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शनिवार, 22 सितंबर 2018

गतिविधियाँ

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  07,   अंक  :  11-12,   जुलाई-अगस्त 2018 



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इस अंक में गतिविधियों की क्रमिक सूची

01. इन्दौर में ‘क्षितिज’ का लघुकथा सम्मेलन संपन्न
02. म हादेवी वर्मा के 111वें जन्मदिन पर संगोष्ठी
03. टॉलस्टॉय की धरती पर टैगौर पुरस्कार
04. पंकज उधास को के. के. यादव ने माई स्टैम्प भेंट कर किया सम्मानित 
05. अविराम साहित्यिकी का विमोचन
06. अम्बिका प्रसाद दिव्य पुरस्कारो हेतु पुस्तकें आमंत्रित




इन्दौर में ‘क्षितिज’ का लघुकथा सम्मेलन संपन्न



‘क्षितिज’ संस्था माहेश्वरी भवन, इंदौर में अखिल भारतीय लघुकथा सम्मेलन दो व तीन जून को सम्पन्न हुआ। सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी की अध्यक्षता में पहले दिन मुख्य अतिथि बलराम, विशेष अतिथि बलराम अग्रवाल, बी.एल.आच्छा, सतीशराज पुष्करणा, श्यामसुंदर दीप्ति, सूर्यकांत नागर व सुभाष नीरव थे। प्रथम सत्र में ‘क्षितिज सफर पैंतीस वर्षों का’ का बलराम द्वारा और क्षितिज पत्रिका के ताज़ा
अंक का बलराम अग्रवाल द्वारा लोकार्पण किया गया। इसके साथ बलराम अग्रवाल की पुस्तक ‘परिंदों के दरमिया’, रामकुमार घोटड़ की ‘स्मृति शेष लघुकथाकार’, विजय जोशी के लघुकथा संग्रह ‘ठहराव में सुख कहाँ’, लघुकथा अखबार ‘लघुकथा टाइम्स’ (संपा. कांता रॉय), मार्टिन जॉन के लघुकथा संग्रह ‘सब खैरियत है’ एवं सतीश राठी, संतोष सुपेकर, राजेन्द्र नागर की लघुकथाओं के बंगला अनुवाद
‘क्षिप्रा से गंगा तक’ का भी लोकार्पण किया गया। अनघा जोगलेकर व किशोर बागरे कृत पोस्टरों की प्रदर्शनी, प्रतिभागियों की पुस्तकों की विक्री हेतु एक बुक स्टॉल एवं क्षितिज संस्था पर बने 35 मिनट के वीडियो को भी प्रदर्शित किया गया। मुख्य अतिथि बलराम ने अपने विस्तृत संबोधन में कहा, ‘‘लघुकथा में गद्य व काव्य दोनों का समावेश स्वीकार्य है। लघुकथा लिखने के लिए भी परकाया प्रवेश
आवश्यक है। नई पीढ़ी में दीपक मशाल, संध्या तिवारी, अनघा जोगलेकर, शोभना श्याम में लघुकथा को दूर तक ले जाने की ताकत है।’’ सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी ने कहा कि कोई भी विधा छोटी नहीं होती। इंदौर में क्षितिज के माध्यम से सतीश राठी ने यह बहुत बड़ा काम करके दिखाया है। बलराम अग्रवाल ने ‘लघुकथा कितनी पारंपरिक कितनी आधुनिक’ पर बात करते हुए कहा कि
लघुकथा ने अब मजबूती पा ली है। समाज में जो चलन में है वह ग्राह्य होकर परंपरा बन जाती है। रीति रिवाज संस्कार से आते हैं। लेकिन लघुकथा में कथ्य में नवीनता होना आवश्यक है। बी.एल. आच्छा ने कहा कि आज तक काव्य-शास्त्र कितना बदला है उस पर कोई प्रश्न नहीं उठाता। अगर लघुकथाकार भी शब्द और ध्वनि विज्ञान से जुड़ें तो बुनावट जोरदार होगी। चर्चा में सूर्यकांत नागर, भगीरथ परिहार, चैतन्य त्रिवेदी, पुरुषोत्तम दुबे, अशोक भाटिया, सुभाष
नीरव, श्यामसुंदर दीप्ति, सतीश राज पुष्करणा, अशोक भाटिया, सीमा जैन, योगराज प्रभाकर, संध्या तिवारी, सतीश राठी, कांता राय, अंतरा करवडे, कविता वर्मा आदि ने भी भाग लिया। कार्यक्रम में पथिक नाट्य संस्था द्वारा नंद किशोर बर्वे द्वारा निर्देशित एवं सतीश श्रोत्रि द्वारा संयोजित
17 लघुकथाओं का नाट्य रूपांतरण प्रस्तुत किया गया। प्रो.शैलेंद्र कुमार शर्मा की अध्यक्षता में दूसरे दिन के कार्यक्रम में बलराम मुख्य अतिथि एवं श्रीराम दवे और राकेश शर्मा विशेष अतिथि थे। दूसरे दिन अनघा जोगलेकर के उपन्यास ‘अश्वत्थामा’, पंजाबी लघुकथा पत्रिका प्रतिमान, लघुकथाओं के मराठी अनुवाद की पत्रिका ‘भाषा सखी’, अंतरा करवडे व वसुधा गाडगिल संपादित लघुकथा संकलन ‘कृति आकृति’ व वसुधा गाडगिल के लघुकथा संग्रह ‘साझा मन’ के विमोचन के साथ ‘क्षितिज’ लघुकथा सम्मान प्रदान
किये गए। क्षितिज लघुकथा शिखर सम्मान डॉ. बलराम अग्रवाल, क्षितिज लघुकथा समालोचना सम्मान 2018 श्री बी एल आच्छा, क्षितिज लघुकथा नवलेखन सम्मान श्री कपिल शास्त्री, क्षितिज लघुकथा कला सम्मान श्री संदीप राशिनकर एवं श्री नंदकिशोर बर्वे एवं क्षितिज लघुकथा विशिष्ट सम्मान श्री बलराम को प्रदान किया गया। सर्व श्री योगराज प्रभाकर, सतीशराज पुष्करणा, भगीरथ परिहार, सुभाष नीरव, श्याम सुंदर दीप्ति, अशोक भाटिया, कांता रॉय, अनघा जोगलेकर, किशोर बागरे एवं रवींद्र व्यास को भी सम्मानित किया गया।
[
(सभी छायाचित्र सम्मलेन के प्रमुख आयोजक श्री सतीश राठी की वाल से साभार )/(समा. सौजन्य : कविता वर्मा)]



महादेवी वर्मा के 111वें जन्मदिन पर संगोष्ठी

पुरुष दासता से लड़ते हुए हमें दूसरे छोर पर नहीं पहुँच जाना चाहिए : मृदुला गर्ग 

महादेवी वर्मा हिंदी की ही नहीं, आधुनिक भारत की पहली स्त्री रचनाकार हैं। उनकी रचनाओं और जीवन दोनों में ही उस नई आधुनिक भारतीय स्त्री के अंकुरण को बहुत साफ देखा जा सकता है। लेकिन दुर्भाग्य से आज हम इस आधुनिकता के स्रोतों की तलाश के लिए महादेवी के पास नहीं, उन अपरिचित कोनों-अंतरों में झांकते हैं, जहाँ कहीं भी हमारी जड़ें नहीं है। यह बात प्रतिष्ठित व्यास सम्मान एवं साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित सुप्रसिद्ध साहित्यकार मृदुला गर्ग ने कवयित्री महादेवी वर्मा के 111वें जन्मदिन के अवसर पर कुमाऊँ विवि. की उमागढ़ (रामगढ़) स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ में ‘स्त्री और लेखन’ विषय पर छठा महादेवी वर्मा स्मृति व्याख्यान देते हुए कही। सुश्री गर्ग ने कहा कि महादेवी ने साहित्य में स्त्री मुक्ति की लड़ाई लड़ी पर वह पुरुष विरोध में जाकर खड़ी नहीं हुई। उन्होंने कहा था कि पुरुष दासता से लड़ते हुए हमें दूसरे छोर या ध्रुवांत पर नहीं पहुँच जाना चाहिए। 
      साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित वरिष्ठ साहित्यकार एवं पत्रकार
मंगलेश डबराल ने कहा कि भारत की पहली नारीवादी कवि महादेवी वर्मा ने ऐसे समय में पुरुष सत्ता के षड़यंत्र को लेखनी से उजागर किया, जिस समय महिलाओं को बोलने तक की आजादी नहीं थी। उन्होंने पुरुष सत्तात्मक समाज में महिलाओं की भागीदारी पर लेखनी के जरिए महिलाओं को सचेत करने का प्रयास किया।
       संगोष्ठी की मुख्य वक्ता सुप्रसिद्ध लेखिका सुमन केशरी ने कहा कि सारा लेखन कर्म राजनीतिक उपक्रम होता है। महादेवी ने भी राजनीतिक लेखन किया। उनके साहित्य से यही पीड़ा बार-बार ध्वनित होती है कि महिलाएँ जब तक पति व पिता की तरह संपत्ति का अधिकार प्राप्त नहीं करेंगी, तब तक उनकी स्वतंत्रता की लड़ाई सफल नहीं हो सकती। हमें मुक्ति के लिए हिमालय नहीं जाना बल्कि अपने मानस की बेड़ियों को काटना होगा, जो हमारे पैरों की बेड़ियाँ कब बन जाती हैं, इसका हमें अहसास तक नहीं होता। चर्चित युवा रचनाकार पंखुरी सिन्हा ने कहा कि महादेवी का पूरा काव्य सफर अपनी पहचान बनाने वाली कालजयी स्त्री का स्वर है। महादेवी के जीवन में ही नहीं, उनके सम्पूर्ण कृतित्व में भावी भारत की वह रूपरेखा साफ दिखाई देती हैं जिसके केंद्र में स्त्री है। कुमाऊँ विवि. की हिंदी विभागाध्यक्ष प्रो. नीरजा टण्डन ने कहा कि हिंदी साहित्य में महिला प्रतिरोध की शुरूआत महादेवी वर्मा ने की। भक्तिकाल में जिस तरह सूर, तुलसी व जायसी की तुलना में मीरा को ज्यादा तवज्जो नहीं दी गयी, उसी तरह छायावाद में महादेवी वर्मा के लेखन की घोर उपेक्षा की गयी। अभी तक उनकी रचनाओं का सही मूल्यांकन नहीं हो पाया है। अतः उनकी रचनाओं के पुनर्पाठ की जरूरत है। संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार एवं संस्कृतिकर्मी सतीश जायसवाल ने कहा कि मीरा ने कृष्ण से लौ लगाई तो महादेवी ने कविता से। वे हिंदी ही नहीं वरन आधुनिक भारत की पहली स्त्री रचनाकार थीं जिनके पास परम्परा व प्रगति का द्वंद्व है। उन्होंने स्त्री शिक्षा में लगातार काम किया और स्त्रीवाद के किसी ध्रुवांत पर न तो गई और न ही ऐसा करने की किसी को सलाह दी। 
       महादेवी जी की शिष्या रही सेंट जोसेफ कॉलेज, इलाहाबाद की पूर्व हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. यासमीन सुलताना नकवी ने ‘महादेवी के सान्निध्य में सत्रह वर्ष’ शीर्षक से संस्मरणात्मक व्याख्यान देते हुए उनकी स्मृतियों को ताजा किया। उन्होंने कहा कि उनके साहित्य में प्रेम, वेदना और परोपकार के जो भाव नजर आते हैं, व्यक्तिगत जीवन में भी वह उसकी प्रतिमूर्ति थीं। 
     अपने स्वागत संबोधन में महादेवी वर्मा सृजन पीठ के निदेशक प्रो. देव सिंह पोखरिया ने कहा कि पीठ को साहित्यिक गतिविधियों के प्रमुख केन्द्र के रूप में विकसित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि महादेवी की स्मृति में सामूहिक प्रयासों से सष्जन पीठ राष्ट्रीय स्तर के साहित्यिक संस्थान के तौर पर स्थापित हो सके तो यही महादेवी जी के प्रति वास्तविक श्रद्धांजलि होगी। संगोष्ठी को प्रो. मानवेन्द्र पाठक, डॉ. सिद्धेश्वर सिंह, मुकेश नौटियाल, रिया शर्मा, सुनील
भट्ट, डॉ. शशांक शुक्ला, डॉ. ममता ध्यानी आदि ने संबोधित किया। ‘कविता में स्त्री’ सत्र के अंतर्गत कुँअर रवीन्द्र, गीता गैरोला, राजेश सकलानी, डॉ. नंदकिशोर हटवाल, डॉ. नूतन गैरोला, नीलिमा शर्मा, मृदुला शुक्ला, सुभाष तराण, संतोष कुमार तिवारी, शैलेय, नीरज पंत, नवीन बिष्ट, विनीता जोशी, रमेश चंद्र पंत, लक्ष्मी खन्ना ‘सुमन’, आशा शैली, त्रिभुवनगिरि, श्याम सिंह कुटौला, मोती प्रसाद साहू, डॉ. तेजपाल सिंह, डॉ. चन्द्रा जोशी आदि ने कविता-पाठ किया। ‘हिंदी कविता का युवा स्वर’ सत्र के अंतर्गत युवा रचनाकार पंखुरी सिन्हा, कविता कृष्णपल्लवी, डॉ. अनिल कार्की, डॉ. अर्चिता सिंह, संदीप तिवारी, उमेश पंत, डॉ. ललित चंद्र जोशी, पवनेश ठकुराठी आदि ने कविता-पाठ किया। संचालन पीठ के शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत ने किया। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन और महादेवी वर्मा के चित्र पर माल्यार्पण से हुआ। पीठ निदेशक प्रो. देव सिंह पोखरिया ने अतिथियों का पुष्पगुच्छ, शॉल एवं स्मृति चिन्ह भेंटकर स्वागत किया। एस.एस.जे. परिसर, अल्मोड़ा के विद्यार्थियों ने सरस्वती वंदना, स्वागत गीत और विश्वविद्यालय कुलगीत प्रस्तुत किया।
      इस अवसर पर डॉ. रेनू जोशी, डॉ. दीपा गोबाड़ी, डॉ. विपिन चंद्र शाह, डॉ. कल्पना शाह, डॉ. सुमिता गड़कोटी, डॉ. रूपा आर्या, डॉ. बरखा रौतेला, डॉ. ममता आर्या, डॉ. बसन्ती रौतेला, डॉ. सबीहा नाज़, डॉ. सुनीता भण्डारी, डॉ. किरन दानू, डॉ. गौरव कुमार, प्रवीण कुमार भट्ट, बीना जोशी, राजेश प्रसाद, शिवप्रकाश त्रिपाठी, शालिनी नागर, जावेद अली, रवि यादव, कविता बिष्ट, चन्द्रा देवी, कविता अप्रेती, कंचन बिष्ट, समर बहादुर, नीरज भट्ट, चन्दन पाण्डे, गितेश त्रिपाठी, नीरज सिंह पांगती, डिम्पल जोशी, नेहा तिलारा, कंचन आर्या, पुष्पा दानू, ममता गहतोड़ी, शीला आर्या, सीमा यादव, दीपाली आर्या, भावना अग्रवाल, प्रमोद सिंह रैखोला, बहादुर सिंह कुँवर आदि उपस्थित थे।  (समा. सौ.: मोहन सिंह रावत)




टॉलस्टॉय की धरती पर टैगौर पुरस्कार

शीर्षस्थ कवि रमाकांत शर्मा ‘उद्भ्रांत’ की कई भाषाओं में अनूदित काव्यकृति ‘राधामाधव’ पर प्रथम गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगौर अंतरराष्ट्रीय साहित्य पुरस्कार दिया गया। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन द्वारा ‘गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर अंतर्राष्ट्रीय सम्मान’ प्रतिवर्ष उस वरिष्ठ रचनाकार को दिया जायेगा जिसने साहित्य के विविध अनुशासनों में अप्रतिम और समानांतर रचनात्मक लेखन किया हो जिससे भारतीय जीवन मूल्यों के साथ वैश्विक जीवन की प्रगतिशीलता भी अपनी नयी संभावनाओं के साथ स्थापित हो। प्रो. नित्यानंद तिवारी, डॉ. कर्ण सिंह चौहान, डॉ. खगेन्द्र ठाकुर की चयन-समिति व संयोजक जयप्रकाश मानस की अनुशंसा पर 200 से अधिक प्रविष्टियों में से कृति ‘राधा माधव’ को चुना गया। श्री बी. के. एस. रे की अध्यक्षता में उद्भ्रांत जी को 51,000 रूपयों की प्रतीक राशि, मानपत्र व प्रतीक चिन्ह सहित यह पुरस्कार 2 जून के दिन 15वें अंतर्राष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन (रूस, मास्को) में देश के शीर्षस्थ उपन्यासकार डॉ. शरद पगारे के करकमलों से दिया गया। इस अवसर पर भारत और रूस के अनेक वरिष्ठ कलमकार उपस्थित थे। (समाचार सौ.: सुनील तोमर)




लघुकथा में शीर्षक जिज्ञासा के रूप में हो : बलराम अग्रवाल

‘‘लघुकथा में उसके शीर्षक का बहुत महत्व होता है। शीर्षक एक संकेत है, इसमें जिज्ञासा होनी चाहिए और अंत तक वह खुलनी नहीं चाहिए। शीर्षक रचना की खूँटी होता है।’’ श्रीकृष्ण ‘सरल’ जन्मशती वर्ष आयोजन शृंखला के अन्तर्गत उज्जैन में सरल काव्यांजलि की लघुकथा संगोष्ठी में शीर्षस्थ लघुकथाकार बलराम अग्रवाल ने ‘शीर्षक को लेकर लघुकथाकार की जद्दोजहद’ विषय पर बोलते हुए उक्त उद्गार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि प्रेमचन्द ने अपनी कहानी का शीर्षक ‘पंचों में परमेश्वर’ रखा था, जिसे संपादित कर ‘पंच परमेश्वर’ किया गया। सुप्रसिद्ध लघुकथाकार प्रतापसिंह सोढ़ी की अध्यक्षता में संपन्न संगोष्ठी में संतोष सुपेकर व राजेन्द्र नागर ‘निरंतर’ के बांग्ला में अनूदित लघुकथा संग्रह ‘क्षिप्रा थैके गंगा पर्यन्तो’’का विमोचन भी हुआ। श्रीराम दवे, दिलीप जैन, आशागंगा शिरोढ़कर, संतोष सुपेकर, राजेन्द्र नागर निरंतर, राजेन्द्र देवधरे दर्पण एवं कोमल वाधवानी ‘प्रेरणा’ ने लघुकथा-पाठ किया। अतिथि स्वागत संजय नागर व एम.जी.सुपेकर एवं संचालन राजेन्द्र देवधरे ‘दर्पण’ ने किया। पुष्पा चौरसिया ने सभी का आभार व्यक्त किया। (समा. सौ.: संतोष सुपेकर)




पंकज उधास को के. के. यादव ने माई स्टैम्प भेंट कर किया सम्मानित 

      ‘चिट्ठी आई है’ गीत से प्रसिद्धि पाने वाले मशहूर ग़ज़ल गायक पंकज उधास के जोधपुर आगमन पर डाक विभाग की तरफ से सम्मानित किया गया। राजस्थान पश्चिमी क्षेत्र, जोधपुर के निदेशक डाक सेवाएँ एवं चर्चित साहित्यकार व् ब्लॉगर श्री कृष्ण कुमार यादव ने उन्हें ‘‘माई स्टैम्प’’ भेंटकर सम्मानित किया। 12 डाक टिकटों के इस माई स्टैम्प पर हवा महल के साथ पंकज उधास की तस्वीर लगाई गई है। जिस चिट्ठी पर गाये गीत ने पंकज उधास को एक पहचान दी, उसी चिठ्ठी वाले डाक विभाग द्वारा अपने ऊपर पर्सनलाइज्ड डाक टिकट पाकर पंकज उधास काफी हर्षित हुए और डाक विभाग का आभार व्यक्त किया। 
      जोधपुर के 560वें स्थापना दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में पंकज उधास ने अपनी दिलकश ग़जलों से लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया। 1982 के बाद पहली बार जोधपुर पधारे पंकज उधास की पहली गजल प्रस्तुति के बाद ही लोगों ने चिट्ठी आई है गीत की फरमाइश की। इस पर पंकज उधास ने चिट्ठियों के बदलते चलन पर कहा कि हम सब ई-मेल के जमाने में जी रहे हैं, पर चिट्ठियों का अपना एक अलग अंदाज है, एक अपना रंग है। गौरतलब है कि पंकज उधास को फिल्म नाम में गायकी से प्रसिद्धि मिली, जिसमें उनका एक गीत चिठ्ठी आई है काफी लोकप्रिय हुआ था। उसके बाद से उन्होंने कई फिल्मों के लिए एक पार्श्व गायक के रूप में अपनी आवाज दी। (समाचार प्रस्तुति : सुदर्शन सामरिया)



अविराम साहित्यिकी का विमोचन


       पालमपुर, हि.प्र. में ‘हिन्दी साहित्य निर्झर’ की संगोष्ठी में अविराम साहित्यिकी के श्री नरेश उदास के विशेष संपादन में हिमाचल एवं जम्मू-कश्मीर राज्यों की लघुकथा पर केन्द्रित अंक का विमोचन संपन्न हुआ। संस्थाध्यक्ष नरेश उदास ने दोनों कवयित्रियों की पुस्तकों एवं अविराम के अंक पर विस्तार से
प्रकाश डाला। अविराम के इस अंक में जम्मू-कश्मीर तथा हिमाचल प्रदेश के लघुकथाकारों की लघुकथाओं को विशेष रूप से शामिल किया गया है। यह प्रयास अविराम साहित्यिकी की सुदूर क्षेत्रों के रचनाकारों के लघुकथा में योगदान को रेखांकित करने की विशेष मुहिम का हिस्सा है। अविराम के अंक में शामिल लेखिकाएँ नलिन विभा ‘नाजली’, कृष्णा अवस्थी, कमलेश सूद व सुमन शेखर इस अवसर पर उपस्थित रहीं। 
        कार्यक्रम में कमलेश सूद के क्षणिका संग्रह ‘रिश्तों की डोरी’ व सुमन शेखर के उपन्यास ‘अपरिचित चेहरा’ का भी विमोचन संपन्न हुआ। दोनों ही लेखिकाएँ 
हिमाचल प्रदेश के साहित्यिक क्षेत्र में अपनी विशेष पहचान बना चुकी हैं। 
      डॉ. लेखराज कार्यक्रम में मुख्य अतिथि थे। आयोजन में अनेक स्थानीय कवियों ने काव्यपाठ भी किया। सुमन शेखर ने संस्था की गतिविधियों पर रिपोर्ट प्रस्तुत की। (समा. सौ.: कमलेश सूद)



अम्बिका प्रसाद दिव्य पुरस्कारो हेतु पुस्तकें आमंत्रित 

      साहित्य सदन भोपाल द्वारा विगत बीस वर्षाे से दिये जाने वाले इक्कीसवे अम्बिका प्रसाद दिव्य स्मृति प्रतिष्ठा पुरस्कारो हेतु रचनाकारों से पुस्तकें आमंत्रित की गई हैं। दिव्य पुरस्कारों हेतु लेखको एवं कवियों से- कहानी, उपन्यास , कविता, गजल, नवगीत साहित्य व्यंग्य, समालोचना एवं बाल साहित्य विषयो पर मौलिक कृतियां आमंत्रित की गई हैं। प्रत्येक विधा में इक्कीस सौ रुपये राशि के अम्बिका प्रसाद दिव्य स्मृति पुरस्कार प्रदान किये जायेंगे। गुणवत्ता के क्रम में द्वितीय स्थान पर आने वाली पुस्तकों को दिव्य प्रशस्ति पत्र प्रदान किये जायेंगे। प्रविष्टियाँ सशुल्क भेजनी होंगी। हिन्दी में प्रकाशित पुस्तकों की मुद्रण अवधि 1 जनवरी 2016 से 31 दिसम्बर 2018 के मध्य होना चाहिए। अन्य जानकारी हेतु मोबाइल नंबर 09977782777 तथा ईमेल- रंहकपेीापदरंसा/हउंपसण्बवउ पर सम्पर्क कियाजा सकता है। प्रविष्टियाँ भेजने का पता है- श्रीमती राजो किंजल्क, साहित्य सदन, 145-ए , सांईनाथ नगर, सी सेक्टर, कोलार रोड, भोपाल-462042 (म.प्र.) पुस्तकें भेजने की अंतिम तिथि है- 30 दिसम्बर 2018। (समाचार प्रस्तुति : जगदीश किंजल्क)

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