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सोमवार, 31 दिसंबर 2012

कुछ और महत्वपूर्ण पत्रिकाएँ/डॉ. उमेश महादोषी

अविराम का ब्लॉग :  वर्ष : 2,  अंक   : 4,   दिसम्बर  2012  


{अविराम के ब्लाग के इस  स्तम्भ में अब तक हमने क्रमश:  'असिक्नी', 'प्रेरणा (समकालीन लेखन के लिए)', कथा संसार, संकेत, समकालीन अभिव्यक्ति,  हम सब साथ साथ, आरोह अवरोह , लघुकथा अभिव्यक्ति, हरिगंधा,  मोमदीप, सरस्वती सुमन, 'एक और अंतरीप', 'दीवान मेरा', ‘अभिनव प्रयास’'शब्द प्रवाह' एवं 'कथा सागर'  साहित्यिक पत्रिकाओं का परिचय करवाया था।  इस  अंक में  हम दो  और  पत्रिकाओं  'रंग अभियान' तथा 'बाल  प्रहरी' पर अपनी परिचयात्मक टिप्पणी दे रहे हैं। 'बाल  प्रहरी' पर हमारी टिपण्णी 'बाल अविराम' खंड में पोस्ट की गयी है, कृपया वहीँ देखें। जैसे-जैसे सम्भव होगा हम अन्य  लघु-पत्रिकाओं, जिनके  कम से कम दो अंक हमें पढ़ने को मिल चुके होंगे, का परिचय पाठकों से करवायेंगे। पाठकों से अनुरोध है इन पत्रिकाओं को मंगवाकर पढें और पारस्परिक सहयोग करें। पत्रिकाओं को स्तरीय रचनाएँ ही भेजें,  इससे पत्रिकाओं का स्तर तो बढ़ता ही है, रचनाकारों के रूप में आपका अपना सकारात्मक प्रभाव भी पाठकों पर पड़ता है। हम सबको समझना चाहिए कि हमारी पहचान हमारी रचनाओं और काम के स्तर होती है।- उमेश महादोषी}


नाटक और रंगमंच को समर्पित एक लघु पत्रिका : रंग अभियान



     आजकल नाटक और रंगमंच को पत्र-पत्रिकाओं में साहित्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा कम स्थान मिल पाता है, लेकिन कुछेक पत्रिकाएं ऐसी भी हैं, जो पूरी तरह नाटक, रंगमंच और समरूप कलाओं के लिए समर्पित हैं। बेगूसराय से प्रकाशित ‘रंग अभियान’ एक ऐसी ही पत्रिका है। डा. अनिल पतंग द्वारा संपादित इस पत्रिका के पिछले कई अंक देखने का अवसर मिला है। पारंपरिक कलाओं (जिनमें नाटक एवं रंगमच प्रमुख हैं) के प्रति अपने वादे को सही मायने में और पूरी ईमानदारी के साथ निभा रही है ‘रंग अभियान’। हर अंक में कुछेक नाटकों के प्रकाशन के साथ नाटक एवं रंगमच संबन्धी आलेख, नाटककारों, रंगमंच कर्मियों एवं इस कला की वाहिका संस्थाओं से संबन्धित आलेखों को भी इस लघु पत्रिका में पर्याप्त स्थान दिया जाता है। इसके साथ रंगमंच की गतिविधियों पर रपटों के साथ नाटक एवं रंगमंच संबन्धी पुस्तकों की समीक्षा के लिए भी पर्याप्त गुंजाइश रखी गई है। सिनेमा और टी.वी. धारावाहिकों के प्रचलन के कारण नाट्क एवं रंगमंच को दर्शकों की बेरुखी के इस युग में इस तरह के प्रयास निश्चित रूप से सम्बल प्रदान करते हैं। 
     ‘रंग अभियान’ का प्रयास इस मायनें में और भी महत्वपूर्ण है कि सामग्री की स्तरीयता के मामले में कोई समझौता नहीं कर रहे हैं डा. अनिल पतंग। प्रकाशित नाटक, चाहे ऐतिहासिक, पौराणिक पृष्ठभूमि पर आधारित हों या समकालीन समस्याओं पर, उनका कलात्मक स्तर और पाठकों की दृष्टि से सम्प्रेषणीयता और प्रभावशीलता का स्तर ऊँचा होता है। चूंकि नाटक का प्रभाव साहित्य की अन्य विधाओं की अपेक्षा अधिक होता है, अतः समकालीन समस्याओं पर रचित नाटकों का महत्व भी अधिक होता है। ‘रंग अभियान’ के हर अंक ऐसे नाटक शामिल रहें, संपादक इस बात का ध्यान रखते हैं। पिछले तीन अंकों (अंक 25-27, 28 व 29), जिनमें तीन अंकों को मिलाकर प्रकाशित किया गया एक वृहद संयुक्तांक भी है, में से हरेक में कोई न कोई नाटक ऐसा जरूर है, जो सामयिक समस्याओं/वृत्तियों से जुड़ा होने के कारण साहित्य के पाठकों का ध्यान आकर्षित करता है। अंक 29 में प्रो. चन्द्र किशोर जायसवाल का ‘नाम में क्या रखा है?’, अंक 28 में डा.अनिल पतंग का ‘डेविड की डायरी’ तथा संयुक्तांक 25-26 में सुरेश कांटक का ‘धरती का दर्द’ एवं डा. पूर्णिमा केडिया ‘अन्नपूर्णा’ का ‘कल, आज और कल’ ऐसे ही नाटक हैं। संयुक्तांक में डा. श्याम सुन्द घोष का नाटक ‘हनुमान का अन्याय’ रामायण के प्रसंग से जुड़ा होने के बावजूद सामयिक तो है, अन्तर्मन को झकझोरने वाले कई प्रश्नों को उठाता है। पौराणिक दृष्टि से भी और सामयिक दृष्टि से भी। यह ज्वलन्त प्रश्न है कि लक्ष्मण जी को बचाने गये हनुमान जी संजीवनी बूटी को न पहचानने के कारण समूचे पहाड़ को ही क्यों उठाकर ले गये, उन्होंने वहाँ के निवासियों को विश्वास में लेना क्यों नहीं उचित समझा? और किन्हीें परिस्थितियों में यह मान भी लिया जाये कि उनका कृत्य परिस्थितिबद्ध था, तो अपना काम बन जाने के बाद द्रोण पर्वत के उस भाग को वहीं पुर्नस्थापित भी तो किया जा सकता था। हनुमान जी जैसे महाबुद्धिमान महानायक के द्वारा लंका में वृक्षों को उजाड़ने आदि के कृत्य पर भी प्रश्न उठाया गया है। हनुमान तो हनुमान, मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम जी से भी इतनी भयंकर भूल कैसे हुई? पहाड़ और प्रकृति का दर्द इतना उपेक्षित क्यों हुआ? यह उपेक्षा आज भी ज्यों की त्यों है। प्रश्न निसन्देह बड़ा है। दुभाग्य की बात तो यह है कि इतना बड़ा यह प्रश्न देश में चल रहे अनेक आन्दोलनों के बीच भी अपने लिए थोड़ा सा स्थान नहीं बना पा रहा है। क्या इस उपेक्षा से श्रीराम की मर्यादा लांक्षित नहीं होती है? इस तरह के नाटको की अधिकाधिक प्रस्तुतियाँ देने के बारे में रंगकर्मियों को भी सोचना चाहिए।
    अंक 28 बेगूसराय जनपद की रंगमंचीय गतिविधियों, संस्थाओं एवं रंगकर्मियों के योगदान पर केन्द्रित है। यह अंक इस मायने में महत्वपूर्ण है कि बेगूसराय जैसे एक क्षेत्र विशेष में तमाम मतभेदों, व्यक्तित्वों के टकरावों और दूसरी समस्याओं, जो वातावरण को प्रदूषित करती हैं, के बावजूद नाटक और रंगमंच के लिए कितना काम हुआ है, इस पर एक सार्थक विवेचन प्रस्तुत करता है। इसी विवेचन से बेगूसराय जनपद में निष्क्रिय हो चुकी संस्थाओं को सक्रिय करने और रंगमंचीय गतिविधियों को सघन एवं तीव्र करने का रास्ता ढूंढ़ा जा सकता है। यही विवेचन दूसरे जनपदों/क्षेत्रों में के लिए भी अपने रंगमंचीय एवं साहित्यिक वातावरण की पुनर्रचना के लिए प्रेरक हो सकता है। 
    नाटक एवं रंगमंच की प्रगति के लिए अपने वजूद को निरंतरता देने के उद्देश्य से आर्थिक संसाधन जुटाने की छटपटाहट भी इस लघु पत्रिका के काफी है, जिसे अनुचित नहीं कहा जा सकता। लघु पत्रिकाओ के समक्ष आर्थिक संसाधनों की समस्या रहती है, और उन्हें इस समस्या से अपनी-अपनी तरह से निपटना पड़ता है। महत्वपूण यह है कि रंग अभियान जैसी पत्रिका अर्थ-समस्या से अपनी तरह निपटते हुए भी अपनी निरन्तरता के साथ स्तरीयता बनाये हुए है। 
रंग अभियान :  पारम्परिक कलाओं की अनियतकालीन पत्रिका। सम्पादक : डा. अनिल पतंग (मो. 09430416408)। सम्पादकीय पता :  पोस्ट बाक्स नं. 10, प्रधान डाकघर, बेगूसराय-851101(बिहार)/नाट्य विद्यालय, बाघा, पो.-सुहृदयनगर, बेगूसराय-851218(बिहार)। सहयोग राशि- 25 अंकों के लिए : रु. 500/-, आजीवन :  रु. 1000/-।

रविवार, 30 सितंबर 2012

कुछ और महत्वपूर्ण पत्रिकाएँ/डॉ. उमेश महादोषी

अविराम का ब्लॉग :  वर्ष : 2,  अंक   : 1,   सितम्बर 2012  


{अविराम के ब्लाग के इस  स्तम्भ में अब तक हमने क्रमश:  'असिक्नी', 'प्रेरणा (समकालीन लेखन के लिए)', कथा संसार, संकेत, समकालीन अभिव्यक्ति,  हम सब साथ साथ, आरोह अवरोह , लघुकथा अभिव्यक्ति, हरिगंधा,  मोमदीप, सरस्वती सुमन, 'एक और अंतरीप' एवं 'दीवान मेरा'  साहित्यिक पत्रिकाओं का परिचय करवाया था।  इस  अंक में  हम तीन और  पत्रिकाओं  ‘अभिनव प्रयास, 'शब्द प्रवाह' एवं 'कथा सागर'  पर अपनी परिचयात्मक टिप्पणी दे रहे हैं।  जैसे-जैसे सम्भव होगा हम अन्य  लघु-पत्रिकाओं, जिनके  कम से कम दो अंक हमें पढ़ने को मिल चुके होंगे, का परिचय पाठकों से करवायेंगे। पाठकों से अनुरोध है इन पत्रिकाओं को मंगवाकर पढें और पारस्परिक सहयोग करें। पत्रिकाओं को स्तरीय रचनाएँ ही भेजें,  इससे पत्रिकाओं का स्तर तो बढ़ता ही है, रचनाकारों के रूप में आपका अपना सकारात्मक प्रभाव भी पाठकों पर पड़ता है। हम सबको समझना चाहिए की हमारी पहचान हमारी रचनाओं और कम के स्तर होती है।- उमेश महादोषी}


एक अभिनव पत्रिका : ‘अभिनव प्रयास’ 


   

         ‘अभिनव प्रयास’ के पिछले दो अंक अप्रैल-जून 2012 एवं जुलाई-सितम्बर 2012 अंक पढ़ने का अवसर मिला है। निःसंदेह अशोक अंजुम जी का यह प्रयास ‘अभिनव’ है। सामग्री तो स्तरीय है ही, रूपाकार, मुद्रण, प्रस्तुतीकरण- सब कुछ आकर्षक है। कागज भी बेहद बढ़िया गुणवत्ता का उपयोग हो रहा है। काव्य रचनाओं को ग़ज़ल, गीत-नवगीत, दोहा, मुक्तक/रुबाई/कत्आत, छन्द मकरन्द एवं मुक्तछन्द/छन्दमुक्त समूहों में बद्ध करके छापना; रचनाओं के साथ रचनाकार का छायाचित्र और कई रचनाओं को काली पृष्ठभूमि पर ब्लॉक के रूप में छापना, रचनाओं को जरूरी स्पेस देना आदि कई छोटी-छोटी चीजे हैं, जो पत्रिका के गेटअप और रचनाओं के प्रस्तुतीकरण- दोनों को आकर्षक बनाती हैं। शायद यही सब वे चीजे हैं जो अंजुम जी की संपादन कला के रूप में इसे लघु पत्रिकाओं के मध्य एक बड़ी पत्रिका की प्रतिष्ठा प्रदान करती हैं। युवा कवि-समीक्षक श्री जितेन्द्र ‘जौहर’ जी के स्तम्भ ‘तीसरी आँख’ की इसमें नियमित उपस्थिति सोने में सुगन्ध जैसी है। इस स्तम्भ के बारे में काफी कुछ सुना था, इसकी दो पुरानी किस्तें अन्यत्र से प्राप्त कर पहले ही पढ़ चुका हूँ। अध्ययन, चिन्तन और आत्मविश्वास से पुष्ट जितेन्द्र जी का समालोचनात्मक दृष्टिकांेण समकालीन पीढ़ी को एक सकारात्मक मार्ग पर ले जाने में अपनी भूमिका निभायेगा और समकालीन साहित्य को बहुत सारी गर्म हवाओं के थपेड़ों से बचायेगा। मुझे लगता है भविष्य में वह एक ऐसी दीवार बनकर उभर सकते हैं, जो साहित्य में बहुत सारी ऊल-जुलूल चीजों के प्रवेश को रोकने में सक्षम होगी।  
    अप्रैल-जून 2012 अंक ‘व्यंग्य विशेषांक’ है। संपादक अंजुम जी स्वयं एक प्रतिष्ठित व गम्भीर व्यंग्यकार हैं, स्वाभाविक रूप से उनकी रचनात्मकता की छाप इस अंक के संपादन में देखी जा सकती है। काव्य की सभी विधाओं में उन्होंने व्यंग्य रचनाएं जुटाईं हैं और निर्धारित प्रारूप में उनकी प्रस्तुति की है। यद्यपि एकाध रचना व्यंग्य के चुटीलेपन से आगे जाकर आक्रमण की मुद्रा में भी देखने को मिल जाती है, पर अधिकांश रचनाएं व्यंग्य के अनुशासन में बँधी हैं। व्यंग्य-विमर्श का प्रतिनिधित्व करते दो आलेख भी इस अंक में शामिल हैं- डॉ. शिवओम अम्बर का ‘हिन्दी-ग़ज़ल की व्यंग्य-मुद्रा’ एवं बानो सरताज का ‘उर्दू शायरी में पैरोडी’।
    जुलाई-सितम्बर 2012 के सामान्य अंक में भी उत्कृष्ट रचनाएं हैं। स्व. डॉ. राकेश गुप्त व डॉ. ऋषि कुमार चतुर्वेदी द्वारा संपादित ‘हिन्दी कहानी’ से साभार ली गई मुकारबखान आज़ाद की कहानी ‘गिरगिट’ मुस्लिम समाज में महिलाओं की दुर्दशा की भयावह तश्वीर सामने रखती है। काश! वास्तविक स्थिति अब इतनी भयंकर न हो। यद्यपि यह सिर्फ मुस्लिम समाज की महिलाओं की ही व्यथा नहीं है, कमोवेश हिन्दू और दूसरे समाजों में ही कहीं न कहीं विद्यमान रही है। डॉ. शिवओम ‘अम्बर’ ने अपने आलेख ‘हिन्दी-ग़ज़ल के प्रस्थान बिन्दु’ में ऐतिहासिक महत्व की संक्षिप्त जानकारी दी है। लघुकथाएं अपेक्षाकृत हलकी हैं।
    दोनों अंको में विरासत के अन्तर्गत वरिष्ठ साहित्यकार स्व. डॉ. राकेश गुप्त की आत्मकथा ‘देखे सत्तर शरद्-बसंत’ के अंश उनके जीवन के बहुत से पहलुओं को पाठकों के समक्ष रखने की दृष्टि से स्वागतेय हैं। प्राप्त पुस्तकों के परिचय के साथ ही पारस्परिक सहयोग को बढ़ाती विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं की चर्चा को भी कई पृष्ठ देना महत्वपूर्ण है।
    और अब पुनः कुछ बात ‘तीसरी आँख’ स्तम्भ पर। अप्रैल-जून 2012 अंक की किस्त में आद. सुरेन्द्र शर्मा जी के साथ जितेन्द्र ‘जौहर’ जी की मोबाइल वार्ता ने निश्चित रूप से शर्मा जी के बारे में बहुत से लोगों की धारणा का परिष्कार किया होगा। उनके व्यक्तित्व का जो चित्र इस वार्ता में उभरकर आया है, वह साधारण शब्दों में रचे-बसे उनके हास्य-व्यंग्य में व्याप्त गम्भीर रचनात्मकता की ओर भी संकेत कर जाता है। उनका कथन ‘बाज़ार बन जाना बुरा नहीं है, बाज़ारूपन बुरा है’ एक बड़ा संकेत देता है। 
    साक्षात्कार की शब्दाख्या एवं उसके तरीके के बारे में जितेन्द्र जी की बात एक सीमा तक ठीक लगती है। लघु एवं व्यक्तित्वपरक, नीतिगत मुद्दों पर स्पष्टीकरण, उत्तरदाता के पूर्व के कथनों, कार्यों या धारणाओं आदि से सम्बन्धित विषयों पर साक्षात्कारों के सन्दर्भ में उनकी बात से अक्षरशः सहमत हुआ जा सकता है, लेकिन ऐसी स्थितियां भी होती हैं, कुछ व्यापक विषय होते हैं, जिनके सन्दर्भ में एक ओर उत्तरदाता को समय लेना पड़ सकता है। दूसरे प्रश्नकर्ता के लिए भी आधुनिक व महंगी तकनीक के अभाव में प्रश्नों के लम्बे व सूक्ष्म समझ वाले (जहां कुछ का कुछ समझे/लिखे जाने की सम्भावना हो सकती है) उत्तरों को तुरन्त लिपिबद्ध कर पाना या स्मृति के आधार पर बाद में लिपिबद्ध करना मुश्किल हो सकता है। यदि कोई गम्भीर मसला है और प्रश्नकर्ता/साक्षात्कार लेने वाले का उद्देश्य समस्याओं का वास्तविक समाधान तलाशना है, तो प्रश्नों के जवाब के लिए उत्तरदाता को समय देने में कोई नुकसान नहीं है। मुझे लगता है साक्षात्कार के माध्यम से कुछ शोध जैसा कार्य होता है, तो व्यापक और गम्भीर विषयों पर साक्षात्कार के लिए एक त्रिस्तरीय तरीका अपनाया जा सकता है। इसके लिए पहले स्तर पर साक्षात्कार लेने वाला व्यक्ति अध्ययन और अनुभवों के आधार पर विषय/समस्या को स्वयं ठीक से समझे, मोटे तौर पर आरम्भिक प्रश्न तैयार करके उत्तरदाता को उपलब्ध करवा दे। उनके प्राप्त जवाबों के अध्ययन के बाद आवश्यक स्पष्टीकरणों एवं आरम्भिक प्रश्नों के उत्तरों से जनित सूक्ष्म प्रश्नों पर आमने-सामने बैठकर साक्षात्कार को पूरा किया जा सकता है। निःसंदेह ऐसे साक्षात्कारों से कई बार आलेख सदृश चीजें निकलकर आ जाती हैं, लेकिन वे महत्वपूर्ण भी होती हैं और साक्षात्कार को किसी लेखक के स्वलिखित/मौलिक आलेख से इस मायने में भिन्न भी बनाती हैं कि इनमें प्रश्नकर्ता के प्रश्न, जो अन्यथा लेखक के रूप में उत्तरदाता के जेहन में न भी आ पाते, के समाधान भी इसमें शामिल हो जाते हैं। जहां तक कई साक्षात्कारों के अकादमिक (डिप्लोमैटिक, आदर्शवादी आदि भी) दिखने का प्रश्न है, निःसंदेह ऐसा है; पर इसका कारण उत्तरदाता (कई बार प्रश्नकर्ता भी) की सोच एवं चिन्तन से कहीं अधिक जुड़ा हुआ है। कुछ प्रश्न होते ही अकादमिक हैं। कुछ प्रश्नकर्ता बिना अध्ययन-मनन के साक्षात्कार लेने लग जाते हैं। कुछ लोगों के समक्ष आप कितना भी खोजी और व्यवहारिक प्रश्न रखिए, वे आपको उत्तर अकादमिक तरीके से ही देंगे। प्रश्न आकस्मिक पूछा जाये या पूर्व निर्धारित हो, अकादमिक जवाब दोनों तरह के प्रश्नों के मिल सकते हैं। जिन लोगों का ज्ञान और निष्कर्ष सामान्यतः किताबों के अध्ययन-मनन पर आधारित होते हैं, उनके साथ ऐसा ही होता है। परन्तु जिन लोगों का ज्ञान एवं निष्कर्ष व्यवहारिक अनुभवों, आत्मचिन्तन एवं स्वविवेक पर आधारित तर्कों से जनित होता हैं, उनके साथ ऐसा नहीं होता। अपितु उनके निष्कर्ष अकादमिक चीजों का आधार बनते हैं। इसलिए मुझे लगता है कि किसी व्यापक विषय पर साक्षात्कार के लिए ‘उत्तरदाता’ का चयन कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। ऐसे बिषयों पर यदि चिन्तन-मनन की जरूरत होती है, तो उत्तरदाता को समय देने में कुछ नुकसान नहीं है, क्योंकि विषय पर अपनी धारणाओं, विचारों, निष्कर्षों को एक दस्तावेज बनने के लिए निर्गत करने से पूर्व उन पर एक बार पुनर्दृष्टि डालना या पुनर्प्रेक्षित करना अनजाने में किसी विवाद को जन्म देने या अपनी बात कहने के बाद उससे पलटने की अपेक्षा कहीं अधिक उचित है। साक्षात्कार का तरीका काफी कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि साक्षात्कार किस तरह का है और उसका उद्देश्य क्या है। जहां जरूरी है वहां आमने-सामने बैठकर ही बात होनी चाहिए। जितेन्द्र जी ने एक अच्छा विषय उठाया है, मुझे लगता है आलेख या निबन्ध की एक पूरक विधा के रूप में ‘साक्षात्कार’ के परिष्कार हेतु चर्चा होनी चाहिए।
     जुलाई-सितम्बर 2012 अंक की क़िस्त में जितेन्द्र ‘जौहर’ जी ने श्री मंगलेश डबराल जी के एक आलेख में उनके निष्कर्ष एवं वैचारिक दृष्टिकोण पर अपनी बेबाक, निर्भीक और जरूरी टिप्पणी दी है। निःसंदेह मंगलेश जी वरिष्ठ और रचनात्मक स्तर पर प्रभावशाली कवि हैं, परन्तु उनके संदर्भित आलेख की जिन बातों को सामने रखा गया है तथा मंगलेश जी के जो विचार उनके साथ हुई मोबाइल वार्ता के माध्यम से सामने आये हैं, उनके आधार पर साहित्यिक/सामाजिक चिंतक के स्तर पर मंगलेश जी बेहद निराश करते हैं। मंगलेश जी जैसा कवि जब इस स्तर पर सोचता है और पूछे गये प्रश्नों के इस स्तर के जवाब देता है, तो मान लेना चाहिए कि वह कविता के स्तर पर चाहे जितने सफल हों, लेकिन व्यक्तित्व और साहित्यिक/सामाजिक चिन्तन के स्तर पर या तो वह अपना तेज खो रहे हैं या फिर किसी पार्टीलाइन/राजनैतिक स्तर पर विचारधारा के दबाव में हैं। साहित्यिक व्यक्ति को इस तरह के मुद्दों पर व्यापक साहित्यिक/सामाजिक दृष्टिकोण से सोचना चाहिए न कि साहित्य को दक्षिणपन्थी और वामपन्थी खांचों में बांटकर स्वयं उनमें से किसी एक खांचे में बैठकर। मानते हैं कि जिसकी पेटिंग दो मिलियन डॉलर तक पहुंच जाने की चर्चा रही हो, जिसे पद्मश्री, पद्मभूषण, पद्मविभूषण जैसे राष्ट्रीय अलंकरणों से नवाजा गया हो, जिसके काम को अतिविशिष्ट मानकर कलाकारों को प्रतिनिधित्व देने के लिए राज्यसभा में मनोनीत किया गया हो, वह कोई छोटा कलाकार नहीं होगा। लेकिन इसी बात को इस तरह से भी समझना होगा कि हुसैन साहब को उनकी विशिष्टता के एवज में देश व समाज की ओर से कोई कम सम्मान नहीं दिया गया और इतना बड़ा सम्मान पाने के बाद उस देश, जिसकी मिट्टी से वह पैदा हुए और जिसने उन्हें इतना कुछ दिया, उसके प्रति उनका भी कोई दायित्व बनता था। ऐसा व्यक्ति अपने देशवासियों (सारे न सही, एक बड़ा वर्ग ही सही) की भावनाओं को न समझ सके, तो यह दुर्भाग्यपूण ही माना जायेगा। पहली बात तो कला का उद्देश्य ‘नंगेपन’ को ढकना होता है, उघाड़ना नहीं। सौन्दर्य में वृद्धि करना होता है, उसे विकृत करना नहीं। सामाजिक सरोकारों से जुड़े प्रश्नों को उठाना होता है, उनसे जुड़े लोंगों का विचलित करना नहीं। फिर भी मान-मर्यादाओं से परे जाकर यदि मान भी लिया जाये कि वह एक कलाकार थे और उन्हें अपनी कला को अपने तरीके से अभिव्यक्त करने की आजादी थी, तो भी क्या इतने मान-सम्मान से किसी बड़प्पन का जन्म नहीं होना चाहिए? (बहुत बार ऐसा होता कि मान-मर्यादा की रक्षा के लिए धीर-गम्भीर लोग, जो करना चाहते हैं, नहीं करते; जो कहना चाहते हैं, नहीं कहते)। कोई भी आजादी समाज-निरपेक्ष नहीं होती। कम से कम उस व्यक्ति की तो बिल्कुल ही नहीं, जो देश और समाज के मान-सम्मान का प्रतीक बन चुका हो। इस स्तर पर आकर उन्होंने कला को बाजारू बनाने का काम किया। और मंगलेश जी जैसा कवि ऐसे कृत्य को तर्कहीन तरीके से महिमामण्डित कर रहा है? कलाकार होने का मतलब मनमानापन नहीं होता। काश! हुसैन साहब अपने देश की जमीन पर आखिरी सांस लेते। मुझे नहीं लगता उन्होंने जिस हॉस्पीटल में आखिरी सांस ली, वहां उन क्षणों में अपने देश और उसकी मिट्टी को चूमने की इच्छा उनके अहं (और स्वास्थ्य-सम्बन्धी जरूरतों) से ऊपर उठ पाई होगी। यदि ऐसा होता तो कम से कम देश के द्वारा दिए गए मान-सम्मान और प्यार के एवज में ही सही, अपनी गलतियों को स्वीकार कर सकते थे। यह ऐसा देश नहीं है जो उन्हें क्षमा नहीं करता। बल्कि ऐसा करने पर उनका कद और भी बढ़ जाता। चलिए, इस बात को भी एक तरफ रखते हैं। अब दूसरी बात- यदि समाज और लोग खांचों में बंटने लगें, तो साहित्यकार का क्या धर्म है? क्या वह उनके बीच की खाई को और चौड़ा करे? गलत और सही पर विवेकपूर्ण और निष्पक्ष चिन्तन की बजाय एक को उत्तेजित करे और दूसरे के तमाम कुकृत्यों के साथ खड़ा नज़र आये? (दोनों का परिणाम?) क्या हो रही गलतियों के कारणों और प्रभावों पर व्यापक नजरिये से न सोचा जाये? आप किसी को ‘लंपट’ कहते हैं और उसे गाली नहीं मानते, कोई आपको-हमें; आपकी-हमारी पूरी जमात को ‘लंपट’ कह देगा। इसका दोषी कौन होगा? यदि कुछ लोग वास्तव में लंपट हों भी, तो भी क्या हमारा स्तर यही है कि हम उन्हें इस बात के लिए उत्तेजित करें कि वे हमें भी ‘लंपट’ कहें? और क्या उस तरह के ‘लंपट’, जैसे आपकी दृष्टि में रचे-बसे हैं, सिर्फ हिन्दुत्ववादियों में ही हैं? क्या हिन्दुत्ववादी होने का अर्थ उग्रवादी होना है? क्या कुछ लोगों के बहाने आप एक पूरी और समृद्ध (विश्व भर में सर्वश्रेष्ठ समझी जाने वाली) संस्कृति को आरोपित नहीं कर रहे हैं? मंगलेश जी, क्या इस तरह के शब्दों का आपके पास कोई विकल्प नहीं रह गया है? निःसन्देह आपका-हमारा शब्दों पर ही अधिकार रह गया है, पर क्या अधिकार के विवेकपूर्ण उपयोग की जिम्मेवारी से बचना ठीक है? बात बहुत लम्बी हो जायेगी और वर्तमान के सन्दर्भ में यहां पर हिदुत्व और इस्लाम में विभेद की जरूरत नहीं है, पर ‘आखिर मैं किसी अन्य पर क्यों लिखूं’, ‘हिन्दुत्ववादी शक्तियों के बारे में मेरी राय तो यही है...’, ‘जितेन्द्रजी..... आप अपनी राय क़ायम रखने के लिए........ स्वतन्त्र हैं’ जैसी बातों में मंगलेश जी का कवि कहीं नज़र नहीं आता। एक कलाकार की सोच ऐसी नहीं होती है, एक कवि और साहित्यकार की सोच भी ऐसी नहीं होती है।
    एक अच्छी और स्तरीय पत्रिका के लिए अंजुम जी से यही कहना है- ‘वीर तुम बढ़े चलो, ....’।

अभिनव प्रयास :  साहित्यिक त्रैमासिकी। सम्पादक :  अशोक अंजुम (मो. 09258779744)। सम्पादकीय पता :  स्ट्रीट-2, चन्द्रविहार कॉलोनी (नगला डालचन्द), क्वारसी बाईपास, अलीगढ़ (उ.प्र.) पिन 202127। ई मेल : ashokanjumaligarh@gmail.com। अर्थ सहयोग- द्विवार्षिक : रु. 200/-, पंचवार्षिक :  रु. 500/-, आजीवन : रु. 2100/-।


ऊर्जा और उत्साह से भरपूर पत्रिका : शब्द प्रवाह



    

            छोटे स्तर के अन्य व्यवसायों की तरह लघु पत्रिकाओं के दीर्घकालिक प्रकाशन के लिए तीन चीजें बहुत जरूरी होती हैं- ऊर्जा, विश्वास और सूक्ष्म प्रबन्धन। ऊर्जा- जो हमें कुछ कर गुजरने के जुनून तक ले जाये। विश्वास- अपने आप पर कि हम जो करना चाहते हैं उसे कर पायेंगे। विश्वास- उस उद्देश्य के प्रति, जिसके लिए हम काम करना चाहते हैं कि वह हासिल करने योग्य है। विश्वास- उन लोगों के प्रति, जिनके साथ हमें काम करना पड़ता है कि वे अन्ततः हमें सहयोग करेंगे। विश्वास- उस वातावरण के प्रति, जिसमें हमें काम करना है कि तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद हम उस वातावरण में काम कर पायेंगे। विश्वास- जो हमें उन अपेक्षाओं को दिलाना होता है, जो हमारे काम पर केन्द्रित होती हैं कि हम उन्हें पूरा करेंगे। सूक्ष्म प्रबन्धन- जो काम करने के तौर-तरीकों की हमारी समझ को दर्शाता है कि किस तरह हम अति लघु संसाधनों का बड़े उद्देश्य के लिए उपयोग कर पायेंगे। इसमें उद्देश्य के समुचित रूप, यानी जो छोटा दिखकर भी अन्ततः बड़े प्रभावों वाला हो, का चयन भी शामिल होता है। सामान्यतः लघु पत्रिकाओं के पास संसाधनों की इतनी कमी होती है कि इन तीन चीजों के बिना उनका प्रकाशन तो दूर उनकी योजना बनाना भी सम्भव नहीं होता है। सौभाग्य से आज कई लघु पत्रिकायें हैं, जो इन्हीं तीनों चीजों को अपना संसाधन बनाकर साहित्य की गतिवान वाहिका बनी हुई हैं। ‘शब्द प्रयास’ भी ऐसी ही लघु पत्रिका है। नियमित प्रकाशन, अधिकाधिक लोगों से जुड़ने का प्रयास, पर्याप्त सामग्री की उपयुक्त सलीके से प्रस्तुति, बिना किसी तरह की ओवर प्रिंटिंग के उपलब्ध स्थान का यथाधिक प्रयोग, साफ-सुथरा मुद्रण, प्रतियों को लम्बे समय तक सहेजकर रखने की दृष्टि से कागज की सही गुणवत्ता, एक टीम बनाकर सहयोगियों को साथ लेकर चलना आदि को लेकर ‘शब्द प्रयास’ जिस तरह आगे बढ़ रही है, विश्वास किया जा सकता है कि लम्बे समय तक इसकी निरन्तरता बनी रहेगी और साहित्य की विकास यात्रा में अपना योगदान देगी।
    पत्रिका का जनवरी-मार्च 2012 अंक वार्षिक काव्य विशेषंाक था। दो सौ पृष्ठों से अधिक के इस विशेषांक में करीब 182 रचनाकारों को शामिल किया गया है। स्वाभाविक है इतनी बड़ी संख्या में शामिल रचनाकारों में कुछ अपना प्रभाव नहीं भी छोड़ पाये होंगे; लेकिन अच्छी रचनाएं पर्याप्त संख्या में हैं। रचनाओं में सामयिक चिन्तन और चिंताएं- दोनों का होना उनकी जीवन्तता को दर्शाता है। आज के साहित्य की यह विशेषता है कि बहुत सारे हाथ मिलकर एक छप्पर उठाते हैं, बहुत सारी आवाजें मिलकर एक आवाज बनती हैं। और यह इस विशेषांक की रचनाओं में भी है। हर रचनाकार को एक पृष्ठ दिया गया है। रचनाओं के साथ उनका फोटो, संक्षिप्त परिचय एवं सम्पर्क सूत्र देने के साथ हर पृष्ठ पर किसी चर्चित कवि की दो पंक्तियां उद्धृत की गई हैं, जो निसन्देह उन कवियों को सम्मान देने के साथ प्रस्तुति का आकर्षक भी बढ़ा देती हैं। काव्य विशेषांक में रचनाकारों के मार्गदर्शन हेतु कुछ संन्तुलित आलेख भी शामिल कर लिए जाते तथा प्रस्तुत रचनाओं को किसी उपयुक्त आधार पर कुछ खण्डों में विभक्त कर हर खण्ड के आरम्भ में अंक की श्रेष्ठ रचनाओं को रखा जाता तो अंक की सार्थकता और भी बढ़ जाती। पर संपादक का अपना भी कुछ दृष्टिकोंण होता है, सम्भव है संदीप जी की दृष्टि में सभी रचनाकारों को समान दृष्टि से देखने की भावना रही हो। सम्पादकीय में नये रचनाकारों के पक्ष में संदीप जी ने अपनी बात रखते हुए कुछ आलोचकों के अनुचित रवैये (जो स्थानीय स्तरों पर कुछ अधिक ही देखने को मिलता है) पर कड़ी टिप्पणी की है। दरअसल आलोचना का एक संतुलित और नियोजित उद्देश्य होना चाहिए, समय सापेक्ष सन्दर्भों में सृजनात्मक पक्षधरता और मार्गदर्शन का। आलोचक का अपना दृष्टिकोंण अध्ययन और चिन्तन से पुष्ट होना चाहिए, कम से कम जिस रचना, तकनीक या दृष्टिकोंण की आलोचना की जा रही हो, उसके सन्दर्भ में तो अवश्य ही। दूसरी बात रचना पर अन्य पाठकों की दृष्टि से विचार करने के साथ रचनाकार के दृष्टिकोंण तक भी पहुँचने की कोशिश होनी चाहिए। आप दूसरे के दृष्टिकोंण को भी तो समझिए। अपना बना-बनाया एक पक्षीय दृष्टिकोंण थोपने का प्रयास करेंगे, तब वह आपका अपना व्यक्तिगत मन्तव्य तो हो सकता है, उद्देश्यपरक आलोचना नहीं। ऐसे में बहुत सारी सम्भावनाएं भी अंकुरित होने से पहले ही कुचल जाती हैं। आलोचना भी एक तरह का साहित्य ही है, उसका भी अपना एक स्तर होता है और उसमें भी समय और जरूरतों के अनुरूप सुधारों व बदलावों की जरूरत होती है। लेकिन इसी के साथ यह भी जरूरी है कि रचनाकार और संपादक के रूप में हम आलोचकों के प्रतिपक्षी न बन जायें। सम्पादक के रूप में हमें कई भूमिकाएं एक साथ निभानी पड़ती हैं और कहीं न कहीं आलोचक की भूमिका में भी आना पड़ता है। दरअसल एक समुचित समालोचनात्मक दृष्टिकोंण के विकास का रास्ता ढूंढ़ने का दायित्व कहीं न कहीं लघु पत्रिकाओं की भूमिका में शामिल है। इस भूमिका में रचनाकारों एवं पाठकों का सहयोग भी मिलना चाहिए। रचनाकार आलोचना को समुचित एवं संयमित जवाब दें, पाठक जैसे रचनाओं पर प्रतिक्रिया देते हैं, वैसे ही आलोचना पर भी प्रतिक्रिया दें। एक बात और- संदीप जी ने एक पुस्तक के भूमिका लेखक द्वारा उसी पुस्तक के समीक्षक के रूप में रचनाकार की कमियाँ गिनाने पर आपत्ति की है। हो सकता है उस पुस्तक के सन्दर्भ में उनकी बात ठीक हो। मैं पूरे वाकये से परिचित नहीं हूँ, पुस्तक में क्या था और उन भूमिकाकार महोदय ने भूमिका में क्या लिखा और बतौर समीक्षक क्या कहा? हम मानकर चलते हैं कि संदीप जी का आंकलन ठीक होगा। लेकिन कुछ सामान्य प्रश्नों पर संदीप जी सहित हम सबको अवश्य विचार करना चाहिए कि भूमिका लेखक को समीक्षक/समालोचक का दायित्व सौंपना क्या औचित्यपूर्ण है? दूसरे क्या दोनों भूमिकाएँ एक ही हैं? जब कोई रचनाकार किसी से भूमिका लिखवाने का अनुरोध करता है, तो उसकी अपेक्षा क्या होती है और वह स्वयं किस मनःस्थिति में होता है? आजकल कितने लेखकगण अपनी पुस्तक के प्रकाशन से पूर्व किसी की आलोचनात्मक राय लेना और उस पर गम्भीरतापूर्वक विचार करना पसन्द करते हैं? क्या भूमिका समीक्षा का ही दूसरा नाम है? मेरी स्पष्ट सोच है कि आलोचक को दुत्कारने की नहीं, उसका सामना करते हुए जवाबदेह बनाने की जरूरत है। खैर! बेवाकी से अपनी बात रखने का साहस दिखाने के लिए संदीप को बधाई। लघु पत्रिकाओं को सहयोग पर कुछ लोगों की नकारात्मक प्रतिक्रियाओं और दृष्टिकोंण पर भी इस अंक में संदीप जी ने यथानुरूप अपनी बात रखी है। यह भी एक मुद्दा है, जिस पर विस्तार से विमर्श की जरूरत है। साहित्य भी समाज का हिस्सा है और समाज में सबकी अपनी-अपनी कुछ स्वतः स्फूर्त भूमिकाएं/जिम्मेवारियां भी होती हैं। यहां भी कुछ स्वतः स्फूर्त भूमिकाएं/जिम्मेवारियां लघु पत्रिकाओं के प्रकाशकों की हैं तो कुछ स्वतः स्फूर्त भूमिकाएं/जिम्मेवारियां पाठकों-रचनाकारों की भी हैं। इसी से साहित्य आगे बढ़ पायेगा, साहित्य- जो हम सबका साझा पथ है।
    पत्रिका का अप्रैल-जून 2012 अंक मुक्तक विशेषांक है। कविता में यह एक ऐसा दौर है जहां बहुत सारे नए कवि मात्राओं और वर्णों की गिनती की ओर लौट रहे हैं। कहीं न कहीं यह अपनी विरासत का स्मरण ही है। इसका स्वागत कई पत्रिकाओं ने अपनी ज़मीन मुहैया कराके किया है। यह मुक्तक विशेषांक और जानकारी के मुताबिक पूर्व में दोहा, गीत आदि विशेषांक गवाह हैं कि ‘शब्द प्रवाह’ का उत्साह भी किसी से कम नहीं रहा है। इस विशेषांक में शताधिक कवियों के मुक्तक शामिल किए गए हैं, जिनमें शिल्प एवं पारम्परिक भावों की दृष्टि से अनेक रचनाकारों के मुक्तक प्रभावित करते हैं। कई मुक्तकों के कथ्य में पर्याप्त गहराई भी है। निसंदेह अतिथि सम्पादक श्री यंशवंत दीक्षित जी ने मुक्तकों के चयन में यथासंभव सतर्कता बरती है। बिना संशोधन के रचनाओं के प्रकाशन का संकल्प लेकर चलने पर यह सतर्कता बेहद श्रमसाध्य है और चुनौतीपूर्ण भी। उम्मीद है इस तरह के विशेषांको के प्रकाशनों से आने वाले समय में कथ्य की गहराई, बिम्बों के प्रयोग और भावों की ताजगी भी नए दौर के मुक्तकों में देखने को मिलेगी। मुक्तक के युवा विशेषज्ञ श्री जितेन्द्र जौहर का आलेख इस अंक का एक अकेला आलेख है, जो मुक्तक में कुछ नए छान्दसिक प्रयोगों पर सारगर्भित टिप्पणी करता है और मुक्तक में इन प्रयोगों की सम्भावनाओं को टटोलता है। इस आलेख से अंक की सार्थकता बढ़ गई है। दरअसल जितेन्द्र जौहर हाल में मुक्तक के साथ अन्य छान्दसिक कविता की समालोचना एवं व्याख्या के क्षेत्र में उभरा एक ऐसा नाम है, जिसकी ऊर्जा का ईमानदार और समुचित उपयोग किया जा सके तो मुक्तक ही नहीं समग्रतः छान्दसिक कविता के प्रभाव को पुनः प्रक्षेपित किया जा सकता है। 
     ‘शब्द प्रवाह’ ऊर्जा और उत्साह से भरपूर है और अपने उपलब्ध संसाधनों का समुचित उपयोग करती हुई पूरे विश्वास के साथ बढ़ रही है। वाद रहित धरातल और अपनी विरासत से जुड़कर चल रही है। कई अचर्चित रचनाकारों को सामने ला रही है। यह सब स्वागतेय है। यदि विचार पक्ष को भी कुछ पृष्ठ देकर चले तो और भी अच्छा होगा। संदीप सृजन और उनकी सम्पूर्ण टीम को हार्दिक बधाई!
शब्द प्रवाह :  साहित्यिक त्रैमासिक पत्रिका। प्रधान सम्पादक  :  संदीप फाफरिया ‘सृजन’। सम्पर्क :  ए-99, व्ही.डी. मार्केट, उज्जैन-456006 (म.प्र.)। मोबाइल : 09926061800 / 09406880599। ई मेल : shabdpravah@gmail.com। वार्षिक सहयोग : सामान्य :  रु. 200/-, विशेष :  रु. 300/-, स्तम्भ सहयोग :  रु. 500/-।


साधारण कलेवर में भविष्य की पत्रिका : कथा सागर


    


               समकालीन रचनाकारों में कई ऐसे हैं, जो रचनात्मक स्तर पर जितने ऊर्जावान हैं, उतने ही स्पष्ट, तार्किक और निडर भी हैं। अपनी बात को बेहद प्रभावी ढंग से रखते हैं। डा. तारिक असलम तस्नीम इन्हीं में से एक हैं। जब उन जैसा कोई रचनाकार साहित्यिक पत्रकारिता में कदम रखता है तो उससे बहुत सारी और बड़ी अपेक्षाएं होती हैं, यद्यपि परिस्थितियों व संसाधनों से जुड़ी एवं कुछ अन्य सीमाओं के रहते वे सभी पूरी नहीं हो पाती। ‘कथा सागर’ के पिछले तीन अंक देखने-पढ़ने के बाद मुझे इस लघु पत्रिका के साधारण से कलेवर में स्तरीय सामग्री देने की कोशिश और छटपटाहट दोनों दिखाई देती हैं। पर जितना समय और श्रम इस पत्रिका को चाहिए, उतना संपादक डॉ. तारिक जी सम्भवतः अपनी नौकरी व लेखकीय व्यस्तताओं के चलते दे नहीं पा रहे हैं। 
    अप्रैल-दिसम्बर 2010 अंक, इसके बाद के दोनों अंकों से कहीं अधिक प्रभावशाली बन पड़ा है। इस अंक के संपादकीय में उन्होंने एक कोर्ट केस के सन्दर्भ में मुस्लिम समाज में प्रचलित ‘बहु-विवाह’ प्रथा के बारे में सूरा निसा की आयतों के हवाले से स्पष्ट किया है कि यह प्रथा असामान्य परिस्थितियों के लिए है। आम हालात में एक पुरुष के लिए एक ही औरत से निकाह करना जायज है। इस प्रथा को फैशन या सुविधाभोगी तौर पर अपनाना उचित नहीं है। उनका यह संपादकीय निसंदेह महत्वपूर्ण है। इस अंक की अधिकांश कविताएं अच्छी हैं। फैज अहमद फैज पर तारिक जी के अपने आलेख में फैज साहब के जीवन के कुछ क्षणों को कलम से छूने की कोशिश की है। ‘कोरे कागज की दास्तान’ में अमृता प्रीतम जी द्वारा साहिर की भावपूर्ण स्मृति है। राजकमल चौधरी की एक सशक्त लघु कहानी ‘ननद-भौजाई’ प्रस्तुत कर उन्हें याद किया गया है। लघुकथाओं में डा. सतीशराज पुष्करणा, पारस दासोत, संतोष सुपेकर प्रभावित करते हैं। विशेष साक्षात्कार में वरिष्ठ लघुकथाकार युगल जी ने तारिक जी के प्रश्नों के बेहद संतुलित जबाब दिए हैं। परन्तु उनके बारे में संपादकीय टिप्पणी में तारिक जी का अतिउत्साह हावी नज़र आता है। युगल जी और दूसरे भी कई साहित्यकार जिस मुकाम पर आज खड़े हैं, वहां किसी अन्य से तुलना या किसी अन्य को छोटा सिद्ध करके उन्हें बड़ा सिद्ध करने की कोई जरूरत नहीं है। जिनका कद और योगदान स्वयंसिद्ध है, उनके समक्ष .... ‘जिनके समकक्ष हिंदी लघुकथा साहित्य में कोई दूसरा हम पल्ला नहीं दिखाई देता। यह अलग बात है कि ब्लॉग से लेकर लघुकथा के सौन्दर्य शास्त्र की रचना कर कुछ लोग स्वयं को झंडाबरदार और मसीहा कहलवाने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं, उनकी नियति और फितरत दोनों ही साफ नहीं हैं, जो युगल की कभी आदत नहीं बनी।’.... जैसी टिप्पणियों का क्या अर्थ हो सकता? मुझे लगता है इस सामान्य टिप्पणी में लघुकथा के व्यापक प्रभाव और विकास के लिए सकारात्मक और समर्पित रूप से काम कर रहे तमाम अग्रणी लोगों के बारे में भी नकारात्मक संदेश ध्वनित होता है। जबकि तारिक जी भी यह मानेंगे कि लघुकथा अपने वर्तमान मुकाम पर जिन लोगों के अनथक प्रयासों के बाद खड़ी है, उनमें युगल जी निःसन्देह महत्वपूर्ण हैं, पर अकेले नहीं हैं। अग्रणी और समर्पित नामों की एक लम्बी सूची है। हाँ, युगल जी के योगदान का मूल्यांकन जिस स्तर पर होना चाहिए था, उस स्तर पर नहीं हुआ है। यह काम अब भी हो सके, तो लघुकथा के भविष्य के लिए कुछ अच्छी चीजें निकलकर आयेंगी। टिप्पणी में अतिउत्साह की बात मैंने इसलिए कही है कि जो कुछ इस टिप्पणी से ध्वनित हो रहा है, वैसा संकेत जानबूझकर तारिक जी जैसा व्यक्ति सम्भवतः नहीं दे सकता। वरिष्ठ लघुकथाकार श्री प्रतापसिंह सोढ़ी जी द्वारा एक लम्बे समय के बाद लघुकथा की विकास यात्रा के महत्वपूर्ण नायक श्री विक्रम सोनी की खोज-खबर लेना सोढ़ी साहब की संवेदनशीलता को तो दर्शाता ही है, तारिक साहब इस स्मरण रिपोर्ट को प्रकाशित करने के लिए विशेष बधाई के पात्र हैं। हम सबको दुआ करनी है कि सोनी जी को ईश्वर शीघ्र स्वस्थ करे और एक बार हम फिर से लघुकथा मे उनकी कलम का जादू देख सकें। 
    अक्टूबर-दिसम्बर 2011 अंक कविता पर विशेषांक है। इसमें वर्तमान के कवियों के साथ केदारनाथ सिंह, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, रघुवीर सहाय, डा. हरवंश राय बच्चन, अमृता प्रीतम, फैज अहमद फैज, धूमिल आदि कई पुराने कवियों की चयनित कविताएं भी दी गई हैं। संपादकीय में ‘कविता का बिगड़ता तेवर और मिजाज’ पर यथार्थपरक टिप्पणी की गई है। निसन्देह आज की कविता बहुत सारी सकारात्मक चीजों के बावजूद काव्यात्मक प्रभाव की दृष्टि से सामान्य पाठकों से बहुत दूर है। सिद्धेश्वर जी ने अपने लघु आलेख ‘कविता से पाठकों की बढती दूरी’ में तीखी किन्तु सटीक टिप्पणी की है। लेकिन हमें यह भी स्वीकार करना होगा कि जो बड़ा रचनाकार वर्ग हाशिए पर है, उसे अपने अध्ययन व चिन्तन-मनन को पुष्ट करते हुए लघु-पत्रिकाओं के जरिए अपनी प्रतिभा को सामने लाने का प्रयास स्वयं भी करना चाहिए। उनके हाशिए पर होने के लिए सिर्फ और सिर्फ दूसरे ही दोषी नहीं हैं, थोड़ा बहुत कमी उनके प्रयासों में भी हो सकती है। आज बहुत सी लघु पत्रिकाओं के मंच पर उनकी प्रतिभा को आदर मिल सकता है और उस मंच से अपनी वास्तविक प्रतिभा को प्रकट करते हुए राष्ट्रीय परिदृश्य पर अपनी उपस्थिति वे दर्ज करा सकते हैं। कई लघु पत्रिकाएं ऐसे रचनाकारों के स्वागत के लिए तत्पर दिखाई देती हैं। ‘कथा सागर’ भी एक उदाहरण है। एक ओर यदि एक बड़ा रचनाकार वर्ग हाशिए पर है और दूसरी ओर लघु पत्रिकाओं को अच्छी रचनाएं प्रकाशित करने के लिए नहीं मिल पा रही हैं, तो इसे बहुत बड़ा विरोधाभास और बिडंबना ही कहा जायेगा। दूसरी बात हमें साहित्य और साहित्यकारों के योगदान/कद को पुरस्कारों व अलंकरणों से आंकने और पुरस्कारों व अलंकरणों की ओर ताकना बन्द करना होगा। मैं यह नहीं कहता कि पुरस्कारों व अलंकरणों का कोई महत्व नहीं है, उनका महत्व है, पर यह भी सत्य है कि पुरस्कार व अलंकरण आज प्रतिभा के मूल्यांकन की वास्तविक कसौटी नहीं रह गए हैं। जिन्हें पुरस्कार व अलंकरण नहीं मिल पाते, उनमें भी कई बड़े रचनाकार होते हैं, बल्कि कहीं अधिक बड़े होते हैं। ऐसे बड़े रचनाकारों की प्रतिभा व योगदान की चर्चा होनी चाहिए, उनके काम को सामने लाना चाहिए। तथ्यों को सामने रखना चाहिए कि वे क्यों महत्वपूर्ण हैं, उनकी रचनाओं में क्या खास है! प्रतापसिंह सोढ़ी जी द्वारा वरिष्ठ शाइर आदिल नूर साहब से एक फुटपाथ पर हुई भावुक मुलाकात में अनुभूत यथार्थ की संस्मरणात्मक प्रस्तुति अंक का स्तर बढ़ाती है। डा. शिवनारायण व डा. सुवंश ठाकुर ‘अकेला’ लिखित क्रमशः डा. तारिक के कविता संग्रह ‘शब्द इतिहास नहीं रचते’ एवं जवाहर किशोर के उपन्यास ‘खुशियां’ की समीक्षाएं उत्कृष्ट हैं।
    जनवरी-मार्च 2012 अंक लघुकथा विशेषांक है। इसे होना था कविता विशेषांक, पर अच्छी कविताएं और कविता आधारित सामग्री समय पर न जुट पाने के चलते संपादक तारिक जी को इसे लघुकथांक के रूप में प्रकाशित करना पड़ा। साहित्यिक बिडंबना का यह एक जीता जागता उदाहरण है। खैर! इस अंक में डा. सतीश दुबे, युगल, विक्रम सोनी, प्रतापसिंह सोढ़ी, माधव नागदा, रामयतन यादव, सुरेन्द्र मंथन, डा. तारिक असलम ‘तस्नीम’, सुरेश शर्मा आदि की बेहतरीन लघुकथाओं के साथ सिद्धेश्वर, उषा अग्रवाल ‘पारस’, रामदेव प्रसाद शर्मा, अरुण अभिषेक, विश्वप्रताप भारती, संतोष सुपेकर, प्रभात दुबे की लघुकथाएं भी प्रभावित करती हैं। कुछ अच्छी कविताएं भी हैं। मशहूर शायर शहरयार को उनकी स्मृतियों एवं कुछ ग़ज़लों की प्रस्तुति के साथ भावपूर्ण श्रद्धांजलि दी गई है। लघुकथा के इतिहास के सन्दर्भ में लघुपत्रिकाओं की भूमिका को रेखांकित करते तारिक जी का अपने लम्बे आलेख में लघुकथा के सन्दर्भ से इतर भी कुछ सन्दर्भों पर बात की गई है। देश की चर्चित पत्रिकाओं में स्थान बनाने के लिए महिला लेखकों को किन-किन स्तरों पर समझौते करने पड़ते हैं, इसके खुलासे के सन्दर्भ में जो बात उठाई गई है, वह यह भी सोचने को विवश करती है कि क्या सरेआम इस तरह के आचरण में संलिप्तता को स्वीकारना इतना वास्तविक और विश्वसनीय है? इस तरह के खुलासों के पीछे क्या कोई मानवीय सरोकार दिखाई देता है? कहीं ऐसा तो नहीं यह सब सुर्खियां और बाजार लूटने का पारस्परिक सहमति से अपनाया गया हथकंडा होता हो? जब ये लोग इतने बाजारू तरीके से इन खुलासों को करते हैं और इतने सबके साथ भी सिर उठाकर जीते दिखाई देते हैं, तो इनका उद्देश्य संदिग्ध ही लगता है। समीक्षाएं इस अंक में भी अच्छी हैं। 
    कथा सागर के मुद्रण एवं प्रस्तुतीकरण पर तारिक जी अपेक्षित ध्यान नहीं दे पा रहे हैं। प्रूफ में भी असावधानी दिखाई देती है। व्यस्तताओं के साथ छोटी जगहों/कस्बों में समुचित तकनीक की अनुपलब्धता भी एक बड़ी समस्या होती है। उम्मीद की जा सकती है कि भविष्य में जब भी तारिक जी कुछ जिम्मेवारियों के बोझ से हल्के होंगे, कथा सागर का एक नया ही रूप देखने को मिलेगा, जिसकी भावना और बीज इसके वर्तमान रूपाकार में छुपे हुए हैं। तब तक ‘कथा सागर’ का आते रहना महत्वपूर्ण है।

कथा सागर :  साहित्यिक त्रैमासिक पत्रिका। संपादक :  डा. तारिक असलम ‘तस्नीम’। सम्पर्क : भारतीय साहित्य सृजन संस्थान, प्लाट-2/सेक्टर-2, हारून नगर, फुलवारी शरीफ, पटना-801505पत्राचार : थाना रोड, जामताड़ा-815351, झारखण्ड।  मोबाइल : 09570146864 / 09122914396 / 08969974239 / 09031938169। ई मेल :  kathasagareditor@gmail.com / tariq_lekhni@yahoo.com । अर्थ सहयोग- वार्षिक : रु. 100/-, आजीवन : रु. 1000/-।

गुरुवार, 24 मई 2012

कुछ और महत्वपूर्ण पत्रिकाएँ/डॉ. उमेश महादोषी


अविराम का ब्लॉग :  वर्ष : १, संयुक्तांक  : 8 व 9, अप्रैल-मई  २०१२  


{अविराम के ब्लाग के इस  स्तम्भ में अब तक हमने क्रमश:  'असिक्नी', 'प्रेरणा (समकालीन लेखन के लिए)', कथा संसार, संकेत, समकालीन अभिव्यक्ति,  हम सब साथ साथ, आरोह अवरोह , लघुकथा अभिव्यक्ति, हरिगंधा,  मोमदीप एवं सरस्वती सुमन   साहित्यिक पत्रिकाओं का परिचय करवाया था।  इस  अंक में  हम दो  और  पत्रिकाओं 'एक और अंतरीप' एवं 'दीवान मेरा' पर अपनी परिचयात्मक टिप्पणी दे रहे हैं।  जैसे-जैसे सम्भव होगा हम अन्य  लघु-पत्रिकाओं, जिनके  कम से कम दो अंक हमें पढ़ने को मिल चुके होंगे, का परिचय पाठकों से करवायेंगे। पाठकों से अनुरोध है इन पत्रिकाओं को मंगवाकर पढें और पारस्परिक सहयोग करें। पत्रिकाओं को स्तरीय रचनाएँ ही भेजें,  इससे पत्रिकाओं का स्तर तो बढ़ता ही है, रचनाकारों के रूप में आपका अपना सकारात्मक प्रभाव भी पाठकों पर पड़ता है।}

एक और अन्तरीप : रचना और विमर्श के मध्य संतुलन साधती महत्वपूर्ण पत्रिका


    पुनर्प्रकाशन के बाद ‘एक और अन्तरीप’ के तीन अंक आ चुके हैं। मानव मुक्ति को समर्पित इस प्रभावशाली त्रैमासिक साहित्यिकी में सृजनात्मक रचनाओं और विमर्श के मध्य सन्तुलन बनाये रखने का अच्छा प्रयास किया जा रहा है। हर अंक में विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर पाँच-सात आलेखों, एक महत्वपूर्ण साक्षात्कार, तीन-चार समीक्षाओं एवं सम्पादकीय के माध्यम से विमर्श के लिए पर्याप्त मंच उपलब्ध कराया जा रहा है। दूसरी ओर पत्रिका के सृजनात्मक दायित्व का बोध कराती तीन-चार कथाकारों की कहानियाँ व लघुकथाएँ, पाँच-सात समकालीन कवियों की सामयिक कविताएँ, व्यंग्य और संस्मरण आदि विधाओं की स्तरीय रचनाएँ। निश्चित रूप से पत्रिका के साहित्यिक अभिरुचि के पाठकों के लिए तथा साहित्य के सरोकारों को पूरा करने के लिए ‘एक और अन्तरीप’ अपने में काफी कुछ समेटे हुए है।
    तीनों अंकों में सम्पादकीय लघु-पत्रिकाओं और उनके सन्दर्भ में ‘एक और अन्तरीप’ के औचित्य, महत्व और लेखकों से उनकी रचनात्मक सहयोगाकांक्षाओं पर केन्द्रित रहे हैं। बेहद सटीक-सारगर्भित रूप में कई प्रश्नों (जो अधिकांशतः मौखिक माध्यमों से या व्यवहारिक रूप में उठाये जाते रहे हैं) के उत्तर दिये गये हैं और लघु-पत्रिकाओं के प्रकाशन को उत्साहित करने का काम किया है। प्रेम कृष्ण शर्मा जी का यह कथन प्रेरणाशील है- ‘हमें इस बात की चिन्ता नहीं करनी चाहिए कि उनकी प्रसार संख्या कम है, उनका प्रभाव क्षेत्र बहुत छोटा है या कि आम आदमी तक उनकी पहुँच नहीं है।......हमारी नज़र तो उन नेत्रों पर होनी चाहिए जिनमें अभाव के आंसू हैं तथा शोषण चक्र की बेबसी से जो पूरी तरह त्रस्त हैं।’ उनकी इस बात से असहमति नहीं हो सकती कि ‘लघु-पत्रिका निकालना कोई विलासिता नहीं है, बल्कि अपने रक्त से उस हथियार का निर्माण करना है जो मानव मुक्ति की लड़ाई में कारगर होकर मानव को शोषण चक्र से मुक्त करेगा।’ इसलिए जब भी कोई लघु-पत्रिका चाहे जितने छोटे रूप में, चाहे जितने कम संसाधनों के साथ चाहे, जितने कम समय के लिए सामने आये, उसके औचित्य पर प्रश्न करने की बजाय उसे एक सही दिशा में ले जाने के लिए जैसा और जितना भी सहयोग करने की स्थिति में हम हों, हमें करना ही चाहिए। लघु-पत्रिकाओं का औचित्य उनके प्रकाशकों/संचालकों/संपादकों के साहस में स्वयं सिद्ध होता है। और जैसा कि प्रेम कृष्ण जी ने ‘एक और अन्तरीप’ को एक बड़े महाभियान का छोटा सा अंश कहकर इंगित भी किया है, निश्चित रूप से लघु-पत्रिकायें एक दूसरे की पूरक होती हैं और उनकी ताकत समेकित एवं संयुक्त होकर समाज में बड़े सकारात्मक बदलावों की प्रेरक बनती है। जो लोग इस बात को नहीं समझ सकते, वे शायद साहित्य के महत्व को भी नहीं समझ सकते। ‘एक और अन्तरीप’ के बहाने लघु-पत्रिकाओं के लिए रचनात्मक सहयोग की उनकी अपेक्षा को सिर्फ एक अपेक्षा नहीं माना जाना चाहिए, यदि रचनाकार और लघु-पत्रिकाएं एक ही पथ के राही हैं, तो एक-दूसरे पर एक-दूसरे का अधिकार मानना चाहिए, उनके मध्य साधिकार सम्बन्ध विकसित होने चाहिए। संघर्षरत रचनाकार और लघु-पत्रिकाएं बहुधा यह अधिकार एक-दूसरे को देकर चलते भी हैं, परन्तु बहुत सारे स्थापित रचनाकारों के बारे में यह बात नहीं कही जा सकती। उनका नज़रिया लघु-पत्रिकाओं के प्रति बहुत सहयोगपूर्ण नहीं होता है, इस सन्दर्भ में प्रेम कृष्ण जी का दर्द उभरकर दूसरे व तीसरे अंक के सम्पादकीयों में आया भी है। उम्मीद है आने वाले समय में स्थापित रचनाकारों के दृष्टिकोंण में सकारात्मक परिवर्तन आयेगा। यदि कहीं कोई लघु-पत्रिका भी अपने होने की गम्भीरता को नहीं समझ पा रही है, तो उसे भी आत्म-मंथन करना चाहिए।
    एक बात लघु-पत्रिकाओं के सन्दर्भ में निकलकर आती है, बहुधा लघु-पत्रिकाएं व्यक्तिगत प्रयासों से ही चल पाती हैं। संगठनगत प्रयास वहीं सफल होते हैं, जहां वे किसी न किसी रूप में या तो सरकार या प्रायोजक संस्था विशेष के नियन्त्रण से जुड़े हैं या संबन्धित संगठन में कोई व्यक्ति विशेष अत्यन्त धैर्य और त्याग-समर्पण की भावना के साथ संगठन के अधीन लघु-पत्रिका को आगे बड़ा रहा है। लघु-पत्रिकाओं के प्रकाशन के सन्दर्भ में अधिकांशतः संगठनों के प्रयास व्यवहारिक स्तर पर सामूहिक ऊर्जा विकसित नहीं ही कर पाते हैं। इसलिए यदि ‘एक और अन्तरीप’ किसी संगठन विशेष के हाथों में जाकर आगे नहीं बढ़ पायी तो इस तथ्य को उस संगठन विशेष में सामूहिक ऊर्जा के अभाव के रूप में ही स्वीकार करना चाहिए और भविष्य में ‘एक और अन्तरीप’ के प्रकाशन से जुड़े लोग इसे दोहराने से बचें, यही उचित है। वैसे भी यह युगीन सत्य है कि कोई भी संगठन, चाहे वह सामाजिक हो, सांस्कृतिक हो, राजनैतिक हो, बहुधा किसी व्यक्ति या व्यवस्था विशेष के आभा मंडल के इर्द-गिर्द ही सफल हो पाता है। सामूहिक सांगठनिक आभा सामान्यतः दीर्घकालिक प्रभाव सिद्ध नहीं ही कर पाती है।
   रचनाओं का स्तर पिछले तीनों अंको में अच्छा है। एक कवि विशेष की रचनाधर्मिता के मूल्यांकन पर एक आलेख और उसकी कुछ कविताओं को एक साथ पटल पर रखने से निश्चय ही पाठकों को उस रचनाकार को ठीक से समझने का अवसर मुहैया कराता है और उस रचनाकार को उसके सृजन के लिए सम्मानित करने जैसा भी लगता है।
    दूसरे अंक में साहित्यिक पत्रकारिता के सामाजिक सरोकारों पर डॉ. इन्द्र प्रकाश श्रीमाली जी की डॉ. हेतु भारद्वाज जी, प्रो. नन्द चतुर्वेदी जी, डॉ. नन्द किशोर शर्मा जी के साथ बातचीत काफी सार्थक है। तीसरे अंक में डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल जी के साथ डॉ. रजनीश भारद्वाज जी की बातचीत में जयपुर लिटरेचर फेस्टीवल पर कई सवालों के जवाब देते हुए डॉ. अग्रवाल जी ने कई नकारात्मक धारणाओं पर अपना सकारात्मक दृष्टिकोंण रखा है। हालांकि इसी अंक में जयपुर लिटरेचर फेस्टीवल पर श्री नवल किशोर शर्मा जी की रपट तथा सांस्कृतिक संदर्भों में इस तरह के फेस्टीवल के प्रभावों पर आलोचनात्मक दृष्टिकोंण के सन्दर्भ में देखा जाये, तो डॉ. अग्रवाल जी इस फेस्टीवल का पक्ष लेते दिखाई देते हैं। प्रश्न यह उठता है कि ऐसे फेस्टीवल की आलोचना का अन्तिम उद्देश्य क्या होना चाहिए, इन्हें रोकना या इनमें जरुरी सुधारों एवं साहित्य के देशीय एवं सामाजिक सरोकारों के सन्दर्भ में इनका रूपान्तरण? दूसरी बात साहित्य में ग्लैमर और साहित्यिक ग्लैमर जैसे मुद्दों पर क्या दृष्टिकोंण अपनाया जाये? क्या आधुनिक जमाने के युद्ध पुराने जमाने के हथियारों से लड़े जा सकते हैं? साहित्य के मूल उद्देश्यों और सरोकारों को हासिल करने के लिए समूचे साहित्यिक वातावरण को अद्यतन करना क्या जरूरी नहीं है, और यदि हां, तो कितना और कैसे? मुझे लगता है डॉ. अग्रवाल जी के दृष्टिकोंण को इस सन्दर्भ में आधार बनाया जा सकता है और इस दृष्टि से इस बातचीत को बेहद सार्थक माना जाना चाहिए।
    कई महत्वपूर्ण साहित्यकारों के साथ संघर्षरत रचनाकारों की अन्य रचनाएं भी अच्छी हैं। घोषित तौर पर पत्रिका द्विभाषी है, इसलिए एक-दो आलेख अंग्रेजी में भी दिये जा रहे हैं। ‘एक और अन्तरीप’ एक दिशाबद्ध और उद्देश्यपरक पत्रिका है। निश्चित रूप से साहित्य-पटल पर उसकी उपस्थिति जरूरी है। पुनर्प्रकाशन पर ‘एक और अन्तरीप’ का हार्दिक स्वागत एवं प्रेम कृष्ण शर्मा जी और उनकी पूरी टीम को बधाई।
      एक और अन्तरीप : साहित्यिक त्रैमासिकी। प्रधान सम्पादक : प्रेम कृष्ण शर्मा (मो. 09414055811)/सम्पादक द्वय :  डॉ. अजय अनुरागी (मो. 09468791896) एवं डॉ. रजनीश (मो. 09460762293)। सम्पादकीय पता : 1, न्यू कॉलोनी, झोटवाड़ा, पंखा, जयपुर-302012 (राज.)। ई मेल: anuragiajay11@gmail.com। मूल्य: रु. 25/-, वार्षिक सदस्यता: रु. 100/-।




दिवान मेरा : एक नियमित लघु-पत्रिका


 
    अहिन्दी भाषी क्षेत्रों से हिन्दी साहित्य की कोई भी पत्रिका जब नियमित रूप से प्रकाशित होती है, तो यह अपने-आप में एक उपलब्धि होती है। ‘दिवान मेरा’ एक ऐसी ही द्विमासिक लघु पत्रिका है, जो पिछले सात वर्षों से नियमित रूप से नागपुर शहर से प्रकाशित हो रही है। सभी विधाओं की रचनाओं को इसमें स्थान मिलता है। वैचारिक स्तर पर यह पत्रिका भी लघु-पत्रिकाओं के मध्य अपनी जिम्मेवारी समझती है और साहित्यिक यज्ञ में अपनी आहुति दे रही है। सामान्यतः रचनाओं का स्तर साधारण है, पर इन्हीं के मध्य कई अच्छी रचनाएं भी पढ़ने को मिलती हैं। आलेखों और कथा रचनाओं की तुलना में कविता पक्ष कमजोर है। लेखकगण यदि अपनी उत्कृष्ट रचनाएं उपलब्ध करवायें तो इस पत्रिका के रूप में उपलब्ध संसाधन का और भी  बेहतर उपयोग हो सकता है। महाराष्ट्र और आसपास के कई नए रचनाकारों को अपनी रचनाधर्मिता को रखने का एक प्रभावी मंच मिल रहा है, इसे मैं बेहद सकारात्मक मानता हूँ।
    भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना जी के आन्दोलन पर कुछ प्रश्न किए जाते रहे हैं। जैसा कि बहुधा होता है, निश्चित रूप से कुछ गलत लोगों और तौर-तरीकों की शिरकत भी इस आन्दोलन में हुई होगी, पर इससे आन्दोलन के उद्देश्य और प्रासंगिकता संदिग्ध नहीं हो जाती है। आज आम आदमी और शोषण के शिकार लोगों को यदि ताकत मिलती है, उनमें जागरूकता लाई जाती है, तो इसका समर्थन ही होना चाहिए। साहित्यिक जनों से ऐसे आन्दोलन पर प्रश्न करने की उम्मीद नहीं की जाती। हाँ, यदि ऐसे किसी आन्दोलन के कुछ खतरे दिखाई देते हैं, उसमें कुछ घुसपैठिये घुसपैठ करते दिखाई देते हैं, तो उनके प्रति आगाह करने में कोई हर्ज नहीं है। पर यह कार्य पूरी सावधानी के साथ किया जाये कि कहीं से ऐसे सद्प्रयास हतोत्साहित और आम आदमी की पक्षधरता के विरोधी और शोषक मजबूत न होने लगें। इस दृष्टि से दिसंबर 2011-जनवरी 2012 एवं फरवरी-मार्च 2012 अंकों में ‘एकान्त दर्पण’ स्तम्भ में नरेन्द्र परिहार जी को अपने लघु आलेख को संतुलित बनाना चाहिए था। नरेन्द्र जी एक अच्छे विचारक हैं, आम जन के पक्षधर हैं और निश्चय ही उनके उठाए कुछ प्रश्न महत्वपूर्ण हैं। मैं यह भी मानता हूँ कि जिन चीजों को उन्होंने आपत्तिजनक माना है, उनमें कई बातें वास्तव में आपत्तिजनक मानी जा सकती हैं, पर उनकी वजह से समूचा आन्दोलन औचित्यहीन भी नहीं हो सकता। आन्दोलन को पूरी तरह प्रायोजित कहना उचित नहीं। स्वतः स्फूर्ति का तत्व इस आन्दोलन में कहीं बड़ा था।  दूसरी बात ये बातें उन बातों के समक्ष बहुत छोटी हैं, जिनके खिलाफ अन्ना जी प्रेरित आन्दोलन की पृष्ठभूमि बनी है। मुझे नहीं लगता कि दुनियां का कोई भी जनांदोलन छोटी-मोटी गलतियों का शिकार न होता हो। हां यह अवश्य देखा जाना चाहिए कि कोई गलत उद्देश्य से आन्दोलन को हाईजैक न कर ले। इस सन्दर्भ में यह समझना भी जरूरी है कि जनता आन्दोलन के आधारीय मुद्दों से जुड़ी है, पर आन्दोलनकर्ताओं के साथ जनता ने राजनैतिक पक्षधरता नहीं दिखाई है, और यह बात आन्दोलन के संचालन से जुड़े लोग भी कहीं न कहीं महसूस कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में जनता के मन को समझना जरूरी है। जनता भ्रष्टाचार और शोषण के खिलाफ आवाज उठाने की ताकत चाहती है, पर इसके लिए किसी संगठन या पार्टी विशेष के हाथों खेलना उसे मंजूर नहीं है। जनता में आ रही इस परिपक्वता को उत्साहित किया जाना चाहिए। मुझे लगता है कि जब भी अन्ना जी या कोई और ईमानदारी से जनहित के मुद्दे उठायेगा, जनता के बीच एक स्वतःस्फूर्त चेतना दिखाई देगी।
     जहां तक संसद की मर्यादा के हनन का प्रश्न है, यह बात अन्ना जी की ओर से बार-बार स्पष्ट की जा चुकी है कि वे संसद के खिलाफ नहीं हैं, सांसदों के आचरण के खिलाफ हैं। और सांसदो का आचरण कितना गिर गया है, मुझे नहीं लगता इस पर कुछ सिद्ध करने की जरूरत है। यदि ऐसे गलत आचरण वाले सांसदों के खिलाफ बोलना गलत है, तो ऐसी गलती तो भ्रष्टाचार के विरुद्ध होने वाले हर आन्दोलन में स्वाभाविक रूप से होगी ही। जहां कहीं भी भाषागत अशिष्टता हुई है, उसे दोनों तरफ नियन्त्रित किया जाना चाहिए। जहां तक आन्दोलन के एक पार्टी विशेष के खिलाफ जाने की बात है, सो ऐसी खिलाफत तो राममनोहर लोहिया जी की मुहिम और जयप्रकाश नारायण जी के आन्दोलन में भी हुई थी। तो क्या वे भी गलत थे? राजनैतिक पार्टी के नाम पर कांग्रेस हो, बी.जे.पी. हो, या कोई अन्य पार्टी हो, गलत तो गलत ही है। हर पार्टी को अपनी गलतियों के लिए किसी न किसी रूप में जनाक्रोश सामना तो करना ही पड़ेगा। यदि कोई पार्टी अपने ही लोगों को भ्रष्टाचार में आरोपित होने पर जेल भेजती है, तो इतने मात्र से वह ईमानदार नहीं हो जाती है। सब जानते हैं कि ऐसा भी जनता, मीडिया और न्यायपालिका के दबाव में ही होता है। अन्यथा अपने लोगों को बचाने की कोशिशें और उनके काले कारनामों पर पर्दा डालने की कोशिशें कम नहीं होती हैं। अपितु इसके लिए तमाम पार्टियां और राजनैतिक नेतृत्व निचले दर्जे तक गिरने में भी शर्म महसूस नहीं करते। जिम्मेवारी की भावना को किस तरह से तार-तार किया जा रहा है, किसी से छुपा नहीं है। यदि ईमानदारी की भावना वास्तविक रही होती तो पिछले दिनों कई ऐसे काण्ड हुए हैं, जिनके बाद समूची केन्द्र सरकार को इस्तीफा दे देना चाहिए था। कई राज्यों में भी ऐसी स्थितियां आई हैं। जन-प्रतिनिधियों का सम्मान आज गिर रहा है, तो उसके लिए वे स्वयं जिम्मेवार हैं। और  यदि उन्हें अपना सम्मान पुनः पाना है तो अपने आचरण को स्वयं सुधारना होगा, अपनी प्रतिष्ठा के बारे में उन्हें स्वयं सोचना होगा। माननीय संसद को भी इस विषय में विचार करना चाहिए कि अपने प्रांगण की पवित्रता को कैसे स्थापित करे, कैसे अपने पवित्र प्रांगण में गलत आचरण वाले लोगों को आने से रोके। इस सन्दर्भ में लोकतन्त्र को पुनर्परिभाषित एवं पुनर्स्थापित करने की जरूरत है।
    ‘दिवान मेरा’ का अप्रैल-मई 2012 अंक महान विचारक राममनोहर लोहिया पर केन्द्रित है। इस विशेषांक के माध्यम से कई विषयों पर लोहिया जी के विचारों को सामने रखा गया है, वहीं उनके व्यक्तित्व और विचारों की प्रासंगिकता को भी उकेरा गया है। ‘स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी साहित्य में लोहिया चिन्तन’ आलेख में ओमप्रकाश शिव जी ने लोहिया जी के चिन्तन के हिन्दी साहित्य पर पड़े प्रभावों का विस्तार से विवेचन किया है। दरअसल लोहिया जी और उनके समय के अनेकों महान साहित्यकार युगीन आवश्यकताओं से जनित चिन्तन के हमराही थे। और एक दूसरे के विचारों का सम्मान-समर्थन करते थे। इस अंक की अपनी प्रासंगिकता है। निश्चित रूप से पाठकों ने इस अंक को मनोयोग से पढ़ा होगा।
     निश्चित रूप से ‘दिवान मेरा’ लघु-पत्रिकाओं के बीच लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है। सम्पादकीय टीम को सामग्री के प्रस्तुतीकरण को आकर्षक बनाने पर भी थोड़ा ध्यान देना चाहिए। महारष्ट्र के साथ-साथ पूरे देश में यह पत्रिका अपना स्थान बनाए, हार्दिक शुभकामनाएं। नरेन्द्र सिंह परिहार जी और उनकी पूरी टीम को बधाई।
    दिवान मेरा : साहित्यिक द्विमासिकी। मुख्य सम्पादक : नरेन्द्र सिंह परिहार/ प्रबन्ध सम्पादक : ओमप्रकाश शिव। सम्पादकीय पता : सी.-004, उत्कर्ष अनुराधा, सिविल लाइन, नागपुर-440001 (महा.)। मोबाइल: 09561775384/07875761187। ई मेल :  nksparihar@gmail.com। मूल्य: रु. 15/-, वार्षिक सदस्यता: रु. 90/-, द्विवार्षिक रु. 150/- तथा पंचवार्षिक रु. 400/- मात्र।

सोमवार, 27 फ़रवरी 2012

कुछ और महत्वपूर्ण पत्रिकाएँ/डॉ. उमेश महादोषी

अविराम का ब्लॉग :  वर्ष : १, अंक : ०६, फरवरी  २०१२  



{अविराम के ब्लाग के इस  स्तम्भ में अब तक हमने क्रमश:  'असिक्नी', 'प्रेरणा (समकालीन लेखन के लिए)', कथा संसार, संकेत, समकालीन अभिव्यक्ति,  हम सब साथ साथ, आरोह अवरोह , लघुकथा अभिव्यक्ति, हरिगंधा व मोमदीप साहित्यिक पत्रिकाओं का परिचय करवाया था।  इस  अंक में  हम एक  और  पत्रिका 'सरस्वती सुमन' पर अपनी परिचयात्मक टिप्पणी दे रहे हैं।  जैसे-जैसे सम्भव होगा हम अन्य  लघु-पत्रिकाओं, जिनके  कम से कम दो अंक हमें पढ़ने को मिल चुके होंगे, का परिचय पाठकों से करवायेंगे। पाठकों से अनुरोध है इन पत्रिकाओं को मंगवाकर पढें और पारस्परिक सहयोग करें। पत्रिकाओं को स्तरीय रचनाएँ ही भेजें,  इससे पत्रिकाओं का स्तर तो बढ़ता ही है, रचनाकारों के रूप में आपका अपना सकारात्मक प्रभाव भी पाठकों पर पड़ता है।}


सरस्वती सुमन :  एक अग्रणी पत्रिका


   सरस्वती सुमन के पिछले तीन अंक देखने को मिले हैं, जिनमें दो विशेषांक है, क्रमशः लघुकथा  एवं मुक्तक-रुबाई-क़त्आ पर तथा एक सामान्य अंक है। दरअसल सरस्वती सुमन की विशेषांकों की एक समृद्ध परम्परा है, जिसके माध्यम से विभिन्न विधाओं एवं विषयों पर वैचारिक एवं मार्गदर्शक साहित्य का दस्तावेज प्रस्तुत करती है यह पत्रिका। बड़े आयोजनों में कुछ कमियों का रह जाना स्वाभाविक होता है, पर महत्वपूर्ण यह होता है कि आप किस मन्तव्य को लेकर चल रहे हैं। सरस्वती सुमन का मन्तव्य बेहद साफ और सकारात्मक है, इसमें कोई दो राय नहीं होनी चाहिए।
   लघुकथा विशेषांक में 126 लघुकथाकारों की लघुकथाओं एवं दस लघुकथा बिषयक आलेखों को स्थान दिया गया है। अधिसंख्यक लघुकथाएं प्रभावित करती हैं, पर कुछ लघुकथाएं ऐसी भी हैं, जिनके कथ्य अस्वाभाविक अथवा लीक पीटते से लगते हैं। लघुकथा यदि पीछे की ओर मुड़कर देखे तो उसका मन्तव्य गलतियों को सुधारना होना चाहिए, न कि उनका अनुकरण करना। यह बात हर लघुकथाकार को समझनी होगी। विशेषांक के लिए रचनाएं भेजते समय हर रचनाकार के जेहन में यह बात साफ होनी चाहिए कि आप एक दस्तावेज का हिस्सा बनने जा रहे हैं, इसलिए अपनी श्रेष्ठ रचनाएं ही दें। पर बहुत सारे रचनाकार इसका ध्यान नहीं रखते, सम्पादक को जो मिलता है, उसी में से अपेक्षाकृत अच्छे का चयन करना उसकी विवशता बन जाती है। सर्वश्रेष्ठ की प्रस्तुति का लक्ष्य पूरा नहीं हो पाता। इस तरह की सीमाओं और आलेखों को लेकर सामने आये तथ्याधारित कुछ विवादों के बावजूद विशेषांक की अपनी उपयोगिता है। अतिथि सम्पादक श्री कृष्ण कुमार यादव जो भी दे पाये हैं, उसके लिए उनका मनोबल बढ़ाना ही अभीष्ट होगा। अभी भी लघुकथा को एक लम्बी दूरी तय करनी है, इस लिहाज से लघुकथा से जुड़े लोग विवादों का कारण न बनकर महत्वपूर्ण कार्या में निर्विवाद सहयोगी बनें, तो इस तरह के विशेषांकों में होने वाला श्रम एवं निवेश कहीं अधिक सार्थक हो सकेगा।
   दूसरा विशेषांक मुक्तक-रुबाई-क़त्आ पर है। इस विशेषांक का संपादन अपने अध्ययन-मनन का भरपूर उपयोग करते हुए उत्साही एवं समर्पित कवि-समीक्षक श्री जितेन्द्र जौहर ने किया है। दरअसल मुक्तक-रुबाई-क़त्आ के वैचारिक पक्ष पर काम बहुत अधिक नहीं हुआ है और बहुत सारी भ्रान्तियां भी रही हैं, जिनका यथासम्भव समाधान इस विशेषांक के माध्यम से करने का प्रयास किया गया है, इसलिए इसका महत्व और भी अधिक हो जाता है। दूसरी ओर मुक्तक और रुबाई में कुछ अन्य विधाओं/छन्दों, यथा- हाइकु, दोहा आदि के प्रयोग की सम्भावनाओं को भी टटोला गया है। यद्यपि ये प्रयोग मूल छन्दो की सीमाओं के दृष्टिगत बहुत अधिक सफल नहीं कहे जा सकते, फिर भी सम्भावनाओं की तलाश के लिए इस तरह के प्रयोग स्वागतेय हैं। एक और खास बात यह है कि इस विशेषांक में पुराने लब्ध-प्रतिष्ठित कवियों के साहित्य में भी मुक्तक-रुबाई की परम्परा और तकनीक को खोजने का सार्थक श्रम किया गया है। देश की विभिन्न भाषा-बोलियों में लिखे गये मुक्तकों एवं मूल भारतीय रचनाकारों के साथ अनिवासी भारतीयों को भी एक प्लेटफार्म पर प्रस्तुत करने से बिशेषांक का आकर्षण बढ़ गया है। रुबाइयों को मुक्तक से अलग रखकर एवं कुछ आलेखों एवं अतिथि सम्पादकीय के माध्यम से रूबाई एवं मुक्तक के बीच के अन्तर को स्पष्ट किया गया है। रुबाई के औज़ानों पर भी पर्याप्त जानकारी दी गई है। इस विधा के नए रचनाकारों को इससे काफी लाभ होगा और उनके लिए यह विशेषांक एक स्कूल जैसा काम करेगा। निश्चित रूप से यह विशेषांक एक ऐतिहासिक दस्तावेज प्रमाणित होगा। जौहर जी ने इस अंक के माध्यम से जितना कुछ दिया है, उसके लिए वह पूरे अंक पाने के हकदार हैं।
   सामान्य अंक में भी सरस्वती सुमन ने अधिकांशतः अच्छी सामग्री प्रस्तुत की है। रचनाओं की प्रस्तुति आकर्षक है। रेखाचित्रों का पर्याप्त उपयोग आकर्षण को और भी बढ़ा रहा है। तीनो अंकों के आवरण सुप्रसिद्ध चित्रकार श्री संदीप राशिनकर जी ने तैयार किए हैं। निश्चित रूप से सरस्वती सुमन लघु पत्रिकाओं में अग्रणी भूमिका निभा रही है। अपने हर विशेषांक के साथ एक बड़े साहित्यिक कार्यक्रम का हिस्सा बनकर सरस्वती सुमन के सम्पादन-प्रकाशन परिवार के लोग साहित्यिक हलचल को जीवन्त बनाये रखने का भी दोहरा कार्य कर रहे हैं। साधुवाद!


सरस्वती सुमन : त्रैमासिक साहित्यिक पत्रिका। प्रधान सम्पादक : डॉ. आनन्दसुमन सिंह, सम्पादक: नेहा क्रान्ति सिंह व कुँवर विक्रमादित्य सिंह। सम्पादकीय सम्पर्क: 1, छिब्बर मार्ग (आर्यनगर), देहरदून-248001, उत्तराखण्ड।

बुधवार, 28 दिसंबर 2011

कुछ और महत्वपूर्ण पत्रिकाएँ/डॉ. उमेश महादोषी



अविराम का ब्लॉग :  वर्ष : १, अंक : ०४, दिसंबर २०११ 




{अविराम के ब्लाग के इस  स्तम्भ में अब तक हमने क्रमश:  'असिक्नी', 'प्रेरणा (समकालीन लेखन के लिए)', कथा संसार, संकेत, समकालीन अभिव्यक्ति,  हम सब साथ साथ, आरोह अवरोह तथा लघुकथा अभिव्यक्ति साहित्यिक पत्रिकाओं का परिचय करवाया था।  इस  अंक में  हम दो और  पत्रिकाओं पर अपनी परिचयात्मक टिप्पणी दे रहे हैं।  जैसे-जैसे सम्भव होगा हम अन्य  लघु-पत्रिकाओं, जिनके  कम से कम दो अंक हमें पढ़ने को मिल चुके होंगे, का परिचय पाठकों से करवायेंगे। पाठकों से अनुरोध है इन पत्रिकाओं को मंगवाकर पढें और पारस्परिक सहयोग करें। पत्रिकाओं को स्तरीय रचनाएँ ही भेजें,  इससे पत्रिकाओं का स्तर तो बढ़ता ही है, रचनाकारों के रूप में आपका अपना सकारात्मक प्रभाव भी पाठकों पर पड़ता है।}



हरिगन्धा का ऐतिहासिक लघुकथा विशेषांक

    हरिगन्धा एक महत्वपूर्ण व चर्चित साहित्यिक पत्रिका है। महत्वपूर्ण साहित्य को सामने लाने के साथ ही हरियाणा के बहुत से रचनाकारों को एक मंच प्रदान करने एवं उन्हें पहचान दिलाने में भी हरियाणा साहित्य अकादमी की इस पत्रिका की भूमिका रही है। हरियाणा के सामाजिक एवं लोक जीवन के यथार्थ के साथ उसके सांस्कृतिक पक्ष को उजागर करने का काम भी हरिगन्धा बखूबी कर रही है। हरियाणा सिर्फ जाटों-किसानों की ही नहीं साहित्यकारों की भी ज़मीन है, इसे इस प्रदेश की साहित्यिक-सांस्कृतिक सुगन्ध की वाहिका बनकर राष्ट्रीय स्तर पर साहित्यिक क्षेत्र में हरिगन्धा की उड़ान में भी महसूस किया जा सकता है। इस बात का पुख्ता प्रमाण बनकर आया है गत दिसम्बर 2010-जनवरी 2011 में प्रकाशित इस पत्रिका का लघुकथा विशेषांक। लघुकथा पर इस वृहत विशेषांक के लिए अकादमी और हरिगन्धा की टीम प्रशंसा की पात्र है।
    सबसे पहले तो इस विशेषांक के लिए अकादमी ने दो सामान्य अंको का स्थान उपलब्ध करवाकर लघुकथा के विस्तार को समझने की कोशिश की है। दूसरी बात इसके सम्पादन का दायित्व अतिथि सम्पादक के रूप में अग्रणी लघुकथाकार एवं लघुकथा समालोचक-दिशावाहक डॉ. अशोक भाटिया को सौंपकर लघुकथा की गम्भीरता एवं बारीकियों के प्रति जिम्मेदारी का अहसास भी अकादमी ने प्रदर्शित किया है। इसमें कोई दो राय नहीं कि डॉ. भाटिया के समान ही अग्रणी एवं महत्वपूर्ण कुछ और भी लघुकथाकार हरियाणा की जमीन ने दिये हैं, पर शायद कुछेक चीजें इस विशेषांक में ऐसी हैं, जिनका श्रेय डॉ. भाटिया जी को दिया जा सकता हैे। उन्होंने अपने पूर्व के लघुकथा सम्बन्धी विशिष्ट कार्यों और अनुभवों का उपयोग करते हुए ‘लघुकथा के आलोक स्तम्भ’ के अन्तर्गत विश्व की विभिन्न भाषाओं के सुप्रसिद्ध साहित्यकारों की कथा रचनाओं में लघुकथा की जड़ें खोजने एवं ‘लघुकथा: हिन्दी की विरासत’ के माध्यम से हिन्दी के महान कथाकारों के साहित्य में लघुकथा की उपस्थिति को सामने लाकर लघुकथा को कथा साहित्य की महान विरासत से सम्बद्ध करने की कोशिश की है। यद्यपि समय-समय पर इस तरह के कार्य होते रहे हैं, पर भाटिया जी ने इस कार्य को सुनियोजित व समेकित रूप से एवं यथोचित तरजीह दी है। इसके पीछे लघुकथा के बारे में भ्रान्तियों के निराकरण का उददे्श्य हो सकता है। शार्टकट, भाग-दौड़ की जिन्दगी का परिणाम, फिलर वगैरह जैसी धारणायें कहीं न कहीं लघुकथा की स्वाभाविक विधा के रूप में उत्पत्ति एवं विकास को प्रश्नांकित करती रही हैं। मुझे लगता है कि कृत्रिम चीजें साहित्य और संस्कृति में बहुत बड़ा मुकाम हासिल नहीं कर सकती और जो चीजें बड़ा मुकाम हासिल कर लें, उनकी उत्पत्ति और विकास के पीछे कहीं कोई स्वाभाविकता नहीं होगी, ऐसा मानना सर्वथा अनुचित होगा। काल और काल-जनित परिस्थितियों का प्रभाव साहित्य पर पड़ता है, पर उसका सम्बन्ध लोगों की रुचियों (यहाँ रूचि से तात्पर्य पाठकीय रूचि से नहीं, जीवन की जरूरतों और जीने के तौर-तरीकों से है) और जीवन में आये यथार्थपरक एवं सामाजिक-सांस्कृतिक बदलावों से होता है। समय नहीं है इसलिए लोग कहानी या उपन्यास न पढ़कर लघुकथा पढ़ेंगे, इसलिए लघुकथा लिखी जा रही है, ऐसी धारणाएँ भ्रम से ज्यादा कुछ नहीं हैं। जिनके पास समय नहीं है, वे लघुकथा भी क्यों पढ़ेंगे? अविराम में लघुकथाएँ पढ़कर एक परिचित (सामान्य पाठक) की प्रतिक्रिया थी- ‘भाई साहब आप बड़ी कहानी क्यों नहीं छापते? ये छोटी-छोटी कहानियाँ (लघुकथाओं के लिए उनका सम्बोधन) भी अच्छी हैं, पर हमें तो बड़ी कहानी पढ़ना ज्यादा अच्छा लगता है।’ आज लघुकथा जिस रूप में सामने खड़ी है, वह जीवन में आये यथार्थपरक एवं सामाजिक-सांस्कृतिक बदलावों के कारण खड़ी है। लघुकथा ने कहीं से भी कहानी और उपन्यास को प्रतिस्थापित नहीं किया है, बल्कि उनकी पूरक बनकर सामने आई है। लघुकथा वह काम कर रही है, जो कहानी और उपन्यास से छूट गया है। संयोगवश ऐसे कार्य का आज जीवन में आये यथार्थपरक एवं सामाजिक-सांस्कृतिक बदलावों के कारण विस्तार होता जा रहा है और लघुकथा आगे बढ़ रही है। इसलिए लघुकथा की जड़ें और उसकी उपस्थिति हमें अपने बड़ों के कथा-कर्म में भी दिखाई दे रही है (और उसे हमारे लघुकथा के ध्वजवाहक पहचान रहे हैं) तो यह लघुकथा के स्वाभाविक विकास को दर्शाती है। मेरा मानना है कि साहित्य इसलिए पढ़ा जाता है कि वह जीवन के उद्देश्यों को हासिल करने के लिए लिखा जा रहा है, वह जीवन का मर्म लेकर सामने आ रहा है; इसलिए नहीं लिखा जाता कि किसी को उसे पढ़ना है।
   इस विशेषांक के आलेख खण्ड में कई वरिष्ठ कई महत्वपूर्ण आलेखों के मध्य बलराम अग्रवाल का समकालीन लघुकथा का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण एवं डॉ. पुरुषोत्तम दुबे का महत्वपूर्ण बारीकियों से भरा लघुकथा में शिल्प प्रयोंगों का विश्लेषण लघुकथा लेखन में, विशेषतः नए लेखकों को गुणवत्ता का दृष्टि से मार्गदर्शन करेगा।
   विशेषांक के लिए अधिकांश लेखकों ने अच्छी लघुकथाएँ उपलब्ध करवाई हैं और अतिथि सम्पादक ने यथाशक्ति सावधान होकर चयन किया है। अधिकांशतः बेहद प्रभावशाली लघुकथाएँ हैं। फिर भी कहीं कोई छोटी-मोटी चूक दिखाई देती है, तो बड़े आयोजन में इसे स्वाभाविक रूप से लेना ही ठीक रहेगा।  कोई कार्य हमेशा सम्पूर्णता प्राप्त नहीं कर पाता। महत्वपूर्ण यह होता है कि सम्पूर्णता तक जाने की कोशिश दिखाई दे, जो हरिगंधा में दिखती है। हरियाणा साहित्य अकादमी, पत्रिका की प्रधान सम्पादक डॉ. मुक्ता, सम्पादक नीलम सिंगला और उनकी टीम के साथ डॉ. अशोक भाटिया इस महत्वपूर्ण कार्य के लिए बधाई के पात्र हैं ही, हरिगन्धा हरियाणा की साहित्यिक-सांस्कृतिक सुगन्ध की वाहिका बनी रहे, शुभकामनाएँ।

हरिगंधा : साहित्यिक मासिकी। प्र. सम्पादक :  डॉ. मुक्ता/सम्पादक : नीलम सिंगला/लघुकथा विशेषांक के अतिथि संपादक : डॉ. अशोक भाटिया। प्रकाशक एवं सम्पर्क : हरियाणा साहित्य अकादमी, अकादमी भवन, पी-16, सेक्टर-14, पंचकुला-134113(हरियाणा) दूरभाष : ०१७२-२५६५५२१ / २५८१८०७। वार्षिक चन्दा : रु. 150/-, संयुक्तांक/विशेषांक का मूल : रु. 30/- 


मोमदीप : एक सम्भावनापूर्ण लघु पत्रिका

    मोमदीप में कुछ वरिष्ठों के साथ अधिकांशतः  नए रचनाकारों को स्थान मिल रहा है। पिछले जिन तीन अंकों को हमने देखा है, उनमें कई प्रभावशाली रचनाएँ भी हैं पर अधिकांश रचनाओं को देखकर ऐसा लगता है साहित्य के प्रवेश द्वार पर आये लोगों का स्वागत कर रही है यह लघु पत्रिका। यह बात अच्छी भी है, नए लोग जुड़ेंगे, तभी साहित्य आगे बढ़ेगा। अधिकाधिक लोगों को साहित्य से जोड़ने की मुहिम में मोमदीप का शामिल होना शुभ है। इसी के साथ नए लोगों का साहित्यिक स्तर की दृष्टि से मार्गदर्शन भी जरूरी है। मोमदीप के सम्पादन से वरिष्ठ लोग जुड़े हैं, जो नए रचनाकारों का सम्पादकीय हस्तक्षेप से मार्गदर्शन कर सकते हैं। यह कार्य किया जाना चाहिए। नए लागों में कई मित्र लेखनेतर गतिविधियों में पर्याप्त सक्रियता के चलते प्रसिद्धि पा जाते हैं, पर लेखन के स्तर की दृष्टि से इन मित्रों को जिस परिश्रम की जरूरत होती है, उसे भी समझना चाहिए (आज के रचनाकार के लिए लेखनेतर साहित्यिक गतिविधियों में सक्रियता और लेखन व उसके स्तर के मध्य संतुलन बेहद जरूरी है)। रचनाओं की प्रस्तुति और चयन में थोड़ा सा ध्यान देने पर पत्रिका का आकर्षण काफी अधिक बढ़ जायेगा। रचनाकारों को भी अपनी रचनाएँ मोमदीप सहित तमाम लघु पत्रिकाओं को भेजने से पूर्व उनकी स्वयं समीक्षा भी करनी चाहिए। दूसरी ओर चर्चित एवं वरिष्ठ रचनाकारों को कुछ अच्छी रचनाएँ पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध करवाकर पत्रिका की उपस्थिति को साहित्य के लिए उपयोगी बनाने में योगदान करना चाहिए। कुछ वरिष्ठ रचनाकारों ने अच्छी रचनाएँ दी भी हैं। संतुलन बनाकर ही सही दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। 60 जमा 4 यानी 64 पृष्ठ के साथ एक साहित्यिक लघु पत्रिका का नियमित प्रकाशन साहित्यिक संसाधन की उपलब्धता की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण घटना होती है, इस बात को सभी लोगों को समझने की जरूरत है।
    विधागत दृष्टि से मोमदीप में दोहा एवं ग़ज़ल रचनाएँ ही प्रभाव छोड़ पा रही हैं। फिलहाल मोमदीप के गीत एवं लघुकथाएँ अपेक्षानुरूप नहीं लगतीं। नई कविता एवं क्षणिका जैसी समकालीन विधाओं को स्थान ही नहीं दिया गया है, कम से कम इन तीन अंकों में। शिक्षा, भ्रष्टाचार एवं जन सेवकों पर प्रहार करते सम्पादकीय आलेखों में डॉ. गार्गीशरण मिश्र ‘मराल’ जी की चिन्ताएँ हम सबकी हैं। आचार्य भगवत दुबे जी ने समीक्षाएँ अच्छी लिखी हैं। प्रूफ की गलतियाँ, खासकर आठवें अंक में काफी ज्यादा हैं। मोमदीप एक सम्भावनापूर्ण लघु पत्रिका है, उम्मीद है आने वाले समय में साहित्य के प्रचार-प्रसार में यह महत्वपूर्ण भूमिका निभायेगी।

मोमदीप :  साहित्य-शिक्षा-संस्कृति को समर्पित हिन्दी त्रैमासिक पत्रिका। सम्पादक :  डॉ. गार्गीशरण मिश्र ‘मराल’/प्रबन्ध सम्पादक :  आचार्य भगवत दुबे। सम्पर्क : 1436-बी, सरस्वती कॉलोनी, चेरीताल, जबलपुर-482002 (म.प्र.) दूरभाष: 2340036/मोबाइल: 09425899232। मूल्य: एक प्रति: रु. 10/-, वार्षिक: रु. 40/- एवं आजीवन: रु. 500/- मात्र।

मंगलवार, 22 नवंबर 2011

कुछ और महत्वपूर्ण पत्रिकाएँ


{अविराम के ब्लाग के इस  स्तम्भ में अब तक हमने क्रमश:  'असिक्नी', 'प्रेरणा (समकालीन लेखन के लिए)', कथा संसार, संकेत, समकालीन अभिव्यक्ति तथा हम सब साथ साथ साहित्यिक पत्रिकाओं का परिचय करवाया था।  इस  अंक में  हम दो और  पत्रिकाओं पर अपनी परिचयात्मक टिप्पणी दे रहे हैं।  जैसे-जैसे सम्भव होगा हम अन्य  लघु-पत्रिकाओं, जिनके  कम से कम दो अंक हमें पढ़ने को मिल चुके होंगे, का परिचय पाठकों से करवायेंगे। पाठकों से अनुरोध है इन पत्रिकाओं को मंगवाकर पढें और पारस्परिक सहयोग करें। पत्रिकाओं को स्तरीय रचनाएँ ही भेजें,  इससे पत्रिकाओं का स्तर तो बढ़ता ही है, रचनाकारों का अपना सकारात्मक प्रभाव भी पाठकों पर पड़ता है।}

आरोह अवरोह : जिसके अन्तस में है साहित्य का सरोवर

   आरोह अवरोह के मुखपृष्ठ को देखते ही किसी सामाजिक-राजनैतिक व्यवसायिक पत्रिका का आभास होता है, पर इसकी पुष्टि के लिए अन्दर के पृष्ठों में उतनी सामग्री नहीं मिलती, जितनी होनी चाहिए। पत्रिका का अन्तस हमें एक समृद्ध साहित्यिक लघु पत्रिका के दर्शन ही कराता है। सम्पादकीय सामाजिक-राजनैतिक, फिल्म और साहित्य के बीच संतुलन साधता प्रतीत होता है। ‘वैचारिक भूमि’ के अन्तर्गत कुछ आलेख, सांस्कृतिक रिपोर्टें, फिल्मों पर आधारित आलेख, राशिफल आदि भी इसी नीति पर मुहर लगाते दिखाई देते हैं। लेकिन अन्दर के पृष्ठों में ‘गन्धवीथी’ के अन्तर्गत पर्याप्त संख्या में कविता, गीत-नवगीत, ग़ज़ल, हाइकु, आदि विविध काव्य रचनाओं एवं ‘बरगद की छांव’ में कहानी एवं लघुकथाओं की प्रस्तुति पत्रिका के अन्तस को पूरी तरह साहित्यमय बना देती है। पत्रिका को मासिक स्तर पर दीर्घकाल तक निकालने और अधिकाधिक पाठकों तक पहुँचाने की इच्छा की दृष्टि से यह एक सन्तुलित नीति हो सकती है। इस नीति के तहत मिले पाठकों को अच्छा और पर्याप्त साहित्य उपलब्ध करवाने को साहित्य के प्रचार-प्रसार की एक अलग दृष्टि माना जा सकता है। वर्ष 2011 के जून एवं अगस्त दो अंक हमने देखे हैं, दोनों अंक उपरोक्त नीति की पुष्टि करते हैं। जहाँ तक आरोह अवरोह की साहित्यिक रचनाओं का प्रश्न है, अधिकांश गीत-नवगीत एवं कई ग़ज़लें प्रभावशाली हैं। कविताओं में चेतना वर्मा (जून अंक) प्रभाव छोड़ने में सफल हैं। हाइकु दोनों ही अंकों में बहुत प्रभावशाली नहीं कहे जा सकते। कथा रचनाएँ (लघुकथा और कहानियों) में अधिसंख्यक सफल हैं। वैचारिक दृष्टि से
अधिकांश रचनाएँ समकालीन मानवीय-जीवन के विभिन्न पक्षों पर बखूबी ध्यान आकर्षित करती हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि साहित्यिक रचनाओं को संख्या और गुणवत्ता- दोनों ही दृष्टि से पर्याप्त महत्व दिया गया है। सम्पादक डॉ. शंकर प्रसाद जी का यह प्रयास निश्चय ही उत्साहजनक है। उनकी टीम में साहित्यिक परामर्शी के तौर पर वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. सतीशराज पुष्करणा की उपस्थिति पत्रिका के साहित्यिक योगदान को सही दिशा में ले जाने में सहायक होगी। उम्मीद है आरोह अवरोह अपने पाठको को अपने अन्तस के साहित्यिक सरोवर में स्नान करने के लिए सफलतापूर्वक आकर्षित करती रहेगी।
आरोह अवरोह :  कला, साहित्य, संस्कृति और सामाजिक सरोकार की मासिक पत्रिका। सम्पादक : डॉ. शंकर प्रसाद सम्पादकीय कार्यालय : 306, महादेवी अपार्टमेंट, काशीनाथ लेन, पूर्वी लोहानीपुर, पटना-800003 (बिहार) दूरभाष : ०९८३५०५५६२६६/०९३३४१४३३६३। ई मेल : arrohavroh@rediffmail.com ।  मूल्य : रु. 15/- प्रति एक प्रति। पृष्ठ : 64।



लघुकथा अभिव्यक्ति : लघुकथा की पूर्ण लघु पत्रिका
लघुकथा के विकास में कई प्रमुख पत्रिकाओं का विशेष योगदान रहा है, इनमें कुछ पूर्णतः लघुकथा को समर्पित पत्रिकाएँ भी रही हैं। हिन्दी में आघात/लघु आघात, मिनीयुग, जनगाथा/वर्तमान जनगाथा और पंजाबी में ‘मिन्नी’ आदि की भूमिका को भुलाया नहीं जा सकता। पंजाबी में ‘मिन्नी’ और इन्टरनेट पर हिन्दी में वेब पत्रिका ‘लघुकथा डाट काम’ आज भी लघुकथा की पहचान बनी हुई हैं। सुपरिचित लघुकथाकार श्री मो. मुइनुद्दीन ‘अतहर’ जी ने ‘लघुकथा अभिव्यक्ति’ के माध्यम से इसी समृद्ध परम्परा से जुड़ने का प्रयास किया है। वर्तमान में पूर्णतः लघुकथा को लेकर चलने वाली हिन्दी में सम्भवतः यह अकेली मुद्रित लघु पत्रिका है। इस दृष्टि से ‘लघुकथा अभिव्यक्ति’ का लघुकथा को आगे बढ़ाने में अच्छा उपयोग किया जा सकता है। लेकिन इसके दो अंको (अप्रैल-जून 2010 एवं जुलाई-सितम्बर्र 2011) को देखने के बाद ऐसा नहीं लगता कि इस पत्रिका की मौजूदगी का लघुकथा से जुड़े लोग जितना उपयोग करना चाहिए, उतना कर पा रहे हैं। प्रत्येक अंक में लगभग चालीस तक लघुकथाकारों की लघुकथाएँ तो पढ़ने को मिल जाती हैं, पर लघुकथा के विचार पक्ष पर ‘लघुकथा अभिव्यक्ति’ का उपयोग नहीं हो पा रहा है। लघुकथाओं को देखकर भी लगता है, सभी लघुकथाकार अपनी श्रेष्ठ या प्रतिनिधि लघुकथाएँ नहीं दे रहे हैं। एक विधागत समर्पित पत्रिका के प्रत्येक अंक में चालीस में से एक तिहाई रचनाकार भी अपना प्रभाव छोड़ पाने में समर्थ न हों तो इसे क्या कहा जाये? अतहर साहब स्वयं वरिष्ठ लघुकथाकार हैं और लघुकथा की अच्छी समझ रखते हैं। लघुकथा के लिए हिन्दी में कम से कम एक पूर्ण पत्रिका की जरूरत भी है, ऐसे में वरिष्ठ लघुकथाकारों का दायित्व बन जाता है कि वे इस लघु पत्रिका को पर्याप्त रचनात्मक सहयोग देकर स्थापित करने में रुचि लें। आज लघुकथा बहुत आगे आ चुकी है, ऐसे में एक समर्पित पत्रिका की मौजूदगी से अपेक्षाएँ कुछ अधिक की ही होगी। यदि पत्रिका इन अपेक्षाओं को नहीं समझेगी या उन्हें पूरा करने की दिशा में कदम नहीं बढ़ायेगी, तो समय से बहुत पीछे होगी। अतहर जी को इस सम्बन्ध में सोचना होगा कि पत्रिका को ‘लघुकथा की पत्रिका’ से ‘लघुकथा की समर्पित पत्रिका’ बनाने के लिए वह और क्या-क्या कर सकते हैं!
   लघुकथा जैसी महत्वपूर्ण विधा के लिए भावनात्मक दृष्टि से ‘लघुकथा अभिव्यक्ति’ और उसके सम्पादक महोदय के प्रयासों का स्वागत होना चाहिए, क्योंकि पर्याप्त रचनात्मक सहयोग उपलब्ध होने पर यह लघुकथा की जरूरत को पूरा कर सकती है। उम्मीद है लघुकथाकार मित्र इस कीमती संसाधन का बेहतर उपयोग करने के बारे में अवश्य सोचेंगे।
   लघुकथा अभिव्यक्ति  :  लघुकथा की लघु पत्रिका। सम्पादक :  मोह. मुइनुद्दीन ‘अतहर’। सम्पादकीय पता : 1308, अजीजगंज पसियाना, शास्त्री वार्ड, आर.के. टेण्ट हाउस, जबलपुर-2 (म.प्र.) फोन : 0761-2449830, मो. 09425860708। प्रष्ट : ४४। मूल्य : रु. 15/-, आजीवन सदस्यता : रु. 1000/-

शुक्रवार, 21 अक्टूबर 2011

कुछ और महत्वपूर्ण पत्रिकाएँ

{अविराम के ब्लाग के इस  स्तम्भ में पिछले  अंक में हमने दो महत्वपूर्ण साहित्यिक पत्रिकाओं क्रमश:  'असिक्नी' और 'प्रेरणा (समकालीन लेखन के लिए)' का परिचय करवाया था।  इस  अंक में  हम चार और  पत्रिकाओं पर अपनी परिचयात्मक टिप्पणी दे रहे हैं।  जैसे-जैसे सम्भव होगा हम अन्य  लघु-पत्रिकाओं, जिनके  कम से कम दो अंक हमें पढ़ने को मिल चुके होंगे, का परिचय पाठकों से करवायेंगे। पाठकों से अनुरोध है इन पत्रिकाओं को मंगवाकर पढें और पारस्परिक सहयोग करें। पत्रिकाओं को स्तरीय रचनाएँ ही भेजें,  इससे पत्रिकाओं का स्तर तो बढ़ता ही है, रचनाकारों का अपना सकारात्मक प्रभाव भी पाठकों पर पड़ता है।}
 

कथा संसार :  कुछ नया करने की चाहत
   कथा संसार हिन्दी सहित्य की प्रमुख और चर्चित लघु पत्रिकाओं में से एक है। पिछले दस वर्षों में कथा संसार के इक्कीस अंक आये हैं । स्पष्ट है निरन्तरता वाधित हुई है, फिर भी कथा संसार की उपस्थिति साहित्य से जुड़े तमाम लोगों ने लगातार महसूस की है, इसका कारण निश्चित रूप से सम्पादक सुरंजन द्वारा कदम-कदम पर संघर्षों के बावजूद हमेशा अपनी क्षमताओं से अधिक और हर बार कुछ न कुछ नया और जरूरी देने की कोशिश एवं इच्छाशक्ति ही है। कथा संसार का हर अंक एक विशेषांक होता है और नये-पुराने बहुत सारे रचनाकारों की उपस्थिति के साथ तमाम बड़ी पत्रिकाओं के बराबर खड़ी नज़र आती है यह पत्रिका। खास बात यह है कि अपने अधिकांश रचनाकार मित्रों के साथ सम्पादक सुरंजन जी के सम्बन्धों की गहराई प्रत्येक अंक में महसूस की जा सकती है, साथ ही पत्रिका की रचनात्मकता और वैचारिकता पर सुरंजन जी के व्यक्तित्व के खुलेपन और स्पष्टवादिता का प्रभाव भी।
   कथा संसार के पिछले दो अंक क्रमशः जनक छन्द और पुरुष व्यथा पर केन्द्रित रहे हैं। जनक छन्द एक नया छन्द है, तदापि इसके प्रणेता डॉ. ओम्प्रकाश भाटिया ‘अराज’ जी के व्यक्तित्व एवं जनक छन्द के लिए उनके तमाम प्रयासों, जनक छन्द की पृष्ठ-भूमि एवं विकास यात्रा और उसकी रचना-प्रक्रिया व रचनात्मकता के तमाम पक्षों आदि को विस्तार से आलेखों, साक्षात्कार एवं प्रतिनिधि जनक छन्द रचनाओं के माध्यम से सामने रखा गया है जनक छन्द विशेषांक (अंक 20) में। जनक छन्द से जुड़े लगभग सभी रचनाकारों की रचनाओं को विशेषांक में स्थान दिया गया है। विशेषांक की सामग्री के चयन एवं संयोजन में रमेश प्रसून जी का विशेष योगदान रहा है। जनक छन्द से जुड़े रचनाकारों के लिए भी और उन रचनाकारों के लिए भी, जो जनक छन्द का गहन परिचय प्राप्त करना चाहते हैं, यह विशेषांक बेहद महत्वपूर्ण एवं संग्रहणीय है। सुरंजन जी, रमेश प्रसून जी एवं पूरी संपादकीय टीम के सदस्य इस स्तुत्य कार्य के लिए बधाई के पात्र हैं।
    इक्कीसवां अंक पुरुष व्यथा पर केन्द्रित है। समाज में नारी उत्पीड़न और नारी सशक्तीकरण का मुद्दा चर्चा के केन्द्र में है। इस मुद्दे के पक्ष में बहुत सारी अतिरंजित प्रतिक्रियाओं का परिणाम यह हो रहा है कि पुरुष की बहुत सारी पीड़ाएं नज़र अन्दाज हो रही हैं। इस सम्बन्ध में गहराई से और व्यवहारिक स्तर पर निष्पक्ष होकर सोचा जाये, तो महिला-उत्पीड़न हो या पुरुष-उत्पीड़न, बहुत सारे मामले विशुद्ध रूप से मानवीय उत्पीड़न के होते हैं, उनका सम्बन्ध महिला या पुरुष होने से उतना नहीं होता है, जितना समझा जाता है। दूसरी बात उत्पीड़न पुरुष द्वारा महिला/महिलाओं का हो या महिला द्वारा पुरुष/पुरुषों का हो, चर्चा और समाधान दोनों का होना चाहिए। सकारात्मक तथ्य यह है कि महिला और पुरुष दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं और इसी तथ्य को दोनों के समान जीवन-मूल्यों के सन्दर्भ में समान अधिकारों और समान कर्त्तव्यों के आधार पर स्थापित किया जाना चाहिए। पर व्यापक स्तर पर ऐसा हो नहीं पा रहा है। प्रमुखतः महिलाओं के पक्ष में एकतरफा चर्चाएं हो रही हैं और इन चर्चाओं के उद्देश्य और परिणामों पर प्रश्नचिह्न भी लग रहे हैं। इन्हीं सबके मध्य महिलाओं द्वारा पुरुष उत्पीड़न का मुद्दा भी उठने लगा है। अमर साहनी जी ने नियोजित अध्ययन एवं चिन्तन के बाद इसको लेकर एक पुस्तक लिखी है- ‘अथ पुरुष व्यथा’। इस पुस्तक और उसमें उठाये गये मुद्दे यानी महिलाओं द्वारा पुरुषों के उत्पीड़न पर केन्द्रित है- कथा संसार का ‘अथ पुरुष व्यथा विशेषांक-2011’। इस विशेषांक में एक ओर जहाँ अमर साहनी जी की पुस्तक से पुरुष व्यथा पर विभिन्न आलेख रखे गये हैं, वहीं कई रचनाकारों की सशक्त कविताओं, लघुकथाओं एवं कहानियों के साथ सम्पादकीय के माध्यम से भी विशेषांक के विषय का समर्थन किया गया है। रमेश प्रसून जी ने साहनी जी की पुस्तक की संतुलित समीक्षा भी दी है। विशेषांक का उद्देश्य निश्चित रूप से पुरुषों के उत्पीड़न के पक्ष को भी चर्चा के मध्य रखना रहा है, पर कहीं-कहीं वैसी ही अतिरंजित सी प्रतिक्रियाएं भी दृष्टिगत होती हैं, जैसी नारीवादी चर्चाओं में आती रही हैं, खासतौर से पौराणिक सन्दर्भों को उद्धृत करते समय। यद्यपि कथा संसार के विशेषांक को काफी संतुलित करने की कोशिश की गई है, तदापि यह कहना प्रासंगिक होगा कि नारीवाद या पुरुषवाद से अधिक जरूरत दोनों के पूरक सम्बन्धों को समझने एवं स्थापित करने की है।
    निश्चय ही कथा संसार वैचारिक व रचनात्मक स्तर पर तो एक महत्वपूर्ण पत्रिका है ही, कई रचनाकारों और उनके कार्य को पहचान देने की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही है।

कथा संसार :  कथा साहित्य और चिन्तन की पत्रिका। सम्पादक :  सुरंजन सम्पादकीय सम्पर्क :  ई-385 सी, प्रताप विहार, निकट कैप्टन गैस ऐजेन्सी, गाजियाबाद-201009(उ.प्र.)। फोन :  9313195796। पृष्ठ :  80-90। मूल्य- एक प्रति :  रु.50/-, वार्षिक :  रु. 200/-(संस्था/लाइब्रेरी के लिए :  रु. 500/-), आजीवन :  रु. 2000/-।

संकेत  :  कविता में जीवन दृव की अभिव्यक्ति को खोजती लघु पत्रिका
 संकेत कविता केन्द्रित लघु पत्रिका है। लोकोन्मुखी एवं जीवन-दृव के अहसास को अभिव्यक्ति देने वाली कविता की खोज में संकेत का हर अंक ऐसी ही कविता के सृजन से जुड़े अपने समय के किसी एक कवि पर केन्द्रित होता है। एक अंक में एक ही कवि की कविताएं होने से सम्पादक जिस कविता की खोज में निकले हैं, उसे उसके फलक की व्यापकता के साथ समझना तो सम्भव होता ही है; कवि विशेष की रचनात्मकता और उसके व्यक्तित्व को समझना भी सम्भव हो जाता है। इस दृष्टि से सम्पादक अनवर सुहैल जी का यह सतत प्रयास अपने-आपमें अनूठा है। हर अंक एक लघु संग्रह की तरह आ रहा है। हालांकि इसके साथ विभिन्न रचनाकारों से आने वाली विविधिता से वंचित जरूर रहना पड़ता है, पर इसे वहन किया जा सकता है क्योंकि इसकी प्रतिपूर्ति के लिए अनेकों अच्छी पत्र-पत्रिकाएं हमारे मध्य हैं।
   संकेत के अब तक आठ अंक आये हैं, जो क्रमशः रजतकृष्ण, केशव तिवारी, शिरोमणि महतो, महेश चन्द्र पुनेठा, खदीजा खान, भास्कर चौधुरी, विष्णु चन्द्र शर्मा एवं ओम शंकर खरे ‘असर’ पर केन्द्रित हैं। इनमें से दो अंक शिरोमणि महतो एवं ओम शंकर खरे ‘असर’ पर केन्द्रित हमें देखने को मिले हैं।
    शिरोमणि महतो की कविताओं में लोक और स्थानीय चेतना के अंकुर भी मिलते हैं और जीवन-दृव का प्रवाह भी। अंक में उनकी ‘अखरा’, ‘काम पर जाते हुए लोग’, ‘इस साल का सावन (2009)’ ‘नदी’, ‘नेटवर्किंग वाले लड़के’ जैसी कई प्रतिनिधि व प्रभावशाली कविताएं शामिल हैं। शिरोमणि महतो भविष्य के एक ऊर्जावान रचनाकार हैं, संकेत के इस अंक से निश्चय ही उनकी प्रतिभा से लोगों को परिचित होने का अवसर तो मिला ही है, महतो जी और अच्छा करने के लिए प्रेरित होंगे।
   ओम शंकर खरे ‘असर’ जी को संकेत के सम्पादकीय में ‘अचर्चित वयोवृद्ध कवि’ कहा गया है, लेकिन उनके कार्यों और योगदन का जो विवरण प्रस्तुत किय गया है, वह इस तथ्य को सामने रखनेे के लिए पर्याप्त है कि आज भी महत्वपूर्ण और महान सृजक समय की अंधेरी कन्दराओं में साधनारत हैं। जब कभी ऐसे सृजकों की ओर किसी का ध्यान जाता है तो हमे कई चौंकाने वाली उपलब्धियां देखने को मिलती हैं। संकेत का असर जी पर अंक निकालना लागों का ध्यान इस ओर खींचने का काम करता है। अंक में असर जी की चौदह ग़ज़लों के साथ कुछ छोटी किन्तु बेहद प्रभावशाली छन्दमुक्त कविताएं रखी गई हैं। सभी रचनाओं में जीवन की धड़कनों को साफ-साफ सुना जा सकता है, जहाँ विसंगतियों को उकेरा गया है, वहाँ भी और जहाँ जीवन के विभिन्न अहसास सीधे अन्तर्मन टकराते हैं, वहाँ भी। असर जी ने कहीं-कहीं व्यंग्य का प्रयोग भी पूरे असर के साथ किया है।
   संकेत छोटी किन्तु एक अच्छी पत्रिका है, कविता के प्रति जिज्ञासुओं के लिए भी और पाठकों के लिए भी। संकेत में कुछ पुस्तकों की सारगर्भित समीक्षाएं भी दी जाती हैं, साथ ही सहयोगी लघु-पत्रिकाओं की परिचयात्मक जानकारी भी।

संकेत :  कविता केन्द्रित लघु पत्रिका। सम्पादक :  अनवर सुहैलसम्पादकीय सम्पर्क :  टाइप 4/3, ऑफीसर्स कालोनी, पो. बिजुरी, जिला- अनूपपुर (म.प्र.) पिन-484440। मोबाइल : 09907978108/07587690183। ई मेल : sanketpatrika@gmail.com . पृष्ठ : 30-32। सहयोग राशि: एक अंक: रु.15/-, विशेष सहयोग: रु.100/-। पुराने उपलब्ध अंक भी रु. 100/- भेजकर मंगावाये जा सकते हैं। सभी धनराशि धनादेश (मनीआर्डर) द्वारा ही भेजें।


समकालीन अभिव्यक्ति  :   संतुलित पत्रिका
     साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चेतना की लघ्ुा पत्रिका के रूप में समकालीन अभिव्यक्ति का अपना महत्व है। पत्रिका विगत नौ वर्षों से निरन्तर प्रकाशित हो रही है, यह बात अपने आपमें महत्वपूर्ण है। दो अंक अप्रैल-सितम्बर 2010 एवं अक्टूबर-दिसम्बर 2010 हमें देखने को मिले है। दिल्ली से श्री उपेन्द्र कुमार मिश्र के सम्पादन में प्रकाशित इस त्रैमासिक पत्रिका में साहित्यिक रचनाओं के साथ सामाजिक विषयों एवं दर्शनीय स्थलों आदि पर आलेख एवं स्तम्भबद्ध महत्वपूर्ण सामग्री भी दी जाती है। साहित्यिक रचनाओं में कविता, कहानी, लघुकथा, समीक्षाएं आदि का चयन स्तरीय है। स्थापित रचनाकारों के साथ कई उभरते हुए रचनाकारों की उपस्थिति भी देखी जा सकती है। ‘चुप्पी तोड़ो’ शीर्षक से काव्यात्मक सम्पादकीय अनूठा तो होता ही है, वैचारिक स्तर पर भी प्रभावित करता है। प्रमुख स्थाई स्तम्भ हैं- अन्दाजे बयाँ, एक दुनियां और भी है, वक्रोक्ति, साहित्यिक विनोद, खोज खबर एवं पोथी की परख। ‘एक दुनियां और भी है’ में सम्पादक उपेन्द्र जी सामाजिक-राजनैतिक समस्याओं पर अपना चिन्तन रखते हैं, जिससे पाठक सीधे तौर भी जुड़कर बहस का हिस्सा बन सकते हैं, यद्यपि ऐसा हो नहीं पा रहा है। वक्रोक्ति में सह सम्पादक हरिशंकर राढ़ी के व्यंग्य आलेख भी बेहद पैनापन लिए हुए होते हैं। धरोहर के अन्तर्गत अनिल डबराल विभिन्न महत्वपूर्ण स्थलों की अच्छी जानकारी दे रहे हैं, इन दोनों अंको में क्रमशः एलोरा एवं कन्याकुमारी के बारे में जाजकारी दी गई है। यात्रा वृतान्त में बुद्धि प्रकाश कोटनाला वर्ष 2009 में अपनी लद्दाख यात्रा के अपने अनुभव बाँट रहे हैं पाठकों के साथ। अपनी स्मृतियों के माध्यम से वह पाठकों को कश्मीर और लद्दाख की खूबसूरती और बहुत सारी अच्छी चीजों से रूबरू कराते नज़र आते हैं।
      ‘खोज खबर’ के अन्तर्गत विभिन्न साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों से सम्बन्धित सूचना-समाचार भी प्रकाशित किए जाते हैं। पुस्तकों की समीक्षाओं के लिए भी पर्याप्त स्थान रखा गया है। सहित्यकारों और पाठकों दोनों की दृष्टि से समकालीन अभिव्यक्ति एक अच्छी संतुिलत पत्रिका है।

समकालीन अभिव्यक्ति :  साहित्यिक एवं सांस्कृतिक चेतना की पत्रिका। सम्पादक :  उपेन्द्र कुमार मिश्रसम्पादकीय सम्पर्क :  फ्लैट नं.5, तृतीय तल, 984, वार्ड नं. 7, महरोली, नई दिल्ली-30। पृष्ठ :  64। शुल्क :  एक अंक :  रु.15/-, वार्षिक : रु.50/-, संस्था रु.80/-, आजीवन शुल्क : रु.500/-। दूरभाष : 011-26645001/26644751। ई मेल : samkaleen999@gmail.com


हम सब साथ साथ :  प्रासंगिक मुद्दों पर ध्यान खींचती लघु पत्रिका
     ‘हम सब साथ साथ’ द्विमासिक साहित्यिक पत्रिका है, नौ वर्ष से निरन्तर निकल रही है। हर अंक को किसी बिषय विशेष पर केन्द्रित करके विषयानुकूल कविता, कहानी, लघुकथा आदि रचनाओं, आलेखों, चर्चाओं आदि के माध्यम से उस विषय पर साहित्यकारों  और अपने पाठकों सहित तमाम बुद्धिजीवियों का ध्यान आकर्षित करती है। चूँकि पत्रिका के द्वारा चयनित विषय प्रासंगिक होते हैं, इसलिए ‘हससासा’ का कार्य निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है और इसका नोटिस लिया जाना चाहिए। पत्रिका के दो अंक मार्च-अप्रैल 2011 (राष्ट्रीय एकता/देशभक्ति पर केन्द्रित) और जुलाई-अगस्त2011 (अंधविश्वास/ढकोसला पर केन्द्रित) अंक हमने देखे हैं। सामान्यतः ऐसे विषयों पर अच्छी और स्तरीय रचनाएं/सामग्री जुटाना लघु पत्रिकाओं के लिए बेहद मुश्किल कार्य होता है, पर ‘हससासा’ ने इन अंकों के लिए न सिर्फ पर्याप्त वल्कि स्तरीय सामग्री जुटाई है। आलेखों/चर्चाओं में विचार सुलझे हुए हैं, अधिकांश रचनाएं, खासकर कथा रचनाएं (लघुकथाएं व कहानी) प्रभावशाली हैं। कविताओं में भी अधिसंख्यक प्रभावित करती हैं। कार्यकारी सम्पादक श्री किशोर श्रीवास्तव जी स्वयं एक स्थापित और अच्छे चित्रकार/रेखांकनकार हैं, वे इस कला का यथासम्भव उपयोग पत्रिका में बखूबी करते हैं। रचनाओं के साथ रचनाकारों के छायाचित्र भी देने का प्रयास किया जाता है। पत्रिका अपने सदस्यों का परिचय भी फोटो सहित प्रकाशित करती है। लघु पत्रिकाओं के परिचय एवं साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों की सूचनाओं एवं समाचारों के लिए भी पर्याप्त स्थान रखा गया है। पत्रिका से सम्बन्धित विभिन्न सूचना-समाचारों के लिए इन्टरनेट पर एक ब्लाग भी संचालित किया जा रहा है।

हम सब साथ साथ :  द्विमासिक साहित्यिक पत्रिका। सम्पादिका :  शशि श्रीवास्तव, कार्यकारी सम्पादक :  किशोर श्रीवास्तवसम्पादकीय सम्पर्क :  916, बाबा फरीदपुरी, पश्चिमी पटेलनगर, नई दिल्ली-110008। पृष्ठ : 36। शुल्क :  एक अंक :  रु.15/-, वार्षिक :  रु.120/-, पांच वर्ष का शुल्क रु.550/-, आजीवन शुल् :  रु.1100/-।
फोन :  8447673015/9868709348/9968396832/9971070545
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