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रविवार, 30 सितंबर 2018

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  08,   अंक  :  01-02,   सितम्बर-अक्टूबर 2018 




।।कविता अनवरत।। 


प्रतापसिंह सोढ़ी



गज़लें


01.
उन्हें सताने में लुत्फ़ आया
हमें मनाने में लुत्फ़ आया

थी रास्ते में इक दीवार
उसे गिराने में लुत्फ़ आया

हमें तलब थी के मुखड़ा देखें
उन्हें छुपाने में लुत्फ़ आया

उधर से ज़लवों की बारिशें थीं
हमें नहाने में लुत्फ़ आया

मिली जो जुल्फ़ों की छाँव हमको
तो बैठ जाने में लुत्फ़ आया

मिले थे ज़ख्मों जिगर जो उनसे
उन्हें छुपाने में लुत्फ़ आया

02.
रेखाचित्र : (स्व.) बी.मोहन नेगी 

रात भर इक दिया दिल का जलता रहा
उससे मिलने का अरमां मचलता रहा

लब उदासी लिये उसके हँसते रहे
उसकी आँखों का काज़ल पिघलता रहा

फूल उसने बिछाये जहाँ के लिए
खुद अकेला वो काँटों पर चलता रहा

उसके मंजिल ने इक रोज चूमे कदम
जो गिरा और गिरकर सँभलता रहा

देखकर बेहिसी अपने एहबाब की
खून उसके बदन का उबलता रहा

  • 5, सुख शान्ति नगर, बिचौली हप्सी रोड, इन्दौर-452016, म.प्र./मो. 09479560623

मंगलवार, 29 मई 2018

किताबें

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक  :  09-10,  मई-जून 2018

{लेखकों/प्रकाशकों से अनुरोध है कृपया समीक्षा भेजने के साथ पुस्तक की एक प्रति (एक से अधिक नहीं) हमारे अवलोकनार्थ डा. उमेश महादोषी, 121, इन्द्रापुरम, निकट बी.डी.ए. कालौनी, बदायूं रोड, बरेली, उ.प्र. के पते पर भेजें। समीक्षाएँ ई मेल द्वारा कृतिदेव 010 या यूनिकोड मंगल फॉन्ट में वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल के रूप में ही भेजें।स्कैन करके या पीडीएफ में भेजी रचनाओं का उपयोग सम्भव नहीं होगा } 


डॉ. उमेश महादोषी



सकारात्मक चिंतन की रचनात्मक कहानियाँ

प्रतापसिंह सोढ़ी जी को देशभर में मूलतः एक लघुकथाकार के रूप में पहचाना जाता है, लेकिन वे एक कहानीकार भी हैं और कवि भी। लघुकथाओं की तरह उनकी कहानियाँ भी प्रभावित करती हैं। लघुकथा हो या कहानी, सामाजिक सरोकारों के साथ पारिवारिक-सामाजिक रिश्तों की सोंधी गंध उनकी रचनात्मकता के केन्द्र में प्रायः उपस्थित रहती है। कहानी संग्रह ‘हम सब गुनहगार हैं’ में सोढ़ी जी की बारह मौलिक कहानियों के साथ छः लघुकथाएँ भी
संग्रहीत हैं। इन कहानियों में भाषागत सहजता-सरलता तो है ही, जीवन मूल्यों से जुड़ी भाव-प्रवणता भी पाठक मन को बाँधे रखती है। इनमें से अधिकांश कहानियों का सम्बन्ध आर्थिक रूप से निम्न एवं निम्न-मध्यम वर्ग के परिवेश से है। उस परिवेश की तमाम अच्छाइयों-बुराइयों के सजीव चित्रण के मध्य सकारात्मक भाव-चिंतन का प्रभावी सम्प्रेषण देखने को मिलता है। 
      संग्रह की पहली कहानी ‘उमंग के क्षण’ एक ऐसे ट्रक ड्राइवर गरमीत की कहानी है, जो आम ड्राइवरों के चाल-चलन और व्यवहार से इतर अपनी पूरी कमाई पत्नी के हाथ पर रखता है और परिवार के साथ खुश रहता है। इस बार ट्रक रास्ते में पलट जाने के कारण वह घर पर सही समय पर नहीं पहुँच पाया। तमाम शंका-आशंकाओं के बीच घर में उसकी पत्नी बेहद पेरशान होती है। वह गुरुद्वारे मन्नत माँगने जाती है, लौटने पर उसकी पड़ोसन शुभ समाचार देती है कि उसके ‘वो’ आये थे और ट्रक के पलटने व स्वयं के सकुशल होने की सूचना देकर गये हैं। पति की कुशल जानकर पत्नी खुशी की उमंग से भर जाती है। शराब के नशे में डूबते साथी ड्राइवरों के तंज भरे मजाकों के बीच गरमीत के आत्मनियंत्रण और उसके घर पर सही समय पर न पहुँचने से परेशान पत्नी की बेचैनी के दृश्य कथा को प्रभावशाली बनाते हैं।
      ‘सिद्धि की गुड़िया’ बाल्यावस्था में पनपे प्रेम के विछोह की भावपूर्ण कथा है। ‘नपे तुले कदम’ एक ऐसे निम्नवर्गीय ब्राह्मण लड़के की कहानी है, जो अपने घर व शहर से भागकर दूसरे शहर में गन्ने के रस की चर्खी पर नौकरी करता है और इस बात से डरता है कि उसके घर वालों को यह पता न चल जाये कि वह किसी की दुकान पर झूठे बर्तन धोता है। लेकिन जब वह नौकरी बदलता है तो घरों में काम करने वाली एक लड़की से प्रेम-विवाह करके अपने जीवन को व्यवस्थित कर लेता है। अब उसके मन से सारा डर निकल चुका है और वह जातिगत भेदभाव की भावना से दूर निडरता के साथ जीना सीख जाता है। प्रेम-डगर पर जीवन की सहजता-सरलता मिल जाये तो उसे निडरता के साथ अपनाने का सन्देश देती एक सकारात्मक कथा है। संग्रह की शीर्षक कथा ‘हम सब गुनहगार हैं’ पति-पत्नी के गहरे प्रेमान्त की कथा होने के साथ हमारे समाज के पिछड़े तबके, विशेषतः मुस्लिम समाज में बीमारियों का विशेषज्ञ डॉक्टरों से इलाज कराने की वजाय नीम-हकीमों के साथ मन्नतों और गंडे-तावीजों के लिए बाबाओं-पीरों-फकीरों के पीछे दौड़ने के दुष्प्रभावों को रेखांकित करती है।
      जीवन का कुछ अर्थ अपने लिए भी होता है, लेकिन उस अर्थ वाला अध्याय समाप्त हो जाये तो भी जीवन पलायन के लिए नहीं होता। जीवन का दूसरा अर्थ अपनी जिम्मेवारियों एवं स्वयं से जुड़े निकट संबन्धियों की खुशियों के लिए भी होता है। एक ट्रक दुर्घटना के कारण अपनी टाँगे गंवाने पर डॉक्टर से मौत माँगते ‘एहसास’ के जयदयाल को जब इस बात का एहसास होता है तो उसकी जीने की मर चुकी इच्छा पुनः जाग उठती है। ‘बीस साल बाद’ की अनु, ‘सांवली’ की सांवली, ‘मर्द’ की मंगली भी जीवन के दूसरे अर्थ का अध्याय खोलकर ही जीवन-संघर्ष को अपनाती हैं। ‘नई कमीज’ व ‘अपना खून’ कहानियों में ‘पारिवारिक रिश्तों’ की सोंधी गंध पाठक मन को अच्छी लगती है। ‘मायूस आँख बन्द होंठ’ अधूरे प्रेम की प्रभावशाली कहानी है। कई निम्न आयवर्ग के शोरशराबे का कारण बनते परिवारों के मध्य एक शालीन परिवार रहने आ जाता है, जिससे सभी प्रसन्न हैं। उस परिवार की लड़की घर की खिड़की से रोजाना झाँकती है, जिसे देखकर कथानायक सत्यजीत आकर्षित हो जाता है। वह उसका परिचय जानना और घनिष्ठता बढ़ाना चाहता है। लेकिन यह काम कैसे करे, इसी कशमकश में काफी समय निकल जाता है। एक दिन वह उसे पत्र लिखने का निर्णय करता है, लेकिन उसी दिन वह परिवार उस घर को छोड़कर जाने लगता है साथ ही सत्यजीत को पता चलता है कि उस लड़की को थ्रॉट कैंसर है। सत्यजीत का सपना टूट जाता है। ‘एक कप चाय में शायरी’ एक बुजुर्ग शायर की व्यथा-कथा है, जिसे एक कप चाय पिलाकर होटल में एक होटलवाला उसका कलाम इसलिए पढ़वाना चाहता है कि इससे उसके होटल में ग्राहकों की संख्या बढ़ जायेगी। संग्रह में गुरुबख्श सिंह की पंजाबी कहानी का सोढ़ी जी द्वारा अनुवाद (स्त्री मोहरा है पुरुष की शतरंज का) भी शामिल किया गया है, जो पुरुषों द्वारा स्त्री को उपयोग करने के प्रसंग की एक प्रभावशाली कथा है। संग्रह में शामिल सोढ़ी जी की छः लघुकथाएँ बहुचर्चित और पठनीय हैं।
      कुल मिलाकर संग्रह की कहानियाँ सकारात्मक चिंतन की पठनीय दस्तावेज हैं। 

हम सब गुनहगार हैं : कहानी संग्रह : प्रतापसिंह सोढ़ी। प्रका.: रिसर्च लिंक प्रकाशन, 81, सर्वसुविधा नगर एक्यटेंशन, कनाड़िया रोड, इन्दौर-452016, म.प्र.। मूल्य: रु. 120/- मात्र। सं.: 2017।

रविवार, 12 नवंबर 2017

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक  :  01-04,  सितम्बर-दिसम्बर 2017




।। कथा प्रवाह ।।



प्रतापसिंह सोढ़ी




मुराद

    मेरे पुराने रिजेक्टेड सोफे को देखने के बाद कबाड़े वाले ने पूछा- ‘‘साहब, कितने तक देंगे?’’
    ‘‘पाँच सौ रुपये तो लग गये हैं इसके।’’
    चेहरे पर फैली पसीने की बूँदों को अपनी मैली कमीज की आस्तीन से पोंछते हुए वह बोला- ‘‘पाँच सौ रुपये देने की मेरी हैसियत नहीं है, साहब।’’
    मैंने पूछा- ‘‘तुम लोग तो कबाड़े का सामान अपने सेठ को ले जाकर देते हो?’’
    ‘‘हाँ साहब, लेकिन यह सोफा मैं अपने लिए खरीदना चाहता हूँ।’’
    ‘‘तुम्हारे घर में इसे रखने की जगह है?’’
    ‘‘नहीं साहब, एक खोली में रहता हूँ। इसे ठीक करवा के अपनी लड़की की शादी में दूँगा।’’
    उसने दो सौ रुपये मेरी ओर बढ़ाये।
    मैं कभी उन रुपयों को, कभी अपने पुराने सोफे को और कभी कबाड़वाले की आँखों में झलक आई दीनता को देख रहा था। मेरे संवेदन तंतुओं में दया और सहानुभूति की प्रबल ध्वनियाँ झंकृत हो रही थीं। मैंने अपना निर्णय सुनाया- ‘‘मेरी तरफ से इस सोफे को अपनी बिटिया के विवाह में उपहार दे देना।’’
    उसकी आँखें नम हो आईं। दो सौ रुपये मेरी हथेली पर रखते हुए रुँधे कंठ से उसने निवेदन किया- ‘‘साहब, अपनी कमाई से ही अपनी बिटिया को यह सोफा दूँगा। आपने इस गरीब की मुराद पूरी कर दी। आपके इस उपकार को मैं जीवन भर याद रखूँगा।’’
    उसके कदम मेरी ओर बढ़े। उसने मेरे पाँव छुए और ठेले पर सोफा रख खुशी-खुशी चल दिया।

  • 5, सुखशांति नगर, बिचौली-हप्सी रोड, इन्दौर (म0प्र0)/मोबाइल: 09039409969

शुक्रवार, 26 मई 2017

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  6,   अंक  :  05-06,  जनवरी-फ़रवरी  2017



।।हाइकु।।


प्रतापसिंह सोढ़ी



हाइकु

01.
ओस की बूँदें
सूरज निगलता
अजगर सा।

02.
दूध में पानी
या पानी में हो दूध
रंग समान।

03.
दीपक बुझा
रेखाचित्र : बी. मोहन नेगी 
अँधेरा गहराया
मन सुलगा।

04.
नभ के आँसू
धरा पर बिखरे
मोती से सजे।

05.
कोई फाइल
आगे बढ़ती नहीं
पहिए बिना।
  • 5, सुखशांति नगर, बिचौली-हप्सी रोड, इन्दौर (म0प्र0)/मोबा. 09039409969