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बुधवार, 6 जनवरी 2016

अविराम विमर्श

अविराम  ब्लॉग संकलन :  वर्ष : 5,  अंक : 01-04,  सितम्बर-दिसम्बर 2015 



।।अविराम विमर्श।।

सामग्री :  इस अंक में डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय का आलेख- ‘‘आंचलिक कथासाहित्य की प्रेरक वृत्ति और शक्ति (डॉ. सतीश दुबे की औपन्यासिक कृतियाँ ‘कुर्राटी’ तथा ‘डेरा-बस्ती का सफरनामा’ के विशेष सन्दर्भ में)’’ तथा डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’ द्वारा ‘‘सामाजिक-मानवीय परिप्रेक्ष्य में ऑनर किलिंग’’ विषय पर आयोजित बहस (प्रतिभागी- इन्दिरा किसलय, डॉ.रामकिंकर सिन्हा, कविता विकास एवं विनोद सागर)


डॉ. पशुपतिनाथ उपाध्याय
आंचलिक कथासाहित्य की प्रेरक वृत्ति और शक्ति
(डॉ. सतीश दुबे की औपन्यासिक कृतियाँ ‘कुर्राटी’ तथा ‘डेरा-बस्ती का सफरनामा’ के विशेष सन्दर्भ में)
      आंचलिक कथा-साहित्य में सामाजिक विसंगतियों, सांस्कृतिक-अवधारणाओं एवं लोक जीवन की तनावग्रस्त रीति-रिवाजों तथा परम्पराओं को उकेरने का प्रयास हुआ है। वस्तुतः आंचलिक कथा-साहित्य की प्रेरक वृत्ति और शक्ति आंचलिकता में निहित है। कथाकार अंचल विशेष के परिवेश से प्रेरित और प्रभावित होकर कथा-सृजन में जुटता है तथा आंचलिकता के माध्यम से राष्ट्रीयता को जीवंतता प्रदान करने का सद्प्रयास करता है। राष्ट्रीय अस्मिता की खोज ही कथा और कथाकार का अभीष्ट बनता है। यही कारण है कि लोक भावभूमि और लोकजीवन के वैशिष्ट्य को आंचलिकता के धरातल पर कथाकार चित्रित करता हुआ वैविध्य अंतर्निहित ऐक्य स्थापन में भी सफल सिद्ध होता है। लोकजीवन के तनाव को राजनीतिक, धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य में चित्रित करना तथा उसे जनमानस के लिए ग्राह्य बनाना ही कथाकार का उद्देश्य होता है। लोकसंस्कृति का चित्रांकन संास्कृतिक परंपरा की अभिवृद्धि और समृद्धि का द्योतन करता है जिसका सीधा संबंध आंचलिक-कथा से होता है। जनमानस की अभिलाषाओं, आशाओं एवं आकांक्षाओं को मद्देनजर रखते हुए मानवता के प्रति उत्कृष्ट लगाव तथा स्थानीय जीवन और प्रकृति के प्रति गहरे अनुराग ने कथाकारों को कथासाहित्य-सृजन के लिए उत्साहित किया है।
     नया समाज, उसकी नई समस्याएँ एवं उससे उत्पन्न तनावग्रस्त स्थितियों-परिस्थितियों को चित्रांकित करने वाले समकालीन कथाकारों में आंचलिकता के फलक पर प्रस्तुत करने वाले कथाकार रेणु, विवेकीराय, डॉ. सत्यनारायण उपाध्याय, डॉ. नवलकिशोर, डॉ. रामदरश मिश्र आदि हैं, जिन्होंने लोकतत्व और लोकजीवन का सांस्कृतिक परिवेश में यथार्थवादी चित्रांकन प्रस्तुत किया है। समकालीन जीवन, उसके परिवर्तित स्वरूप एवं लोक परम्पराओं से प्रसूत नए मानमूल्यों की कथासाहित्य में उतारने और उभारने का जो कार्य हो रहा है, उनमें एक नाम डॉ. सतीश दुबे का भी जुड़ गया है जिनकी औपन्यासिक कृतियाँ ‘कुर्राटी’ और ‘डेरा-बस्ती का सफरनामा’ हैं। ‘कुर्राटी’ में भील आदिवासी की सामाजिक और सांस्कृतिक विकास और उत्थान की प्रक्रिया को आदिवासी युवा पीढ़ी को संदर्भित करते हुए कथानक का तानाबाना बुना गया है, जिसमें झाबुआ को केन्द्र में रखा गया है। दूसरी कृति ‘डेरा-बस्ती का सफरनामा’ है, जिसमें बांछड़ा समाज में प्रचलित कन्या देह व्यापार की परम्परा को सामाजिक-सांस्कृतिक संदर्भों में निरीक्षण-परीक्षण किया गया है, जिसके मूल में स्त्री की विवशता और अस्मिता को रेखांकित किया गया है। अतएव दोनों उपन्यास आँचलिक परिवेशगत परिस्थितियों में मानवीय सरोकारों का विचारोत्तेजक धरातल पर चित्रांकन करते हैं। 
      ‘कुर्राटी’ का कथाकार लोकजीवन में आए हुए तनाव से उत्पन्न समस्याओं के प्रति सजग है, सतर्क है एवं सावधान है क्योंकि शोषण के प्रति सम्प्रति भील समाज भी अपनी आवाज उठाने में सक्षम है। व्यवस्था परिवर्तन की लड़ाई लड़ रहा है। युवा पीढ़ी अब दिग्भ्रमित नहीं रही तथा आँचलिकता नए रूप में परिलक्षित होती है। कहा गया है कि ‘‘मेरा आशय यह कदापि नहीं है कि सुदूर-वन्य या ग्रामीण क्षेत्रों का दलित या जनजातीय समाज हाथ-पर-हाथ धरे बैठा है। सच तो यह है कि वह पूरे परिदृश्य से खूब परिचित है। अपने अधिकारों के प्रति सजगता एवं शोषण के विरुद्ध मोर्चेबंदी की चेतना का उसमें जबरदस्त विकास हुआ है। राजनैतिक सोच दलबन्दी के कारण भले ही संकुचित हो गई हो, किन्तु व्यक्तिगत सोच का दायरा बढ़ा है। दरअसल, यही सोच समस्याओं के निदान हेतु कारगर सिद्ध हो सकती है। मेरा आप युवापीढ़ी से अनुरोध है कि शिक्षाकाल समाप्त होने के बाद परिवर्तित सामाजिक स्थिति में भी आप अपने घर-गाँव से जुड़े रहें तथा बौद्धिक स्तर पर ही नहीं, व्यावहारिक स्तर पर भी समस्याओं को समझकर सम्मानजनक हल ढूंढ़ने का प्रयास करें।’’ (पृ.174)
      उल्लेखनीय है कि प्रमुख पात्र के माध्यम से परम्परागत स्थापित समाज और नए बसे समाज के बीच द्वन्द्वात्मक स्थिति, नैसर्गिक जीवन को खंडित करने वाली परिस्थिति तथा लोकजीवन के सांस्कृतिक चैतन्यता को कथाकार ने उभारने का प्र्रयास किया है जिसके मूल में सम्भ्रांतिक जीवन और उसके परिवर्तित स्वरूपों के खोज की अहम् भूमिका है। लोक-विश्वास में आस्था है, परम्परा के प्रति अनुराग और लगाव है। नागराज और दादा के संवाद से स्पष्ट है कि शासन और प्रशासन दोनों स्तरों पर भ्रष्टाचार जोरों पर है और यह लाइलाज है, दूर करना समसामयिक परिवेश में बहुत ही मुश्किल है। साक्ष्य है यह कथन, ‘‘लाखों का बजट रहता है हरिजन आदिवासियों के लिए। सरकार के पास पैसा-ही-पैसा है। उनको व्यवसाय दिलाना, उनके बच्चों को पढ़ाने-लिखाने के लिए कोडी-कटोर छात्रावास आश्रम है, वहाँ के लिए बिस्तर बर्तन से लेकर गादी-गोदड़े तक खरीदे जाते हैं। सबकी खरीद में सबको मिलता  है। कभी-कभी तो माल खरीदा भी नहीं जाता और स्टॉक इन्ट्री होकर पेमेन्ट हो जाता है। हमको सब मालूम रहता है, और मालूम होते हुए भी पाप की पहली सीढ़ी हम बनते हैं। उस पर भी हक्क का ना मिले तो दुःख तो होगा ना!’’ (पृ.18)
      भीलों की शैक्षणिक एवं सामाजिक चेतना को झाबुआ के परिपार्श्व में रखकर लोकजीवन और लोकसंस्कृति का दिग्दर्शन कराया गया है तथा उससे संदर्भित लोकगीत, कथा, त्यौहार, उत्सव, क्रीड़ा, पूजा-अर्चना आदि को भी यथा प्रसंग विवेचित किया गया है। सोमल्या परम्परागत जीवन शैली में विश्वास रखने वाले परिवारजनों को सुशिक्षित समाज से परिचित कराने में हीनता महसूस करना आदि तथ्यों को भी रेखांकित किया गया है। कथाकार ने भीलों की तांत्रिक-साधना के बारे में प्रचलित धारणा तथा उपलब्ध तथ्यों को आधार मानकर अपने कथ्य को प्रमाणित किया है क्योंकि भील धार्मिक दृष्टि से विभिन्न सम्प्रदायों में विभक्त है। एक वर्ग विशेष शैव मतानुयायी है। तांत्रिक साधना इनमें बहुत प्रचलित है। भैरव तथा भैरवी के आराधक मौके-बेमौके तांत्रिक वेषभूषा में उन्माद के चरम पर मांदल ढोल की उत्तेजक धुनों पर विभिन्न मुद्राओं में नृत्य करते हैं। तांत्रिक की परम्परा को बड़वे या भौपा किसी न किसी रूप में बनाए रखे हैं। विभिन्न दैविक तथा दैहिक कष्टों का निदान इन्हीे के द्वारा किया जाता है। (पृ. 51) आँचलिकता की तरंगें सम्पूर्ण उपन्यास में प्रवाहित होती देखी गई हैं।
      शिक्षा के क्षेत्र में छात्रवृत्ति का सबको दिलाना, वितरण व्यवस्था में दोष, जबरदस्त भीलों में शैक्षिक ऊर्जा का संचार, महाविद्यालयीन शिक्षा का स्तर, आत्म विश्वास की क्षमता-दक्षता आदि का भी संकेत मिलता है। दलबदल, घोटाला, घेराव, बन्द, रास्ता रोको, मण्डल-कमण्डल, गुटबाजी, फिरका परस्ती, हड़ताल, भ्रष्टाचार, पक्षपात, भाई-भतीजावाद आदि नारे सिद्धान्त की लड़ाई या देश की प्रगति के लिए नहीं- सत्ता, कुर्सी, स्वार्थसिद्धि, अस्तित्वरक्षा, कुनबा-परस्ती के लिए गढ़े गए हैं- को भी रेखांकित किया गया है जो राष्ट्रीय चरित्र का द्योतक करते हैं। नागराज द्वारा भोले-भीलड़े की मदद करना तथा अन्ततः उसकी पहल पर कुर्राटी मारकर भाग जाने में सफल होना आदि तथ्यों ने नैतिक मूल्यों की स्थापना का संकेत दिया है। नागराज के कानों में मंगल्या बेस्ता के ये शब्द गूंजते रहे कि ‘‘शाब, थोड़ी-सी मदद मिल जाए तो कुर्राटी मारकर हम भी कहीं भी पहुंच जायें।’’ (पृ. 176) सम्प्रति इसी छोटी-सी मदद की समस्त पिछड़े क्षेत्रों में आवश्यकता है जिसके द्वारा गरीबी, अशिक्षा, रोजी-रोजगार, बीमारी, आवासीय समस्या, पानी की समस्या आदि से निजात पाया जा सकता है। यही राष्ट्रीय और प्रादेशिक लक्ष्य प्राप्ति हेतु आवश्यक भी है जिसके द्वारा प्रत्येक शोषित-पीडि़त एवं गरीब व्यक्ति कुर्राटी मारकर अपना व्यवस्थित जीवनयापन कर सके। यही सही मायने में राजधर्म, राष्ट्रधर्म एवं मानवधर्म भी है - यही उपन्यास और उपन्यासकार का अभीष्ट भी है। 
      दूसरी क्रान्ति - ‘डेरा-बस्ती का सफरनामा’ प्राकृतिक सुषमा के सुरम्य हरे-भरे वातावरण के मध्य, विशेष प्रकार की जिन्दगी जीने वाले बांछड़ा समाज में व्याप्त अनैतिक क्रियाकलाप एवं स्त्रियों के दैहिक शोषण और उत्पीड़न पर आधृत कथानक का जीता-जागता साक्ष्य है जिसमें कहा गया है कि यह सामाजिक व्यवस्था का ऐसा अभिशप्त समाज है, जहाँ औरत के लिए देह-व्यापार प्रथा के अनुसार बाध्यता है। यहाँ देह व्यापार या धन्धे पर बिठाने के लिए कोखजाई बेटी की माँ रस्म अदायगी, पिता दलाली तथा भाई येन-केन प्रकारेण व्यापार में मदद करता है। मालवा के लोक जीवन में किसी स्त्री को जलील करने के लिए ‘रामजणी’ और ‘वैश्या’ के बाद जिस उच्चतम विशेषण शब्द का प्रयोग किया जाता है, वह है बांछड़ी। (पृ. 13) समकालीन जीवन और उसकी जटिलताओं का लोकतत्व और लोकजीवन से संदर्भित क्रियाकलापों का अन्वेषण कथाकार ने यथार्थवादी फलक पर किया है। बांछड़ा-समाज में प्रचलित अवधारणाएं, मान्यताएं, रीति-रिवाजों, सामाजिक मर्यादाएं एवं सांस्कृतिक पक्षों को उजागर करते हुए नारी की दयनीय एवं विवश स्थिति को संवेदनात्मक धरातल पर चित्रित किया गया है जिसमें विविध प्रकार की यातनाएं भोगनी पड़ी हैं।
      बाँछड़ा समाज की विकृत संस्कृति, विकृति आकृति एवं प्रवृत्ति को समसामयिक परिवेश में सुधारने की आवश्यकता है, जनजागरण अभियान चलाने की महती आवश्यकता है तथा शासन-प्रशासन एवं समाज को संवेदनशीलता और सहानुभूति के धरातल पर उनके जख्मों पर मरहम लगाते हुए सम्मानपूर्वक जीवन जीने को प्रेरित करना है, प्रोत्साहित करना है एवं उन्हें सहयोग देना है ताकि एक स्वस्थ समाज एवं समरस समाज की स्थापना हो सके- यही युगधर्म भी है। माँ द्वारा अपनी कोख से उत्पन्न बेटी को प्रथा निर्वाह हेतु रखैल रूप में बेच देना और ग्राहक द्वारा छोड़ दिए जाने पर बेटी द्वारा देह-व्यापार की ओर प्रवृत्त होना सामाजिक विकृति और विकृत मानसिकता का परिचायक है। यह तथ्य भी विचारणीय है कि देह-व्यापार की मजबूरी का यह मुद्दा किसी एक जाति-विशेष से नहीं हमारे जीवन-मूल्यों की सांस्कृतिक परम्परा और नारी की आदर्श छवि से जुड़ा हुआ है जो अद्यतन परिवेश में चिंता और चिंतन की अपेक्षा रखता है।
      सामाजिकता और सांस्कृतिक चैतन्यता को एकमेव करने की प्रबलेच्छा ने कथा-सृजनशीलता को प्रभावित किया है। आंचलिक कथा-साहित्य की तनावग्रस्तताओं ने सामाजिकता को बुरी तरह से प्रभावित किया है लेकिन विकृति ने संस्कृति को पूरी तरह ध्वस्त नहीं किया है, अभी आस्था और विश्वास के साथ उनमें बदलाव लाया जा सकता है। कथाकार ने अपने द्वारा उठाए गए जीवित प्रश्न का समाधान इन पंक्तियों में प्रस्तुत किया है- ‘‘उपेक्षित और नाकारा वर्ग को मुख्य धारा से सम्बद्ध करने में दो बिन्दु मददगार हो सकते हैं। पहला धर्म और धार्मिक प्रतीकों के प्रति आस्था, जो प्रकारान्तर से उनमें निहित नैतिक बोध से परिचित कराती है और दूसरा, नई पीढ़ी की युवा महिलाओं में बदनामी के कारागृह से मुक्ति की छटपटाहट।’’ (पृ. 156) परम्परागत मान्यताओं को बाधा और अवरोध न मानकर एक चुनौती के रूप में स्वीकारते हुए परिवर्तनगामी स्थितियों और परिस्थितियों को एक अभियान आन्दोलन का रूप देने की आवश्यकता है।
      शास्त्रीय परम्परा में कथा-साहित्य के छः तत्व माने गए हैं जिनमें कथानक, पात्र और चरित्र-चित्रण, कथोपकथन या संवाद, वातावरण या देशकाल परिस्थिति, भाषा-शैली एवं उद्देश्य हैं। यहाँ तात्विक विवेचन की अपेक्षा समीक्षात्मक विश्लेषण अपेक्षित है। दोनों उपन्यासों की कथाएँ उपन्यासकार के निकटस्थ समाज से उपजी हैं जिसमें समाज के अँचल विशेष को परोक्षतः नायकत्व प्रदान किया गया है। ‘कुर्राटी’ में झाबुआ के आदिवासी युवापीढ़ी भीलों की सामाजिक और शैक्षणिक चेतना को कथानक के रूप में नायकत्व प्रदान किया गया है जबकि ‘डेरा-बस्ती का सफरनामा’ बाँछड़ा समाज का प्रतिनिधित्व करने में सफल रहा है। मानवीय मूल्यों के प्रति आस्था एवं विश्वास तथा सामाजिक बदलाव के प्रति रुचि-रुझान ने कथाकार को आदिवासी भील समाज और बाँछड़ा समाज से संवेदनशीलता के स्तर पर जुड़ने को प्रेरित किया है, प्रोत्साहित किया है जिसकी चरम परिणति इन उपन्यासों की सर्जना में देखने को मिली है।
      इन उपन्यासों में परिवेश के बहुआयामी चित्रांकन के साथ-साथ मानवीय मूल्यों के क्षरण की चिंता भी देखी गई है जो कथाकार की अभिनव उपलब्धि कही जा सकती है। अंचल विशेष की सम्पूर्ण विशिष्टताओं के साथ बोली, त्यौहार, उत्सव, समारोह, लोकगीत, लोकपर्व एवं परिवेशगत जनरीतियों का जीवंत चित्रण निश्चय ही औपन्यासिक प्रवृत्ति का द्योतक सिद्ध हुआ है। अंचल विशेष की समस्या जनसामान्य की समस्या बन गई है तथा प्रकारान्तर से वही राष्ट्रीय समस्या भी है। संक्रमणकालीन स्थिति और परिस्थिति से जूझता हुआ ‘बांछड़ा’ और ‘भील’ समाज धूमिल और दिशाहीन स्थिति से गुजरते हुए सम्प्रति पंकजीवन मुक्ति हेतु व्यग्र है, व्याकुल है क्योंकि आदिवासियों-दलितों पर बेवजह अत्याचार और उनके द्वारा चुपचाप सहते रहने का जमाना अब कोसों दूर पीछे रह गया है। समग्रतः कहा जा सकता है कि कथाकार की अभीष्ट प्राप्ति सामाजिक और सांस्कृतिक चैतन्यता और उससे उत्पन्न विसंगतियों के प्रस्तुतीकरण में निहित है। इन उपन्यासों में सामाजिक और सांस्कृतिक विडम्बनाओं के परिप्रेक्ष्य में आंचलिक परिवेशगत वृत्ति और शक्ति को रेखांकित करते हुए चुनौती भरे प्रश्न उठाए गए हैं जिसके लिए डॉ.सतीश दुबे की प्रज्ञा की अनुशंसा करते हुए उनकी साहित्य-साधना हेतु अनेकानेक धन्यवाद!

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बहस संयोजक :  डॉ. शैलेष गुप्त ‘वीर’
सामाजिक-मानवीय परिप्रेक्ष्य में ऑनर किलिंग
साहित्य में कई तरह के सामाजिक सरोकारों को लेकर आन्दोलनात्मक बहसें, चिन्तन और चर्चाएं होती रही हैं। बहस का एक सामाजिक मुद्दा ‘ऑनर किलिंग’ यानी ‘अपने सम्मान की रक्षा के नाम पर परिजनों की हत्या कर देना’है। इस सन्दर्भ में सम्मान से जुड़े जिन कारणों से हत्यायें की जाती हैं, के परिप्रेक्ष्य में इस तथ्य पर विचार किया जाना जरूरी है कि सम्मान का प्रश्न (चाहे जितना भी बड़ा हो) क्या किसी के जीवन से ऊपर हो सकता है? माना कि हमारी सामाजिक व्यवस्था के वर्तमान ढांचे में बहुत सी चीजें स्वीकार्य नहीं हैं और वे किसी परिवार या व्यक्ति के सम्मान को बहुत हद तक ठेस भी पहुंचाती हैं, लेकिन क्या ऐसी चीजों का कोई ऐसा हल नहीं ढूंढ़ा जा सकता कि जीवन सर्वोपरि बना रहे? अविराम साहित्यिकी में ‘बहस’ की दूसरी कड़ी का आरम्भ इसी विषय पर करने का निश्चय करते हुए हमने साहित्यकारों-पाठकों से उनके विचार इन प्रश्नों के सन्दर्भ में आमंत्रित किए थे- 1. समाज के हर तबके का शैक्षणिक व आर्थिक विकास हो रहा है और विभिन्न जाति समूहों के मध्य अन्तर्सम्बन्ध भी विकसित हो रहे हैं, पुरानी परम्पराएं टूट रही हैं और नए मूल्यों के प्रति स्वीकार्यता भी बढ़ रही है, फिर भी ऑनर किलिंग की घटनाएं बढ़ रही हैं। अनुभवों और चिंतन के आधार पर इस परिदृश्य को आप कैसे देखते हैं? 2. विभिन्न जाति समूहों के मध्य बन रहे अन्तर्सम्बन्धों की मिकेनिज्म (प्रक्रिया) आपको कैसी लगती है? कहीं इस मिकेनिज्म की प्रकृति तो ऑनर किलिंग का कारण नहीं बन रही है? 3. सामान्यतः ‘ऑनर किलिंग’ की घटनाओं के मूल में जातियों-समूहों-समुदायों के मध्य की विषमताएं होती हैं। साहित्य इन विषमताओं को आइना दिखाता रहा है। इस दृष्टि से साहित्य इस समस्या के निदान में क्या भूमिका निभा सकता है? 4. समाज के विभिन्न समूहों के पारस्परिक सरोकार और उनमें विकसित हो रही नई व्यवहार दृष्टि के सूत्र ऑनर किलिंग के कारणों का समाधान प्रस्तुत करने में कोई भूमिका क्यों नहीं निभा पा रहे हैं? 5. ‘ऑनर किलिंग’ की घटनाओं को सरकार के स्तर पर कठोर कानून के माध्यम से क्या रोका जा सकता है? आप सरकार की भूमिका को किस तरह देखते हैं? 6. ‘ऑनर किलिंग’ की घटनाओं को रोकने के लिए साहित्यकार के रूप में आप तेजी से बदलते मूल्यों में विश्वास करने वाली नई पीढ़ी की भूमिका को किस प्रकार देखते हैं? 
    प्राप्त विचारों में से जिन चार लेखकों के विचार प्रस्तुति हेतु उपयुक्त लगे, वे यहाँ प्रस्तुत हैं। कुछेक मित्रों ने कुछ और समय चाहा, लेकिन अंक के प्रकाशन में बिलम्ब करना संभव नहीं था। संपादक से बात करके यह विकल्प खुला रखा गया है कि यदि किसी मित्र का आलेख विलम्ब से प्राप्त होता है, तो उसे आगामी किसी अंक में एक सामान्य आलेख के रूप में शामिल कर लिया जायेगा। पर यह चिन्तनीय अवश्य है कि सामाजिक सरोकारों से जुड़े विषयों पर चर्चा के लिए लघु पत्रिकाओं के पाठकों/लेखकों के पास समय की कमी है। क्या लघु पत्रिकाओं को समाज से जुड़ी चीजों पर चर्चा की ओर ले जाने का प्रयास इनके पाठकों और लेखकों को नहीं करना चाहिए? फिलहाल प्रस्तुत है एक महत्वपूर्ण विषय पर प्रतीकात्मक चर्चा।

इन्दिरा किसलय



वोट बैंक की राजनीति शह देती है

औद्योगिक क्रान्ति के बाद महाबली बाजार ने मात्र मुनाफे की भाषा का आविष्कार किया और संचार क्रान्ति ने ग्लोबल विलेज की संकल्पना साकार की। ऐसे में सांस्कृतिक संवाद, आक्रमण और अतिक्रमण होना ही था। इस पृष्ठभूमि पर भारत में कुछ परंपराएँ ध्वस्त हुई, कुछ शिथिल तो कई कुनमुनाती हुई पड़ी रहीं। विभिन्न जाति समूहों के बीच रोटी-बेटी के संबंध बने, जो श्रेष्यकर कहे जा सकते हैं।
    यह संक्रमण काल है। ऑनर किलिंग बदस्तूर जारी है। इसका अर्थ इतना सा है कि समाज में सतह पर जो बदलाव नज़र आता है, वह कुछ ही वर्गों या इलाकों में आया है, सर्वत्र नहीं। दरअसल पूरा समाज एक स्वीकृत मान्यता पर नहीं चलता। उसके कई तल होते हैं। आर्थिक स्तर, जातीय श्रेष्ठता, विरासत का अहं और क्षेत्र विशेष की मान्यताएँ इसे संचालित करती हैं। ऑनर किलिंग को जाति, समुदाय या कबीलों में वर्चस्व की लड़ाई, इलाकाई रंजिश, निजी खुन्नस या वंश, गोत्र, परंपरा के नाम पर जानलेवा अहंकार का प्रफल कहा जाना चाहिए।
     साहित्य से परिवर्तन की आकांक्षा, मेघों से वर्षा की चाह जैसी स्वाभाविक है। पर साहित्य की प्रकृति माचिस की तीली की तरह नहीं होती,कि बाती को छूकर तत्काल उजाला कर दे। सामाजिक परिवर्तन, कछुए की चाल चलते हैं। वर्तमान में जिस स्तर पर साहित्य ने अवसरवाद का झंडा ऊँचा किया है, गंभीर वैचारिकी और सामाजिक प्रतिबद्धता धूल चाटने लगी है।
     बेशक समाज के कई समूहों में विज्ञानवादी व्यवहार दृष्टि और पारस्परिक सरोकार विकसित हुए। पर यह नूतन दर्शन हाफ हार्टेडली अपनाया गया! न पुराने का मोह छूटा न नये का आकर्षण। जैसे कोई युवती जीन्स टॉप और पेंसिल हील वाले सैंडिल धारण करे और पाजेब बिछुए पहनकर मांग में सिन्दूर की लंबी रेखा खींच दे।
     सरकार और कानून किसी भी सामाजिक विकृति को जड़ से नहीं उखाड़ सकते। क्योंकि वोट बैंक की राजनीति ही है जिसकी शह पर ‘खाप’ जैसे संगठन बेखौफ फतवे जारी करते हैं। राज्य सरकारें, दिखावे के लिए, हल्ला मचाकर चुप हो जाती हैं और मीडिया चौबीस घंटे बीन बजाकर रुख बदल लेता है।
     जब तक पंचायतों के माध्यम से गांव किसी भी सत्तारूढ़ पार्टी के हमराज़, हमकदम, हमनिवाला बने रहेंगे, ऑनर किलिंग का खात्मा नामुमकिन है।
     इस सन्दर्भ में नई पीढ़ी की भूमिका, निश्चय ही अहम है। वह चरम व्यक्तिवाद की गिरफ्त में है। कुछ क्रान्तिकारी युवा पहल करना चाहें तो बेबसी उनके कदम रोक लेती है क्योंकि उन्हें पता है कि शहर कोतवाल और चोर की हथकड़ी का नंबर एक है। गांवों में कबीले, कट्टरवाद के तहत लामबन्द होते हैं तथा शहर में पैसा और रसूख बोलता है।
     निष्कर्षतः एकाकी प्रयास से कुछ न होगा। साहित्य, मीडिया, युवा, महिलाएँ, कानून और स्वयंसेवी संगठन मिलकर, समवेत स्वर में प्रयास करें, तो ही परिवर्तन हेतु जमीन तैयार होगी और सड़ी गली मान्यताओं को दो गज जमीन के नीचे दफ्न किया जा सकेगा।

  • 58/101, बल्लालेश्वर मार्ग, रेणुका विहार, रामेश्वरी रिंग रोड, नागपुर-440027(महा.) / मो.: 09371023625 



डॉ.रामकिंकर सिन्हा




जनमानस को तैयार करके ही समाधान संभव है
01. ‘ऑनर किलिंग’ की घटनाएँ इसलिए बढ़ रही हैं कि लोगों में शैक्षणिक एवं आर्थिक विकास तो हो रहा है, पर मानसिक विकास नहीं। स्त्रियों के प्रति हमारा दृष्टिकोण एकदम पुरातन पंथी है। उन्हें हम गुलामों से अधिक कुछ नहीं समझते, उन्हें स्वतंत्रता नहीं दे सकते कि वह अपनी पसंद के लड़के से विवाह संबंध स्थापित कर सके। लड़का दूसरी जाति का हो तब तो यह प्रायः असंभव ही है। झूठे जातीय स्वाभिमान का भाव इतना बढ़ गया है कि पुरुष सत्तात्मक समाज भौतिकता और दिखावे की चकाचौंध में पहले तो आंकलन ही नहीं कर पाता है कि उनकी लड़की की किसी दूसरी जाति के लड़के से घनिष्ठता बढ़ रही है और जब इस संबंध के पराकाष्ठा पर पहुँचने की जानकारी हो जाती है, तो लड़की के घर के अभिभावक हताश होकर उहापोह की स्थिति में लड़की के साथ ‘ऑनर किलिंग’ का अमानुषीय खेल खेलते हैं।
02. विभिन्न जाति समूहों के बीच अन्तर्संबंध की प्रक्रिया मात्र झूठे आत्मसम्मान और भौतिक समृद्धि को लेकर है। मेरी समझ से इसमें स्त्रियों की सामाजिक स्थिति बदले और उनकी भावनाओं का सम्मान हो, इसको लेकर कहीं कोई भाव कार्य नहीं कर रहा है। इसलिए मुझे यह ‘ऑनर किलिंग’ का कारण नहीं लगता है।
03. यह सच है कि साहित्य जातियों-समूहों-समुदायों की विषमताओं को युगों से आइना दिखाता आ रहा है, पर वर्त्तमान में ऐसी प्रवृत्तियों की रफ्तार अत्यन्त धीमी है। साहित्य इस समस्या के निदान में अपनी भूमिका बखूबी निभा सकता है, बशर्तें कि साहित्यकार इस समस्या को केन्द्र बनाकर इसके उन्मूलन हेतु रचनाएँ लिखें, क्योंकि यह पीढि़यों तक चलने वाला कार्य है। खुलापन और व्यक्तियों के मेलजोल तो बदलते परिवेश में रुकेंगे नहीं, उन्हें चिन्तन के स्तर पर ऊँचा बनाने का कार्य साहित्य ही कर सकता है।
04. ऐसा इसलिए नहीं हो पा रहा है कि समूहों के पारस्परिक सरोकार और उनमें विकसित होने वाली नई व्यवहार दृष्टि में ‘ऑनर किलिंग’ कोई विषय है ही नहीं। लोग स्वेच्छाचारी हो गये हैं और नैतिकता तथा सामाजिक दृष्टिबोध के अभाव में इसे कोई सामाजिक समस्या मानता ही नहीं। लोग सोचते हैं कि जिसकी समस्या है वही इसका समाधान भी खोजे, हम व्यर्थ में इस पचड़े में क्यों पड़ें? इसका नतीजा यह होता है कि ये समस्या जिनपर भी पड़ती है वे आनन-फानन में झूठे आत्मसम्मान की रक्षा के लिए विक्षिप्तों की तरह ‘ऑनर किलिंग’ का अत्यन्त दारुणकृत्य कर बैठते हैं।
05. हर्गिज नहीं। आज तक कानून के माध्यम से किसी भी सामाजिक समस्या का निदान नहीं हुआ है जिसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण दहेज रोकने के लिए बने कानून हैं। सरकार समाज को विश्वास में लेकर ही ऐसी समस्याओं पर अंकुश लगाने के बारे में सोच सकती है। जब तक बैठकों, विचार गोष्ठियों, सभाओं, सेमिनारों, आंदोलनों आदि के माध्यम से जनमानस को तैयार नहीं किया जाता तब तक कोई भी सरकार इतने नाजुक विषय को छूने की भी हिम्मत नहीं कर सकती।
06. आज के तेजी से बदलते मूल्यों में विश्वास करने वाली नई पीढ़ी की भूमिका इस संबंध में अत्यन्त उदासीन है। नई पीढ़ी के सामने बस उनका अपना खुद का भविष्य है कि पढ़-लिख कर हजारों-लाखों रुपयों का पैकेज़ मिल जाए जिससे वे वैभव-विलास से भरपूर जीवन बिता सकें। नई पीढ़ी को इससे कोई मतलब नहीं है कि कौन क्या है? किस समस्या का कैसे समाधान हो सकता है? इसका कारण यह है कि उसका सामाजिक और नैतिक स्तर अत्यन्त सामान्य है और चूँकि वह वर्त्तमान शिक्षा-पद्धति की उपज है जहाँ भौतिक समृद्धि और व्यक्तिगत सफलता पाने के लिए आदमी कुछ भी कर सकता है, पर नैतिक शिक्षा, सामाजिक शिक्षा और मानवीय संवेदनाओं से शून्य पीढ़ी के पास इतनी ऊँची सोच कहाँ कि वह ऐसी घटनाओं के बारे में कुछ सोचे, विचारे और करे।

  • सनशाइन प्ले एंड पब्लिक स्कूल, ब्लॉक रोड, पेटोल पंप के पीछे, पो. जपला, जिला पलामू-822116,झारखंड / मो. 07631146532



कविता विकास




शिक्षा का अभाव बड़ी सीमा तक जिम्मेवार है 

समाज के तथाकथित ठेकेदार जिन्होंने समाज का ठेका ले रखा है, अपने सम्मान की रक्षा में कुछ भी करवा सकते हैं। अमानवीय अत्याचार तो इनके लिए बहुत छोटी बात है और किसी की जान लेना कोई बड़ी बात भी नहीं। एक समय में सामंतवादी प्रथा का इतना दबदबा था कि अपनी साख बनाये रखने के लिए ये पूरा का पूरा क़स्बा मिटा डालते थे पर झुकने या समझौता करने जैसी कोई बात इनके शब्दकोश में नहीं होते थे। समय बहुत बदला। गुलामी की ज़ंजीरें टूटीं। पर कुछ स्थानों में अपने नियम-क़ानून आज भी चलते हैं। उनके लिए न्यायालय बहुत दूर हैं। समाज के ऐसे वर्ग देश की मुख्यधारा से कटे हुए हैं। उनमंे शिक्षा का घोर अभाव है। निम्न जातियों में भी जो सबसे उच्च हैं वो अपना दबदबा  कायम रखने के लिए कभी अंतर्जातीय विवाह नहीं पसंद करते। इससे वे अपनी मांन्यताओं या परम्पराओं को विखंडित होना मानते हैं। मूल कारण इनके पीछे फिर वही है, यानी अज्ञानता, विचारों के परस्पर आदान-प्रदान का अभाव और क्षेत्र विशेष की व्यवस्था में आमूल परिवर्तन को अपनाने से दूर भागना। सूचना का अधिकार इन भूभागों में पहुँचा ही नहीं। स्वयं सेवी संस्थाएं भी इन तक नहीं पहुँचती जब तक की कोई हादसे की खबर सार्वजनिक न हो जाए। वीरभद्र की घटना को ही लीजिये। विजातीय लड़के से प्रेम करना इतना बड़ा अपराध माना गया कि लड़की को पूरे पंचायत के सामने नंगा खड़ा कर पीटा गया और साथ में गाँव के बड़े-बुज़ुर्गों के सामने उस लड़की से सामूहिक बलात्कार करने का फैसला सुनाया गया। प्यार करने का अपराध किसी भी कीमत पर लड़की की जान से बड़ा नही था। ऑनर किलिंग का एक और हालिया घटना बोकारो के निकटवर्ती गाँव से जुड़ा हुआ है। मामला अंतर्जातीय विवाह का और फैसला मानवता की सारी हदों को पार करता हुआ बेहद संवेदनशील। लड़की के भाई को आदेश दिया गया कि वह लड़के की बहन का रेप करे। भला ऐसी सज़ाएँ कानून की किस किताब में लिखी हैं? पिछले दिनों ओडि़सा की एक जनजाति में 18 साल की युवती के गर्भवती होने की सूचना आयी और पंचायत ने उस अविवाहित युवती को नंगे बदन गाड़ी से बाँध कर कई किलोमीटर तक सड़क पर खिंचवा डाला। अंततः उसकी मृत्यु हो गयी। इन सभी घटनाओं में एक बात कॉमन है, वह यह कि ये सभी गाँव-देहात में बसने वाली पिछड़ी जातियों में ज्यादा प्रचलित है। ज़ाहिर है, उन इलाकों में शिक्षा का घोर अभाव है। साहित्य की बातें तो साधारण पढ़े-लिखे परिवारों में भी नहीं समझा जाता है, फिर इन कस्बों में भला कौन समझेगा। ज़रुरत है इनमे जागरूकता लाने की। वह भी मोटी-मोटी पोथियों से नहीं, हलके-फुल्के संवादों से। नुक्कड़ नाटक, नौटंकी या चौपाल के माध्यम से जागरूकता लाने की पहल करनी होगी। हरियाणा के ग्रामीण इलाकों में प्रचलित खाप व्यवस्था भी अंतर्जातीय  प्रेम प्रसंग को अपने सम्मान से जोड़कर देखता है और ऐसी घटनाएं जब तक राष्ट्रीय समाचारों का हिस्सा बनतीं हैं, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है। उन जोड़ों को कुसूरवार ठहराते हुए अपमानित किया जाता है और कठोर सज़ाएं दी जातीं हैं।
     ऑनर किलिंग का आधार जातीय संकीर्णता रही है। विभिन्न समाज सुधारकों द्वारा इसके उन्मूलन के प्रयास किये गए, पर यह अब भी कायम है। जातीयता और अपने मापदंडों से परे कोई काम इनकी आन, बान और शान पर बट्टा लगने जैसा है। इसलिए ये अनुचित और अनैतिक कार्य करते हैं। यह निश्चित है कि जब तक जातीय संकीर्णता रहेगी, तब तक समाज में जाति-पाँति, छुआछूत, ऊँच-नीच आदि की भावना व्याप्त रहेगी। एकता, समानता और हम की भावना का अभाव रहेगा। सरकार को जातीयता के नाम पर हो रहे भेदभावों को दूर करने के लिए यथासंभव कदम उठाने होंगे, नयी क़ानून व्यवस्था बनाकर उनका कड़ाई से पालन करना होगा। कबीर ने आज से दो सौ साल पहले समाज की बुराइयों की जड़ संकीर्ण जातीयता बताई थी, इसलिए उसने, ‘‘जाती पाँति पूछे नहीं कोई, हरि को भजे सो हरि का होई’’ कहकर जातीयता को ख़त्म करने की चुनौती दी थी। एक साहित्यकार का आयाम बहुत विस्तृत होता है। वह अपनी कलम को तलवार बना कर समाज के उक्त ठेकेदारों की सोच को बदल सकता था। अपनी लेखनी के माध्यम से जाति व्यवस्था का विरोध करते हुए उन्नति के मार्ग को प्रशस्त कर सकता है। ऋग्वेद की एक उक्ति में कहा गया, ‘‘पुरान पुमासं परि पातु विश्वत।’’ भारतीयों को अधिकार और सामजिक न्याय दिलाने का संघर्ष प्राचीन है। शिक्षा का समान अधिकार वैदिक काल में था जो मुग़ल काल में नगण्य हो गया। 1908 ईस्वी में मालवरी द्वारा स्थापित सेवा सदन सोसाइटी तथा 1914 ईस्वी में वुमन मेडिकल सर्विस संस्था आदि ने शिशु स्वास्थ्य, मातृत्व की प्रगति और विधवाओं को नौकरियाँ दिलाने जैसे प्रशंसनीय कार्य किये। ज़मींदारी उन्मूलन का निर्णय एक क्रांतिकारी कदम था। पर देश के आंतरिक भागों में पंचायत या खाप के फैसले अब तक मान्य हैं। पंचायती राज के अंतर्गत स्थानीय स्वयंसेवी संस्थाएं छोटी-मोटी समस्याओं को सुलझाने में कामयाब हैं। लेकिन इन्हें अपने स्तर से उठकर थोड़ा लचीला और व्यापक होना होगा। शादी-विवाह जैसे मामलों में जहाँ अंतर्जातीय सम्बन्ध बनाने की बात आती है, इन संस्थाओं को निजता से परे संबंधों की गरिमा पर ध्यान देना होगा। एक मज़बूत क़ानून व्यवस्था के तहत पंचायतों के अमानवीय निर्णयों को पूरी तरह ख़त्म कर देनी चाहिए।  
     मानव अधिकार प्राकृतिक है। समस्त व्यक्तियों को समाज में प्रतिष्ठा के साथ जीवन यापन के मौलिक अधिकार मिलने चाहिए। एक कल्याणकारी राष्ट्र के लिए धर्म, संस्कृति और शिक्षा के क्षेत्र में लिंग, जाति या भाषा में भेदभाव नहीं  होनी चाहिए। इन विषमताओं को दूर कर मनुष्य को उसका मौलिक अधिकार देना चाहिए क्योंकि अधिकार ईश्वर प्रदत्त है न कि मानव प्रदत्त।

  • डी.-15, सेक्टर- 9, पो.ओ. कोयलानगर, जिला धनबाद-826005, झारखण्ड / मो. 09431320288


विनोद सागर




मूल्यों में बदलाव की इच्छुक नई पीढ़ी ही उदासीन है
01. ‘ऑनर किलिंग’ की घटनाएँ इसलिए बढ़ रही हैं कि लोगों में आज के इस शैक्षणिक परिवेश में भी झूठे आत्मसम्मान की मानसिकता हावी है। आज भी लोग पूर्वाग्रहों से इस कदर ग्रसित हैं कि वे खुद को स्वयंभू भूमिका में देख रहे हैं। यही कारण है कि वे नयी विचारधारा वाली नई पीढि़यों के साथ सामंजस्य स्थापित नहीं कर पा रहे हैं, क्योंकि उनके मन में यह विचार घर कर गया है कि अगर वे नई पीढि़यों को साथ लेकर चलेंगे, तो उनकी सदियों से बरकरार प्रतिष्ठा एक पल में ध्वस्त हो जाएगी। इसलिए जब भी उनके घर की लड़की अपने पसंद के लड़के के साथ जीवन-यापन करना चाहती है, तो वे अपनी झूठी शोहरत को बरकरार रखने हेतु आनन-फानन में उस लड़की के साथ ‘ऑनर किलिंग’ जैसा अमानवीय व्यवहार कर बैठते हैं।
02. विभिन्न जाति समूहों के बीच अन्तर्संबंधों की मिकेनिज़्म (प्रक्रिया) मुझको कागज के बने उस गुलाब की तरह लगता है जो खूबसूरत रहने के बावज़ूद खुशबू से रहित होता है। आज जितने भी अन्तर्सम्बंध स्थापित हो रहे हैं सब के सब भौतिकवादिता में लिप्त हो रहे हैं। हाँ यह काफी हद तक सच है कि विभिन्न जाति समूहों के बीच अन्तर्संबंधों की प्रक्रिया झूठे आत्मसम्मान और विलासिता से ऊपर उठकर जब विवाह जैसी पवित्र संबंध का रूप लेना चाहती है तब यही घनिष्ठता ‘ऑनर किलिंग’ का कारण बन जाता है।
03. हाँ यह सौ फीसदी सच है कि साहित्य जातियों-समूहों-समुदायों की विषमताओं को युगों से आइना दिखाता आ रहा है, पर वर्त्तमान में ऐसी प्रवृत्तियों की रफ्तार अत्यन्त धीमी ही नहीं, बल्कि विलुप्ति के कगार पर है, क्योंकि आज का साहित्य पूँजीपतियों के घरों में बन्धक बनकर रह गया है। आज का साहित्य बाजारवाद की भाषा बोल रहा है। आज उसे ‘‘मुन्नी बदनाम हुई’’ और ‘‘उलाला-उलाला’’ करके लाखों कमाने से फुर्सत कहाँ कि वह ‘ऑनर किलिंग’ जैसी गंभीर समस्या के निदान को अपना उद्देश्य बना सके।
04. समूहों के पारस्परिक सरोकार और उनमें विकसित होने वाली नई व्यवहार दृष्टि में ‘ऑनर किलिंग’ के कारणों का समाधान प्रस्तुत करने में कोई भूमिका इसलिए नहीं निभा पा रहे हैं कि वे यह सोचते हैं कि जिनकी यह समस्या है वही इसका निदान भी खोजेें। हम क्यों इस पचड़े में पड़कर अपना माथा खराब करें या बिन मोल की लड़ाई अपने जिम्मे लें?   
05. बिल्कुल ही नहीं। आज तक सरकार के स्तर पर कानून के कठोर नियमों के माध्यम से किसी भी सामाजिक समस्या का निदान ना तो कभी हुआ है और ना ही भविष्य होता हुआ प्रतीत हो रहा है। आज भी दहेज एवं भ्रूण-हत्या जैसी मूलभूत समस्याएँ यथावत् खड़ी है। अगर सरकार कानून के मार्फत इस पर अंकुश लगाना चाहती है, तो सर्वप्रथम उसे उनकी सामाजिक मनःस्थितियों के दौर से गुजरना होगा और समाज के उन लोगों को विश्वास में लेना होगा जो ‘ऑनर किलिंग’ को ही समस्या का निदान समझते हैं। 
06. ‘ऑनर किलिंग’ की घटनाओं को रोकने के लिए साहित्यकार के रूप में हम तेजी से बदलते मूल्यों में विश्वास करने वाली नई पीढ़ी की भूमिका को उदासीनता के रूप में देखते हैं, क्योंकि आज की युवा पीढ़ी को बस अपने कैरियर का ख्याल रह गया है। उसका इन सामाजिक सरोकारों से कोसों तक कुछ भी लेना-देना नहीं है और इसका सबसे बड़ा कारण है उनके पाठ्यक्रम से नैतिक शिक्षा का विलुप्तीकरण। आज के मध्यम वर्ग के कुछ युवा प्रेम-विवाह जैसी गतिविधियों में तो रूचि दिखाते हैं, पर सामाजिक रूढि़वादियों के मकड़जाल के कारण वे ‘ऑनर किलिंग’ का शिकार होते जा रहे हैं।

  • सागर निवास, कुम्हार टोली, पो. जपला, जिला पलामू-822116, झारखंड / मो. 09905566775

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