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शनिवार, 22 सितंबर 2018

किताबें

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  07,   अंक  :  11-12,   जुलाई-अगस्त 2018 

{लेखकों/प्रकाशकों से अनुरोध है कृपया समीक्षा भेजने के साथ पुस्तक की एक प्रति (एक से अधिक नहीं) हमारे अवलोकनार्थ डा. उमेश महादोषी, 121, इन्द्रापुरम, निकट बी.डी.ए. कालौनी, बदायूं रोड, बरेली, उ.प्र. के पते पर अवश्य भेजें। समीक्षाएँ ई मेल द्वारा कृतिदेव 010 या यूनिकोड मंगल फॉन्ट में वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल के रूप में ही भेजें।स्कैन करके या पीडीएफ में भेजी रचनाओं का उपयोग सम्भव नहीं होगा। बिना पुस्तक भेजे समीक्षा-प्रकाशन संभव नहीं होगा।


डॉ. उमेश महादोषी






हिन्दी लघुकथा का मार्गदर्शक दस्तावेज

      कथा लेखन प्रमुखतः मनुष्य और उसके समग्र परिवेश पर केन्द्रित होता है। लेकिन लघुकथा से इतर विधाओं में मनुष्य और उसका परिवेश अपने विविध अन्तर्सम्बन्धों के साथ सामने आता है जबकि लघुकथा में मनुष्य के साथ उसका परिवेश उसे प्रभावित करने वाले कारक के रूप में सामने आता है। इसलिए लघुकथा सृजन मनुष्य और उसके समकालीन (अद्यतन) परिवेश के सूक्ष्म अध्ययन की अपेक्षा करता है। 
      समकालीन लघुकथा के अब तक के सृजन में मनुष्य के परिवेश का सूक्ष्म अध्ययन तो स्पष्टतः दिखाई
देता है, लेकिन मनुष्य का अध्ययन अपेक्षित सूक्ष्मता और नियोजित दृष्टि के साथ दिखाई नहीं देता। जितना दिखता है, उसमें बहुत कुछ सांयोगिक है। लघुकथा में सृजनात्मक कमजोरियों और कहीं-कहीं गम्भीरता के अभाव की जो बातें कही जाती हैं, उनका कारण निसन्देह मनुष्य (मुख्यतः परिवेश से प्रभावित होने एवं प्रतिक्रिया देने के सन्दर्भ में) को अपेक्षित रूप में समझने (अध्ययन) की कमी है। दूसरे रूप में हम कह सकते हैं कि मनुष्य के मनोविज्ञान और मनोविश्लेषण से एक लघुकथाकार को जिस तरह जुड़ना चाहिए, वह लघुकथा के कई अच्छे उदाहरण उपलब्ध होने के बावजूद उससे काफी दूर है।
      डॉ. बलराम अग्रवाल ने लघुकथा में गम्भीर सृजन के साथ लघुकथा के समग्र रूप-स्वरूप को समझने का प्रयास आरम्भ से ही किया है। इसी का परिणाम है कि लघुकथा के अनेक पक्षों पर उन्होंने गम्भीर आलोचनात्मक आलेख लिखे और शोध के लिए भी उन्होंने ऐसे विषय का चुनाव किया, जो लघुकथाकारों को लघुकथा सृजन से पूर्व लघुकथा की आधारीय भावभूमि को सूक्ष्मता से समझने एवं ग्रहण करने के लिए प्रेरित करने में सक्षम है। उनका यही शोधकार्य महत्वपूर्ण ग्रन्थ ‘हिन्दी लघुकथा का मनोविज्ञान’ के रूप में हमारे सामने है। मनुष्य के मनोविज्ञान और मनोविश्लेषण को समझने के साथ समकालीन लघुकथा को उसके आधार पर विभिन्न कोणों से परखने का काम इस विश्लेषण में किया गया है, जो निश्चित रूप से लघुकथा सृजन की आवश्यकता के सन्दर्भ में मनुष्य को सूक्ष्मता से समझने का प्रेरक प्रयास है।
       इस ग्रन्थ में सम्पूर्ण विश्लेषण को प्रमुखतः चार भागों (अध्यायों) में बाँटा गया है। पहले भाग ‘लघुकथा: परम्परा और विकास’ में लघुकथा के उपलब्ध इतिहास के सन्दर्भ में ‘समकालीन लघुकथा’ की मौलिकता और सदृश रचनाओं से उसकी भिन्नता को विस्तृत विश्लेषण के साथ स्पष्ट किया गया है। इससे समकालीन लघुकथा के उद्भव का मनुष्य के वर्तमान (अद्यतन) परिवेश से सम्बन्ध स्पष्ट होता है और समकालीन लघुकथा स्पष्टतः आधुनिक काल की रचना सिद्ध होती है।
      दूसरे अध्याय ‘समकालीन लघुकथा: विभिन्न आयाम’ में ‘समकालीनता’ के अभिप्राय को स्पष्ट करते हुए उसके सन्दर्भ में समकालीन लघुकथा का परीक्षण किया गया है। साथ ही प्रमुख समकालीन लघुकथाकारों का संक्षिप्त परिचय दिया गया है, जिन्होंने लघुकथा को गहराई से समझते हुए ‘समकालीन लघुकथा’ के रूप में प्रतिष्ठित करने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
      ‘संवेदना, सृजनशीलता और मनोविज्ञान’ नामक तीसरे भाग में सृजन की आधारभूमि के रूप में संवेदना को विस्तार से समझने का प्रयास किया गया है। संवेदना और सृजनशीलता के सम्बन्ध के दृष्टिगत मनुष्य के मनोविज्ञान और मनोविश्लेषण के सन्दर्भों पर प्रकाश डालते हुए संवेदना को समझना बेहद रुचिकर बन पड़ा है। इस अध्याय में सृजन से जुड़ने वाले व्यक्ति के लिए व्यक्ति और समाज के मनोविज्ञान से परिचित होना आवश्यक माना गया है। अभिव्यक्ति के कलात्मक पक्ष के रूप में ‘बिम्ब’ और अभिव्यक्ति के रचनात्मक माध्यम ‘भाषा’ के वास्तविक आशय को भी स्पष्ट किया गया है।
      ग्रन्थ के चौथे और सर्वाधिक महत्वपूर्ण भाग ‘मनोविश्लेषण: सिद्धान्त और विवेचन’ में मनुष्य के मनोविश्लेषण के प्रमुख सिद्धान्तों पर पर्याप्त प्रकाश डाला गया है। इनमें फ्रायड, एलफ्रेड एडलर, कार्ल गुस्ताव युंग, ओटो रांक, सैंडर फेरेंजी, विल्हेम राइक, करेन हार्नी, एरिक फ्राम, हेरी स्टैक सलीवन के सिद्धान्त शामिल हैं। फ्रायड के सिद्धान्त सर्वाधिक महत्वपूर्ण माने जाने के बावजूद अन्य मनोविज्ञानियों के सिद्धान्त भी मनुष्य को समझने में महत्वपूर्ण सिद्ध होते हैं। यद्यपि अन्य विद्वानों की दृष्टि में एक तथ्य यह भी हो सकता है कि भारतीय साहित्य, जो हर दृष्टि से समृद्ध है, में भी मनुष्य को मनोविश्लेषण की दृष्टि से समझने के लिए सूत्र खोजे जा सकते हैं। इस सन्दर्भ में, इतना समझना पर्याप्त होना चाहिए कि एक तो प्रत्येक शोध का एक दायरा होता है और दूसरे, समकालीन मनुष्य को समकालीन मनोविश्लेषण के सिद्धान्तों के परिप्रेक्ष्य में कहीं अधिक अच्छे से समझा जा सकता है। एक और बात, लघुकथा-सृजन में मनुष्य और उसके परिवेश के सूक्ष्म अध्ययन की दृष्टि से इस तरह का शोध-विश्लेषण किसी भी अबलम्ब के सहारे किया जाये, उसका निष्कर्ष उसी बिन्दु पर जाकर ठहरेगा, जो डॉ. बलराम अग्रवाल जी के अपने इन शब्दों से निर्धारित होता है- ‘‘...और व्यक्ति की सामाजिक और सांस्कृतिक पृष्ठभूमि के चित्रण का काम ही तो समकालीन लघुकथाकार कर रहे हैं। इस कार्य को उत्कृष्टता, परिपूर्णता, कुशलता के साथ सम्पन्न करने के लिए आवश्यक है कि वे समकालीन मनोविश्लेषण की धारा को, समकालीन मनोविश्लेषकों द्वारा गहन अध्ययन के बाद प्रस्तुत व्यक्ति चरित्र सम्बन्धी अनेक रहस्यों को, उनकी परतों को जानें, तब आगे बढें। आगे बढ़ चुके हैं तो इनके द्वारा प्रस्तुत सिद्धान्तों के आलोक में उन्हें जाँचें, परखें। उनका व अपना आकलन करें।...’’
      प्रत्येक अध्याय के आरम्भ में एक श्रेष्ठ लघुकथा और ग्रन्थ के अन्त में नई पीढ़ी के कुछ प्रमुख लघुकथाकारों की श्रेष्ठ लघुकथाएँ पाठकों के विश्लेषणार्थ दी गई हैं। इसका अपना प्रतीकात्मक महत्व है। निसन्देह यह ग्रन्थ समकालीन लघुकथाकारों को समकालीन लघुकथा की सृजन-प्रकिया को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा।
हिन्दी लघुकथा का मनोविज्ञान : शोधालोचना : डॉ. बलराम अग्रवाल। प्रकाशक : राही प्रकाशन, एल-45, गली सं.-5, करतार नगर, दिल्ली। मूल्य : रु. 595/-। सं. 2017।


  • 121, इन्द्रापुरम, निकट बीडीए कॉलोनी, बदायूँ रोड, बरेली-247001, उ.प्र./मो. 09458929004

बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक  :  05-06,  जनवरी-फरवरी 2017



।। कथा प्रवाह ।।

बलराम अग्रवाल




वे दो
      यह रेगिस्तानी ठूँठ-सा था। अकेला। उपेक्षित।
      और वह सद्य-प्रवाहिता नदी-सी। अपनाई और छोड़ी जाती हुई।
      हालात ने इसे बहरा बना दिया था।
      और उसे पगली।
      यह सुन नहीं पाता था।
      और उसे बकते रहने की बीमारी लग गई थी।
      मैंने देखा कि धरती के एक भीड़-भरे इलाके में दोनों एक दिन आमने-सामने बैठे थे। उकड़ू। इसने अपनी दोनों कुहनियों को घुटनों पर टिका रखा था और चेहरे को मुट्ठियों पर। उसने अपनी बायीं-हथेली इसके नंगे कंधे पर रखी हुई थी।
      यह मुँह-बाये अचरज से उसे ताक रहा था। जैसे कि मुद्दत बाद किसी ने अपना समझा हो।
      वह दायाँ-हाथ हवा में लहरा-लहरा कर अपनी व्यथा इसे सुनाए जा रही थी। जैसे कि जन्मों बाद मन की पीर सुनने वाला कोई मिला हो।
      यह पिघलता जा रहा था उपेक्षित कंधे पर गर्म हथेली के स्पर्श और उसके टिकाव से।
      वह घुली जा रही थी। अन्तहीन व्यथाओं को कहते-कहते, कहते-कहते।

अगर तू खुदा है

      अलग-अलग आदमी में अलग-अलग खटक होती है। कभी किसी बात को लेकर तो कभी किसी ‘आदमी’ को लेकर। बहुत-से लोगों में मुझे लेकर भी खटक रहती है और वो जिन्दगी भर रहती है। एक बेचारा ऐसा था जिसने शाम को घर लौटते समय शराब की बोतल खरीदने और दुकान से ही पीते हुए चलने को अपना नियम बना रखा था। रास्ते में एक मस्जिद पड़ती थी। वह उसके सामने रुकता। बोतल में बची बाकी सारी शराब को गले में उतारता और तर्जनी उठाकर मुझे चुनौती देता-
      अगर तू खुदा है तो मस्जिद को हिलाकर देख।
      या दो घूँट इसके पी और मस्जिद को हिलता देख।।
      ‘जुगनू’ नाम का वह शायर जब तक जिन्दा रहा, मुझे चुनौती देता रहा। असलियत तो यह है कि वह मरने के बाद आज तक भी मुझे चुनौती देता-सा नज़र आता है।
      दरअसल, मन्दिर को, मस्जिद को, गिरिजा को, गुरुद्वारे को एक बारगी शैतान तो हिला सकता है, मैं या मेरा कोई बंदा नहीं।
  • एम-70, उल्धनपुर, दिगम्बर जैन मन्दिर के पास, नवीन शाहदरा, दिल्ली-32/मो. 08826499115

रविवार, 12 नवंबर 2017

लघुकथा विमर्श

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक  :  01-04,  सितम्बर-दिसम्बर 2017




।।लघुकथा विमर्श।।

{इस ब्लॉग के जुलाई-अगस्त 2017 अंक तक लघुकथा सम्बंधी आलेख एवं साक्षात्कार ‘अविराम विमर्श’ स्तम्भ में प्रकाशित किए जाते रहे हैं। इस अंक से लघुकथा विमर्श सम्बंधी समस्त सामग्री इस नए स्तम्भ ‘लघुकथा विमर्श’ स्तम्भ में ही जाएगी। कृपया पूर्व में प्रकाशित लघुकथा विमर्श की खोज ‘अविराम विमर्श’ स्तम्भ में ही करें।} 



डॉ. बलराम अग्रवाल




लघुकथा में नेपथ्य
{‘लघुकथा में नेपथ्य’ के मुद्दे को उठाने वाला यह लघु आलेख बलराम अग्रवाल जी ने 1991 में लिखा था और ‘पड़ाव और पड़ताल खण्ड-17’ में संकलित है। ‘नेपथ्य’ की भूमिका लघुकथा सृजन में बेहद महत्वपूर्ण होती है, लेकिन लघुकथा समालोचना में इसे अपेक्षित महत्व नहीं दिया गया। हमें लगता है इस पर कई कोंणों से चर्चा हो सकती है और लघुकथा समालोचना का एक विशिष्ट आधार बन सकता है ‘नेपथ्य’। नए लघुकथाकार ‘नेपथ्य’ को सही सन्दर्भ में समझकर उसके उपयोग के बारे में जागरूक बनें, इसी उद्देश्य से यह आलेख यहाँ प्रस्तुत है।}

      लघुकथा, कहानी और उपन्यास की प्रकृति और चरित्र में इनके नेपथ्य के कारण भी आकारगत अन्तर आता है। उपन्यासकार स्थितियों-परिस्थितियों और घटनाओं को यथासम्भव विस्तार देता है तथा पाठक के समक्ष पात्रों की मनःस्थिति, चरित्र, परिस्थितियाँ, गतिविधियाँ एवं तज्जनित परिणाम तक का ब्यौरा देने को उत्सुक रहता है; इस तरह उपन्यास अत्यल्प या कहें कि नगण्य नेपथ्य वाली कथा-रचना है। कहानीकार जीवन के विस्तृत पक्ष को रचना का आधार नहीं बनाता। इसके अतिरिक्त, जीवनखण्ड से जुड़ी अनेक घटनाओं को विस्तार से लिखने की बजाय उनको वह आभासित करा देना ही यथेष्ट समझता है, क्योंकि गति की दृष्टि से उपन्यास की तुलना में कहानी को एक त्वरित रचना होना चाहिए। अतः उपन्यास की तुलना में कहानी का नेपथ्य कुछ अधिक गहरा और विस्तृत हो सकता है। बावजूद इसके, कहानी का नेपथ्य उपन्यास की प्रकृति और चरित्र से को-रिलेटेड और को-लिंक्ड रहता है, अतः कहानी ने सहज ही उपन्यास जैसी पूर्णता का आभास अपने पाठक को दिया और प्रतिष्ठित उपन्यासकारों व जड़-आलोचकों के घोर विरोध के बावजूद व्यापक जनसमूह के बीच अपनी जगह बना ली। लघुकथा आकार की दृष्टि से क्योंकि कहानी की तुलना में अपेक्षाकृत बहुत छोटी कथा-रचना है, अतः जाहिर है कि उसका नेपथ्य कहानी की तुलना में बहुत अधिक विस्तृत और गहरा होगा; लेकिन उसे कहानी के नेपथ्य से उसी प्रकार को-रिलेटेड और को-लिंक्ड रहना चाहिए जिस प्रकार कहानी का नेपथ्य उपन्यास के नेपथ्य के साथ रहता आया है। लघुकथा-लेखक इस तथ्य से अक्सर ही अनभिज्ञ और लापरवाह रहे हैं। उन्होंने अधिकांशतः ऐसी रचनाएँ लघुकथा के नाम पर लिखी हैं जिनमें प्रस्तुत रचना तथा उसके नेपथ्य में एक और सौ का अनुपात नजर आता है जो किसी भी रचना के लिए स्वस्थ स्थिति नहीं है। कोई भी पाठक किसी रचना के अन्धकूप सरीखे नेपथ्य में भला क्यों उतरना चाहेगा? इसी के समानान्तर एक सोच यह भी है कि लेखक पाठक-विशेष या रचना-विधा के सिद्धान्त-विशेष को ध्यान में रखकर रचना क्यों करे? अपने आप को अभिव्यक्ति के धरातल पर उन्मुक्त क्यों न रखे? वस्तुतः ‘अभिव्यक्ति के धरातल पर उन्मुक्त’ रहने का अर्थ उच्छृंखल अथवा अनुशासनहीन हो जाना नहीं माना जाना चाहिए। इंटरनेट के माध्यम से 5 शब्दों से लेकर 500 या ज्यादा शब्दों तक की ‘Flash Story’ लिखना सिखाने वाली व्यावसायिक साइटें कथा-विधा का भला कर रही हैं, कथा-लेखकों का भला कर रही हैं या स्वयं अपना- यह तो समय ही तय करेगा; फिलहाल यहाँ हिन्दी की कुछ कौंध-कथाएँ यानी 'Flash Story' साभार प्रस्तुत हैं-
एक
      राजपथ से गुजरती हुई सैनिक टुकड़ी क्विक मार्च करते हुए गा रही थी- हम सब एक हैं। फुटपाथ पर खड़े पुलिस के अफसर, सेठ रामलाल और प्रसिद्ध जुआरी गोवर्द्धन एक दूसरे की आँखों में हँसते हुए न जाने क्यों गाने लगे- हम सब एक हैं।
दो
      शेर गुर्राया, हिरण को खूँखार दृष्टि से देखा और फिर हिरण को कुछ किए बगैर गुफा के अँधेरे में चला गया। दोनों एक ही कश्ती के सवार थे।...
      बाहर आदमी घात लगाए बैठा था।
      इनके साथ ही मैं Wits अर्थात विलक्षण-वाक्यकथा की ओर भी लेखकों/पाठकों और संपादकों का ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा। इन्होंने भी लघुकथा में हो रहे गंभीर प्रयासों को काफी धक्का पहुँचाया है। हिन्दी में लघुकथा के नाम पर प्रचलित Wits के कुछ नमूने निम्न प्रकार हैं-
एक
      इंपाला’ की पिछली सीट पर बैठे अल्सेशियन को देखकर अंगभंग भिखारी बच्चों ने ठंडी साँस लेकर कहा, “काश! हम भी ऐसे होते!”
दो
      डीयर ‘इतिहास’, तुम्हारे अध्याय अब कलमें नहीं, मैं लिखूँगी...
      मैं हूँ ‘बन्दूक’
तीन
      मैंने जब भी डुबकी लगानी चाही, सारा मानसरोवर चुल्लू हो गया!
चार
      सामान्य-ज्ञान की परीक्षा में एक परिक्षार्थी एक सरल से प्रश्न पर अटक गया। प्रश्न था-’भारत का प्रधानमन्त्री कौन है?’ उत्तर परीक्षार्थी को पता था, इस पर भी वह परेशान था। अन्ततः उसने लिख ही दिया, पर उसमें एक वाक्य और बढ़ा दिया। उसने लिखा- आज भारत के प्रधानमन्त्री श्री... हैं, परचा जाँचते समय कौन होगा, मालूम नहीं।
      इन विलक्षण-वाक्यकथाओं के लेखकों की हिन्दी-लघुकथा के क्षेत्र में लम्बी कतार है; और इन सब की प्रेरणा के मूल में सम्भवतः सुप्रसिद्ध कथाकार रमेश बतरा की बहुचर्चित लघुकथा ‘कहूँ कहानी’ रही है, जो निम्न प्रकार है-
      ए रफीक भाई! सुनो...उत्पादन के सुख से भरपूर थकान की खुमारी लिए, रात मैं घर पहुँचा तो मेरी बेटी ने एक कहानी कही, ”एक लाजा है, वो बो......त गलीब है।’’
      यहाँ हमारा हेतु क्योंकि लघुकथा की रचनात्मक प्रकृति और चारित्रिक तीक्ष्णता तथा उसके सही स्वरूप एवं स्तर को रेखांकित करना भर है, अतः ‘कौंधकथा’ और विलक्षण-वाक्यकथा समझी जाने वाली ऊपर उद्धृत हिन्दी रचनाओं के साथ उनके लेखक और संदर्भित पत्र-पत्रिका, संग्रह-संकलन अथवा संपादक के नाम आदि का उल्लेख नहीं किया गया है। यह ठीक है कि कोई अकेला आदमी लघुकथा का नियन्ता नहीं हैं, और यह भी कि किसी भी दृष्टि से हमारे द्वारा हेय तथा त्याज्य समझी जाने वाली, लघुकथा शीर्ष तले छपने वाली Flash Story व Wits अन्य आलोचकों-समीक्षकों अथवा संपादकों को प्रभावशाली महसूस हो सकती हैं; तथा हमारे द्वारा स्वीकार्य रचनाएँ त्याज्य। इस बारे में विवाद की गुंजाइश हमेशा बनी रहेगी, परन्तु लघुकथा को ‘कौंधकथा’ और ‘विलक्षण-वाक्यकथा’ से अलग रखना ही होगा।
      मैं पुनः नेपथ्य बिंदु पर आना चाहूँगा। वस्तुतः नेपथ्य वह वातायन है जिसे लेखक अपनी रचना में तैयार करता है और पाठक को विवश करता है कि वह उसमें झाँके तथा रचना के भीतर के व्यापक और गहरे संसार को जाने। कई बार मुख्य-कथा के एक या अनेक पात्र भी लघुकथा के नेपथ्य में रहते हैं। लघुकथा में उनका सिर्फ आभास मिलता है, वे स्वयं उसमें साकार नहीं होते। दरअसल, घटनाओं और स्थितियों का यह प्रस्फुटन लघुकथा के नेपथ्य में उतरे उसके पाठक के मन-मस्तिष्क में होने वाली निरन्तर प्रक्रिया है। अगर कोई रचना, जो इस प्रक्रिया को जन्म देने में अक्षम है, वह निःसंदेह अच्छी रचना नहीं हो सकती। अपने इसी गुण के कारण लघुकथा गंभीर प्रकृति के पाठक को जिज्ञासु बनाए रखने में सफल रह सकी है। इसी बात को मैं यों भी कहना चाहूँगा कि अपने समापन के साथ ही जो लघुकथा पाठक के भीतर विचार की एक श्रृंखला जाग्रत कर देने की क्षमता रखती है, वह एक सफल लघुकथा है।
      लघुकथा में नेपथ्य की उपस्थिति को जानने के बाद यह अवधारणा पूर्णतः निर्मूल सिद्ध हो जाती है कि कोई कथाकार लघुकथा लिखता है क्योंकि वह कथा को कहानी जितना विस्तार दे पाने में अक्षम है। सही बात यह है कि लघुकथाकार कथा के मात्र संदर्भित बिंदुओं पर कलम चलाता है और शेष को नेपथ्य में बनाए रखता है। यही उसका कथा-कौशल है और यही लघुकथा की प्रभावकारी क्षमता।
  •  एम-70, जैन मन्दिर के सामने, नवीन शाहदरा (उल्धनपुर), दिल्ली-110032/मो. 08826499115

रविवार, 5 नवंबर 2017

किताबें

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  6,   अंक  :  11-12,  जुलाई-अगस्त  2017






डॉ. बलराम अग्रवाल




खिड़कियों से झाँकते जीवन और प्रकृति के उपादान




डॉ.शील कौशिक हरियाणा की सम्मानित साहित्यकार हैं। उन्होंने गद्य और काव्य की अनेक विधाओं में लेखन किया है और अपनी पहचान बनाई है। ‘खिड़कियों से झांकते ही’ में कुल 153 कविताएँ संग्रहीत हैं। इन समस्त कविताओं को कवयित्री ने दस वर्गों में विभाजित करके संग्रह का रूप दिया है। संग्रह की कविताएँ इसलिए भी ध्यान आकर्षित करती हैं कि इन सभी में अभिव्यक्ति को शाब्दिक विस्तार देने से बचा गया है। यह तो निर्विवाद है कि अनुभूति जितनी सघन होगी, अभिव्यक्ति उतनी सुगठित, सटीक और प्रभावपूर्ण होगी। कवयित्री की अनुभूतिजन्य पीड़ा को उनके द्वारा लिखित संग्रह की भूमिका ‘मन की बात’ में भी जगह-जगह पर महसूस किया जा सकता है। यथा, ‘‘पहाड़ की साँसें बेदम हैं, जंगल सिमट रहे हैं, नदियाँ मर रही हैं, झीलों की गोद सूखी और बंजर है। ऐसे में प्रकृति की लय बिगड़ना तय है और प्रकृति की लय बिगड़ना ही प्रलय की भूमिका बनाता है।’’ कवयित्री के इन शब्दों में मात्र मानवता के प्रति नहीं, चर-अचर समूचे परिदृश्य के प्रति चिंता का भाव परिलक्षित है। जो व्यक्ति इस भाव के साथ जीता है, वस्तुतः वही कवि है, वही मनुष्य है। ‘पहाड़ की साँसें
बेदम हैं’ में वह लिखती हैं- ‘‘फुरसत में कभी/पत्थरों की कहानी/उनकी जुबानी सुनना/बहुत छोटा लगेगा/अपना दुःख तुम्हें।’’
      निःसंदेह, पत्थरों की कहानी उनकी जुबानी सुनने की जितनी और जैसी फुरसत मनुष्य को चाहिए, वैसी वह कभी निकाल नहीं पाता है और इसीलिए पहाड़ के दुःख को भी समझ नहीं पाता है। ‘‘मेरे दादा और पहाड़/कभी-कभी मुझे/एक-जैसे लगते हैं/जो मौन हैं/अनगिनत चोटों के बावजूद।’’ तथा ‘‘एक दिन निराश/हताश, दुखी पहाड़/अपनी प्रियतमा/नदी से/बतिया रहा था/नदी, रोते हुए/बही जा रही थी।’’ जैसी अभिव्यक्ति के लिए गहन संवेदनशील हृदय चाहिए। कवयित्री के पास सपाट शब्द ही नहीं हैं, अधिकतर कविताओं में उनकी अभिव्यक्ति आलंकारिक ही है। ‘भीगी मुस्कानें लिए बादल’ की यह कविता देखिए- ‘‘बादल भी दुःख में/धुआं-धुआं होते नजर आते/बेचैनी में इधर-उधर दौड़ते हैं/सुखी होते हैं/तो खूब बरसते हैं।’’ इन पंक्तियों  में कवयित्री ने विरोधालंकार का प्रयोग किया है। इसी तरह- ‘‘कितनी अजीब बात है/बदली के बिखरने से ही/बरखा का जन्म होता है/वह फिर-फिर बनती-सँवरती है/फिर से बिखरने के लिए।’’ कवयित्री का मानना है कि व्यक्ति के जीवन में सुर और लय का बिगड़ना ही सारे संताप की जड़ है। इसीलिए बादलों के सुर-ताल का बिगड़ना उसे भयभीत करता है- ‘‘सुर की लय की तरह/बिगड़े हैं आज ये बादल/डर है ये कहीं सितम न ढहाएँ/ओले और बर्फीले तूफान के रूप में।’’
      कविता को अति सूक्ष्म दृष्टि से परखने में सिद्धहस्त डॉ. उमेश महादोषी का मानना है कि ‘‘कविता का सीधा सम्बन्ध जीवन और उसे जीने योग्य बनाने वाले मूल्यों के प्रति समझ विकसित और आत्मसात् करने से होता है। जीवन की इकाई होता है- क्षण; यानी एक ऐसा प्रतिनिधि बिन्दु, जिसमें जीवन का विराट अस्तित्व समाया हुआ होता है। जीवन में होने वाले तमाम परिवर्तन उसके प्रतिनिधि बिन्दुओं यानी क्षण-क्षण में होने वाले परिवर्तनों का समेकित (इन्टीग्रेटिड) अथवा/और प्रभावी (इफैक्टिव) परिणाम होते हैं।’’ (देखें- ‘समकालीन क्षणिका’ अप्रैल 2017) इस परख के मद्देनजर प्रस्तुत संग्रह में डॉ. शील कौशिक की कुछ कविताओं की बानगी देखिए- 
01. ‘‘तूफान में/अपनी माँ से बिछुड़े/शिशु को देखकर/नवांकुर पत्ते चिपक गये हैं/डाल के सीने से/अनजानी आशंका लिए’’। 
02. ‘‘जादूगर बना चाँद/नचाता है लहरों को/अपने इशारों पर/और लहरें कठपुतली बनी/उठती-बैठती हैं/समुद्री आसन पर’’। 
03. ‘‘वृक्ष की खोखल में छुपी चिड़िया/देती है विश्वास-/फिर से दिन बहुरेंगे/लौटेगी फिर चहल-पहल/थम जाएँगे सब/वाद तूफानी’’। 
      सूक्ष्म भावों और विचारों की ऐसी तीव्र अनुभूतियों को, जो रचनाकार के हृदय में स्थित समस्तरीय ऊर्जा के प्रभाव में त्वरित गति से अभिव्यक्त और सम्प्रेषित होती हैं, डॉ. उमेश महादोषी ने ‘क्षणिका’ माना है (पुनः देखें- ‘समकालीन क्षणिका’ अप्रैल 2017)। इस दृष्टि से आकलन करें तो ‘खिड़की से झाँकते हुए’ महत्वपूर्ण क्षणिका संग्रह सिद्ध होता है, जिसके लिए डॉ. शील कौशिक को भरपूर बधाई दी जा सकती है। तथापि यह अवश्य महसूस होता है कि संग्रह की कुछ कविताएँ और चुस्ती और गठन की माँग करती हैं।
खिड़की से झांकते ही : कविता संग्रह : डॉ. शील कौशिक। प्रकाशक : सुकीर्ति प्रकाशन, करनाल रोड, कैथल-136027, हरि.। मूल्य : रु॰ 250/- मात्र। सं. : 2016। 
  •  एम-70, निकट जैन मन्दिर, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032/मो. 08826499115

शुक्रवार, 26 मई 2017

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  6,   अंक  :  05-06,  जनवरी-फ़रवरी  2017




।। कथा प्रवाह ।।



डॉ. बलराम अग्रवाल



घुन वाले खम्भे

‘‘हाँ, तो फिर?’’ आरोप सुनकर सफेदपोश ने तरेड़ के साथ पूछा।
‘‘यह अमानवीय कर्म है!’’ डराने वाले अन्दाज़ में वह दहाड़ा।
‘‘है, तो फिर?’’
‘‘इन गोरखधंधों के खि़लाफ़ राष्ट्रीय स्तर के पेपर्स और चैनल्स को सबूत दूँगा मैं। और...।’’
      ‘‘और?’’ लापरवाह तरीके से मुस्कुराते हुए सफेदपोश ने बीच में ही टोका।
      और...और...’’ जबर्दस्त तनाव के कारण उसका बदन काँप उठा। सफेदपोश की मुस्कान से हत्प्रभ वह तुरन्त सोच नहीं पाया कि ‘और’ के आगे क्या कहे।
      ‘‘तुझे जहाँ जो उखाड़ना है शौक़ से उखाड़...’’ इस बार सफेदपोश ने होठों से मुस्कराहट को हटाकर कहा, लेकिन मेरी तरफ से मानहानि के मुक़द्दमे के लिए तैयार होकर करना उखाड़ना। एक करोड़ का ठोकूँगा।’’
      ‘‘डरा रहे हैं?’’
      ‘‘डरा नहीं रहा, बता रहा हूँ।’’ उसके स्वर में आक्रामक तीखापन था, सबूतों को सँभालकर रखना; कोर्ट में काम आयेंगे।’’
      उसकी हेकड़ी देखकर वह दाँत किटकिटाकर रह गया। बड़ी मोटी खाल का आदमी है!... उसने सोचा.... बहुत ऊपर तक पहुँचाता लगता है पत्ती।
      उसे असंजस में देख, उँगलियों के बीच फँसी सिगरेट की राख को मेज पर रखी एस्ट्रे में झाड़ते हुए सफेदपोश व्यंग्य-भरे लहजे में बोला, अगर मैंने ‘घो...ऽ...र अपराध’ किया है...और तूने सारे सबू...ऽ...त भी जुटा रखे हैं, तो तू मेरे पास क्या करने आया है? सीधा चला क्यों नहीं गया ‘राष्ट्री...ऽ...य स्तर के’ पेपर्स और चेनल्स के पास?’’
      ‘‘सम्बन्धित पार्टी को चेताना होता है उसके खिलाफ कहीं जाने से पहले।’’ वह बोला, ‘‘एक मौका दिया जाता है सँभलने का।’’
      ‘‘सँभलने का मौका!!  क्यों?’’
      ‘‘तकाज़ा है इन्सानियत का! ...उसूल है धन्धे का !!’’ उसकी ढीठता से लगातार चौंकने के बावजूद वह रौब जमाता-सा चीखा, पत्रकार हूँ, कसाई नहीं कि बंदे को चीरने के पैसे तो घरवालों से वसूल कर लूँ और उसके भीतर का माल बाहर वालों को बेच डालूँ। और...और यह ‘तू-तड़ाक’ वाली भाषा! कोई तरीका भी होता है बात करने का या नहीं?’’
      ‘‘तू मेरे ही क्लीनिक में मुझे धमकाने आया है; और मैं तुझसे तमीज़ के साथ बात करूँ!!!’’ सफेदपोश बोला, चल छोड़, क्या लेगा... यह बता।’’
      ‘‘मैं दावत उड़ाने नहीं आया हूँ यहाँ।’’ उसने कड़ेपन से प्रतिवाद किया।
      ‘‘मान ली तेरी बात! चाहता क्या है?’’
      ‘‘इस प्रस्तावनुमा सवाल को सुनकर उसने बात को और-खींचना ठीक नहीं समझा। तुरन्त बोला, आप मित्रवत् सम्मान देंगे तो मैं सहर्ष आपके खि़लाफ़ संघर्ष के रास्ते से हट जाऊँगा।’’
         यह बात सुन सफेदपोश पुनः मुस्कुरा उठा। बोला, ‘‘जब चाहे तब, मित्रवत् बता जाना सम्मान की राशि।’’ फिर उसके चेहरे पर नज़रें गाड़ते हुए काइयाँ अन्दाज़ में पूछ बैठा, ‘‘अच्छा, एक बात बता... मेरे खिलाफ संघर्ष के रास्ते से हटने की बात छोड़; ‘इन्सानियत’ दिखाने वाली इस पत्रकारिता से हटने की कितनी क़ीमत लेगा?’’              
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