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रविवार, 12 नवंबर 2017

लघुकथा विमर्श

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक  :  01-04,  सितम्बर-दिसम्बर 2017




।।लघुकथा विमर्श।।

{इस ब्लॉग के जुलाई-अगस्त 2017 अंक तक लघुकथा सम्बंधी आलेख एवं साक्षात्कार ‘अविराम विमर्श’ स्तम्भ में प्रकाशित किए जाते रहे हैं। इस अंक से लघुकथा विमर्श सम्बंधी समस्त सामग्री इस नए स्तम्भ ‘लघुकथा विमर्श’ स्तम्भ में ही जाएगी। कृपया पूर्व में प्रकाशित लघुकथा विमर्श की खोज ‘अविराम विमर्श’ स्तम्भ में ही करें।} 



डॉ. बलराम अग्रवाल




लघुकथा में नेपथ्य
{‘लघुकथा में नेपथ्य’ के मुद्दे को उठाने वाला यह लघु आलेख बलराम अग्रवाल जी ने 1991 में लिखा था और ‘पड़ाव और पड़ताल खण्ड-17’ में संकलित है। ‘नेपथ्य’ की भूमिका लघुकथा सृजन में बेहद महत्वपूर्ण होती है, लेकिन लघुकथा समालोचना में इसे अपेक्षित महत्व नहीं दिया गया। हमें लगता है इस पर कई कोंणों से चर्चा हो सकती है और लघुकथा समालोचना का एक विशिष्ट आधार बन सकता है ‘नेपथ्य’। नए लघुकथाकार ‘नेपथ्य’ को सही सन्दर्भ में समझकर उसके उपयोग के बारे में जागरूक बनें, इसी उद्देश्य से यह आलेख यहाँ प्रस्तुत है।}

      लघुकथा, कहानी और उपन्यास की प्रकृति और चरित्र में इनके नेपथ्य के कारण भी आकारगत अन्तर आता है। उपन्यासकार स्थितियों-परिस्थितियों और घटनाओं को यथासम्भव विस्तार देता है तथा पाठक के समक्ष पात्रों की मनःस्थिति, चरित्र, परिस्थितियाँ, गतिविधियाँ एवं तज्जनित परिणाम तक का ब्यौरा देने को उत्सुक रहता है; इस तरह उपन्यास अत्यल्प या कहें कि नगण्य नेपथ्य वाली कथा-रचना है। कहानीकार जीवन के विस्तृत पक्ष को रचना का आधार नहीं बनाता। इसके अतिरिक्त, जीवनखण्ड से जुड़ी अनेक घटनाओं को विस्तार से लिखने की बजाय उनको वह आभासित करा देना ही यथेष्ट समझता है, क्योंकि गति की दृष्टि से उपन्यास की तुलना में कहानी को एक त्वरित रचना होना चाहिए। अतः उपन्यास की तुलना में कहानी का नेपथ्य कुछ अधिक गहरा और विस्तृत हो सकता है। बावजूद इसके, कहानी का नेपथ्य उपन्यास की प्रकृति और चरित्र से को-रिलेटेड और को-लिंक्ड रहता है, अतः कहानी ने सहज ही उपन्यास जैसी पूर्णता का आभास अपने पाठक को दिया और प्रतिष्ठित उपन्यासकारों व जड़-आलोचकों के घोर विरोध के बावजूद व्यापक जनसमूह के बीच अपनी जगह बना ली। लघुकथा आकार की दृष्टि से क्योंकि कहानी की तुलना में अपेक्षाकृत बहुत छोटी कथा-रचना है, अतः जाहिर है कि उसका नेपथ्य कहानी की तुलना में बहुत अधिक विस्तृत और गहरा होगा; लेकिन उसे कहानी के नेपथ्य से उसी प्रकार को-रिलेटेड और को-लिंक्ड रहना चाहिए जिस प्रकार कहानी का नेपथ्य उपन्यास के नेपथ्य के साथ रहता आया है। लघुकथा-लेखक इस तथ्य से अक्सर ही अनभिज्ञ और लापरवाह रहे हैं। उन्होंने अधिकांशतः ऐसी रचनाएँ लघुकथा के नाम पर लिखी हैं जिनमें प्रस्तुत रचना तथा उसके नेपथ्य में एक और सौ का अनुपात नजर आता है जो किसी भी रचना के लिए स्वस्थ स्थिति नहीं है। कोई भी पाठक किसी रचना के अन्धकूप सरीखे नेपथ्य में भला क्यों उतरना चाहेगा? इसी के समानान्तर एक सोच यह भी है कि लेखक पाठक-विशेष या रचना-विधा के सिद्धान्त-विशेष को ध्यान में रखकर रचना क्यों करे? अपने आप को अभिव्यक्ति के धरातल पर उन्मुक्त क्यों न रखे? वस्तुतः ‘अभिव्यक्ति के धरातल पर उन्मुक्त’ रहने का अर्थ उच्छृंखल अथवा अनुशासनहीन हो जाना नहीं माना जाना चाहिए। इंटरनेट के माध्यम से 5 शब्दों से लेकर 500 या ज्यादा शब्दों तक की ‘Flash Story’ लिखना सिखाने वाली व्यावसायिक साइटें कथा-विधा का भला कर रही हैं, कथा-लेखकों का भला कर रही हैं या स्वयं अपना- यह तो समय ही तय करेगा; फिलहाल यहाँ हिन्दी की कुछ कौंध-कथाएँ यानी 'Flash Story' साभार प्रस्तुत हैं-
एक
      राजपथ से गुजरती हुई सैनिक टुकड़ी क्विक मार्च करते हुए गा रही थी- हम सब एक हैं। फुटपाथ पर खड़े पुलिस के अफसर, सेठ रामलाल और प्रसिद्ध जुआरी गोवर्द्धन एक दूसरे की आँखों में हँसते हुए न जाने क्यों गाने लगे- हम सब एक हैं।
दो
      शेर गुर्राया, हिरण को खूँखार दृष्टि से देखा और फिर हिरण को कुछ किए बगैर गुफा के अँधेरे में चला गया। दोनों एक ही कश्ती के सवार थे।...
      बाहर आदमी घात लगाए बैठा था।
      इनके साथ ही मैं Wits अर्थात विलक्षण-वाक्यकथा की ओर भी लेखकों/पाठकों और संपादकों का ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा। इन्होंने भी लघुकथा में हो रहे गंभीर प्रयासों को काफी धक्का पहुँचाया है। हिन्दी में लघुकथा के नाम पर प्रचलित Wits के कुछ नमूने निम्न प्रकार हैं-
एक
      इंपाला’ की पिछली सीट पर बैठे अल्सेशियन को देखकर अंगभंग भिखारी बच्चों ने ठंडी साँस लेकर कहा, “काश! हम भी ऐसे होते!”
दो
      डीयर ‘इतिहास’, तुम्हारे अध्याय अब कलमें नहीं, मैं लिखूँगी...
      मैं हूँ ‘बन्दूक’
तीन
      मैंने जब भी डुबकी लगानी चाही, सारा मानसरोवर चुल्लू हो गया!
चार
      सामान्य-ज्ञान की परीक्षा में एक परिक्षार्थी एक सरल से प्रश्न पर अटक गया। प्रश्न था-’भारत का प्रधानमन्त्री कौन है?’ उत्तर परीक्षार्थी को पता था, इस पर भी वह परेशान था। अन्ततः उसने लिख ही दिया, पर उसमें एक वाक्य और बढ़ा दिया। उसने लिखा- आज भारत के प्रधानमन्त्री श्री... हैं, परचा जाँचते समय कौन होगा, मालूम नहीं।
      इन विलक्षण-वाक्यकथाओं के लेखकों की हिन्दी-लघुकथा के क्षेत्र में लम्बी कतार है; और इन सब की प्रेरणा के मूल में सम्भवतः सुप्रसिद्ध कथाकार रमेश बतरा की बहुचर्चित लघुकथा ‘कहूँ कहानी’ रही है, जो निम्न प्रकार है-
      ए रफीक भाई! सुनो...उत्पादन के सुख से भरपूर थकान की खुमारी लिए, रात मैं घर पहुँचा तो मेरी बेटी ने एक कहानी कही, ”एक लाजा है, वो बो......त गलीब है।’’
      यहाँ हमारा हेतु क्योंकि लघुकथा की रचनात्मक प्रकृति और चारित्रिक तीक्ष्णता तथा उसके सही स्वरूप एवं स्तर को रेखांकित करना भर है, अतः ‘कौंधकथा’ और विलक्षण-वाक्यकथा समझी जाने वाली ऊपर उद्धृत हिन्दी रचनाओं के साथ उनके लेखक और संदर्भित पत्र-पत्रिका, संग्रह-संकलन अथवा संपादक के नाम आदि का उल्लेख नहीं किया गया है। यह ठीक है कि कोई अकेला आदमी लघुकथा का नियन्ता नहीं हैं, और यह भी कि किसी भी दृष्टि से हमारे द्वारा हेय तथा त्याज्य समझी जाने वाली, लघुकथा शीर्ष तले छपने वाली Flash Story व Wits अन्य आलोचकों-समीक्षकों अथवा संपादकों को प्रभावशाली महसूस हो सकती हैं; तथा हमारे द्वारा स्वीकार्य रचनाएँ त्याज्य। इस बारे में विवाद की गुंजाइश हमेशा बनी रहेगी, परन्तु लघुकथा को ‘कौंधकथा’ और ‘विलक्षण-वाक्यकथा’ से अलग रखना ही होगा।
      मैं पुनः नेपथ्य बिंदु पर आना चाहूँगा। वस्तुतः नेपथ्य वह वातायन है जिसे लेखक अपनी रचना में तैयार करता है और पाठक को विवश करता है कि वह उसमें झाँके तथा रचना के भीतर के व्यापक और गहरे संसार को जाने। कई बार मुख्य-कथा के एक या अनेक पात्र भी लघुकथा के नेपथ्य में रहते हैं। लघुकथा में उनका सिर्फ आभास मिलता है, वे स्वयं उसमें साकार नहीं होते। दरअसल, घटनाओं और स्थितियों का यह प्रस्फुटन लघुकथा के नेपथ्य में उतरे उसके पाठक के मन-मस्तिष्क में होने वाली निरन्तर प्रक्रिया है। अगर कोई रचना, जो इस प्रक्रिया को जन्म देने में अक्षम है, वह निःसंदेह अच्छी रचना नहीं हो सकती। अपने इसी गुण के कारण लघुकथा गंभीर प्रकृति के पाठक को जिज्ञासु बनाए रखने में सफल रह सकी है। इसी बात को मैं यों भी कहना चाहूँगा कि अपने समापन के साथ ही जो लघुकथा पाठक के भीतर विचार की एक श्रृंखला जाग्रत कर देने की क्षमता रखती है, वह एक सफल लघुकथा है।
      लघुकथा में नेपथ्य की उपस्थिति को जानने के बाद यह अवधारणा पूर्णतः निर्मूल सिद्ध हो जाती है कि कोई कथाकार लघुकथा लिखता है क्योंकि वह कथा को कहानी जितना विस्तार दे पाने में अक्षम है। सही बात यह है कि लघुकथाकार कथा के मात्र संदर्भित बिंदुओं पर कलम चलाता है और शेष को नेपथ्य में बनाए रखता है। यही उसका कथा-कौशल है और यही लघुकथा की प्रभावकारी क्षमता।
  •  एम-70, जैन मन्दिर के सामने, नवीन शाहदरा (उल्धनपुर), दिल्ली-110032/मो. 08826499115

लघुकथा विमर्श

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक  :  01-04,  सितम्बर-दिसम्बर 2017




{इस ब्लॉग के जुलाई-अगस्त 2017 अंक तक लघुकथा सम्बंधी आलेख एवं साक्षात्कार ‘अविराम विमर्श’  स्तम्भ में प्रकाशित किए जाते रहे हैं। इस अंक से लघुकथा विमर्श सम्बंधी समस्त सामग्री इस नए स्तम्भ ‘लघुकथा विमर्श’ स्तम्भ में ही जाएगी। कृपया पूर्व में प्रकाशित लघुकथा विमर्श की खोज ‘अविराम विमर्श’ स्तम्भ में ही करें।}



डॉ. पुरूषोत्तम दुबे




महाराष्ट्र : लघुकथा का आसमान साफ है


      हिन्दीतर महाराष्ट्र प्रांत से हिन्दी की सोच से परिपूरित होकर हिन्दी लघुकथा का आना हिन्दी लघुकथा सर्जन के सम्मान में एक महती प्रदेय है। महाराष्ट्र से परोसे जाने वाली लघुकथाएँ स्वयं लघुकथाकारों के आन्तरिक द्वन्द्वों से परिचालित होकर लिखी गई मिलती है। यही कारण है कि यहाँ का लघुकथाकार आन्तरिक तौर पर वैचारिक द्वन्द्वों से उत्पन्न तनाव की स्थिति को पहले भोगता नजर आता है। फिर लघुकथाआंे मंे ऐसे भोगे हुए तनावों को उनके यथार्थ रूप में प्रस्तुत करता है। महाराष्ट्र से आने वाली लघुकथाआंे का यदि बारीकी से अध्ययन किया जाए तो ज्ञात होता है कि यहाँ के लघुकथाकार ‘केवल लघुकथा हो गई’ सरीखे निराकरण पर यकीन न करके लिखी गई लघुकथा पर बारम्बार विचार कर देश-काल और परिवेश की जरूरत की दृष्टि से उसमें अपेक्षित सुधार कर लघुकथा को अन्तिम रूप देता है। अतएव महाराष्ट्र से आने वाली लघुकथाऐं भाव-प्रवणता से कहीं अधिक विचार प्रवणता से ओत-प्रोत हुई मिलती हैं।
      शब्द जब वाक्य में ढलता है तब लघुकथा अथवा सर्जनात्मक लेखन बनता है। अकेले ‘नाव’ भर लिख देने से नदी और नदी के दोनों तटों का आभास उभर कर सामने आता है। इस सिलसिले मंे हिन्दी के स्थापित समीक्षक रमेश दवे का कहना महत्वपूर्ण है कि ‘‘शब्द की सृष्टि उसके अकेेलेपन में एक भौतिक भाषाई इकाई है लेकिन जब वह सन्दर्भवान, अर्थवान और वाक्यवान होता है तो विचार भी हो जाता है और संवेदन के या सौन्दर्य के नाना रूप धारण कर कविता, कहानी, नाटक, कलाकृति भी बन जाता है।’’ शब्द की यही सृष्टि लघुकथा का विन्यास भी रचती है।
      महाराष्ट्र से आने वाले स्थापित और श्रेष्ठी लघुकथाकारों में शंकर पुणताम्बेकर, घनश्याम अग्रवाल, भगवान वैध ‘प्रखर’, डॉ. दामोदर खड़से, अनन्त श्रीमाली, अशोक गुजराती और सेवासदन प्रसाद के नाम उल्लेखनीय है। इनमें से शंकर पुणताम्बेकर की लघुकथाएँ सामाजिक साम्य और वैषम्य से टकराती मिलती है। उनकी लघुकथा ‘चुनाव’ इन्सपेक्टर राज्य के प्रभुत्व को वर्णित करती है। स्कूल शिक्षक अपने सजातीय पेशे वाले स्कूल इन्सपेक्टर के बच्चे को पहले नम्बर से उत्तीर्ण नहीं करते हुए पुलिस इन्सपेक्टर के बच्चे को पहले नम्बर से उत्तीर्ण करता है। कहने की जरूरत नहीं देश के डण्डा राज्य से पाठक और समाज भलीभांति परिचित है। उनकी ‘चींटी और कबूतर’ लघुकथा ऐसे दनुज के चरित्र को बखान करती मिलती है, जो कालाबाजारी और करचोरी में माहिर होकर समाज में अपना उजला मुखौटा बनाए रखने में अपने संरक्षको के कार्यक्रमों के आयोजनांें के भारी खर्च उठाता है। घनश्याम अग्रवाल की लघुकथाएँ सामाजिक संदर्भो से जुड़ी हुई होकर सामाजिक यथार्थ का कटु रूप उपस्थित करती मिलती है। स्त्री-विमर्श पर केन्द्रित आपकी दो लघुकथाएँ ‘रोटी, कपड़ा मकान’ तथा ‘औरत का गहना’ एक ही साँचे में ढली मगर पृथक-पृथक ऐसी दो स्त्रियों की दास्तानें व्यक्त करती है कि जिन्दा रहने के लिए उन्हंे देह व्यापार के लिए विवश होना पड़ता है और ऐसे कुत्सित व्यापार में शर्म का गहना तक बेच देना होता है। भगवान वैद्य ‘प्रखर’ की लघुकथाएँ ‘विकल्प’ तथा ‘अभिलेख’ अपने ढंग की अलग लघुकथाएँ हैं। ‘विकल्प' लघुकथा में नशाखोर पति खुद के लिए शराब की व्यवस्था जुटाने में अपनी पत्नी को ठेकेदार का हमबिस्तर बनने में झोंक देता है। ‘अभिलेख’ लघुकथा वन-विभाग की उन काली करतूतों को उजागर करती है जिसके अफसरशाह अपनी जेबों में काली कमाई के हरे-हरे नोट भरने हेतु हरे-भरे जंगलों को क्रूरता के साथ जलाकर उनमें फिर से हरियाली रोपने के उद्यम में  दोहरा लाभ उठाते हैं। डॉ. दामोदर खड़से की लघुकथाएँ ‘युक्ति’ और ‘भक्ति’ दोनो धर्म केन्द्रित है। ‘युक्ति लघुकथा में एक पत्थर को सिन्दूर में पोतकर घर की उस दीवार मंे सटकर रख दिया जाता है, जिससे सटकर हर आने जाने वाला जिसको पेशाब घर के रूप में इस्तेमाल करता है और ऐसे पेशाबियों पर नियंत्रण की दृष्टि से उसी दीवार पर ‘बजरंग बली की जय’ लिख दिया जाता है। लघुकथा ‘भक्ति’ दर्शाती है कि वर्तमान में सारे जंगल फल विहीन हो गए हैं, ऐसे में भूख को मिटाने वीर हनुमान कहाँ जाए! अतः वे साक्षात रूप मेें एक बस्ती में प्रकट होते हैं मगर उन पर कोई विश्वास नहीं करता। वे यहाँ मखौल के पात्र बनते हैं, बावजूद इसके अपना परलोक सुधारने में एक वृद्ध उनके चरणों में झुक जाता है। इस प्रकार लघुकथा ‘भक्ति’ समाज में वासित अंधविश्वासी लोगों के लिये स्वर्ग की टिकिट के द्वार खोलती मिलती है।
      अनन्त श्रीमाली की लघुकथाओं- कर्फ्यू, सत्संग तथा हिसाब-किताब में से लघुकथा ‘कर्फ्यू’ सामाजिक सहिष्णुता के बल पर हिन्दू-मुस्लिम को एक साथ चाय पीते हुए वर्णित करती है बरअक्स इसके सामाजिक असहिष्णुता की चिंगारी से लथ-पथ होकर पारस्परिक समभाव को मेटने में हिन्दू-मुस्लिम के यही वर्ग समाज में साम्प्रदायिक आग को भड़काते हैं। अशोक गुजराती की लघुकथाएँ- नौकरी चाहिए, सेल का खेल और हींग लगे न फिटकरी; तीनों ही वर्तमान सन्दर्भो से आप्लावित है। लेकिन उनकी ‘हींग लगे न फिटकरी’ लघुकथा वास्तव में इसी मुहावरे को चरितार्थ करती प्रतीत होती है। प्रस्तुत लघुकथा में कॉलेज की नेतागिरी से उठे एक ऐसे छात्र पर केन्द्रित है जो अपनी विचारधाराओं के दल में शामिल होकर नगर निगम का चुनाव जीत लेता है, फिर थोड़ा रसूखदार बनकर अपने दल के सत्तासीन होेने का फायदा अपने नाम पेट्रोल पंप आवंटित कराकर उठाता है। अंत में सेवासदन प्रसाद की लघुकथा ‘नये साल का विष’ राष्ट्र की चिंता में ऐसे युवक को नायक बनाकर पेश करती है, जो इंजीनियर अथवा डॉक्टर बनकर विदेश में जाने की बजाए गुणी नेता बनकर अपने देश को तरक्की की राह पर खड़ा करना चाहता है। प्रस्तुत लघुकथा भारतीय युवाओं के विदेश के सिलसिले में हो रहे ‘ब्रेन ड्रेन’ के स्थान पर अपने ही देश के हित में ‘ब्रेन गेन’ के उपयोगी प्रतीकों को लेकर घटती है। 
      महाराष्ट्र की लघुकथाओं पर मैं मानता हूँ कि यह आलेख, महाराष्ट्र की लघुकथाओें के विवेचन के संदर्भ में नाकाफी है, लेकिन उक्त विवेचित लघुकथाओं के कई छोर वर्तमान के लघुकथाकारों को लघुकथा विषयक सर्जन हेतु दिशा-बोध कराने में महत्वपूर्ण है। महाराष्ट्र का साहित्यिक परिवेश समुन्नत है, यहाँ से आने वाले नाटकों की एक समृद्ध परम्परा रही है। बंगाल की तरह ही महाराष्ट्र के नाटककारों का वर्चस्व कायम है। लघुकथाओं की सटीकता प्रायः सम्वादों के बूते से कथानकों की बनावट और बुनावट पर अधिक निर्भर करती है, अतएव लघुकथा मंे लघुकथाओं को अनावश्यक विस्तार से बचाने मेें सम्वादों का कैसे उपयोग किया जा सकता है, इसकी प्राथमिक और महती सूझ-बूझ को हासिल करने की दिशा में महाराष्ट्र की लघुकथाएँ अत्यन्त श्रेयस्कर हैं।

  • शशीपुष्प 74-जे/ए, स्कीम नं. 71, इन्दौर-452009, म.प्र./मो. 09407186940

शनिवार, 27 अगस्त 2016

अविराम विमर्श

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  5,   अंक  :  05-12,  जनवरी-अगस्त  2016


।।अविराम विमर्श।।

सामग्री :  इस अंक में डॉ. पुरुषोत्तम दुबे का आलेख- ‘‘हिन्दी लघुकथा : स्थापना के सोपान’’ तथा डॉ. जितेन्द्र ‘जीतू’ का आलेख- ‘‘सांस्कृतिक बदलाववाद और लघुकथा की स्थिति का नारको टेस्ट’’


डॉ. पुरुषोत्तम दुबे



हिन्दी लघुकथा : स्थापना के सोपान 
मान्यता के बहुत समीप होना और विधा का नाम अर्जित कर लेना, इन दो बातों में बड़ा अंतर है। मान्यता पाठकों से जन्म लेती है प्रत्युत् विधा आलोचकों के मध्य गहन मनन-चिंतन और चर्चा-परिचर्चाओं के प्रतिफलन से अपनी अस्मिता में ढलती है। क्या हिन्दी लघुकथा का जरूरत से ज्यादा लिखा जाना ही हिन्दी लघुकथा विधा के स्थापित होने की गारण्टी है? वर्षों से लिखा चला आ रहा हिन्दी व्यंग्य साहित्य अद्यतन विधा की संज्ञा पा सकने में असमर्थ रहा है, इसे हिन्दी साहित्य की सद्यःस्फुट धारा में स्थान दिया गया है।
     हिन्दी लघुकथा लेखन की उपलब्धियों पर बात करें तो आज हिन्दी लघुकथा की रचनाशीलता हिन्दी के अलावा हिन्दीतर प्रान्तों में बहुतायत में विकासशील है। बल्कि कहें, कि हिन्दी लघुकथा लेखन अकेले भारतव्यापी न रहकर देश की सीमाओं के उस पार से भी आ रहा है। तो ऐसे में, हिन्दी लघुकथा की स्थापना का सवाल वर्तमान में जस का तस क्यों अटका हुआ है? भारत विश्रुत पत्रिकाएँ, चाहे फिर ‘सारिका’ रही हो अथवा ‘कथादेश’, ‘हंस’, ‘बरोह’, ‘नवनीत’, ‘कादम्बिनी’ या फिर आज और नई जुड़ने वाली पत्रिकाओं में ‘साक्षात्कार’, ‘नया ज्ञानोदय’, ‘समावर्तन’, ‘वीणा’ प्रभृति पत्रिकाएँ हैं जिनमें अनिवार्यतः हिन्दी लघुकथा का प्रकाशन हो रहा है। यही क्या लघुकथा को ‘विधा’ ठहराने की बात है? अलहदा इसके, एक दलील यह भी है कि यह आसानी से पढ़ ली जाती है, इसकी क्षणिक अनुभूति है और इसमें तेज मारक क्षमता है। हिन्दी लघुकथा के सम्बन्ध में “विरुदावलियों” के ऐसे बोल लघुकथाकारों के मध्य से ही निकले हैं। लेकिन गहराई इस तर्क में है कि अभी तक हिन्दी साहित्य के जो मान्य विद्वान, पण्डित, आलोचक हैं, उन्होंने हिन्दी लघुकथा की ओर गम्भीरतापूर्वक ध्यान नहीं दिया है। फिर, सवाल यह भी सामने आता है कि हिन्दी की उपन्यास, कविता और कहानी ऐसी विधाएँ हैं जिनके पास पूर्णकालिक रचनाकार हैं और आलोचक भी। रचनाकारों के समान्तर यदि विधाओं के आलोचक भी विधाओं से संलग्न हुए मिलते हैं तब विधाओं के स्थापन्न का प्रश्न स्वमेव हल होता है।
     कहा यह भी जाता है कि वर्तमान में लघुकथा की स्थापना का सवाल बेमानी है। परन्तु इसके पीछे वही पुराना और लिजलिजा वक्तव्य...कि वर्तमान में लघुकथा तादाद में लिखी जा रही है, लेकिन जो बात लघुकथा की ऐतिहासिकता गोकि कहें कि विधागत स्थापना के पीछे लघुकथा लेखन के तारतम्य में ‘रचनात्मक संस्कार’ की होनी चाहिए, वह नहीं हो पा रही है।
     अभी लघुकथा लेखन के सम्बन्ध में कुछ नीतिगत अथवा सैद्धान्तिक पक्षों पर काम करना आवश्यक है। लघुकथा लेखन की सीमा के निर्धारण में बात को रबर-केंचुआ-छंद की तरह खींचा जा रहा है। साहित्य की प्रायः हर मान्य विधा का धर्म उसके मानकीकरण में निहित है। हिन्दी लघुकथा में मनुष्य और उसके परिवेश का अंकन उस सीमा तक नहीं पाया है, जो कसौटी का आदर्श है।
     और भी अनेक मसले हैं, जिनपर एकदम से नहीं, तो भी, उत्तरोत्तर विचार किया जा सकता है। बड़ी जरूरत है हिन्दी लघुकथा पर एक वैचारिक ‘संसद’ चलाने की। ऐसी बयार कहीं से भी बहे, मगर झंझावात की शक्ल में नहीं, अपितु लघुकथा स्थापन की दिशा में प्राण-शक्ति रोपने की शक्ल में। होना यह चाहिए कि जो फिलवक्त नहीं हो रहा है, गोया कि जो-जो लघुकथाकार अपनी-अपनी लघुकथाओं के संग्रह की थाल सजाकर लघुकथा-मंदिर में अपनी प्रविष्टि दर्ज कराए, वो-वो सर्वप्रथम स्वयं से यही निर्णय लेवें कि अपनी-अपनी किताब में बतौर ‘प्राक्कथन’ हिन्दी लघुकथा की स्थापना की चिन्ता को लेकर जिम्मेदारी के साथ लिखें। दिशा-दिशा से आने वाली निज के द्वारा लिखी गई ऐसी भूमिकाओं के समुच्चय से तपे हुए कुन्दन की तरह निकली बातें लघुकथा की विधागत स्थापना विषयक मसौदे तैयार करती मिलेंगी।
     अतीत का कालचक्र ‘सन् 1980’ अभी भी हमारी पहुँच से बाहर नहीं है। 1980 को बीते हुए पेंतीस बरस का समय अभी हमारी सोच की गिरफ्त में है। विराट काल की गणना की तुलना में पेंतीस वर्षीय इस अल्प कालावधि को दूरबीन से देखे बगैर भी हम लघुकथा विषयक स्थापना को साध सकते हैं। आधुनिक समय में इंटरनेट की सुविधा ने पारस्परिक वार्तालाप को आसान बना दिया है। अब किसी भी प्रकार की चर्चा-परिचर्चाओं के लिए ‘कॉफी हाउसों’ अथवा साहित्यिक सभागारों की जरूरतें निघट चुकी हैं। आजकल तो इंटरनेट पर बात रखो, और बात पर सहमत-असहमत के रेकॉर्ड संचित कर लो। पर इस बात के लिए अपने से किए एक संकल्प का अनुसरण करना होगा। किसी काम के लिए फिक्रजदा होकर काम को निपटाया जा सकता है। तो देर क्यों? रखिए पैर इंटरनेट की दहलीज पर और लिख डालिए लघुकथा के स्थापन्न विषयक अपने विचार। विचारों का सम्प्रेषण लघुकथाकारों की सामुदायिक भावना के फलस्वरूप होगा, तो नियति भी जरूर अपना काम करेगी। मात्र और मात्र आलोचना की राह चलकर लघुकथा की स्थापना का सवाल हल नहीं किया जा सकता। लघुकथाकारों की बोर्जुआ पीढ़ी; गोकि जिनके पास लघुकथा की बारीकियों को गिनाने का खासा अनुभव है; को आगे आना होगा, अपने अनुभवों की बानगी निकालनी होगी ताकि लघुकथा की स्थापना की कोई उचित सूरत बने।
     अतीत में, हिन्दी कहानी की स्थापना को लेकर बहुतेरी जंग लड़ी गईं। कहानी, फिर नई कहानी, फिर समकालीन कहानी, फिर आंचलिक कहानी, फिर समान्तर कहानी। और स्थिति यह है कि कहानी के ये सभी विभाजन आज स्वीकार्य हैं और कहानी के नाम-विभाजन की प्रत्येक संज्ञा स्थापना की पटरी पर सवार है। फिर ऐसा ही काम हिन्दी लघुकथा की स्थापना के हित में क्यों नहीं?
     आज लघुकथा को लिखने वाले बहुसंख्यक लघुकथाकार हैं। शायद सुई की नोंक के बराबर भी कोई कथानक वर्तमानकालीन लघुकथाकारों से छूटा नहीं है। तब यह सम्भव ही नहीं है कि लघुकथा के स्थापना बाबत दावे खारिज हों। अपनी ओर से, कोई चार सुझाव यहाँ देना मैं मौजूँ समझता हूँ। सम्भवतः मेरे द्वारा दिये जा रहे ये सुझाव लघुकथा-स्थापना की गाँठें खोलने में सहायक बन सकें।
     पहला सुझाव है-आचार, विचार और रुचि की प्रक्रिया, यानी कि लघुकथा लेखन के प्रति लघुकथाकार कितना आग्रही (पजेसिव) रहा है। दूसरा-आचार, विचार और रुचि में संशोधन, अर्थात् पहले की तुलना में लघुकथा लेखन की गहराई का ग्राफ कितना ऊँचा हुआ है? तीसरा-लेखन की दुनिया में लिखा गया जितना भी सर्वश्रेष्ठ है, उसकी अनुगामिता कितनी हुई है? तथा, चौथा-बीसवीं सदी के पश्चात् इक्कीसवीं सदी में आ रही सभ्यता के बौद्धिक अंशों से आज का लघुकथाकार कितना प्रभावित है?
उक्त चार बातों पर समेकित दृष्टि के बूते पर ही हिन्दी लघुकथा की विवेचना करनी होगी। जिससे लघुकथा लेखन की विकासगत स्थिति को उसके ऐतिहासिक क्रम से देखा जा सके। समय की पुकार है कि हिन्दी लघुकथा अपनी संरचना में काम आये समस्त अंगों से जानी जाए। कथ्य, प्रस्तुति, भाषा, शिल्प, संवेदन, आस्वादन प्रभृति के जरिए लघुकथा का पाठक लघुकथा के समीप आए। तादात्म्य, जहाँ होगा, स्थापना की मोहर वहीं लगेगी।

  • शशीपुष्प, 74 जे/ए (स्कीम नं. 71), इन्दौर-452009 म.प्र./मोबाइल 09407186940



डॉ. जितेन्द्र ‘जीतू’



सांस्कृतिक बदलाववाद और लघुकथा की स्थिति का नारको टेस्ट
       समकालीन हिन्दी लघुकथा को देश की सांस्कृतिक परिस्थितियों ने पूर्ण रूप से प्रभावित किया है। देश की संस्कृति क्या थी और क्या से क्या हो गयी है, यह जानना बहुत जरूरी है।
     यह संयोग नहीं है कि संस्कृति आज एक विशाल और व्यापक उद्योग के रूप में विकसित हो रही है। संस्कृति की परिभाषा और उसका कर्म भी बदल गया है। आज संस्कृति वह नहीं रह गई है जिसे टी. एस. इलियट ने कभी मनुष्य की पूरी कार्य शैली, व्यवहार, जीवन के प्रति दृष्टिकोण तथा सामाजिक चेतना केे रूप में परिभाषित किया था। हालांकि टी. एस. इलियट भी जानते थे कि ऐसा व्यक्ति जो संास्कृतिक कार्य में योगदान करता है, जरूरी नहीं है कि वह स्वयं सुसंस्कृत हो। आज ऐसा ही हो रहा है, संस्कृति का कार्य व्यक्ति या समाज को ‘सुसंस्कृत’ बनाना नहीं रह गया है।
     देश की यह संस्कृति कोई एक दिन में नहीं बदली। इसके पीछे परिवर्तन की एक पूरी प्रक्रिया शामिल है। इस समय भारत के लोगों के बारे में कहा जा सकता है कि वे सांस्कृतिक उन्मूलन और आत्म विसर्जन के रास्ते पर तेजी से बढ़ रहे हैं। आज का मूल मन्त्र है- पश्चिम की ओर देखो।
     संस्कृति किसी भी राष्ट्र की पहचान होती है और जब यही संस्कृति न रहे तो पहचान का संकट उत्पन्न हो जाता है। वास्तविकता यह है कि दुनिया में इस समय एक ही संस्कृति की धूम है, जो वैश्वीकरण के पीछे खड़ी है। यह मुनाफे, खुदगर्जी और निर्ममता की संस्कृति है। निश्चय ही वैश्वीकरण के लिए दुनिया भर की परम्परागत संस्कृतियों ने शुरू में थोड़ी समस्या पैदा की थी। पश्चिम की कई वस्तुओं और सेवाओं को अपनी जगह बनाने में कठिनाई हुई, क्योंकि स्थानीय चुनौतियों और संस्कारों की भिन्नता थी। अन्ततः बड़ी पूंजी के चमकीले आतंक के आगे कुछ भी न ठहर सका।
     सन् सत्तर के बाद से संस्कृति में जो परिवर्तन आये, उन्हें लघुकथाकारों ने अपनी लघुकथाओं के माध्यम से उकेरा। ये परिवर्तन इतने गहरे थे कि इस परिवर्तन ने मां-बाप की स्थिति को भी शोचनीय बना डाला। इस सम्बन्ध में डॉ. तारा निगम की निम्न लघुकथा ‘सेवा’ उल्लेखनीय हैः 
     ‘‘वह रोज मंदिर में आता, भगवान को प्रणाम कर कुछ स्तुति गाता, फिर देर तक भगवान की मूर्ति के पैर दबाता। उसकी श्रद्धा देख मुझे अच्छा लगता और मैं सोचती, जो पत्थर की मूर्ति के प्रति इतना सेवा भाव रखता है, वो जीवितों के प्रति कितना दयालु होगा।
     एक दिन मुझसे रहा नहीं गया। मैंने उससे पूछा- भाई, आप रोज इतनी देर तक मूर्ति के पैर दबाते हैं तो अपने माता-पिता के पैर कितनी देर तक दबाते होंगे?
     मेरे सवाल से चौंक गया वो। बोला, उनके पैर मैं कैसे दबाऊंगा?
     क्यों? क्या माता-पिता नहीं है? माफ करना, मुझसे भूल हुई।
     ‘‘नहीं, नहीं, ऐसी बात नहीं, दरअसल वे दोनों तो वृद्धाश्रम में रहते हैं।’’
     अपने देश में संस्कृति की स्थिति आज यह है कि यह अब ‘कल्चर’ के नाम से जाना जाता है और जाना भी क्या जाता है, नाक-भौं चढ़ाकर ‘इंडियन कल्चर’ (?) का जिक्र किया जाता है। 
     हम अपने आस पास के लोगों, घटनाओं और राजनैतिक वक्तव्यों में एक ऐसी संस्कृति की छाया देख सकते हैं, जिससे हम अब तक परिचित थे। विश्व बाज़ार में आम जनता के बुनियादी मूल्यबोध और रूचियों को उजाड़कर एक नकली आस्वाद प्रत्यारोपित कर दिया है। वह हमें अपनी छाया में हंसा और रूला रहा है। मनुष्य खुद अपनी हँसी और अपने आँसू भूलता जा रहा है। दूसरी तरफ, हमारी संस्कृतियाँ सामन्ती रूढ़ियों में पहले से ज्यादा जकड़ गई हैं, धर्म अब नैतिक प्रेरणा से दूर एक मनोरंजन है या हिंसक उन्माद।
     इस नई संस्कृति के पैरोकारों की कोई कमी नहीं है। सांस्कृतिक दुनिया में बाज़ार के ऊपर उठने का अर्थ है कला का नीचे गिरना। हम देख सकते हैं कि आर्थिक मन्दी में भी दिखावे और चमक-दमक में कोई कसर नहीं है, ग्लानि का युग बीत गया है।
इस नई संस्कृति ने मानो पूरे भारत को बाजार में बदल दिया है। सारा भारत बाजारमय हो गया है। हम देख सकते है कि बच्चों के खिलौनों की शक्ल बदल गई है। जीवन के तौर-तरीके बदल गये हैं। इन सबके साथ आदमी की सामाजिकता विलुप्त होती जा रही है। हम सांस्कृतिक उन्मूलन और आत्मविसर्जन का जितना अंदाजा लगा रहे हैं, उससे ज्यादा है। संस्कृति का प्रश्न मुख्यतः एक मध्यमवर्गीय प्रश्न है। मध्यमवर्ग को ही संस्कृति की ज्यादा चिन्ता होती है और अन्धानुकरण में भी वह सबसे आगे होता है। कहा जाता है, वैश्वीकरण ने मध्यमवर्ग का आकार बढ़ा दिया है, उसके स्वप्न ऊंचे कर दिये हैं। आज उच्च वर्ग की वास्तविक आमदनी, मूल्यविहीनता, ताकत और शान-शौकत का अनुमान तक कठिन है पर अब मध्यमवर्ग का भी एक हिस्सा काफी ऊँचे पायदान पर है, जहां से आम पब्लिक जरा भी नहीं दिखती।
     यही नहीं, बदलती संस्कृति के पदचापों की आवाज बच्चों के आंगन में भी आसानी से सुनी जा सकती है। उनका खानपान, रहन-सहन इतना बदल गया है कि उनके और मां-बाप के बीच एक पीढ़ी का नहीं, मानो कई पीढ़ी का अंतर आ गया हो। टी. वी. संस्कृति से रजी-कजी आज के बच्चों की बदलती सोच को डॉ. कमल मुसद्दी की निम्न लघुकथा ‘ब्रेकिंग न्यूज’ प्रमुखता के साथ उद्घाटित करती है:
     ‘‘बच्चों के जोर-जोर से चीखने, झगड़ने और रोने की आवाजों पर मां दौड़कर आई तो देखा कि रितिक के रोबोट की गर्दन और धड़ अलग-अलग पड़े हैं। रितिक आक्रोश भरे रूदन के साथ मुदित के सुपरमैन को कैंची से काट रहा है, साथ ही बड़बड़ाता जा रहा है, ‘तूने मेरा रोबोट तोड़ा, मैं इसके टुकड़े-टुकड़े कर डालूंगा।’’
     मां ने रितिक को डांट कर सुपरमैन छीनना चाहा तो वह मचल गया, ‘‘मैं इसके तीन सौ टुकड़े करके ही मानूंगा। इसने मेरे रोबोट की गर्दन तोड़ी है।’’
     मां मुदित से बोली, ‘‘क्यों तोड़ा तूने इसका रोबोट, बता...?’’ वह चीखा, ‘‘नहीं तोड़ा मैंने।’’
     रितिक चीखा, ‘‘यह झूठ बोल रहा है?’’
     मां ने फिर मुदित को डांटा, ‘‘क्यों झूठ बोलता है तू?’’
     इस पर मुदित और आक्रामक होकर बोला, ‘‘मैं झूठ नहीं बोल रहा, नहीं बोल रहा मैं झूठ...।’’ रोते हुए ही बोला, ‘‘तुम चाहो तो मेरा नार्को टेस्ट करा लो।’’ हतप्रभ मां कुछ देर निशब्द रही... फिर गहरी सांस लेकर खिलौनों के टुकड़े बटोरने लगी।’’
     बाजारवाद ने व्यक्ति के मानस को भी बदलने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। इंसान वैसा नहीं रहा जैसा कि कभी हुआ करता था। 
     इस संस्कृति में न प्रेमचन्द युग के ‘हृदयपरिवर्तन’ की गुजंाइश है और न ही मुक्तिबोध युग के ‘आत्मसंघर्ष’ की। ये दोनों चीजें मानवीय अन्तःकरण में होती है, जो मध्यमवर्ग खोता जा रहा है। मध्यमवर्गीय लोग अब दुख-कष्ट में ज्यादा देर नहीं रह सकते। उन्हें ज़्यादा विलासिता, दौलत, उपभोक्ता सामान, पहचानहीनता की भीड़ में पहचान या प्रतिष्ठा चाहिये। उनके पास अपने हर भले और बुरे के लिए अपना तर्क है। वे हमेशा आत्म-महिमामंडन और दूसरों के ख.डन के लिये तैयार मिलेंगे। वे जिनका विरोध करेंगे, उससे आत्मीयता भी रखंेगे। वे अपने शत्रु के आत्मीय विरोधी होंगे, ताकि गुंजाइश बनी रहे। विकास की अंधी दौड़ ने सभी रिश्ते-नातों को भुला दिया है। 
     मूल्यबोध से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है येन-केन प्रकारेण विकास। सह-अस्तित्व से अधिक चिन्ता है सिर्फ अपने फायदे और बोलबाले की। योग्यता से अधिक बड़ी कसौटी है वफादारी। न्याय से अधिक जरूरी है स्वजन-पोषण। पैसा सबका राजा है। इस विश्वास ने आदमी में लालच बढ़ाया है। इसके साथ उसकी असुरक्षा भी बढ़ी है- कहीं भी हत्या, नरसंहार या आत्मघाती हमला सम्भव है।.... भोले आदमी अन्य ग्रह पर चले जाएं। अब ऐसे व्यक्तियों की जरूरत है, जो प्रबन्धन में होशियार हैं, जुगाड़ा टेक्नोलोजी में मास्टर हैं, मंत्रियों या सत्ताधारियों की चापलूसी करके अपना काम निकालना जानते हैं एवं निर्मम हैं। वे महत्वकांक्षी ही होने चाहिए। आज के ज्ञान में स्वार्थहीनता, राष्ट्रीय भावना, ईमानदारी, जनता से प्रेम जैसे मूल्यों के लिए जगह नहीं है। अब जो कम्पनी मुनाफा नहीं देती और जो रिश्ता फायदा नहीं पहुँचाता, उसे बने नहीं रहना है। 
     सरकार के सामने भी समस्या खड़ी हो गयी है। वह इस नये माहौल में सबको कैसे सुख-सुविधा और जीने की आम जरूरतें प्रदान करे जबकि हर आदमी जल्दी में है और जल्दी से जल्दी अमीर बनना चाहता है। 
     सर्वविदित है कि लोकतांत्रिक कही जाने वाली सरकारें भारी खर्च करके भी आम आदमी को न अच्छी शिक्षा दे पा रही हैं, न सही चिकित्सा और न ही जरूरी सेवाएं। इसलिए ही देश-विदेश की निजी कम्पनियां अपने कठोर अनुशासन के साथ छाती जा रही हैं। दरअसल, निजीकरण लोकतंत्र की विफलता की देन है। नतीजतन सरकारें हों या व्यक्ति उनकी बुनियादी दृष्टि बन गयी है- जिसमें फायदा नहीं, उसमें हम शामिल नहीं। अब जहां से फायदे की उम्मीद नहीं होती, चाहे वह सरकारी संस्थान हो, सरकारी सहायता प्राप्त संस्थान हो, कोई सेवा कार्य हो या आत्मीय रिश्ता, वहां से हाथ खींच लिया जाता है।
     यह संतोष की बात है कि इस नये माहौल को लघुकथाकारों ने बहुत जल्दी पकड़ लिया। आज ऐसी अनेकों लघुकथाएं हैं जो इस संस्कृति को दर्शाती हैं और समाज को प्रतिबिम्बित करती हैं।
     एक छोटे से सवाल के साथ यह कहानी यहीं खत्म करते हैं। यह बताइये कि किसी एक इंसान के शरीर में यदि उसकी सिर्फ नाक पनप रही है और बाकी अंग सूखे जा रहे हैं, तो क्या आप उसकी इस अद्भुत तरक्की का जश्न मनायेंगे? उससे कहेंगे ‘‘यार तुम्हारा हाथ पांव, सिर-पेट सूख कर कांटा हो गया तो क्या, तुम्हारी नाक तो हाथी की सूँड की तरह फल-फूल रही है, बधाई हो! या फिर आप उससे कहेंगे कि ‘‘महोदय आप अत्यन्त बीमार हैं, आपको जल्दी उपचार की जरूरत है, आपकी नाक आपके बाकी शरीर को पनपने नहीं दे रही है। शायद यह कैंसर जैसी कोई भीषण बीमारी है। फैसला आपको करना है।
     इस नयी संस्कृति को दर्शाती लघुकथा ‘शर्त’ (डॉ. तारिक असलम ‘तस्नीम’) यहां प्रस्तुत है:
     ‘‘मिसेज लीला, अब तो दोनों बच्चों की शादी एक साथ कर डालो। रवि तीस का और नीलू सत्ताइस की होने को है। कब तक इंतजार करोगी यूं ही। जल्दी से शगुन की मिठाई का स्वाद चखा दो।’
     ‘चिंता तो मुझे भी हो रही है, कुलकर्णी बहिन। मैं भी सोचती हूँ कब तक बेचारे दोनों इस तरह रात-रात भर क्लबों-पार्टियों में घूम-घूमकर ‘टाइम पास’ करते रहेंगे। मेरी तो कोई इच्छा नहीं है। बस, रवि के लिए कोई सुन्दर, सुशील, खानदानी, घरेलू लड़की मिल जाये जो रवि से एडजस्ट कर ले। नीला के नाज-नखरे उठाने वाला कोई ‘जोरू का... मिल जाये तो मैं चिंतामुक्त हो जाऊं।’’ 


  • कविकुल, खरवन्दा निवास, स्टेशन रोड, बिजनौर-246701 (उ.प्र.)/मोबा. 09412567854

शुक्रवार, 9 जनवरी 2015

अविराम विमर्श

अविराम  ब्लॉग संकलन :  वर्ष : 4,  अंक : 03-04,  नवम्बर-दिसम्बर  2014 

।।विमर्श।।

सामग्री :  डॉ. उमेश महादोषी का आलेख ‘स्थापना चरण से आगे लघुकथा विमर्श’।



डॉ. उमेश महादोषी

{यह आलेख सुप्रसिद्ध लघुकथाकार श्री भगीरथ जी द्वारा संपादित व श्री मधुदीप जी द्वारा संयोजित लघुकथा संकलन श्रंखला ‘पड़ाव और पड़ताल’ के खण्ड-4 में बतौर अग्रलेख  शामिल है।}
स्थापना चरण से आगे लघुकथा विमर्श
      लघुकथा के पक्ष-विपक्ष में दो घटनाओं, जिनसे मैं स्वयं रू-ब-रू हुआ, को साझा करना चाहूंगा। पहली घटना एक रेल-यात्रा के दौरान घटी। मैं अपनी पत्नी के साथ बरेली से रुड़की जा रहा था। हमारे सामने वाली वर्थ पर एक युवा महिला अपने पति व बच्चों के साथ जम्मू के लिए यात्रा कर रही थी। मैं उषा अग्रवाल संपादित लघुकथा संकलन ‘लघुकथा वर्तिका’ पढ़ रहा था। मेरे द्वारा पढ़ने के दौरान एकाध रचना पर उस महिला की दृष्टि पड़ गई। उसने कुछ संकोच के साथ मुझसे अनुरोध किया, ‘‘अंकल, आप पढ़ लें तो यह किताब थोड़ी देर मुझे भी पढ़ने के लिए दीजिएगा।’’ मैंने यह कहते हुए कि मैं तो कभी भी पढ़ लूँगा, समय सीमित है अतः पहले आप पढ़ लें, संकलन उस महिला को दे दिया। मेरे अनुमान के अनुसार वह महिला कोई साहित्यकार नहीं थी। संकलन को करीब डेढ़ घंटे तक पढ़ने के बाद उसने मुझे लौटाते हुए कहा, ‘‘किताब बहुत अच्छी है। इसमें छपी छोटी-छोटी कहानियाँ बहुत अच्छी हैं।’’ इस बीच मैं अविराम साहित्यिकी का लघुकथा विशेषांक पढ़ता रहा, जिसे भी उस महिला पाठक ने मुझसे लेकर पढ़ा और उसमें शामिल लघुकथाओं को सराहा। दूसरी घटना- हमारी एक भाभीजी (हमारे एक घनिष्ठ मित्र की पत्नी) साहित्यकार न होते हुए भी साहित्य की संजीदा पाठक हैं (उनके परिवार में भी कोई साहित्यकार नहीं है)। उनकी रुचि को देखते हुए हम आरम्भ से ही अविराम/अविराम साहित्यिकी के हर अंक की प्रति उन्हें पढ़ने के लिए भेंट करते रहे हैं। आरम्भ के पाँच-सात अंक पढ़ने के बाद उन्होंने एक दिन मुझे कुछ शिकायती लहजे में कहा, ‘‘भाई साहब, आप इसमें कहानियाँ बहुत कम छापते हैं।’’ मैंने उत्तर में उनका ध्यान हर अंक में पर्याप्त संख्या में प्रकाशित होने वाली लघुकथाओं की ओर आकर्षित किया। वह बोलीं, ‘‘ये भी ठीक हैं पर मुझे तो बड़ी कहानियाँ ही अच्छी लगती हैं।’’ 
    इन दोनों घटनाओं के केन्द्र में लघुकथा है। दोनों घटनाएँ साहित्य के आम पाठकों से संबंधित हैं। लेकिन अपनी अलग-अलग रुचि के कारण एक लघुकथा को बहुत चाव के साथ पढ़ती है और प्रभावित होती है; जबकि दूसरी पाठक लघुकथा के ऊपर कहानी को तरजीह देती है। मैं समझता हूँ लघुकथा (और अन्य लघ्वाकारीय विधाओं) को लेकर चल रही अनेक बहसों और विवादों के अधिकतर जवाब इन और इस तरह की घटनाओं के विश्लेषण में मिल जायेंगे। विवादों और अनेक सतही बातों में उलझने के बजाय हमें मान लेना चाहिए कि साहित्य में स्थापित होने वाले परिवर्तन मनुष्य की रुचि और उसके अन्तःकरण की भाव-भूमि की रासायनिकी से संचालित और नियंत्रित होते हैं। इसमें समय की उपलब्धता-अनुपलब्धता और भागमभाग जैसी चीजों की बहुत अधिक भूमिका नहीं होती, जबकि यह लम्बी खिंची बहस में अहम् मुद्दा रहा है। दूसरी ओर लघुकथा के शिल्पगत ताने-बाने के इर्दगिर्द की चर्चाएं भी अब बेवजह-सी लगने लगी हैं। ये चीजें लघुकथा-सृजन की समीक्षा व समालोचना में कितनी ही उठायी जायें परन्तु लघुकथा की विधागत चर्चाओं व बहसों के केन्द्र में जब तक रहेंगी, लघुकथा को एक नई विधा के दायरे से बाहर नहीं आने देंगी। चूंकि पिछले पांच दशक में इस विधा के रूप-स्वरूप पर पर्याप्त मंथन हुआ है। बहुतायत में सृजन हुआ है। अनगिनत संकलन-संग्रह आए हैं। तकरीबन हर स्तर पर इसकी स्वीकार्यता ज्ञापित हुई है। जनमानस में भी इस विधा ने अपना समुचित स्थान बनाया है। यदि इतने सबके बावजूद इस विधा के बारे में धारणा कुछ ऐसी है कि यह अभी भी एक नई साहित्य विधा है तो यह निराशाजनक है। दूसरी ओर इस पर विधागत विमर्श पांच दशक पूर्व जहां से शुरू हुआ था, सामान्यतः वहीं पर खड़ा दिखाई देता है, विमर्श के वही मुद्दे, वही पुरानी बातें हैं, जिन्हें लगातार दोहराया जा रहा है। चूंकि इन पर आवश्यकतानुरूप पर्याप्त बातें हो चुकी हैं तो अब इनकी पुनरावृत्ति मन को गहराई तक कचोटती हैं। साहित्य में विधागत संधारणा पर क्या इससे आगे कोई गन्तव्य नहीं होता? क्या किसी विधा के अस्तित्व में आने के बाद उसके रूपाकार, शिल्प-संयोजन, ऐतिहासिकता, कुछ घिसे-पिटे वादों के सांचे में जड़े प्रश्नों और इनसे जुड़े विषयों को समाहित करने वाले स्थापना चरण से आगे विमर्श का कुछ अर्थ नहीं होता? विमर्श विधा का वाहक होता है। इसलिए विमर्श जहां जायेगा, विधा को भी वहाँ ले जायेगा। समीक्षा-समालोचना विधा का परिमार्जन कर सकती है, उसके लिए नई जमीन तोड़ने और भूमिका को चरणबद्ध अद्यतन रखने का काम शिल्पकारों के मध्य का विमर्श ही करता है। फिर विमर्श के नए क्षितिज क्यों नहीं? एक विधा के तौर पर उसकी आगे की भूमिका की तलाश क्यों नहीं? मुझे लगता है कि लघुकथा की स्थापना का चरण पूरी तरह संपन्न हो चुका है और अब उसे ‘‘नई विधा’’ की प्रशिक्षण कक्षा से बाहर लाना चाहिए। विमर्श के अनेक पहलू होते हैं और हर पहलू पर चर्चा का एक समय और विधान होता है। लघुकथा के रूप-स्वरूप व नुक्ताचीनियों के सन्दर्भ में बात अब अकादमिक समीक्षकों और समालोचकों के लिए छोड़ देना उचित होगा। लघुकथा के शिल्पकारों के लिए चर्चा के विषय अब लघुकथा की विधागत जिम्मेवारियों से जुड़े मुद्दे होने चाहिए, एक स्थापित और परिपक्व विधा के तौर पर लघुकथा क्या-क्या कर सकती है, उसको क्या करना चाहिए और उसने क्या किया है। इनके मध्य अन्तराल की पहचान-परख जरूरी है। इसी के माध्यम से लघुकथा को मानवीय जीवन के पक्ष में आगे बढ़ाया जा सकता है। साहित्य के उत्तरदायित्वों में मानव जीवन के विविधि पक्षों का प्रेक्षण, मूल्यांकन और संवर्द्धन सर्वाेपरि होता है। यह कार्य मानव जीवन में होने वाले परिवर्तनों और उनके प्रभावों के प्रतिबिम्बन व मूल्यांकनपरक विश्लेषण से संभव है। आने वाले समय की आहट को कल्पनाशीलता के समावेश के कारण साहित्य में ही सबसे प्रभावशाली ढंग से सुना जा सकता है। इस परिप्रेक्ष्य में देखें तो आज लघुकथा ही नहीं, समग्र साहित्य के समक्ष ही नई-नई जिम्मेवारियां सम्हालने की चुनौती है। समय तेजी से बदल रहा है। कई बदलाव जब तक हमें दिखाई देना आरम्भ होते हैं, वे करवाचौथ के चाँद की तरह बूढ़े हो चुके होते हैं। हम इन बदलावों की प्रक्रिया समझ ही नहीं पाते। ऐसे में सामान्यतः आ चुके बदलावों को स्थापित माइन्डसैट के चश्मे से ही देखते रहते हैं। उनके अन्तस तक पहुँचना प्रायः संभव नहीं होता। चेतना और संवेदनशीलता की सूक्ष्मता हमें अपने अन्दर विकसित करनी होगी, तमाम क्षेत्रों में। मानवीय संवेदना के साहित्य से जुड़े होने के रिश्ते से हमारी जिम्मेवारी कुछ अधिक है। लघुकथा सूक्ष्मता को ग्रहण करने और उसका फोकस बनाने में सक्षम है, इसलिए उसकी भूमिका सर्वाेपरि है। हमें इसी भूमिका पर चर्चा करनी है, विमर्श को केन्द्रित करना है। 
      एक ताजातरीन उदाहरण सामने है। नई पीढ़ी में हो रहे चारित्रिक बदलाव को सामान्यतः राजनैतिक लोग नजरअन्दाज करते रहते हैं, जबकि यही चारित्रिक बदलाव बड़ी उथल-पुथल का कारण बन जाता है। विशेषतः उत्तर भारत में इसे हमने अभी-अभी देखा है। भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना आन्दोलन एवं बलात्कार के खिलाफ निर्भया काण्ड के बाद का आन्दोलन, इन दोनों में सहभागिता के मामले में समाज की कई रूढ़ियाँ टूटीं। गरीब-अमीर, जाति-पाँति, एक सीमा तक (स्थानीय) क्षेत्रवाद आदि के दायरों को लाँघकर युवाओं का हुजूम सामने था। बरास्ता कार्पाेरेट कल्चर (इसका प्रभाव कॉन्वेंट, तकनीकी एवं व्यवसायिक शिक्षा से जुड़े संस्थानों में भी है और वहां से प्रसारित होती है) युवाओं में आया चारि़ित्रक बदलाव, जो तमाम संकुचित सामाजिक दायरों की उपेक्षा करके व सामाजिक भेदभाव की सीमाओं के ऊपर अपनी प्रगति को सर्वाेपरि मानने और इसी आधार पर बन रहे पारस्परिक आकर्षण से संचालित हो रहा है। हाल ही में संपन्न लोकसभा चुनावों में इसका बड़ा सजीव दृश्य देखने को मिला। जहां छह-सात माह पूर्व कोई सोच भी नहीं सकता था कि उ.प्र. व बिहार जैसे धुर जातिवादी राजनीति के शिकंजे में फंसे इन क्षेत्रों में भारतीय जनता पार्टी कभी पुनः खड़ी भी हो पायेगी, वहां नई पीढ़ी के चारित्रिक बदलाव का करिश्मा नरेन्द्र मोदी को महानायक बना गया। धुर जातिवादी राजनीति के पुरोधा इस बदलाव को समझने में नाकाम रहे, लेकिन नरेन्द्र मोदी ने न सिर्फ इसे जाना, बल्कि समझकर उसका विश्लेषण भी किया और उसका प्रवाह अपने पक्ष में मोड़ने में कामयाब रहे। इस उदाहरण को सामने रखने का मेरा उद्देश्य सिर्फ इतना है कि यदि नई पीढ़ी में यह और इस तरह के चारित्रिक बदलाव आते हैं तो उन्हें साहित्य में प्रतिबिम्बित होना चाहिए, विशेषतः लघुकथा जैसी विधाओं में, ताकि कल्पनाशीलता की रोशनी में उनका परीक्षण करके भविष्य की पीढ़ियों के सन्दर्भ में मानवीय जीवन का समुचित प्रतिबिम्बन और विश्लेषण प्रस्तुत किया जा सके। इस तरह के चारित्रिक बदलाव कितने उचित हैं, कितने अनुचित, इनमें से किन्हें कैरी फॉरवर्ड होना चाहिए, किन्हें हतोत्साहित करने की जरूरत है, इसका विश्लेषण साहित्य में बेहतर ढंग से हो सकता है। साहित्य ही इसके लिए सही मंच है। लघुकथा और उससे जुड़े लोगों को इसे समझना होगा।
     दूसरी बात, आन्दोलनात्मक चरित्र के पीछे सदैव आदर्श ही नहीं होते हैं। जीवन शैली से जनित कई तरह की सुविधाभोगी चीजें भी होती हैं। मेरा व्यक्तिगत मानना है कि अन्ना आन्दोलन व निर्भया काण्ड के बाद के शक्तिशाली दोनों आन्दोलनों में सहभागिता के स्तर पर कई तरह के विरोधाभास भी थे और कई सुविधाभोगी तत्व भी। ऐसी चीजों का सही विश्लेषण व मूल्यांकन न तो आन्दोलन के माहौल में संभव है न ही सामाजिक-राजनैतिक चर्चाओं में। इन दोनों ही मंचों पर कई तरह के दबाव होते हैं, जो सही तस्वीर को उभरने नहीं देते। इसके विपरीत साहित्य में ऐसी चर्चाओं के लिए जोखिम उठाने की क्षमता होती है।
     यहाँ यह भी समझना जरूरी है कि एक समय की युवा पीढ़ी ही आने वाले समय की वरिष्ठ पीढ़ी होती है। इसलिए प्रत्येक कालखंड में सिर्फ नई पीढ़ी का चरित्र ही नहीं बदलता है, वरिष्ठ पीढ़ी का चरित्र भी बदलता है। और यह बदलाव पाँच-दस वर्षों के अन्तराल के साथ भी हो सकता है। एक समय पर नई पीढ़ी के जो मूल्य होते हैं, कुछ वर्षों बाद जब वही पीढ़ी वरिष्ठ पीढ़ी बनती है, तो अपने समय के मूल्यों, अपने चरित्र को साथ लेकर आती है। बेशक कुछ अनुभवजन्य रूपांतरण हो सकते हैं, पर मूल चारित्रिक कवच से निकलना मुश्किल होता है। ऐसे में हर समय बिन्दु पर समाज का बदला हुआ चरित्र और पीढ़ी अंतराल के नए रूप सामने आते हैं और हमारी तमाम व्यवस्थाओं को प्रभावित करते हैं। 
    ये और ऐसे ही अनेक बिन्दु हैं जिन पर लघुकथा सृजन और विमर्श दोनों को फोकस किया जा सकता है। लेकिन क्या ऐसा हो पा रहा है? जीवन मूल्यों एवं नई पीढ़ी के चारित्रिक रूपांतरण को उसके यथार्थ के साथ गहन एवं समग्र रूप में लघुकथा में उतना नहीं प्रतिबिम्बित किया जा सका है, जितने की अपेक्षा है। जो प्रतिबिम्ब देखने को मिलते भी हैं, वे या तो बेहद सतही हैं या नकारात्मक हैं। इन रूपान्तरणों का तर्कसंगत विश्लेषण का पक्ष तो न के बराबर ही देखने को मिलता है। नई पीढ़ी के हर व्यवहार को हम पुराने मूल्यों के आधार पर नकारात्मक ही मानते रहें, यह किसी भी तरह से उचित नहीं है। उसके व्यवहार को हमें उसकी परिस्थितियों और परिस्थितिजन्य आवश्यकताओं के साथ रखकर देखना होगा। साहित्यकार और उसका कर्म बेहद संवेदनापूर्ण होता है, उससे सतर्कता और न्यायसंगत चिन्तन की अपेक्षा की जाती है। उसकी दृष्टि समग्र को देखने में सक्षम होनी चाहिए, उसमें सूक्ष्मता के साथ विस्तार होना चाहिए, सीमित व्यक्तिपरकता नहीं। सृजन में गहराई भी इसी से आयेगी और हम अपने समय के साथ सही मायनों में इसी तरह जुड़ पायेगे। आज यदि लघुकथा अपने समय के साथ उतना नहीं जुड़ पा रही है जितना कि कहानी, जैसा कि वरिष्ठ लघुकथाकार डॉ. सतीश दुबे जी मानते हैं, तो इसके पीछे के कारण इसी तरह के हैं। समय को पढ़ना, उसकी गति की सूक्ष्मता और परिवर्तन की प्रक्रिया को समझने जैसा होता है। सामान्यतः समय कारण और परिणाम के वैज्ञानिक रिश्ते से संचालित होता है, इसी में उसकी गति की सूक्ष्मता और परिवर्तन की प्रक्रिया निहित होती है। एक पहिया, जो घूमता तो तेजी से है लेकिन उसके घूमने में कुछ भी अकारण नहीं होता, न ही कुछ छूटता है, जिसे घूमने की घटना में शामिल होना चाहिए। यही उसकी सूक्ष्मता है। लघुकथा को अपने रास्ते पर इसी तरह समय का अनुसरण करना होगा। यह अनुसरण उसके विकास का दूसरा चरण होगा, जो उसे मानवीय जीवन के अद्यतन परिवर्तनों और रूपान्तरणों को प्रतिबिंबित करने को प्रेरित करेगा, साथ ही उनके विश्लेषण और संवर्द्धन के लिए भी।
  • 121, इन्द्रापुरम्, निकट बीडीए कॉलोनी, बदायूँ रोड, बरेली, उ.प्र. / मोबाइल : 09458929004

रविवार, 6 जुलाई 2014

अविराम विमर्श


अविराम  ब्लॉग संकलन :  वर्ष : 3,  अंक : 09-10,  मई-जून 2014 

।।विमर्श।।
  
सामग्री : सुप्रसिद्ध लघुकथाकार डॉ. बलराम अग्रवाल से लघुकथा से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर डॉ. उमेश महादोषी की बातचीत।

डॉ. बलराम अग्रवाल  

साहित्य को दलित और स्त्री-विमर्श में संकुचित कर दिया गया है : डॉ. बलराम अग्रवाल

{लघुकथा पर अध्ययन-मनन करते हुए मेरे मन में कई तरह के प्रश्न उठते रहे हैं। मैं इन प्रश्नों को नोट करके संग्रहीत करता रहा। करीब तीन वर्ष पूर्व अपनी जिज्ञासाओं को लेकर सुप्रसिद्ध लघुकथाकार एव समालोचक डॉ. बलराम अग्रवाल जी से बातचीत की बात मेरे मन में आई थी, लेकिन संयोग नहीं बन पाया। चूंकि बातचीत काफी लम्बी हो सकती है, इस संभावना के दृष्टिगत हमने निश्चय किया कि अपने प्रश्नों को कुछ खण्डों बाँटकर, समय की उपलब्धता के अनुरूप बातचीत को किश्तों में अंजाम दिया जाये। अब हमने इस प्रक्रिया को आरम्भ किया है। प्रस्तुत है पहली किश्त में लघुकथा की सामान्य स्थिति से जुड़े प्रश्नों पर हुई बातचीत। बातचीत के दौरान पूर्व निर्धारित प्रश्नों में कुछ बदलाव करने पड़े तो कुछ नए प्रश्न भी उभरकर
डॉ. उमेश महादोषी  
सामने आए। जैसे-जैसे समय की उपलब्धता का संयोग बनेगा, हम इस बातचीत को आगे बढायेंगे। -उमेश महादोषी}
उमेश महदोषी :  किसी विधा के आरम्भिक और विकास काल में नियोजित लेखन को क्या आप ठीक मानते हैं? यदि हाँ, तो उस तरह के सन्दर्भ में नियोजित लेखन के प्रमुख चरण क्या होने चाहिए?

बलराम अग्रवाल : हिन्दी कहानी प्रेमचंद से पहले भी थी लेकिन उसके सरोकार रोमांच और रंजन से अधिक नहीं थे। प्रेमचंद ने उसको जनमानस की तत्कालीन पीड़ाओं से जोड़ा। इसलिए कहानी का विकास यदि हम प्रेमचंद से मानें तो मुझे नहीं लगता कि उन्होंने या उनकी पीढ़ी के किसी अन्य कथाकार (प्रमुखतः प्रसादजी आदि) ने कभी नियोजित लेखन के बारे में सोचा भी होगा। विधा का विकास दृष्टि की नवीनता और कालानुरूप दिशाबोध पर निर्भर करता है, नियोजित लेखन उसके बाद की चीज़ है। प्रेमचंद के बाद, नई कहानी के दौर में जिस तरह कहानी-लेखन हुआ या किया गया; और उसके जो सरोकार बताए-गिनाए गये, उसे आप नियोजित लेखन मान सकते हैं। लेकिन समाज और साहित्य के बीच जो जगह नई कहानी ने बनाई उसकी वजह यही थी कि उस दौर के कथाकारों ने कहानी के कथ्य और उसकी प्रस्तुति को प्रेमचंद के काल से आगे पहुँचाने की जरूरत महसूस की। उन्होंने प्रेमचंद की अवहेलना नहीं की; लेकिन उनके कथ्यों का अनुसरण भी नहीं किया। यह भी कह सकते हैं कि बदली हुई परिस्थितियों में वे वहाँ भी पहुँचे जहाँ प्रेमचंद की पहुँच नहीं बन पाई थी। इस कार्य के लिए उनमें यथार्थ ललक और अपने काल की प्रवृत्तियों और मनोवृत्तियों को पहचानने व अभिव्यक्ति देने की अद्भुत कथा क्षमता थी।

उमेश महदोषी :  ठीक है, लेकिन 1970 के बाद 15-20 वर्षों तक समकालीन लघुकथा को एक फोकस के तहत लिखा गया और उस पर विमर्श की मुहिम को चलाया गया। क्या इस तरह के तमाम प्रयासों को एक नवीन विधा के सन्दर्भ में लघुकथा में नियोजित लेखन मानना उचित नहीं होगा?

बलराम अग्रवाल :  नहीं। 1970 के बाद ‘लघुकथा’ को फोकस का मिलना उस काल की महती आवश्यकता थी। 1980 में प्रकाशित अपने संग्रह ‘विकलांग श्रद्धा का दौर’ की भूमिका में अपने समय का, प्रमुखतः 1970 के बाद का जिक्र परसाईजी ने जिस तरह किया था, उसे मैं ज्यों का त्यों उद्धृत करना चाहूँगा- ‘‘इस दौर में चरित्रहीन भी बहुत हुआ। वास्तव में यह दौर राजनीति में मूल्यों की गिरावट का था। इतना झूठ, फरेब, छल पहले कभी नहीं देखा था। दग़ाबाजी संस्कृति हो गई थी। दोमुँहापन नीति। बहुत बड़े-बड़े व्यक्तित्व बौने हो गए। श्रद्धा सब कहीं से टूट गई। इन सब स्थितियों पर मैंने जहाँ-तहाँ लिखा। इनके संदर्भ भी कई रचनाओं में प्रसंगवश आ गए हैं। आत्म-पवित्रता के दंभ के इस राजनीतिक दौर में देश के सामयिक जीवन में सब कुछ टूट-सा गया। भ्रष्ट राजनीतिक संस्कृति ने अपना असर सब कहीं डाला। किसी का किसी पर विश्वास नहीं रह गया था- न व्यक्ति पर न संस्था पर। कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका का नंगापन प्रकट हो गया। श्रद्धा कहीं नहीं रह गई। यह विकलांग श्रद्धा का भी दौर था। अभी भी सरकार बदलने के बाद स्थितियाँ सुधरी नहीं। गिरावट बढ़ रही है। किसी दल का बहुत अधिक सीटें जीतना और सरकार बना लेना, लोकतंत्र की कोई गारंटी नहीं है। लोकतांत्रिक स्परिट गिरावट पर है।‘‘ ये सामाजिक, राजनीतिक परिस्थितियाँ थीं जो 1967 के आसपास से ही उभरकर सामने आने लगी थीं। ऐसे में अनेक कथाकार कहानी कहने की उस शैली को जो उक्त काल में बोझिल-सी हो चुकी थी, त्यागकर कथाभिव्यक्ति की छापामार शैली की ओर उन्मुख हुए। आप देखेंगे कि उस काल की अधिकतर लघुकथाएँ अपने शिल्प और शैलीगत अधकचरेपन के बावजूद सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक दोगलेपन के खिलाफ अपनी आवाज़ बुलन्द करती हैं। इस कथा-शैली को ‘तारिका’, ‘कात्यायनी’ जैसी तब की अनेक लघु-पत्रिकाओं ने अपने पन्नों पर जगह देनी शुरू की। कुछ नई पत्रिकाएँ भी शुरू हुईं जिनमें ‘अतिरिक्त’, ‘मिनियुग’, ‘अन्तर्यात्रा’, ‘दीपशिखा’ आदि का नाम आसानी से लिया जा सकता है। इन लघु-पत्रिकाओं में प्रकाशित होने वाली लघुकथाओं का नोटिस कथाकार-संपादक कमलेश्वर ने लिया और उन्होंने ‘सारिका’ में लघुकथाओं को जगह देनी शुरू की। ‘सारिका’ के जुलाई 1973 अंक को उन्होंने ‘लघुकथा बहुल अंक’ बनाकर प्रकाशित किया। किसी व्यावसायिक कथा-पत्रिका का द्वारा लघुकथा को स्वीकारने की यह महत्वपूर्ण पहल थी। हमें नहीं भूलना चाहिए कि अपने संपादन में लघुकथा को बढ़ावा देने की शुरुआत करने वाले कमलेश्वर नयी कहानी आंदोलन के स्तम्भ कथाकार थे। आखिर कोई तो बात उन्होंने ‘लघुकथा’ में देखी ही होगी कि वे इस विधा को प्रमुखता देने की ओर उन्मुख हुए। ...तो जिस नियोजन की बात आप कर रहे हैं, उसका निर्धारण समय और परिस्थितियाँ करते हैं, कोई व्यक्ति या व्यक्ति-समूह नहीं। समय और परिस्थितियों से विलग हर नियोजन व्यर्थ जायेगा।

उमेश महदोषी :  क्या आपको लगता है कि पिछली शताब्दी के आठवें और नौवें दशक में लघुकथा को प्रतिष्ठित करने के लिए किए गए प्रयास अपने आप में पूर्ण थे? या कुछ ऐसी चीजें दिखाई देती हैं, जिन्हें किया जा सकता था, लेकिन नहीं किया गया?

बलराम अग्रवाल :  अगर समुचित अध्ययन के द्वारा आपने विवेकशील होने के गुण को साधा है। अगर समाज को देखने-परखने की आपकी दृष्टि में पारदर्शिता है। अगर आप अपने उद्देश्य के निर्धारण में किसी भ्रम या उहापोह के शिकार नहीं हैं। अगर आप ईमानदारी, निष्ठा और सम्पूर्ण शारीरिक-मानसिक क्षमता के साथ अपने उद्देश्य की ओर बढ़ने का दायित्व निभा रहे हैं तो इतर कारणों से अनचीन्हे भले ही रह जाएँ, मेरी नजर में आपके प्रयास में ‘पूर्णता’ है। उमेश जी, व्यक्ति के सम्बन्ध में भी और विधा के सम्बन्ध में भी, मुझे लगता है कि ‘प्रतिष्ठा’ एक सापेक्षिक शब्द है। काल-विशेष या स्थान-विशेष में जैसी प्रतिष्ठा इन्हें मिली हो, वैसी प्रत्येक काल या प्रत्येक स्थान में मिलती रहेगी, आवश्यक नहीं है। वे चीजें, जिन्हें किया जा सकता था और नहीं किया गया, के साथ-साथ एक सवाल यह भी बनता है कि क्या कुछ ऐसी चीजें दिखाई देती हैं जिन्हें किया गया लेकिन नहीं करना चाहिए था। खैर, जिन्हें किया जा सकता था और नहीं किया गया, के बारे में मैं यही कह सकता हूँ कि लघुकथा-संकलनों के संपादन-प्रकाशन का जैसा काम बलराम ने किया वैसा व्यावसायिक पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े अन्य लघुकथा-हितैषियों को भी करना चाहिए था। दूसरी ओर, बलराम को कोशों के संपादन के साथ-साथ लघुकथा-लेखन पर भी बने रहना चाहिए था। महेश दर्पण अपने लेखन की शुरुआत में लघुकथा से जुड़े थे। ‘मिट्टी की औलाद’ नाम से उनका लघुकथा-संग्रह भी आया था। उन्होंने कहानी पर बहुत बड़ा काम कर दिखाया; लेकिन लघुकथा पर काम के लिए किसी प्रकाशक को तैयार न कर सके। रमेश बतरा तो लघुकथा के हित-चिंतक, विचारक और लेखक सभी कुछ थे। वे ‘सारिका’, ‘नवभारत टाइम्स’ या ‘सण्डे मेल’ जहाँ भी रहे, लघुकथा को जगह देते रहे। जब तक जिये, लघुकथा पर संवाद में बने रहे। उनके दो कहानी संग्रह तो आये; लेकिन अपनी लघुकथाओं का संग्रह प्रकाशित करने की ओर वे क्यों नीरस रहे समझ में नहीं आता है। ये मैं लघुकथा की उन सशक्त संभावनाओं के नाम गिना रहा हूँ जो संयोग से व्यावसायिक प्रकाशन संस्थाओं की साहित्यिक पत्रिकाओं से जुड़ी थीं। लघुकथा के चयन और उसकी आलोचना के एक काम को 2013 से मधुदीप ने ‘पड़ाव और पड़ताल’ के रूप में आगे बढ़ाने की शुरुआत की है। उम्मीद है कि उसके माध्यम से स्थिति कुछ साफ अवश्य होगी।

उमेश महदोषी :  निसंदेह मधुदीप जी की योजना लघुकथा के लिए नई ज़मीन तैयार कर सकती है। उन्होंने अपनी नवें दशक की योजना को अब आगे बढ़ाने की ठानी है। आठवां और नौवां दशक समकालीन लघुकथा के लिए सबसे उर्वर समय रहा। क्या उसके बाद के समय में वह लय किसी सीमा तक बनी रह पाई है? या किसी बिन्दु पर जाकर लघुकथा का समय ठहर गया-सा लगता है?

बलराम अग्रवाल :  मेरा मानना है कि लघुकथा लेखन के लिए समय की उर्वरता सातवें दशक के उत्तरार्द्ध में शुरू हो चुकी थी। अनेक लोगों ने उस दौर में कथाभिव्यक्ति की इस शैली को अपनाने की ओर ध्यान देना शुरू कर दिया था। उस जमीन को पकने में करीब एक दशक लगा और आठवें दशक के मध्य तक आते-आते यह पूरी तरह तैयार हो चुकी थी। हमें स्वीकार कर लेना चाहिए कि भारतवासियों के जीवन में वह राजनीतिक, धार्मिक और आर्थिक- सभी मोर्चों पर नये-नये शोषक झंडाबरदारों के पैदा हो जाने और उनके द्वारा निर्द्वंद्व ठगे जाने के एहसास का काल था। शोषण और अत्याचार के खिलाफ कहीं कोई सुनवाई नहीं। सभी प्रकार के नेतृत्व के खिलाफ जितना उग्र स्वर उस काल के भारतीय साहित्य में मिलता है, उतना उसके बाद वाले काल में नहीं। इसलिए लघुकथा में भी विरोध की वह लय नवें दशक के बाद टूटती-सी नजर आती है। यहाँ एक और बात की ओर भी ध्यान दिलाना अप्रासंगिक नहीं होगा। नवें दशक के बाद समूचे साहित्य को दलित-विमर्श और स्त्री-विमर्श में संकुचित कर दिया गया। इससे जनसंघर्ष के अनेक मुहानों पर सूनापन छा गया, लूटखोरों के लिए वे निर्द्वंद्व हो गये। माना, कि ये दोनों विमर्श भारतीय समाज की बड़ी आवश्यकताएँ थीं; लेकिन इनके जरिए समूचे असंतोष को संकुचित कर देने की अभिजात्य चालाकी पर किसी का ध्यान नहीं गया। अशिक्षा, बेरोजगारी और भुखमरी से आज का भारत सातवें-आठवें-नवें दशक के भारत से कम त्रस्त नहीं है, लेकिन उस ओर आज के साहित्य का रुझान बेमानी बना दिया गया है। यही वह बिन्दु है जहाँ लघुकथाकार भी भ्रमित है, कहानीकार भी और कवि भी। शाश्वत संघर्ष की धार को पूँजी और सत्ता किस चालाकी से कुंद करती हैं, यह उसका सजीव उदाहरण है।

उमेश महदोषी :  समूचे विमर्श को ‘दलित विमर्श’ और ‘स्त्री विमर्श’ के इर्द-गिर्द संकुचित कर देने की बात महत्वपूर्ण है, बावजूद कि ये दोनों बड़े मुद्दे हैं। निसंदेह इसके पीछे पूँजी और सत्ता की चालाकी खड़ी है, लेकिन इतना मान लेना क्या पर्याप्त होगा? क्या इसमें कहीं साहित्य और साहित्य से जुड़े, लोगों बल्कि तमाम बुद्धिजीवी वर्ग की असफलता समाहित नहीं है? यह वर्ग सत्ता और पूंजी को प्रभावित करने की बजाय उससे क्यों प्रभावित हो जाता है? क्या आप इसे सामयिक चिन्तन के सन्दर्भ में मौलिकता के पथ, जो नई विधाओं की प्रासंगिकता की ओर इंगित करता है, से विचलन नहीं मानेंगे?

बलराम अग्रवाल :  पूँजी, सत्ता और अभिजात्य- ये तीनों उस शतरंज के माहिर खिलाड़ी हैं जिसमें पैदल, हाथी, घोड़ा, ऊँट, वज़ीर, रानी और राजा नामक मोहरों की जगह आम आदमी को इस्तेमाल किया जाता है। दुनिया का हर साधारण व्यक्ति ‘सुख सम्पति घर आवे, कष्ट मिटे तन का’ का चिंतक और पूजक है। उसकी इस अभिलाषा को अपने पक्ष में भुनाने के लिए ये कुछ ऐसे तर्क और योजनाएँ लेकर उपस्थित होते हैं कि पूँजीहीन, सत्ताहीन और शक्तिहीन सामाजिक कभी आसानी से तो कभी कुछेक समझौतों के साथ इनके चंगुल में फँस ही जाता है। इस कार्य में धनाकांक्षी, पदाकांक्षी और महत्वाकांक्षी लोग इनके सहायक बनते हैं। पूँजी और सत्ता ऐसे लोलुपों को मुख्यतः धार्मिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक गलियारों में तलाशती और नियुक्त करती हैं। ये चालाक लोग आम आदमी को चारों ओर से घेरकर ऐसा बिगुल फूँकना शुरू करते हैं कि वह उसी की धुन को समय की धुन मानकर उसकी लय पर झूमने लगता है। जो आदमी इनके बिगुल की लय पर नहीं झूमता, उसे ये दकियानूस, प्रतिक्रियावादी, पुनरुत्थानवादी या जो इनके मन में आये वह सिद्ध करके किनारे सरका देते हैं। वक्त का पहिया तो कभी रुकता नहीं है, चलता रहता है। अवसरवादी लोग उसकी अरनियों को पकड़कर लटक जाते हैं। पहिए की गति के साथ अरनि ऊपर आई तो वे ऊपर आ जाते हैं और नीचे गई तो नीचे पहुँच जाते हैं। अवसरवादी आदमी मान-अपमान और मानवीयता-अमानवीयता जैसी भावुकताओं से परे रहता है तथा सब काल में समान बना रहता है।

उमेश महदोषी :  अच्छा, लघुकथा के सन्दर्भ में एक स्थिति देखने में आई है- एक तरफ नवें दशक के बाद कई वरिष्ठ लोग लघुकथा लेखन के प्रति अनासक्त हो गए, जबकि अनेक नए लेखक लघुकथा लेखन के प्रति आकर्षित हुए। रचनात्मकता के कारणों और परिस्थितियों के सन्दर्भ में इस परिदृश्य को आप किस तरह देखते हैं?

बलराम अग्रवाल :  देखिए, समान ‘वस्तु’ को कुछेक अवान्तर प्रसंगों के सहारे विस्तार देकर कुछ कथाकार कहानी बनाकर प्रस्तुत करने के अभ्यस्त हैं तो कुछ अवांतर प्रसंगों की घुसपैठ को अनावश्यक मानते हैं। सामान्यतः पाठक को भी अवान्तर प्रसंगों में घुसना रोचक नहीं लगता है; लेकिन उसके मनोमस्तिष्क पर कहानी का पारम्परिक प्रारूप इतना हावी है कि अवान्तर प्रसंगों से हटना उसे भयभीत करता है। यह स्थिति किसी समय अंग्रेजी कहानीकारी की रह चुकी है, जिनकी रचना (कहानी यानी शॉर्ट स्टोरी) को उपन्यास के पाठकों और समालोचकों द्वारा वर्षों यह कहकर नकारा जाता रहा कि इतने कम शब्दों में जीवन की घटनाओं को व्यक्त नहीं किया जा सकता; और यह कि कहानी लेखन में केवल वे ही महत्वाकांक्षी उतर रहे हैं जो उपन्यास लिखने में अक्षम हैं। ये दोनों ही नकार आखिरकार निराधार भय ही साबित हुए और ‘शॉर्ट स्टोरी’ ने अपनी जगह आम पाठकों के बीच बना ही ली। कथा-लेखन में अक्षम होने संबंधी आरोपों का जो दंश पूर्ववर्ती अंग्रेजी कहानीकारों ने झेला था, वही दंश हिन्दी लघुकथाकार भी झेल रहे हैं। मुझे विश्वास है कि जो सूरज उन्होंने देखा था, वही लघुकथाकार भी अवश्य देखेंगे। दूसरी बात- जब आप ‘सकाम’ लेखन करते हैं तो निश्चय ही आपकी नजर लेखन की बजाय कहीं और टिकी होती है। उस उद्देश्य की प्राप्ति में देरी आपमें लेखन के प्रति उकताहट पैदा करती है और आपको वहाँ से हट जाने को विवश कर देती है। लघुकथा के जिन वरिष्ठों की ओर आप लघुकथा-लेखन से अनासक्त या विरक्त होने का संकेत कर रहे हैं उनमें से कुछ ने केवल लघुकथा-लेखन ही छोड़ा है, लेखन नहीं। यानी कि आकांक्षाओं की पूर्ति के उन्होंने अन्यान्य क्षितिज तलाश लिए हैं, जहाँ परिणाम तत्काल नहीं तो बहुत जल्द मिलने की उम्मीद हो।

उमेश महदोषी :   नयी पीढ़ी के रचनाकारों में लघुकथा लेखन के प्रति आकर्षण को आप कितना वास्तविक और सार्थक मानते हैं? क्या ये रचनाकार लघुकथा में लेखन का कोई ‘विजन’ देते दिखाई देते हैं?

बलराम अग्रवाल :   नयी पीढ़ी के रचनाकारों में लघुकथा लेखन के प्रति आकर्षण पर शक करने का कोई कारण मुझे नजर नहीं आता है। अगर कोई कथाकार सार्थक लघुकथाएँ दे पाने में सफल रहता तो उसके आगमन को वास्तविक ही माना जायेगा। सभी में न सही, नये आने वाले कथाकारों में से कुछ में ‘विज़न’ है।

उमेश महदोषी :  मैं शक की नहीं, अपेक्षाओं की बात कर रहा हूँ। बहुत सारे नए लघुकथाकारों में से कुछेक गिने-चुने लघुकथाकारों के पास ‘विजन’ हो सकता है, पर क्या एक परिदृश्य का संकेत मिल पा रहा है? लघुकथा की पहली पीढ़ी ने समग्रतः जो पृष्ठभूमि उपलब्ध करवाई, क्या नई पीढ़ी से उससे आगे जाने की अपेक्षा नहीं की जानी चाहिए? आज की नई पीढ़ी अपने समय को कहीं अधिक अच्छी तरह से पहचान और समझ सकती है और इसलिए वह अपने समय के सच और संघर्ष को भी बेहतर ढंग से आगे बढ़ा सकती है। तुलनात्मक रूप से उसके पास संसाधन भी कहीं अधिक उपलब्ध हैं। ऐसे में क्या हमारी नई पीढ़ी वैसे परिणाम दे पा रही है, जैसी जरूरत और अपेक्षा है?

बलराम अग्रवाल :  देखिए, यह तो निर्विवादित है कि लघुकथा-लेखन में उतरने वाले कथाकारों की संख्या आठवें, नौवें, दशवें दशक जितनी शायद आज नहीं है। इसके अनेक कारण हो सकते हैं जिनमें से एक यह भी है कि जैसे राजनीति के जरिए समाजसेवा के हमारे प्रतिमान बदले हैं, वैसे ही साहित्यसेवा के जरिए समाज में बदलाव लाने के हमारे विश्वास में कमी आई है। विश्वास में आई यह कमी हमें संघर्ष के लम्बे रास्ते पर कदम रखने से रोकती है। आप कहते हैं कि लघुकथा की पहली पीढ़ी ने जो पृष्ठभूमि उपलब्ध कराई, नई पीढ़ी को उसे उससे आगे ले जाना चाहिए। बेशक। लेकिन कब? उमेशजी, आकलनरहित साहित्य कितने भी ऊँचे दर्जे का क्यों न हो, नये लेखक को न तो आकर्षित ही कर पाता है और न बहुत दिनों तक उसे खुद से बाँधकर ही रख पाता है। लघुकथा के साथ यही हो रहा है। बड़ी समझी जाने वाली जो पत्रिकाएँ अपने लगभग हर अंक में लघुकथाएँ छापती हैं, लघुकथा-केन्द्रित आलोचनात्मक लेख को स्थान उनके पास नहीं है। तो कोई लेखक क्यों ऐसी किसी विधा से जुड़ना चाहेगा जिसमें उसके लेखन के आकलन की सम्भावना शून्य हो। जो संसाधन उसे उपलब्ध हैं, उनका इस्तेमाल वह उन विधाओं में क्यों न करे, जिनमें उसके लेखन के मूल्यांकन की सम्भावना अधिक भी है और तुरत-फुरत भी। हमारे देखते-देखते कहानी-लेखन में पूरी की पूरी नई पीढ़ी आ गई और बेहतर रचनाएँ भी दे रही है। ऐसा सम्भव हो पाया क्योंकि ज्ञानपीठ आदि बड़े प्रतिष्ठानों की पत्रिकाओं के संपादकों ने कहानी के नये लेखकों को प्रश्रय देने की योजना बनाई। लघुकथा को ऐसा प्रश्रयदाता कमलेश्वर के बाद नहीं मिल पाया।

उमेश महदोषी :   लघुकथा में कथ्य और शिल्प की नकारात्मकता से जुड़ी चीजें, लेखकों की भीड़ के साथ आई। एक समय इन चीजों से पीछा छुड़ाने की कोशिशें भी दिखने लगी थीं। परन्तु आज के समूचे लघुकथा-परिदृश्य पर दृष्टि डालने पर वे सब चीजें फिर से दिखाई देती हैं। ऐसा क्यों? कहीं न कहीं इसमें नयी पीढ़ी के लघुकथाकारों की लापरवाह छवि ध्वनित नहीं होती है? इसमें पुरानी पीढ़ी की भूमिका पर आप क्या कहेंगे?

बलराम अग्रवाल : नया लेखक पूर्ववर्ती लेखन का अनुगमन करता है। इस अनुगमन से कोई जल्दी पीछा छुड़ाकर अपना रास्ता बना लेता है, कोई देर से छुड़ा पाता है; और कोई ऐसा भी होता है जो ताउम्र अनुगामी ही बना रहता है, अपनी कोई धारा स्वतंत्रतः नहीं बना पाता। जहाँ तक लघुकथा की बात है, सभी जानते हैं कि यह लघुकाय कथा-विधा है। सब बस इतना ही जानते हैं, यह नहीं जानते कि ‘लघुकाय’ में छिपा क्या-क्या है, उसमें साहित्यिक गुणों का समावेश कथाकार ने किस खूबी के साथ कर दिया है और यह भी कि प्रचलित कथा-रचनाओं की प्रभावान्विति से अलग और विलक्षण उसने कुछ ऐसा पाठक को दे दिया है कि वह अचम्भित है। अचम्भित चौंकाने वाले अर्थ में नहीं; बल्कि इस अर्थ में कि जो बात इस लघुकथाकार ने कह दी है, वह साधारण होते हुए भी स्वयं उसके जेहन से दूर क्यों थी?

उमेश महादोषी :  नयी पीढ़ी के लघुकथाकार अलग-अलग कुछ अच्छी लघुकथाएं देते रहे हैं। परन्तु अपने समग्र लघुकथा लेखन से उस तरह प्रभावित कर पाने में सफल नहीं दिखते, जैसा उन्हें होना चाहिए या फिर जैसा आठवें दशक में उभरे लघुकथाकार सफल हुए। प्रमुख कारण आप क्या मानते हैं?

बलराम अग्रवाल :  यह कमी पुरानी पीढ़ी के भी एक-दो लघुकथाकारों में दिखाई देती है। उनके समग्र लघुकथा लेखन में विषय वैविध्य नदारद है। कोई साम्प्रदायिक दंगो के, कोई राजनेताओं की कथनी-करनी के तो कोई घर-परिवार के दुखांत कथानकों में ही उलझकर रह गया है। इस सब का प्रमुख कारण तो मात्र एक ही है- जीवनानुभवों की सीमा।

उमेश महादोषी :  नयी पीढ़ी के अधिकांश लघुकथाकार लघुकथा-लेखन से तो जुड़े हैं, किन्तु विमर्श और अच्छी लघुकथाओं को रेखांकित करने के अन्य प्रयासों में कोई सार्थक भूमिका निभाते दिखाई नहीं देते। आप क्या कहेंगे?

बलराम अग्रवाल :  लेखन अलग कर्म है और समीक्षण अलग। विमर्श में उतरने के लिए प्रत्येक कथाकार को जिस अध्ययन, गाम्भीर्य और शब्द-कौशल की आवश्यकता होती है, वह धीरे-धीरे ही आता है; एकदम से नहीं।

उमेश महादोषी :  क्या आपको नहीं लगता कि आज भी लघुकथा प्रमुखतः आठवें-नौवें दशक के स्थापित लघुकथाकारों के इर्द-गिर्द ही घूम रही है? यदि ऐसा है तो इस स्थिति से लघुकथा को निकालने के लिए किस तरह के प्रयास होने चाहिए? पुरानी और नयी पीढ़ी के लघुकथाकारों की अपनी-अपनी भूमिकाएं क्या हो सकती हैं?

बलराम अग्रवाल :  आठवें-नौंवें दशक के लघुकथाकार उस काल में स्थापित कथाकार नहीं थे; नवोदित थे सब के सब। उन्हें अगर आज स्थापित माना जा रहा है तो उनका लेखकीय श्रम और मेधा ही उसके कारण हैं। लघुकथा लघुकथाकारों के इर्द-गिर्द घूम रही है, यह कथन ऐसा ही है जैसे कोई यह कहे कि लेखन की बागडोर लेखक के हाथ से खिसककर रचना के हाथ में चली गई है। और अगर आपका तात्पर्य यह है कि स्थापित लघुकथाकार नये कथाकारों को आगे नहीं आने दे रहे तो यह भी सच नहीं है। चैतन्य त्रिवेदी, शोभा रस्तोगी, दीपक मशाल आदि अनेक लोग लघुकथा को नई सदी के पहले दशक की देन माने जा सकते हैं। भूमिका इसमें रचनाशीलता ही निभाती है, गोड-फादरशिप नहीं।

उमेश महादोषी :  आपकी बात निसन्देह ठीक है। पर मैं किसी अवरोध या गॉड फादरशिप की बात नहीं कर रहा हूँ। मुझे लगता है कि लघुकथा में आप लोगों के बाद की पीढ़ी को जिस तरह और जिस स्तर पर लघुकथा को आगे ले जाने के लिए, विशेषतः समीक्षा-समालोचना की प्रक्रिया में, आगे आना चाहिए था, वह अपेक्षा से बहुत कम है। इस प्रश्न को मैं इसलिए उठा रहा हूँ कि मुझे लगता है कि आज हमारी सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक-राजनैतिक स्थितियाँ और हालात जैसे हैं, उन्हें लघुकथा (और क्षणिका जैसी विधाओं) में नई पीढ़ी कहीं अधिक प्रभावपूर्ण और सार्थक ढंग से अभिव्यक्ति दे सकती है, नया चिन्तन और विचार ला सकती है। दूसरे कई अन्य विधाओं में देखें तो वहाँ बाद की पीढ़ियों के रचनाकार भी समस्तर पर सक्रिय रहे हैं। क्या कहेंगे?

बलराम अग्रवाल :  लघुकथा लेखकों में सामयिक चिंतन से जुड़ी अभिव्यक्ति देने का संकट तो अक्सर नजर आता है, निःसंदेह; लेकिन इसका दूसरा पक्ष भी है। मुझे लगता है कि... लगता ही नहीं है बल्कि कभी-कभी उसका सामना भी करना पड़ जाता है; वो यह कि हम आज भी लघुकथा के पारम्परिक रूप-आकार पर ही रूढ़ रवैया अपनाए हुए हैं। इस ‘हम’ में लेखक, पाठक, संपादक, आलोचक सब शामिल हैं। रचना ने ‘हमारे’ पैमाने वाले आकार का अतिक्रमण किया नहीं कि उसे लघुकथा कहने में हमें संकोच होने लगता है। उसने बिम्ब का, प्रतीक का सहारा लिया नहीं कि हम उसे आम पाठक की समझ से बाहर की रचना मानने लगते हैं। ‘आम आदमी के लिए साहित्य’ के नाम पर बड़े से बड़ा आलोचक ऐसा साहित्यिक भोजन चाहने लगा है जो उसके मुँह में जाते ही घुल जाये, जिसे चबाने को लेशमात्र मशक्कत उसे न करनी पड़े। शब्द से जो अर्थ स्वतः फूटता है, उसे रिसीव करने वाले इनके ट्रांसमीटर्स आउट-डेटेड हो चुके हैं। इन्हें अब बस शब्द ही दीखता है, उसका नेपथ्य नहीं। मैं सब की नहीं, अधिकतर की बात कह रहा हूँ। इन अधिकतर के कारण नये कलेवर और सोच की रचनाएँ चर्चा पाने से वंचित रह जाती हैं।

उमेश महादोषी :  क्या लघुकथा अपना सर्वाेत्तम समय देख चुकी? यदि नहीं, तो उसके ‘लक्षित समय’ की कल्पना आप किस तरह करते हैं? क्या उस ‘समय’ के आने की आशा है आपको? वर्तमान परिदृश्य को देखते हुए क्या आपको लगता है कि अगले पचास वर्ष के बाद लघुकथा साहित्य में अपनी सार्थक भूमिका के साथ खड़ी होगी?

बलराम अग्रवाल :  उमेश जी, कला व साहित्य के रचनात्मक क्षेत्रों में ‘सर्वाेत्तम समय’ वह नहीं होता जिसे सामान्य लोग सर्वाेत्तम समय कहते या मानते हैं। इनमें सर्वाेत्तम समय वह होता है जब उससे जुड़े लोग पूरी निष्ठा के साथ निष्पक्ष रूप से सृजनात्मक व परिवीक्ष्णात्मक दायित्वों को निभाते हैं। मैं समझता हूँ कि कुछेक अपवादों को छोड़कर अधिकतर समकालीन लघुकथाकारों ने अपने इस दायित्व का निर्वाह किया है और उनमें से कुछ अभी तक भी कर रहे हैं। दूसरी बात यह है कि पूर्व प्रचलित विधाओं के चलते नवीन विधाओं का अपनी जगह बना लेना बहुत आसान कभी भी नहीं रहा। समय लगता है; लेकिन इसके लिए आप कोई निश्चित समय-रेखा नहीं खींच सकते। कारण यह है कि यह मात्र आपकी यानी लेखक और आलोचक की इच्छा पर निर्भर नहीं है। इस बारे में, जिसके बीच जगह बनानी है, उस ‘जन’ को आप दोयम पायदान पर नहीं रख सकते। तीसरी बात यह है कि लघुकथा यदि आज साहित्य में अपनी सार्थक भूमिका के साथ नहीं खड़ी है तो यह निश्चित मानिए कि पचास क्या दस साल बाद भी वह अपनी सार्थक भूमिका में खड़ी दिखाई नहीं देगी। हमें सबसे पहले अपने ‘आज’ को देखना है, भावी समय को नहीं। अगर हम आज समय के साथ नहीं खड़े हैं तो आने वाला समय हमारे साथ क्यों खड़ा होगा?

उमेश महादोषी :  आपकी बात बिल्कुल ठीक है। लेकिन यहाँ मेरी जिज्ञासा ‘समय के यथार्थ’ को दिशा देने में साहित्य (लघुकथा) की भूमिका के सन्दर्भ में है। आपका भी मानना रहा है कि समय कभी अचानक नहीं बदलता, धीरे-धीरे बदलता है। इस बदलाव को पहचानकर भविष्य के लिए साहित्य से मार्गदर्शन की अपेक्षा गलत तो नहीं होगी? यदि आज के कुछ हालात बिना किसी अवरोध के चलते हुए पचास वर्ष बाद किसी विस्फोटक स्थिति में बदलने का संकेत देतेे हैं, तो क्या हमारा दायित्व यह नहीं होना चाहिए कि हम उसकी कल्पना करें और उसे रोकने के लिए अपनी भूमिका निभायें या निभाने के लिए तैयार रहें? चूंकि अब लघुकथा अपने रूप-स्वरूप और दिशा आदि की स्थापना के प्रयासों से आगे आ रही है, अतः उसकी पिछली सामाजिक भूमिका से अलग एक अनुकूल विधा के रूप में भावी भूमिका को लेकर अधिक अपेक्षा करना क्या उचित नहीं होगा? पिछली पीढ़ी ने हमें जो प्रभावशाली अस्त्र तैयार करके दिया है, अगली पीढ़ी अपने और भावी पीढ़ियों के हित में उसका प्रभावी उपयोग करे, क्या ऐसी अपेक्षा नहीं होनी चाहिए?

बलराम अग्रवाल :  उमेशजी, मैं पुनः दोहराऊँगा कि यदि हम ‘आज’ को साध लेते हैं, ‘आज’ के साथ ईमानदार बर्ताव करते हैं तो ‘भावी’ को साधने की चिंता में हमें अधिक घुलना नहीं पड़ेगा। हमें पचास साल बाद वाली विस्फोटक स्थिति की कल्पना में जाने की जरूरत नहीं है; क्योंकि पचास साल बाद वाली समूची स्थिति का पूर्वाभास आज की स्थिति दे रही होती है। उस पूर्वाभास को भी कथाकार लघुकथा की ‘वस्तु’ बना सकता है, बनाना चाहिए; क्योंकि उस रचना में भी कहीं न कहीं ‘आज’ ही अभिव्यक्त हो रहा होगा। हाँ, वर्तमान पीढ़ी के लघुकथाकारों से अपने ‘आज’ को अपनी रचना का सच बनाने की आपकी अपेक्षा का मैं सम्मान करता हूँ क्योंकि इस अपेक्षा के दायरे में कहीं न कहीं स्वयं मैं भी अपने आप को खड़ा देखता हूँ।

  • डॉ.बलराम अग्रवाल, एम-70, उल्धनपुर, दिगम्बर जैन मन्दिर के पास, नवीन शाहदरा, दिल्ली-32// मोबा. : 08826499115  
  • डॉ.उमेश महादोषी, एफ-488/2, गली सं0 11, राजेन्द्र नगर, रुड़की, जिला-हरिद्वार (उ.खण्ड)-247667// मोबा. : 09458929004 

शुक्रवार, 29 जून 2012

अविराम विमर्श

अविराम  ब्लॉग संकलन :  वर्ष : 1, अंक : 10, जून  2012

।।सामग्री।।

हिन्दी लघुकथा का विकास एवं मूल्यांकन’ से जुड़े प्रमुख चिंतन-बिंदुओं पर वरिष्ठ लघुकथा चिन्तक श्री बलराम अग्रवाल से जामिया मिलिया इस्लामिया वि.वि., नई दिल्ली में शोध हेतु सुश्री शोभा भारती की बातचीत 



बलराम अग्रवाल 

केवल लघु आकार ही लघुकथा की पठनीयता का प्रमुख आधार नहीं है : बलराम अग्रवाल




शोभा भारती : आपके विचार से हिन्दी की पहली लघुकथा किसे कहा जाना चाहिए और क्यों?
बलराम अग्रवाल :  इस प्रश्न के विस्तृत उत्तर के लिए आप कृपया मेरा लेख ‘पहली हिन्दी लघुकथा’ पढ़ लें। यह ‘समांतर’ पत्रिका के लघुकथा विशेषांक जुलाई-सितम्बर, 2001 में प्रकाशित हुआ था और इंटरनेट पर भी उपलब्ध है। लिंक है — http://www.laghukatha-varta.blogspot.com/2009/01/1.html

शोभा भारती :  लघुकथा के उद्भव को लेकर कुछ लोगों का मानना है कि इसका मूल पंचतंत्र, हितोपदेश और जातक कथाओं में है, जबकि कुछ लोग कहते हैं कि यह वर्तमान जीवन की विसंगतियों से उद्भूत है। आप क्या सोचते है?
बलराम अग्रवाल : मेरा सुझाव है कि लघुकथा से सम्बन्धित कुछ बारीकियों को आसानी से समझ लेने के लिए सभी को नहीं तो कम-से-कम लघुकथा विषयक शोधों से जुड़े लोगों को बारीक-सी एक विभाजन अवश्य स्वीकार कर लेना चाहिए। यह कि सन् 1970 तक की सभी लघ्वाकारीय कथा-रचनाएँ, वे चाहे दृष्टांत परम्परा की हों चाहे भाव परम्परा की हों, गम्भीर कथ्य परम्परा की हों या व्यंग्यात्मक पैरोडी परम्परा की, ‘लघुकथा’ हैं; और सन् 1971 से अब तक की लघुकथाएँ ‘समकालीन लघुकथा’ हैं। यह बात ‘लघुकथा’ के शनैः शनैः परिवर्तित व परिवर्द्धित स्वरूप के मद्देनज़र कही जा रही है। लघुकथा में यह परिवर्तन व परिवर्द्धन यद्यपि सन् 1965 के आसपास से दिखाई देना प्रारम्भ हो जाता है तथापि बहुलता के साथ यह सन् 1971 के बाद ही प्रकट होता है। इसलिए जिस लघु-आकारीय कथा-रचना का मूल पंचतंत्र, हितोपदेश, जातक कथाएँ अथवा अन्य पुरातन कथा-स्रोत बताए जाते हैं वह (इने-गिने अपवादों को छोड़कर, घनीभूतता के साथ सन् 1970 तक तथा विरलता के साथ 1975-76 तक भी) ‘लघुकथा’ है और जिसका उद्भव वर्तमान जीवन की विसंगतियों से बताया जा रहा है, वह पूर्व-कथित उसी ‘लघुकथा’ का विकसित स्वरूप ‘समकालीन लघुकथा’ है जिसका प्रादुर्भाव लगभग सभी लघुकथा-आलोचक 1971 से स्वीकार करते हैं।

शोभा भारती :  कथाकुल में जन्मी लघुकथा को आप उपविधा मानते हैं या विधा?
बलराम अग्रवाल : रचनात्मक साहित्य में मैं ‘उपविधा’ जैसे किसी भी प्रकार को प्रारम्भ से ही नहीं मानता। डॉ॰ उमेश महादोषी के इसी सवाल के जवाब में सन् 1988 में मैंने कहा था-“यह लघुकथा में लेखन के स्तर पर चुक गए कुण्ठित लोगों द्वारा छोड़ा गया शिगूफा है...” (देखें- लघुकथा विशेषांक ‘सम्बोधन’: सं॰ क़मर मेवाड़ी/पृष्ठ99)।

शोभा भारती :  आरम्भिक लघुकथाओं और आज की लघुकथाओं में आप क्या अन्तर पाते हैं?
बलराम अग्रवाल : आरम्भिक लघुकथाएँ आम तौर पर उपदेश और उद्बोधन की मुद्रा में नजर आती हैं या फिर व्यंग्य व कटाक्षपरक पैरोडी कथा के रूप में, जबकि समकालीन लघुकथा मानवीय संवेदना को प्रभावित करने वाली बाह्य भौतिक स्थिति अथवा आन्तरिक मनःस्थिति के चित्रण मात्र से पाठक मन में आकुलता उत्पन्न करने का, मस्तिष्क में द्वंद्व उत्पन्न करने का दायित्व-निर्वाह करती है। अध्ययन से सिद्ध होता है कि समकालीन लघुकथा पाठक के समक्ष सिर्फ निदान प्रस्तुत करती है, समाधान नहीं। 

शोभा भारती :  लघुकथा के उत्कर्ष के लिए लघुकथाकारों, संपादकों और प्रकाशकों द्वारा किए गये प्रयास क्या आपको पर्याप्त लगते हैं?
बलराम अग्रवाल :  लघुकथा के उत्कर्ष के लिए मात्र लघुकथाकारों ने ही नहीं अन्य साहित्यकारों ने भी खासे प्रयास किए हैं। कथाकारों-कवियों में असगर वजाहत, विष्णु नागर, प्रेमपाल शर्मा, चित्रा मुद्गल, महेश दर्पण, प्रेमकुमार मणि आदि, आलोचकों में डॉ॰ कमल किशोर गोयनका, डॉ॰ ब्रजकिशोर पाठक, डॉ॰ सुरेश गुप्त, डॉ॰ रत्नलाल शर्मा, कृष्णानन्द कृष्ण आदि तथा संपादकों में कमलेश्वर, अवध नारायण मुद्गल, राजेन्द्र यादव, रमेश बतरा, प्रभाकर श्रोत्रिय, हसन जमाल, क़मर मेवाड़ी, अवध प्रताप सिंह, महाराज कृष्ण जैन व उर्मि कृष्ण, प्रकाश जैन व मोहिनी जैन, शैलेन्द्र सागर, बलराम, अशोक भाटिया, सुकेश साहनी, सतीशराज पुष्करणा, कमल चोपड़ा, डॉ॰ रामकुमार घोटड़ आदि के अवदान को नकारना असम्भव है। प्रिंट क्षेत्र के प्रकाशकों में अयन प्रकाशन के स्वामी श्रीयुत भूपाल सूद ने काफी लघुकथा संग्रह व संकलन प्रकाशित किए हैं। दिशा प्रकाशन, किताबघर व भावना प्रकाशन ने भी लघुकथा के संग्रह व संकलन वरीयता से प्रकाशित किए हैं। बावजूद इस सबके लघुकथा के उन्नयन का भाव किसी प्रकाशक के मन में रहा हो, ऐसा मुझे नहीं लगता। बलराम द्वारा संपादित ‘विश्व लघुकथा कोश’ सन्मार्ग प्रकाशन से प्रकाशित हुआ था, लेकिन वह विशुद्ध व्यापारिक एप्रोच का मामला प्रतीत होता है। लघुकथा के उन्नयन का अत्यन्त महत्वपूर्ण और साफ-सुथरा काम रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ व सुकेश साहनी की टीम ने ‘लघुकथा डॉट कॉम’ नाम से वेबसाइट संपादित करके किया है। इस कार्य में वे धन और बल दोनों खपा रहे हैं।

शोभा भारती :  कहानी और लघुकथा में आकार के अलावा क्या अंतर आप देखते हैं?
बलराम अग्रवाल :  सबसे पहले तो यह जान लेना आवश्यक है कि अनेक कथा-रचनाएँ छोटे आकार की होते हुए भी कहानी ही होती हैं, लघुकथा नहीं। इसलिए आकार में छोटी होने-मात्र के कारण ही किसी कथा-रचना को लघुकथा मान लेना न्यायसंगत नहीं है और न ही यह कि केवल लघु-आकार ही लघुकथा की पठनीयता और जनप्रियता का कारण है। कहानी सामाजिक विसंगतियों, असंगत मानवीय क्रिया-कलापों व मानसिक व्यापारों के कारणों और कारकों की पड़ताल तथा उनका खुलासा करती हुई पाठकीय संवेदना को छूने-जगाने का प्रयास करती है जबकि लघुकथा सामाजिक विसंगतियों, असंगत मानवीय क्रिया-कलापों व मानसिक व्यापारों को पाठक के सामने सीधे प्रस्तुत कर देती है तथा कथा-संप्रेषण में वांछनीय कारणों व कारकों का आभास कराती हुई उन्हें कथा के नेपथ्य में बनाए भी रखती है। कहानी को केन्द्रीय कथ्य के आजू-बाजू भी अनेक स्थितियों के दर्शन कराने, चित्रण करने की छूट प्राप्त है जबकि लघुकथा में यह अवांछित है क्योंकि ऐसा करने से लघुकथा के शैल्पिक-गठन में छितराव आ जाने का खतरा बराबर बना रहता है।

शोभा भारती :  लघुकथा अक्सर समाज की विसंगतियों की ओर ही इशारा करती है। क्या आपको लगता है कि इसमें मनुष्य की सकारात्मक भावनाओं का अंकन भी उतनी ही तीव्रता से सम्भव है?
बलराम अग्रवाल :  अलग-अलग कालखण्ड में सामाजिक आवश्यकताएँ, मानवीय प्राथमिकताएँ और साहित्यिक अपेक्षाएँ अलग-अलग ही हुआ करती हैं। निःसंदेह समकालीन लघुकथा का प्रारम्भिक काल समाज की विसंगतियों की ओर इशारा करने को वरीयता देने वाला ही रहा होगा। इस तथ्य को उस समय की अनेक सामाजिक-राजनीतिक घटनाओं-दुर्घटनाओं के अध्ययन के द्वारा आसानी से जाना-समझा जा सकता है। लेकिन इसका तात्पर्य यह नहीं है कि लघुकथाकारों का ध्यान मनुष्य की सकारात्मक भावनाओं की ओर अथवा मानवीय संवेदनशीलता के उत्कृष्ट पक्ष की ओर कभी गया ही नहीं। रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ की ‘ऊँचाई’, रूप देवगुण की ‘जगमगाहट’, सुकेश साहनी की ‘ठडी रजाई’, पृथ्वीराज अरोड़ा की ‘बेटी तो बेटी होती है’, स्वयं मेरी (यानी बलराम अग्रवाल की) ‘गोभोजन कथा’, श्यामसुंदर अग्रवाल की ‘संतू’, श्यामसुंदर दीप्ति की ‘हद’, अशोक भाटिया की ‘कपों की कहानी’, सुभाष नीरव की ‘अपने घर जाओ न अंकल’, विपिन जैन की ‘कंधा’ आदि अनगिनत लघुकथाएँ हैं जिनमें मनुष्य की सकारात्मक भावनाओं का, मानवीय संवेदनशीलता का अंकन सफलतापूर्वक हुआ है।

शोभा भारती :  कब कोई लघुकथा मात्र चुटकुला बनकर रह जाती है?
बलराम अग्रवाल :  लघुकथा ही नहीं, कोई कहानी भी चुटकुला बनकर रह जा सकती है, अगर कथ्य-संप्रेषण की ओर कथाकार गंभीरता से अपने कदम न बढ़ाए और रचना-समापन में यथेष्ट सावधानी न बरते। अन्तर केवल यह है कि आकारगत लघुता वाली रचना को चुटकुला कह देना आसान होता है जबकि लम्बी रचना को चुटकुला न कहकर हास-परिहास की रचना कह दिया जाता है।

शोभा भारती : आज के समय में जब साहित्य अपना सामाजिक आधार खोता जा रहा है, क्या आपको लगता है कि लघुकथा अपनी पठनीयता के चलते साहित्य की प्रासंगिकता को वापस ला सकती है?
बलराम अग्रवाल :  समाज से कटा हुआ साहित्य ही अपना सामाजिक आधार खोता है, समूचा साहित्य नहीं। तुलसी, कबीर, खुसरो, ग़ालिब, प्रेमचंद, शरत् चंद्र आदि की रचनाएँ अपना सामाजिक आधार कभी खोएँगी, ऐसा लगता नहीं हैं। समकालीन हिन्दी लघुकथा में आपको मात्र ‘पठनीयता’ का गुण दिखाई देता है जबकि मुझे ‘सम्प्रेषणीयता’ का गुण भी भरपूर नजर आता है। ऐसे समय में, जब अधिकतर साहित्यिक विधाओं के सरोकार कुछेक क्लिष्ट अभिव्यक्तियों और नारेबाजियों में उलझकर आम आदमी से दूर महसूस होते हैं, समकालीन लघुकथा सहज और ग्राह्य कथन-शैली व शिल्प के चलते आम आदमी के एकदम निकट की विधा है और अपना साहित्यिक दायित्व बखूबी निभा रही है।

शोभा भारती :  चैतन्य त्रिवेदी के लघुकथा संग्रह ‘उल्लास’ को आर्य स्मृति सम्मान प्रदान करते हुए स्व॰ कमलेश्वर जी ने कहा था कि आज लघुकथा एक विधा के रूप में स्थापित हो गई है। आप इस स्थापना से कितने सहमत हैं?
बलराम अग्रवाल :  इस प्रश्न के जवाब में आप कृपया प्रस्तुत पंक्तियाँ भी पढ़िए और निश्चित करने का यत्न कीजिए कि लघुकथा 16अप्रैल 1989 में प्रो॰ निशान्तकेतु के आधार लेख की प्रस्तुति के उपरान्त पटना में ‘विधा’ स्वीकृत हुई, 16 दिसम्बर, 2000 को कमलेश्वर की घोषणा के बाद दिल्ली में ‘विधा’ स्वीकृत हुई या डॉ॰ रमेश कुन्तल मेघ की अध्यक्षता व डॉ॰ फूलचन्द ‘मानव’ की उपस्थिति में पंचकुला(हरियाणा) में 06 दिसम्बर २००९ को सम्पन्न गोष्ठी में? अपने एक लेख ‘बिहार का हिंदी लघुकथा संसार’ (पुस्तक- ‘भारत का हिंदी लघुकथा संसार’ सं॰ डॉ॰ रामकुमार घोटड़/पृष्ठ 57) में डॉ॰ सतीशराज पुष्करणा लिखते हैं-“1989 का वर्ष लघुकथा के लिए एक ऐतिहासिक वर्ष रहा। 16 अप्रैल 1989 को पटना लघुकथा लेखक-आलोचक सम्मेलन ’89 में प्रो॰ निशान्तकेतु द्वारा प्रस्तुत आधार लेख ‘लघुकथा’ की विधागत शास्त्रीयता के बाद विधा-उपविधा का विवाद समाप्त हो गया...” अर्थात लघुकथा को ‘विधा’ की मान्यता मिल गई। इस सम्बन्ध में अगर यह कहा जाय कि विधा-उपविधा का विवाद पटना में पैदा होकर लघुकथा-आलोचना से जुड़े विद्वत-समाज से किसी भी प्रकार के समर्थन के अभाव में प्रो॰ निशान्तकेतु के लेख की आड़ लेकर वहीं दफन होने को विवश हो गया तो अनर्गल नहीं होगा। 
    इस सम्बन्ध में प्रो॰ रूप देवगुण के एक लेख ‘हरियाणा का लघुकथा संसार’ (भारत का हिंदी लघुकथा संसार: संपादक-डॉ॰ राम कुमार घोटड़/पृष्ठ 84) की ये पंक्तियाँ भी दृष्टव्य हैं- ‘06 दिसम्बर, 2009 को साहित्य संगम संस्था, पंचकुला के सौजन्य से पंचकुला में डॉ॰ रमेश कुन्तल मेघ की अध्यक्षता में डॉ॰ फूलचन्द ‘मानव’ (पंजाब) के द्वारा एक लघुकथा गोष्ठी का आयोजन किया गया। इस गोष्ठी में ‘लघुकथा का शिल्प और संरचना’ विषय पर प्रो॰ अशोक भाटिया, डॉ॰ सुरेन्द्र मंथन, रामकुमार आत्रेय, रतनचन्द ‘रत्नेश’, योगेश्वर कौर, डॉ॰ ज्ञानचंद शर्मा व मोहिन्द्र राठौड़ द्वारा एक सार्थक चर्चा की गई और डॉ॰ शशि प्रभा, चन्द्र भार्गव, विष्णु सक्सेना ने अपनी-अपनी लघुकथाएँ पढ़ीं। इस आयोजन में पधारे कुछ वरिष्ठ साहित्यकारों ने पहली बार लघुकथा के अस्तित्व को स्वीकारा और माना कि लघुकथा भी साहित्य की एक स्वतंत्र विधा है।’ मैं समझता हूँ कि इस वक्तव्य में प्रो॰ रूप देवगुण का इशारा उक्त गोष्ठी के अध्यक्ष डॉ॰ रमेश कुन्तल मेघ व डॉ॰ फूलचंद ‘मानव’ सरीखे विद्वानों की ओर है जो 06 दिसम्बर, 2009 से पहले तक लघुकथा की विधागत अस्मिता से या तो परिचित नहीं थे या उसे स्वीकारने की स्थिति में स्वयं को नहीं पा रहे थे।
    और अन्त में आपके अभिमत पर विचार करते हैं। हिन्दी लघुकथा को गरिमापूर्ण साहित्यिक मंच प्रदान करने वाले संपादकों में कमलेश्वर निःसंदेह सर्वाेपरि रहे हैं। उनकी जिस उद्घोषणा की बात आपने की है वह 16 दिसम्बर, 2000 को सम्पन्न ‘आर्य स्मृति सम्मान समारोह’ में कही गई थी। उनकी घोषणा में आए ‘आज’ शब्द का अर्थ वह दिन-विशेष न मानकर काल-विशेष मानना चाहिए। यह ‘काल’ मुख्यतः सन् 1971 से लेकर उनके द्वारा की गई घोषणा वाले दिन और समय-विशेष तक फैला हुआ है। लघुकथा से जुड़े अधिकतर कथाकार, संपादक, आलोचक व शोधकर्ता उस दिन और उस समय-विशेष के बहुत पहले से लघुकथा को ‘विधा’ मानते चले आए हैं। ऐसा न होता तो सन् 1976 में जयपुर विश्वविद्यालय ‘हिन्दी लघुकथा’ को शोध-विषय हेतु पंजीकृत न करता और न ही ‘आर्य स्मृति सम्मान समारोह’ के आयोजकों (किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली) द्वारा सन् 1999 में ही सन् 2000 के सम्मान हेतु ‘लघुकथा’ की पांडुलिपियाँ आमन्त्रित करने सम्बन्धी घोषणा ही की जाती और न कमलेश्वर, राजेन्द्र यादव और चित्रा मुद्गल सरीखे वरिष्ठ कथाकार व कथा-विचारक निर्णायक बनने हेतु अपनी सहमति प्रदान करते। 

शोभा भारती :  आपकी दृष्टि में लघुकथा के समीक्षात्मक मानदंड क्या हैं?
बलराम अग्रवाल :  मेरी दृष्टि में ‘लघुकथा’ समसामयिक सरोकारों से जुड़ी कथा-रचना है। यह तो स्पष्ट ही है कि यहाँ जिस कथा-रचना को हम ‘लघुकथा’ कह रहे हैं, वह लघु-आकारीय गद्यात्मक कथा-रचना है। उसकी भाषा कितनी ही काव्यात्मक अथवा नाटकीय गुण-सम्पन्न क्यों न हो, वह गद्यगीत अथवा निरी काव्यकृति नहीं है। दूसरी बात यह कि एक लघुकथा किसी एक-ही संवेदन-बिंदु को उद्भासित करती होनी चाहिए, अनेक को नहीं। कथ्य-प्रस्तुति की आवश्यकतानुरूप उसमें लम्बे कालखण्ड का आभास भले ही दिलाया गया हो, लेकिन उसका विस्तृत ब्योरा देने से बचा गया हो। ‘लघुकथा’ में जिसे हम ‘क्षण’ कहते हैं वह द्वंद्व को उभारने वाला या पाठक मस्तिष्क को उस ओर प्रेरित करने वाला होना चाहिए न कि सूत्र-रूप में प्रस्तुत होकर कथाकार्य की इति मान बैठने वाला। कथ्य की प्रस्तुति के अनुरूप कोई कथाकार अनेक शिल्पों व शैलियों का प्रयोग करने को स्वतन्त्र है, लेकिन इस स्वतंत्रता का मनमाना दुरुपयोग न करके उसे विधा को आयाम देने हेतु प्रयासरत नजर आना चाहिए। लघुकथा की भाषा सहज ग्राह्य तथा प्रवाहमयी हो तथा पाठक को चमत्कृत करने मात्र की बजाय कथा कहने के नये मुहावरे गढ़ती-सी लगती हो। 

शोभा भारती :  लघुकथा के विचार-पक्ष पर आप क्या कहना चाहेंगे?
बलराम अग्रवाल :  लघुकथा का विचार-पक्ष इस समय काफी पुष्ट है। शुरुआती दौर में रमेश बतरा, अवध नारायण मुद्गल, शंकर पुणताम्बेकर, भगीरथ, जगदीश कश्यप,    कृष्ण कमलेश आदि ने लघुकथा के विचार-पक्ष को मजबूती के साथ रखना प्रारम्भ किया था। उसी दौर की अगली कड़ी के रूप में डॉ॰ ब्रजकिशोर पाठक, कृष्णानन्द कृष्ण, निशांतकेतु, डॉ॰ कमल किशोर गोयनका आदि ने इसके विचार-पक्ष पर शोधपरक लेखों व साक्षात्कारों के माध्यम से इसे पुष्ट किया। परन्तु प्रारम्भ से लेकर अद्यतन हालत यह है कि प्रिंट-मीडिया की बहुत-सी वे पत्रिकाएँ जो लगातार लघुकथाएँ प्रकाशित करती आ रही हैं, इसके विचार-पक्ष को प्रस्तुत करने से कन्नी काट रही है; लेकिन संतोष और प्रसन्नता की बात यह है कि पूर्व में लगभग सभी लघु-पत्रिकाएँ तथा वर्तमान में लगभग सभी ई-पत्रिकाएँ तथा इंटरनेट ब्लॉग्स लघुकथाओं के साथ-साथ इसके विचार-पक्ष को भी ससम्मान स्थान दे रहे हैं। अतः विचार-पक्ष की प्रस्तुति में निर्वात की स्थिति नहीं है।

शोभा भारती :  क्या आप भी मानते हैं कि हिन्दी आलोचना ने लघुकथा को अपेक्षित तवज्जो नहीं दी?
बलराम अग्रवाल :  हिन्दी आलोचना अन्य विधाओं की भी समस्त उल्लेखनीय कृतियों पर अपेक्षित तवज्जो कब दे पा रही है? यों भी, एकांकी आदि नयी उद्भूत विधाओं को आलोचकों के बीच अपनी स्थापना के लिए लम्बा संघर्ष पूर्व में भी करना पड़ा है, अब भी करना पड़ रहा है और आगे भी करते रहना पड़ेगा।

शोभा भारती :  बीसवीं सदी की लघुकथा में आप क्या दुर्बलताएँ देखते हैं जिन्हें आने वाले समय में दूर किया जाना जरूरी है?
बलराम अग्रवाल :  मैं समझता हूँ कि बीसवीं सदी की लघुकथा ने निरंतर अपने-आप को परिष्कृत किया है और इसका जो रूप आज इक्कीसवीं सदी के इस दूसरे दशक के पहले वर्ष में आप देख रही हैं, वह इस बात का प्रमाण है कि इस कथा-विधा से जुड़े कथाकारों में स्व-विवेक की कमी कभी रही नहीं। दुर्बलताएँ समय-सापेक्ष भी होती हैं। रचना-विधा का जो पक्ष आज प्रशंसनीय है, जरूरी नहीं कि आने वाले कल तक वह प्रसंशनीय ही बना रहेगा। इसलिए मैं समझता हूँ कि इस दिशा में मुझे ही नहीं, किसी को भी मसीहाई अंदाज़ अपनाते हुए सुझाव-विशेष देने की आवश्यकता नहीं है।

शोभा भारती :  पहली लघुकथा आपने कब लिखी?
बलराम अग्रवाल :  मेरी पहली प्रकाशित लघुकथा ‘लौकी की बेल’ थी जो श्रीयुत अश्विनी कुमार द्विवेदी के संपादन में लखनऊ से प्रकाशित होने वाली कथा-पत्रिका ‘कात्यायनी’ के जून 1972 अंक में प्रकाशित हुई थी।

शोभा भारती :  किस विधा में लिखकर आपको सबसे ज्यादा संतोष मिलता है?
बलराम अग्रवाल :  निश्चित रूप से लघुकथा में, लेकिन कभी-कभी कविता व कहानी में भी।

शोभा भारती :  लघुकथा की रचना के पीछे रचनाकार की मनःस्थिति के विषय में आप क्या बताना चाहेंगे? यानी वह क्या चीज़ होती है कि आप किसी कथ्य-विशेष को कविता या कहानी के बजाय लघुकथा में व्यक्त करना चाहते हैं?
बलराम अग्रवाल :  मेरा मानना है कि विश्वभर का मानव समुदाय आदम के ज़माने से ही किस्से-कहानियाँ सुनने-कहने में गहरी रुचि लेता है। एक उर्दू कहावत है- कम खर्च बाला नशीं; लघुकथाकार के लिए इससे तात्पर्य है- शाब्दिक मितव्ययता बरतते हुए आनन्दित रहना और मूछों पर ताव दिये घूमना। मन में कौन छोटी-सी बात गहरे चुभ जायेगी और समूचे अस्तित्व को हिलाकर रख देगी अथवा कौन-सा बड़ा हादसा धरती को हिलाकर रख देगा लेकिन मस्तिष्क को छू तक नहीं पायेगा- एकाएक कुछ कहा नहीं जा सकता। मैं यद्यपि कविता में भी अभिव्यक्त होता रहता हूँ और गाहे-बगाहे कहानी में भी, लेकिन लघुकथा-लेखन जितना अभ्यस्त अन्य विधाओं में नहीं हूँ इसलिए इस विधा में अभिव्यक्त होना मुझे मारक भी महसूस होता है और संतोषप्रद भी।

शोभा भारती :  क्या आप कुछ ऐसे लघुकथाकारों के नाम लेना चाहेंगे जो आपको सचमुच लघुकथा के लिए वरदान लगते हैं?
बलराम अग्रवाल : ऐसे लघुकथाकारों की दो श्रेणियाँ सक्रिय रही हैं, ऐसा मेरा मानना है। पहली श्रेणी में मैं उन लोगों के नाम लेना चाहूँगा जिन्होंने लघुकथा के रचनात्मक और आलोचनात्मक- दोनों पक्ष आम तौर पर साहित्यिक राजनीति से विलग रहते हुए गम्भीरतापूर्वक सुधारे-सँवारे हैं और वैसा ही काम अब भी कर रहे हैं। वे हैं- भगीरथ, डॉ॰ सतीश दुबे, कमल चोपड़ा, सुकेश साहनी, सूर्यकांत नागर, अशोक भाटिया व बलराम। इनमें विक्रम सोनी व स्व॰ रमेश बतरा का नाम भी ससम्मान जोड़ा जाना चाहिए। कुछ अन्य सम्माननीय नाम कहने से छूट भी गये हो सकते हैं। दूसरी श्रेणी में वे लोग हैं जिन्होंने लघुकथा के रचनात्मक और आलोचनात्मक- दोनों पक्षों पर काम तो यथेष्ट किया लेकिन व्यावहारिक स्तर पर वे स्वयं को मर्यादित न रख सके जिसके कारण लघुकथा की विधापरक प्रतिष्ठा, गरिमा और सम्मान- तीनों ही, विद्वत् आलोचक-वर्ग के बीच लगातार क्षत हुए। यद्यपि मैं उनके नामों का उल्लेख करना यहाँ उचित नहीं समझ रहा हूँ तथापि लघुकथा से जुड़े वरिष्ठ हस्ताक्षर बिना बताए भी उन नामों को जानते हैं अतः पहचान लेंगे। 

शोभा भारती :  एक लघुकथाकार के रूप में आप हिन्दी समाज से क्या कहना चाहेंगे?
बलराम अग्रवाल :  लघुकथाकार के रूप में मैं केवल हिन्दी समाज से ही नहीं समूचे मानव समुदाय से मुखातिब हूँ और अपनी बात को ‘प्रवचन’, ‘सैद्धांतिक आदेश’ या ‘नैतिक निर्देश’ के रूप में बोलने की बजाय रचनात्मक लघुकथा के रूप में ही रखना ज्यादा पसन्द करूँगा



  • शोभा भारती, 1773/31, शान्तिनगर, त्रिनगर, दिल्ली-110035
  • बलराम अग्रवाल, 70, उल्धनपुर, नवीन शाहदरा, दिल्ली