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मंगलवार, 3 अक्तूबर 2017

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  6,   अंक  :  07-10,  मार्च-जून 2017





लघुकथा : अगली पीढ़ी

डॉ. संध्या तिवारी



{लघुकथा की दूसरी व तीसरी पीढ़ी के लघुकथा लेखन पर केन्द्रित इस स्तम्भ का आरम्भ अविराम साहित्यिकी के मुद्रित प्रारूप में जनवरी-मार्च 2015 अंक से किया गया था। उसी सामग्री को इंटरनेट पर अपने पाठकों के लिए भी हम क्रमशः उपलब्ध करवाना आरम्भ कर रहे हैं। इस स्तम्भ का उद्देश्य लघुकथा की दूसरी व तीसरी पीढ़ी के लघुकथा लेखन में अच्छी चीजों को तलाशना और रेखांकित करना है। अपेक्षा यही है कि ये लघुकथाकार अपने समय और सामर्थ्य को पहचानें, कमजोरियों से निजात पायें और लघुकथा को आगे लेकर जायें। यह काम दो तरह से करने का प्रयास है। सामान्यतः नई पीढ़ी के रचनाकार विशेष के उपलब्ध लघुकथा लेखन के आधार पर प्रभावित करने वाले प्रमुख बिन्दुओं व उसकी कमजोरियों को आलेखबद्ध करते हुए समालोचनात्मक टिप्पणी के साथ उसकी कुछ अच्छी लघुकथाएँ दी जाती हैं। दूसरे प्रारूप में किसी विशिष्ट बिषय/बिन्दुओं (जो रेखांकित करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण हो) पर केन्द्रित नई पीढ़ी के लघुकथाकारों की लघुकथाओं में उन लघुकथाकारों की रचनात्मकता के बिन्दुओं की प्रस्तुति कुछ महत्वपूर्ण लघुकथाओं के साथ देने पर विचार किया जा सकता है। प्रस्तुत लघुकथाकारों से अनुरोध है कि समालोचना को अन्यथा न लें। उद्देश्य लघुकथा सृजन में आपके/आपकी पीढ़ी के रचनाकारों की भूमिका को रेखांकित करना मात्र है। कृष्णचन्द्र महादेविया एवं दीपक मशाल के बाद इस अंक में हम डॉ. संध्या तिवारी पर प्रस्तुति दे रहे हैं। -अंक संपादक}

रचनात्मक विमर्श को सृजन में ढालती लघुकथाकार : डॉ. उमेश महादोषी

       आज लघुकथा एक स्थापित विधा है और विविध मानवीय पक्षों की अभिव्यक्ति-कला की दृष्टि से कथा साहित्य में केन्द्रीय भूमिका प्राप्त करने की ओर बढ़ रही है। दूसरी ओर इस विधा में नई प्रतिभाओं की खोज एवं उन्हें प्रोत्साहित-स्थापित करने के प्रयास भी विगत दो वर्षों में काफी तेज हुए हैं। इसके बावजूद कुछ चीजें निराशाजनक हैं। अनेक नये जुड़ रहे लघुथाकार सामान्यतः लघुकथा को समझकर लिखने की बजाय या तो सुविधा की दृष्टि से या फिर पुराने लघुकथाकारों से प्रेरित होकर लिखते दिख रहे हैं। कई पुराने लघुकथाकार लम्बे समय से लघुकथा लेखन में सक्रिय होने के बावजूद आज तक लघुकथा को ठीक से नहीं समझ पाए। इनमें से कुछ सृजन से इतर अपने महत्वपूर्ण कार्य के कारण नए लघुकथाकारों के लिए आकर्षण का केन्द्र बन गए हैं। योगदान विशेष के सन्दर्भ में यह अच्छी बात है। लेकिन नए रचनाकार ऐसे वरिष्ठों को प्रेरणास्रोत मानकर लघुकथा सृजन में इनका अनुसरण करने लगते हैं, तब समस्या पैदा होती है। यह स्थिति अच्छी नहीं मानी जा सकती। इससे बहुधा अनपेक्षित परिणाम ही सामने आते हैं। लघुकथा में कई तरह के बाह्य आकर्षण हैं, उसमें लेखन के नाम पर कुछ सुविधाएँ भी जुड़ी हैं। ये आकर्षण और सुविधाएँ रचनाकारों पर तब तक हावी रहेंगी, जब तक वे लघुकथा के वास्तविक मर्म, सौन्दर्य और यथार्थ को समझने का प्रयास नहीं करेंगे। कालजयी सृजन अनुभवों और भोगी हुई पीड़ा से निकलता है। लेकिन विविध मानवीय पक्षों पर सकारात्मक और सूक्ष्म चिंतन भी अनुभवजन्य स्थितियों के समीप ले जाता है। लघुकथा के नए लेखकों को यह भी सीखना होगा कि एक चित्र को देखकर वैसा ही खूबसूरत चित्र बनाने और अच्छे चित्र से प्राप्त सौन्दर्य प्रेरणा को अपने विचारों और अनुभवों में उतारने में अन्तर होता है। कई नए लघुकथा लेखक सुन्दर रचनाएँ लिख रहे हैं, लेकिन इस सुन्दर लघुकथा लेखन को मौलिक रूप देना भी आवश्यक है। मौलिकता आपके अनुभवों में हो सकती है, आपके प्रस्तुतीकरण में, भाषा-शैली और वातावरण में हो सकती है, आपके सृजित सौन्दर्य बोध में हो सकती है। पात्रों की प्रकृति और चरित्र में भी हो सकती है। रचना के जिस भी कोने में आप मौलिकता को स्थापित करें, लेकिन बिना इसके आप सृजन में अपने चिंतन और मूल्यबोध को स्थापित कर नहीं सकेंगे। 
      आज लघुकथा के क्षेत्र में दूसरी और तीसरी पीढ़ी के अनेक रचनाकार आ चुके हैं। इनमें कुछ निसन्देह जागरूक और लघुकथा लेखन के यथार्थ को समझने का प्रयास कर रहे हैं। अपने लेखन के साथ निरन्तर सीखने की ललक साथ लेकर और सूक्ष्म चिंतन के साथ जुड़ने के प्रयास के साथ आगे बढ़ रहे हैं। उनके लघुकथा सृजन में इसके प्रमाण भी देखने को मिल जाते हैं। डॉ. संध्या तिवारी ऐसी ही लघुकथाकार हैं। यद्यपि वह साहित्य की सभी विधाओं में लेखन कर रही हैं और स्वभाव से कवयित्री हैं लेकिन लघुकथा में उनकी पैठ अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देती है। उन्होंने नाटक के क्षेत्र में सृजन, अभिनय और निर्देशन भी किया है, पेटिंग में भी काम किया है। इन क्षेत्रों में उन्हें जिला/क्षेत्रीय स्तरों पर काफी प्रशंसा मिली है और कुछ पुरस्कार भी प्राप्त हुए हैं। वह हिन्दी एवं संस्कृत की विद्यार्थी रही हैं। हिन्दी में शोध और अध्यापन किया है। युवा वय से जुड़ी ऊर्जा उनके पास है। एक महाविद्यालय की प्राचार्य होने के नाते प्रशासनिक स्थितियों का अनुभव है। चचेरे दादा जी और ताऊ-ताई जी की कविता में अच्छी दखल होने के नाते परिवार में कविता का वातावरण भी उन्हें प्राप्त रहा है। इन सब चीजों ने उन्हें स्वाभाविक लेखन से जोड़ा है। हाँ, संकोची स्वभाव और प्रत्यक्ष प्रोत्साहन की कमी ने कहीं न कहीं उनकी सक्रियता को बाधित अवश्य किया है। अच्छी बात उनके साथ यह रही है कि उन्होंने केवल वही लिखा, जिसने उनके अन्तर्मन को प्रभावित किया। अन्तर्मन के पटल पर जब कोई चीज अपना प्रभाव जमाती है तो परिणामी लेखन कहीं न कहीं रचनात्मक सौन्दर्य और उद्देश्यपरकता के साथ सामने आता है। संध्याजी के लघुकथा लेखन का आरम्भ सुविधाभोगी तौर-तरीकों से होने के बावजूद अन्तर्मन में पैठे स्वाभाविक साहित्य बीजों के योगदान के कारण और दूसरी ओर संक्षिप्त ही सही, डॉ. बलराम अग्रवाल, सुकेश साहनी जैसे वरिष्ठ और अनुभवी लघुकथाकारों के साथ कुछ स्तरीय पत्रिकाओं में कथा साहित्य के अध्ययन के कारण सही दिशा पकड़ने में सफल हो गया है। फेसबुक के माध्यम से आये लघुकथाकारों के बीच से निकलने के बावजूद उन्होंने अपनी स्वाभाविकता को नहीं छोड़ा है। चूँकि उन्हें लघुकथा सृजन में अभी बहुत थोड़ा समय ही हुआ है, अतः भविष्य में अध्ययन-मनन की प्रक्रिया उनके रचाव और सृजन को सम्भावनाओं के व्यापक फलक पर स्थान देगी, यह विश्वास किया जा सकता है।
     डॉ. संध्या तिवारी की 30-32 लघुकथाएँ पढ़ने का अवसर मुझे मिला है। उनके लघुकथा सृजन में दो-तीन बातें विशेष रूप से प्रभावित करती हैं। पुराने विषयों को भी वह नए जैसे रूप में प्रस्तुत करने में सक्षम हैं। सृजन शैली पर कविता का प्रभाव है, लेकिन यह प्रभाव कथा पर हावी नहीं है। उनकी काव्यात्मकता लघुकथा के सौंदर्य को बढ़ाने का काम करती है। लघुकथा समालोचक के रूप में डॉ. बलराम अग्रवाल भी यही मानते हैं कि लघुकथा पर कविता का प्रभाव अवश्य होना चाहिए लेकिन यह कथा पर हावी नहीं होना चाहिए। अनुभवों के सापेक्ष उनके चिंतन में सूक्ष्मता और परिपक्वता के संकेत भी मिलते हैं, जिसके कारण भविष्य में उनके लघुकथा सृजन के और भी प्रभावशाली रूप में उभरने की संभावना दिखाई देती है। जीवन के अनेक पहलुओं को समझकर लघुता में व्यापकता के साथ प्रस्तुत करने में वह सक्षम हैं। उनके पात्रों का व्यक्तित्व और भाषा बहुत तेज-तर्रार नहीं होती, लेकिन अपनी बात कहने की सामर्थ्य उनमें भरपूर होती है। बेहद सरल, सहज और सधे शब्दों में कही गयी बात पाठक के अन्तर्मन में सीधे और पूरी तीव्रता के साथ उतर जाती है। उनकी रचनाओं में अनेक नए लेखकों की तरह तकनीकी कमजोरियाँ और विरोधाभासी चीजें प्रायः नहीं मिलती। उनके कथ्य भावपूर्ण स्वरूप में उद्भूत होते हैं, उन्हें पारिभाषिक शब्दावली में बाँधना मुश्किल और अनावश्यक लगता है। यदि यह कहा जाये तो कहीं अधिक सही होगा कि उनकी लघुकथाओं में कथा की स्पष्ट और दैहिक उपस्थिति के बावजूद कथ्य कविता की सुगन्ध सरीखे होते हैं। पाठक के लिए यह एक आत्मीय स्थिति होती है।
      संध्या स्वयं मध्य वर्ग से हैं। उनकी रचनाओं में भी मध्य वर्ग के भाव-विचार और अनुभूतियाँ स्थान पाती हैं। इसे उनके अनुभवों के साथ निकट होने के कारण उनके स्वाभाविक लेखन के पक्ष में माना जा सकता है। उनकी लघुकथाओं में कुछ तार्किक सामाजिक परिवर्तनों की आवश्यकता बार-बार उभरकर सामने आती है। यहीं पर वह ऐसी चीजों से प्रभावित और आहत भी दिखाई देती हैं, जो नारी के अधिकारों और सक्रियता को सीमित करती हैं और उसे आगे बढ़ने से रोकती हैं। इसलिए अपने लेखन में जाने- अनजाने वह महिलाओं से जुड़ी समस्याओं और तकलीफों की ओर आ ही जाती हैं।
      यहाँ पर मैंने उनकी जिन पाँच प्रतिनिधि लघुकथाओं को प्रस्तुति हेतु चुना है, वे हैं- बया और बन्दर, सिलवट, मैं तो नाचूँगी गूलर तले, कठिना एवं  चप्पल के बहाने। इनमें उनके सृजन के सशक्त बिन्दुओं के साथ वे चीजें भी हैं, जिन पर रचनात्मकता के रास्ते पर बढ़ने के लिए उन्हें और ध्यान देने की आवश्यकता है।
      ‘बया और बन्दर’ लघुकथा पुरुष प्रधान समाज (परिवारों) में महिलाओं की स्थिति पर फोकस करती है। यूँ तो ऐसे विषयों पर बहुधा लेखन होता रहता है, लेकिन संध्या का प्रस्तुतीकरण और बुनावट लघुकथा में अलग प्रभाव पैदा करता है। पुरुष अपनी सुविधा के अनुसार जीना चाहता है, जबकि महिलाएँ प्रायः घर और जीवन को साज-सज्जा और अनुशासन के ढाँचे में ढालकर आकर्षक बनाना चाहती हैं। समस्या वहाँ पैदा होती है, जहाँ पुरुष अपने स्वभाव को छोटी-छोटी सुविधाओं के जाल से मुक्त करने की बजाय अपने अहं के मुलम्मे से चमकाना चाहता है। परिवार की महिलाओं द्वारा जीवन में आकर्षण पैदा करने के प्रयासों में ‘बन्दर’ की तरह तोड़-फाड़ करना आरंभ कर देता है। पहले पिता, बाद में पुत्र के बन्दर स्वभाव को बया की तरह जीवन के नीड़ को तिनका-तिनका सँवारती वह कब तक झेले? इस प्रश्न को प्रभावशाली ढँग से उठाने में संध्या तिवारी की यह लघुकथा निसंदेह एक रचनात्मक सृजन है। 
      आजकल हमारे समाज में समलैंगिक जीवन साहचर्य का प्रवेश हो रहा है। यह कितना नैतिक है, कितना अनैतिक, इस पर विचार तभी संभव हो सकता है जब यह व्यापक प्रश्न बनकर हमारे समक्ष आये। इसलिए मेरा मानना है यह और ऐसे तमाम मुद्दों पर सृजन होना चाहिए और उनके तमाम पक्षों की तर्कसंगतता को खोलते हुए होना चाहिए। सृजन के बहाने विमर्श के बाद जो कुछ सकारात्मक निकलकर सामने आये, उसके आधार पर फैसले हों। डॉ. संध्या तिवारी की लघुकथा ‘सिलवट’ इस सन्दर्भ में एक साहसिक रचना है। एक ट्यूटर लड़की अपनी सहेली के साथ जीवन बिताना चाहती है, लेकिन उन दोनों के घरवालों को यह बात स्वीकार नहीं है। यह बात पारस्परिक बातचीत में, जिस बच्ची को वह पढ़ाती है उसकी माँ को बता देती है। बच्ची की माँ उसकी इस बात पर उसे प्रताड़ने के भाव में कहती है- ‘‘शर्म नहीं आती तुम्हें?’’ निसन्देह बच्ची की माँ की यह प्रतिक्रिया हमारे समाज की विद्यमान स्थिति को दर्शाती है और विमर्श की प्रक्रिया को रोकने का प्रयास करती है। लेखिका इस बात को अच्छी तरह जानती है, इसलिए लघुकथा में वह लड़की के बेहिचक जवाब से विमर्श की राह को खोले रखती है- ‘‘आप और आपका समाज छिपाकर कितनी ही कुत्सित भावनाएँ पाल ले, लेकिन बता दिया तो समाज से बहिष्कृत।’’ यद्यपि इस रचना का कथ्य समलेंगिकता की बजाय भावनाभिव्यक्ति के अधिकार पर केन्द्रित हो गया है, तदापि इसमें एक संकेत तो है ही। हमें स्वीकारना होगा, आने वाली पीढ़ियाँ अपना जीवन जियेंगी तो अपनी ही तरह से। इसलिए उचित यही होगा कि हम उनकी भावनाओं में उठने वाली उमंगों और प्रश्नों को कम से कम विचार बिन्दु तक अवश्य आने दें। विचार होगा तो गलत-सही के तर्क-वितर्क सामने आयेंगे और भावनाओं में बहने वालों को भी निर्णय लेने से पूर्व सोच-विचार का अवसर मिलेगा।
      हमारे देश में पिछले दिनों असहिष्णुता का कानफोडू शोर खूब सुना गया। इस खेल ने संवेदना और सरोकार जैसे शब्दों को खोखला करने का काम किया है। असहिष्णुता के इसी चेहरे को लक्ष्य करती है लघुकथा ‘मैं तो नाचूंगी गूलर तले’। यह एक बिम्ब आधारित रचना है, जिसमें डॉ. संध्या तिवारी ने अपने शिल्प-कौशल का उदाहरण प्रस्तुत करने का प्रयास किया है। सुप्रसिद्ध कब्बाली के तुकान्त पंक्ति का शीर्षक में उपयोग, कथा के वातावरण में गूलर, चूहे, उनका सरवाइविंग स्किल एवं उनकी बढ़ती आबादी, बूचड़खाने से फेंके हुये छीछड़ जैसे बहुत सारे प्रतीक थोड़े से पाठकीय श्रम से भगीरथ जी की कई लघुकथाओं के पैटर्न पर अपना-अपना अर्थ खोलते चले जाते हैं। अन्त में इन शब्दों में छुपा हुआ व्यंग्य लेखिका की बात को पूरी तरह साफ कर देता है- ‘‘पत्नी मुझसे पूछ रही थी और मैं देख रहा था सारे असहिष्णु सुरक्षित स्थान की तलाश में गूलर तले इकठ्ठे हो रहे हैं।’’ यह व्यंग्य किसी धर्म पर नहीं, अपितु धर्म और साहित्य की आड़ में छुपी राजनीति पर है। उस पूरे प्रकरण में क्या सही था, क्या गलत; इस पर एक समीक्षक के लिए अपना मन्तव्य रखना उचित हो न हो लेकिन इस और ऐसे ही अनेक प्रकरणों पर जब बड़े-बड़े लेखक अपना-अपना मन्तव्य सीधे-सीधे रख चुके हैं तो इस युवा लेखिका को भी पूरा अधिकार है अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने का। मैं उसकी इस लघुकथा को शिल्प-कौशल और साहस के लिए पूरे अंक देना चाहूँगा।
      आज बेटियाँ अपने परिश्रम और प्रतिभा से समाज में अपना ऊँचा मुकाम हासिल कर रही हैं, वहीं समाज में अनेक ऐसी घटनाएँ देखने को मिल जाती हैं, जिनकी बजह से न सिर्फ परिवार के लोगों को शर्मिन्दगी झेलनी पड़ती है, अपितु लड़कियों का अपना जीवन भी तबाह हो जाता है। ऐसी जटिल परिस्थितियों से उबरने के लिए अत्यंत समझदारी, धैर्य और विवेक से काम लिया जाना चाहिए। लेकिन हमारा समाज, जिस दोहरी मानसिकता को आज भी जी रहा है, वहाँ कथित बदनामी और सामाजिक प्रतिष्ठा के प्रश्नों को मानवीय गलतियों को सुधारकर जीवन को आगे बढ़ाने के ऊपर तरजीह दी जाती है। यहाँ तक कि लड़के को बिना सजा के छोड़ दिया जाता है और लड़की को अवसर नहीं दिया जाता। इसी समस्या का प्रतिबिम्बन और एक भूल का शिकार बेटी की माँ की पीड़ा का प्रभावी संप्रेषण प्रस्तुत किया है संध्या तिवारी ने लघुकथा ‘कठिना’ में। यद्यपि लघुकथा प्रस्तुतीकरण और संप्रेषण में पूरी तरह सफल है किन्तु प्रत्यक्ष रचनात्मकता के थोड़े से अतिरिक्त पुट से लघुकथा और भी प्रभावशाली बन सकती है।
      ‘चप्पल के बहाने’ में दलित विमर्श पर संध्या तिवारी का रचनात्मक विचार देखने को मिलता है। दूसरी ओर यह रचना लेखिका की पसंदीदा काव्यात्मक शैली से भिन्न पूरी तरह कथात्मक रचना है। रचना में वातावरण का निर्माण हो, पात्रों का चरित्र, घटनाओं का अनुक्रम और प्रस्तुति या फिर कथ्य का सम्प्रेषण, सब कुछ वैसे ही व्यवस्थित है, जैसे होना चाहिए। लघुकथा में एक फैक्ट्री कर्मी, मनोज, एक मोची को लंच टाइम में अपनी चप्पल गाँठने को देता है। मोची सामान निकालने के लिए अपना जूता-चप्पल गाँठने वाला डिब्बा खोलता है, तो मनोज डिब्बे के ढक्कन के ऊपरी हिस्से में रामकृष्ण परमहंस, उनकी पत्नी शारदा देवी और देवी काली के चित्र देखकर भड़क उठता है। वह भगवान को ऐसे स्थान पर रखने के लिए मोची को हड़काता है। तब तक मोची अपना काम कर चुका होता है और मेहनताने के दस रुपये माँगता है। मनोज पैसे देने की बजाय उसे आदेश देता है- ‘‘हटाओ अभी के अभी। हटाओ ये चित्र इस डिब्बे से।’’ लेकिन मोची हड़काने में आने की बजाय बड़े इत्मीनान से अपना डिब्बा बन्द करते हुए अपनी जाति के गौरवपूर्ण इतिहास और आस्था के बारे में शालीन और साहसिक टिप्पणी करता है। मोची का मनोज से न डरना और न ही उसके हड़काऊ व्यवहार के प्रति उत्तेजित होना, साथ ही अपने व्यवहार में इत्मीनान का प्रदर्शन करना उसके परिपक्व और निडर आचरण को दर्शाता है, जिस पर गर्व किया जा सकता है। साथ ही रैदास का उदाहरण सामने रखते हुए उसका यह कहना- ‘‘और महाराज सच्च पूछौ, तो इहे कौम ठीक से समुझि पाई कि ईसुर कहाँ नहीं है।’’ उसके आत्मगौरव को दर्शाता है। यह आत्मगौरव ही किसी कौम और व्यक्ति को ऊपर उठाता है। मुझे लगता है कि दलित विमर्श ऐसे ही विश्वास भरे तत्वों से पूर्णता प्राप्त कर सकता है। कोई कौम छोटी नहीं होती, कोई कर्म छोटा नहीं होता। व्यक्ति और कौम को छोटा या बड़ा बनाता है तो उसका आचरण, आत्मविश्वास और साहस। लघुकथा में भाषा और संवाद आवश्यकतानुरूप और रचनासौंदर्य को बढ़ाने वाले हैं।
      संध्या तिवारी को भले लघुकथा सृजन में बहुत अधिक समय न हुआ हो, उनमें लघुकथा की व्यापक समझ है, रचनात्मक विमर्श की प्रक्रिया को सृजन के रास्ते पर वह बहुत सधे तरीके से ले आती हैं। अपने समकक्ष रचनाकारों में वह अपनी अलग पहचान की अधिकारी हैं। ऐसे रचनाकारों के उद्भव से लघुकथा की विकास यात्रा को निरंतरता मिलनी ही है।

डॉ. संध्या तिवारी की चयनित लघुकथाएँ

01. बया और बन्दर
      ‘‘सीख बाको दीजिये, जाको सीख सुहाय
      सीख न दीजै बान्दरा, जो घरो बया को जाय।’’
      यहाँ कोई बन्दर नही पढ़े-लिखे सभ्य पुरुष हैं, लेकिन वह नन्ही बया सी जरूर लगी मुझे। जो तिनके-तिनके जोड़कर आशियाना बुन देती थी, कभी पिता का, कभी पति का, कभी पुत्र का.....
      वह स्वप्नजीवी औरत अपने पुत्र द्वारा नोचीं गयी झालरों की लडियाँ एकटक घूरे जा रही थी, जो उसने दीवाली पर बाजार से लाकर बड़े जतन से सजाईं थीं। रसोई के फिके बर्तन, शो-केश में रखा सजावटी सामान, सब जमीन पर बिखरा पड़ा था। उसके हाथ आँसू पोछने के लिये गाल तक पहुँचे, लेकिन आँसू का तो नामोनिशान तक नहीं था वहाँ। परन्तु अन्दर घुटन इतनी, कि बेचैनी-बेबसी से वह खड़ी रहने तक में सक्षम नहीं थी। वह वहीं फिंके हुये समान के बीच बेजान-सी लुढ़क गयी।
      शरीर निष्क्रिय था लेकिन मन.... उस पर तो किसी का बस नहीं। उसे याद आ गया वह दिन, जिस दिन उसने अपने पिता के घर की अलमारियों को पड़ोस से मांग कर लाये अखवारों से सजाया था। अखबार बदलते समय अपने पापा का बीड़ी का बंडल तस्वीर के पीछे छुपा दिया था, क्योंकि नये अखबार पर बीचों-बीच रखा वह बीड़ीबंडल उस समय मखमल में टाट का पेबन्द ही लग रहा था।
      लेकिन पापा का कहना था, मेरा बीड़ीबंडल सामने कार्निश पर ही मिलना चाहिये। उन्हें उसे खोजना न पड़े। बीड़ीबंडल का जगह पर न मिलना मानो कयामत आ जाना था। पापा ने सारे माँगे हुये नये अखबार फाड़ दिये। तस्वीरे फेंक दी और उसे एक झन्नाटेदार थप्पड़ भी रसीद कर दिया था।
      उस झन्नाटेदार थप्पड़ की गूंज और बेटे की गालियाँ व चीख-पुकार सब आपस में गड्डमड्ड हुई जा रही थी। उस दिन भी कोई कसूर नही था उसका, बस मंशा थी घर सुसज्जित लगे और पापा के फेफडे़ सही सलामत रहें।
      आज भी वही मंशा थी। इसलिये उसने बेटे को पैसे नहीं दिये, कहीं ज्यादा शराब के चलते बेटे का स्वास्थ्य खराब न हो।
      ‘‘सुना था, इतिहास खुद को दोहराता है। आज देख भी लिया।’’
      पिता से पुत्र तक की लम्बी यात्रा में सभ्य पुरूष तो थका नहीं। लेकिन एक जीवन में बया को कितनी बार नीड़ बुनना है, और बन्दर को कितनी बार उजाडना?

02. सिलवट
      पहले ही दिन उसे देखकर जाने क्यूँ लगा कि उसके व्यक्तित्व में सिलवटें ही सिलवटें हैं। खैर ... कोई बात नहीं। मुझे अपनी बच्ची पढ़वानी थी और उसे पढ़ानी। 
      लेकिन रोज आते-जाते उससे मेरी कब घनिष्ठता हो गयी, पता ही नहीं चला।
      एक दिन वह यूँ ही मुझसे पूँछ बैठी, ‘‘आपका  कोई ऐसा सपना जो आप शिद्दत से देखती हों और पूरा न हुआ हो?’’
      ख्यालो में खोते हुये मैंने कहा, ‘‘हाँ, मैं ए. पी. जे. अब्दुल कलाम को मन ही मन बहुत चाहती हूँ और...’’
      ‘‘और क्या भाभी बताइये न’’, उसने मुझे इन्सिस्ट किया। मैंने शर्माकर कहा, ‘‘काश! मैं उनकी शरीकेहयात होती....’’
      मुझे थोड़ी देर घूरने के बाद वह गुमसुम सी हो गयी।
      मेरा राज जानने के बाद मैंने उसका मन टटोला। ‘‘तुम भी बताओ न अपना सपना, जो खुली आँखो से देखती हो, लेकिन पा न सकी हो’’, कहकर मैं मुस्कुराई। 
      ‘‘मेरा सपना तो मेरी एक सहेली है जिसके संग मैं अपनी उम्र गुजारना चाहती हूँ। मैं उसके साथ तीन साल से मिलती-जुलती हूँ। उसके घर में और मेरे घर में सबको पता है, लेकिन उसके लिये भी रिश्ते देखे जा रहे हैं और मेरे लिये भी।’’
      मैं उसकी बेबाकी पर उसे आँखे फाडे़ देख रही थी, लेकिन वह निर्द्वंद बैठी थी।
      मैं कुछ तैश खाये धीमे स्वर में बोली, ‘‘शर्म नहीं आती तुम्हें?’’ उसने आँखों में जमाने भर की हिकारत भरकर कहा, ‘‘क्यों? क्या आपको आपके सपने पर शर्म आती है? मुझे क्यों आयेगी? रॉबिन चौरसिया का नाम सुना है, जो बम्बई के कमाठीपुरा में यौनकर्मियों के बच्चे पढ़ाती है। उन्हें दस शीर्ष ग्लोबल शिक्षकों के लिये चुना गया, वह हममंे से एक है। और उन जैसी न जाने कितनी। ‘आप और आपका समाज’ छिपाकर कितनी ही कुत्सित भावनायें पाल ले, लेकिन बता दिया तो समाज से बहिष्कृत।’’
      उस समय न जाने क्यों लगा वह समाज की एक बड़ी सिलवट है जो कि फटकारने से भी नहीं निकलती। वल्कि वह तो मुझ जैसी तमाम सिलवटों को निकालकर अपनी जिन्दगी अपनी तरह से ओढ़ती-बिछाती है। 

03. मैं तो नाचूंगी गूलर तले
      शाम का धुंधलका छा रहा था, मैंने थककर आरामकुर्सी की पीठ पर अपनी पीठ टिका दी और खुद को ढीला छोड़कर आँखे बन्द कर लीं। दूसरे समुदाय के किसी भाई के घर सूफियानाँ कव्वालियों का प्रोग्राम लाऊडस्पीकर पर जोर-शोर से चल रहा था। पूरा वातावरण सूफियाना हो चुका था। मैं भी स्वयं को उन स्वर लहरियों से बचा नहीं पाया। ‘‘मैं तो नाचूँगी गूलर तले, नाचूँगी गूलर तले।’’ की लय में खोता सा चला गया।
      अचानक लगा पूरा घर चूहों से भर गया है। चूहे ही चूहे। मुझे नफरत है चूहों से, लेकिन वे तो हर हाल मे जिन्दा रह सकते है। उन्हें कोई नहीं मार सकता।
      उनका सरवाइविंग स्किल इतना बढ़ा हुआ है कि वे बूचडखाने से फेंके हुये छीछड़ों और गुजर-बसर के लिये बंगले-कोठियों से लेकर कबाड़ के ढेर पर भी पनप जाते हैं। उनकी विशाल बढ़ती आबादी के आगे कानून-पुलिस सब लाचार है। अब तो कोई जगह ही नही बची जहाँ से उन्हंे खदेड़ा जा सके। लोग खुद ही घर छोड़कर सुरक्षित ठिकानों पर जा रहे हैं।
      और पीछे छूटे सभी घर-मकानों-बंगलो के आगे मुर्गे, भैंसे, बकरे और प्रतिबन्धित पशु के उधडे माँस को चूहे शौक से कुतर रहे हैं।
      अरे! सुनो, आज फिर बबाल हो गया। न्यूज पेपर, टी वी सब जगह एक ही मुद्दा छाया हुआ है, असहिष्णुता-असहिष्णुता। कभी शाहरुख खान, कभी आमिर खान, कभी कमलहासन।
      पत्नी मुझसे पूछ रही थी और मैं देख रहा था सारे असहिष्णु सुरक्षित स्थान की तलाश में गूलर तले इकठ्ठे हो रहे हैं।
      पत्नी की बातों का असर था या सपना, कुछ ठीक से समझ नहीं पा रहा था।

04. कठिना
      अरे वाह! कितना विहंगम दृश्य है, चारों ओर घना जंगल। जंगल के बीच बहती गरजती-उफनती नदी।  जी करता है, यहीं बस जाऊँ। उस कंक्रीट के जंगल में ऐसा नजारा कहाँ। खुशी और मायूसी के मिश्रित मनोभावों से घिरी चाँदनी बस की खिडकी से बाहर झाँक रही थी। बस धीरे-धीरे कठिना नदी पर बना जर्जर पुल पार कर रही थी।
      उसने साथ बैठी अपनी मामी से पूछा; ‘‘यह कौन सी नदी है?’’
      ‘‘कठिना’’। मामी ने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया। 
      ‘‘क्या हुआ मामी आप अचानक वीतराग हो गयी?’’ 
      चुहुल करती हुई चाँदनी ने उनसे कहा।
      उत्तर की जगह सन्नाटा था।
      चाँदनी ने शायद उत्तर की अपेक्षा भी नहीं की थी, इसलिये वह बाहर के दृश्य में उलझ गयी और मामी अन्दर के। उसके भी चारों तरफ जंगल था, बियाबान जंगल।
      सियार, गीदड, लकडबग्घे, लोमड़ी सब वर्चस्व की लड़ाई में भीतरघात करने का कोई मौका चूकना नहीं चाहते थे। कब किसका दाँव लगे कि वह दूसरे को ऐसी चोट दे कि ‘‘अगला कह भी न सके, और सह भी न सके।’’
      दाँव लगा था चचिया ससुर के बेटे का।
      दाँव पर लगी थी उसकी पन्द्रह वर्षीय बेटी खानदानी भाई का बीज पेट में लिये घूम रही थी। नादान।
      पूरा परिवार सकते में था। बेटी भी जा रही और इज्जत भी। कह भी नहीं पा रहे और सह भी नहीं पा रहे। क्या दिन थे? समझ नहीं आ रहा था क्या किया जाय, मुसीबत से छुटकारा पाने को।
      बड़ा कठिन फैसला लिया था उसके ससुर ने। बच्ची को जंगल दिखाने का। कठिना नदी की सैर कराने का। कठिना की सैर करके सब आये बस बच्ची नहीं आयी।
      तब से वह अपने भीतर उफनती कठिना पर रिश्ते-नातों का जर्जर पुल बांधे बड़ी कठिनाई से आती-जाती है।

05. चप्पल के बहाने
     टूटी चप्पल आगे बढ़ाते हुये मनोज ने कहा, ‘‘चल भइ! इस चप्पल को जल्दी से टांक दे। फैक्ट्री का लंच टाइम खत्म होने को है। देर हो रही है। जरा जल्दी कर दे।’’
      यह शुगर फैक्ट्रियाँ भी कस्बों में ही खुलती हैं, जहाँ न बिजली न पानी और न ढंग की सडकें। अब चप्पल टूट गयी। बड़बड़ाता मनोज मोची को देख रहा था।
      ‘‘अभी लेउ बाबूजी।’’ कहकर उसने अपना जूता चप्पल गाँठने वाला डिब्बा खोला। डिब्बे के ढक्कन की अन्दरूनी साइड में विवेकानन्द के गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस, उनकी पत्नी शारदा देवी और देवी काली के चित्र लगे हुये थे।
      ‘‘यह क्या है? किसके चित्र हैं?’’
      मनोज ने भगवान का ऐसा स्थान देखा तो आपा खो बैठा और मोची को हड़काने लगा।
      ‘‘जि...जि.. बाबूजी।’’ चप्पल गाँठता हुआ वह क्षण भर के लिये हकला गया।
      ‘‘क्या तुम्हें पता है, ये हमारे भगवान है?’’ तुमने इन्हें जूते गाँठने के डिब्बे में लगा रखा है? हम लोगांे का कुछ नहीं हो सकता। मरगिल्ली, कायर कौम के हैं हम। अपने भगवान को कहाँ बिठाना है, जब ये तक नहीं सोच सकते, तो और क्या सोचेंगे खाक...? मनोज गुस्से से लगभग उबल ही पड़ा था।
      ‘‘दस रूपिया साब।’’
      ‘‘हटाओ अभी के अभी। हटाओ ये चित्र इस डिब्बे से।’’ मनोज ने आदेशात्मक लहजे में कहा।
      ‘‘जी साब हटा देंगे। इमें कौन बड़ी बात, लेकिन हम सुने रहे, एक संत रैदासऊ रहे पहिले। उनकी चमड़ा भिगोने वाली कठौती में साक्षात गंगाजी आय रहीं। तो ई तौ केवल गांठने वाला डब्बाइ है, और महाराज सच्च पूछौ, तो इहे कौम ठीक से समुझि पाई कि ईसुर कहाँ नहीं है।’’ कहकर उसने बडे़ इत्मीनान से अपना डिब्बा बन्द कर लिया। 

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