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शनिवार, 22 सितंबर 2018

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक :  11-12,  जुलाई-अगस्त 2018



लघुकथा : अगली पीढ़ी


कपिल शास्त्री

कपिल शास्त्री 



{लघुकथा की दूसरी व तीसरी पीढ़ी के लघुकथा लेखन पर केन्द्रित इस स्तम्भ का आरम्भ अविराम साहित्यिकी के मुद्रित प्रारूप में जनवरी-मार्च 2015 अंक से किया गया था। उसी सामग्री को इंटरनेट पर अपने पाठकों के लिए भी हम क्रमशः उपलब्ध करवाना आरम्भ कर रहे हैं। इस स्तम्भ का उद्देश्य लघुकथा की दूसरी व तीसरी पीढ़ी के लघुकथा लेखन में अच्छी चीजों को तलाशना और रेखांकित करना है। अपेक्षा यही है कि ये लघुकथाकार अपने समय और सामर्थ्य को पहचानें, कमजोरियों से निजात पायें और लघुकथा को आगे लेकर जायें। यह काम दो तरह से करने का प्रयास है। सामान्यतः नई पीढ़ी के रचनाकार विशेष के उपलब्ध लघुकथा लेखन के आधार पर प्रभावित करने वाले प्रमुख बिन्दुओं व उसकी कमजोरियों को आलेखबद्ध करते हुए समालोचनात्मक टिप्पणी के साथ उसकी कुछ अच्छी लघुकथाएँ दी जाती हैं। दूसरे प्रारूप में किसी विशिष्ट बिषय/बिन्दुओं (जो रेखांकित करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण हो) पर केन्द्रित नई पीढ़ी के लघुकथाकारों की लघुकथाओं में उन लघुकथाकारों की रचनात्मकता के बिन्दुओं की प्रस्तुति कुछ महत्वपूर्ण लघुकथाओं के साथ देने पर विचार किया जा सकता है। प्रस्तुत लघुकथाकारों से अनुरोध है कि समालोचना को अन्यथा न लें। उद्देश्य लघुकथा सृजन में आपके/आपकी पीढ़ी के रचनाकारों की भूमिका को रेखांकित करना मात्र है। कृष्णचन्द्र महादेविया, दीपक मशाल एवं डॉ. संध्या तिवारी के बाद इस अंक में हम कपिल शास्त्री पर प्रस्तुति दे रहे हैं। -अंक संपादक}




लघुकथा में घनीभूत मानवीय अनुभूतियों को उकेरता हस्ताक्षर : उमेश महादोषी 



लघुकथा से जुड़े विभिन्न पक्षों पर विस्तार से बात होती रही है और अधिकांश पक्षों पर काफी बात हो चुकी है। अब दूसरी-तीसरी पीढ़ी के रचनाकार क्रमशः पहली पीढ़ी के समस्तर सृजन के अभ्यास तक पहुँच रहे हैं। समालोचनात्मक जिम्मेवारी के निर्वहन हेतु ‘नई सदी की धमक’ संकलन की पाण्डुलिपि पढ़ने के बाद मैंने महसूस किया है कि अपने दायित्व के प्रति नई पीढ़ी के कई लघुकथाकार बेहद जिम्मेवार होते जा रहे हैं। यह माना जा सकता है लघुकथा में अब कोई सृजन-अन्तराल नहीं आ सकता। नई पीढ़ी लघुकथा की सृजन-परम्परा के निर्वाह के लिए ही नहीं, उसे आगे ले जाने के लिए भी तैयार है। पिछले लगभग एक दशक की गतिविधियों और उनमें ‘पड़ाव और पड़ताल’ जैसी लघुकथा की वृहद एवं महत्वपूर्ण रचनात्मक एवं मूल्यांकन शृंखला के साथ विगत दो-तीन वर्ष में आई उल्लेखनीय तीव्रता, जिसमें इंटरनेट पर सामाजिक माध्यम के रूप में फेसबुक का विशेष योगदान है, को इसका श्रेय दिया जा सकता है। यद्यपि फेसबुक के रास्ते आई खामियों से भी आँखें नहीं मूँदी जा सकतीं, लेकिन मुख्य बात उस बड़ी चिंता के दूर होने की है, जो सृजन-अन्तराल की संभावना के रूप में तीन-चार वर्ष पहले तक बहुत स्पष्ट रूप में देखी जा रही थी। आज नई पीढ़ी की लघुकथाओं पर आधारित संकलनों का प्रकाशन आरम्भ किया जाये तो निसन्देह वर्ष में एकाधिक अच्छे संकलन लाये जा सकते हैं। नये लेखक दोहराव, जो सम्भवतः विषयाधारित लघुकथा प्रतियोगिताओं से पनपी कुछ गलत धारणाओं के कारण एक समस्या के रूप में दिखाई दे रहा है, से मुक्ति पाकर मौलिकता का स्तर थोड़ा और बढ़ा सकें, जिसकी उम्मीद भी बँधती दिखाई दे रही है, तो लघुकथा को एक शिखर पर ले जाने का श्रेय नई पीढ़ी को मिलना तय है। फेसबुक पर गतिविधियों के अनेकानेक संचालकों, जिनमें प्रायः नये लेखक ही अधिक हैं, को अभिव्यक्ति के इस सामाजिक माध्यम के सुनिश्चित और दिशाबद्ध उपयोग के लिए डॉ. बलराम अग्रवाल द्वारा संचालित ‘लघुकथा साहित्य’ नामक समूह का सूक्ष्म अध्ययन अवश्य करना चाहिए। इससे उन्हें लघुकथा को नये आयाम देने और सही दिशा में ले जाने हेतु अपना महत्वपूर्ण योगदान देने में मदद मिलेगी। आज के ये नये लेखक ही आने वाले समय में लघुकथा के वरिष्ठ बनेंगे और इन्हीं के कंधों पर अपने बाद की पीढ़ी को तैयार करने, प्रशिक्षित करने के साथ लघुकथा के कुछ सार्थक आयाम तय करने वाली पीढ़ी को उत्साहित करने का जिम्मा होगा। इस दृष्टि से देखा जाये तो लघुकथा की पहली पीढ़ी ने अपना एक दायित्व- सृजन-अंतराल की समस्या से मुक्ति, लगभग पूर्ण कर लिया है, लेकिन अपनी छोड़ी जाने वाली सम्पूर्ण भूमिका के निर्वाह के लिए वर्तमान नई पीढ़ी को तैयार करके ही वे अंतिम दायित्व को पूर्ण कर पायेंगे, यह बात सोचने का समय भी आ ही चुका है। उम्मीद है जल्दी ही हमारे नये लघुकथाकार साथी भी इस दिशा में अपनी भूमिका को ग्रहण करते दिखाई देंगे। 
      लेकिन इससे पूर्व नये लेखकों के सृजन को रचनात्मक धरातल पर प्रतिष्ठित करने और उसके मूल्यांकन के बारे में सोचना आवश्यक है। आलोचनात्मक स्तर पर इसी आलेख शृंखला में डॉ. संध्या तिवारी की लघुकथाओं के संदर्भ में लिखते हुए मैंने नई पीढ़ी के लेखन में जिन विसंगतियों और कमजोरियों की चर्चा की थी, उनमें से अधिकांश के सन्दर्भ में अपनी कई लघुकथाओं में ये लेखक आगे बढ़ते दिख रहे हैं, लेकिन कुछ बातों पर विशेष ध्यान देना होगा। मैं पुनः दोहराऊँगा कि दोहराव से बचना और मौलिकता को समझना बड़ा प्रश्न है, इस प्रश्न पर नये लेखकों को अतिरिक्त सावधानी बरतनी होगी। इस दृष्टि से जो कमजोर लघुकथाएँ पहले लिखी जा चुकी हैं, प्रचारात्मक प्रसार की दृष्टि से उनके व्यामोह से निकलना आवश्यक है। नई पीढ़ी के एक लेखक, जिसे रचनात्मक सन्दर्भ में बेहद सम्मान की दृष्टि से देखने वालों में मैं स्वयं भी शामिल हूँ, की एक लघुकथा किसी पत्रिका में प्रकाशित हुई। उस मित्र ने अपनी उस लघुकथा के प्रकाशन की सूचना के साथ उसकी स्केन प्रति फेसबुक पर मित्रों से साझा की। मेरी वाल पर भी वह दिखी और संयोगवश उस पर मेरी दृष्टि भी पड़ गई। मैंने उसे पूरा पढ़ा। आरम्भ में रुचिकर भी लगी, लेकिन उसका अन्त जिस कथ्य में हुआ, वह एक चर्चित कथ्य था। मुझे निराशा हुई कि एक जागरूक और स्तरीय माने जाने वाला रचनाकार कथ्य के दोहराव के सन्दर्भ में इतना लापरवाह है! मुझे लगता है कि प्रतिष्ठा के एक बिन्दु पर पहुँचकर यदि कोई कमजोर रचना प्रकाशित भी हुई है तो उसे रचनाकार को अपनी प्रचारात्मक प्राथमिकता में शामिल नहीं करना चाहिए। आपकी पचास-साठ या अधिक रचनाओं के संग्रह में कुछेक कमजोर रचनाएँ चली जायें तो उनका वैसा नकारात्मक प्रभाव नहीं होगा, जैसा कहीं अकेली प्रकाशित रचना के कमजोर होने पर हो सकता है। एक छोटी बात को बड़ा करके दिखाने का मेरा उद्देश्य मित्रगण समझ लेंगे। 
      एक दूसरी बात, नये लघुकथाकारों को लघुकथा के विभिन्न तत्वों को समझने की प्रंिक्रया में लघुकथा में नेपथ्य की उपस्थिति और उपयोग पर विशेष ध्यान देना चाहिए। ‘नेपथ्य’ लघुकथा का वह प़क्ष है, जो इस विधा की रचना में सबसे गतिशील ऊर्जा का निर्माण करता है। पिछले दिनों इस सन्दर्भ में डॉ. बलराम अग्रवालजी के एक लघु आलेख को पढ़ने और ‘नई सदी की धमक’ संकलन की पाण्डुलिपि पढ़ने के बाद मुझे लगा कि नई पीढ़ी का ध्यान विशेष रूप से इस ओर आकर्षित करने की आवश्यकता है। सामान्यतः हर घटना, हर विसंगति, हर जीवनानुभूति के पीछे कुछ न कुछ ऐसा अवश्य होता है, जो प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देता, लेकिन परिणामी प्रत्यक्ष में उसका महत्वपूर्ण योगदान होता है। यह, जो महत्वपूर्ण होकर भी प्रत्यक्ष नहीं है, दर्शनीय नहीं है, वह आखिर होता क्या और कहाँ है? मेरी समझ में यह अदृश्य किन्तु वास्तविक स्रोत से जनित वास्तविक प्रभाव होता है और इसका उद्गम स्थल नेपथ्य कहलाता है। दूसरे शब्दों में कथात्मक रचनाओं के सन्दर्भ में प्रत्यक्ष प्रभाव के अप्रत्क्ष स्रोत का उद्गम-स्थल नेपथ्य होता है। साहित्यिक रचनाओं में नेपथ्य में सृजित प्रभाव के उद्देश्य (ऑब्जेक्ट) पर प्रक्षेपण के लिए उचित माध्यम या झरोखे (पैसेज) का होना भी आवश्यक है। नेपथ्य में सृजित प्रभाव रचना में शाब्दिक संक्षिप्तीकरण के साथ उसके रचनात्मक प्रभाव को बढ़ाता है और संप्रेषण की गति को त्वरित करता है। लेकिन नेपथ्य में सृजित प्रभाव के प्रक्षेपण के लिए उचित माध्यम या रास्ता नहीं मिलेगा, तो रचना में ऐसे नेपथ्य और उसमें सृजित प्रभाव का कोई प्रयोजन नहीं रह जायेगा। साधारण भाषा में एक सन्दर्भ के तौर पर नेपथ्य और उसमें सृजित प्रभाव को संयुक्ततः ‘नेपथ्य’ या ‘नेपथ्य का प्रभाव’ या ‘नेपथ्य की ध्वनि’ आदि सम्बोधन दिये जा सकते हैं। नेपथ्य का निर्माण रचना की माँग के साथ रचनाकार की लेखन पद्धति, रचनात्मक प्रभाव-सृजन की दिशा में उसकी जागरूकता और क्षमताओं पर निर्भर करता है। विशेषतः कथात्मक रचनाओं में दैहिक विस्तार स्वभावगत रूप से जितना अल्प होगा, वहाँ नेपथ्य के उतने ही अधिक प्रभावशाली उपयोग की गुंजाइश होती है। इसका उल्टा भी सच है। चूँकि लघुकथा स्वभावगत रूप से लघ्वाकारीय होती है, अतः जहाँ भी रचना की माँग के साथ समायोजन की गुंजाइश हो, नेपथ्य का समुचित उपयोग करना ही चाहिए। आश्चर्यजनक रूप से लघुकथा के सन्दर्भ में सर्वाधिक महत्वपूर्ण होते हुए भी नेपथ्य के मुद्दे पर बहुत अधिक चर्चा नहीं हुई है। नई पीढ़ी के लघुकथाकार मित्रों को इसका उपयोग अपने लघुकथा सृजन को प्रभावशाली बनाने में करना चाहिए।
      इन दोनों प्रश्नों से विलग, लघुकथा जगत के लिए यह प्रसन्नता का बड़ा कारण है कि विगत तीन-चार वर्षों में नए लघुकथा लेखक पर्याप्त संख्या में सामने आये हैं और उनमें प्रभावित करने वाले लेखकों की संख्या उम्मीद से अधिक है और लगातार बढ़ रही है। आने वाले समय में यह देखना रुचिकर होगा कि इन अच्छे लघुकथाकारों ने कितनी लघुकथाएँ लिखी हैं और उनमें प्रभावित करने वाली रचनाओं का प्रतिशत कितना है! 
     लगभग एक वर्ष पूर्व कुछ मित्रों ने मेरे आमंत्रण पर अपनी लघुकथाएँ इस आलेख श्रंखला हेतु मुझे भेजी थीं, उनमें से भोपाल के श्री कपिल शास्त्री की भी छब्बीस लघुकथाएँ मैंने पढ़ी हैं। उनके लेखन की प्रवृत्ति को समझने की नियति से कुछ और लघुकथाओं की खोज में मैं फेसबुक पर गया। वहाँ उनकी 2015 में पोस्ट की गई लघुकथाओं पर मेरी दृष्टि पड़ी। इस अत्यल्प समय अन्तराल में उनके लेखन में जो परिवर्तन और रुझान देखने को मिला, उससे स्पष्ट है कि कपिलजी लघुकथा को समझने का प्रयास गम्भीरतापूर्वक कर रहे हैं। भले लघुकथा लेखन उन्होंने काफी बिलम्ब से आरम्भ किया है लेकिन आयु-अनुभवों की दृष्टि से प्रौढ़ समझ (और अध्ययन-मनन) का लाभ उनके लघुकथा-लेखन को मिल रहा है। 2015 की रचनाओं में उनके पास कथ्य और विचार तो दिखाई देते हैं, उन्हें कथा का रूप देने का सिलसिला 2016 में आरम्भ होता है। 2016 में प्राप्त उनकी रचनाएँ, जिनमें कुछ पहले लिखी गई हो सकती हैं लेकिन उनमें कुछ सुधार किए गए होंगे, लघुकथा के दैहिक रूपाकार में अवश्य हैं, भले उनमें कई अच्छी लघुकथाओं के साथ कुछ कमजोर भी हैं। कम समय में कपिल शास्त्री ने जो सीखा-समझा है, वह निसन्देह प्रशंसनीय है और भविष्य के लिए उम्मीदें जगाता है। उनसे की गई चर्चा से भी यह स्पष्ट होता है कि फेसबुक से मिली लेखन की प्रेरणा को लघुकथा में साकार करने में उन्होंने अध्ययन-मनन के स्तर पर काफी परिश्रम किया है, जिसमें ‘पड़ाव और पड़ताल’ संकलन शृंखला के अध्ययन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने अपने समकक्ष अच्छा लिख रहे नए लघुकथा लेखकों को भी सूक्ष्मता से पढ़ा है और पढ़ रहे हैं, जो सीखने और आगे बढ़ने की उनकी ललक और लेखकीय समर्पण को दर्शाता है। यद्यपि उन्होंने लेखन काफी बिलम्ब से आरम्भ किया है लेकिन उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि संस्कृतिमय रहने के कारण कहीं न कहीं उनके अन्दर सुसुप्तावस्था में पड़े हुए सृजन के बीज अंकुरण की दिशा में बहुत पहले से अँगड़ाते रहे हैं। ये ऐसी चीजें हैं, जो उनके अन्दर भविष्य के एक समर्थ लेखक के उदय की आश्वस्ति देती हैं।
      कपिलजी की अधिकांश लघुकथाएँ मध्यम वर्ग की दिनचर्या से आती हैं। मध्यम वर्ग में ऐसे एकल परिवारों की संख्या काफी अधिक है, जो अपनी पृष्ठभूमि से उद्भूत प्रेरणाओं के कारण पैसा कमाने और जीवन को एन्ज्वॉय करने में विश्वास रखते हैं। पति-पत्नी और बच्चों तक सीमित इन परिवारों के दायित्व सीमित हैं, इसलिए इनके लिए जीवन को सहज-तरीके और आनन्द के साथ जीना आसान होता है। यद्यपि रोजगारदात्री कम्पनियों की अपेक्षाओं को पूरा करने के तनाव इन्हें परेशान भी करते हैं, लेकिन उन्हीं तनावों के विरुद्ध ये अपने जीवन को एन्ज्वॉयमेंट के माध्यम से प्रबन्धित करते हैं। ऐसी स्थितियों और क्षणों से जनित व्यवहार की तीव्र अनुभूतियाँ लघुकथा के लिए स्थान बनाती हैं। प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से कपिलजी का मन इस क्षेत्र में सबसे अधिक रमता है। बॉडी गार्ड, हार-जीत, आगंतुक, पापा, ये मोह मोह के धागे, रोजमर्रा, हौसला, वेलेंटाइन डे, कचौड़ी, व्यवहारिकता आदि जैसी लघुकथाएँ किसी न किसी रूप में ऐसी ही पृष्ठभूमि से जुड़ी हैं। विभिन्न प्रकार के खाँचे बनाने वाले विमर्श, जो लघुकथा और अन्य समकालीन लेखन को चर्चाओं के घेरे में बनाए रखते हैं, कपिल शास्त्री की लघुकथाओं में प्रत्यक्षतः बहुत स्थान प्राप्त नहीं कर पाये हैं। इसी प्रकार राजनैतिक विषयों एवं सन्दर्भों पर भी वह लघुकथा में उतरते दिखाई नहीं देते। वस्तुतः यह विमर्श और राजनीति-निरपेक्षता उनकी बड़ी ताकत बनती दिखाई देती है। 
      कपिल बड़ों और बच्चों के मध्य रिश्तों में व्याप्त मनोविज्ञान में रुचि लेते दिखाई देते हैं। पीढ़ी-अंतराल को न्यून करने की दृष्टि से यह अच्छा विषय है और इस पर सृजनात्मक चिंतन के लिए गुंजाइश भी पर्याप्त है। लेकिन इस विषय पर पर्याप्त सावधानी भी अपेक्षित है, जो सूक्ष्म दृष्टि और चिन्तन से ही संभव है। वैसे तो प्रत्येक विषय के सन्दर्भ में यह आवश्यक है कि यथार्थ चित्रण के प्रयास में नकारात्मक भाव की स्थापना में रचना सहयोगी न बन जाये, लेकिन बच्चों के सन्दर्भ में ऐसी चीजों का सही उपचार बहुत आवश्यक है। ‘चुल्लू भर पानी’ में टिंकू का अहसास ‘‘आज पापा की मेरे कारण इतनी बेइज्जती हुई और पापा बेचारे कुछ नहीं बोल पाये।’’ ठीक है लेकिन ‘‘यार टिंकू, फिर तो हमें चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए।’’ के साथ ही चश्मे वाली लड़की और उसकी माँ के एक नम्बर की कटौती पर बहते आँसुओं का सही समाधान नहीं हो पाया है। एक सशक्त होते लघुकथाकार के रूप में कपिलजी से इतनी अपेक्षा तो करनी ही होगी। उनसे हमारी ऐसी ही पाठकीय अपेक्षा ‘बॉडी गार्ड’ जैसी लघुकथाओं के सन्दर्भ में भी रहेगी। हाँ, उनकी इन लघुकथाओं में बच्चों और बड़ों के मध्य रिश्ते में जिस सकारात्मक भाव को उकेरा गया है, वह स्वागतेय है।
      कपिलजी की एक लघुकथा है ‘पंछी क्यों नहीं आते’। संवेदना के स्तर पर (शीर्षक बहुत उपयुक्त नहीं लगता) अच्छी लघुकथा है, लेकिन फ्लैश बैक और नेपथ्य के समुचित उपयोग से ऐसी लघुकथाओं के प्रभाव को कई बार गुणित किया जा सकता है। विशेष रूप से नेपथ्य के उपयोग और स्पष्टता पर कपिलजी को परिश्रम करना होगा। एक और बात, कपिलजी की कुछ रचनााओं का फार्मेट कुछ मित्रों को लघुकथा से इतर जैसा लगेगा। उनकी ऐसी ही दो लघुकथाएँ हैं- ‘हौसला’ और ‘आत्मनिर्भरता’। प्रचलित धारणाओं के दृष्टिगत कुछ समीक्षक कह सकते हैं कि ‘हौसला’ में दो असम्बन्धित दृश्यों को जोड़कर बिना किसी स्पष्ट कथ्य के रचना को समाप्त कर दिया गया है, इसलिए इसमें लघुकथा जैसा कुछ नहीं है। लेकिन इस रचना को थोड़ा सूक्ष्म दृष्टि से पढ़ने और नेपथ्य से निकलती ध्वनि को समझने की आवश्यकता है। ‘आत्मनिर्भरता’ भी लघुकथा ही है। परिभाषाओं के जाल में उलझे लोगों को ऐसी लघुकथाओं को स्वीकारने में समय लगेगा। कपिलजी दवा-व्यवसाय से जुड़े हैं, इस क्षेत्र की अच्छी समझ है उन्हें, इसलिए इस क्षेत्र के परिवेश से जुड़ी उनकी लघुकथाएँ भी सफल हैं।
       यहाँ मैंने कपिल शास्त्री की जिन पाँच लघुकथाओं को चुना है, वे उनकी प्रतिनिधि लघुकथाएँ होने के साथ उनके लघुकथा लेखन के सकारात्क बिन्दुओं को सामने रखती हैं और भविष्य में उनसे अच्छे लघुकथा सृजन की संभावनाओं की आश्वस्ति देती हैं। ये लघुकथाएँ हैं- पापा, वैलेंटाइन डे, पंगत, सेफ्टी वाल्व और ढोंग।
      लघुकथा मूलतः जीवन की सहजता और सरलता की पक्षधर होने के कारण जीवन से जुड़े हर पक्ष पर अपनी दृष्टि रखती है, इसलिए हर वह चीज जो जीवन को सहज-सरल बनाती है, लघुकथा को भी आगे ले जाती है। उसकी अर्थवत्ता, प्रभावोत्पादकता और व्यापकता के माध्यम से उसे बहुआयामी बनाती है। दूसरी बात, विशिष्ट महत्वाकांक्षाओं एवं उद्देश्यों से जनित संघर्ष से इतर जीवन में सहजता और सरलता प्रमुखतः भावनात्मक सम्बन्धों के पारस्परिक आकर्षण से ही आती है। इस दृष्टि से बच्चों, विशेषतः बेटियों और माता-पिता के मध्य स्नेहिल और भावनात्मक सम्बन्धों की सुगन्ध ने लघुकथा को विशेष आयाम प्रदान किए हैं। इस सन्दर्भ में वरिष्ठ पीढ़ी के साथ नई पीढ़ी ने भी कई प्रभावशाली लघुकथाएँ दी हैं। कपिल शात्री की लघुकथा ‘पापा’ भी उन्हीं में से एक है। बालपन में तो बच्चों की दुनिया प्रायः माता-पिता के इर्द-गिर्द होती है, इसलिए स्वाभाविक लगाव और आकर्षण को समझा जा सकता है, लेकिन जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं, उनकी दुनिया का विस्तार होता है। आकर्षण का एकाधिकार टूटता है और कई बार बच्चे माता-पिता के विरुद्ध भी खड़े हो जाते हैं। इसमें माता-पिता की ओर से भी कुछ कारण हो सकते हैं और बच्चों की ओर से भी, एक-दूसरे को न समझ पाने के। लेकिन बढ़ती उम्र के साथ माता-पिता की दुनिया बच्चों पर कहीं अधिक केन्द्रित होते जाने के कारण उनके बच्चों के हितैषी होने में सन्देह के कारण अत्यल्प होते हैं, ऐसे में उनकी भावनाओं को समझने और स्नेह-आकर्षण के रिश्ते को बनाए रखने की प्रक्रिया बच्चों के व्यवहार में कहीं अधिक महत्वपूर्ण होती है, जिसे इस लघुकथा में सिद्दत से देखा-समझा जा सकता है। बड़ी होती बेटी द्वारा अपनी दुनिया में पिता की सीख को हल्के में लेने के बावजूद उनके मध्य उभयपक्षीय आकर्षण बना रहता है। अन्ततः एक समयबिन्दु पर पिता की सीख को हल्के में लेने का परिणाम पिता के स्नेहाकर्षण की गहराई और उसके प्रति स्वीकारोक्ति बेटी के व्यवहार में उतरकर दुःखद क्षण में भी जीवन-प्रवाह की सुखद अनुभूति का सम्प्रेषण करती है। अनुभूति का एक झोंका ऐसा आता है, गोया बेटी की दुनिया भी पिता के इर्द-गिर्द ही सिमटी हो। यही तो लघुकथा है! शिल्प के स्तर पर भी रचना अच्छी है, लेकिन तीसरे पैराग्राफ के पहले वाक्य में आरुषि का नाम लाना और उसके बाद पूरी बात ‘मैं’ से कहलवाना, शिल्पगत विसंगति है। ‘‘आरुषि की आँखों के...’’ के स्थान पर ‘‘मेरी आँखों के...’’ शब्दों का उपयोग सही होगा। तीसरे पैराग्राफ में पहले वाक्य के बाद का दृश्य पार्श्व में मान लेने पर भी बात बनती नहीं दिखती।
      जीवन में प्यार के अहसास की गर्माहट सदैव खुशियों को गुणित करने और रिश्तों को जीवंत रखने की क्षमता रखती है। लेकिन नियमित रिश्तों में प्यार के अहसास को बनाये रखने के लिए स्थितियों-परिस्थितियों पर विजय प्राप्त करनी होती है, संकल्पबद्ध होना होता है। आवश्यक अनुकूलताओं के बावजूद आम गृहस्थ लोगों में यह भावना और संकल्पबद्धता या तो होती नहीं या बहुत कम होती है। इसके कई मनोवैज्ञानिक कारण गिनाए जा सकते हैं लेकिन ऐसे कारणों को गिनाकर न तो जीवन में ताज़गी लाई ला सकती है, न ही गुम होते प्यार के अहसास को पुनर्जीवित किया जा सकता है। इसलिए कारणों के लिए स्मृतियों को खगालने की बजाय होना यह चाहिए कि सामने से गुजरते दृश्यों में प्रेरणा के सूत्रों को तलाशा जाये और यथार्थ को स्वीकार किया जाये। अहसास को उभरने दिया जाये। कपिल शास्त्री ‘वैलेंटाइन डे’ में इसी सर्द अहसास को गर्माहट देते दिखते हैं। कार वाश करके जीवन को जीवंत रखने वाला इंजीनियरिंग का वह छात्र पैसे न मिलने पर भी अपनी प्रेमिका के साथ वैलेंटाइन डे पर खुश है। विपरीत स्थिति में दिखने वाला यही भाव लघुकथा के ‘वह’ को उसके जीवन में खत्म होते जा रहे प्यार के अहसास को पुनर्जीवित करने की प्रेरणा देता है। लघुकथा इसी बिन्दु पर अपने ‘विशिष्ट’ को प्राप्त करती है कि ‘वह’ उस लड़के को उसकी गर्ल फ्रेन्ड के साथ देखकर वैलेंटाइन डे का एक आम क्रियाकलाप मानकर किसी कथित संकोच के साथ एन्ज्वॉय करता हुआ निकल नहीं जाता, अपितु उसमें रुचि लेता है, उसके बारे में पत्नी से बात करता है और अन्ततः उसमें अपने प्यार के लिए संकल्पबद्धता की प्रेरणा का सूत्र ग्रहण करता है। 
       ‘पंगत’ सामाजिक और सार्वजनिक आयोजनों में सहभोज की व्यवस्था के माध्यम से संस्कृति और परम्पराओं में आ रहे बदलावों के चरित्र की कथा है। इसके केन्द्र में जो महसूस करने वाला अहसास है, उसका कारण कुछ लोगों को पीढ़ीअन्तराल लग सकता है। किन्तु आयोजनों की व्यवस्था जिस दिशा में जा रही है, यदि कुछ आवश्यक समायोजन नहीं किए गए तो कुछ समय बाद वह सामाजिकता के ताने-बाने को समाप्त करने वाली ही सिद्ध होगी। प्राचीन व्यवस्था में भोजन ग्रहण करने के लिए अतिथियों से मान-मनुहार किया जाता था, जिससे भोजन करने में आनन्द आता था और पारस्परिक स्नेह-सम्बंध भी प्रगाड़ होते थे। वर्तमान व्यवस्था में भोजन के लिए कोई किसी को पूछता नहीं, स्वतः ही लाइनों में लगना पड़ता है। कई आयोजनों में तो कई-कई जगह (प्रत्येक काउन्टर पर) लाइन में लगना पड़ जाता है। लाइनों की वजह से कई बार झगड़े तक की स्थिति बन जाती है, कई अतिथियों को अपमान के घूँट पीने पड़ जाते हैं। जो लोग इस आधुनिक व्यवस्था को आत्मसात् नहीं कर पाये हैं, वे क्षुब्धता-बोध का शिकार हो जाते हैं और कभी-कभी बिना भोजन किए ही वापस चले जाते हैं। आयोजकों और आमंत्रितों के मध्य ईवेन्ट मैनेजमेंट कम्पनियाँ आ गई हैं। ये कम्पनियाँ व्यावसायिकता के नाम पर कभी-कभी अत्यधिक संवेदनहीनता का परिचय देकर अतिथि और आतिथ्य की परिभाषा ही बदलती दिखाई देती हैं। इस तरह की व्यवस्थाओं को आरम्भ करने का प्रमुख उद्देश्य था, आयोजक कार्यों की देखभाल से मुक्त होकर अतिथियों से मिल सकें, उनका व्यक्तिगत स्वागत कर सकें, लेकिन व्यवस्था किन्हीं और दिशाओं में जाती दिखाई दे रही है। यद्यपि लघुकथा ‘पंगत’ मूलतः भोजन-व्यवस्था पर ही टिप्पणी करती है, लेकिन इसका संकेत व्यवस्था के पूरे ढाँचे के सन्दर्भ में समझे जाने योग्य है। लघुकथा के कथ्य को पीढ़ी अन्तराल की सोच से देखना सामाजिक ढाँचे पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को उपेक्षित करना होगा। इसलिए इस लघुकथा के संकेताक्षरों को व्यापक महत्व दिया जाना चाहिए।
     अपने अधिकारों के लिए महिलाओं का आक्रोश इस अर्थ में तो समझ में आता है कि अपने ऊपर होने वाली ज्यादती और जीवन को असहज करने वाली चीजों को क्यों सहा जाये! किन्तु उस स्थिति में, जब जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आवश्यक संसाधन पति और परिवार अपने दम पर जुटाने में समर्थ हो, यदि कोई व्यक्ति अपने अधिकार या पैतृक सम्पत्ति में अपने हिस्से के लिए माता-पिता से माँग नहीं करता या जोर-जबरदस्ती नहीं करता तो इसके लिए पत्नी का जीवन को असहज करने वाला असीमित आक्रोश कैसे उचित माना जा सकता है! कई स्वाभिमानी पुत्र आज भी ऐसे होते हैं, जो अपने स्वाभिमान की रक्षार्थ और जीवन को शान्तिपूर्ण ढंग से जीने के लिए माता-पिता की सम्पत्ति में अपना हिस्सा स्वेच्छा से छोड़ देते हैं। लेकिन व्यवहार में पत्नी का आक्रोश उन्हें उसी तरह झेलना पड़ता है, जैसे कपिल शास्त्री ने ‘सेफ्टी वाल्व’ में दर्शाया है। ‘सेफ्टी वाल्व’ एक पत्नी के विकराल आक्रोश का प्रभाशाली चित्र है। वेवश पति के समक्ष स्थिति से निपटने का कोई रास्ता नहीं है, सिवाय कार्पोरेट कल्चर से मिली इस सीख के कि वाष्प निकलते समय प्रेशर कुकर के सेफ्टी वाल्व के ढक्कन की तरह नाचता रहे। लघुकथा इन आक्रोशवान महिलाओं का ध्यान उनके अपने आक्रोश के औचित्य पर आकर्षित कर सकती है कि वे अपनी बुद्धिमत्ता के प्रश्न पर विचार करें। निसन्देह कुछ स्थितियाँ ऐसी भी होती हैं, जिनमें सहज जीवन के स्तर तक आते-आते महिलाओं को अपने सम्बन्धियों की ओर से काफी कुछ झेलना पड़ा होता है। मन में कुछ घाव हो जाते हैं, जो आसानी से भरते नहीं। किन्तु इस स्थिति में भी विकराल आक्रोश से घाव भरने वाले नहीं हैं। पति को प्रताड़ित करके, आक्रोशित होकर स्वयं के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करके और अपने परिवार में जीवन के लिए असहज वातावरण बनाकर कुछ भी हासिल नहीं हो सकता। अधिकारों को प्राप्त करने के आक्रोश रहित तरीके हो सकते हैं। यथार्थ चित्रण और संकेताक्षरों की प्रस्तुति के सन्दर्भ में लघुकथा अपनी स्वाभाविकता के लिए अच्छे अंक पाने की हकदार है। शिल्प के स्तर पर भी रचना अच्छी है लेकिन ‘पुराने गड़े मुर्दे’ के स्थान पर ‘गड़े मुर्दे’ ही पर्याप्त होगा। 
       सोशल मीडिया, विशेषतः फेसबुक से बन रही परम्पराओं में भी कुछ चीजें व्यापक स्तर पर निकलकर आई हैं, जिसके कारण इस पर दिखावा-प्रदर्शनों का प्रचलन बड़ा है। यहाँ फैशन और दिखावे के नए-नए तौर-तरीके नित्य देखने को मिलते हैं और लोगों में इससे प्रचार और खुशियाँ प्राप्त करने की लालसा लगातार बढ़ रही है। लघुकथा ‘ढोंग’ इस यथार्थ को प्रतिबिम्बित करती है। फेसबुक पर कई अधेड़ जोड़ों के प्रेमपूर्वक खिंचवाए फोटोज के आकर्षण में प्रदीपजी भी अपनी पत्नी को वेस्टर्न ड्रेसेज पहनने के लिए प्रेरित करते हैं। उनका सोचना है कि तमाम जिम्मेवारियों से मुक्त होने के बाद अब वे दोनों पति-पत्नी भी फेसबुक से मिलने वाली खुशियों को एन्जॉय कर सकते हैं। लेकिन जिम्मेवारियों से मुक्त हो जाने वाली बात पत्नी को अतीत में धकेल देती है। उसे जीवन के कड़वे अतीत की तमाम घटनाएँ याद आती चलीं जाती हैं। मन में बसी कड़वाहट इन शब्दों में अभिव्यक्ति पाती है- ‘‘...तुम्हें अब मेरी खुशियों का खयाल आया। सिर्फ वेस्टर्न ड्रेसेज पहनाकर और फेसबुक पर फोटो डालकर तुम मुझे सुखी नहीं दिखा सकते।’’ पत्नी के उत्तर में बरसों की खामोशी टूटी तो पतिदेव को लगा जैसे वह निर्वस्त्र होते जा रहे हों। फेसबुक जैसे माध्यम निसन्देह सामाजिक जीवन में बदलाव ला रहे हैं, लेकिन वे आइना भी दिखा रहे हैं। इन क्रियाकलापों में हो सकता है भविष्य के जीवन की कुछ बेहतरी के सूत्र छिपे हों। इस तरह की खुशियों का आकर्षण जीवन में वास्तविक और सकारात्मक प्रेरणाएँ ला सकेगा, ऐसी उम्मीद तो की ही जा सकती है। इस लघुकथा का यही संकेत है।
     कपिलजी लघुकथा में मानवीय जीवन की घनीभूत अनुभूतियों को प्रस्तुत करने में सक्षम हैं, इस दिशा में वह विशेष दक्षता हासिल कर सकते हैं। निश्चित रूप से वह स्वयं भी इस बात को समझते होंगे कि कोई भी रचनाकार अपने सशक्त बिन्दुओं को पहचान कर और उन्हें केन्द्र में रखकर अपेक्षाकृत अधिक गति से और अधिक आगे तक जा सकता है।
कपिल शास्त्री की चयनित लघुकथाएँ 
01. पापा
    भुर...भुर...भुर... की आवाज़ आने लगी, लगता है पापा आ गए। पापा ने मोटरसाइकिल पर बैठे-बैठे ही गाड़ी टेढ़ी करके लोहे का गेट खोला, अब मैं पापा के लिए दरवाज़ा खोलूँगी, मम्मी तो अम्मा के साथ चौके में खाना बना रहीं हैं, उन्हें तो पता ही नहीं है। मैंने तो सब लोहे की जाली में से देख लिया।
    सिटकनी तक मेरा हाथ नहीं पहुचता है, ऐसा करती हूँ एक कुर्सी खींचकर लाती हूँ, उस पर चढ़कर तो पहुँच ही जायेगा। पापा को जाली में से देखते साथ ही चिल्ला दी- ‘‘पापा!’’ अरे ये क्या! पापा को विश्वास ही नहीं कि मैं भी दरवाज़ा खोल सकती हूँ। उन्होंने डोर बेल बजा दी, इतने में ही मम्मी भी आ गयी। लो मेरी सारी मेहनत गयी पानी में। ‘‘नहीं, मैं दरवाज़ा खोलूँगी’’ मैं जोर-जोर से अलड़ाने लगी। मम्मी भी मुझे गोद में लेकर बोलीं, ‘‘लो भई, आज पापा के लिए हमारी गुड़िया रानी ही दरवाज़ा खोलेगी और मुझी से सटकनि खुलवाई। मैं और मम्मी दोनों पापा को देखकर बहुत खुश हो गयीं। मम्मी ने एक गाना भी सिखाया था. ‘‘सात समंदर पार से, गुड़ियों के बाजार से, अच्छी-सी गुड़िया लाना, गुड़िया चाहे ना लाना, पप्पा जल्दी आ जाना।’’
    बचपन का यह सारा दृश्य आज अस्पताल में बेड पर पड़े-पड़े आरुषि की आँखों के आगे घूम रहा था। एक समय था जब मैं जाली में से देखकर पापा के लिए दरवाज़ा खोलती थी, आजकल जब मैं स्कूटी दनदनाते हुए आती थी तो उसी जाली में से देखकर पापा खोलते थे और कहते थे- ‘‘मुँह तो बाँध लेती हो, हेलमेट भी लगा लिया करो, आजकल बहुत एक्सीडेंट हो रहे हैं। बाहर जाती हो तो तुम्हारी चिंता रहती है, जरा धीरे चलाया करो, पुलिस पकड़ लेगी।’’ मैं पापा की बात को मज़ाक में उड़ा देती थी कि बाल ख़राब हो जायेंगे और लड़कियों को पुलिस नहीं पकड़ती। अरे पापा, हम लोग तो ट्रिपलिंग भी कर लेते हैं! यही सब सोचते-सोचते, पता नहीं कब नींद लग गयी।
    अचानक सिर पर किसी के स्पर्श से आँख खुली। देखा, पापा हैं। मैं उन्हें देखकर रोने लगी- ‘‘पापा, छिले हुए हाथ-पैरों में बहुत दर्द हो रहा है।’’ पापा मुस्कुराकर बोले- ‘‘अच्छा हुआ कोई फ्रैक्चर नहीं है।’’ फिर वही पुराना शेर मारा जो अक्सर बचपन में भी मेरे गिरने पर मारा करते थे- ‘‘शह सवार ही गिरते हैं मैदाने जंग में’’। मैंने फिर चिढ़कर पापा के सीने पर हल्का सा मुक्का मारने की कोशिश की लेकिन हाथ उठाते ही नहीं बना, बहुत दर्द था और सेलाइन लगी हुई थी। मेरी इच्छा हुई कि उठकर पापा के सीने से लग जाऊँ पर उठते भी नहीं बना, सिर्फ आँखों की कोर से आँसू लुढ़क पड़े। पापा ने मेरी तक़लीफ़ देखते ही मेरा माथा चूम लिया। 



02 वैलेंटाइन डे
    इस बार वैलेंटाइन डे सन्डे को पड़ा था। शाम को श्रीमतीजी को न्यू मार्केट ले जाते वक्त, ट्रैफिक सिग्नल पर लाल बत्ती होते ही मैं उससे नज़र बचाकर प्रेमी जोड़ों को हाथ में हाथ डालकर घूमते हुए देख रहा था और सोच रहा था कि हम तो इजहारे मोहब्बत भी नहीं कर पाये और समाज ने हमारी दस्तानों को लघुकथा में तब्दील कर जल्दी से दी एन्ड कर दिया। तभी एक परिचित चेहरा दिखा, याद आया ये तो वही इंजिनीयरिंग पढ़ रहा लड़का है जो हमारे अपार्टमेंट में हर सन्डे कार वाश के लिए आता है और चार सौ रुपये महीने लेता है, आठ-दस गाड़ियों से चार हज़ार कमा लेता है। पिछले दो सन्डे को उसने नागा कर दिया था लेकिन आज सुबह आया था और कुछ पैसों की अपेक्षा की थी। किन्तु पत्नीजी उसकी दो छुट्टियों से पहले ही भुनभुनाई हुई थी इसलिए कह दिया और दो सन्डे करो तब पेमेंट करूँगी। उसने कोई तकाजा नहीं किया और चुपचाप चला गया।
    मैंने पत्नी को बताया कि ‘‘मैंने उसे अपनी गर्लफ्रेंड के साथ घूमते हुए देखा, कम से कम आज के दिन तुम्हें ये बनिया बुद्धि इस्तेमाल नहीं करनी थी। आज उसे सख्त ज़रुरत होगी।’’
    वो भी अफ़सोस जताते हुए बोली ‘‘हाँ, सुबह ये बात तो दिमाग में ही नहीं आई लेकिन तुम्हें उसकी गर्लफ्रेंड की गिफ्ट की फिकर हो रही है खुद तुमने इतने सालो में मुझे प्यार से कोई गिफ्ट दी है!’’ मैंने महसूस किया- ‘‘हाँ, प्यार का वो अहसास ख़त्म होता जा रहा है।’’
    आगे फूलों की दुकान पर मैंने कार रोक दी और एक लाल गुलाब का बुके खरीद कर पेशे खिदमत करते हुए फ़रमाया, ‘‘चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों और तुम बन जाओ मेरी वैलेंटाइन, हैप्पी वैलेंटाइन डे।’’
    ‘‘थैंक्स’’ के साथ चेहरे पर आई मुस्कराहट में वो अहसास पुनर्जीवित हो चुका था और मैं उस आत्मस्वाभिमानी, प्यार करने वाले लड़के का शुक्रिया अदा कर रहा था। 



03. पंगत
      हाथ-पैर धोने के बाद जैसे ही कृष्णकांतजी ने हॉल में प्रवेश किया, पहली पंगत में अधिकांश लोग बैठ चुके थे। राधेश्यामजी और नारायणजी के पास जगह खाली थी सो उन्होंने देखते ही पुकारा- ‘‘अरे कैं वकील साब, इधर ही पधारो नी, हमारे पास विराजो नी।’’ वो भी उनके पास आलकी-पालकी मांडकर बैठ गए। फ़ौरन ही उनके सामने भी दोने, पत्तल और गिलास लगा दिए गए।
      परिवार और मोहल्ले के ही कई युवक पंगतों के बीच से डोंगे लिए दौड़ते-भागते प्रत्येक व्यंजन परोसते जा रहे थे। जब सभी के पत्तल-दोने, सभी व्यंजनों से परिपूर्ण हो गए तब लोगों ने भगवान् का भोग निकालकर अंचली छोड़कर एक साथ भोजन आरम्भ किया। उदरस्थ किये गए भोजन से पत्तल में हुए खाली स्थान पर परोसने वालों की ही नहीं, मित्रों की भी बराबर नज़र थी। पूरियाँ ख़त्म होते ही नारायणजी ने आवाज़ लगाई- ‘‘अरे नानू, वकील साब ने गरमागरम पूरी परोसे नी और म्हारे भी रायता लै दे और राधेश्याम ने बेसन की चक्की और परोसे नी।’’
      भरपेट भोजन से तृप्त होने के बाद अतिरिक्त मिष्ठान्न परोसे जाने पर उन्होंने पत्तल को अपनी हथेलिओं से ढँककर क्रॉस बना लिया और बोले- ‘‘अरे, अरे, कै कर रिये हो महाराज, बस बस, पेट फटी जायगो।’’ आसपास बैठे मित्रों ने उनके एक-एक हाथ खींचकर वो क्रॉस भंग करवा दिया और बोले- ‘‘परीस, परीस, वकील साब ने, बस में भी कंडक्टर की जगह तो होवे ही, अभी तो श्रीखंड का एक दोना और जिमाना है।’’
      डी.जे. की तेज ध्वनि से यकायक तंद्रा भंग हुई तो खुद को पुरानी यादों से एक भव्य विवाह समारोह के बुफे में खड़ा पाया। यहाँ अनेक स्टाल्स लगे हुए थे, वहाँ गए तो प्लेट्स नहीं दिखीं, पूछने पर पता पड़ा वो बीचोबीच स्थित है सलाद के साथ। फिर एक चक्रव्यहू में संघर्षरत होते हुए महिलाओं से अपेक्षित दूरी बनाये रखते हुए प्लेट को सजाने की चुनौती को बखूबी अंजाम दिया और यथासंभव उदरपूर्ति की। प्लेट रखने गए तो लोगों की छोड़ी गयी जूठन से अन्नदेव का ऐसा अनादर देख मन व्यथित हो गया। पानी का स्टाल ग्राउंड के दूसरे कोने पर था जहाँ सिर्फ दो कंटेनर से दो लोग ही मिनरल वाटर पी पा रहे थे बाकी डिस्पोजेबल गिलास हाथ में लिए उनके हटने का इंतज़ार कर रहे थे।
      लौटते समय वही पुराने मित्र मिल गए तो चेहरे पर प्रसन्नता आ गयी मगर आँखों में एक प्रश्न था, ‘‘वो मान-मनुहार अब कहाँ गयी!!!’’



04. सेफ्टी वाल्व 
      प्रेशर कुकर गैस पर चढ़ाकर अनु पति अविनाश पर बरस पड़ी।
      ‘‘अब तो तुम्हारी शकल देखकर भी गुस्सा आता है, आखिर हो तो उन्हीं का खून। किस मनहूस घडी में तुम मेरी सीढ़ी चढ़े।’’ कुकर के तापमान के साथ उसका पारा भी चढ़ता जा रहा था।
      ‘‘मैं तो हर रिश्ते में ठगी गयी, सबने मेरा इस्तेमाल ही किया। माँ-बाप क्या, सास-ससुर क्या, भैया-भाभी क्या और ननंद-नंदोईजी ने तो बंटाढार ही कर दिया। चुगली कर-करके घर से ही निकलवा दिया और रही-सही कसर तुमने घर छोड़ कर पूरी कर दी, कोई तकाज़ा भी नहीं किया, जो उन्होंने बाद में ठिकाने लगा दिया।’’
      अविनाश ने टालते हुए कहा- ‘‘अब, जब हमने सब कुछ अपने दम पर बना लिया है तो क्यों पुराने गड़े मुर्दे उखाड़ रही हो।’’
      ‘‘मुर्दे पुराने हैं तो क्या हुआ, ज़ख्म तो हरे हैं। अपने घर वालों के खिलाफ तो कुछ सुन ही नहीं सकते न, सही है, मैं तुम्हारे लिए अपना खून भी बहा दूँ तो क्या हुआ, मैं तो गैर हूँ न! घुटना तो पेट की तरफ ही मुड़ेगा न!’’ अनु ने फिर कुरेदा।
    पहली और दूसरी की तरह इधर तीसरी बार भी सीटी बजने पर सेफ्टी वाल्व से निकल रही वाष्प से ढक्कन कमर हिला-हिला कर नाच रहा था फिर बैठ जा रहा था, जैसे वो अवांछित वाष्प के निकल जाने से खुद की और कुकर की सलामती के लिए प्रसन्न तो था मगर डरा भी हुआ था। गैस बंद कर दी गयी।
      ‘‘बस कुकर ज़रा ठंडा हो जाने दो, फिर खाना लगाती हूँ।’’ इस बार अनु की आवाज़ में कुछ ठंडक लगी।
      अविनाश को लगा जैसे वो स्वयं इन वाष्परूपी ज़ख्मों के ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठा हुआ एक ढक्कन है, ‘‘अगर वो नाच सकता है तो भड़ास निकलते वक्त मैं क्यों नहीं।’’ भोजन के पश्चात् वो भी कमर हिलाते हुए बाय कह कर निकल लिया। 



05. ढोंग
      ‘‘अब तो तुम भी वेस्टर्न ड्रेस्सेस पहन सकती हो।’’ फेसबुक पर कई अधेड़ जोड़ो के प्रेमपूर्वक खिंचवाए फोटोज को दिखाकर प्रदीपजी अपनी धर्मपत्नी सरोज से बोले।
      ‘‘अब तो से तुम्हारा क्या मतलब है?’’ सरोज ने पूछा।
      ‘‘मतलब, अब तो माताजी-पिताजी भी गुजर चुके हैं, दोनों बेटियाँ और बेटा बाहर पढ़ रहे हैं। अब तो हम भी एन्जॉय कर सकते हैं।’’ प्रदीप जी ने स्पष्ट किया।
      गुजरी घटनाओं की यादों ने जैसे सरोज के दिल पर पत्थर रख दिया हो। भारी-भरकम दहेज के साथ संस्कारी बहू की मांग, फिर लड़खड़ाते व्यापार के लिए पिता से बेटी को सुखी रखने की शर्त, पहली दो बेटियों के होने पर वारिस न दे पाने के ताने।
    हर मांग के साथ पिताजी के माथे की सिलवटें बढ़ती गयी और कमर झुकती गयी। पति का भी शराब और शवाब को व्यापार का ही हिस्सा बताना और उसी नशे में उसे भी वारिस पैदा करने वाली मशीन की तरह इस्तेमाल करना।
      ‘‘क्यों क्या हुआ?’’ उदास देखकर पति ने पूछा।
      ‘‘नहीं, अब बहुत देर हो चुकी है। मेरे पिताजी की कमर टूट चुकी है, वो तो हमेशा ही मुझे सुखी देखना चाहते थे पर तुम्हें अब मेरी खुशियों का ख्याल आया। सिर्फ वेस्टर्न ड्रेसेस पहना कर और फेसबुक पर फ़ोटो डालकर तुम मुझे सुखी नहीं दिखा सकते।’’
    सरोज के उत्तर में बरसों की ख़ामोशी टूटी थी और प्रदीप जी को लग रहा था जैसे वो निर्वस्त्र होते जा रहे हैं।

  • कपिल शास्त्री, निरुपम रीजेंसी एस-3, 231ए/2ए साकेत नगर. भोपाल, म.प्र./ मो. 09406543770
  • डॉ .उमेश महादोषी, 121, इन्द्रापुरम, निकट बी.डी.ए. कॉलोनी, बदायूँ रोड, बरेली, उ.प्र./मो. 09458929004

मंगलवार, 3 अक्टूबर 2017

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  6,   अंक  :  07-10,  मार्च-जून 2017





लघुकथा : अगली पीढ़ी

डॉ. संध्या तिवारी



{लघुकथा की दूसरी व तीसरी पीढ़ी के लघुकथा लेखन पर केन्द्रित इस स्तम्भ का आरम्भ अविराम साहित्यिकी के मुद्रित प्रारूप में जनवरी-मार्च 2015 अंक से किया गया था। उसी सामग्री को इंटरनेट पर अपने पाठकों के लिए भी हम क्रमशः उपलब्ध करवाना आरम्भ कर रहे हैं। इस स्तम्भ का उद्देश्य लघुकथा की दूसरी व तीसरी पीढ़ी के लघुकथा लेखन में अच्छी चीजों को तलाशना और रेखांकित करना है। अपेक्षा यही है कि ये लघुकथाकार अपने समय और सामर्थ्य को पहचानें, कमजोरियों से निजात पायें और लघुकथा को आगे लेकर जायें। यह काम दो तरह से करने का प्रयास है। सामान्यतः नई पीढ़ी के रचनाकार विशेष के उपलब्ध लघुकथा लेखन के आधार पर प्रभावित करने वाले प्रमुख बिन्दुओं व उसकी कमजोरियों को आलेखबद्ध करते हुए समालोचनात्मक टिप्पणी के साथ उसकी कुछ अच्छी लघुकथाएँ दी जाती हैं। दूसरे प्रारूप में किसी विशिष्ट बिषय/बिन्दुओं (जो रेखांकित करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण हो) पर केन्द्रित नई पीढ़ी के लघुकथाकारों की लघुकथाओं में उन लघुकथाकारों की रचनात्मकता के बिन्दुओं की प्रस्तुति कुछ महत्वपूर्ण लघुकथाओं के साथ देने पर विचार किया जा सकता है। प्रस्तुत लघुकथाकारों से अनुरोध है कि समालोचना को अन्यथा न लें। उद्देश्य लघुकथा सृजन में आपके/आपकी पीढ़ी के रचनाकारों की भूमिका को रेखांकित करना मात्र है। कृष्णचन्द्र महादेविया एवं दीपक मशाल के बाद इस अंक में हम डॉ. संध्या तिवारी पर प्रस्तुति दे रहे हैं। -अंक संपादक}

रचनात्मक विमर्श को सृजन में ढालती लघुकथाकार : डॉ. उमेश महादोषी

       आज लघुकथा एक स्थापित विधा है और विविध मानवीय पक्षों की अभिव्यक्ति-कला की दृष्टि से कथा साहित्य में केन्द्रीय भूमिका प्राप्त करने की ओर बढ़ रही है। दूसरी ओर इस विधा में नई प्रतिभाओं की खोज एवं उन्हें प्रोत्साहित-स्थापित करने के प्रयास भी विगत दो वर्षों में काफी तेज हुए हैं। इसके बावजूद कुछ चीजें निराशाजनक हैं। अनेक नये जुड़ रहे लघुथाकार सामान्यतः लघुकथा को समझकर लिखने की बजाय या तो सुविधा की दृष्टि से या फिर पुराने लघुकथाकारों से प्रेरित होकर लिखते दिख रहे हैं। कई पुराने लघुकथाकार लम्बे समय से लघुकथा लेखन में सक्रिय होने के बावजूद आज तक लघुकथा को ठीक से नहीं समझ पाए। इनमें से कुछ सृजन से इतर अपने महत्वपूर्ण कार्य के कारण नए लघुकथाकारों के लिए आकर्षण का केन्द्र बन गए हैं। योगदान विशेष के सन्दर्भ में यह अच्छी बात है। लेकिन नए रचनाकार ऐसे वरिष्ठों को प्रेरणास्रोत मानकर लघुकथा सृजन में इनका अनुसरण करने लगते हैं, तब समस्या पैदा होती है। यह स्थिति अच्छी नहीं मानी जा सकती। इससे बहुधा अनपेक्षित परिणाम ही सामने आते हैं। लघुकथा में कई तरह के बाह्य आकर्षण हैं, उसमें लेखन के नाम पर कुछ सुविधाएँ भी जुड़ी हैं। ये आकर्षण और सुविधाएँ रचनाकारों पर तब तक हावी रहेंगी, जब तक वे लघुकथा के वास्तविक मर्म, सौन्दर्य और यथार्थ को समझने का प्रयास नहीं करेंगे। कालजयी सृजन अनुभवों और भोगी हुई पीड़ा से निकलता है। लेकिन विविध मानवीय पक्षों पर सकारात्मक और सूक्ष्म चिंतन भी अनुभवजन्य स्थितियों के समीप ले जाता है। लघुकथा के नए लेखकों को यह भी सीखना होगा कि एक चित्र को देखकर वैसा ही खूबसूरत चित्र बनाने और अच्छे चित्र से प्राप्त सौन्दर्य प्रेरणा को अपने विचारों और अनुभवों में उतारने में अन्तर होता है। कई नए लघुकथा लेखक सुन्दर रचनाएँ लिख रहे हैं, लेकिन इस सुन्दर लघुकथा लेखन को मौलिक रूप देना भी आवश्यक है। मौलिकता आपके अनुभवों में हो सकती है, आपके प्रस्तुतीकरण में, भाषा-शैली और वातावरण में हो सकती है, आपके सृजित सौन्दर्य बोध में हो सकती है। पात्रों की प्रकृति और चरित्र में भी हो सकती है। रचना के जिस भी कोने में आप मौलिकता को स्थापित करें, लेकिन बिना इसके आप सृजन में अपने चिंतन और मूल्यबोध को स्थापित कर नहीं सकेंगे। 
      आज लघुकथा के क्षेत्र में दूसरी और तीसरी पीढ़ी के अनेक रचनाकार आ चुके हैं। इनमें कुछ निसन्देह जागरूक और लघुकथा लेखन के यथार्थ को समझने का प्रयास कर रहे हैं। अपने लेखन के साथ निरन्तर सीखने की ललक साथ लेकर और सूक्ष्म चिंतन के साथ जुड़ने के प्रयास के साथ आगे बढ़ रहे हैं। उनके लघुकथा सृजन में इसके प्रमाण भी देखने को मिल जाते हैं। डॉ. संध्या तिवारी ऐसी ही लघुकथाकार हैं। यद्यपि वह साहित्य की सभी विधाओं में लेखन कर रही हैं और स्वभाव से कवयित्री हैं लेकिन लघुकथा में उनकी पैठ अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देती है। उन्होंने नाटक के क्षेत्र में सृजन, अभिनय और निर्देशन भी किया है, पेटिंग में भी काम किया है। इन क्षेत्रों में उन्हें जिला/क्षेत्रीय स्तरों पर काफी प्रशंसा मिली है और कुछ पुरस्कार भी प्राप्त हुए हैं। वह हिन्दी एवं संस्कृत की विद्यार्थी रही हैं। हिन्दी में शोध और अध्यापन किया है। युवा वय से जुड़ी ऊर्जा उनके पास है। एक महाविद्यालय की प्राचार्य होने के नाते प्रशासनिक स्थितियों का अनुभव है। चचेरे दादा जी और ताऊ-ताई जी की कविता में अच्छी दखल होने के नाते परिवार में कविता का वातावरण भी उन्हें प्राप्त रहा है। इन सब चीजों ने उन्हें स्वाभाविक लेखन से जोड़ा है। हाँ, संकोची स्वभाव और प्रत्यक्ष प्रोत्साहन की कमी ने कहीं न कहीं उनकी सक्रियता को बाधित अवश्य किया है। अच्छी बात उनके साथ यह रही है कि उन्होंने केवल वही लिखा, जिसने उनके अन्तर्मन को प्रभावित किया। अन्तर्मन के पटल पर जब कोई चीज अपना प्रभाव जमाती है तो परिणामी लेखन कहीं न कहीं रचनात्मक सौन्दर्य और उद्देश्यपरकता के साथ सामने आता है। संध्याजी के लघुकथा लेखन का आरम्भ सुविधाभोगी तौर-तरीकों से होने के बावजूद अन्तर्मन में पैठे स्वाभाविक साहित्य बीजों के योगदान के कारण और दूसरी ओर संक्षिप्त ही सही, डॉ. बलराम अग्रवाल, सुकेश साहनी जैसे वरिष्ठ और अनुभवी लघुकथाकारों के साथ कुछ स्तरीय पत्रिकाओं में कथा साहित्य के अध्ययन के कारण सही दिशा पकड़ने में सफल हो गया है। फेसबुक के माध्यम से आये लघुकथाकारों के बीच से निकलने के बावजूद उन्होंने अपनी स्वाभाविकता को नहीं छोड़ा है। चूँकि उन्हें लघुकथा सृजन में अभी बहुत थोड़ा समय ही हुआ है, अतः भविष्य में अध्ययन-मनन की प्रक्रिया उनके रचाव और सृजन को सम्भावनाओं के व्यापक फलक पर स्थान देगी, यह विश्वास किया जा सकता है।
     डॉ. संध्या तिवारी की 30-32 लघुकथाएँ पढ़ने का अवसर मुझे मिला है। उनके लघुकथा सृजन में दो-तीन बातें विशेष रूप से प्रभावित करती हैं। पुराने विषयों को भी वह नए जैसे रूप में प्रस्तुत करने में सक्षम हैं। सृजन शैली पर कविता का प्रभाव है, लेकिन यह प्रभाव कथा पर हावी नहीं है। उनकी काव्यात्मकता लघुकथा के सौंदर्य को बढ़ाने का काम करती है। लघुकथा समालोचक के रूप में डॉ. बलराम अग्रवाल भी यही मानते हैं कि लघुकथा पर कविता का प्रभाव अवश्य होना चाहिए लेकिन यह कथा पर हावी नहीं होना चाहिए। अनुभवों के सापेक्ष उनके चिंतन में सूक्ष्मता और परिपक्वता के संकेत भी मिलते हैं, जिसके कारण भविष्य में उनके लघुकथा सृजन के और भी प्रभावशाली रूप में उभरने की संभावना दिखाई देती है। जीवन के अनेक पहलुओं को समझकर लघुता में व्यापकता के साथ प्रस्तुत करने में वह सक्षम हैं। उनके पात्रों का व्यक्तित्व और भाषा बहुत तेज-तर्रार नहीं होती, लेकिन अपनी बात कहने की सामर्थ्य उनमें भरपूर होती है। बेहद सरल, सहज और सधे शब्दों में कही गयी बात पाठक के अन्तर्मन में सीधे और पूरी तीव्रता के साथ उतर जाती है। उनकी रचनाओं में अनेक नए लेखकों की तरह तकनीकी कमजोरियाँ और विरोधाभासी चीजें प्रायः नहीं मिलती। उनके कथ्य भावपूर्ण स्वरूप में उद्भूत होते हैं, उन्हें पारिभाषिक शब्दावली में बाँधना मुश्किल और अनावश्यक लगता है। यदि यह कहा जाये तो कहीं अधिक सही होगा कि उनकी लघुकथाओं में कथा की स्पष्ट और दैहिक उपस्थिति के बावजूद कथ्य कविता की सुगन्ध सरीखे होते हैं। पाठक के लिए यह एक आत्मीय स्थिति होती है।
      संध्या स्वयं मध्य वर्ग से हैं। उनकी रचनाओं में भी मध्य वर्ग के भाव-विचार और अनुभूतियाँ स्थान पाती हैं। इसे उनके अनुभवों के साथ निकट होने के कारण उनके स्वाभाविक लेखन के पक्ष में माना जा सकता है। उनकी लघुकथाओं में कुछ तार्किक सामाजिक परिवर्तनों की आवश्यकता बार-बार उभरकर सामने आती है। यहीं पर वह ऐसी चीजों से प्रभावित और आहत भी दिखाई देती हैं, जो नारी के अधिकारों और सक्रियता को सीमित करती हैं और उसे आगे बढ़ने से रोकती हैं। इसलिए अपने लेखन में जाने- अनजाने वह महिलाओं से जुड़ी समस्याओं और तकलीफों की ओर आ ही जाती हैं।
      यहाँ पर मैंने उनकी जिन पाँच प्रतिनिधि लघुकथाओं को प्रस्तुति हेतु चुना है, वे हैं- बया और बन्दर, सिलवट, मैं तो नाचूँगी गूलर तले, कठिना एवं  चप्पल के बहाने। इनमें उनके सृजन के सशक्त बिन्दुओं के साथ वे चीजें भी हैं, जिन पर रचनात्मकता के रास्ते पर बढ़ने के लिए उन्हें और ध्यान देने की आवश्यकता है।
      ‘बया और बन्दर’ लघुकथा पुरुष प्रधान समाज (परिवारों) में महिलाओं की स्थिति पर फोकस करती है। यूँ तो ऐसे विषयों पर बहुधा लेखन होता रहता है, लेकिन संध्या का प्रस्तुतीकरण और बुनावट लघुकथा में अलग प्रभाव पैदा करता है। पुरुष अपनी सुविधा के अनुसार जीना चाहता है, जबकि महिलाएँ प्रायः घर और जीवन को साज-सज्जा और अनुशासन के ढाँचे में ढालकर आकर्षक बनाना चाहती हैं। समस्या वहाँ पैदा होती है, जहाँ पुरुष अपने स्वभाव को छोटी-छोटी सुविधाओं के जाल से मुक्त करने की बजाय अपने अहं के मुलम्मे से चमकाना चाहता है। परिवार की महिलाओं द्वारा जीवन में आकर्षण पैदा करने के प्रयासों में ‘बन्दर’ की तरह तोड़-फाड़ करना आरंभ कर देता है। पहले पिता, बाद में पुत्र के बन्दर स्वभाव को बया की तरह जीवन के नीड़ को तिनका-तिनका सँवारती वह कब तक झेले? इस प्रश्न को प्रभावशाली ढँग से उठाने में संध्या तिवारी की यह लघुकथा निसंदेह एक रचनात्मक सृजन है। 
      आजकल हमारे समाज में समलैंगिक जीवन साहचर्य का प्रवेश हो रहा है। यह कितना नैतिक है, कितना अनैतिक, इस पर विचार तभी संभव हो सकता है जब यह व्यापक प्रश्न बनकर हमारे समक्ष आये। इसलिए मेरा मानना है यह और ऐसे तमाम मुद्दों पर सृजन होना चाहिए और उनके तमाम पक्षों की तर्कसंगतता को खोलते हुए होना चाहिए। सृजन के बहाने विमर्श के बाद जो कुछ सकारात्मक निकलकर सामने आये, उसके आधार पर फैसले हों। डॉ. संध्या तिवारी की लघुकथा ‘सिलवट’ इस सन्दर्भ में एक साहसिक रचना है। एक ट्यूटर लड़की अपनी सहेली के साथ जीवन बिताना चाहती है, लेकिन उन दोनों के घरवालों को यह बात स्वीकार नहीं है। यह बात पारस्परिक बातचीत में, जिस बच्ची को वह पढ़ाती है उसकी माँ को बता देती है। बच्ची की माँ उसकी इस बात पर उसे प्रताड़ने के भाव में कहती है- ‘‘शर्म नहीं आती तुम्हें?’’ निसन्देह बच्ची की माँ की यह प्रतिक्रिया हमारे समाज की विद्यमान स्थिति को दर्शाती है और विमर्श की प्रक्रिया को रोकने का प्रयास करती है। लेखिका इस बात को अच्छी तरह जानती है, इसलिए लघुकथा में वह लड़की के बेहिचक जवाब से विमर्श की राह को खोले रखती है- ‘‘आप और आपका समाज छिपाकर कितनी ही कुत्सित भावनाएँ पाल ले, लेकिन बता दिया तो समाज से बहिष्कृत।’’ यद्यपि इस रचना का कथ्य समलेंगिकता की बजाय भावनाभिव्यक्ति के अधिकार पर केन्द्रित हो गया है, तदापि इसमें एक संकेत तो है ही। हमें स्वीकारना होगा, आने वाली पीढ़ियाँ अपना जीवन जियेंगी तो अपनी ही तरह से। इसलिए उचित यही होगा कि हम उनकी भावनाओं में उठने वाली उमंगों और प्रश्नों को कम से कम विचार बिन्दु तक अवश्य आने दें। विचार होगा तो गलत-सही के तर्क-वितर्क सामने आयेंगे और भावनाओं में बहने वालों को भी निर्णय लेने से पूर्व सोच-विचार का अवसर मिलेगा।
      हमारे देश में पिछले दिनों असहिष्णुता का कानफोडू शोर खूब सुना गया। इस खेल ने संवेदना और सरोकार जैसे शब्दों को खोखला करने का काम किया है। असहिष्णुता के इसी चेहरे को लक्ष्य करती है लघुकथा ‘मैं तो नाचूंगी गूलर तले’। यह एक बिम्ब आधारित रचना है, जिसमें डॉ. संध्या तिवारी ने अपने शिल्प-कौशल का उदाहरण प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। सुप्रसिद्ध कब्बाली के तुकान्त पंक्ति का शीर्षक में उपयोग, कथा के वातावरण में गूलर, चूहे, उनका सरवाइविंग स्किल एवं उनकी बढ़ती आबादी, बूचड़खाने से फेंके हुये छीछड़ जैसे बहुत सारे प्रतीक थोड़े से पाठकीय श्रम से भगीरथ जी की कई लघुकथाओं के पैटर्न पर अपना-अपना अर्थ खोलते चले जाते हैं। अन्त में इन शब्दों में छुपा हुआ व्यंग्य लेखिका की बात को पूरी तरह साफ कर देता है- ‘‘पत्नी मुझसे पूछ रही थी और मैं देख रहा था सारे असहिष्णु सुरक्षित स्थान की तलाश में गूलर तले इकठ्ठे हो रहे हैं।’’ यह व्यंग्य किसी धर्म पर नहीं, अपितु धर्म और साहित्य की आड़ में छुपी राजनीति पर है। उस पूरे प्रकरण में क्या सही था, क्या गलत; इस पर एक समीक्षक के लिए अपना मन्तव्य रखना उचित हो न हो लेकिन इस और ऐसे ही अनेक प्रकरणों पर जब बड़े-बड़े लेखक अपना-अपना मन्तव्य सीधे-सीधे रख चुके हैं तो इस युवा लेखिका को भी पूरा अधिकार है अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने का। मैं उसकी इस लघुकथा को शिल्प-कौशल और साहस के लिए पूरे अंक देना चाहूँगा।
      आज बेटियाँ अपने परिश्रम और प्रतिभा से समाज में अपना ऊँचा मुकाम हासिल कर रही हैं, वहीं समाज में अनेक ऐसी घटनाएँ देखने को मिल जाती हैं, जिनकी बजह से न सिर्फ परिवार के लोगों को शर्मिन्दगी झेलनी पड़ती है, अपितु लड़कियों का अपना जीवन भी तबाह हो जाता है। ऐसी जटिल परिस्थितियों से उबरने के लिए अत्यंत समझदारी, धैर्य और विवेक से काम लिया जाना चाहिए। लेकिन हमारा समाज, जिस दोहरी मानसिकता को आज भी जी रहा है, वहाँ कथित बदनामी और सामाजिक प्रतिष्ठा के प्रश्नों को मानवीय गलतियों को सुधारकर जीवन को आगे बढ़ाने के ऊपर तरजीह दी जाती है। यहाँ तक कि लड़के को बिना सजा के छोड़ दिया जाता है और लड़की को अवसर नहीं दिया जाता। इसी समस्या का प्रतिबिम्बन और एक भूल का शिकार बेटी की माँ की पीड़ा का प्रभावी संप्रेषण प्रस्तुत किया है संध्या तिवारी ने लघुकथा ‘कठिना’ में। यद्यपि लघुकथा प्रस्तुतीकरण और संप्रेषण में पूरी तरह सफल है किन्तु प्रत्यक्ष रचनात्मकता के थोड़े से अतिरिक्त पुट से लघुकथा और भी प्रभावशाली बन सकती है।
      ‘चप्पल के बहाने’ में दलित विमर्श पर संध्या तिवारी का रचनात्मक विचार देखने को मिलता है। दूसरी ओर यह रचना लेखिका की पसंदीदा काव्यात्मक शैली से भिन्न पूरी तरह कथात्मक रचना है। रचना में वातावरण का निर्माण हो, पात्रों का चरित्र, घटनाओं का अनुक्रम और प्रस्तुति या फिर कथ्य का सम्प्रेषण, सब कुछ वैसे ही व्यवस्थित है, जैसे होना चाहिए। लघुकथा में एक फैक्ट्री कर्मी, मनोज, एक मोची को लंच टाइम में अपनी चप्पल गाँठने को देता है। मोची सामान निकालने के लिए अपना जूता-चप्पल गाँठने वाला डिब्बा खोलता है, तो मनोज डिब्बे के ढक्कन के ऊपरी हिस्से में रामकृष्ण परमहंस, उनकी पत्नी शारदा देवी और देवी काली के चित्र देखकर भड़क उठता है। वह भगवान को ऐसे स्थान पर रखने के लिए मोची को हड़काता है। तब तक मोची अपना काम कर चुका होता है और मेहनताने के दस रुपये माँगता है। मनोज पैसे देने की बजाय उसे आदेश देता है- ‘‘हटाओ अभी के अभी। हटाओ ये चित्र इस डिब्बे से।’’ लेकिन मोची हड़काने में आने की बजाय बड़े इत्मीनान से अपना डिब्बा बन्द करते हुए अपनी जाति के गौरवपूर्ण इतिहास और आस्था के बारे में शालीन और साहसिक टिप्पणी करता है। मोची का मनोज से न डरना और न ही उसके हड़काऊ व्यवहार के प्रति उत्तेजित होना, साथ ही अपने व्यवहार में इत्मीनान का प्रदर्शन करना उसके परिपक्व और निडर आचरण को दर्शाता है, जिस पर गर्व किया जा सकता है। साथ ही रैदास का उदाहरण सामने रखते हुए उसका यह कहना- ‘‘और महाराज सच्च पूछौ, तो इहे कौम ठीक से समुझि पाई कि ईसुर कहाँ नहीं है।’’ उसके आत्मगौरव को दर्शाता है। यह आत्मगौरव ही किसी कौम और व्यक्ति को ऊपर उठाता है। मुझे लगता है कि दलित विमर्श ऐसे ही विश्वास भरे तत्वों से पूर्णता प्राप्त कर सकता है। कोई कौम छोटी नहीं होती, कोई कर्म छोटा नहीं होता। व्यक्ति और कौम को छोटा या बड़ा बनाता है तो उसका आचरण, आत्मविश्वास और साहस। लघुकथा में भाषा और संवाद आवश्यकतानुरूप और रचनासौंदर्य को बढ़ाने वाले हैं।
      संध्या तिवारी को भले लघुकथा सृजन में बहुत अधिक समय न हुआ हो, उनमें लघुकथा की व्यापक समझ है, रचनात्मक विमर्श की प्रक्रिया को सृजन के रास्ते पर वह बहुत सधे तरीके से ले आती हैं। अपने समकक्ष रचनाकारों में वह अपनी अलग पहचान की अधिकारी हैं। ऐसे रचनाकारों के उद्भव से लघुकथा की विकास यात्रा को निरंतरता मिलनी ही है।

डॉ. संध्या तिवारी की चयनित लघुकथाएँ

01. बया और बन्दर
      ‘‘सीख बाको दीजिये, जाको सीख सुहाय
      सीख न दीजै बान्दरा, जो घरो बया को जाय।’’
      यहाँ कोई बन्दर नही पढ़े-लिखे सभ्य पुरुष हैं, लेकिन वह नन्ही बया सी जरूर लगी मुझे। जो तिनके-तिनके जोड़कर आशियाना बुन देती थी, कभी पिता का, कभी पति का, कभी पुत्र का.....
      वह स्वप्नजीवी औरत अपने पुत्र द्वारा नोचीं गयी झालरों की लडियाँ एकटक घूरे जा रही थी, जो उसने दीवाली पर बाजार से लाकर बड़े जतन से सजाईं थीं। रसोई के फिके बर्तन, शो-केश में रखा सजावटी सामान, सब जमीन पर बिखरा पड़ा था। उसके हाथ आँसू पोछने के लिये गाल तक पहुँचे, लेकिन आँसू का तो नामोनिशान तक नहीं था वहाँ। परन्तु अन्दर घुटन इतनी, कि बेचैनी-बेबसी से वह खड़ी रहने तक में सक्षम नहीं थी। वह वहीं फिंके हुये समान के बीच बेजान-सी लुढ़क गयी।
      शरीर निष्क्रिय था लेकिन मन.... उस पर तो किसी का बस नहीं। उसे याद आ गया वह दिन, जिस दिन उसने अपने पिता के घर की अलमारियों को पड़ोस से मांग कर लाये अखवारों से सजाया था। अखबार बदलते समय अपने पापा का बीड़ी का बंडल तस्वीर के पीछे छुपा दिया था, क्योंकि नये अखबार पर बीचों-बीच रखा वह बीड़ीबंडल उस समय मखमल में टाट का पेबन्द ही लग रहा था।
      लेकिन पापा का कहना था, मेरा बीड़ीबंडल सामने कार्निश पर ही मिलना चाहिये। उन्हें उसे खोजना न पड़े। बीड़ीबंडल का जगह पर न मिलना मानो कयामत आ जाना था। पापा ने सारे माँगे हुये नये अखबार फाड़ दिये। तस्वीरे फेंक दी और उसे एक झन्नाटेदार थप्पड़ भी रसीद कर दिया था।
      उस झन्नाटेदार थप्पड़ की गूंज और बेटे की गालियाँ व चीख-पुकार सब आपस में गड्डमड्ड हुई जा रही थी। उस दिन भी कोई कसूर नही था उसका, बस मंशा थी घर सुसज्जित लगे और पापा के फेफडे़ सही सलामत रहें।
      आज भी वही मंशा थी। इसलिये उसने बेटे को पैसे नहीं दिये, कहीं ज्यादा शराब के चलते बेटे का स्वास्थ्य खराब न हो।
      ‘‘सुना था, इतिहास खुद को दोहराता है। आज देख भी लिया।’’
      पिता से पुत्र तक की लम्बी यात्रा में सभ्य पुरूष तो थका नहीं। लेकिन एक जीवन में बया को कितनी बार नीड़ बुनना है, और बन्दर को कितनी बार उजाडना?

02. सिलवट
      पहले ही दिन उसे देखकर जाने क्यूँ लगा कि उसके व्यक्तित्व में सिलवटें ही सिलवटें हैं। खैर ... कोई बात नहीं। मुझे अपनी बच्ची पढ़वानी थी और उसे पढ़ानी। 
      लेकिन रोज आते-जाते उससे मेरी कब घनिष्ठता हो गयी, पता ही नहीं चला।
      एक दिन वह यूँ ही मुझसे पूँछ बैठी, ‘‘आपका  कोई ऐसा सपना जो आप शिद्दत से देखती हों और पूरा न हुआ हो?’’
      ख्यालो में खोते हुये मैंने कहा, ‘‘हाँ, मैं ए. पी. जे. अब्दुल कलाम को मन ही मन बहुत चाहती हूँ और...’’
      ‘‘और क्या भाभी बताइये न’’, उसने मुझे इन्सिस्ट किया। मैंने शर्माकर कहा, ‘‘काश! मैं उनकी शरीकेहयात होती....’’
      मुझे थोड़ी देर घूरने के बाद वह गुमसुम सी हो गयी।
      मेरा राज जानने के बाद मैंने उसका मन टटोला। ‘‘तुम भी बताओ न अपना सपना, जो खुली आँखो से देखती हो, लेकिन पा न सकी हो’’, कहकर मैं मुस्कुराई। 
      ‘‘मेरा सपना तो मेरी एक सहेली है जिसके संग मैं अपनी उम्र गुजारना चाहती हूँ। मैं उसके साथ तीन साल से मिलती-जुलती हूँ। उसके घर में और मेरे घर में सबको पता है, लेकिन उसके लिये भी रिश्ते देखे जा रहे हैं और मेरे लिये भी।’’
      मैं उसकी बेबाकी पर उसे आँखे फाडे़ देख रही थी, लेकिन वह निर्द्वंद बैठी थी।
      मैं कुछ तैश खाये धीमे स्वर में बोली, ‘‘शर्म नहीं आती तुम्हें?’’ उसने आँखों में जमाने भर की हिकारत भरकर कहा, ‘‘क्यों? क्या आपको आपके सपने पर शर्म आती है? मुझे क्यों आयेगी? रॉबिन चौरसिया का नाम सुना है, जो बम्बई के कमाठीपुरा में यौनकर्मियों के बच्चे पढ़ाती है। उन्हें दस शीर्ष ग्लोबल शिक्षकों के लिये चुना गया, वह हममंे से एक है। और उन जैसी न जाने कितनी। ‘आप और आपका समाज’ छिपाकर कितनी ही कुत्सित भावनायें पाल ले, लेकिन बता दिया तो समाज से बहिष्कृत।’’
      उस समय न जाने क्यों लगा वह समाज की एक बड़ी सिलवट है जो कि फटकारने से भी नहीं निकलती। वल्कि वह तो मुझ जैसी तमाम सिलवटों को निकालकर अपनी जिन्दगी अपनी तरह से ओढ़ती-बिछाती है। 

03. मैं तो नाचूंगी गूलर तले
      शाम का धुंधलका छा रहा था, मैंने थककर आरामकुर्सी की पीठ पर अपनी पीठ टिका दी और खुद को ढीला छोड़कर आँखे बन्द कर लीं। दूसरे समुदाय के किसी भाई के घर सूफियानाँ कव्वालियों का प्रोग्राम लाऊडस्पीकर पर जोर-शोर से चल रहा था। पूरा वातावरण सूफियाना हो चुका था। मैं भी स्वयं को उन स्वर लहरियों से बचा नहीं पाया। ‘‘मैं तो नाचूँगी गूलर तले, नाचूँगी गूलर तले।’’ की लय में खोता सा चला गया।
      अचानक लगा पूरा घर चूहों से भर गया है। चूहे ही चूहे। मुझे नफरत है चूहों से, लेकिन वे तो हर हाल मे जिन्दा रह सकते है। उन्हें कोई नहीं मार सकता।
      उनका सरवाइविंग स्किल इतना बढ़ा हुआ है कि वे बूचडखाने से फेंके हुये छीछड़ों और गुजर-बसर के लिये बंगले-कोठियों से लेकर कबाड़ के ढेर पर भी पनप जाते हैं। उनकी विशाल बढ़ती आबादी के आगे कानून-पुलिस सब लाचार है। अब तो कोई जगह ही नही बची जहाँ से उन्हंे खदेड़ा जा सके। लोग खुद ही घर छोड़कर सुरक्षित ठिकानों पर जा रहे हैं।
      और पीछे छूटे सभी घर-मकानों-बंगलो के आगे मुर्गे, भैंसे, बकरे और प्रतिबन्धित पशु के उधडे माँस को चूहे शौक से कुतर रहे हैं।
      अरे! सुनो, आज फिर बबाल हो गया। न्यूज पेपर, टी वी सब जगह एक ही मुद्दा छाया हुआ है, असहिष्णुता-असहिष्णुता। कभी शाहरुख खान, कभी आमिर खान, कभी कमलहासन।
      पत्नी मुझसे पूछ रही थी और मैं देख रहा था सारे असहिष्णु सुरक्षित स्थान की तलाश में गूलर तले इकठ्ठे हो रहे हैं।
      पत्नी की बातों का असर था या सपना, कुछ ठीक से समझ नहीं पा रहा था।

04. कठिना
      अरे वाह! कितना विहंगम दृश्य है, चारों ओर घना जंगल। जंगल के बीच बहती गरजती-उफनती नदी।  जी करता है, यहीं बस जाऊँ। उस कंक्रीट के जंगल में ऐसा नजारा कहाँ। खुशी और मायूसी के मिश्रित मनोभावों से घिरी चाँदनी बस की खिडकी से बाहर झाँक रही थी। बस धीरे-धीरे कठिना नदी पर बना जर्जर पुल पार कर रही थी।
      उसने साथ बैठी अपनी मामी से पूछा; ‘‘यह कौन सी नदी है?’’
      ‘‘कठिना’’। मामी ने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया। 
      ‘‘क्या हुआ मामी आप अचानक वीतराग हो गयी?’’ 
      चुहुल करती हुई चाँदनी ने उनसे कहा।
      उत्तर की जगह सन्नाटा था।
      चाँदनी ने शायद उत्तर की अपेक्षा भी नहीं की थी, इसलिये वह बाहर के दृश्य में उलझ गयी और मामी अन्दर के। उसके भी चारों तरफ जंगल था, बियाबान जंगल।
      सियार, गीदड, लकडबग्घे, लोमड़ी सब वर्चस्व की लड़ाई में भीतरघात करने का कोई मौका चूकना नहीं चाहते थे। कब किसका दाँव लगे कि वह दूसरे को ऐसी चोट दे कि ‘‘अगला कह भी न सके, और सह भी न सके।’’
      दाँव लगा था चचिया ससुर के बेटे का।
      दाँव पर लगी थी उसकी पन्द्रह वर्षीय बेटी खानदानी भाई का बीज पेट में लिये घूम रही थी। नादान।
      पूरा परिवार सकते में था। बेटी भी जा रही और इज्जत भी। कह भी नहीं पा रहे और सह भी नहीं पा रहे। क्या दिन थे? समझ नहीं आ रहा था क्या किया जाय, मुसीबत से छुटकारा पाने को।
      बड़ा कठिन फैसला लिया था उसके ससुर ने। बच्ची को जंगल दिखाने का। कठिना नदी की सैर कराने का। कठिना की सैर करके सब आये बस बच्ची नहीं आयी।
      तब से वह अपने भीतर उफनती कठिना पर रिश्ते-नातों का जर्जर पुल बांधे बड़ी कठिनाई से आती-जाती है।

05. चप्पल के बहाने
     टूटी चप्पल आगे बढ़ाते हुये मनोज ने कहा, ‘‘चल भइ! इस चप्पल को जल्दी से टांक दे। फैक्ट्री का लंच टाइम खत्म होने को है। देर हो रही है। जरा जल्दी कर दे।’’
      यह शुगर फैक्ट्रियाँ भी कस्बों में ही खुलती हैं, जहाँ न बिजली न पानी और न ढंग की सडकें। अब चप्पल टूट गयी। बड़बड़ाता मनोज मोची को देख रहा था।
      ‘‘अभी लेउ बाबूजी।’’ कहकर उसने अपना जूता चप्पल गाँठने वाला डिब्बा खोला। डिब्बे के ढक्कन की अन्दरूनी साइड में विवेकानन्द के गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस, उनकी पत्नी शारदा देवी और देवी काली के चित्र लगे हुये थे।
      ‘‘यह क्या है? किसके चित्र हैं?’’
      मनोज ने भगवान का ऐसा स्थान देखा तो आपा खो बैठा और मोची को हड़काने लगा।
      ‘‘जि...जि.. बाबूजी।’’ चप्पल गाँठता हुआ वह क्षण भर के लिये हकला गया।
      ‘‘क्या तुम्हें पता है, ये हमारे भगवान है?’’ तुमने इन्हें जूते गाँठने के डिब्बे में लगा रखा है? हम लोगांे का कुछ नहीं हो सकता। मरगिल्ली, कायर कौम के हैं हम। अपने भगवान को कहाँ बिठाना है, जब ये तक नहीं सोच सकते, तो और क्या सोचेंगे खाक...? मनोज गुस्से से लगभग उबल ही पड़ा था।
      ‘‘दस रूपिया साब।’’
      ‘‘हटाओ अभी के अभी। हटाओ ये चित्र इस डिब्बे से।’’ मनोज ने आदेशात्मक लहजे में कहा।
      ‘‘जी साब हटा देंगे। इमें कौन बड़ी बात, लेकिन हम सुने रहे, एक संत रैदासऊ रहे पहिले। उनकी चमड़ा भिगोने वाली कठौती में साक्षात गंगाजी आय रहीं। तो ई तौ केवल गांठने वाला डब्बाइ है, और महाराज सच्च पूछौ, तो इहे कौम ठीक से समुझि पाई कि ईसुर कहाँ नहीं है।’’ कहकर उसने बडे़ इत्मीनान से अपना डिब्बा बन्द कर लिया। 

  • डॉ. संध्या तिवारी, 41, बेनी चौधरी, पीलीभीत-262001, उ0प्र0/मोबा. 09410464495 
  • डॉ. उमेश महादोषी, 121, इन्द्रापुरम, निकट बीडीए कॉलोनी, बदायूँ रोड, बरेली, उ.प्र./मो. 09458929004

शुक्रवार, 26 मई 2017

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  6,   अंक  :  05-06,  जनवरी-फ़रवरी  2017



लघुकथा : अगली पीढ़ी

दीपक मशाल


     {लघुकथा की दूसरी व तीसरी पीढ़ी के लघुकथा लेखन पर केन्द्रित इस स्तम्भ का आरम्भ अविराम साहित्यिकी के मुद्रित प्रारूप में जनवरी-मार्च 2015 अंक से किया गया था। उसी सामग्री को इंटरनेट पर अपने पाठकों के लिए भी हम क्रमश: उपलब्ध करवाना आरम्भ कर रहे हैं। 
इस स्तम्भ का उद्देश्य लघुकथा की दूसरी व तीसरी पीढ़ी के लघुकथा लेखन में अच्छी चीजों को तलाशना और रेखांकित करना है। अपेक्षा यही है कि ये लघुकथाकार अपने समय और सामर्थ्य को पहचानें, कमजोरियों से निजात पायें और लघुकथा को आगे लेकर जायें। यह काम दो तरह से करने का प्रयास है। सामान्यतः नई पीढ़ी के रचनाकार विशेष के उपलब्ध लघुकथा लेखन के आधार पर प्रभावित करने वाले प्रमुख बिन्दुओं व उसकी कमजोरियों को आलेखबद्ध करते हुए समालोचनात्मक टिप्पणी के साथ उसकी कुछ अच्छी लघुकथाएँ दी जाती हैं। दूसरे प्रारूप में किसी विशिष्ट बिषय/बिन्दुओं (जो रेखांकित करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण हो) पर केन्द्रित नई पीढ़ी के लघुकथाकारों की लघुकथाओं में उन लघुकथाकारों की रचनात्मकता के बिन्दुओं की प्रस्तुति कुछ महत्वपूर्ण लघुकथाओं के साथ देने पर विचार किया जा सकता है। प्रस्तुत लघुकथाकारों से अनुरोध है कि समालोचना को अन्यथा न लें। उद्देश्य लघुकथा सृजन में आपके/आपकी पीढ़ी के रचनाकारों की भूमिका को रेखांकित करना मात्र है। कृष्णचन्द्र महादेविया के बाद  इस अंक में हम दीपक मशाल पर प्रस्तुति दे रहे हैं। -अंक संपादक}

दीपक मशाल का लघुकथा में उभरना एक सकारात्मक घटना जैसा है 
: डॉ. उमेश महादोषी
         1980 में जन्मे दीपक मशाल का समकालीन लघुकथा सृजन में उभरने का अर्थ है विशुद्धतः इक्कीसवीं सदी की लघुकथा। उनके इस दुनियाँ में पदार्पण तक समकालीन हिन्दी लघुकथा अपना रूपाकार प्राप्त कर चुकी थी और एक रचनात्मक आन्दोलन के तौर पर लघुकथा का सृजन और विमर्श, दोनों ही अपने उत्कर्ष के तात्कालिक शिखर पर पहुँच रहे थे। दीपक जी द्वारा लघुकथा को समझने और सृजन से जुड़ने तक के बीस-तीस वर्षों में लघुकथा कई तरह की घटनाओं और प्रक्रियाओं की साक्षी बन चुकी थी। उसकी शक्ति और कमजोरियों को प्रदर्शित करने वाले सामान्य बिन्दु पूरी स्पष्टता के साथ सामने आ चुके थे, भले उसके अद्यतन होने की प्रक्रिया पूरी तरह स्पष्ट नहीं हो पाई हो। इन वर्षों के कालखण्ड में लघुकथा की जन स्वीकार्यता बढ़ने के बावजूद अनेक वरिष्ठ लघुकथाकारों का लघुकथा सृजन से विमुख होना बेहद चिंतनीय था। उनके विमुख होने के कारणों का मुखर और बहुत स्पष्ट न होना भी लघुकथा के लिए एक तरह की चुनौती जैसा रहा है। इस तरह के वातावरण में जब एक जागरूक और सृजनात्मक प्रतिभा से सम्पन्न नया रचनाकार लघुकथा को समझने और उससे जुड़ने का प्रयास करता है, उसे अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाता है, तो यह इस विधा की भावी सम्भावनाओं की ओर संकेत तो करता ही है, लघुकथा के विधागत विकास में एक सकारात्मक घटना का संकेत भी करता है। दीपक मशाल और उन जैसे अन्य लघुकथाकारों के उभरने को इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिए।
    लघुकथा में दीपक मशाल की चर्चा मैं वरिष्ठ लघुथाकारों, विशेषतः डॉ. बलराम अग्रवाल जी व रा. का. हिमांशु जी से सुनता रहा था किन्तु उनकी सृजनात्मक क्षमताओं से वास्तविक परिचय ‘पड़ाव और पड़ताल’ के मधुदीप जी संपादित पाँचवें खण्ड में शामिल उनकी लघुकथाओं के माध्यम से हुआ। ‘पड़ाव और पड़ताल’ में उनकी सभी ग्यारह लघुकथाएँ प्रभावित करती हैं। इसके बाद मैंने दीपक जी की कई अन्य लघुकथाओं को मँगवाकर पढ़ा। लगभग तीन दर्जन लघुकथाओं के पाठ में के आधार पर मुझे लघुकथा में उनकी उपस्थिति सार्थक लगी। लघुकथा के सन्दर्भ में दीपक जी की प्रतिभा को स्वीकारने में किसी को कोई संकोच नहीं होना चाहिए। 
     मोटे तौर पर दीपक जी की अधिकांश लघुकथाएँ किसी न किसी वजह से प्रभावित करती हैं। उनमें कथा तत्व विद्यमान है, कथ्य स्वाभाविक तरीके से प्रकट होते हैं। यथार्थ के प्रस्तुतीकरण में रचनाकार को यह देखना जरूरी होता है कि किस यथार्थ को उसकी नकारात्मकता के साथ प्रस्तुत करना है और किसे नकारात्मक वृत्ति से सकारात्मक वृत्ति की ओर ले जाना है। अधिकांश लघुकथाओं में दीपक जी इस कार्य को बेहद सहजता से अंजाम देते हैं। ‘संशय’ में अवश्य वह चूक गये लगते हैं। इस रचना में सृजन के उद्देश्य को पूरा करने के लिए लघुकथा को थोड़ा और आगे जाकर यथार्थ में सकारात्मकता लाना चाहिए था। यथार्थ की नकारात्मकता ठेस, क्रान्ति, अहम्, दखल जैसी लघुकथाओं में भी है, किन्तु वहाँ यथार्थ से पर्दा हटाकर रचनाकार अभीष्ट की प्राप्ति कर रहा है। लघुकथा की स्वाभाविकता में वातावरण और भाषा की सानुकूलता की भूमिका अहम् होती है। दीपक जी इस सन्दर्भ में बेहद सफल हैं। निर्धारण में जिस वातावरण की प्रस्तुति है, उसके लिए निश्चित रूप से लेखक को उसे समझना पड़ा होगा, कई चीजों की जानकारी अब या तब अध्ययन और मित्रों से लेनी पड़ी होगी। संशय, मुआवजा जैसी रचनाओं में स्थानीय भाषा का उपयोग, क्रान्ति में फिल्म प्रोडक्शन की शब्दावली, परछाई के संवादों को कथानायक की स्थिति और प्रकृति के अनुरूप रख पाने में उनकी सफलता जाहिर करती है कि उन्होंने लघुकथा को किस स्तर पर समझने का प्रयास किया है। वरिष्ठ साहित्यकार श्री श्रीकृष्ण त्रिवेदी जी ने अपने एक आलेख में प्रवासी साहित्य के बारे में स्पष्ट किया है कि लेखक जिस देश में प्रवास कर रहा है, उसकी रचनाओं में उस देश का वातावरण और दूसरी चीजों की उपस्थिति ही उसे प्रवासी साहित्य का दर्जा दिला सकती है। इस दृष्टि से लघुकथा ‘समझदार’ को निसन्देह- प्रवासी लघुकथा माना जा सकता है। ‘प्रगति’, ‘पसीजे शब्द’ आदि में भी प्रवासी वातावरण है। उम्मीद है विदेश में रहता यह भारतीय लघुकथाकार कुछ और महत्वपूर्ण प्रवासी लघुकथाएँ देगा। ‘बड़े’ लघुकथा में काव्यात्मक भाषा-शैली का उपयोग प्रभावित करता है। लघुकथाओं के शीर्षक सोचे-समझे और सोद्देश्य रखे गये हैं। कई रचनाओं का अंत प्रतीकात्मक होने के कारण बेहद प्रभावशाली हो गया है। प्रतीकों का उपयोग उन्होंने बहुत खूबसूरती से किया है। उन्होंने छूट गये जैसे कोनों पर टॉर्च की रौशनी डालने का सफल प्रयास भी कई लघुकथाओं में किया है। इसे तजुर्बा, अंगुलियाँ, आतंक आदि में देखा जा सकता है। उनकी रचनाओं में विषयों की विविधता भी भरपूर है। 
     कुछ जटिल विषयों को उठाते हुए लघुकथा में अतिरिक्त सावधानी की जरूरत होती है। ‘माचिस’ और ‘दूध’ अच्छी लघुकथाएँ हैं, लेकिन ये और भी अच्छी हो सकती थीं। ‘माचिस’ में कल्पनाशीलता का अंश थोड़ा कम किया जा सकता है और ‘दूध’ में लड़के के व्यवहार (में परिवर्तन) को वेश्या के व्यवहार जैसा स्वाभाविक बनाने की गुंजाइश है। कुल मिलाकर दीपक मशाल की लघुकथा के प्रति समझ असंदिग्ध है। यहाँ हम उनकी चार प्रतिनिधि लघुकथाओं क्रान्ति, आतंक, प्रगति एवं पसीजे शब्द की चर्चा-प्रस्तुति कर रहे हैं।
     सांस्कृतिक-सामाजिक सन्दर्भों में मनुष्य की कार्यगतिविधियों का उद्देश्य सामाजिक चेतना पर केन्द्रित माना जाता है। सांस्कृतिक दृष्टि से कलात्मकता का पुट अधिक हो सकता है और उसकी दिशा मनुष्य के लिए एक आकर्षण का कारण हो सकती है। लेकिन हर गतिविधि का एक अर्थशास्त्र भी होता है, जिसके बिना उसका अस्तित्व संभव नहीं है। स्वाभाविक है कि प्रमुख उद्देश्य के साथ गतिविधि को अस्तित्व में लाने के समायोजन को नकारा नहीं जा सकता। इसके बावजूद प्रमुख उद्देश्य प्रमुख ही रहना चाहिए। सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टि का यही पाठ है। लेकिन हमने देखा है कि कला से प्राप्त लोकप्रियता ग्लैमर की ओर ले जाती है। ग्लैमर के साथ पैसा जुड़ता है। पैसा नैतिक-अनैतिक के प्रश्न को दरकिनार करता है। यह चीज जीवन से जुड़े हर क्षेत्र में है, विशेषतः फिल्मों के क्षेत्र में सीमा से काफी अधिक। सीन कुछ ऐसा बने कि पर्दे पर आग लग जाये। आग लगेगी तो तमाशबीन भी अधिक जुटेंगे। और फिल्मों में पैसे का बड़ा हिस्सा तमाशबीनों की जेब से ही आता है। तो आग की प्रकृति को भी तमाशबीनों की अपेक्षाओं और आदतों का पोषक ही नहीं जनक भी बनना पड़ता है। ‘क्रान्ति’ इसी यथार्थ से पर्दा हटाती है। फिल्म का निर्देशक पर्दे पर आग लगाना चाहता है, इसलिए बार-बार रिटेक से बात न बनने पर सहायक निर्देशक का आइडिया उसे पसन्द आता है और दृश्य व संवाद- दोनों बदल जाते हैं। आग लगाने की कोशिश में शब्दों की प्रकृति और ध्वनित प्रभाव का कोई अर्थ नहीं रह जाता। फिल्म बनाना कितना सांस्कृतिक-सामाजिक रह जायेगा, यह प्रश्न बेमानी हो जाता है। कुछ लोग कहेंगे कि कला में स्वाभाविकता के लिए समाज में घटने वाली यथार्थ घटनाओं को उनके वास्तविक रूप में ही रखना जरूरी है, पर ऐसे लोगों को यह भी सोचना होगा कि कला में रचनात्मकता को कैसे परिभाषित करेंगे? अभिनेत्री के माध्यम से आप नारी की जिस शक्ति को उभारना चाहते हैं, उसकी चुकायी जा रही कीमत का आकलन क्या जरूरी नहीं है? उसे शक्तिशाली बनाने का अर्थ बाजारू बनाने से अलग होता है। शायद इसीलिए दीपक मशाल जैसा रचनाकार इस कन्टेन्ट पर लघुकथा की जरूरत महसूस करता है। शीर्षक से लेकर रचना का वातावरण लघुकथा की तकनीक के सानुकूल है और कथ्य को सपोर्ट करने वाला भी। 
     स्कूली शिक्षा में कान्वेन्ट कल्चर के माध्यम से कुछ उन्नत चीजों के साथ समस्याएँ भी आई हैं। भाषायी समस्या बहुत बड़ी है। अंग्रेजी सिखाना गलत नहीं है, लेकिन उसे थोपना और इस कदर थोपना कि बच्चों का विकास अवरुद्ध होने लगे, वे दूसरी समस्याओं, विशेषतः मनोवैज्ञानिक, का शिकार होने लगें तो इस पर सिर्फ माता-पिता और सामाजिक लोगों को ही नहीं, स्वयं स्कूल संचालकों और शिक्षा विशेषज्ञों को भी सोचना चाहिए। एक अहम् प्रश्न यह है कि शहरों-कस्बों में अंग्रेजी स्कूलों में पढ़ने वाले अधिकांश बच्चे हिन्दी वातावरण वाले परिवारों से आते हैं। घर में अंग्रेजी का स्वाभाविक वातावरण नहीं होता। स्कूलों में अंग्रेजी बोलना सिखाने की अलग से कोई व्यवस्था नहीं होती। एक विषय के तौर पर अंग्रेजी की औपचारिक शिक्षा का स्तर भी बहुत संतोषजनक नहीं होता। लेकिन बच्चों को अंग्रेजी में ही बोलने के लिए बाध्य किया जाता है, वे चाहे अपनी बात कह पायें या नहीं। इस प्रक्रिया में इन स्कूलों में बहुत सारे बच्चे गूँगे-बहरे बनकर रह जाते हैं। कई मनोवैज्ञानिक समस्याओं से ग्रस्त हो जाते हैं। यहाँ तक कि उनका स्वाभाविक विकास अवरुद्ध होने लग जाता है। मैंने अपने बेटे के सन्दर्भ में रुड़की के एक प्रमुख स्कूल के प्रिंसिपल के समक्ष इस मुद्दे को उठाया था, प्रिंसिपल साहब संवेदनशील थे सो उन्होंने समस्या को समझा और अपने स्कूल में बच्चों को ऐसी किसी बात को, जिसे वह अंग्रेजी में व्यक्त नहीं कर पा रहे हों, हिन्दी में व्यक्त करने की अनुमति दे दी थी और शिक्षक-शिक्षिकाओं को हिदायत भी। लेकिन हर स्कूल ऐसा नहीं कर पाता है। दीपक मशाल ने इसी समस्या को ‘आतंक’ में बेहद सरल-स्वाभाविक ढंग से उठाया है। बच्चा बाथरूम जाने की अनुमति के लिए अंग्रेजी में नहीं बोल पाता, हिन्दी में पूछने पर टीचर दण्ड देते हैं। इसलिए भयग्रस्त होकर पेशाब आने पर भी वह बाथरूम नहीं जाता और उसका पेशाब पैंट में ही निकल जाता है। लघुकथा का सकारात्मक पक्ष यह है कि शिकायत आने पर उसका पिता बच्चे को सीने से लगाकर प्यार से समस्या को जानने का प्रयास करता है। खेद की बात है कि स्कूल वाले इस बात की शिकायत तो करते हैं लेकिन अपने स्तर पर समस्या को जानने-समझने और समाधान का प्रयास नहीं करते। यह संवेदनहीन स्थिति है। दीपक जी ने ‘आतंक’ में स्कूली आतंक को अभिव्यक्ति तो दी ही है, एक गम्भीर समस्या की ओर भी समाज का ध्यान आकर्षित करने में भी वह सफल हुए हैं।
     जिन लघुकथाओं में जीवन से जुड़े बदलावों की चर्चा हुई है, उनमें सामान्यतः समय के साथ आ चुके बदलाव ही शामिल होते हैं। भविष्य के संभावित बदलावों की एक कल्पना दीपक मशाल की ‘प्रगति’ में देखने को मिलती है। इसमें रचनाकार ने भविष्य के रिश्तों और सम्बोधनों में आने वाले परिवर्तनों का कल्पनाशील किन्तु स्वाभाविक चित्र भविष्य के ही एक समय बिन्दु पर स्थित होकर प्रस्तुत किया है। कल्पनाशीलता का एक अच्छा उदाहरण है यह। आज कई कार्यालयों में जूनियर-सीनियर सभी एक दूसरे को नाम से पुकारते हैं, बिना किसी सम्मानसूचक शब्द का प्रयोग किए। सम्बोधनों से पता ही नहीं चलता कि कौन जूनियर है और कौन सीनियर। निसन्देह ‘प्रगति’ की कल्पनाशीलता कोरी कल्पना नहीं है। कार्यालयों की संस्कृति बहुत सारे अर्थ लेकर घरों और व्यक्तिगत रिश्तों में भी प्रवेश कर रही है। दूसरी ओर बच्चे और उनके माध्यम से आ रही पीढ़ी के लिए बहुत सारे शब्दों-सन्दर्भों के अर्थ बदलते जा रहे हैं। ऐसे में यह लघुकथा भविष्य की स्थितियों पर एक यथार्थ कमेंट प्रस्तुत कर रही है। दीपक जी की यह कल्पना रुचिकर है कि चालीस-पचास वर्षों के बाद बच्चे माता-पिता, दादा-दादी, बुआ-चाचा आदि जैसे शब्दों को भूल चुके होंगे, उनके लिए हर व्यक्ति सिर्फ एक व्यक्ति होगा, जिसका कोई एक नाम होगा। सम्बोधित करने के लिए वह नाम ही पर्याप्त होगा, किसी रिश्ते या आदर सूचक शब्दों का प्रयोग कॉम्प्लीकेटेड चीज बनकर रह जायेगा, जिसे मैनेज करना उस समय की नई पीढ़ी के लिए सम्भव नहीं होगा। जीवन का आनन्द जिसे जिस चीज में मिलता है, उसके लिए जिन्दगी वैसी ही चीजों से जुड़ जाती है। लघुकथा का वातावरण, विशेषतः संवादों में व्याप्त मनोविनोद संकेत करता है कि मम्मी-पापा, दादा-दादी की पीढ़ियों को संतानों की पीढ़ियों के जीवन से जुड़ी चीजों के साथ आनन्दित होना सीख लेना चाहिए। ‘जैनरेशन गैप’ से जनित पीड़ा को पसीने में बहा देने का यही एक तरीका होगा।
     जीवन से जुड़ी कई यथार्थ स्थितियाँ ऐसी होती हैं, जिनमें पर्याप्त नकारात्मकता होती है, लेकिन वही रचनात्मकता का स्रोत बन जाती है। ‘पसीजे शब्द’ एक ऐसी ही लघुकथा है। नकारात्मक यथार्थ के बावजूद रचनात्मक लघुकथा! दीपक जी की सर्वोत्तम लघुकथाओं में से एक। रचना का प्रमुख पात्र, एक ऐसा व्यक्ति है, जो बेहद मेहनती और ईमानदार है और इसी के बलबूते पर उसने एक मुकाम हासिल किया है। लेकिन उसके बचपन से जुड़ी कुछ विशेष (कड़वी) यादें हैं, जिन्हें वह किसी भी रूप में याद नहीं करना चाहता। विदेश में रहता यह व्यक्ति अपनी स्थिति को लगातार मजबूत करने के लिए छुट्टी के दिन भी काम करता है। छोटी सी बेटी द्वारा पावर्टी याने गरीबी का मतलब पूछे जाने पर उसका गला भर आता है। वह कहना चाहता है कि उसकी अपनी सन्तान को गरीबी का मतलब पता न चले यानी जो दुर्दिन उसने देखे हैं, वे सन्तान को न देखने पड़ें, इसीलिए वह इतनी मेहनत करता है, अपना देश छोड़कर परदेश में आ बसा है, लेकिन उसके शब्द दर्द के पसीने में पसीज जाते हैं और वह अपनी बेटी को सीने से भींच लेता है। बेटी उसके आँसुओं में कुछ अर्थ ढूँढ़ने लग जाती है। यह पीड़ा और संवेदनात्मक पराकाष्ठा का क्षण है, जो लघुकथा को चरम पर ले जाता है। चीजों के प्रति उसकी चिड़चिड़ाहट नकारात्मकता को दर्शाती है, वहीं बेटी के प्रति गहनतम प्रेम रचनात्मकता को। संभवतः संतान के प्रति इसी प्रेम के चलते उसने परिश्रम और ईमानदारी का संकल्प लिया और बहुत कुछ (जो रचना में पर्दे के पीछे है) झेलकर भी किसी गलत रास्ते पर नहीं गया, इस सरल-स्वाभाविक रचना में निसन्देह ऐसा कुछ है, जिसमें डूबा जा सकता है, जिसे अन्तर्मन में सहेजा जा सकता है!
     यह कहते हुए मैं बेहद उत्साहित हूँ कि दीपक मशाल की लघुकथाओं में बहुत कुछ है, जिसकी अपेक्षा की जाती है। नई पीढ़ी के अभी तक मेरी दृष्टि में आये, वह सबसे ऊर्जावान और संजीदा लघुकथाकार हैं। उनके लेखन में परिपक्वता है। इक्कीसवीं सदी में सृजित लघुकथाओं का समुचित प्रतिनिधित्व प्रस्तुत किया है उन्होंने। आने वाले समय में वह लघुकथा के भंडार को समृद्ध तो करेंगे ही, नए आयाम भी देंगे; यह विश्वास किया जा सकता है। 

दीपक मशाल की चार प्रतिनिधि लघुकथाएँ

क्रान्ति 
     शूटिंग जारी थी 
     - साले कमीने, घर में माँ-बहन नहीं है क्या?
     अभिनेत्री ने चीखते हुए सीटी बजाने वाले बदमाश को लताड़ा। 
     - कट, कट, कट... नहीं यार बात नहीं बन रही आमना, एक्स्प्रेशन्स ही ढँग से नहीं आ रहे। फिर ट्राई करते हैं, अबके सही से करना। निर्देशक ने युवा अभिनेत्री को समझाते हुए कहा। 
     - ओके गाइज़, गैट रेडी फॉर रीटेक। क्लैप, रोल लाइट 
     - रोलिंग 
     - रोल साउण्ड, रोल कैमरा 
     - रोलिंग    
     - रोलिंग 
     - एक्शन 
     - साले कमीने, घर में माँ-बहन नहीं है क्या?
     - कट कट, कट इट... वो मज़ा ही नहीं आ रहा, मैं इस सीन को कुछ ऐसा बनाना चाहता हूँ कि लोग आने वाले कई सालों तक याद रखें। पर्दे पर आग लग जाए, कुछ ऐसा कि एक नई क्रान्ति पैदा हो। तुम समझ रही हो न?
     - या नो प्रॉब्लम, वी कैन डू इट अगेन। अभिनेत्री ने कोई ना-नुकुर नहीं की। 
     - अरे मोहन, बाल ठीक कर मैडम के। निर्देशक ने मेकअप आर्टिस्ट को बुलाया कि तभी सहायक निर्देशक ने उससे कुछ मशविरा किया, जिस पर निर्देशक ने खुश होते हुए सहमति की मोहर लगा दी। 
     - हाँ, ये ठीक कह रहे हो, कमाल का पकड़ा तुमने। बदलकर यही कर देते हैं, तहलका मचा देगा ये। 
     - यस गाइज़, वन मोर टाइम... लाइट, कैमरा, एक्शन...  
     अभिनेत्री ने बदमाश के बालों को पकड़ पूरे जोश से उसकी नाक को अपने घुटने पर मारा और 
     - मादर... घर में माँ-बहन नहीं तेरे? भेन के... 

आतंक 
     समर सेन के लिए स्कूल से भेजी गई बेटे की शिक़ायत उन्हें सिर्फ़ हैरान ही नहीं बल्कि परेशांन करने वाली भी थी। खुद की याददाश्त पर ज़ोर देने के बाद भी जब ऐसा कुछ याद न आया तो उन्होंने पत्नी से पूछा 
     - अरे सुनो, क्या विकू कभी रात में भी बिस्तर गीला करता है क्या?
     - नहीं, रात में तो उसने आज तक कभी ऐसा नहीं किया, ये तो पिछले हफ़्ते से हो रहा है कि रोज जब स्कूल से लौटकर आता है तो पैन्ट में ही सू-सू किए आता है। 
     रात को बेटे को बिस्तर में अपने सीने से लगाकर उन्होंने उसके सर पर हाथ फेरते हुए प्यार से पूछा 
     - बेटा क्या बात है, स्कूल में तुम पैंट में क्यों सू-सू कर लेते हो? तुम तो मेरे राजाबेटा हो ना, तुम्हें तो बाथरूम में जाना चाहिए, जैसे घर में जाते हो। 
     विकू उनके सीने से चिपक कर सहमते हुए बोला 
     - पापा, मैं बाथरूम जाने के लिए सर से अंग्रेज़ी में नहीं पूछ पाता और जो बच्चे हिन्दी में पूछते हैं सर उन्हें पनिशमेंट देते हैं।  


प्रगति 
     अपने हर काम के लिए लगभग 90-95 प्रतिशत तक मशीनों पर निर्भर हो चुके मानव को अपने वर्तमान युग को अतीत से सम्बन्ध जोड़कर देखना हास्यास्पद लगने लगा था, तभी न एक दिन मैनी ने ऐजो को एक तस्वीर दिखाते हुए कहा
     - तुम विश्वास कर सकोगे ऐजो कि आज से लगभग पचास साल पहले यानि सन 2000 के आसपास के युग की इस तस्वीर से दुनिया कितनी बदल चुकी है, अगर तुम उस समय पैदा हुए होते तो किमी को बुआ कहकर बुलाते और जॉन को चाचा। 
     - अच्छा! क्या तुम भी अपने रिश्तेदारों को ऐसे ही बुलाती थीं मैनी?
     ऐजो ने उत्सुकतावश और जानना चाहा। 
     मैनी के बोलने से पहले ही पास में सोफेनुमा कुर्सी पर पसरे सैम ने बताना चालू किया।
     - अरे नहीं, हमारे समय तक कुछ और बदलाव आये थे। हमने उस समय के चाचा-बुआ को अंकल-आंटी कहना शुरू कर दिया था। 
     - हाऊ इंट्रेस्टिंग! कितनी जल्दी बदलाव आते गए! क्या मिस्टर समीर और मिस रिमी को भी उस समय में मैं चाचा-बुआ कहकर बुलाता सैम?
     ऐजो ने रिश्तों के नामों पर डिसकशन में मजा लेना शुरू कर दिया था। 
     - नहीं डिअर यहाँ चाचा की पार्टनर को लोग चाची कहते थे, समीर और रिमी को तुम उस समय में दादा-दादी कहते।
     ब्लैक कॉफ़ी के सिप मारते हुए ऐजो ने फिर कहा 
     - कितना कॉम्प्लीकेटेड था न सबकुछ उस समय, कैसे मैनेज करते थे तुम लोग? और तुम दोनों को कैसे बोलता मैं उस समय मैनी?
     - सैम को पापा और मुझे मम्मी। हँसते हुए मैनी ने जवाब दिया। 


पसीजे शब्द 
     जब उसने पहली बार इस पराई ज़मीन पर क़दम रखा था तो जेब में दस पाउंड और बैग में तीन जोड़ी कपड़े भर थे। आज ये न सिर्फ उसका कहना है बल्कि लोगों का मानना भी है कि पंद्रह सालों में उसने अपनी लगन, मेहनत और ईमानदारी के दम पर ‘फर्श से अर्श’ तक का सफ़र तय किया है। मगर बचपन की न जाने वो कौन सी यादें हैं जिनका वह अपने आज से कोई भी रिश्ता नहीं रखना चाहता था। कोई भारतप्रेमी अंग्रेज़ दोस्त उससे भारत के विषय में जानकारी लेना चाहता तो वह चिड़चिड़ा हो उठता।
     आज इतवार को शत-प्रतिशत छुट्टी घोषित करती गुनगुनी धूप निकली थी लेकिन उसने आज भी एक क्लाइंट को समय दे रखा था। दफ्तर जाने के लिए जूतों में पैर डाले, तस्मे बाँधे, फिर कलाई पर घड़ी पहन ही रहा था कि तभी उसकी फूल सी बेटी हाथ में पेन-कॉपी और जिहन में सवाल लिए उसके पास आई। 
     - पापा ये पावर्टी क्या होती है?
     वह पल भर को ठिठका, बेटी के माथे को चूमा फिर ठण्डी आवाज़ में बोला 
     - गरीबी बेटा! 
     वह जोर से खिलखिला उठी। 
     - ओह्हो आप भी न बुद्धू हो पापा... हिंदी मीनिंग तो मुझे भी पता है लेकिन गरीबी का मतलब क्या होता है।
     जवाब भरे गले से निकला 
     - तुम्हें इसका मतलब पता न चले इसीलिये तो.... 
     शेष शब्द दर्द के पसीने में पसीज गए, उसने अचानक बेटी को सीने से भींच लिया। बेटी उसके आँसुओं में गरीबी के मायने ढूँढने में लग गई।
  • दीपक मशाल, कोलम्बस-ओहायो/ईमेल : mashal.com@gmail.com
  • भारत में : द्वारा श्री रामबिहारी चौरसिया, मालवीय नगर, बजरिया कोंच (शुक्लाजी की दुकान के सामने), जिला जालौन-285205, उ.प्र.