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गुरुवार, 24 मई 2012

अविराम विस्तारित


अविराम का ब्लॉग :  वर्ष : 1, अंक : 08-09,  अप्रैल-मई 2012 


।।व्यंग्य वाण।।

सामग्री : डॉ. राजेन्द्र मिलन का व्यंग्यालेख इन्टैलकचुअल्स इलैक्शन



डॉ. राजेन्द्र मिलन


इन्टैलकचुअल्स इलैक्शन

   चुनाव कौ मौसम आयो देख हमारे भीतर की चौधराहट ऊ कुलबुलाई। महंगौ सौदा जानके टिकट लेवे की दमखम तौ नाय हती और निर्दलीय खड़े हैबे की हिम्मतऊ जुटा नहीं पाए। बस लोगन में बुद्धिजीवी हैबे की धाक जमावे की सोच कै एक ‘इन्टेलकचुअल्स क्लब’ कौ गठन कर भड़ास निकालबे को प्लान रच डारौ। चार-छह अपने जैसेई बुद्धिजीवीयन कूँ टटौलो। लगौ सबके दिमाग में ऐसौ ही कीड़ा कुलबुला रहौ है। बस बन गई बात। शहर भर के तथाकथित बुद्धिजीवियों को न्यौता भिजवा दयौ। चतुराई जे करी कै अपने पत्तेऊ ओपन नाय करे और बिसात बिछा दई। बुद्धिजीवियों पै समय कौ अभाव हॉवी रहवत ही है पर खावे-पीवे के मामले में काहे कौ समय-बमय? सो भैया अच्छी खासी भीड़ आ जुटी। हमारे गुर्गों ने ‘बुद्धिजीवी सर्किल’ बनवे कौ शिगूफा छेड़ दियौ। मजे की बात जे रही कै सभी जा बीमारी के मरीज निकले!! फिर समय मिलै नाय मिलै, तुरंत दान महाकल्याण कौ फार्मूला आजमाय लियौ गयौ।
    खूब गाढ़ौ विचार मंथन करके हमारे नाम के साथ छै नाम सर्किल पदाधिकारियौं के और आ चिपके। सिकंदर भाई, भीकम राय, बहोरी लाल ‘हीरो’, बरकत साई ‘पापड़ वाले’, छैलो बाबू और शेर सिंह ढोलकिया। हमने गांधीगीरी अपनाई। ‘भाइयो अच्छा हो चुनाव-चकल्लस की चपेट तै बचके सर्वसम्मति ते ही कार्यकारिणी के पदाधिकारी चुन लेयो। आखिर बुद्धिजीवियों की छवि भी तो बचाए रखनी है।’ बात जड़ पकड़ गई। अब सब खुल के बड़ी ते बड़ी कुर्सी पै बैठिवे के लिए अपनी जन्मपत्री बांचवे लगे। ऐसी-ऐसी बुलंदियों की भनक भनभनाबे लगी कि दिमाग चकरघिन्नी खा गयौ। खानदानी पुश्तैनी समाज सेवा की ऐसी कारगुजारियां खुलके आवे लगी कै अस्सी-अस्सी फीट गहरौ गड्ढा खोदवे पैऊ जलस्रोत की नमी तक ढूंढ़े नाय मिलत। जाते फर्जी हलफनामे कौ जज्बा तैयार होतौ हो बस वैसी ही कारिस्तानियों ते मिलती-जुलती जुगाड़बंदी जोर ते चली।
   हमने अपनी टकली खोपड़ी खुजाई। उनके पक्ष में छै पड़ोसियों ते रजाबंदी की बात पूछवै की चाल चल दई। पड़ौसी धर्म तो जगजाहिर हतै ही, बस सभी बगलें झांकबे लगे। सिकंदर भाई कौ चिड़चिड़ौपन और गुस्सैल हेवौ। भीकम राय कौ शैखी मारबो और नकचढ़ौ हेवौै। बहोरी लाल ‘होरी’ बातूनी और नौटंकीबाज हेवौ। पापड़ वाले बरकत साई कौ लालची और मौकौपरस्त हेवौ। छैलो बाबू को जुगाडू व हरफनमौला हेवौ और ढोलकिया कौ कामचोर और दब्बू हेवै कौ महासंग्राम ऐसौ सरूर पै चढ़ौ- बातन ही बातन में गाली-गलौंच, हाथा-पाई और मारपीट भारतीय लोकसभा की बराबरी तौ न कर पाई तोऊ कछू हद तक बुद्धिजरवियों के घुटन्नै उतरवावे तक नौबत जा पहुंची। बुद्धिजीवियों की लफ्फाजी के आगे नक्कारखाने की बोलती शर्मसार है गई!!
    भोज के लिए किराए पर मंगाए गए बर्तन-भांड़े, कुर्सी, शामियाने कौ जो हाल भयौ, हमते मत पूछौ!! शामियाने वाले पहलवान की लाठी धमक ते गले के ऊपर-नीचे कछू चढ़-उतर हूं नही पा रहौ है।
   हाय राम! हे अल्लाह! मेरे वाहे गुरु और गॉड! ऐ तौ नज्जारौ देखवे कूँ आगे नाय मिलै। भले ही बुद्धिजीवी सर्किल नाय बनै। बुद्धिजीवीयन तै जनप्रतिनिधि भले। कम ते कम बे चुनके पहुंचबे पर जुगाड़ करके सरकार तौ बना लेत हैं।
   महाभोज पर जो कर्जा हमने लियौ हतौ वो कैसे चुकैगौ? अंतरआत्माऊ कराहती, पछताती, बलखाती हमें दुत्कारती भई घड़ियां आठोंयाम थू-थू करती रहत हतै। एक शेर मुलाहिजा हो- ‘दिल की बात लबों पर लाकर, अब तक हम दुख सहते हैं!/हमने सुना था इस बस्ती में, दिलवाले भी रहते हैं!!’

  • मिलन मंजरी, आजाद नगर, खंदारी, आगरा-288002 (उ.प्र.)

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