आपका परिचय

राजेन्द्र परदेसी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
राजेन्द्र परदेसी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, 30 सितंबर 2018

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  08,   अंक  :  01-02,   सितम्बर-अक्टूबर 2018 


।।।।हाइकु।।



राजेन्द्र परदेसी






हाइकु

01.

प्रेम की नाव
आस्था डगमगाती
बचाए कौन

02.

मन सवाली
गुमसुम उदास
रहे अकेला

03.

दिल चाहता
लिखना प्रेम पाती
जग रोकता

04.

रही सालती
नीरवता रात की
बिना तुम्हारे

05.

सन्नाटा मिला
अक्सर शहर में
रिश्तों के बीच

06.

शेष निशान
समय की रबड़
मिटाती घाव

07.

स्वार्थ प्रेरित
गढ़ता रहा सदा
बोनसाई ही

08.


छायाचित्र : अभिशक्ति गुप्ता 
हर कहानी
संवेदना में ढली
रास न आती

09.

सपने सभी 
खुद देखती आँख
फिर क्यों रोती

10.

बँधी रहती
अतीत की साँकल
अक्सर द्वार

  • 44, शिव विहार, फरीदीनगर, लखनऊ-226015/मो. 09415045584

रविवार, 12 नवंबर 2017

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक  :  01-04,  सितम्बर-दिसम्बर 2017




।। कथा प्रवाह ।।


राजेन्द्र परदेसी






वाउचर
      लॉन में बैठे अपने साहब को देखकर रतनलाल ने सोचा, ‘‘मिलता चलूँ, नहीं तो सोचेंगे मुझे देखकर मुँह घुमा लिया।’’ और थैला
लिए ही वह बँगले के अन्दर चले गये।
      देखते ही साहब ने पूछा- ‘‘कहो रतनलाल, कैसे आना हुआ?’’
      ‘‘बाजार जा रहा था, सोचा आपसे मिलता चलूँ।’’
      ‘‘अच्छा किया, पप्पू को भी साथ लेते जाओ। जो कहे, दिला देना।’’
      ‘‘ठीक है सर..’’ इतना ही रतनलाल कह पाये थे कि साहब ने बेटे को आवाज दी- ‘‘पप्पू ऽ ओ पप्पू ऽऽ’’
      ‘‘क्या है डैडी?’’ बेटे ने आकर पूछा।
      ‘‘देखो, अंकल बाजार जा रहे हैं। तुम्हें भी तो बाजार जाकर कुछ लेना है न?’’ फिर सलाह के लहजे में बोले- ‘‘इन्हीं के साथ चले जाओ। ये सामान तुम्हें दिलवा देंगे।’’
      ‘‘तो क्या आप नहीं चलेंगे?’’ पप्पू ने पूछा।
      ‘‘मुझे बहुत काम हैं।’’ 
      ‘‘ठीक है’’ कहकर पप्पू रतनलाल के साथ बाजार चला गया। 
      बाजार में वह फरमाइश करता जाता और रतनलाल भुगतान करके हाथ में उठाते जाते। खरीद समाप्त हुई तो बंगले की ओर लौट पड़े।
      सामान रखकर रतनलाल जब वापस जाने लगे तो साहब ने टोका, ‘‘क्यों रतनलाल! तुमने बताया नहीं, कितने पैसे हुए?’’
      ‘‘बता दूँगा, सर!’’
      ‘‘यह ठीक नहीं, तुम्हारे भी तो बाल-बच्चे हैं, रतनलाल।’’ फिर सोचकर बोले- ‘‘ऐसा करो, हजार का वाउचर बना लो और मुझसे कल पास कराकर पेमेंट ले लो।’’
      ‘‘ठीक है, सर!’’
      ‘‘भूलना मत। कल जरूर पास करा लेना। और सुनो- जब भी बाजार जाया करो, इधर भी हो लिया करो।’’

  • 44, शिव विहार, फरीदीनगर, लखनऊ-226015, उ.प्र./मो. 09415045584