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शनिवार, 27 अगस्त 2016

अविराम विमर्श

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  5,   अंक  :  05-12,  जनवरी-अगस्त  2016


।।अविराम विमर्श।।

सामग्री :  इस अंक में डॉ. पुरुषोत्तम दुबे का आलेख- ‘‘हिन्दी लघुकथा : स्थापना के सोपान’’ तथा डॉ. जितेन्द्र ‘जीतू’ का आलेख- ‘‘सांस्कृतिक बदलाववाद और लघुकथा की स्थिति का नारको टेस्ट’’


डॉ. पुरुषोत्तम दुबे



हिन्दी लघुकथा : स्थापना के सोपान 
मान्यता के बहुत समीप होना और विधा का नाम अर्जित कर लेना, इन दो बातों में बड़ा अंतर है। मान्यता पाठकों से जन्म लेती है प्रत्युत् विधा आलोचकों के मध्य गहन मनन-चिंतन और चर्चा-परिचर्चाओं के प्रतिफलन से अपनी अस्मिता में ढलती है। क्या हिन्दी लघुकथा का जरूरत से ज्यादा लिखा जाना ही हिन्दी लघुकथा विधा के स्थापित होने की गारण्टी है? वर्षों से लिखा चला आ रहा हिन्दी व्यंग्य साहित्य अद्यतन विधा की संज्ञा पा सकने में असमर्थ रहा है, इसे हिन्दी साहित्य की सद्यःस्फुट धारा में स्थान दिया गया है।
     हिन्दी लघुकथा लेखन की उपलब्धियों पर बात करें तो आज हिन्दी लघुकथा की रचनाशीलता हिन्दी के अलावा हिन्दीतर प्रान्तों में बहुतायत में विकासशील है। बल्कि कहें, कि हिन्दी लघुकथा लेखन अकेले भारतव्यापी न रहकर देश की सीमाओं के उस पार से भी आ रहा है। तो ऐसे में, हिन्दी लघुकथा की स्थापना का सवाल वर्तमान में जस का तस क्यों अटका हुआ है? भारत विश्रुत पत्रिकाएँ, चाहे फिर ‘सारिका’ रही हो अथवा ‘कथादेश’, ‘हंस’, ‘बरोह’, ‘नवनीत’, ‘कादम्बिनी’ या फिर आज और नई जुड़ने वाली पत्रिकाओं में ‘साक्षात्कार’, ‘नया ज्ञानोदय’, ‘समावर्तन’, ‘वीणा’ प्रभृति पत्रिकाएँ हैं जिनमें अनिवार्यतः हिन्दी लघुकथा का प्रकाशन हो रहा है। यही क्या लघुकथा को ‘विधा’ ठहराने की बात है? अलहदा इसके, एक दलील यह भी है कि यह आसानी से पढ़ ली जाती है, इसकी क्षणिक अनुभूति है और इसमें तेज मारक क्षमता है। हिन्दी लघुकथा के सम्बन्ध में “विरुदावलियों” के ऐसे बोल लघुकथाकारों के मध्य से ही निकले हैं। लेकिन गहराई इस तर्क में है कि अभी तक हिन्दी साहित्य के जो मान्य विद्वान, पण्डित, आलोचक हैं, उन्होंने हिन्दी लघुकथा की ओर गम्भीरतापूर्वक ध्यान नहीं दिया है। फिर, सवाल यह भी सामने आता है कि हिन्दी की उपन्यास, कविता और कहानी ऐसी विधाएँ हैं जिनके पास पूर्णकालिक रचनाकार हैं और आलोचक भी। रचनाकारों के समान्तर यदि विधाओं के आलोचक भी विधाओं से संलग्न हुए मिलते हैं तब विधाओं के स्थापन्न का प्रश्न स्वमेव हल होता है।
     कहा यह भी जाता है कि वर्तमान में लघुकथा की स्थापना का सवाल बेमानी है। परन्तु इसके पीछे वही पुराना और लिजलिजा वक्तव्य...कि वर्तमान में लघुकथा तादाद में लिखी जा रही है, लेकिन जो बात लघुकथा की ऐतिहासिकता गोकि कहें कि विधागत स्थापना के पीछे लघुकथा लेखन के तारतम्य में ‘रचनात्मक संस्कार’ की होनी चाहिए, वह नहीं हो पा रही है।
     अभी लघुकथा लेखन के सम्बन्ध में कुछ नीतिगत अथवा सैद्धान्तिक पक्षों पर काम करना आवश्यक है। लघुकथा लेखन की सीमा के निर्धारण में बात को रबर-केंचुआ-छंद की तरह खींचा जा रहा है। साहित्य की प्रायः हर मान्य विधा का धर्म उसके मानकीकरण में निहित है। हिन्दी लघुकथा में मनुष्य और उसके परिवेश का अंकन उस सीमा तक नहीं पाया है, जो कसौटी का आदर्श है।
     और भी अनेक मसले हैं, जिनपर एकदम से नहीं, तो भी, उत्तरोत्तर विचार किया जा सकता है। बड़ी जरूरत है हिन्दी लघुकथा पर एक वैचारिक ‘संसद’ चलाने की। ऐसी बयार कहीं से भी बहे, मगर झंझावात की शक्ल में नहीं, अपितु लघुकथा स्थापन की दिशा में प्राण-शक्ति रोपने की शक्ल में। होना यह चाहिए कि जो फिलवक्त नहीं हो रहा है, गोया कि जो-जो लघुकथाकार अपनी-अपनी लघुकथाओं के संग्रह की थाल सजाकर लघुकथा-मंदिर में अपनी प्रविष्टि दर्ज कराए, वो-वो सर्वप्रथम स्वयं से यही निर्णय लेवें कि अपनी-अपनी किताब में बतौर ‘प्राक्कथन’ हिन्दी लघुकथा की स्थापना की चिन्ता को लेकर जिम्मेदारी के साथ लिखें। दिशा-दिशा से आने वाली निज के द्वारा लिखी गई ऐसी भूमिकाओं के समुच्चय से तपे हुए कुन्दन की तरह निकली बातें लघुकथा की विधागत स्थापना विषयक मसौदे तैयार करती मिलेंगी।
     अतीत का कालचक्र ‘सन् 1980’ अभी भी हमारी पहुँच से बाहर नहीं है। 1980 को बीते हुए पेंतीस बरस का समय अभी हमारी सोच की गिरफ्त में है। विराट काल की गणना की तुलना में पेंतीस वर्षीय इस अल्प कालावधि को दूरबीन से देखे बगैर भी हम लघुकथा विषयक स्थापना को साध सकते हैं। आधुनिक समय में इंटरनेट की सुविधा ने पारस्परिक वार्तालाप को आसान बना दिया है। अब किसी भी प्रकार की चर्चा-परिचर्चाओं के लिए ‘कॉफी हाउसों’ अथवा साहित्यिक सभागारों की जरूरतें निघट चुकी हैं। आजकल तो इंटरनेट पर बात रखो, और बात पर सहमत-असहमत के रेकॉर्ड संचित कर लो। पर इस बात के लिए अपने से किए एक संकल्प का अनुसरण करना होगा। किसी काम के लिए फिक्रजदा होकर काम को निपटाया जा सकता है। तो देर क्यों? रखिए पैर इंटरनेट की दहलीज पर और लिख डालिए लघुकथा के स्थापन्न विषयक अपने विचार। विचारों का सम्प्रेषण लघुकथाकारों की सामुदायिक भावना के फलस्वरूप होगा, तो नियति भी जरूर अपना काम करेगी। मात्र और मात्र आलोचना की राह चलकर लघुकथा की स्थापना का सवाल हल नहीं किया जा सकता। लघुकथाकारों की बोर्जुआ पीढ़ी; गोकि जिनके पास लघुकथा की बारीकियों को गिनाने का खासा अनुभव है; को आगे आना होगा, अपने अनुभवों की बानगी निकालनी होगी ताकि लघुकथा की स्थापना की कोई उचित सूरत बने।
     अतीत में, हिन्दी कहानी की स्थापना को लेकर बहुतेरी जंग लड़ी गईं। कहानी, फिर नई कहानी, फिर समकालीन कहानी, फिर आंचलिक कहानी, फिर समान्तर कहानी। और स्थिति यह है कि कहानी के ये सभी विभाजन आज स्वीकार्य हैं और कहानी के नाम-विभाजन की प्रत्येक संज्ञा स्थापना की पटरी पर सवार है। फिर ऐसा ही काम हिन्दी लघुकथा की स्थापना के हित में क्यों नहीं?
     आज लघुकथा को लिखने वाले बहुसंख्यक लघुकथाकार हैं। शायद सुई की नोंक के बराबर भी कोई कथानक वर्तमानकालीन लघुकथाकारों से छूटा नहीं है। तब यह सम्भव ही नहीं है कि लघुकथा के स्थापना बाबत दावे खारिज हों। अपनी ओर से, कोई चार सुझाव यहाँ देना मैं मौजूँ समझता हूँ। सम्भवतः मेरे द्वारा दिये जा रहे ये सुझाव लघुकथा-स्थापना की गाँठें खोलने में सहायक बन सकें।
     पहला सुझाव है-आचार, विचार और रुचि की प्रक्रिया, यानी कि लघुकथा लेखन के प्रति लघुकथाकार कितना आग्रही (पजेसिव) रहा है। दूसरा-आचार, विचार और रुचि में संशोधन, अर्थात् पहले की तुलना में लघुकथा लेखन की गहराई का ग्राफ कितना ऊँचा हुआ है? तीसरा-लेखन की दुनिया में लिखा गया जितना भी सर्वश्रेष्ठ है, उसकी अनुगामिता कितनी हुई है? तथा, चौथा-बीसवीं सदी के पश्चात् इक्कीसवीं सदी में आ रही सभ्यता के बौद्धिक अंशों से आज का लघुकथाकार कितना प्रभावित है?
उक्त चार बातों पर समेकित दृष्टि के बूते पर ही हिन्दी लघुकथा की विवेचना करनी होगी। जिससे लघुकथा लेखन की विकासगत स्थिति को उसके ऐतिहासिक क्रम से देखा जा सके। समय की पुकार है कि हिन्दी लघुकथा अपनी संरचना में काम आये समस्त अंगों से जानी जाए। कथ्य, प्रस्तुति, भाषा, शिल्प, संवेदन, आस्वादन प्रभृति के जरिए लघुकथा का पाठक लघुकथा के समीप आए। तादात्म्य, जहाँ होगा, स्थापना की मोहर वहीं लगेगी।

  • शशीपुष्प, 74 जे/ए (स्कीम नं. 71), इन्दौर-452009 म.प्र./मोबाइल 09407186940



डॉ. जितेन्द्र ‘जीतू’



सांस्कृतिक बदलाववाद और लघुकथा की स्थिति का नारको टेस्ट
       समकालीन हिन्दी लघुकथा को देश की सांस्कृतिक परिस्थितियों ने पूर्ण रूप से प्रभावित किया है। देश की संस्कृति क्या थी और क्या से क्या हो गयी है, यह जानना बहुत जरूरी है।
     यह संयोग नहीं है कि संस्कृति आज एक विशाल और व्यापक उद्योग के रूप में विकसित हो रही है। संस्कृति की परिभाषा और उसका कर्म भी बदल गया है। आज संस्कृति वह नहीं रह गई है जिसे टी. एस. इलियट ने कभी मनुष्य की पूरी कार्य शैली, व्यवहार, जीवन के प्रति दृष्टिकोण तथा सामाजिक चेतना केे रूप में परिभाषित किया था। हालांकि टी. एस. इलियट भी जानते थे कि ऐसा व्यक्ति जो संास्कृतिक कार्य में योगदान करता है, जरूरी नहीं है कि वह स्वयं सुसंस्कृत हो। आज ऐसा ही हो रहा है, संस्कृति का कार्य व्यक्ति या समाज को ‘सुसंस्कृत’ बनाना नहीं रह गया है।
     देश की यह संस्कृति कोई एक दिन में नहीं बदली। इसके पीछे परिवर्तन की एक पूरी प्रक्रिया शामिल है। इस समय भारत के लोगों के बारे में कहा जा सकता है कि वे सांस्कृतिक उन्मूलन और आत्म विसर्जन के रास्ते पर तेजी से बढ़ रहे हैं। आज का मूल मन्त्र है- पश्चिम की ओर देखो।
     संस्कृति किसी भी राष्ट्र की पहचान होती है और जब यही संस्कृति न रहे तो पहचान का संकट उत्पन्न हो जाता है। वास्तविकता यह है कि दुनिया में इस समय एक ही संस्कृति की धूम है, जो वैश्वीकरण के पीछे खड़ी है। यह मुनाफे, खुदगर्जी और निर्ममता की संस्कृति है। निश्चय ही वैश्वीकरण के लिए दुनिया भर की परम्परागत संस्कृतियों ने शुरू में थोड़ी समस्या पैदा की थी। पश्चिम की कई वस्तुओं और सेवाओं को अपनी जगह बनाने में कठिनाई हुई, क्योंकि स्थानीय चुनौतियों और संस्कारों की भिन्नता थी। अन्ततः बड़ी पूंजी के चमकीले आतंक के आगे कुछ भी न ठहर सका।
     सन् सत्तर के बाद से संस्कृति में जो परिवर्तन आये, उन्हें लघुकथाकारों ने अपनी लघुकथाओं के माध्यम से उकेरा। ये परिवर्तन इतने गहरे थे कि इस परिवर्तन ने मां-बाप की स्थिति को भी शोचनीय बना डाला। इस सम्बन्ध में डॉ. तारा निगम की निम्न लघुकथा ‘सेवा’ उल्लेखनीय हैः 
     ‘‘वह रोज मंदिर में आता, भगवान को प्रणाम कर कुछ स्तुति गाता, फिर देर तक भगवान की मूर्ति के पैर दबाता। उसकी श्रद्धा देख मुझे अच्छा लगता और मैं सोचती, जो पत्थर की मूर्ति के प्रति इतना सेवा भाव रखता है, वो जीवितों के प्रति कितना दयालु होगा।
     एक दिन मुझसे रहा नहीं गया। मैंने उससे पूछा- भाई, आप रोज इतनी देर तक मूर्ति के पैर दबाते हैं तो अपने माता-पिता के पैर कितनी देर तक दबाते होंगे?
     मेरे सवाल से चौंक गया वो। बोला, उनके पैर मैं कैसे दबाऊंगा?
     क्यों? क्या माता-पिता नहीं है? माफ करना, मुझसे भूल हुई।
     ‘‘नहीं, नहीं, ऐसी बात नहीं, दरअसल वे दोनों तो वृद्धाश्रम में रहते हैं।’’
     अपने देश में संस्कृति की स्थिति आज यह है कि यह अब ‘कल्चर’ के नाम से जाना जाता है और जाना भी क्या जाता है, नाक-भौं चढ़ाकर ‘इंडियन कल्चर’ (?) का जिक्र किया जाता है। 
     हम अपने आस पास के लोगों, घटनाओं और राजनैतिक वक्तव्यों में एक ऐसी संस्कृति की छाया देख सकते हैं, जिससे हम अब तक परिचित थे। विश्व बाज़ार में आम जनता के बुनियादी मूल्यबोध और रूचियों को उजाड़कर एक नकली आस्वाद प्रत्यारोपित कर दिया है। वह हमें अपनी छाया में हंसा और रूला रहा है। मनुष्य खुद अपनी हँसी और अपने आँसू भूलता जा रहा है। दूसरी तरफ, हमारी संस्कृतियाँ सामन्ती रूढ़ियों में पहले से ज्यादा जकड़ गई हैं, धर्म अब नैतिक प्रेरणा से दूर एक मनोरंजन है या हिंसक उन्माद।
     इस नई संस्कृति के पैरोकारों की कोई कमी नहीं है। सांस्कृतिक दुनिया में बाज़ार के ऊपर उठने का अर्थ है कला का नीचे गिरना। हम देख सकते हैं कि आर्थिक मन्दी में भी दिखावे और चमक-दमक में कोई कसर नहीं है, ग्लानि का युग बीत गया है।
इस नई संस्कृति ने मानो पूरे भारत को बाजार में बदल दिया है। सारा भारत बाजारमय हो गया है। हम देख सकते है कि बच्चों के खिलौनों की शक्ल बदल गई है। जीवन के तौर-तरीके बदल गये हैं। इन सबके साथ आदमी की सामाजिकता विलुप्त होती जा रही है। हम सांस्कृतिक उन्मूलन और आत्मविसर्जन का जितना अंदाजा लगा रहे हैं, उससे ज्यादा है। संस्कृति का प्रश्न मुख्यतः एक मध्यमवर्गीय प्रश्न है। मध्यमवर्ग को ही संस्कृति की ज्यादा चिन्ता होती है और अन्धानुकरण में भी वह सबसे आगे होता है। कहा जाता है, वैश्वीकरण ने मध्यमवर्ग का आकार बढ़ा दिया है, उसके स्वप्न ऊंचे कर दिये हैं। आज उच्च वर्ग की वास्तविक आमदनी, मूल्यविहीनता, ताकत और शान-शौकत का अनुमान तक कठिन है पर अब मध्यमवर्ग का भी एक हिस्सा काफी ऊँचे पायदान पर है, जहां से आम पब्लिक जरा भी नहीं दिखती।
     यही नहीं, बदलती संस्कृति के पदचापों की आवाज बच्चों के आंगन में भी आसानी से सुनी जा सकती है। उनका खानपान, रहन-सहन इतना बदल गया है कि उनके और मां-बाप के बीच एक पीढ़ी का नहीं, मानो कई पीढ़ी का अंतर आ गया हो। टी. वी. संस्कृति से रजी-कजी आज के बच्चों की बदलती सोच को डॉ. कमल मुसद्दी की निम्न लघुकथा ‘ब्रेकिंग न्यूज’ प्रमुखता के साथ उद्घाटित करती है:
     ‘‘बच्चों के जोर-जोर से चीखने, झगड़ने और रोने की आवाजों पर मां दौड़कर आई तो देखा कि रितिक के रोबोट की गर्दन और धड़ अलग-अलग पड़े हैं। रितिक आक्रोश भरे रूदन के साथ मुदित के सुपरमैन को कैंची से काट रहा है, साथ ही बड़बड़ाता जा रहा है, ‘तूने मेरा रोबोट तोड़ा, मैं इसके टुकड़े-टुकड़े कर डालूंगा।’’
     मां ने रितिक को डांट कर सुपरमैन छीनना चाहा तो वह मचल गया, ‘‘मैं इसके तीन सौ टुकड़े करके ही मानूंगा। इसने मेरे रोबोट की गर्दन तोड़ी है।’’
     मां मुदित से बोली, ‘‘क्यों तोड़ा तूने इसका रोबोट, बता...?’’ वह चीखा, ‘‘नहीं तोड़ा मैंने।’’
     रितिक चीखा, ‘‘यह झूठ बोल रहा है?’’
     मां ने फिर मुदित को डांटा, ‘‘क्यों झूठ बोलता है तू?’’
     इस पर मुदित और आक्रामक होकर बोला, ‘‘मैं झूठ नहीं बोल रहा, नहीं बोल रहा मैं झूठ...।’’ रोते हुए ही बोला, ‘‘तुम चाहो तो मेरा नार्को टेस्ट करा लो।’’ हतप्रभ मां कुछ देर निशब्द रही... फिर गहरी सांस लेकर खिलौनों के टुकड़े बटोरने लगी।’’
     बाजारवाद ने व्यक्ति के मानस को भी बदलने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है। इंसान वैसा नहीं रहा जैसा कि कभी हुआ करता था। 
     इस संस्कृति में न प्रेमचन्द युग के ‘हृदयपरिवर्तन’ की गुजंाइश है और न ही मुक्तिबोध युग के ‘आत्मसंघर्ष’ की। ये दोनों चीजें मानवीय अन्तःकरण में होती है, जो मध्यमवर्ग खोता जा रहा है। मध्यमवर्गीय लोग अब दुख-कष्ट में ज्यादा देर नहीं रह सकते। उन्हें ज़्यादा विलासिता, दौलत, उपभोक्ता सामान, पहचानहीनता की भीड़ में पहचान या प्रतिष्ठा चाहिये। उनके पास अपने हर भले और बुरे के लिए अपना तर्क है। वे हमेशा आत्म-महिमामंडन और दूसरों के ख.डन के लिये तैयार मिलेंगे। वे जिनका विरोध करेंगे, उससे आत्मीयता भी रखंेगे। वे अपने शत्रु के आत्मीय विरोधी होंगे, ताकि गुंजाइश बनी रहे। विकास की अंधी दौड़ ने सभी रिश्ते-नातों को भुला दिया है। 
     मूल्यबोध से अधिक महत्वपूर्ण हो गया है येन-केन प्रकारेण विकास। सह-अस्तित्व से अधिक चिन्ता है सिर्फ अपने फायदे और बोलबाले की। योग्यता से अधिक बड़ी कसौटी है वफादारी। न्याय से अधिक जरूरी है स्वजन-पोषण। पैसा सबका राजा है। इस विश्वास ने आदमी में लालच बढ़ाया है। इसके साथ उसकी असुरक्षा भी बढ़ी है- कहीं भी हत्या, नरसंहार या आत्मघाती हमला सम्भव है।.... भोले आदमी अन्य ग्रह पर चले जाएं। अब ऐसे व्यक्तियों की जरूरत है, जो प्रबन्धन में होशियार हैं, जुगाड़ा टेक्नोलोजी में मास्टर हैं, मंत्रियों या सत्ताधारियों की चापलूसी करके अपना काम निकालना जानते हैं एवं निर्मम हैं। वे महत्वकांक्षी ही होने चाहिए। आज के ज्ञान में स्वार्थहीनता, राष्ट्रीय भावना, ईमानदारी, जनता से प्रेम जैसे मूल्यों के लिए जगह नहीं है। अब जो कम्पनी मुनाफा नहीं देती और जो रिश्ता फायदा नहीं पहुँचाता, उसे बने नहीं रहना है। 
     सरकार के सामने भी समस्या खड़ी हो गयी है। वह इस नये माहौल में सबको कैसे सुख-सुविधा और जीने की आम जरूरतें प्रदान करे जबकि हर आदमी जल्दी में है और जल्दी से जल्दी अमीर बनना चाहता है। 
     सर्वविदित है कि लोकतांत्रिक कही जाने वाली सरकारें भारी खर्च करके भी आम आदमी को न अच्छी शिक्षा दे पा रही हैं, न सही चिकित्सा और न ही जरूरी सेवाएं। इसलिए ही देश-विदेश की निजी कम्पनियां अपने कठोर अनुशासन के साथ छाती जा रही हैं। दरअसल, निजीकरण लोकतंत्र की विफलता की देन है। नतीजतन सरकारें हों या व्यक्ति उनकी बुनियादी दृष्टि बन गयी है- जिसमें फायदा नहीं, उसमें हम शामिल नहीं। अब जहां से फायदे की उम्मीद नहीं होती, चाहे वह सरकारी संस्थान हो, सरकारी सहायता प्राप्त संस्थान हो, कोई सेवा कार्य हो या आत्मीय रिश्ता, वहां से हाथ खींच लिया जाता है।
     यह संतोष की बात है कि इस नये माहौल को लघुकथाकारों ने बहुत जल्दी पकड़ लिया। आज ऐसी अनेकों लघुकथाएं हैं जो इस संस्कृति को दर्शाती हैं और समाज को प्रतिबिम्बित करती हैं।
     एक छोटे से सवाल के साथ यह कहानी यहीं खत्म करते हैं। यह बताइये कि किसी एक इंसान के शरीर में यदि उसकी सिर्फ नाक पनप रही है और बाकी अंग सूखे जा रहे हैं, तो क्या आप उसकी इस अद्भुत तरक्की का जश्न मनायेंगे? उससे कहेंगे ‘‘यार तुम्हारा हाथ पांव, सिर-पेट सूख कर कांटा हो गया तो क्या, तुम्हारी नाक तो हाथी की सूँड की तरह फल-फूल रही है, बधाई हो! या फिर आप उससे कहेंगे कि ‘‘महोदय आप अत्यन्त बीमार हैं, आपको जल्दी उपचार की जरूरत है, आपकी नाक आपके बाकी शरीर को पनपने नहीं दे रही है। शायद यह कैंसर जैसी कोई भीषण बीमारी है। फैसला आपको करना है।
     इस नयी संस्कृति को दर्शाती लघुकथा ‘शर्त’ (डॉ. तारिक असलम ‘तस्नीम’) यहां प्रस्तुत है:
     ‘‘मिसेज लीला, अब तो दोनों बच्चों की शादी एक साथ कर डालो। रवि तीस का और नीलू सत्ताइस की होने को है। कब तक इंतजार करोगी यूं ही। जल्दी से शगुन की मिठाई का स्वाद चखा दो।’
     ‘चिंता तो मुझे भी हो रही है, कुलकर्णी बहिन। मैं भी सोचती हूँ कब तक बेचारे दोनों इस तरह रात-रात भर क्लबों-पार्टियों में घूम-घूमकर ‘टाइम पास’ करते रहेंगे। मेरी तो कोई इच्छा नहीं है। बस, रवि के लिए कोई सुन्दर, सुशील, खानदानी, घरेलू लड़की मिल जाये जो रवि से एडजस्ट कर ले। नीला के नाज-नखरे उठाने वाला कोई ‘जोरू का... मिल जाये तो मैं चिंतामुक्त हो जाऊं।’’ 


  • कविकुल, खरवन्दा निवास, स्टेशन रोड, बिजनौर-246701 (उ.प्र.)/मोबा. 09412567854

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