आपका परिचय

गुरुवार, 24 मई 2012

कुछ और महत्वपूर्ण पत्रिकाएँ/डॉ. उमेश महादोषी


अविराम का ब्लॉग :  वर्ष : १, संयुक्तांक  : 8 व 9, अप्रैल-मई  २०१२  


{अविराम के ब्लाग के इस  स्तम्भ में अब तक हमने क्रमश:  'असिक्नी', 'प्रेरणा (समकालीन लेखन के लिए)', कथा संसार, संकेत, समकालीन अभिव्यक्ति,  हम सब साथ साथ, आरोह अवरोह , लघुकथा अभिव्यक्ति, हरिगंधा,  मोमदीप एवं सरस्वती सुमन   साहित्यिक पत्रिकाओं का परिचय करवाया था।  इस  अंक में  हम दो  और  पत्रिकाओं 'एक और अंतरीप' एवं 'दीवान मेरा' पर अपनी परिचयात्मक टिप्पणी दे रहे हैं।  जैसे-जैसे सम्भव होगा हम अन्य  लघु-पत्रिकाओं, जिनके  कम से कम दो अंक हमें पढ़ने को मिल चुके होंगे, का परिचय पाठकों से करवायेंगे। पाठकों से अनुरोध है इन पत्रिकाओं को मंगवाकर पढें और पारस्परिक सहयोग करें। पत्रिकाओं को स्तरीय रचनाएँ ही भेजें,  इससे पत्रिकाओं का स्तर तो बढ़ता ही है, रचनाकारों के रूप में आपका अपना सकारात्मक प्रभाव भी पाठकों पर पड़ता है।}

एक और अन्तरीप : रचना और विमर्श के मध्य संतुलन साधती महत्वपूर्ण पत्रिका


    पुनर्प्रकाशन के बाद ‘एक और अन्तरीप’ के तीन अंक आ चुके हैं। मानव मुक्ति को समर्पित इस प्रभावशाली त्रैमासिक साहित्यिकी में सृजनात्मक रचनाओं और विमर्श के मध्य सन्तुलन बनाये रखने का अच्छा प्रयास किया जा रहा है। हर अंक में विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर पाँच-सात आलेखों, एक महत्वपूर्ण साक्षात्कार, तीन-चार समीक्षाओं एवं सम्पादकीय के माध्यम से विमर्श के लिए पर्याप्त मंच उपलब्ध कराया जा रहा है। दूसरी ओर पत्रिका के सृजनात्मक दायित्व का बोध कराती तीन-चार कथाकारों की कहानियाँ व लघुकथाएँ, पाँच-सात समकालीन कवियों की सामयिक कविताएँ, व्यंग्य और संस्मरण आदि विधाओं की स्तरीय रचनाएँ। निश्चित रूप से पत्रिका के साहित्यिक अभिरुचि के पाठकों के लिए तथा साहित्य के सरोकारों को पूरा करने के लिए ‘एक और अन्तरीप’ अपने में काफी कुछ समेटे हुए है।
    तीनों अंकों में सम्पादकीय लघु-पत्रिकाओं और उनके सन्दर्भ में ‘एक और अन्तरीप’ के औचित्य, महत्व और लेखकों से उनकी रचनात्मक सहयोगाकांक्षाओं पर केन्द्रित रहे हैं। बेहद सटीक-सारगर्भित रूप में कई प्रश्नों (जो अधिकांशतः मौखिक माध्यमों से या व्यवहारिक रूप में उठाये जाते रहे हैं) के उत्तर दिये गये हैं और लघु-पत्रिकाओं के प्रकाशन को उत्साहित करने का काम किया है। प्रेम कृष्ण शर्मा जी का यह कथन प्रेरणाशील है- ‘हमें इस बात की चिन्ता नहीं करनी चाहिए कि उनकी प्रसार संख्या कम है, उनका प्रभाव क्षेत्र बहुत छोटा है या कि आम आदमी तक उनकी पहुँच नहीं है।......हमारी नज़र तो उन नेत्रों पर होनी चाहिए जिनमें अभाव के आंसू हैं तथा शोषण चक्र की बेबसी से जो पूरी तरह त्रस्त हैं।’ उनकी इस बात से असहमति नहीं हो सकती कि ‘लघु-पत्रिका निकालना कोई विलासिता नहीं है, बल्कि अपने रक्त से उस हथियार का निर्माण करना है जो मानव मुक्ति की लड़ाई में कारगर होकर मानव को शोषण चक्र से मुक्त करेगा।’ इसलिए जब भी कोई लघु-पत्रिका चाहे जितने छोटे रूप में, चाहे जितने कम संसाधनों के साथ चाहे, जितने कम समय के लिए सामने आये, उसके औचित्य पर प्रश्न करने की बजाय उसे एक सही दिशा में ले जाने के लिए जैसा और जितना भी सहयोग करने की स्थिति में हम हों, हमें करना ही चाहिए। लघु-पत्रिकाओं का औचित्य उनके प्रकाशकों/संचालकों/संपादकों के साहस में स्वयं सिद्ध होता है। और जैसा कि प्रेम कृष्ण जी ने ‘एक और अन्तरीप’ को एक बड़े महाभियान का छोटा सा अंश कहकर इंगित भी किया है, निश्चित रूप से लघु-पत्रिकायें एक दूसरे की पूरक होती हैं और उनकी ताकत समेकित एवं संयुक्त होकर समाज में बड़े सकारात्मक बदलावों की प्रेरक बनती है। जो लोग इस बात को नहीं समझ सकते, वे शायद साहित्य के महत्व को भी नहीं समझ सकते। ‘एक और अन्तरीप’ के बहाने लघु-पत्रिकाओं के लिए रचनात्मक सहयोग की उनकी अपेक्षा को सिर्फ एक अपेक्षा नहीं माना जाना चाहिए, यदि रचनाकार और लघु-पत्रिकाएं एक ही पथ के राही हैं, तो एक-दूसरे पर एक-दूसरे का अधिकार मानना चाहिए, उनके मध्य साधिकार सम्बन्ध विकसित होने चाहिए। संघर्षरत रचनाकार और लघु-पत्रिकाएं बहुधा यह अधिकार एक-दूसरे को देकर चलते भी हैं, परन्तु बहुत सारे स्थापित रचनाकारों के बारे में यह बात नहीं कही जा सकती। उनका नज़रिया लघु-पत्रिकाओं के प्रति बहुत सहयोगपूर्ण नहीं होता है, इस सन्दर्भ में प्रेम कृष्ण जी का दर्द उभरकर दूसरे व तीसरे अंक के सम्पादकीयों में आया भी है। उम्मीद है आने वाले समय में स्थापित रचनाकारों के दृष्टिकोंण में सकारात्मक परिवर्तन आयेगा। यदि कहीं कोई लघु-पत्रिका भी अपने होने की गम्भीरता को नहीं समझ पा रही है, तो उसे भी आत्म-मंथन करना चाहिए।
    एक बात लघु-पत्रिकाओं के सन्दर्भ में निकलकर आती है, बहुधा लघु-पत्रिकाएं व्यक्तिगत प्रयासों से ही चल पाती हैं। संगठनगत प्रयास वहीं सफल होते हैं, जहां वे किसी न किसी रूप में या तो सरकार या प्रायोजक संस्था विशेष के नियन्त्रण से जुड़े हैं या संबन्धित संगठन में कोई व्यक्ति विशेष अत्यन्त धैर्य और त्याग-समर्पण की भावना के साथ संगठन के अधीन लघु-पत्रिका को आगे बड़ा रहा है। लघु-पत्रिकाओं के प्रकाशन के सन्दर्भ में अधिकांशतः संगठनों के प्रयास व्यवहारिक स्तर पर सामूहिक ऊर्जा विकसित नहीं ही कर पाते हैं। इसलिए यदि ‘एक और अन्तरीप’ किसी संगठन विशेष के हाथों में जाकर आगे नहीं बढ़ पायी तो इस तथ्य को उस संगठन विशेष में सामूहिक ऊर्जा के अभाव के रूप में ही स्वीकार करना चाहिए और भविष्य में ‘एक और अन्तरीप’ के प्रकाशन से जुड़े लोग इसे दोहराने से बचें, यही उचित है। वैसे भी यह युगीन सत्य है कि कोई भी संगठन, चाहे वह सामाजिक हो, सांस्कृतिक हो, राजनैतिक हो, बहुधा किसी व्यक्ति या व्यवस्था विशेष के आभा मंडल के इर्द-गिर्द ही सफल हो पाता है। सामूहिक सांगठनिक आभा सामान्यतः दीर्घकालिक प्रभाव सिद्ध नहीं ही कर पाती है।
   रचनाओं का स्तर पिछले तीनों अंको में अच्छा है। एक कवि विशेष की रचनाधर्मिता के मूल्यांकन पर एक आलेख और उसकी कुछ कविताओं को एक साथ पटल पर रखने से निश्चय ही पाठकों को उस रचनाकार को ठीक से समझने का अवसर मुहैया कराता है और उस रचनाकार को उसके सृजन के लिए सम्मानित करने जैसा भी लगता है।
    दूसरे अंक में साहित्यिक पत्रकारिता के सामाजिक सरोकारों पर डॉ. इन्द्र प्रकाश श्रीमाली जी की डॉ. हेतु भारद्वाज जी, प्रो. नन्द चतुर्वेदी जी, डॉ. नन्द किशोर शर्मा जी के साथ बातचीत काफी सार्थक है। तीसरे अंक में डॉ. दुर्गाप्रसाद अग्रवाल जी के साथ डॉ. रजनीश भारद्वाज जी की बातचीत में जयपुर लिटरेचर फेस्टीवल पर कई सवालों के जवाब देते हुए डॉ. अग्रवाल जी ने कई नकारात्मक धारणाओं पर अपना सकारात्मक दृष्टिकोंण रखा है। हालांकि इसी अंक में जयपुर लिटरेचर फेस्टीवल पर श्री नवल किशोर शर्मा जी की रपट तथा सांस्कृतिक संदर्भों में इस तरह के फेस्टीवल के प्रभावों पर आलोचनात्मक दृष्टिकोंण के सन्दर्भ में देखा जाये, तो डॉ. अग्रवाल जी इस फेस्टीवल का पक्ष लेते दिखाई देते हैं। प्रश्न यह उठता है कि ऐसे फेस्टीवल की आलोचना का अन्तिम उद्देश्य क्या होना चाहिए, इन्हें रोकना या इनमें जरुरी सुधारों एवं साहित्य के देशीय एवं सामाजिक सरोकारों के सन्दर्भ में इनका रूपान्तरण? दूसरी बात साहित्य में ग्लैमर और साहित्यिक ग्लैमर जैसे मुद्दों पर क्या दृष्टिकोंण अपनाया जाये? क्या आधुनिक जमाने के युद्ध पुराने जमाने के हथियारों से लड़े जा सकते हैं? साहित्य के मूल उद्देश्यों और सरोकारों को हासिल करने के लिए समूचे साहित्यिक वातावरण को अद्यतन करना क्या जरूरी नहीं है, और यदि हां, तो कितना और कैसे? मुझे लगता है डॉ. अग्रवाल जी के दृष्टिकोंण को इस सन्दर्भ में आधार बनाया जा सकता है और इस दृष्टि से इस बातचीत को बेहद सार्थक माना जाना चाहिए।
    कई महत्वपूर्ण साहित्यकारों के साथ संघर्षरत रचनाकारों की अन्य रचनाएं भी अच्छी हैं। घोषित तौर पर पत्रिका द्विभाषी है, इसलिए एक-दो आलेख अंग्रेजी में भी दिये जा रहे हैं। ‘एक और अन्तरीप’ एक दिशाबद्ध और उद्देश्यपरक पत्रिका है। निश्चित रूप से साहित्य-पटल पर उसकी उपस्थिति जरूरी है। पुनर्प्रकाशन पर ‘एक और अन्तरीप’ का हार्दिक स्वागत एवं प्रेम कृष्ण शर्मा जी और उनकी पूरी टीम को बधाई।
      एक और अन्तरीप : साहित्यिक त्रैमासिकी। प्रधान सम्पादक : प्रेम कृष्ण शर्मा (मो. 09414055811)/सम्पादक द्वय :  डॉ. अजय अनुरागी (मो. 09468791896) एवं डॉ. रजनीश (मो. 09460762293)। सम्पादकीय पता : 1, न्यू कॉलोनी, झोटवाड़ा, पंखा, जयपुर-302012 (राज.)। ई मेल: anuragiajay11@gmail.com। मूल्य: रु. 25/-, वार्षिक सदस्यता: रु. 100/-।




दिवान मेरा : एक नियमित लघु-पत्रिका


 
    अहिन्दी भाषी क्षेत्रों से हिन्दी साहित्य की कोई भी पत्रिका जब नियमित रूप से प्रकाशित होती है, तो यह अपने-आप में एक उपलब्धि होती है। ‘दिवान मेरा’ एक ऐसी ही द्विमासिक लघु पत्रिका है, जो पिछले सात वर्षों से नियमित रूप से नागपुर शहर से प्रकाशित हो रही है। सभी विधाओं की रचनाओं को इसमें स्थान मिलता है। वैचारिक स्तर पर यह पत्रिका भी लघु-पत्रिकाओं के मध्य अपनी जिम्मेवारी समझती है और साहित्यिक यज्ञ में अपनी आहुति दे रही है। सामान्यतः रचनाओं का स्तर साधारण है, पर इन्हीं के मध्य कई अच्छी रचनाएं भी पढ़ने को मिलती हैं। आलेखों और कथा रचनाओं की तुलना में कविता पक्ष कमजोर है। लेखकगण यदि अपनी उत्कृष्ट रचनाएं उपलब्ध करवायें तो इस पत्रिका के रूप में उपलब्ध संसाधन का और भी  बेहतर उपयोग हो सकता है। महाराष्ट्र और आसपास के कई नए रचनाकारों को अपनी रचनाधर्मिता को रखने का एक प्रभावी मंच मिल रहा है, इसे मैं बेहद सकारात्मक मानता हूँ।
    भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना जी के आन्दोलन पर कुछ प्रश्न किए जाते रहे हैं। जैसा कि बहुधा होता है, निश्चित रूप से कुछ गलत लोगों और तौर-तरीकों की शिरकत भी इस आन्दोलन में हुई होगी, पर इससे आन्दोलन के उद्देश्य और प्रासंगिकता संदिग्ध नहीं हो जाती है। आज आम आदमी और शोषण के शिकार लोगों को यदि ताकत मिलती है, उनमें जागरूकता लाई जाती है, तो इसका समर्थन ही होना चाहिए। साहित्यिक जनों से ऐसे आन्दोलन पर प्रश्न करने की उम्मीद नहीं की जाती। हाँ, यदि ऐसे किसी आन्दोलन के कुछ खतरे दिखाई देते हैं, उसमें कुछ घुसपैठिये घुसपैठ करते दिखाई देते हैं, तो उनके प्रति आगाह करने में कोई हर्ज नहीं है। पर यह कार्य पूरी सावधानी के साथ किया जाये कि कहीं से ऐसे सद्प्रयास हतोत्साहित और आम आदमी की पक्षधरता के विरोधी और शोषक मजबूत न होने लगें। इस दृष्टि से दिसंबर 2011-जनवरी 2012 एवं फरवरी-मार्च 2012 अंकों में ‘एकान्त दर्पण’ स्तम्भ में नरेन्द्र परिहार जी को अपने लघु आलेख को संतुलित बनाना चाहिए था। नरेन्द्र जी एक अच्छे विचारक हैं, आम जन के पक्षधर हैं और निश्चय ही उनके उठाए कुछ प्रश्न महत्वपूर्ण हैं। मैं यह भी मानता हूँ कि जिन चीजों को उन्होंने आपत्तिजनक माना है, उनमें कई बातें वास्तव में आपत्तिजनक मानी जा सकती हैं, पर उनकी वजह से समूचा आन्दोलन औचित्यहीन भी नहीं हो सकता। आन्दोलन को पूरी तरह प्रायोजित कहना उचित नहीं। स्वतः स्फूर्ति का तत्व इस आन्दोलन में कहीं बड़ा था।  दूसरी बात ये बातें उन बातों के समक्ष बहुत छोटी हैं, जिनके खिलाफ अन्ना जी प्रेरित आन्दोलन की पृष्ठभूमि बनी है। मुझे नहीं लगता कि दुनियां का कोई भी जनांदोलन छोटी-मोटी गलतियों का शिकार न होता हो। हां यह अवश्य देखा जाना चाहिए कि कोई गलत उद्देश्य से आन्दोलन को हाईजैक न कर ले। इस सन्दर्भ में यह समझना भी जरूरी है कि जनता आन्दोलन के आधारीय मुद्दों से जुड़ी है, पर आन्दोलनकर्ताओं के साथ जनता ने राजनैतिक पक्षधरता नहीं दिखाई है, और यह बात आन्दोलन के संचालन से जुड़े लोग भी कहीं न कहीं महसूस कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में जनता के मन को समझना जरूरी है। जनता भ्रष्टाचार और शोषण के खिलाफ आवाज उठाने की ताकत चाहती है, पर इसके लिए किसी संगठन या पार्टी विशेष के हाथों खेलना उसे मंजूर नहीं है। जनता में आ रही इस परिपक्वता को उत्साहित किया जाना चाहिए। मुझे लगता है कि जब भी अन्ना जी या कोई और ईमानदारी से जनहित के मुद्दे उठायेगा, जनता के बीच एक स्वतःस्फूर्त चेतना दिखाई देगी।
     जहां तक संसद की मर्यादा के हनन का प्रश्न है, यह बात अन्ना जी की ओर से बार-बार स्पष्ट की जा चुकी है कि वे संसद के खिलाफ नहीं हैं, सांसदों के आचरण के खिलाफ हैं। और सांसदो का आचरण कितना गिर गया है, मुझे नहीं लगता इस पर कुछ सिद्ध करने की जरूरत है। यदि ऐसे गलत आचरण वाले सांसदों के खिलाफ बोलना गलत है, तो ऐसी गलती तो भ्रष्टाचार के विरुद्ध होने वाले हर आन्दोलन में स्वाभाविक रूप से होगी ही। जहां कहीं भी भाषागत अशिष्टता हुई है, उसे दोनों तरफ नियन्त्रित किया जाना चाहिए। जहां तक आन्दोलन के एक पार्टी विशेष के खिलाफ जाने की बात है, सो ऐसी खिलाफत तो राममनोहर लोहिया जी की मुहिम और जयप्रकाश नारायण जी के आन्दोलन में भी हुई थी। तो क्या वे भी गलत थे? राजनैतिक पार्टी के नाम पर कांग्रेस हो, बी.जे.पी. हो, या कोई अन्य पार्टी हो, गलत तो गलत ही है। हर पार्टी को अपनी गलतियों के लिए किसी न किसी रूप में जनाक्रोश सामना तो करना ही पड़ेगा। यदि कोई पार्टी अपने ही लोगों को भ्रष्टाचार में आरोपित होने पर जेल भेजती है, तो इतने मात्र से वह ईमानदार नहीं हो जाती है। सब जानते हैं कि ऐसा भी जनता, मीडिया और न्यायपालिका के दबाव में ही होता है। अन्यथा अपने लोगों को बचाने की कोशिशें और उनके काले कारनामों पर पर्दा डालने की कोशिशें कम नहीं होती हैं। अपितु इसके लिए तमाम पार्टियां और राजनैतिक नेतृत्व निचले दर्जे तक गिरने में भी शर्म महसूस नहीं करते। जिम्मेवारी की भावना को किस तरह से तार-तार किया जा रहा है, किसी से छुपा नहीं है। यदि ईमानदारी की भावना वास्तविक रही होती तो पिछले दिनों कई ऐसे काण्ड हुए हैं, जिनके बाद समूची केन्द्र सरकार को इस्तीफा दे देना चाहिए था। कई राज्यों में भी ऐसी स्थितियां आई हैं। जन-प्रतिनिधियों का सम्मान आज गिर रहा है, तो उसके लिए वे स्वयं जिम्मेवार हैं। और  यदि उन्हें अपना सम्मान पुनः पाना है तो अपने आचरण को स्वयं सुधारना होगा, अपनी प्रतिष्ठा के बारे में उन्हें स्वयं सोचना होगा। माननीय संसद को भी इस विषय में विचार करना चाहिए कि अपने प्रांगण की पवित्रता को कैसे स्थापित करे, कैसे अपने पवित्र प्रांगण में गलत आचरण वाले लोगों को आने से रोके। इस सन्दर्भ में लोकतन्त्र को पुनर्परिभाषित एवं पुनर्स्थापित करने की जरूरत है।
    ‘दिवान मेरा’ का अप्रैल-मई 2012 अंक महान विचारक राममनोहर लोहिया पर केन्द्रित है। इस विशेषांक के माध्यम से कई विषयों पर लोहिया जी के विचारों को सामने रखा गया है, वहीं उनके व्यक्तित्व और विचारों की प्रासंगिकता को भी उकेरा गया है। ‘स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी साहित्य में लोहिया चिन्तन’ आलेख में ओमप्रकाश शिव जी ने लोहिया जी के चिन्तन के हिन्दी साहित्य पर पड़े प्रभावों का विस्तार से विवेचन किया है। दरअसल लोहिया जी और उनके समय के अनेकों महान साहित्यकार युगीन आवश्यकताओं से जनित चिन्तन के हमराही थे। और एक दूसरे के विचारों का सम्मान-समर्थन करते थे। इस अंक की अपनी प्रासंगिकता है। निश्चित रूप से पाठकों ने इस अंक को मनोयोग से पढ़ा होगा।
     निश्चित रूप से ‘दिवान मेरा’ लघु-पत्रिकाओं के बीच लगातार अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही है। सम्पादकीय टीम को सामग्री के प्रस्तुतीकरण को आकर्षक बनाने पर भी थोड़ा ध्यान देना चाहिए। महारष्ट्र के साथ-साथ पूरे देश में यह पत्रिका अपना स्थान बनाए, हार्दिक शुभकामनाएं। नरेन्द्र सिंह परिहार जी और उनकी पूरी टीम को बधाई।
    दिवान मेरा : साहित्यिक द्विमासिकी। मुख्य सम्पादक : नरेन्द्र सिंह परिहार/ प्रबन्ध सम्पादक : ओमप्रकाश शिव। सम्पादकीय पता : सी.-004, उत्कर्ष अनुराधा, सिविल लाइन, नागपुर-440001 (महा.)। मोबाइल: 09561775384/07875761187। ई मेल :  nksparihar@gmail.com। मूल्य: रु. 15/-, वार्षिक सदस्यता: रु. 90/-, द्विवार्षिक रु. 150/- तथा पंचवार्षिक रु. 400/- मात्र।

कोई टिप्पणी नहीं:

टिप्पणी पोस्ट करें