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शनिवार, 22 सितंबर 2018

श्रीकृष्ण 'सरल' जन्म-शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में विशेष सामग्री

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  07,   अंक  :  11-12,   जुलाई-अगस्त 2018 


श्रीकृष्ण 'सरल' स्मरण 


श्रीकृष्ण ‘सरल’ : काव्यांजलि
{देश के क्रान्तिकारी शहीदों के यशोगान को समर्पित महाकवि सरलजी के जन्मशताब्दी वर्ष के आयोजन क्रम में इस अंक में प्रस्तुत हैं उनकी कुछ प्रतिनिधि कविताएँ। सभी कविताएँ व सभी चित्र / रेखाचित्र ‘क्रान्ति गंगा’ से लिए गए हैं। प्रस्तुति : प्रदीप शर्मा ‘सरल’/संतोष सुपेकर} 



जन्मभूमि को  प्रणाम

भूमि मालवा की...
भूमि मालवा की यह अपने 
गौरव से गम्भीर है,
ठीक कहा है, इसमें पग-पग
महान क्रांतिकारी दुर्गा भाभी के साथ सरल जी 
रोटी, डग-डग नीर है।

हर दिन शुभ दिन, सरल सलौनी
सदा यहाँ की रात है,
घूँघट-की-सी हँसी, मालवा
की भीनी बरसात है।

आव-भगत में भूमि यहाँ की 
रही सदा तल्लीन है,
तन से तो काली है, पर यह
मन से नहीं मलीन है।

इसके मन की उज्ज्वलता के 
द्योतक फूल कपास के,
इसके अधिवासी प्रतीक सब
मदमाते मधुमास के।

सैनिक 

मारने और मरने का काम कौन लेता
यह कठिन काम जो करता, वह सैनिक होता,
जैसे चाहे, जब चाहे मौत चली आए
जो नहीं तनिक भी डरता, वह सैनिक होता।

यह नहीं कि वह वेतन-भोगी ही होता है
वह मातृभूमि का होता सही पुजारी है,
अर्चन के हित अपने जीवन को दीप बना
उसने माँ की आरती सदैव उतारी है।

पैसा पाने के लिए कौन जीवन देगा
जीवन तो धरती-माँ के लिए दिया जाता,
धरती के रखवाले सैनिक के द्वारा ही
है जीवन का सच्चा सम्मान किया जाता।

यह नहीं कि वह अपनी ही कुर्बानी देता
दुख के सागर में वह परिवार छोड़ जाता,
जब अपनी धरती-माता की सुनता पुकार
तिनके जैसे सारे सम्बन्ध तोड़ जाता।

सैनिक, सैनिक होता है, वह कुछ और नहीं
वह नहीं किसी का भाई पुत्र और पति है,
कर्त्तव्य-सजग प्रहरी वह धरती माता का
जो पुरस्कार उसका सर्वाेच्च, वीर-गति है।

सैनिक का रिश्ता होता अपनी धरती से
वह और सभी रिश्तों से ऊपर होता है,
जब जाग रहा होता सैनिक, हम सोते हैं
वह हमें जगाने, चिर-निद्रा में सोता है।

मैं अमर शहीदों का चारण

मैं अमर शहीदों का चारण, उनके यश गाया करता हूँ
जो कर्ज राष्ट्र ने खाया है, मैं उसे चुकाया करता हूँ।

यह सच है, याद शहीदों की हम लोगों ने दफनाई है
सरदार भगत सिंह को जन्म देने वाली 
पूज्य माताश्री विद्द्यावती  जी के साथ
सरल जी
 

यह सच है, उनकी लाशों पर चलकर आज़ादी आई है,
यह सच है, हिन्दुस्तान आज जिन्दा उनकी कुर्बानी से
यह सच अपना मस्तक ऊँचा उनकी बलिदान कहानी से।

वे अगर न होते तो भारत मुर्दों का देश कहा जाता,
जीवन ऐसा बोझा होता जो हमसे नहीं सहा जाता,
यह सच है दाग गुलामी के उनने लोहू सो धोए हैं,
हम लोग बीज बोते, उनने धरती में मस्तक बोए हैं।

इस पीढ़ी में, उस पीढ़ी के, मैं भाव जगाया करता हूँ।
मैं अमर शहीदों का चारण, उनके यश गाया करता हूँ।

यह सच उनके जीवन में भी रंगीन बहारें आई थीं,
जीवन की स्वप्निल निधियाँ भी उनने जीवन में पाई थीं,
पर, माँ के आँसू लख उनने सब सरस फुहारें लौटा दीं,
काँटों के पथ का वरण किया, रंगीन बहारें लौटा दीं।

उनने धरती की सेवा के वादे न किए लम्बे-चौड़े,
माँ के अर्चन हित फूल नहीं, वे निज मस्तक लेकर दौड़े,
महान क्रांतिकारी
चंद्र सिंह गढ़वाली  
भारत का खून नहीं पतला, वे खून बहा कर दिखा गए,
जग के इतिहासों में अपनी गौरव-गाथाएँ लिखा गए।

उन गाथाओं से सर्द खून को, मैं गरमाया करता हूँ।
मैं अमर शहीदों का चारण, उनके यश गाया करता हूँ।

है अमर शहीदों की पूजा, हर एक राष्ट्र की परंपरा
उनसे है माँ की कोख धन्य, उनको पाकर है धन्य धरा,
गिरता है उनका रक्त जहाँ, वे ठौर तीर्थ कहलाते हैं,
वे रक्त-बीज, अपने जैसों की नई फसल दे जाते हैं।

इसलिए राष्ट्र-कर्त्तव्य, शहीदों का समुचित सम्मान करे,
मस्तक देने वाले लोगों पर वह युग-युग अभिमान करे,
होता है ऐसा नहीं जहाँ, वह राष्ट्र नहीं टिक पाता है,
आजादी खण्डित हो जाती, सम्मान सभी बिक जाता है।

यह धर्म-कर्म यह मर्म, सभी को मैं समझाया करता हूँ।
मैं अमर शहीदों का चारण, उनके यश गाया करता हूँ।
पूजे न शहीद गए तो फिर, यह पंथ कौन अपनाएगा?
तोपों के मुँह से कौन अकड़ अपनी छातियाँ अड़ाएगा?
चूमेगा फन्दे कौन, गोलियाँ कौन वक्ष पर खाएगा?
अपने हाथों अपने मस्तक फिर आगे कौन बढ़ाएगा?
महान क्रांतिकारी वासुदेव बलवंत फड़के  

पूजे न शहीद गए तो फिर आजादी कौन बचाएगा?
फिर कौन मौत की छाया में जीवन के रास रचाएगा?
पूजे न शहीद गए तो फिर यह बीज कहाँ से आएगा?
धरती को माँ कहकर, मिट्टी माथे से कौन लगाएगा?
मैं चौराहे-चौराहे पर, ये प्रश्न उठाया करता हूँ।
मैं अमर शहीदों का चारण, उनके यश गाया करता हूँ।
जो कर्ज राष्ट्र ने खाया है, मैं उसे चुकाया करता हूँ।

जिसे देश से प्यार नहीं हैं

जिसे देश से प्यार नहीं है
जीने का अधिकार नहीं है।

जीने को तो पशु भी जीते
महान क्रांतिकारी सरदार किशन सिंह जी
 (सरदार भगत सिंह के पिताश्री )
अपना पेट भरा करते हैं
कुछ दिन इस दुनिया में रहकर
वे अन्ततः मरा करते हैं।
ऐसे जीवन और मरण को,
होता यह संसार नहीं है
जीने का अधिकार नहीं हैं।
मानव वह है स्वयं जिए जो
और दूसरों को जीने दे,
जीवन-रस जो खुद पीता वह
उसे दूसरों को पीने दे।
साथ नहीं दे जो औरों का
क्या वह जीवन भार नहीं है?
जीने का अधिकार नहीं हैं।
साँसें गिनने को आगे भी
साँसों का उपयोग करो कुछ 
काम आ सके जो समाज के 
तुम ऐसा उद्योग करो कुछ।
क्या उसको सरिता कह सकते
जिसम़ें बहती धार नहीं है?
जीने का अधिकार नहीं हैं।

शहीद

देते प्राणों का दान देश के हित शहीद
पूजा की सच्ची विधि वे ही अपनाते हैं,
हम पूजा के हित थाल सजाते फूलों का
वे अपने हाथों, अपने शीष चढ़ाते हैं।

जो हैं शहीद, सम्मान देश का होते वे
उत्प्रेरक होतीं उनसे कई पीढ़ियॉं हैं,
उनकी यादें, साधारण यादें नहीं कभी
यश-गौरव की मंज़िल के लिए सीढ़ियाँ हैं।

कर्त्तव्य राष्ट्र का होता आया यह पावन
महान क्रांतिकारी
गणेश दामोदर सावरकर 
अपने शहीद वीरों का वह जयगान करे,
सम्मान देश को दिया जिन्हांेने जीवन दे
उनकी यादों का राष्ट्र सदा सम्मान करे।

जो देश पूजता अपने अमर शहीदों को
वह देश, विश्व में ऊँचा आदर पाता है,
वह देश हमेशा ही धिक्कारा जाता, जो
अपने शहीद वीरों की याद भुलाता है।

प्राणों को हमने सदा अकिंचन समझा है
सब कुछ समझा हमने धरती की माटी को,
जिससे स्वदेश का गौरव उठे और ऊँचा
जीवित रक्खा हमने उस हर परिपाटी को।

चुपचाप दे गए प्राण देश-धरती के हित
हैं हुए यहाँ ऐसे भी अगणित बलिदानी,
कब खिले, झड़े कब, कोई जान नहीं पाया
उन वन-फूलों की महक न हमने पहचानी।
महान क्रांतिकारी
संतोष कुमार मित्र 

यह तथ्य बहुत आवश्यक है हम सबको ही
सोचें, खाना-पीना ही नहीं जिंद़गी है,
हम जिएँ देश के लिए, देश के लिए मरें
वन्दगी वतन की हो, वह सही वन्दगी है।

क्या बात करें उनकी, जो अपने लिए जिए
 वे हैं प्रणम्य, जो देश-धरा के लिए मरे,

वे नहीं, मरी केवल उनकी भौतिकता ही
सदियों के सूखेपन में भी वे हरे-भरे।

वे हैं शहीद, लगता जैसे वे यहीं-कहीं
यादों में हर दम कौंध-कौंध जाते हैं वे,
जब कभी हमारे कदम भटकने लगते हैं
तो सही रास्ता हमको दिखलाते हैं वे।

हमको अभीष्ट यदि, बलिदानी फिर पैदा हांे
बलिदान हुए जो, उनको नहीं भुलाएँ हम,
सिर देने वालों की पंक्तियाँ खड़ी हांेगी
उनकी यादें साँसों पर अगर झुलाएँ हम।
महान क्रांतिकारी
रामचंद्र सरवटे

जीवन शहीद का व्यर्थ नहीं जाया करता
म़र रहे राष्ट्र को वह जीवन दे जाता है,
जो किसी शत्रु के लिए प्रलय बन सकता है
वह जन-जन को ऐसा यौवन दे जाता है।

आँसू

जो चमक कपोलों पर ढुलके मोती में है
वह चमक किसी मोती में कभी नहीं होती,
सागर का मोती, सागर साथ नहीं लाता
अन्तर उंडेल कर ले आता कपोल मोती।

रोदन से, भारी मन हलका हो जाता है
रोदन में भी आनन्द निराला होता है,
महान क्रांतिकारी
नरसिंह दास 
हर आँसू धोता है मन की वेदना प्रखर
ताजगी और वह हर्ष अनोखा बोता है।
आँसू कपोल पर लुढ़क-लुढ़क जब बह उठते
लगता हिम-गिरि से गंगाजल बह उठता है,
हैं कौन-कौन से भाव हृदय में घुमड़ रहे
हर आँसू जैसे यह सब कुछ कह उठता है।

सन्देह नहीं, आँसू पानी तो होते ही
वे तरल आग हैं, और जला सकते हैं वे,
उनमें इतनी क्षमता, भूचाल उठा सकते
उनमें क्षमता, पत्थर पिघला सकते हैं वे।

आँसू दुख के ही नहीं, खुशी के भी होते
जब खुशी बहुत बढ़ जाती, रोते ही बनता,
आधिक्य खुशी का, कहीं न पागल कर डाले
अतिशय खुशियों को, रोकर धोते ही बनता।

भावातिरेक से भी रोना आ जाता है
ऐसे रोदन को कोई रोक नहीं पाता,
रोने वाला, निरुपाय खड़ा रह जाता है
आगमन आँसुओं का, वह रोक नहीं पाता।

जो व्यक्ति फफककर जीवन में रोया न कभी
उसके जीवन में कुछ अभाव रह जाता है,
दुख प्रकट न हो, भारी अनर्थ होकर रहता
रो पड़ने से, वह सारा दुख बह जाता है।

इतिहास आँसुओं ने रच डाले कई-कई
हो विवश शक्ति उनने अपनी दिखलाई है,
वे रहे महाभारत की संरचना करते
सोने की लंका भी उनने जलवाई है।

मुझमें ज्योति और जीवन है
महान क्रांतिकारी संजीव चंद्र रे   

मुझमें ज्योति और जीवन है
मुझमे यौवन ही यौवन है।
मुझमें ज्योति और जीवन है।

मुझे बुझा कर देखे कोई
बुझने वाला दीप नहीं मैं,
जो तट पर मिल जाया करती
ऐसी सस्ती सीप नहीं मैं।
शब्द-शब्द मेरा मोती है,
गहन अर्थ ही सच्चा धन है।
मुझमें ज्योति और जीवन है।।

रुक जाने को चला नहीं मैं
चलते जाना जीवन-क्रम है,
बुझ जाने को जला नहीं मैं
जलते जाना नित्य-नियम है।
मैं पर्याय उजाले का हूँ,
अँधियारे से चिर-अनबन है।
मुझमें ज्योति और जीवन है।।

हलकी बहुत मानसिकता यह
शिकवे या शिकायतें करना,
हलकी बहुत मानसिकता यह
हलकेपन पर कभी उतरना।
आने नहीं दिया मैंने यह,
महान क्रांतिकारी धर्मपाल
(यशपाल के अनुज)
अपने मन में हलकापन है।
मुझमें ज्योति और जीवन है।।

वर्ष, मास, दिन रहा भुनाता
हर क्षण का उपयोग किया है,
तुम हिसाब कर लो, देखोगे
लिया बहुत कम, अधिक दिया है।
यही गणित मेरे जीवन का,
यही रहा मेरा चिन्तन है।
मुझमें ज्योति और जीवन है।

सरल अभिलाषा 

नहीं महाकवि और न कवि ही, लोगों द्वारा कहलाऊँ
सरल शहीदों का चारण था, कहकर याद किया जाऊँ

लोग वाह वाही बटोरते, जब बटोरते वे पैसा
भूखे पेट लिखा करता वह, दीवाना था वह ऐसा।

लोग कहें बंदूक कलम थी, वह सन्नद्ध सिपाही था
शौर्य-वीरता का गायक वह, वह काँटों का राही था
लिख बलिदान कथाएँ वह, लोगों को जाग्रत करता था
उनकी शिथिल शिराओं में, उफनाता लावा भरता था।

लोग कहें वह दीवाना था, जिसे देश की ही धुन थी
देश उठे ऊँचे से ऊँचा, मन में यह उधेड़-बुन थी
कभी किसी के मन में उसने, कुंठा बीज नहीं बोया
वीरों की यश गाथाओं से, हर कलंक उसने धोया।

मन्दिर रहा समूचा भारत, मानव उसको ईश्वर था
देश-धरा समृद्ध रहे यह, यही प्रार्थना का स्वर था
भारत-माता की अच्छी मूरत ही रही सदा मन में
महाशक्ति हो अपना भारत, यही साध थी जीवन में।

अन्यायों को ललकारा, ललकारा अत्याचारों को
रहा घुड़कता गद्दारों को, चोरों को बटमारों को।
रहा पुजारी माटी का वह, मार्ग न वह यह छोड़ सका,
हिला न पाया, कोई भी आघात न उसको तोड़ सका।

कोई भाव अगर आया तो, यही भाव मन में आया,
पाले रहा दर्द धरती का, गीतों में भी वह गाया-
हे ईश्वर! यह भारत मेरा, दुनिया में आदर पाए,
महान क्रांतिकारी 

डॉ. नारायण राव  सावरकर 


गौरवशाली जो अतीत था, वही लौटकर फिर आए।

भारत-वासी भाई-भाई, रहें प्यार से हिलमिल कर,
कीर्ति कौमुदी फैलाएँ वे, फूलों जैसे खिल-खिल कर।
सबके मन में एक भाव हो, अच्छा अपना भारत हो,
सबकी आँखों में उजले से उजला सपना भारत हो।

खून की ज्वाला

कौन कहता है, हमारी बाहुओं में बल नहीं है
कौन कहता है, हमारे खून में ज्वाला नहीं ह,ै
कौन कहता है, प्रणय के ही पुजारी हम रहे हैं
कौन कहता है, प्रलय हमने कभी पाला नहीं है।
कौन कहता है, अहिंसा भीरुता का आवरण है
कौन कहता है, समर में हम न लड़ना जानते हैं,
कौन कहता, शान्ति का सन्देश जो देते रहे, वे
तोप की, तलवार की भाषा न पढ़ना जानते हैं।

विश्व के इतिहास में अध्याय तुम पढ़ लो हमारा
चमकते स्वर्णाक्षरों में लिखा ‘भारतवर्ष’ होगा,
एक पन्ने पर अहिंसा की लिखी वाणी मिलेगी
दूसरे पर गरजता संघर्ष का उत्कर्ष होगा।

प्रतिध्वनित पदचाप से करते रहे हम विश्व-प्रांगण
स्निग्ध प्रिय सम्बन्ध भी बन्धुत्व के जोड़े गए हैं,
किन्तु जिसने भी उठाई आँख है इस मातृ-भू पर
दाँत भी उस आततायी के यहाँ तोड़े गए हैं।

कौन है वह साहसी, जो कर सके अवरोध गति का
बढ़ गए जो पाँव, मंजिल तक कभी रुकते नहीं हैं,
क्यों न जाने है हमारे खून में कुछ बात ऐसी
शीश कट जाते हमारे, किन्तु वे झुकते नहीं हैं।

शत्रुओं की छातियों में हिन्द के नर-नाहरों के
युद्धरत भाले दुधारे, क्रुद्ध हो भोंके गए हैं,
नारियाँ भी कम नहीं, बलिदान गरिमा में नरों से
महान क्रांतिकारी
डॉ. भगवान दास माहोर 
पुत्र पति भाई, समर की आग में झोंके गए हैं।

है नहीं वीरांगनाओं की कमी इस देश में कुछ
वीरता की ज्वाल-सी, रणभूमि में ये घूमती हैं,
छाँह भी सम्मान की, कोई न छू सकता कभी है
लाल लपटों को विहँस कर ये स्वयं ही चूमती हैं।

बाल-वीरों की कथाएँ, विश्व को बतला रहे हैं
झिलमिलाते नील नभ के वक्ष पर अंकित सितारे,
बाप से बेटा सवाया ही यहाँ होता रहा है
दाँत शेरों के गिना करते यहाँ बालक हमारे।

इसलिए संकल्प हम दोहरा रहे दृढ़ चेतना से
देश का सम्मान हम निज प्राण देकर भी रखेंगे,
सूलियों के फूल भी चुनने पड़े तो हम चुनेंगे
देश के हित मौत के भी फल खुशी से हम चखेंगे।




ग़ज़ल

सरल जी का एक रेखाचित्र  







मौत आई तू सुबकदोश मैं होलूँ, तो चलूँ
राज बाकी हैं बहुत, मैं उन्हें खोलूँ, तो चलूँ।

मत समझ लेना तू, जीने की हवस बाकी है
गुल नए और तसब्बुर के पिरोलूँ तो चलूँ।

खार नफरत के ही मिलते रहे जमाने में
सरल जी की सहधर्मिणी
श्रीमती नर्मदा सरल जी 
बोल कुछ प्यार के प्यारे से बोलूँ, तो चलूँ।

दाग लोगों के दिलों के ही हैं झाँके मैंने
दिल का दामन जो खुद अपना ही मैं धोलूँ, तो चलूँ।

दे नहीं पाया मैं मरहम किसी के जख़्मों को
कम से कम चश्म ही ग़म से जो भिगोलूँ, तो चलूँ।

जूझता ही मैं ज़माने से रहा हूँ हरदम
लोरियाँ गा, मैं तेरी गोद में सोलूँ, तो चलूँ।

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