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शनिवार, 22 सितंबर 2018

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक :  11-12,  जुलाई-अगस्त 2018



लघुकथा : अगली पीढ़ी


कपिल शास्त्री

कपिल शास्त्री 



{लघुकथा की दूसरी व तीसरी पीढ़ी के लघुकथा लेखन पर केन्द्रित इस स्तम्भ का आरम्भ अविराम साहित्यिकी के मुद्रित प्रारूप में जनवरी-मार्च 2015 अंक से किया गया था। उसी सामग्री को इंटरनेट पर अपने पाठकों के लिए भी हम क्रमशः उपलब्ध करवाना आरम्भ कर रहे हैं। इस स्तम्भ का उद्देश्य लघुकथा की दूसरी व तीसरी पीढ़ी के लघुकथा लेखन में अच्छी चीजों को तलाशना और रेखांकित करना है। अपेक्षा यही है कि ये लघुकथाकार अपने समय और सामर्थ्य को पहचानें, कमजोरियों से निजात पायें और लघुकथा को आगे लेकर जायें। यह काम दो तरह से करने का प्रयास है। सामान्यतः नई पीढ़ी के रचनाकार विशेष के उपलब्ध लघुकथा लेखन के आधार पर प्रभावित करने वाले प्रमुख बिन्दुओं व उसकी कमजोरियों को आलेखबद्ध करते हुए समालोचनात्मक टिप्पणी के साथ उसकी कुछ अच्छी लघुकथाएँ दी जाती हैं। दूसरे प्रारूप में किसी विशिष्ट बिषय/बिन्दुओं (जो रेखांकित करने की दृष्टि से महत्वपूर्ण हो) पर केन्द्रित नई पीढ़ी के लघुकथाकारों की लघुकथाओं में उन लघुकथाकारों की रचनात्मकता के बिन्दुओं की प्रस्तुति कुछ महत्वपूर्ण लघुकथाओं के साथ देने पर विचार किया जा सकता है। प्रस्तुत लघुकथाकारों से अनुरोध है कि समालोचना को अन्यथा न लें। उद्देश्य लघुकथा सृजन में आपके/आपकी पीढ़ी के रचनाकारों की भूमिका को रेखांकित करना मात्र है। कृष्णचन्द्र महादेविया, दीपक मशाल एवं डॉ. संध्या तिवारी के बाद इस अंक में हम कपिल शास्त्री पर प्रस्तुति दे रहे हैं। -अंक संपादक}




लघुकथा में घनीभूत मानवीय अनुभूतियों को उकेरता हस्ताक्षर : उमेश महादोषी 



लघुकथा से जुड़े विभिन्न पक्षों पर विस्तार से बात होती रही है और अधिकांश पक्षों पर काफी बात हो चुकी है। अब दूसरी-तीसरी पीढ़ी के रचनाकार क्रमशः पहली पीढ़ी के समस्तर सृजन के अभ्यास तक पहुँच रहे हैं। समालोचनात्मक जिम्मेवारी के निर्वहन हेतु ‘नई सदी की धमक’ संकलन की पाण्डुलिपि पढ़ने के बाद मैंने महसूस किया है कि अपने दायित्व के प्रति नई पीढ़ी के कई लघुकथाकार बेहद जिम्मेवार होते जा रहे हैं। यह माना जा सकता है लघुकथा में अब कोई सृजन-अन्तराल नहीं आ सकता। नई पीढ़ी लघुकथा की सृजन-परम्परा के निर्वाह के लिए ही नहीं, उसे आगे ले जाने के लिए भी तैयार है। पिछले लगभग एक दशक की गतिविधियों और उनमें ‘पड़ाव और पड़ताल’ जैसी लघुकथा की वृहद एवं महत्वपूर्ण रचनात्मक एवं मूल्यांकन शृंखला के साथ विगत दो-तीन वर्ष में आई उल्लेखनीय तीव्रता, जिसमें इंटरनेट पर सामाजिक माध्यम के रूप में फेसबुक का विशेष योगदान है, को इसका श्रेय दिया जा सकता है। यद्यपि फेसबुक के रास्ते आई खामियों से भी आँखें नहीं मूँदी जा सकतीं, लेकिन मुख्य बात उस बड़ी चिंता के दूर होने की है, जो सृजन-अन्तराल की संभावना के रूप में तीन-चार वर्ष पहले तक बहुत स्पष्ट रूप में देखी जा रही थी। आज नई पीढ़ी की लघुकथाओं पर आधारित संकलनों का प्रकाशन आरम्भ किया जाये तो निसन्देह वर्ष में एकाधिक अच्छे संकलन लाये जा सकते हैं। नये लेखक दोहराव, जो सम्भवतः विषयाधारित लघुकथा प्रतियोगिताओं से पनपी कुछ गलत धारणाओं के कारण एक समस्या के रूप में दिखाई दे रहा है, से मुक्ति पाकर मौलिकता का स्तर थोड़ा और बढ़ा सकें, जिसकी उम्मीद भी बँधती दिखाई दे रही है, तो लघुकथा को एक शिखर पर ले जाने का श्रेय नई पीढ़ी को मिलना तय है। फेसबुक पर गतिविधियों के अनेकानेक संचालकों, जिनमें प्रायः नये लेखक ही अधिक हैं, को अभिव्यक्ति के इस सामाजिक माध्यम के सुनिश्चित और दिशाबद्ध उपयोग के लिए डॉ. बलराम अग्रवाल द्वारा संचालित ‘लघुकथा साहित्य’ नामक समूह का सूक्ष्म अध्ययन अवश्य करना चाहिए। इससे उन्हें लघुकथा को नये आयाम देने और सही दिशा में ले जाने हेतु अपना महत्वपूर्ण योगदान देने में मदद मिलेगी। आज के ये नये लेखक ही आने वाले समय में लघुकथा के वरिष्ठ बनेंगे और इन्हीं के कंधों पर अपने बाद की पीढ़ी को तैयार करने, प्रशिक्षित करने के साथ लघुकथा के कुछ सार्थक आयाम तय करने वाली पीढ़ी को उत्साहित करने का जिम्मा होगा। इस दृष्टि से देखा जाये तो लघुकथा की पहली पीढ़ी ने अपना एक दायित्व- सृजन-अंतराल की समस्या से मुक्ति, लगभग पूर्ण कर लिया है, लेकिन अपनी छोड़ी जाने वाली सम्पूर्ण भूमिका के निर्वाह के लिए वर्तमान नई पीढ़ी को तैयार करके ही वे अंतिम दायित्व को पूर्ण कर पायेंगे, यह बात सोचने का समय भी आ ही चुका है। उम्मीद है जल्दी ही हमारे नये लघुकथाकार साथी भी इस दिशा में अपनी भूमिका को ग्रहण करते दिखाई देंगे। 
      लेकिन इससे पूर्व नये लेखकों के सृजन को रचनात्मक धरातल पर प्रतिष्ठित करने और उसके मूल्यांकन के बारे में सोचना आवश्यक है। आलोचनात्मक स्तर पर इसी आलेख शृंखला में डॉ. संध्या तिवारी की लघुकथाओं के संदर्भ में लिखते हुए मैंने नई पीढ़ी के लेखन में जिन विसंगतियों और कमजोरियों की चर्चा की थी, उनमें से अधिकांश के सन्दर्भ में अपनी कई लघुकथाओं में ये लेखक आगे बढ़ते दिख रहे हैं, लेकिन कुछ बातों पर विशेष ध्यान देना होगा। मैं पुनः दोहराऊँगा कि दोहराव से बचना और मौलिकता को समझना बड़ा प्रश्न है, इस प्रश्न पर नये लेखकों को अतिरिक्त सावधानी बरतनी होगी। इस दृष्टि से जो कमजोर लघुकथाएँ पहले लिखी जा चुकी हैं, प्रचारात्मक प्रसार की दृष्टि से उनके व्यामोह से निकलना आवश्यक है। नई पीढ़ी के एक लेखक, जिसे रचनात्मक सन्दर्भ में बेहद सम्मान की दृष्टि से देखने वालों में मैं स्वयं भी शामिल हूँ, की एक लघुकथा किसी पत्रिका में प्रकाशित हुई। उस मित्र ने अपनी उस लघुकथा के प्रकाशन की सूचना के साथ उसकी स्केन प्रति फेसबुक पर मित्रों से साझा की। मेरी वाल पर भी वह दिखी और संयोगवश उस पर मेरी दृष्टि भी पड़ गई। मैंने उसे पूरा पढ़ा। आरम्भ में रुचिकर भी लगी, लेकिन उसका अन्त जिस कथ्य में हुआ, वह एक चर्चित कथ्य था। मुझे निराशा हुई कि एक जागरूक और स्तरीय माने जाने वाला रचनाकार कथ्य के दोहराव के सन्दर्भ में इतना लापरवाह है! मुझे लगता है कि प्रतिष्ठा के एक बिन्दु पर पहुँचकर यदि कोई कमजोर रचना प्रकाशित भी हुई है तो उसे रचनाकार को अपनी प्रचारात्मक प्राथमिकता में शामिल नहीं करना चाहिए। आपकी पचास-साठ या अधिक रचनाओं के संग्रह में कुछेक कमजोर रचनाएँ चली जायें तो उनका वैसा नकारात्मक प्रभाव नहीं होगा, जैसा कहीं अकेली प्रकाशित रचना के कमजोर होने पर हो सकता है। एक छोटी बात को बड़ा करके दिखाने का मेरा उद्देश्य मित्रगण समझ लेंगे। 
      एक दूसरी बात, नये लघुकथाकारों को लघुकथा के विभिन्न तत्वों को समझने की प्रंिक्रया में लघुकथा में नेपथ्य की उपस्थिति और उपयोग पर विशेष ध्यान देना चाहिए। ‘नेपथ्य’ लघुकथा का वह प़क्ष है, जो इस विधा की रचना में सबसे गतिशील ऊर्जा का निर्माण करता है। पिछले दिनों इस सन्दर्भ में डॉ. बलराम अग्रवालजी के एक लघु आलेख को पढ़ने और ‘नई सदी की धमक’ संकलन की पाण्डुलिपि पढ़ने के बाद मुझे लगा कि नई पीढ़ी का ध्यान विशेष रूप से इस ओर आकर्षित करने की आवश्यकता है। सामान्यतः हर घटना, हर विसंगति, हर जीवनानुभूति के पीछे कुछ न कुछ ऐसा अवश्य होता है, जो प्रत्यक्ष दिखाई नहीं देता, लेकिन परिणामी प्रत्यक्ष में उसका महत्वपूर्ण योगदान होता है। यह, जो महत्वपूर्ण होकर भी प्रत्यक्ष नहीं है, दर्शनीय नहीं है, वह आखिर होता क्या और कहाँ है? मेरी समझ में यह अदृश्य किन्तु वास्तविक स्रोत से जनित वास्तविक प्रभाव होता है और इसका उद्गम स्थल नेपथ्य कहलाता है। दूसरे शब्दों में कथात्मक रचनाओं के सन्दर्भ में प्रत्यक्ष प्रभाव के अप्रत्क्ष स्रोत का उद्गम-स्थल नेपथ्य होता है। साहित्यिक रचनाओं में नेपथ्य में सृजित प्रभाव के उद्देश्य (ऑब्जेक्ट) पर प्रक्षेपण के लिए उचित माध्यम या झरोखे (पैसेज) का होना भी आवश्यक है। नेपथ्य में सृजित प्रभाव रचना में शाब्दिक संक्षिप्तीकरण के साथ उसके रचनात्मक प्रभाव को बढ़ाता है और संप्रेषण की गति को त्वरित करता है। लेकिन नेपथ्य में सृजित प्रभाव के प्रक्षेपण के लिए उचित माध्यम या रास्ता नहीं मिलेगा, तो रचना में ऐसे नेपथ्य और उसमें सृजित प्रभाव का कोई प्रयोजन नहीं रह जायेगा। साधारण भाषा में एक सन्दर्भ के तौर पर नेपथ्य और उसमें सृजित प्रभाव को संयुक्ततः ‘नेपथ्य’ या ‘नेपथ्य का प्रभाव’ या ‘नेपथ्य की ध्वनि’ आदि सम्बोधन दिये जा सकते हैं। नेपथ्य का निर्माण रचना की माँग के साथ रचनाकार की लेखन पद्धति, रचनात्मक प्रभाव-सृजन की दिशा में उसकी जागरूकता और क्षमताओं पर निर्भर करता है। विशेषतः कथात्मक रचनाओं में दैहिक विस्तार स्वभावगत रूप से जितना अल्प होगा, वहाँ नेपथ्य के उतने ही अधिक प्रभावशाली उपयोग की गुंजाइश होती है। इसका उल्टा भी सच है। चूँकि लघुकथा स्वभावगत रूप से लघ्वाकारीय होती है, अतः जहाँ भी रचना की माँग के साथ समायोजन की गुंजाइश हो, नेपथ्य का समुचित उपयोग करना ही चाहिए। आश्चर्यजनक रूप से लघुकथा के सन्दर्भ में सर्वाधिक महत्वपूर्ण होते हुए भी नेपथ्य के मुद्दे पर बहुत अधिक चर्चा नहीं हुई है। नई पीढ़ी के लघुकथाकार मित्रों को इसका उपयोग अपने लघुकथा सृजन को प्रभावशाली बनाने में करना चाहिए।
      इन दोनों प्रश्नों से विलग, लघुकथा जगत के लिए यह प्रसन्नता का बड़ा कारण है कि विगत तीन-चार वर्षों में नए लघुकथा लेखक पर्याप्त संख्या में सामने आये हैं और उनमें प्रभावित करने वाले लेखकों की संख्या उम्मीद से अधिक है और लगातार बढ़ रही है। आने वाले समय में यह देखना रुचिकर होगा कि इन अच्छे लघुकथाकारों ने कितनी लघुकथाएँ लिखी हैं और उनमें प्रभावित करने वाली रचनाओं का प्रतिशत कितना है! 
     लगभग एक वर्ष पूर्व कुछ मित्रों ने मेरे आमंत्रण पर अपनी लघुकथाएँ इस आलेख श्रंखला हेतु मुझे भेजी थीं, उनमें से भोपाल के श्री कपिल शास्त्री की भी छब्बीस लघुकथाएँ मैंने पढ़ी हैं। उनके लेखन की प्रवृत्ति को समझने की नियति से कुछ और लघुकथाओं की खोज में मैं फेसबुक पर गया। वहाँ उनकी 2015 में पोस्ट की गई लघुकथाओं पर मेरी दृष्टि पड़ी। इस अत्यल्प समय अन्तराल में उनके लेखन में जो परिवर्तन और रुझान देखने को मिला, उससे स्पष्ट है कि कपिलजी लघुकथा को समझने का प्रयास गम्भीरतापूर्वक कर रहे हैं। भले लघुकथा लेखन उन्होंने काफी बिलम्ब से आरम्भ किया है लेकिन आयु-अनुभवों की दृष्टि से प्रौढ़ समझ (और अध्ययन-मनन) का लाभ उनके लघुकथा-लेखन को मिल रहा है। 2015 की रचनाओं में उनके पास कथ्य और विचार तो दिखाई देते हैं, उन्हें कथा का रूप देने का सिलसिला 2016 में आरम्भ होता है। 2016 में प्राप्त उनकी रचनाएँ, जिनमें कुछ पहले लिखी गई हो सकती हैं लेकिन उनमें कुछ सुधार किए गए होंगे, लघुकथा के दैहिक रूपाकार में अवश्य हैं, भले उनमें कई अच्छी लघुकथाओं के साथ कुछ कमजोर भी हैं। कम समय में कपिल शास्त्री ने जो सीखा-समझा है, वह निसन्देह प्रशंसनीय है और भविष्य के लिए उम्मीदें जगाता है। उनसे की गई चर्चा से भी यह स्पष्ट होता है कि फेसबुक से मिली लेखन की प्रेरणा को लघुकथा में साकार करने में उन्होंने अध्ययन-मनन के स्तर पर काफी परिश्रम किया है, जिसमें ‘पड़ाव और पड़ताल’ संकलन शृंखला के अध्ययन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने अपने समकक्ष अच्छा लिख रहे नए लघुकथा लेखकों को भी सूक्ष्मता से पढ़ा है और पढ़ रहे हैं, जो सीखने और आगे बढ़ने की उनकी ललक और लेखकीय समर्पण को दर्शाता है। यद्यपि उन्होंने लेखन काफी बिलम्ब से आरम्भ किया है लेकिन उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि संस्कृतिमय रहने के कारण कहीं न कहीं उनके अन्दर सुसुप्तावस्था में पड़े हुए सृजन के बीज अंकुरण की दिशा में बहुत पहले से अँगड़ाते रहे हैं। ये ऐसी चीजें हैं, जो उनके अन्दर भविष्य के एक समर्थ लेखक के उदय की आश्वस्ति देती हैं।
      कपिलजी की अधिकांश लघुकथाएँ मध्यम वर्ग की दिनचर्या से आती हैं। मध्यम वर्ग में ऐसे एकल परिवारों की संख्या काफी अधिक है, जो अपनी पृष्ठभूमि से उद्भूत प्रेरणाओं के कारण पैसा कमाने और जीवन को एन्ज्वॉय करने में विश्वास रखते हैं। पति-पत्नी और बच्चों तक सीमित इन परिवारों के दायित्व सीमित हैं, इसलिए इनके लिए जीवन को सहज-तरीके और आनन्द के साथ जीना आसान होता है। यद्यपि रोजगारदात्री कम्पनियों की अपेक्षाओं को पूरा करने के तनाव इन्हें परेशान भी करते हैं, लेकिन उन्हीं तनावों के विरुद्ध ये अपने जीवन को एन्ज्वॉयमेंट के माध्यम से प्रबन्धित करते हैं। ऐसी स्थितियों और क्षणों से जनित व्यवहार की तीव्र अनुभूतियाँ लघुकथा के लिए स्थान बनाती हैं। प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से कपिलजी का मन इस क्षेत्र में सबसे अधिक रमता है। बॉडी गार्ड, हार-जीत, आगंतुक, पापा, ये मोह मोह के धागे, रोजमर्रा, हौसला, वेलेंटाइन डे, कचौड़ी, व्यवहारिकता आदि जैसी लघुकथाएँ किसी न किसी रूप में ऐसी ही पृष्ठभूमि से जुड़ी हैं। विभिन्न प्रकार के खाँचे बनाने वाले विमर्श, जो लघुकथा और अन्य समकालीन लेखन को चर्चाओं के घेरे में बनाए रखते हैं, कपिल शास्त्री की लघुकथाओं में प्रत्यक्षतः बहुत स्थान प्राप्त नहीं कर पाये हैं। इसी प्रकार राजनैतिक विषयों एवं सन्दर्भों पर भी वह लघुकथा में उतरते दिखाई नहीं देते। वस्तुतः यह विमर्श और राजनीति-निरपेक्षता उनकी बड़ी ताकत बनती दिखाई देती है। 
      कपिल बड़ों और बच्चों के मध्य रिश्तों में व्याप्त मनोविज्ञान में रुचि लेते दिखाई देते हैं। पीढ़ी-अंतराल को न्यून करने की दृष्टि से यह अच्छा विषय है और इस पर सृजनात्मक चिंतन के लिए गुंजाइश भी पर्याप्त है। लेकिन इस विषय पर पर्याप्त सावधानी भी अपेक्षित है, जो सूक्ष्म दृष्टि और चिन्तन से ही संभव है। वैसे तो प्रत्येक विषय के सन्दर्भ में यह आवश्यक है कि यथार्थ चित्रण के प्रयास में नकारात्मक भाव की स्थापना में रचना सहयोगी न बन जाये, लेकिन बच्चों के सन्दर्भ में ऐसी चीजों का सही उपचार बहुत आवश्यक है। ‘चुल्लू भर पानी’ में टिंकू का अहसास ‘‘आज पापा की मेरे कारण इतनी बेइज्जती हुई और पापा बेचारे कुछ नहीं बोल पाये।’’ ठीक है लेकिन ‘‘यार टिंकू, फिर तो हमें चुल्लू भर पानी में डूब मरना चाहिए।’’ के साथ ही चश्मे वाली लड़की और उसकी माँ के एक नम्बर की कटौती पर बहते आँसुओं का सही समाधान नहीं हो पाया है। एक सशक्त होते लघुकथाकार के रूप में कपिलजी से इतनी अपेक्षा तो करनी ही होगी। उनसे हमारी ऐसी ही पाठकीय अपेक्षा ‘बॉडी गार्ड’ जैसी लघुकथाओं के सन्दर्भ में भी रहेगी। हाँ, उनकी इन लघुकथाओं में बच्चों और बड़ों के मध्य रिश्ते में जिस सकारात्मक भाव को उकेरा गया है, वह स्वागतेय है।
      कपिलजी की एक लघुकथा है ‘पंछी क्यों नहीं आते’। संवेदना के स्तर पर (शीर्षक बहुत उपयुक्त नहीं लगता) अच्छी लघुकथा है, लेकिन फ्लैश बैक और नेपथ्य के समुचित उपयोग से ऐसी लघुकथाओं के प्रभाव को कई बार गुणित किया जा सकता है। विशेष रूप से नेपथ्य के उपयोग और स्पष्टता पर कपिलजी को परिश्रम करना होगा। एक और बात, कपिलजी की कुछ रचनााओं का फार्मेट कुछ मित्रों को लघुकथा से इतर जैसा लगेगा। उनकी ऐसी ही दो लघुकथाएँ हैं- ‘हौसला’ और ‘आत्मनिर्भरता’। प्रचलित धारणाओं के दृष्टिगत कुछ समीक्षक कह सकते हैं कि ‘हौसला’ में दो असम्बन्धित दृश्यों को जोड़कर बिना किसी स्पष्ट कथ्य के रचना को समाप्त कर दिया गया है, इसलिए इसमें लघुकथा जैसा कुछ नहीं है। लेकिन इस रचना को थोड़ा सूक्ष्म दृष्टि से पढ़ने और नेपथ्य से निकलती ध्वनि को समझने की आवश्यकता है। ‘आत्मनिर्भरता’ भी लघुकथा ही है। परिभाषाओं के जाल में उलझे लोगों को ऐसी लघुकथाओं को स्वीकारने में समय लगेगा। कपिलजी दवा-व्यवसाय से जुड़े हैं, इस क्षेत्र की अच्छी समझ है उन्हें, इसलिए इस क्षेत्र के परिवेश से जुड़ी उनकी लघुकथाएँ भी सफल हैं।
       यहाँ मैंने कपिल शास्त्री की जिन पाँच लघुकथाओं को चुना है, वे उनकी प्रतिनिधि लघुकथाएँ होने के साथ उनके लघुकथा लेखन के सकारात्क बिन्दुओं को सामने रखती हैं और भविष्य में उनसे अच्छे लघुकथा सृजन की संभावनाओं की आश्वस्ति देती हैं। ये लघुकथाएँ हैं- पापा, वैलेंटाइन डे, पंगत, सेफ्टी वाल्व और ढोंग।
      लघुकथा मूलतः जीवन की सहजता और सरलता की पक्षधर होने के कारण जीवन से जुड़े हर पक्ष पर अपनी दृष्टि रखती है, इसलिए हर वह चीज जो जीवन को सहज-सरल बनाती है, लघुकथा को भी आगे ले जाती है। उसकी अर्थवत्ता, प्रभावोत्पादकता और व्यापकता के माध्यम से उसे बहुआयामी बनाती है। दूसरी बात, विशिष्ट महत्वाकांक्षाओं एवं उद्देश्यों से जनित संघर्ष से इतर जीवन में सहजता और सरलता प्रमुखतः भावनात्मक सम्बन्धों के पारस्परिक आकर्षण से ही आती है। इस दृष्टि से बच्चों, विशेषतः बेटियों और माता-पिता के मध्य स्नेहिल और भावनात्मक सम्बन्धों की सुगन्ध ने लघुकथा को विशेष आयाम प्रदान किए हैं। इस सन्दर्भ में वरिष्ठ पीढ़ी के साथ नई पीढ़ी ने भी कई प्रभावशाली लघुकथाएँ दी हैं। कपिल शात्री की लघुकथा ‘पापा’ भी उन्हीं में से एक है। बालपन में तो बच्चों की दुनिया प्रायः माता-पिता के इर्द-गिर्द होती है, इसलिए स्वाभाविक लगाव और आकर्षण को समझा जा सकता है, लेकिन जैसे-जैसे बच्चे बड़े होते हैं, उनकी दुनिया का विस्तार होता है। आकर्षण का एकाधिकार टूटता है और कई बार बच्चे माता-पिता के विरुद्ध भी खड़े हो जाते हैं। इसमें माता-पिता की ओर से भी कुछ कारण हो सकते हैं और बच्चों की ओर से भी, एक-दूसरे को न समझ पाने के। लेकिन बढ़ती उम्र के साथ माता-पिता की दुनिया बच्चों पर कहीं अधिक केन्द्रित होते जाने के कारण उनके बच्चों के हितैषी होने में सन्देह के कारण अत्यल्प होते हैं, ऐसे में उनकी भावनाओं को समझने और स्नेह-आकर्षण के रिश्ते को बनाए रखने की प्रक्रिया बच्चों के व्यवहार में कहीं अधिक महत्वपूर्ण होती है, जिसे इस लघुकथा में सिद्दत से देखा-समझा जा सकता है। बड़ी होती बेटी द्वारा अपनी दुनिया में पिता की सीख को हल्के में लेने के बावजूद उनके मध्य उभयपक्षीय आकर्षण बना रहता है। अन्ततः एक समयबिन्दु पर पिता की सीख को हल्के में लेने का परिणाम पिता के स्नेहाकर्षण की गहराई और उसके प्रति स्वीकारोक्ति बेटी के व्यवहार में उतरकर दुःखद क्षण में भी जीवन-प्रवाह की सुखद अनुभूति का सम्प्रेषण करती है। अनुभूति का एक झोंका ऐसा आता है, गोया बेटी की दुनिया भी पिता के इर्द-गिर्द ही सिमटी हो। यही तो लघुकथा है! शिल्प के स्तर पर भी रचना अच्छी है, लेकिन तीसरे पैराग्राफ के पहले वाक्य में आरुषि का नाम लाना और उसके बाद पूरी बात ‘मैं’ से कहलवाना, शिल्पगत विसंगति है। ‘‘आरुषि की आँखों के...’’ के स्थान पर ‘‘मेरी आँखों के...’’ शब्दों का उपयोग सही होगा। तीसरे पैराग्राफ में पहले वाक्य के बाद का दृश्य पार्श्व में मान लेने पर भी बात बनती नहीं दिखती।
      जीवन में प्यार के अहसास की गर्माहट सदैव खुशियों को गुणित करने और रिश्तों को जीवंत रखने की क्षमता रखती है। लेकिन नियमित रिश्तों में प्यार के अहसास को बनाये रखने के लिए स्थितियों-परिस्थितियों पर विजय प्राप्त करनी होती है, संकल्पबद्ध होना होता है। आवश्यक अनुकूलताओं के बावजूद आम गृहस्थ लोगों में यह भावना और संकल्पबद्धता या तो होती नहीं या बहुत कम होती है। इसके कई मनोवैज्ञानिक कारण गिनाए जा सकते हैं लेकिन ऐसे कारणों को गिनाकर न तो जीवन में ताज़गी लाई ला सकती है, न ही गुम होते प्यार के अहसास को पुनर्जीवित किया जा सकता है। इसलिए कारणों के लिए स्मृतियों को खगालने की बजाय होना यह चाहिए कि सामने से गुजरते दृश्यों में प्रेरणा के सूत्रों को तलाशा जाये और यथार्थ को स्वीकार किया जाये। अहसास को उभरने दिया जाये। कपिल शास्त्री ‘वैलेंटाइन डे’ में इसी सर्द अहसास को गर्माहट देते दिखते हैं। कार वाश करके जीवन को जीवंत रखने वाला इंजीनियरिंग का वह छात्र पैसे न मिलने पर भी अपनी प्रेमिका के साथ वैलेंटाइन डे पर खुश है। विपरीत स्थिति में दिखने वाला यही भाव लघुकथा के ‘वह’ को उसके जीवन में खत्म होते जा रहे प्यार के अहसास को पुनर्जीवित करने की प्रेरणा देता है। लघुकथा इसी बिन्दु पर अपने ‘विशिष्ट’ को प्राप्त करती है कि ‘वह’ उस लड़के को उसकी गर्ल फ्रेन्ड के साथ देखकर वैलेंटाइन डे का एक आम क्रियाकलाप मानकर किसी कथित संकोच के साथ एन्ज्वॉय करता हुआ निकल नहीं जाता, अपितु उसमें रुचि लेता है, उसके बारे में पत्नी से बात करता है और अन्ततः उसमें अपने प्यार के लिए संकल्पबद्धता की प्रेरणा का सूत्र ग्रहण करता है। 
       ‘पंगत’ सामाजिक और सार्वजनिक आयोजनों में सहभोज की व्यवस्था के माध्यम से संस्कृति और परम्पराओं में आ रहे बदलावों के चरित्र की कथा है। इसके केन्द्र में जो महसूस करने वाला अहसास है, उसका कारण कुछ लोगों को पीढ़ीअन्तराल लग सकता है। किन्तु आयोजनों की व्यवस्था जिस दिशा में जा रही है, यदि कुछ आवश्यक समायोजन नहीं किए गए तो कुछ समय बाद वह सामाजिकता के ताने-बाने को समाप्त करने वाली ही सिद्ध होगी। प्राचीन व्यवस्था में भोजन ग्रहण करने के लिए अतिथियों से मान-मनुहार किया जाता था, जिससे भोजन करने में आनन्द आता था और पारस्परिक स्नेह-सम्बंध भी प्रगाड़ होते थे। वर्तमान व्यवस्था में भोजन के लिए कोई किसी को पूछता नहीं, स्वतः ही लाइनों में लगना पड़ता है। कई आयोजनों में तो कई-कई जगह (प्रत्येक काउन्टर पर) लाइन में लगना पड़ जाता है। लाइनों की वजह से कई बार झगड़े तक की स्थिति बन जाती है, कई अतिथियों को अपमान के घूँट पीने पड़ जाते हैं। जो लोग इस आधुनिक व्यवस्था को आत्मसात् नहीं कर पाये हैं, वे क्षुब्धता-बोध का शिकार हो जाते हैं और कभी-कभी बिना भोजन किए ही वापस चले जाते हैं। आयोजकों और आमंत्रितों के मध्य ईवेन्ट मैनेजमेंट कम्पनियाँ आ गई हैं। ये कम्पनियाँ व्यावसायिकता के नाम पर कभी-कभी अत्यधिक संवेदनहीनता का परिचय देकर अतिथि और आतिथ्य की परिभाषा ही बदलती दिखाई देती हैं। इस तरह की व्यवस्थाओं को आरम्भ करने का प्रमुख उद्देश्य था, आयोजक कार्यों की देखभाल से मुक्त होकर अतिथियों से मिल सकें, उनका व्यक्तिगत स्वागत कर सकें, लेकिन व्यवस्था किन्हीं और दिशाओं में जाती दिखाई दे रही है। यद्यपि लघुकथा ‘पंगत’ मूलतः भोजन-व्यवस्था पर ही टिप्पणी करती है, लेकिन इसका संकेत व्यवस्था के पूरे ढाँचे के सन्दर्भ में समझे जाने योग्य है। लघुकथा के कथ्य को पीढ़ी अन्तराल की सोच से देखना सामाजिक ढाँचे पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों को उपेक्षित करना होगा। इसलिए इस लघुकथा के संकेताक्षरों को व्यापक महत्व दिया जाना चाहिए।
     अपने अधिकारों के लिए महिलाओं का आक्रोश इस अर्थ में तो समझ में आता है कि अपने ऊपर होने वाली ज्यादती और जीवन को असहज करने वाली चीजों को क्यों सहा जाये! किन्तु उस स्थिति में, जब जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आवश्यक संसाधन पति और परिवार अपने दम पर जुटाने में समर्थ हो, यदि कोई व्यक्ति अपने अधिकार या पैतृक सम्पत्ति में अपने हिस्से के लिए माता-पिता से माँग नहीं करता या जोर-जबरदस्ती नहीं करता तो इसके लिए पत्नी का जीवन को असहज करने वाला असीमित आक्रोश कैसे उचित माना जा सकता है! कई स्वाभिमानी पुत्र आज भी ऐसे होते हैं, जो अपने स्वाभिमान की रक्षार्थ और जीवन को शान्तिपूर्ण ढंग से जीने के लिए माता-पिता की सम्पत्ति में अपना हिस्सा स्वेच्छा से छोड़ देते हैं। लेकिन व्यवहार में पत्नी का आक्रोश उन्हें उसी तरह झेलना पड़ता है, जैसे कपिल शास्त्री ने ‘सेफ्टी वाल्व’ में दर्शाया है। ‘सेफ्टी वाल्व’ एक पत्नी के विकराल आक्रोश का प्रभाशाली चित्र है। वेवश पति के समक्ष स्थिति से निपटने का कोई रास्ता नहीं है, सिवाय कार्पोरेट कल्चर से मिली इस सीख के कि वाष्प निकलते समय प्रेशर कुकर के सेफ्टी वाल्व के ढक्कन की तरह नाचता रहे। लघुकथा इन आक्रोशवान महिलाओं का ध्यान उनके अपने आक्रोश के औचित्य पर आकर्षित कर सकती है कि वे अपनी बुद्धिमत्ता के प्रश्न पर विचार करें। निसन्देह कुछ स्थितियाँ ऐसी भी होती हैं, जिनमें सहज जीवन के स्तर तक आते-आते महिलाओं को अपने सम्बन्धियों की ओर से काफी कुछ झेलना पड़ा होता है। मन में कुछ घाव हो जाते हैं, जो आसानी से भरते नहीं। किन्तु इस स्थिति में भी विकराल आक्रोश से घाव भरने वाले नहीं हैं। पति को प्रताड़ित करके, आक्रोशित होकर स्वयं के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करके और अपने परिवार में जीवन के लिए असहज वातावरण बनाकर कुछ भी हासिल नहीं हो सकता। अधिकारों को प्राप्त करने के आक्रोश रहित तरीके हो सकते हैं। यथार्थ चित्रण और संकेताक्षरों की प्रस्तुति के सन्दर्भ में लघुकथा अपनी स्वाभाविकता के लिए अच्छे अंक पाने की हकदार है। शिल्प के स्तर पर भी रचना अच्छी है लेकिन ‘पुराने गड़े मुर्दे’ के स्थान पर ‘गड़े मुर्दे’ ही पर्याप्त होगा। 
       सोशल मीडिया, विशेषतः फेसबुक से बन रही परम्पराओं में भी कुछ चीजें व्यापक स्तर पर निकलकर आई हैं, जिसके कारण इस पर दिखावा-प्रदर्शनों का प्रचलन बड़ा है। यहाँ फैशन और दिखावे के नए-नए तौर-तरीके नित्य देखने को मिलते हैं और लोगों में इससे प्रचार और खुशियाँ प्राप्त करने की लालसा लगातार बढ़ रही है। लघुकथा ‘ढोंग’ इस यथार्थ को प्रतिबिम्बित करती है। फेसबुक पर कई अधेड़ जोड़ों के प्रेमपूर्वक खिंचवाए फोटोज के आकर्षण में प्रदीपजी भी अपनी पत्नी को वेस्टर्न ड्रेसेज पहनने के लिए प्रेरित करते हैं। उनका सोचना है कि तमाम जिम्मेवारियों से मुक्त होने के बाद अब वे दोनों पति-पत्नी भी फेसबुक से मिलने वाली खुशियों को एन्जॉय कर सकते हैं। लेकिन जिम्मेवारियों से मुक्त हो जाने वाली बात पत्नी को अतीत में धकेल देती है। उसे जीवन के कड़वे अतीत की तमाम घटनाएँ याद आती चलीं जाती हैं। मन में बसी कड़वाहट इन शब्दों में अभिव्यक्ति पाती है- ‘‘...तुम्हें अब मेरी खुशियों का खयाल आया। सिर्फ वेस्टर्न ड्रेसेज पहनाकर और फेसबुक पर फोटो डालकर तुम मुझे सुखी नहीं दिखा सकते।’’ पत्नी के उत्तर में बरसों की खामोशी टूटी तो पतिदेव को लगा जैसे वह निर्वस्त्र होते जा रहे हों। फेसबुक जैसे माध्यम निसन्देह सामाजिक जीवन में बदलाव ला रहे हैं, लेकिन वे आइना भी दिखा रहे हैं। इन क्रियाकलापों में हो सकता है भविष्य के जीवन की कुछ बेहतरी के सूत्र छिपे हों। इस तरह की खुशियों का आकर्षण जीवन में वास्तविक और सकारात्मक प्रेरणाएँ ला सकेगा, ऐसी उम्मीद तो की ही जा सकती है। इस लघुकथा का यही संकेत है।
     कपिलजी लघुकथा में मानवीय जीवन की घनीभूत अनुभूतियों को प्रस्तुत करने में सक्षम हैं, इस दिशा में वह विशेष दक्षता हासिल कर सकते हैं। निश्चित रूप से वह स्वयं भी इस बात को समझते होंगे कि कोई भी रचनाकार अपने सशक्त बिन्दुओं को पहचान कर और उन्हें केन्द्र में रखकर अपेक्षाकृत अधिक गति से और अधिक आगे तक जा सकता है।
कपिल शास्त्री की चयनित लघुकथाएँ 
01. पापा
    भुर...भुर...भुर... की आवाज़ आने लगी, लगता है पापा आ गए। पापा ने मोटरसाइकिल पर बैठे-बैठे ही गाड़ी टेढ़ी करके लोहे का गेट खोला, अब मैं पापा के लिए दरवाज़ा खोलूँगी, मम्मी तो अम्मा के साथ चौके में खाना बना रहीं हैं, उन्हें तो पता ही नहीं है। मैंने तो सब लोहे की जाली में से देख लिया।
    सिटकनी तक मेरा हाथ नहीं पहुचता है, ऐसा करती हूँ एक कुर्सी खींचकर लाती हूँ, उस पर चढ़कर तो पहुँच ही जायेगा। पापा को जाली में से देखते साथ ही चिल्ला दी- ‘‘पापा!’’ अरे ये क्या! पापा को विश्वास ही नहीं कि मैं भी दरवाज़ा खोल सकती हूँ। उन्होंने डोर बेल बजा दी, इतने में ही मम्मी भी आ गयी। लो मेरी सारी मेहनत गयी पानी में। ‘‘नहीं, मैं दरवाज़ा खोलूँगी’’ मैं जोर-जोर से अलड़ाने लगी। मम्मी भी मुझे गोद में लेकर बोलीं, ‘‘लो भई, आज पापा के लिए हमारी गुड़िया रानी ही दरवाज़ा खोलेगी और मुझी से सटकनि खुलवाई। मैं और मम्मी दोनों पापा को देखकर बहुत खुश हो गयीं। मम्मी ने एक गाना भी सिखाया था. ‘‘सात समंदर पार से, गुड़ियों के बाजार से, अच्छी-सी गुड़िया लाना, गुड़िया चाहे ना लाना, पप्पा जल्दी आ जाना।’’
    बचपन का यह सारा दृश्य आज अस्पताल में बेड पर पड़े-पड़े आरुषि की आँखों के आगे घूम रहा था। एक समय था जब मैं जाली में से देखकर पापा के लिए दरवाज़ा खोलती थी, आजकल जब मैं स्कूटी दनदनाते हुए आती थी तो उसी जाली में से देखकर पापा खोलते थे और कहते थे- ‘‘मुँह तो बाँध लेती हो, हेलमेट भी लगा लिया करो, आजकल बहुत एक्सीडेंट हो रहे हैं। बाहर जाती हो तो तुम्हारी चिंता रहती है, जरा धीरे चलाया करो, पुलिस पकड़ लेगी।’’ मैं पापा की बात को मज़ाक में उड़ा देती थी कि बाल ख़राब हो जायेंगे और लड़कियों को पुलिस नहीं पकड़ती। अरे पापा, हम लोग तो ट्रिपलिंग भी कर लेते हैं! यही सब सोचते-सोचते, पता नहीं कब नींद लग गयी।
    अचानक सिर पर किसी के स्पर्श से आँख खुली। देखा, पापा हैं। मैं उन्हें देखकर रोने लगी- ‘‘पापा, छिले हुए हाथ-पैरों में बहुत दर्द हो रहा है।’’ पापा मुस्कुराकर बोले- ‘‘अच्छा हुआ कोई फ्रैक्चर नहीं है।’’ फिर वही पुराना शेर मारा जो अक्सर बचपन में भी मेरे गिरने पर मारा करते थे- ‘‘शह सवार ही गिरते हैं मैदाने जंग में’’। मैंने फिर चिढ़कर पापा के सीने पर हल्का सा मुक्का मारने की कोशिश की लेकिन हाथ उठाते ही नहीं बना, बहुत दर्द था और सेलाइन लगी हुई थी। मेरी इच्छा हुई कि उठकर पापा के सीने से लग जाऊँ पर उठते भी नहीं बना, सिर्फ आँखों की कोर से आँसू लुढ़क पड़े। पापा ने मेरी तक़लीफ़ देखते ही मेरा माथा चूम लिया। 



02 वैलेंटाइन डे
    इस बार वैलेंटाइन डे सन्डे को पड़ा था। शाम को श्रीमतीजी को न्यू मार्केट ले जाते वक्त, ट्रैफिक सिग्नल पर लाल बत्ती होते ही मैं उससे नज़र बचाकर प्रेमी जोड़ों को हाथ में हाथ डालकर घूमते हुए देख रहा था और सोच रहा था कि हम तो इजहारे मोहब्बत भी नहीं कर पाये और समाज ने हमारी दस्तानों को लघुकथा में तब्दील कर जल्दी से दी एन्ड कर दिया। तभी एक परिचित चेहरा दिखा, याद आया ये तो वही इंजिनीयरिंग पढ़ रहा लड़का है जो हमारे अपार्टमेंट में हर सन्डे कार वाश के लिए आता है और चार सौ रुपये महीने लेता है, आठ-दस गाड़ियों से चार हज़ार कमा लेता है। पिछले दो सन्डे को उसने नागा कर दिया था लेकिन आज सुबह आया था और कुछ पैसों की अपेक्षा की थी। किन्तु पत्नीजी उसकी दो छुट्टियों से पहले ही भुनभुनाई हुई थी इसलिए कह दिया और दो सन्डे करो तब पेमेंट करूँगी। उसने कोई तकाजा नहीं किया और चुपचाप चला गया।
    मैंने पत्नी को बताया कि ‘‘मैंने उसे अपनी गर्लफ्रेंड के साथ घूमते हुए देखा, कम से कम आज के दिन तुम्हें ये बनिया बुद्धि इस्तेमाल नहीं करनी थी। आज उसे सख्त ज़रुरत होगी।’’
    वो भी अफ़सोस जताते हुए बोली ‘‘हाँ, सुबह ये बात तो दिमाग में ही नहीं आई लेकिन तुम्हें उसकी गर्लफ्रेंड की गिफ्ट की फिकर हो रही है खुद तुमने इतने सालो में मुझे प्यार से कोई गिफ्ट दी है!’’ मैंने महसूस किया- ‘‘हाँ, प्यार का वो अहसास ख़त्म होता जा रहा है।’’
    आगे फूलों की दुकान पर मैंने कार रोक दी और एक लाल गुलाब का बुके खरीद कर पेशे खिदमत करते हुए फ़रमाया, ‘‘चलो एक बार फिर से अजनबी बन जाएँ हम दोनों और तुम बन जाओ मेरी वैलेंटाइन, हैप्पी वैलेंटाइन डे।’’
    ‘‘थैंक्स’’ के साथ चेहरे पर आई मुस्कराहट में वो अहसास पुनर्जीवित हो चुका था और मैं उस आत्मस्वाभिमानी, प्यार करने वाले लड़के का शुक्रिया अदा कर रहा था। 



03. पंगत
      हाथ-पैर धोने के बाद जैसे ही कृष्णकांतजी ने हॉल में प्रवेश किया, पहली पंगत में अधिकांश लोग बैठ चुके थे। राधेश्यामजी और नारायणजी के पास जगह खाली थी सो उन्होंने देखते ही पुकारा- ‘‘अरे कैं वकील साब, इधर ही पधारो नी, हमारे पास विराजो नी।’’ वो भी उनके पास आलकी-पालकी मांडकर बैठ गए। फ़ौरन ही उनके सामने भी दोने, पत्तल और गिलास लगा दिए गए।
      परिवार और मोहल्ले के ही कई युवक पंगतों के बीच से डोंगे लिए दौड़ते-भागते प्रत्येक व्यंजन परोसते जा रहे थे। जब सभी के पत्तल-दोने, सभी व्यंजनों से परिपूर्ण हो गए तब लोगों ने भगवान् का भोग निकालकर अंचली छोड़कर एक साथ भोजन आरम्भ किया। उदरस्थ किये गए भोजन से पत्तल में हुए खाली स्थान पर परोसने वालों की ही नहीं, मित्रों की भी बराबर नज़र थी। पूरियाँ ख़त्म होते ही नारायणजी ने आवाज़ लगाई- ‘‘अरे नानू, वकील साब ने गरमागरम पूरी परोसे नी और म्हारे भी रायता लै दे और राधेश्याम ने बेसन की चक्की और परोसे नी।’’
      भरपेट भोजन से तृप्त होने के बाद अतिरिक्त मिष्ठान्न परोसे जाने पर उन्होंने पत्तल को अपनी हथेलिओं से ढँककर क्रॉस बना लिया और बोले- ‘‘अरे, अरे, कै कर रिये हो महाराज, बस बस, पेट फटी जायगो।’’ आसपास बैठे मित्रों ने उनके एक-एक हाथ खींचकर वो क्रॉस भंग करवा दिया और बोले- ‘‘परीस, परीस, वकील साब ने, बस में भी कंडक्टर की जगह तो होवे ही, अभी तो श्रीखंड का एक दोना और जिमाना है।’’
      डी.जे. की तेज ध्वनि से यकायक तंद्रा भंग हुई तो खुद को पुरानी यादों से एक भव्य विवाह समारोह के बुफे में खड़ा पाया। यहाँ अनेक स्टाल्स लगे हुए थे, वहाँ गए तो प्लेट्स नहीं दिखीं, पूछने पर पता पड़ा वो बीचोबीच स्थित है सलाद के साथ। फिर एक चक्रव्यहू में संघर्षरत होते हुए महिलाओं से अपेक्षित दूरी बनाये रखते हुए प्लेट को सजाने की चुनौती को बखूबी अंजाम दिया और यथासंभव उदरपूर्ति की। प्लेट रखने गए तो लोगों की छोड़ी गयी जूठन से अन्नदेव का ऐसा अनादर देख मन व्यथित हो गया। पानी का स्टाल ग्राउंड के दूसरे कोने पर था जहाँ सिर्फ दो कंटेनर से दो लोग ही मिनरल वाटर पी पा रहे थे बाकी डिस्पोजेबल गिलास हाथ में लिए उनके हटने का इंतज़ार कर रहे थे।
      लौटते समय वही पुराने मित्र मिल गए तो चेहरे पर प्रसन्नता आ गयी मगर आँखों में एक प्रश्न था, ‘‘वो मान-मनुहार अब कहाँ गयी!!!’’



04. सेफ्टी वाल्व 
      प्रेशर कुकर गैस पर चढ़ाकर अनु पति अविनाश पर बरस पड़ी।
      ‘‘अब तो तुम्हारी शकल देखकर भी गुस्सा आता है, आखिर हो तो उन्हीं का खून। किस मनहूस घडी में तुम मेरी सीढ़ी चढ़े।’’ कुकर के तापमान के साथ उसका पारा भी चढ़ता जा रहा था।
      ‘‘मैं तो हर रिश्ते में ठगी गयी, सबने मेरा इस्तेमाल ही किया। माँ-बाप क्या, सास-ससुर क्या, भैया-भाभी क्या और ननंद-नंदोईजी ने तो बंटाढार ही कर दिया। चुगली कर-करके घर से ही निकलवा दिया और रही-सही कसर तुमने घर छोड़ कर पूरी कर दी, कोई तकाज़ा भी नहीं किया, जो उन्होंने बाद में ठिकाने लगा दिया।’’
      अविनाश ने टालते हुए कहा- ‘‘अब, जब हमने सब कुछ अपने दम पर बना लिया है तो क्यों पुराने गड़े मुर्दे उखाड़ रही हो।’’
      ‘‘मुर्दे पुराने हैं तो क्या हुआ, ज़ख्म तो हरे हैं। अपने घर वालों के खिलाफ तो कुछ सुन ही नहीं सकते न, सही है, मैं तुम्हारे लिए अपना खून भी बहा दूँ तो क्या हुआ, मैं तो गैर हूँ न! घुटना तो पेट की तरफ ही मुड़ेगा न!’’ अनु ने फिर कुरेदा।
    पहली और दूसरी की तरह इधर तीसरी बार भी सीटी बजने पर सेफ्टी वाल्व से निकल रही वाष्प से ढक्कन कमर हिला-हिला कर नाच रहा था फिर बैठ जा रहा था, जैसे वो अवांछित वाष्प के निकल जाने से खुद की और कुकर की सलामती के लिए प्रसन्न तो था मगर डरा भी हुआ था। गैस बंद कर दी गयी।
      ‘‘बस कुकर ज़रा ठंडा हो जाने दो, फिर खाना लगाती हूँ।’’ इस बार अनु की आवाज़ में कुछ ठंडक लगी।
      अविनाश को लगा जैसे वो स्वयं इन वाष्परूपी ज़ख्मों के ज्वालामुखी के मुहाने पर बैठा हुआ एक ढक्कन है, ‘‘अगर वो नाच सकता है तो भड़ास निकलते वक्त मैं क्यों नहीं।’’ भोजन के पश्चात् वो भी कमर हिलाते हुए बाय कह कर निकल लिया। 



05. ढोंग
      ‘‘अब तो तुम भी वेस्टर्न ड्रेस्सेस पहन सकती हो।’’ फेसबुक पर कई अधेड़ जोड़ो के प्रेमपूर्वक खिंचवाए फोटोज को दिखाकर प्रदीपजी अपनी धर्मपत्नी सरोज से बोले।
      ‘‘अब तो से तुम्हारा क्या मतलब है?’’ सरोज ने पूछा।
      ‘‘मतलब, अब तो माताजी-पिताजी भी गुजर चुके हैं, दोनों बेटियाँ और बेटा बाहर पढ़ रहे हैं। अब तो हम भी एन्जॉय कर सकते हैं।’’ प्रदीप जी ने स्पष्ट किया।
      गुजरी घटनाओं की यादों ने जैसे सरोज के दिल पर पत्थर रख दिया हो। भारी-भरकम दहेज के साथ संस्कारी बहू की मांग, फिर लड़खड़ाते व्यापार के लिए पिता से बेटी को सुखी रखने की शर्त, पहली दो बेटियों के होने पर वारिस न दे पाने के ताने।
    हर मांग के साथ पिताजी के माथे की सिलवटें बढ़ती गयी और कमर झुकती गयी। पति का भी शराब और शवाब को व्यापार का ही हिस्सा बताना और उसी नशे में उसे भी वारिस पैदा करने वाली मशीन की तरह इस्तेमाल करना।
      ‘‘क्यों क्या हुआ?’’ उदास देखकर पति ने पूछा।
      ‘‘नहीं, अब बहुत देर हो चुकी है। मेरे पिताजी की कमर टूट चुकी है, वो तो हमेशा ही मुझे सुखी देखना चाहते थे पर तुम्हें अब मेरी खुशियों का ख्याल आया। सिर्फ वेस्टर्न ड्रेसेस पहना कर और फेसबुक पर फ़ोटो डालकर तुम मुझे सुखी नहीं दिखा सकते।’’
    सरोज के उत्तर में बरसों की ख़ामोशी टूटी थी और प्रदीप जी को लग रहा था जैसे वो निर्वस्त्र होते जा रहे हैं।

  • कपिल शास्त्री, निरुपम रीजेंसी एस-3, 231ए/2ए साकेत नगर. भोपाल, म.प्र./ मो. 09406543770
  • डॉ .उमेश महादोषी, 121, इन्द्रापुरम, निकट बी.डी.ए. कॉलोनी, बदायूँ रोड, बरेली, उ.प्र./मो. 09458929004

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