कारण इनके पीछे फिर वही है, यानी अज्ञानता, विचारों के परस्पर आदान-प्रदान का अभाव और क्षेत्र विशेष की व्यवस्था में आमूल परिवर्तन को अपनाने से दूर भागना। सूचना का अधिकार इन भूभागों में पहुँचा ही नहीं। स्वयं सेवी संस्थाएं भी इन तक नहीं पहुँचती जब तक की कोई हादसे की खबर सार्वजनिक न हो जाए। वीरभद्र की घटना को ही लीजिये। विजातीय लड़के से प्रेम करना इतना बड़ा अपराध माना गया कि लड़की को पूरे पंचायत के सामने नंगा खड़ा कर पीटा गया और साथ में गाँव के बड़े-बुज़ुर्गों के सामने उस लड़की से सामूहिक बलात्कार करने का फैसला सुनाया गया। प्यार करने का अपराध किसी भी कीमत पर लड़की की जान से बड़ा नही था। ऑनर किलिंग का एक और हालिया घटना बोकारो के निकटवर्ती गाँव से जुड़ा हुआ है। मामला अंतर्जातीय विवाह का और फैसला मानवता की सारी हदों को पार करता हुआ बेहद संवेदनशील। लड़की के भाई को आदेश दिया गया कि वह लड़के की बहन का रेप करे। भला ऐसी सज़ाएँ कानून की किस किताब में लिखी हैं? पिछले दिनों ओडि़सा की एक जनजाति में 18 साल की युवती के गर्भवती होने की सूचना आयी और पंचायत ने उस अविवाहित युवती को नंगे बदन गाड़ी से बाँध कर कई किलोमीटर तक सड़क पर खिंचवा डाला। अंततः उसकी मृत्यु हो गयी। इन सभी घटनाओं में एक बात कॉमन है, वह यह कि ये सभी गाँव-देहात में बसने वाली पिछड़ी जातियों में ज्यादा प्रचलित है। ज़ाहिर है, उन इलाकों में शिक्षा का घोर अभाव है। साहित्य की बातें तो साधारण पढ़े-लिखे परिवारों में भी नहीं समझा जाता है, फिर इन कस्बों में भला कौन समझेगा। ज़रुरत है इनमे जागरूकता लाने की। वह भी मोटी-मोटी पोथियों से नहीं, हलके-फुल्के संवादों से। नुक्कड़ नाटक, नौटंकी या चौपाल के माध्यम से जागरूकता लाने की पहल करनी होगी। हरियाणा के ग्रामीण इलाकों में प्रचलित खाप व्यवस्था भी अंतर्जातीय  प्रेम प्रसंग को अपने सम्मान से जोड़कर देखता है और ऐसी घटनाएं जब तक राष्ट्रीय समाचारों का हिस्सा बनतीं हैं, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। उन जोड़ों को कुसूरवार ठहराते हुए अपमानित किया जाता है और कठोर सज़ाएं दी जातीं हैं।
     ऑनर किलिंग का आधार जातीय संकीर्णता रही है। विभिन्न समाज सुधारकों द्वारा इसके उन्मूलन के प्रयास किये गए, पर यह अब भी कायम है। जातीयता और अपने मापदंडों से परे कोई काम इनकी आन, बान और शान पर बट्टा लगने जैसा है। इसलिए ये अनुचित और अनैतिक कार्य करते हैं। यह निश्चित है कि जब तक जातीय संकीर्णता रहेगी, तब तक समाज में जाति-पाँति, छुआछूत, ऊँच-नीच आदि की भावना व्याप्त रहेगी। एकता, समानता और हम की भावना का अभाव रहेगा। सरकार को जातीयता के नाम पर हो रहे भेदभावों को दूर करने के लिए यथासंभव कदम उठाने होंगे, नयी क़ानून व्यवस्था बनाकर उनका कड़ाई से पालन करना होगा। कबीर ने आज से दो सौ साल पहले समाज की बुराइयों की जड़ संकीर्ण जातीयता बताई थी, इसलिए उसने, ‘‘जाती पाँति पूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई’’ कहकर जातीयता को ख़त्म करने की चुनौती दी थी। एक साहित्यकार का आयाम बहुत विस्तृत होता है। वह अपनी कलम को तलवार बना कर समाज के उक्त ठेकेदारों की सोच को बदल सकता था। अपनी लेखनी के माध्यम से जाति व्यवस्था का विरोध करते हुए उन्नति के मार्ग को प्रशस्त कर सकता है। ऋग्वेद की एक उक्ति में कहा गया, ‘‘पुरान पुमासं परि पातु विश्वत।’’ भारतीयों को अधिकार और सामजिक न्याय दिलाने का संघर्ष प्राचीन है। शिक्षा का समान अधिकार वैदिक काल में था जो मुग़ल काल में नगण्य हो गया। 1908 ईस्वी में मालवरी द्वारा स्थापित सेवा सदन सोसाइटी तथा 1914 ईस्वी में वुमन मेडिकल सर्विस संस्था आदि ने शिशु स्वास्थ्य, मातृत्व की प्रगति और विधवाओं को नौकरियाँ दिलाने जैसे प्रशंसनीय कार्य किये। ज़मींदारी उन्मूलन का निर्णय एक क्रांतिकारी कदम था। पर देश के आंतरिक भागों में पंचायत या खाप के फैसले अब तक मान्य हैं। पंचायती राज के अंतर्गत स्थानीय स्वयंसेवी संस्थाएं छोटी-मोटी समस्याओं को सुलझाने में कामयाब हैं। लेकिन इन्हें अपने स्तर से उठकर थोड़ा लचीला और व्यापक होना होगा। शादी-विवाह जैसे मामलों में जहाँ अंतर्जातीय सम्बन्ध बनाने की बात आती है, इन संस्थाओं को निजता से परे संबंधों की गरिमा पर ध्यान देना होगा। एक मज़बूत क़ानून व्यवस्था के तहत पंचायतों के अमानवीय निर्णयों को पूरी तरह ख़त्म कर देनी चाहिए।  
     मानव अधिकार प्राकृतिक है। समस्त व्यक्तियों को समाज में प्रतिष्ठा के साथ जीवन यापन के मौलिक अधिकार मिलने चाहिए। एक कल्याणकारी राष्ट्र के लिए धर्म, संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र में लिंग, जाति या भाषा में भेदभाव नहीं  होनी चाहिए। इन विषमताओं को दूर कर मनुष्य को उसका मौलिक अधिकार देना चाहिए क्योंकि अधिकार ईश्वर प्रदत्त है न कि मानव प्रदत्त।

  • डी.-15, सेक्टर- 9, पो.ओ. कोयलानगर, जिला धनबाद-826005, झारखण्ड / मो. 09431320288


विनोद सागर




मूल्यों में बदलाव की इच्छुक नई पीढ़ी ही उदासीन है
01. ‘ऑनर किलिंग’ की घटनाएँ इसलिए बढ़ रही हैं कि लोगों में आज के इस शैक्षणिक परिवेश में भी झूठे आत्मसम्मान की मानसिकता हावी है। आज भी लोग पूर्वाग्रहों से इस कदर ग्रसित हैं कि वे खुद को स्वयंभू भूमिका में देख रहे हैं। यही कारण है कि वे नयी विचारधारा वाली नई पीढि़यों के साथ सामंजस्य स्थापित नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि उनके मन में यह विचार घर कर गया है कि अगर वे नई पीढि़यों को साथ लेकर चलेंगे, तो उनकी सदियों से बरकरार प्रतिष्ठा एक पल में ध्वस्त हो जाएगी। इसलिए जब भी उनके घर की लड़की अपने पसंद के लड़के के साथ जीवन-यापन करना चाहती है, तो वे अपनी झूठी शोहरत को बरकरार रखने हेतु आनन-फानन में उस लड़की के साथ ‘ऑनर किलिंग’ जैसा अमानवीय व्यवहार कर बैठते हैं।
02. विभिन्न जाति समूहों के बीच अन्तर्संबंधों की मिकेनिज़्म (प्रक्रिया) मुझको कागज के बने उस गुलाब की तरह लगता है जो खूबसूरत रहने के बावज़ूद खुशबू से रहित होता है। आज जितने भी अन्तर्सम्बंध स्थापित हो रहे हैं सब के सब भौतिकवादिता में लिप्त हो रहे हैं। हाँ यह काफी हद तक सच है कि विभिन्न जाति समूहों के बीच अन्तर्संबंधों की प्रक्रिया झूठे आत्मसम्मान और विलासिता से ऊपर उठकर जब विवाह जैसी पवित्र संबंध का रूप लेना चाहती है तब यही घनिष्ठता ‘ऑनर किलिंग’ का कारण बन जाता है।
03. हाँ यह सौ फीसदी सच है कि साहित्य जातियों-समूहों-समुदायों की विषमताओं को युगों से आइना दिखाता आ रहा है, पर वर्त्तमान में ऐसी प्रवृत्तियों की रफ्तार अत्यन्त धीमी ही नहीं, बल्कि विलुप्ति के कगार पर है, क्योंकि आज का साहित्य पूँजीपतियों के घरों में बन्धक बनकर रह गया है। आज का साहित्य बाजारवाद की भाषा बोल रहा है। आज उसे ‘‘मुन्नी बदनाम हुई’’ और ‘‘उलाला-उलाला’’ करके लाखों कमाने से फुर्सत कहाँ कि वह ‘ऑनर किलिंग’ जैसी गंभीर समस्या के निदान को अपना उद्देश्य बना सके।
04. समूहों के पारस्परिक सरोकार और उनमें विकसित होने वाली नई व्यवहार दृष्टि में ‘ऑनर किलिंग’ के कारणों का समाधान प्रस्तुत करने में कोई भूमिका इसलिए नहीं निभा पा रहे हैं कि वे यह सोचते हैं कि जिनकी यह समस्या है वही इसका निदान भी खोजेें। हम क्यों इस पचड़े में पड़कर अपना माथा खराब करें या बिन मोल की लड़ाई अपने जिम्मे लें?   
05. बिल्कुल ही नहीं। आज तक सरकार के स्तर पर कानून के कठोर नियमों के माध्यम से किसी भी सामाजिक समस्या का निदान ना तो कभी हुआ है और ना ही भविष्य होता हुआ प्रतीत हो रहा है। आज भी दहेज एवं भ्रूण-हत्या जैसी मूलभूत समस्याएँ यथावत् खड़ी है। अगर सरकार कानून के मार्फत इस पर अंकुश लगाना चाहती है, तो सर्वप्रथम उसे उनकी सामाजिक मनःस्थितियों के दौर से गुजरना होगा और समाज के उन लोगों को विश्वास में लेना होगा जो ‘ऑनर किलिंग’ को ही समस्या का निदान समझते हैं। 
06. ‘ऑनर किलिंग’ की घटनाओं को रोकने के लिए साहित्यकार के रूप में हम तेजी से बदलते मूल्यों में विश्वास करने वाली नई पीढ़ी की भूमिका को उदासीनता के रूप में देखते हैं, क्योंकि आज की युवा पीढ़ी को बस अपने कैरियर का ख्याल रह गया है। उसका इन सामाजिक सरोकारों से कोसों तक कुछ भी लेना-देना नहीं है और इसका सबसे बड़ा कारण है उनके पाठ्यक्रम से नैतिक शिक्षा का विलुप्तीकरण। आज के मध्यम वर्ग के कुछ युवा प्रेम-विवाह जैसी गतिविधियों में तो रूचि दिखाते हैं, पर सामाजिक रूढि़वादियों के मकड़जाल के कारण वे ‘ऑनर किलिंग’ का शिकार होते जा रहे हैं।

  • सागर निवास, कुम्हार टोली, पो. जपला, जिला पलामू-822116, झारखंड / मो. 09905566775

बुधवार, 26 अगस्त 2015

अविराम विमर्श

अविराम  ब्लॉग संकलन :  वर्ष : 4,  अंक : 07-12,  मार्च-अगस्त 2015 


।।अविराम विमर्श।।


सामग्री :   इस अंक में दो साक्षात्कार-  राज हीरामन के आने का अर्थ :  डॉ. सतीश दुबे (मॉरीशस के प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री राज हीरामन के साथ अनौपचारिक भेंटवार्ता पर आधारित) तथा अनुवाद राष्ट्र-सेवा का कर्म है :  डॉ.शिबनकृष्ण रैणा (सुप्रसिद्ध समालोचक प्रो. जीवन सिंह के साथ बातचीत पर आधारित)




मॉरीशस के बहुआयामी सृजनधर्मी राज हीरामन द्वारा आकस्मिक भेंट : कम समय लम्बी गुफ्तगू
राज हीरामन के आने का अर्थ :  डॉ. सतीश दुबे

{इस वर्ष के आरम्भ में मॉरीशस के वरिष्ठ साहित्यकार श्री राज हीरामन अपनी भारत यात्रा के दौरान इन्दौर भी गए और 02 जनवरी 2015 को  लघुकथा के पुरोधा आद. डॉ.सतीश दुबे साहब से उनके आवास पर मिले। इस मुलाकात के अनुभवों और बातचीत पर आधारित यह संस्मरणात्मक आलेख रिश्तों और अपनेपन की खुश्बू तो बिखेरता ही है, इसमें एक वरिष्ठतम साहित्यिक, जो जीवन के पिचहत्तरवें पायदान पर खड़ा होकर पच्चीस से पचास के मध्य वाली ऊर्जा उत्सर्जित कर रहा है, का आत्मिक अहसास भी शामिल है।} 

      मॉरीशस में फ्रेंच, अंग्रेजी और राजभाषा क्रोआल के बहुप्रचलित दबाव के बावजूद भारत से जाकर बसे जनसमुदाय ने अपनी भाषा और संस्कारों को पितामहों द्वारा प्रदत्त धरोहर के रूप में कायम रखा है। गिरमिटिया मजदूर के रूप में बिहार से ले जाये गये भारतीयों का उन्हीं में से एक महत्वपूर्ण वर्ग है। भोजपुरी और हिन्दी के प्रति-आत्मीय ललक को ये अपने पुरखों की याद मानते हैं।  
         

    पारस्पारिक संवाद के अतिरिक्त हिन्दी भाषा के विकास और साहित्य-सृजन मॉरीशस के बौध्दिक-वर्ग के जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। बरसों से हिन्दी भाषा की करीबन सभी विधाओं में लेखन की प्रक्रिया अद्यतन पूरी क्षमता के साथ जारी है। इस क्षेत्र में वैसे तो अनेक रचनाकारों की लम्बी सूची बनाई जा सकती है किन्तु प्रसंगवश इतना लिखना पर्याप्त होगा कि भारत के साहित्य-जगत में फिलवक्त जिस त्रयी को विषेष याद किया जाता है वह है अभिमन्यु अंनत, रामदेव धुरंधर तथा राज हीरामन।  
     इस त्रयी में सक्रिय युवा पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर रहे राज हीरामन ने विगत कुछ वर्षों के दौरान अपनी रचनात्मक एवं आत्मीय खुशबू के माध्यम से भारत के हिन्दी साहित्य जगत में विशेष पहचान बनाई है। अपने देश में हिन्दी भाषा के लिए दृढ़ संकल्पित राजजी महात्मा गांधी संस्थान के सृजन-लेखन विभाग में हिन्दी पत्रिका ‘वसंत’ तथा बच्चों की चहेती ‘रिमझिम’ के वरिष्ठ उप सम्पादक हैं। हालिया प्रकाशित कविता-संग्रह ‘नमि मेरी आँखें’ और कहानी संग्रह ‘बर्फ सी गर्मी’ सहित दस कविता-संग्रह, तीन कहानी संग्रह, दो लघुकथा संग्रह, एक एक साक्षात्कार-लेख संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। इसके अलावा कुछ महत्वपूर्ण अंग्रेजी-हिन्दी पुस्तकों का इन्होंने सम्पादन भी किया है। 
     विगत कुछ वर्षों से निरन्तर या अंतराल के पश्चात् अपने भारत बुलावे प्रवास के दौरान वे मालवा के इस शहर इन्दौर को बिना किसी आयोजन समारोह के तयशुदा या संभावना के याद रखते हैं। वे यहाँ आना अपनी घरेलू यात्रा मानते हैं। कारण, हिन्दी भाषा की अस्मिता, उन्नयन तथा विशिष्ट स्थान के लिए अहर्निश संघर्षरत हिन्दी सेवी श्रीधर बर्वे द्वारा इसीके मुत्तालिक प्रथम पायदान पत्र-संवाद परिचय का पारिवारिक आकार में तब्दील होना। इन्हीं बर्वेजी के माध्यम से राज ने मुझसे पाँच सात वर्ष पूर्व मिलने की इच्छा जाहिर की और कालांतर में लघुकथा लेखन के लिए ‘टिप्स’ प्राप्त कर उन्हीं के शब्दों में ‘गुरू’ बनाने का आग्रह। बहरहाल उनकी इच्छा पूरी हुई। मेरे द्वारा सुझाये शीर्षक ‘कथा संवाद’ का प्रकाशन व इसी शहर में लोकार्पण की मंशा के साथ उनका देश के अन्य मित्रों की तरह मुझसे भी रिश्ता कायम हो गया। 
     एक जनवरी उन्नीस सौ तिरपन को जन्में राज संयोग से नये वर्ष के आगाज और अपने जन्म के इर्द-गिर्द हमारे परिवारों के बीच होते हैं। इसी महफिल में यह प्रश्न उठने पर उनका प्रत्युत्तर होता है- ‘‘मैं आता नहीं हूँ पुरखे आशीर्वाद देने अपनी भूमि पर आने के लिए प्रेरित करते हैं।’’  वैसे तो हर बार उनके पूरे कार्यक्रम की रूपरेखा पूर्व निर्धारित होती है किन्तु इस बार ऐसा नहीं हुआ। 2 जनवरी 2015 को सूरज के क्षितिज लौटते समय बर्वेजी का फोन आया- ‘‘राज हीरामन आए हुए हैं और आपसे मिलने आधे घंटे बाद आ रहे हैं।’’ और सचमुच निर्धारित समय पर एअरपोर्ट टू एअरपोर्ट फ्लाइट या भारतवासियों की निगाह से दूर कारों में यात्रा करने वाले राज हीरामन, सर्दी के कपड़ों में लकदक मुस्कुराते हुए टू-सीटर ऑटो रिक्शा से उतरकर तेज कदमों की मद्धिम गति से सम्मानजनक अभिवादन के साथ मेरे सामने थे। 
     अपने किंचित भारी-भरकम शरीर को सोफे पर व्यवस्थित करने तक उनके चेहरे पर हम दोनों की ओर मौन देखते हुए जो आत्मीय-भाव फूलों की तरह झर रहे थे उसकी खुशबू को व्यक्त करना कठिन है। बार-बार यही विचार कौंध रहा था कि जेहन में बसे संस्कार और सहजता ही व्यक्ति को निरन्तर ऊँचाइयाँ छूने के लिए ऊर्जा प्रदान करते हैं। 
     आधुनिकतम प्रत्येक प्रकार के बेहतरीन चिकित्सा के बावजूद आँतों की असह्य व्याधि से जूझते हुए पत्नी के चले जाने के वियोग से जूझते तथा दोनों बेटियों निधि तथा नेहा द्वारा शादी कर पेरिस तथा लंदन में ‘नीड़’ बना लेने के बाद अपने अकेलेपन को साहित्य सृजन से राजजी ने सम्बद्ध कर नियमित लेखन के पुराने क्रम को जारी रखने का मन बनाया। लेखन की इसी संदर्भ में नए प्रकाशन की टोह लेने के लिए किए गए प्रश्न के प्रत्युत्तर में खुशी का इजहार करते हुए हीरामन बोले ‘‘मंदिर में चढ़ाने के लिए प्रसाद के बिना कैसे आ सकता हूँ।’’ और उनके संकेत पर बर्वेजी ने दो पुस्तकें निकालकर हाथों में थमा दी। सोफा से खड़े होकर प्रथम पृष्ठ पर आदर भाव शब्दों में पिरोई गई जो दो पुस्तकें भेंट की, वे अलग-अलग विधाओं याने कविता और कहानी की।  
     ‘‘प्रसाद के बदले मेरी ओर से अभिनंदन और शुभकामनाओं के साथ तिरयासी ताजातरीन फूलों का यह गुलदस्ता सर्वप्रथम आपके लिए’’ मैंने एक दो रोज पूर्व ही प्राप्त लघुकथा संग्रह ‘ट्वीट’ की प्रति भेंट करते हुए कहा। 
    ‘नमि मेरी आँखें’ करीब सत्तर कविताओं को समेटे हुए है तथा ‘बर्फ सी गर्मी’ दस कहानियों को। कविता संग्रह में ‘अपनी बात’ से जाहिर है कि निजी पारिवारिक टूटन के मानसिक बिखराव को समेटने की शुरूआत इन कृतियों से हुई है- ‘‘मैंने पिछले साल से लिखना प्रारम्भ किया था। इस पुस्तक के नामकरण से लेकर अंतिम कविता तक मैं लड़ता, पटका-पटकी तथा अपने से संघर्ष करता आ रहा हूँ। कभी मेरी आँखें नमि किन्तु अंत में जीत नमि मेरी आँखों की ही हुई। इसमें मेरी स्वर्गीय पत्नी का नाम सबसे पहले आता है। वही तो है मेरी कविता की मेरी प्रेरणा। वही तो हमेशा से मुझे शिखर पर बुलंद देखने की इच्छा करती रही थी।’’  
    ‘बर्फ सी गर्मी’ राज हीरामन के पिछले दो कहानी संग्रहों की तुलना में मुझे बेहतर लगा। देश-विदेश के अनुभवों की हकीकतों से बुनी गई ये कहानियाँ कथ्य ही नहीं भाषा-शिल्प और सम्प्रेष्य स्तर पर प्रभावित ही नहीं याद रखे जाने के लिए भी विवश करती है। 
     धन्यवाद आभार और शुभकामनाओं के शब्दों के साथ दोनों ही संग्रह प्राप्त कर प्रथम दृष्टया पृष्ठ पलटते हुए आवरण अंतिम पर दृष्टि स्थिर करते हुए भरपूर खुशी का इजहार करते हुए मैंने कहा-‘‘राजजी परिचय के साथ आपका यह नेकटाई-सुटेड चित्र तो पहली बार किसी पुस्तक पर देखने को मिल रहा है।’’ प्रत्युत्तर में उसी अंदाज में राज बोले- ‘‘यह लंदन एअरपोर्ट पर बेटी नेहा और दामाद अन्थोनी के साथ लिए गए ग्रुप से पब्लिशर द्वारा अपनी पसंद से स्केच किया गया है।
     इसी संस्मरण आलेख की पिछली कुछ पंक्तियों में ‘मंदिर’ और ‘प्रसाद लाने’ का उल्लेख किया गया है। इन शब्दों की अन्तर्कथा यह है कि- कुछ वर्षों पूर्व प्रकाशित ‘कथा संवाद’ और ‘सेवाश्रम’ के दौरान करीब एक सप्ताह तक राज हीरामन का सानिध्य इन्दौर नगर के साहित्यिक जगत को मिला। तभी साहित्य के विभिन्न पक्षों पर संवाद तथा रचनाकारों को मंच प्रदान करने के लिए स्थापित ‘सृजन-संवाद’ के मित्रों द्वारा प्रस्तावित सम्मान के अनुरोध को राजजी ने इस शर्त पर स्वीकार किया कि वह पारिवारिक और आत्मीय स्तर पर मेरे निवास को ‘लघुकथा मंदिर’ की मानद उपाधि प्रदान की। अपने पत्रों के पते में भी वे तभी से इसका उपयोग करते हैं। 2015 के आगाज आगमन पर संस्था की पंजिका के प्रारम्भिक पृष्ठ पर राजजी ने बतौर शुभकामना लिखा- ‘‘02.01.2015/ लघुकथा मंदिर,/सुदामानगर,/इन्दौर’’
     मेरे यहाँ मॉरीशस के लोग नववर्ष के अवसर पर खासकर पहली जनवरी को मंदिर जाते हैं। गंगा तालाब जाते हैं। स्वास्थ्य की कामना करते हैं। ईश्वर से आशीर्वाद लेते हैं। लोगों के स्वास्थ्य और खुशी की कामना करते हैं। मैं इस ‘लघुकथा-मंदिर’ में नववर्ष पर लेखन उर्जा लेने आया हूँ। दूर-दूर मॉरीशस से चलकर। ‘सृजन संवाद’ के लिए कामना करते हुए आश्वस्ति होना चाहता हूँ कि आपकी साहित्यिक गतिविधियाँ तेजी से होती रहे। आप स्वस्थ्य रहे और लेखन के लिए अधिक सक्षम होवें। बस इतना ही। मेरा, मंदिर आना, विराम नहीं लेगा। बस मुझे पुकारते रहिए। शुभकामनाओं सहित - राज हीरामन, 02.01.2015 सुदामा नगर, इन्दौर 
     
हिन्दी भाषा की दशा दिशा के सन्दर्भ में देश के बौद्धिक वर्ग विशेष के लिए राज हीरामन जैसे विदेशों में बसे हिन्दी रचनाकार इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि वे हिन्दी को तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद जन-जन से जोड़ने के लिए विभिन्न मोर्चों पर कटिबद्ध हैं। चर्चा में ऐसे ही प्रसंग बिन्दु उभरने पर राज हीरामन की टिप्पणी थी कि ‘‘हिन्दी ही नहीं भारतीय जीवन शैली भी हमारे लिए पुरखों की देन है। इसको बनाए रखने के लिए हम ललक भरी निगाहों से भारत की ओर आदर्श के रूप में देखते हैं। किन्तु पिछले कुछ वर्षों से भारत में जो बदलाव आ रहा है, वह हमारे आदर्श के लिए निराशाजनक है। भाषा और सम्बन्धों के जो चित्र आप भारत में देख रहे हैं वे ही हम मॉरीशस में। आप हिन्दी को मान दीजिए हम दुगुना आपको लौटायेंगे।’’

     लेखकीय रचनाप्रक्रिया के बारे में राज हीरामन का यह मानना है कि लेखन की शक्ति उसके कथ्य की विश्वसनीयता भावों का मंथन और प्रभावी सम्प्रेषणीयता है। जो रचना पूरा आकार लेने के बाद पहले पाठ में हमारे अन्तर्मन से स्वीकृति प्राप्त कर ले, हमारा विश्वास है वह पाठकों द्वारा निश्चित सराही जायेगी ।
     ‘‘ऐसी ही अनेक बातें आपने राजेन्द्र परदेसी की द्वारा लिए गए साक्षात्कार में विस्तार से कही है। आपका यह पूरा साक्षात्कार मैंने उमेश महादोषी की पत्रिका ‘अविराम साहित्यिकी’ में पढ़ा था।’’
     ‘अविराम साहित्यिकी’ का जिक्र आने पर कुछ देर पूर्व मेरे पास आने वाली पत्रिकाओं को देखकर टेबल पर
रखे अम्बार में से ‘अविराम साहित्यिकी’ निकालकर बर्वेजी को बताते हुए वे बोले- ‘‘मेरे विचार से यह एक ऐसी पत्रिका है जो कम पृष्ठों में हिन्दी के सम्पूर्ण लेखन और नए पुराने रचनाकारों से परिचित कराती है। ऐसी पत्रिका में अपना साक्षात्कार देखकर मुझे खुशी हुई। यह एक बाजारवादी नहीं साहित्यिक पत्रिका है।’’

     इसी बातचीत के दौरान संयोग से नववर्ष की शुभकामना का संदेश देने के लिए मेरे मोबाइल पर उमेशजी की रिंग-टोन बज उठी। चंद क्षणों में पूरे ताजा दृश्य का बखान कर मैंने संदर्भ देते हुए मोबाइल राजजी की ओर बढ़ा दिया।’’ हम आपकी और पत्रिका की ही चर्चा कर रहे थे।’’ प्रारम्भिक शब्दों के साथ कुछ मिनिट मुस्कुराते हुए ऐसे बतियाते रहे मानो उमेश महादोषी सामने ही बैठे हो। समापन के साथ उनके द्वारा फोन मेरी ओर बढ़ाया था कि कुछ मिनिटों में फिर आवाज घर्रघर्रा उठी। नीमच से बड़ी बेटी सुषमा का फोन था इसलिए उपेक्षा की बजाय ‘‘अपने घर मॉरीशस से हीरामन अंकल आए हैं।’’ मेरा पूरा परिवार ही हीरामनजी से परिचित होने के कारण उसे बहुत प्रसन्नता हुई। आत्मीयता से लबरेज ‘‘कैसी हो बेटी?’’ सम्बोधन के साथ पारिवारिक स्तर की बातचीत खत्म कर पूरी हंसी बिखेरते हुए राज बोले- ‘‘बच्चों से बातें करने के लिए अधिक से अधिक समय भी कम महसूस होता है।’’
     मैंने बर्वेजी को बताया कि हीरामनजी के शिक्षा काल मित्र भी नीमच में है। 
    ‘‘हां गांधी। वह मेरा रूम-मेट था। पिछली बार आप लोगों ने बीमार हीरामन को यहां अस्पताल में एडमिट किया था। तब वह मुझसे मिलने आया था। हमेशा उससे मिलने का सोचता हूँ पर प्रोग्राम नहीं बन पाता। बात होती है पर मुलाकात नहीं होती।’’
    आतिथ्य सत्कार के लिए महफिल से न जाने कब उठ कर चली गई श्रीमती दुबे ने नाश्ते की ट्रे रखते हुए कहा- ‘‘भाई साहब, बातों के साथ थोड़ा ये नाश्ता भी लेते जाइए तब तक मैं कुछ गरम बनाकर लाती हूँ।’’
     ‘‘इस बार कुछ नहीं किसी को मिलने का समय दिया है उनके साथ घर जाना है। खाना भी वहीं है। बर्वेजी किशन को कितने बजे बुलाया है?’’
     यहां मनोरमागंज में प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. वर्मा हैं। उनकी लड़की मॉरीशस में है। घरेलू सम्बन्ध हीरामन का आगमन याने खैर-समाचार, तोहफा या अन्य वस्तुओं का आदान-प्रदान। इन्दौर इस मायने में भी राज हीरामन के लिए कार्यक्रम की वजह बन जाता है।
     कुछ देर और सानिध्य प्राप्त करने की दृष्टि से मैंने कहा- ‘‘हमारे इस सुदामानगर में अलग-अलग विधाओं के श्रेष्ठ लेखक हैं।  आप जैसी हस्ती से यदि किसी का मिलना हुआ तो दोनों के लिए नया वर्ष याद रहेगा।’’ घड़ी की ओर निगाह घुमाते हुए हीरामन बोले- ‘‘कविता से हमें विशेष लगाव है। वेद हिमांशुजी से आपके फोन आवाजाही में बात हो ही गई है। एक और किसी कवि को पाँच-दस मिनिट के लिए बुला लीजिए।’’ 
     ‘‘यहाँ निकट ही युवा कवि अरूण ठाकरे रहते हैं। पिछले महीनों पूर्व ही उनका कविता संग्रह आया है। और आते ही प्रतिष्ठित साहित्यकारों जिनमें नामित कवि सम्मिलित है, सराहा गया। विशेष बात यह कि पिछली बार आपके मित्र रामदेव धुरंधर यहां आए थे, तब उन्होंने भी इनकी कविताओं को सुना, सराहा तथा यह इच्छा प्रकट भी कि संग्रह प्रकाशित होने पर उन तक भिजवाने की व्यवस्था करें।’’
     अरूण ठाकरे से मुलाकात तथा प्रथम कविता संग्रह ‘कविताएँ’ प्राप्त कर अत्यधिक प्रसन्न हुए। यही नहीं मित्रों के आग्रह पर सम्मानित करने के रूप में उसका विमोचन भी किया। व्यवसाय से भवन निर्माता होने की बात सुनकर वे बोले- ‘‘कविताओं को देखकर लगता है जैसे आप शब्दों का भवन ही नहीं, उसमें रहने वालों के चित्र भी अच्छे बनाते हैं।’’ प्रतिक्रियात्मक टिप्पणी के साथ पुस्तक पर कविता सुनाने का मंतव्य प्रकट कर, राज हीरामन उठने की मुद्रा में सोफा से हिलने-डुलने लगे। 
    ‘‘कार से आया हूँ। आप जहां कहेंगे छोड़ दूँगा। इस बहाने आपसे कुछ और सीखने और सुनने को मिल जाएगा। पर उसके पूर्व हम सब आपसे कोई कविता सुनना चाहेंगे।’’
    प्रत्युत्तर में राज हीरामन ने ‘नमि मेरी आँखें’ संग्रह की ‘अपनी बात’ से ‘कविता की दुनिया में मेरी पहचान मेरी क्षणिकाओं से ही हुई। इसलिए मैं क्षणिका बिसार नहीं सकता। यह मेरे अस्तित्व का महत्वपूर्ण हिस्सा है।’’ वक्तव्य के साथ जो दो क्षणिकाऐं सुनाई वे इस प्रकार थी- पहली ‘ईदगाह’ शीर्षक क्षणिका- ‘‘मेरे परवर दिगार! ओ मेरे खुदा!/या मेरे अल्लाह!/मेरे बेछप्पर घर से भी/ईद का चांद/कल नज़र नहीं आया/किस मुँह से यह हामिद/आज ईदगाह जाएगा ?’’ और दूसरी ‘द्रोपदी का विद्रोह’ शीर्षक से यह थी- ‘‘आज की द्रोपदी को/दुःशासन की प्रतीक्षा है/और वह विरोध करती है/कि उसके निजी मामलों में/कृष्ण भगवान/अपनी नाक न डाले।’’
     क्षणिकाएँ सुनाने के पश्चात् राज हीरामन बिना एक क्षण रुके ‘‘बर्वेजी, चलिए किशन आ गए होंगे।’’ कहते हुए उठ खड़े हुए। 
     ‘‘मंदिर’’ के द्वार से बाहर की ओर प्रस्थित होने के पूर्व आत्मीयता और स्नेह के समस्त भावों को चेहरे पर आमन्त्रित कर उन्होंने हम दोनों की ओर देखा, हमेशा की तरह अभिवादन किया ओर सुकून देने वाले विशेष खुशबू के झोंके को सरोबार कर बाहर की ओर मुड़ गए।
     हीरामन जैसे मित्र जब भी आते हैं और अपने निस्वार्थ, निर्द्वंद्व और अन्तर्मन में संजो कर रखे भावना के पुष्प बिखेरते हैं तो महसूस होता है, ये पुष्प ही वस्तुतः रिश्ते शब्द को सही अर्थ में पारिभाषित करने की शक्ति रखते हैं। राज हीरामन का भी तो प्रकारांतर से यही मानना है कि ‘‘सगे कहां अपने होते हैं? वे पराए बन जाते हैं। कभी पराए अपने बन सगे का एहसास दिलाते हैं।’’ 
  • 766, सुदामा नगर, इन्दौर-452009, म.प्र. / मोबाइल : 09617597211





अनुवाद कला पर सुप्रसिद्ध अनुवादक डॉ.शिबनकृष्ण रैणा से सुप्रसिद्ध समालोचक प्रो.जीवनसिंह की बातचीत
अनुवाद राष्ट्र-सेवा का कर्म है :  डॉ.शिबनकृष्ण रैणा 

(अनुवाद कला के अध्येता एवं वरिष्ठ अनुवादक, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के सीनियर फेलो डॉ. शिबनकृष्ण रैणा ने इस कला को समृद्ध करने के लिए उल्लेखनीय कार्य किया है। डॉ. रैणा ने भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान, राष्ट्रपति निवास, शिमला में अध्येता रहते हुए ‘भारतीय भाषाओं से हिन्दी में अनुवाद की समस्याएँ’ विषय पर शोधकार्य किया है तथा अंग्रेजी, कश्मीरी व उर्दू से पिछले 30 वर्षों से निरन्तर अनुवाद-कार्य करते आ रहे हैं। अब तक इनकी चौदह पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनके योगदान के लिए उन्हें राजस्थान साहित्य अकादमी, भारतीय अनुवाद परिषद दिल्ली, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान, बिहार राजभाषा विभाग, केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय आदि अनेक प्रमुख संस्थाओं ने पुरस्कृत/सम्मानित किया है। विगत दिनों प्रो. जीवन सिंह जी ने उनसे अनुवाद कला के विभिन्न पहलुओं पर बातचीत की। प्रस्तुत है इसी बातचीत के प्रमुख अंश।)

प्रो.जीवनसिंह :   आपको अनुवाद की प्रेरणा कब और कैसे मिली? 
डॉ.शिबनकृष्ण रैणा :  1962 में कश्मीर विश्वविद्यालय से एम.ए. (हिन्दी) कर लेने के बाद मैं पीएच.डी. करने के लिए कुरुक्षेत्र विश्ववि़द्यालय आ गया (तब कश्मीर विश्वविद्यालय में रिसर्च की सुविधा नहीं थी)। यू.जी.सी. की जूनियर फेलोशिप पर ‘कश्मीरी तथा हिन्दी कहावतों का तुलनात्मक अध्ययन’ पर शोधकार्य किया। 1966 में राजस्थान लोक सेवा आयोग से व्याख्याता हिन्दी के पद पर चयन हुआ। प्रभु श्रीनाथजी की नगरी नाथद्वारा मैं लगभग दस वर्षों तक रहा। यहाँ कालेज-लाइब्रेरी में उन दिनों देश की प्रतिष्ठित पत्रिकाएँ- धर्मयुग, सारिका, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, नवनीत, कादम्बिनी आदि आती थीं। इनमें यदा-कदा अन्य भारतीय भाषाओं से हिन्दी में अनुवादित कविताएँ/कहानियाँ/व्यंग्य आदि पढ़ने को मिल जाते। मुझे इन पत्रिकाओं में कश्मीरी से हिन्दी में अनुवादित रचनाएँ बिल्कुल ही नहीं या फिर बहुत कम देखने को मिलती। मेरे मित्र मुझसे अक्सर कहते कि मैं यह काम बखूबी कर सकता हूँ क्योंकि एक तो मेरी मातृभाषा कश्मीरी है और दूसरा हिन्दी पर मेरा अधिकार भी है। मुझे लगा कि मित्र ठीक कह रहे हैं। मुझे यह काम कर लेना चाहिए। मैंने कश्मीरी की कुछ चुनी हुई सुन्दर कहानियों/कविताओं/लेखों/संस्मरणों आदि का मन लगाकर हिन्दी में अनुवाद किया। मेरे ये अनुवाद अच्छी पत्रिकाओं में छपे और खूब पसन्द किए गए। कुछ अनुवाद तो इतने लोकप्रिय एवं चर्चित हुए कि अन्य भाषाओं यथा कन्नड़, मलयालम, तमिल आदि में मेरे अनुवादों के आधार पर इन रचनाओं के अनुवाद हुए और उधर के पाठक कश्मीरी की इन सुन्दर रचनाओं से परिचित हुए। मैंने चूंकि एक अछूते क्षेत्र में प्रवेश करने की पहल की थी, इसलिए श्रेय भी जल्दी मिल गया।
प्रो.जीवनसिंह :  अब तक आप किन-किन विधाओं में अनुवाद कर चुके हैं?
डॉ.शिबनकृष्ण रैणा :  मैंने मुख्य रूप से कश्मीरी, अंग्रेजी और उर्दू से हिन्दी में अनुवाद किया है। साहित्यिक विधाओं में कहानी, कविता, उपन्यास, लेख, नाटक आदि का हिन्दी में अनुवाद किया है।
प्रो.जीवनसिंह :  आप द्वारा अनुवादित कुछ कृतियों के बारे में बताएंगे?
डॉ.शिबनकृष्ण रैणा :  मेरे द्वारा अनुवादित कृतियाँ, जिन्हें मैं अति महत्वपूर्ण मानता हूँ और जिनको आज भी देख पढ़कर मुझे असीम संतोष और आनंद मिलता है, ‘प्रतिनिधि संकलन: कश्मीरी’ (भारतीय ज्ञानपीठ) 1973, ‘कश्मीरी रामायण: रामावतार चरित्र’ (भुवन वाणी ट्रस्ट, लखनऊ) 1975, ‘कश्मीर की श्रेष्ठ कहानियाँ’ (राजपाल एण्ड संस दिल्ली) 1980 तथा ‘ललद्यद’ (अंग्रेजी से हिन्दी में अनुवाद, साहित्य अकादमी, दिल्ली) 1981 हैं। ‘कश्मीर की श्रेष्ठ कहानियाँ’ में कुल 19 कहानियाँ हैं। कश्मीरी के प्रसिद्ध एवं प्रतिनिधि कहानीकारों को हिन्दी जगत के सामने लाने का यह मेरा पहला सार्थक प्रयास है। प्रसिद्ध कथाकार विष्णु प्रभाकर ने मेरे अनुवाद के बारे में मुझे लिखा- ‘ये कहानियाँ तो अनुवाद लगती ही नहीं हैं, बिल्कुल हिन्दी की कहानियाँ जैसी हैं. आपने, सचमुच, मेहनत से उम्दा अनुवाद किया है।’
प्रो.जीवनसिंह :   अपनी अनुवाद-प्रक्रिया पर कुछ प्रकाश डालिए।
डॉ.शिबनकृष्ण रैणा :  अनुवाद प्रक्रिया से तात्पर्य यदि इन सोपानों/चरणों से है, जिनसे गुजर कर अनुवाद/अनुवादक अपने उच्चतम रूप में प्रस्तुत होता है, तो मेरा यह मानना है कि अनुवाद रचना के कथ्य/आशय को पूर्ण रूप से समझ लेने के बाद उसके साथ तदाकार होने की बहुत जरूरत है। वैसे ही जैसे मूल रचनाकार भाव/विचार में निमग्न हो जाता है। यह अनुवाद-प्रक्रिया का पहला सोपान है। दूसरे सोपान के अन्तर्गत वह ‘समझे हुए कथ्य’ को लक्ष्य-भाषा में अंतरित करे, पूरी कलात्मकता के साथ। कलात्मक यानी भाषा की आकर्षकता, सहजता एवं पठनीयता के साथ। तीसरे सोपान में अनुवादक एक बार पुनः रचना को आवश्यकतानुसार परिवर्तित/परिवर्धित करे। मेरे विचार से मेरे अनुवाद की यही प्रक्रिया रही है।
प्रो.जीवनसिंह :  अनुवाद के लिए क्या आपके सामने कोई आदर्श अनुवादक रहे?
डॉ.शिबनकृष्ण रैणा :  आदर्श अनुवादक मेरे सामने कोई नहीं रहा। मैं अपने तरीके से अनुवाद करता रहा हूँ और अपना आदर्श स्वयं रहा हूँ। दरअसल आज से लगभग 30-35 वर्ष पूर्व जब मैंने इस क्षेत्र में प्रवेश किया, अनुवाद को लेकर लेखकों के मन में कोई उत्साह नहीं था, न ही अनुवाद कला पर पुस्तकें ही उपलब्ध थीं और न ही अनुवाद के बारे में चर्चाएँ होती थीं। इधर, इन चार दशकों में अनुवाद के बारे में काफी चिंतन-मनन हुआ है। यह अच्छी बात है।
प्रो.जीवनसिंह :   क्या आप मानते हैं कि साहित्यिक अनुवाद एक तरह से पुनर्सृजन है ? 
डॉ.शिबनकृष्ण रैणा :  मैं अनुवाद को पुनर्सृजन ही मानता हूँ, चाहे वह साहित्य का हो या फिर किसी अन्य विधा का। असल में अनुवाद मूल रचना का अनुकरण नहीं वरन् पुनर्जन्म है। वह द्वितीय श्रेणी का लेखन नहीं, मूल के बराबर का ही दमदार प्रयास है। मूल रचनाकार की तरह ही अनुवादक भी तथ्य को आत्मसात करता है, उसे अपनी चित्तवृत्तियों में उतारकर पुनः सृजित करने का प्रयास करता है तथा अपने अभिव्यक्ति-माध्यम के उत्कृष्ट उपादानों द्वारा उसको एक नया रूप देता है। इस सारी प्रक्रिया में अनुवादक की सृजन-प्रतिभा मुखर रहती है।
प्रो.जीवनसिंह :  अनुवाद करते समय किन-किन बातों के प्रति सतर्क रहना चाहिए?
डॉ.शिबनकृष्ण रैणा :  यों तो अनुवाद करते समय कई बातों का ध्यान रखा जाना चाहिए जिनका विस्तृत उल्लेख आदर्श अनुवाद/अनुवन्दक जैसे शीर्षकों के अन्तर्गत ‘अनुवादकला’ विषयक उपलब्ध विभिन्न पुस्तकों में मिल जाता है। संक्षेप में कहा जाए तो अनुवादक को इन बातों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। (1) उसमें स्रोत और लक्ष्य भाषा पर समान रूप से अच्छा अधिकार होना चाहिए। (2) विषय का पर्याप्त ज्ञान होना चाहिए। (3) मूल लेखक के उद्देश्यों की जानकारी होनी चाहिए। (4) मूल रचना के अन्तर्निहित भावों की समझ होनी चाहिए। (5) सन्दर्भानुकूल अर्थ-निश्चयन की योग्यता हो। एक बात मैं यहाँ पर रेखांकित करना चाहूंगा और अनुवाद-कर्म के सम्बन्ध में यह मेरी व्यक्तिगत मान्यता है। कुशल अनुवादक का कार्य पर्याय ढूंढ़ना मात्र नहीं है, वह रचना को पाठक के लिए बोधगम्य बनाए, यह परमावश्यक है। सुन्दर-कुशल, प्रभावशाली तथा पठनीय अनुवाद के लिए यह ज़रूरी है कि अनुवादक भाषा-प्रवाह को कायम रखने के लिए, स्थानीय बिंबों व रूढ़ प्रयोगों को सुबोध बनाने के लिए तथा वर्ण्य-विषय को अधिक हृदयग्राही बनाने हेतु मूल रचना में आटे में नमक के समान फेर-बदल करे। यह कार्य वह लंबे-लंबे वाक्यों को तोड़कर, उनमें संगति बिठाने के लिए अपनी ओर से एक-दो शब्द जोड़कर तथा ‘अर्थ’ के बदले ‘आशय’ पर अधिक जोर देकर कर सकता है। ऐसा न करने पर ‘अनुवाद’ अनुवाद न होकर मात्र सरलार्थ बनकर रह जाता है। 
प्रो.जीवनसिंह :  मौलिक लेखन और अनुवाद की प्रक्रिया में आप क्या अंतर समझते हैं ? 
डॉ.शिबनकृष्ण रैणा :  मेरी दृष्टि में दोनों की प्रक्रियाएं एक-समान हैं। मैं मौलिक रचनाएं भी लिखता हूँ। मेरे नाटक, कहानियाँ आदि रचनाओं को खूब पसन्द किया गया है। साहित्यिक अनुवाद तभी अच्छे लगते हैं जब अनुवादित रचना अपने आप में एक ‘रचना’ का दर्जा प्राप्त कर ले। दरअसल, एक अच्छे अनुवादक के लिए स्वयं एक अच्छा लेखक होना भी बहुत अनिवार्य है। अच्छा लेखक होना उसे एक अच्छा अनुवादक बनाता है और अच्छा अनुवादक होना उसे एक अच्छा लेखक बनाता है। दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, पोषक हैं। 
प्रो.जीवनसिंह :  भारत में विदेशों की तुलना में अनुवाद की स्थिति के विषय में आप क्या सोचते हैं?
डॉ.शिबनकृष्ण रैणा :  पश्चिम में अनुवाद के बारे में चिन्तन-मनन बहुत पहले से होता रहा है। कहने की आवश्यकता नहीं कि जिस तरह ज्ञान-विज्ञान एवं अन्य व्यावहारिक क्षेत्रों में पश्चिम बहुत आगे है, उसी तरह ‘अनुवाद’ में भी वह बहुत आगे है। वहाँ सुविधाएं प्रभूत मात्रा में उपलब्ध हैं, अनुवादकों का विशेष मान-सम्मान है। हमारे यहाँ इस क्षेत्र में अभी बहुत-कुछ करना शेष है। 
प्रो.जीवनसिंह :  भारत में जो अनुवाद कार्य हो रहा है, उसके स्तर से आप कहाँ तक सन्तुष्ट हैं ? इसमें सुधार के लिए आप क्या सुझाव देना चाहेंगे।
डॉ.शिबनकृष्ण रैणा :  साहित्यिक अनुवाद तो बहुत अच्छे हो रहे हैं। पर हाँ, विभिन्न ग्रन्थ-अकादमियों द्वारा साहित्येत्तर विषयों के जो अनुवाद सामने आए हैं या आ रहे हैं, उनका स्तर बहुत अच्छा नहीं है। दरअसल, उनके अनुवादक वे हैं, जो स्वयं अच्छे लेखक नहीं हैं या फिर जिन्हें सम्बन्धित विषय का अच्छा ज्ञान नहीं है। कहीं-कहीं यदि विषय का अच्छा ज्ञान भी है तो लक्ष्य भाषा पर अच्छी/सुन्दर पकड़ नहीं है। मेरा सुझाव है कि अनुवाद के क्षेत्र में जो सरकारी या गैर सरकारी संस्थाएं या कार्यालय कार्यरत हैं, वे विभिन्न विधाओं एवं विषयों के श्रेष्ठ अनुवादकों का एक राष्ट्रीय-पैनल तैयार करें। अनुवाद के लिए इसी पैनल में से अनुवादकों का चयन किया जाए। पारिश्रमिक में भी बढ़ोतरी होनी चाहिए। 
प्रो.जीवनसिंह :  आप अनुवाद के लिए रचना का चुनाव किस आधार पर करते हैं ?
डॉ.शिबनकृष्ण रैणा :  देखिए, पहले यह बात स्पष्ट हो जानी चाहिए कि हर रचना का अनुवाद हो, यह आवश्यक नहीं है। वह रचना जो अपनी भाषा में अत्यन्त लोकप्रिय रही हो, सर्वप्रसिद्ध हो या फिर चर्चित हो, उसी का अनुवाद वांछित है और किया जाना चाहिए। एक टी.वी. चैनल पर मुझसे पूछे गए इसी तरह के एक प्रश्न के उत्तर में मैंने कहा था- ‘प्रत्येक रचना/पुस्तक का अनुवाद हो, यह ज़रूरी नहीं है। हर भाषा में, हर समय बहुत-कुछ लिखा जाता है। हर चीज़ का अनुवाद हो, न तो यह मुमकिन है और न ही आवश्यक! मेरा मानना है कि केवल अच्छी एवं श्रेष्ठ रचना का ही अनुवाद होना चाहिए। ऐसी रचना जिसके बारे में पाठक यह स्वीकार करे कि सचमुच अगर मैंने इसका अनुवाद न पढ़ा होता तो निश्चित रूप से एक बहुमूल्य रचना के आस्वादन से वंचित रह जाता। 
प्रो.जीवनसिंह :  अनुवाद से अनुवाद के बारे में आप की क्या राय है?
डॉ.शिबनकृष्ण रैणा :  प्रसिद्ध दार्शनिक प्लेटो  की वह पंक्ति याद आती है जिसमें वह कहता है कि कविता में कवि मौलिक कुछ भी नहीं कहता, अपितु नकल की नकल करता है। ‘फोटो-स्टेटिंग’ की भाषा में बात करें तो जिस प्रकार मूल प्रति के इम्प्रेशन में और उस इम्प्रेशन के इम्प्रेशन में अन्तर रहना स्वाभाविक है, ठीक उसी प्रकार सीधे मूल से किए गये अनुवाद और अनुवाद से किए गये अनुवाद में फर्क रहेगा। मगर सच्चाई यह है कि इस तरह के अनुवाद हो रहे हैं। तुर्की, अरबी, फ्रैंच, जर्मन आदि भाषाएं न जानने वाले भी इन भाषाओं से अनुवाद करते देखे गए हैं। इधर कन्नड़, मलयालम, गुजराती, तमिल, बंगला आदि भारतीय भाषाओं से इन भाषाओं को सीधे-सीधे न जानने वाले भी अनुवाद कर रहे हैं। ऐसे अनुवाद अंग्रेज़ी या हिन्दी को माध्यम बनाकर हो रहे हैं। यह काम खूब हो रहा है।
प्रो.जीवनसिंह :  अनुवाद-कार्य के लिए अनुवाद-प्रशिक्षण एवं उसकी सैद्धान्तिक जानकारी को आप कितना आवश्यक मानते हैं?
डॉ.शिबनकृष्ण रैणा :  सिद्धान्तों की जानकारी उसे एक अच्छा अनुवाद-विज्ञानी या जागरूक अनुवादक बना सकती है, मगर प्रतिभाशाली अनुवादक नहीं। मौलिक लेखन की तरह अनुवादक में कारयित्री प्रतिभा का होना परमावश्यक है। यह गुण उसमें सिद्धान्तों के पढ़ने से नहीं, अभ्यास अथवा अपनी सृजनशील प्रतिभा के बल पर आ सकेगा। यों अनुवाद-सिद्धान्तों का सामान्य ज्ञान उसे इस कला के विविध ज्ञातव्य पक्षों से परिचय अवश्य कराएगा।
प्रो.जीवनसिंह :  अनुवाद में स्रोत भाषा के प्रति मूल निष्ठता के बारे में आपकी क्या राय है?
डॉ.शिबनकृष्ण रैणा :  मूल के प्रति निष्ठा-भाव आवश्यक है। अनुवादक यदि मूल के प्रति निष्ठावान नहीं रहता, तो निश्चित रूप से ‘पापकर्म’ करता है। मगर, जैसे हमारे यहाँ (व्यवहार में) ‘प्रिय सत्य’ बोलने की सलाह दी गई है, उसी तरह अनुवाद में भी प्रिय लगने वाला फेर-बदल स्वीकार्य है। दरअसल, हर भाषा में उस देश के सांस्कृतिक, भौगोलिक तथा ऐतिहासिक सन्दर्भ प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप में रहते हैं और इन सन्दर्भों का भाषा की अर्थवत्ता से गहरा संबंध रहता है। इस अर्थवत्ता को ‘भाषा का मिज़ाज’ अथवा भाषा की प्रकृति कह सकते हैं। अनुवादक के समक्ष कई बार ऐसे भी अवसर आते हैं जब कोश से काम नहीं चलता और अनुवादक को अपनी सृजनात्मक प्रतिभा के बल पर समानार्थी शब्दों की तलाश करनी पड़ती है। यहाँ पर यह उल्लेखनीय है कि भाषा और संस्कृति के स्तर पर मूल कृति अनुवाद कृति के जितनी निकट होगी, अनुवाद करने में उतनी ही सुविधा रहेगी। सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक दूरी जितनी-जितनी बढ़ती जाती है, अनुवाद की कठिनाइयाँ भी उतनी ही गुरुतर होती जाती हैं। भाषा, संस्कृति एवं विषय के समुचित ज्ञान द्वारा एक सफल अनुवादक उक्त कठिनाई का निस्तारण कर सकता है। 
प्रो.जीवनसिंह :  आप किस तरह के अनुवाद को सबसे कठिन मानते हैं और क्यों ?
डॉ.शिबनकृष्ण रैणा :  अनुवाद किसी भी तरह का हो पर अपने आप में एक दुःसाध्य/श्रमसाध्य कार्य है। इस कार्य को करने में जो कोफ़्त होती है, उसका अन्दाज़ वही लगा सकते हैं जिन्होंने अनुवाद का काम किया हो। वैसे मैं समझता हूँ कि दर्शन-शास्त्र और तकनीकी विषयों से संबंधित अथवा आंचलिकता का विशेष पुट लिए पुस्तकों का अनुवाद करना अपेक्षाकृत कठिन है। गद्य की तुलना में पद्य का अनुवाद करना भी कम जटिल नहीं है। 
प्रो.जीवनसिंह :  लक्ष्य भाषा की सहजता को बनाए रखने के लिए क्या-क्या उपाय सुझाना चाहेंगे ? 
डॉ.शिबनकृष्ण रैणा :  सुन्दर-सरस शैली, सरल-सुबोध वाक्य गठन, निकटतम पर्यायों का प्रयोग आदि लक्ष्य भाषा की सहजता को सुरक्षित रखने में सहायक हो सकते हैं। यों मूल भाषा के अच्छे परिचय से भी काम चल सकता है लेकिन अनुवाद में काम आने वाली भाषा तो जीवन की ही होनी चाहिए। 
प्रो.जीवनसिंह: किसी देश की सांस्कृतिक चेतना को विकसित करने में अनुवाद की क्या भूमिका है ? 
डॉ.शिबनकृष्ण रैणा: अनुवाद-कर्म राष्ट्र सेवा का कर्म है। यह अनुवादक ही है जो भाषाओं एवं उनके साहित्यों को जोड़ने का अद्भुत एवं अभिनंदनीय प्रयास करता है। दो संस्कृतियों, समाजों, राज्यों, देशों एवं विचारधाराओं के बीच ‘सेतु’ का काम अनुवादक ही करता है। और तो और, यह अनुवादक ही है जो भौगोलिक सीमाओं को लांघकर भाषाओं के बीच सौहार्द, सौमनस्य एवं सद्भाव को स्थापित करता है तथा हमें एकात्मकता एवं वैश्वीकरण की भावना से ओतप्रोत कर देता है। इस दृष्टि से यदि अनुवादक को समन्वयक, मध्यस्थ, सम्वाहक, भाषायी-दूत आदि की संज्ञा दी जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। कविवर बच्चन जी, जो स्वयं एक कुशल अनुवादक रहे हैं, ने ठीक ही कहा है कि अनुवाद दो भाषाओं के बीच मैत्री का पुल है। वे कहते हैं- ‘अनुवाद एक भाषा का दूसरी भाषा की ओर बढ़ाया गया मैत्री का हाथ है। वह जितनी बार और जितनी दिशाओं में बढ़ाया जा सके, बढ़ाया जाना चाहिए ...।’ 
प्रो.जीवनसिंह :  अनुवाद मनुष्य जाति को एक-दूसरे के पास लाकर हमारी छोटी दुनिया को बड़ा बनाता है। इसके बावजूद यह दुनिया अपने-अपने छोटे अहंकारों से मुक्त नहीं हो पाती- इसके कारण क्या हैं? आप इस बारे में क्या सोचते हैं?
डॉ.शिबनकृष्ण रैणा :  देखिए, इसमें अनुवाद/अनुवादक कुछ नहीं कर सकता। जब तक हमारे मन छोटे रहेंगे, दृष्टि संकुचित एवं नकारात्मक रहेगी, यह दुनिया हमें सिकुड़ी हुई ही दीखेगी। मन को उदार एवं बहिर्मुखी बनाने से ही हमारी छोटी दुनिया बड़ी हो जाएगी।
प्रो.जीवनसिंह :  अच्छा, यह बताइए कि कश्मीर की समस्या का समाधान करने में कश्मीरी-हिन्दी एवं कश्मीरी से हिन्दीतर भारतीय भाषाओं में अनुवाद किस सीमा तक सहायक हो सकते हैं?
डॉ.शिबनकृष्ण रैणा :  कश्मीर में जो हाल इस समय है, उससे हम सभी वाकिफ़ हैं। सांप्रदायिक उन्माद ने समूची घाटी के सौहार्दपूर्ण वातावरण को विषाक्त बना दिया है। कश्मीर के अधिकांश कवि, कलाकार, संस्कृतिकर्मी आदि घाटी छोड़कर इधर-उधर डोल रहे हैं और जो कुछेक घाटी में रह रहे हैं उनकी अपनी पीड़ाएं और विवशताएं हैं। विपरीत एवं विषम परिस्थितियों के बावजूद कुछ रचनाकार अपनी कलम की ताकत से घाटी में जातीय सद्भाव एवं सांप्रदायिक सौमनस्य स्थापित करने का बड़ा ही स्तुत्य प्रयास कर रहे हैं। मेरा मानना है कि ऐसे निर्भीक लेखकों की रचनाओं के हिन्दी अनुवाद निश्चित रूप से इस बात को रेखांकित करेंगे कि बाहरी दबावों के बावजूद कश्मीर का रचनाकार शान्ति चाहता है और भईचारे और मानवीय गरिमा में उसका अटूट विश्वास है और इस तरह एक सुखद वातावरण की सृष्टि संभव है। ऐसे अनुवादों को पढ़कर वहां के रचनाकार के बारे में प्रचलित कई तरह की बद्धमूल/निर्मूल स्थापनाओं का निराकरण भी  हो सकता है। इसी प्रकार कश्मीरी साहित्य के ऐसे श्रेष्ठ एवं सर्वप्रसिद्ध रचनाकारों जैसे, लल्लद्यद, नुंदऋषि, महजूर,दीनानाथ रोशन, निर्दाेष आदि, जो सांप्रदायिक सद्भाव के सजग प्रहरी रहे हैं, की रचनाओं के  हिन्दी अनुवाद कश्मीर में सदियों से चली आ रही भाईचारे की रिवायत को निकट से देखने में सहायक होंगे।          

  • डॉ.शिबनकृष्ण रैणा : 2/537, अरावली-विहार, अलवर-301001, राजस्थान / मोबाइल : 09414216124  
  • प्रो.जीवनसिंह : 1/14. अरावली-विहार, अलवर, राजस्थान / मोबाइल : 09829248921