आपका परिचय

गुरुवार, 24 मई 2012

125. डा. ओम्प्रकाश भाटिया ‘अराज’

ओम्प्रकाश भाटिया ‘अराज’    








जन्म :  03.09.1933 को। 
शिक्षा :  एम.ए., पी-एच. डी., बी.एड., आयुर्वेद रत्न, अरा रत्न,। 


लेखन/प्रकशन/योगदान :  जनक छन्द के प्रणेता अराज जी स्वभाव से ही शोध, आविष्कारों और नई-नई स्थापनाओं की ओर उन्मुख रहे हैं। उन्होंने हिन्दी भाषा एवं उसके व्याकरण तथा लिपियों के विकास पर महत्वपूर्ण कार्य किया है। भारतीय लिपियों के साढ़े छह हजार वर्षों के मन्थन के साथ अरालिपि, जनक नागरी और जनक छन्द का निर्माण-प्रचार, धर्म सम्बन्धी खोजें उनके उल्लेखनीय कार्य हैं। कविता, बाल साहित्य एवं धार्मिक बिषयों पर लेखन के साथ-साथ कई महत्वपूर्ण उपन्यास एवं कहानियां भी अराज जी ने लिखी हैं। अब तक विभिन्न विधाओं और बिषयों पर उनकी 93 मौलिक एवं 24 सम्पादित पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। अराज जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर विभिन्न विद्वानों ने कई पुस्तकें लिखी हैं, जिनमें ‘साहित्य-साधक अराज’ (सम्पादक डॉ. सुन्दर लाल कथूरिया), ‘चेतना के पंख: डॉ. अराज का व्यक्तित्व और कृतित्व (सम्पादक: डॉ. अशोक भाटिया), कवि अराज और उनका रामकाव्य  (लेखक: डॉ. कृष्णगोपाल मिश्र), ‘स्वातन्त्रोत्तरी हिन्दी कविता में अराज-काव्य का मूल्यांकन’ (लेखक: डॉ. कृष्णगोपाल मिश्र), डॉ. अराज का गद्य-साहित्य (लेखक: डॉ. कृष्णगोपाल मिश्र)आदि प्रमुख हैं।
सम्मान :  कई सम्मानों से सम्मानित/अलंकृत। 
सम्प्रति :  1993 में प्राचार्य पद से निवृत होने के बाद से पूरी तरह साहित्य साधना में समर्पित।
सम्पर्क :  बी-2-बी-34, जनकपुरी, दिल्ली-110058
दूरभाष :  01125525386 / 09971773707


अविराम में प्रकाशन  


मुद्रित अंक :  जून 2011 अंक में दस जनक छंद एवं एक जनक छंद विषयक आलेख।
           दिसम्बर 2011 अंक में पांच जनक छन्द एवं एक पुस्तक समीक्षा।
ब्लॉग संस्करण :  अक्टूबर 2011 अंक में जनक छन्द।
              दिसम्बर 2011 अंक में एक पुस्तक समीक्षा।
              जनवरी 2012 अंक में पाँच जनक छन्द।
              मार्च 2012 अंक में पाँच जनक छंद 











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