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सोमवार, 30 अप्रैल 2018

सरोकार

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक  :  07-08,  मार्च-अप्रैल 2018 


हमारे सरोकार 



डॉ. उमेश महादोषी




वैचारिक भँवर में राष्ट्रीयता का प्रश्न
पिछले दिनों राष्ट्रीय सन्दर्भ में कई तरह की चिन्ताएँ उभरकर सामने आई हैं। एक काम करने वाली सरकार को जनहित व राष्ट्रहित के काम करने से रोकने के कई कठोर प्रयासों के साथ हमने देखा है कि एक स्तर विशेष (केन्द्रीय) पर सरकार बदल जाने के कारण मात्र से लोग अपने ही राष्ट्र के खिलाफ किस तरह खड़े हो जाते हैं, जबकि नई सरकार के स्तर पर सामाजिक दृष्टि से कोई विशेष नकारात्मक कार्यवाही सामने न आई हो! किसी सरकार विशेष के खिलाफ खड़े होने की बात समझ में आ सकती है लेकिन सरकार के विरोध के नाम पर राष्ट्र के खिलाफ खड़े होने की कार्यवाही कुछ तो संकेत करती है। ऐसी कार्यवाही रातोंरात एवं किसी सरकार या राजनैतिक दल विशेष का विरोध करने मात्र के लिए नहीं हो सकती! लगता है कि पिछली सरकारों के दौरान देश के अन्दर काफी कुछ ऐसा होता रहा है जिसका आंशिक परिणाम आज सामने है। चीजों को नियंत्रित नहीं किया गया तो भविष्य में देश के समक्ष किसी बड़े संकट के खड़े होने की प्रबल संभावना है। राष्ट्रीय प्रतिबद्धता वाले किसी भी व्यक्ति के लिए यह घोर चिन्ता का विषय है। चूंकि विरोध का प्रश्न राष्ट्रीय अस्मिता पर चोट पहुँचाने वाला है, अतः सामाजिक-राष्ट्रीय अवधारणा को समझते हुए उसके सन्दर्भ में इस स्थिति की वास्तविकता पर विचार करना जरूरी है।
     राष्ट्रीय अवधारणा के पीछे दो प्रमुख पहलू हैं- एक तो मानवीय जीवन में वैयक्तिकता के सूक्ष्मांश के साथ सामूहिक जीवन के आकर्षण (सामाजिकता और राष्ट्रीयता) का स्वाभाविक विपुल अंश होता है। दूसरे, सामूहिक (सामाजिक, राष्ट्रीय और उससे भी आगे सम्पूर्ण मनुष्य जाति) सन्दर्भों में मनुष्य का प्रतिक्रियात्मक स्वभाव हर स्तर पर जीवन-व्यवहार की सीमाएँ तय करता है। मनुष्य के जन्म और उससे आगे के जीवन व्यवहार के साथ हम इसे समझने का प्रयास करते हैं।
     मनुष्य (अपितु हर जीव) के जन्म की एक सुनिश्चित प्रक्रिया होती है, उसमें प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष योगदान करने वाले अनेक होते हैं। उस जन्म से प्रभावित होने और उसे प्रभावित करने वालों का भी एक बड़ा समूह होता है, जिसमें जन्म में योगकर्ताओं के साथ-साथ अनेकानेक अन्य भी शामिल होते हैं। प्रभाव की प्रकृति एवं संपर्क जनित दूसरी चीजों में ऊर्जा की मात्रा व सहधर्मिता के स्तरों के अनुरूप समूह भी कई स्तरों पर संगठनात्मक रूपाकार गृहण करता है। इनमें घर-परिवार, समाज, राष्ट्र और अखिल विश्व आदि रूप शामिल होते हैं। इस तरह ‘मनुष्य’ का (और अन्य जीवों का भी) का जन्म व्यक्तिगत घटना नहीं है। इसी तरह मनुष्य की मृत्यु भी व्यक्तिगत घटना नहीं है। सत्य तो यह है कि मानवीय जीवन में सामान्यतः जन्म से मृत्यु तक कुछ भी व्यक्तिगत नहीं है (यहाँ मैं रिक्तता की बात नहीं कर रहा हूँ। जीवन से चीजों का निकल जाना रिक्तता पैदा करता है, यह मूल स्थिति नहीं होती है)। हर एक का जीवन किन्हीं न किन्हीं सूत्रों के माध्यम से दूसरे/दूसरों के जीवन से जुड़ा हुआ है। ऐसी स्थिति में मनुष्य के जीवन को मूलतः समधर्मी सहजीवन के रूप में समझा जाना चाहिए, जिसमें सामाजिकता मौलिक व स्वाभाविक रूप से स्थित होती है। यही सामाजिकता सार्वभौमिक तन्त्र द्वारा नियंत्रित भौगोलिक सीमाओं की परिधि में सहज-स्वाभाविक स्वीकार्यता के अधीन एक राष्ट्र का रूप धारण कर लेती है। राष्ट्र की सीमाओं में हर मनुष्य की समधर्मी सहजीवन के अनिवार्य अनुशासन को ग्रहण करने की क्षमताओं और अभ्यस्तता के अनुकूलन से जुड़ी चीजों से मिलने वाली पहचान उभरती है, जो अन्ततः सांस्कृतिक ताने-बाने के रूप में स्थापित होती है। इसी ताने-बाने में अन्य चीजों के साथ सहिष्णुता से असहिष्णुता की ओर जाने वाली एक मापक जैसी अन्तःधारा बहती है, जिस पर उस राष्ट्र के लोगों के सामान्य चरित्र को मापा जा सकता है। यह माप उस राष्ट्र के निवासियों की अपने लोगों के प्रति लगाव को जितना प्रदर्शित करती है, उतना ही राष्ट्र या दूसरी क्षेत्रीय सीमाओं से बाहर अन्यों के प्रति उनके आचार-व्यवहार को भी दर्शाती है। इस आचार-व्यवहार में सामान्यतः स्वपक्षीय दृढ़ता होती है, जिसकी मात्रा प्रमुखतः तीन बातों पर निर्भर करती है, एक- अपने सांस्कृतिक ताने-बाने और परिस्थितियों के प्रति अभ्यस्तता एवं अनुकूलन के सन्दर्भ में अन्य संस्कृतियों एवं उनके लोगों के प्रति ग्राह्यता कितनी है। दूसरे- इस ग्राह्यता के प्रति अन्य राष्ट्र या क्षेत्रीय सीमाओं के लोगों की क्या प्रतिक्रिया है। और तीसरे- अपने लोगों की सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों, विकास, सुरक्षा आदि से जुड़ी आवश्यकताओं एवं उनके सन्दर्भ में हमारी और दूसरों की सापेक्षिक प्रतिक्रियाओं का क्या स्तर है। इस प्रकार कुछ राष्ट्रों के लोग एक-दूसरे के लोगों के आचरण के प्रति अपेक्षाकृत अधिक सहिष्णु हो सकते हैं, उनमें परस्पर सम्मान की भावना काफी अधिक हो सकती है जबकि कुछ अन्य राष्ट्रों के लोगों के मध्य विपरीत स्थिति हो सकती है। निश्चित रूप से समूहगत सीमाओं के बाहर सहधर्मिता और निर्भरता के बावजूद पाई जाने वाली प्रतिस्पर्धा राष्ट्रीय सीमाओं के बाहर बहुत स्पष्ट, कभी-कभी तो विकराल रूप में देखने को मिलती है। स्पष्ट है, राष्ट्रीय सीमाओं के पक्ष को नकारा नहीं जा सकता। 
      यहाँ एक और तथ्य उभरता है कि मनुष्य और मनुष्य के मध्य सहधर्मिता के बावजूद एक स्पष्ट विभेद होता है, वह उतना ही सत्य है, जितना स्वयं मनुष्य का होना। राष्ट्रीय सीमाओं के भीतर इस विभेद को समाप्त करने के संकल्प लिए जा सकते हैं। लेकिन राष्टीªय सीमाओं के बाहर अखिल विश्व स्तर पर हम इस विभेद को यथासंभव न्यून करने के प्रयास कर सकते हैं, विभेद के रहते हुए भी मनुष्य को मनुष्य के साथ खड़ा कर सकने के प्रयास कर सकते हैं, लेकिन इसे पूरी तरह समाप्त नहीं कर सकते। राष्ट्रीय सीमाओं के इधर-उधर का पारस्परिक व्यवहार सदैव सापेक्षिक और प्रतिक्रियात्मक होता है। कुछ सूक्ष्म स्तरों को अपवाद के तौर पर छोड़ दें, तो यह एक जैविक सिद्धान्त जैसा है। इसलिए हमें स्वीकार करना होगा कि विश्व स्तर पर मनुष्य और मनुष्य के मध्य का यह विभेद मनुष्य के जीवन व्यापार का एक अहं आधार है। इसमें ‘‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’’ की अवधारणा भी स्थित है और सम्पूर्ण विश्व पर आधिपत्य स्थापित करके स्वेच्छाचारी नियंत्रण की महत्वाकांक्षा भी। हर नकारात्मकता का विरोध और सकारात्मकता की प्राप्ति के प्रयास इसके साथ ही करने होंगे। इसलिए राष्ट्रीय सीमाओं की समाप्ति के विचार के विरुद्ध हमें उन्हें संपुष्ट करने के विचार की श्रेष्ठता एवं राष्ट्रों की संप्रभुता के सम्मान को स्थापित-प्रसारित करने के लिए हर संभव प्रयास करना चाहिए। आज राष्ट्रीय सीमाओं के विरुद्ध जो भी गतिविधियाँ चल रही हैं, वे विचारधाराओं के विस्तार की प्रक्रिया का अंग मात्र हैं, जिनका उद्देश्य अन्ततः वृहद सीमाओं वाली महाशक्ति, जिसमें कुछ प्रभावशाली मानव समूह अन्यों को गुलाम बनाकर अपनी कुण्ठाओं को तृप्त करना चाहते हैं, के निर्माण की आकांक्षा से अधिक कुछ नहीं है। यह कैसे भी सकारात्मकताओं की स्थापना-प्रक्रिया नहीं है। कम शक्तिशाली राष्ट्रों के भावुक प्रवृत्ति वाले लोगों के मध्य व्यक्तिगत अपेक्षाओं-महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति की लालसा के वशीभूत कुछ चालाक किस्म के लोग विस्तारवादी परिधि में स्वैच्छिक बन्दी बनकर स्वदेशी भावुक जनों को भी उसी परिधि में खींचने व राष्ट्रीय विचार को विभक्त करने का कार्य करते हैं। ऐसे में प्रतिक्रियास्वरूप राष्ट्रीय विचारधारा के पक्ष में थोड़ी सी भी सुरक्षात्मक सक्रियता आती है तो उसमें कट्टरपन के काल्पनिक प्रतिबिम्ब दिखाने के षणयंत्र किए जाते हैं। इसलिए आवश्यक हो जाता है कि भावावेशी उत्तेजना पर नियंत्रण रखकर ही राष्ट्रीयता को संपोषित किया जाये।
      भारत सदैव अन्य राष्ट्रों और संस्कृतियों के प्रति उदार व सहिष्णु रहा है। इसके लिए आवश्यक ऊर्जा, साहस व प्रेरणा भी हमारे इस देश को अपने आन्तरिक संगठन से मिलती रही है, जो स्वयं अनेकों संस्कृतियों से मिलकर बना है। इसके अन्तस में विद्यमान अनेकानेक संस्कृतियाँ समग्रतः एक महासंस्कृति के रूप में प्रवाहित हो रही हैं, जिसमें तमाम अन्य राष्ट्र और उनकी संस्कृतियाँ अपना चेहरा देख सकती हैं। स्वाभाविक रूप से हमारी महासंस्कृति किसी राष्ट्र या संस्कृति के लिए संकट का कारण नहीं हो सकती, कभी बनी भी नहीं है। हमारे देश ने जो कुछ भी प्राप्त किया है, उसे पूरी ईमानदारी और अपने सामान्य मानवीय उद्यम से प्राप्त किया है। इसने दूसरों से कभी कुछ छीनना नहीं सीखा, ईर्ष्या भाव नहीं रखा। इसके बावजूद हमारी महासंस्कृति, उसकी अवयव संस्कृतियों और उसमें आस्थावान हमारे लोगों को निशाना बनाया जाता रहा है। हमारे देश की भौगोलिक-सांस्कृतिक-सामाजिक स्थिति का आकर्षण कई विचारधाराओं एवं संस्कृतियों के लोगों के अन्दर भारत के प्रति सम्मान का कारण बनने के स्थान पर ईष्या का कारण बनता रहा है। इन विस्तारवादी बाहरी शक्तियों ने हमसे हमारी सकारात्मकताओं को ग्रहण करने के स्थान पर येनकेन उन्हें नष्ट करने के प्रयास कहीं अधिक किए हैं। ऐसे लोग सदैव इस सुन्दर देश पर नियंत्रण और यहाँ के लोगों और संसाधनों को अपने अधीन रखना चाहते रहे हैं। वे अपने उद्देश्यों में सफल भी होते रहे हैं। आज लम्बे संघर्ष के बाद गुलामी और कई बाह्य नियंत्रणों से हमने अपने-आपको आजाद कर लिया है, तो कुछ दूसरी शक्तियाँ दूसरे तरीकों से हम पर नियंत्रण करना चाह रही हैं। आज हमारे भोलेभाले लोगों को विभिन्न दृष्टियों से बरगलाया जाता है, कुछ चालाक लालची लोगों का उपयोग करके हमारी मौलिक राष्ट्रीय विचारधारा और उसकी शक्ति को तोड़ने के प्रयास किए जा रहे हैं। बाहर से आईं कुछ विचारधाराएँ, जिनमें वास्तविक सकारात्मकता नाम मात्र को भी नहीं है, जिनका खूनी चरित्र और हमारे लोगों को गुलाम बनाने की प्रवृत्ति अनेकों बार प्रदर्शित हुई है, स्वयं को हम पर थोपने व हमें लगातार बाँटने के कार्य में लगी हुई हैं। मुझे यह बात लगातार परेशान करती है कि हमारे ही कई प्रतिभावान और ऊर्जावान लोग अपनी सुसंपन्न संस्कृति और विचारधारा के विरुद्ध कुसंस्कृति व खूनी विचारधाराओं की गुलामी को हम पर थोपने की ओर दृढ़तापूर्वक बढ़ रहे हैं। हमें इस स्थिति और इसके पीछे के कारणों पर विचार करना चाहिए।
      हमारा समाज अनेक छोटे-छोटे समूहों में बँटा हुआ है। एक समूह कुछ अनुचित करता है तो दूसरे समूह में उसकी प्रतिक्रिया होती है। बाहरी शक्तियाँ और कुछ अपने ही लोग इसके लिए पूरे समाज एवं राष्ट्र को जिम्मेवार प्रचारित करने लग जाते हैं। इसके बेहद घातक परिणाम सामने आते हैं। इस तरह की परिस्थितियों में, जब राष्ट्र के समक्ष विघटन या पारस्परिक वैमनस्य की प्रक्रिया सौहार्द एवं वैचारिक समरसता की सीमाओं को छिन्न-भिन्न करके राष्ट्र की प्रगति एवं विकास में बाधक बनने लगे तो हमें आत्मावलोचन करना ही चाहिए। जिम्मेवार कारणों की पहचान व विश्लेषण करके उनके प्रभावों को समझना और उनके निदान पर संवेदनशीलता के साथ दृढ़तापूर्वक विचार करना चाहिए। इन कारणों को यदि हम समूहों में बाँटकर देखें तो कम से कम चार प्रकार के कारण हमें प्रमुखतः दृष्टव्य होते हैं- एक, हमारी अपनी आन्तरिक कमजोरियाँ; दो, दूसरों को भावुकता एवं अदूरदर्शितापूर्ण तरीके से दिए गए अवसर; तीन, अपनी संस्कृति एवं विचार के मौलिक सत्य को आंतरिक व बाह्य शक्तियों द्वारा प्रदूषित होने देना, उन्हें रोकने के ठोस प्रयासों व इच्छाशक्ति का अभाव तथा चार, अपनी संस्कृति एवं विचार को युगकालीन आवश्यकताओं के सन्दर्भ में अद्यतन व संपोषित करने के वास्तविक प्रयासों एवं उनके सम्प्रेषण एवं प्रसार संबन्धी सक्रियता की कमी। 
      इन बिन्दुओं पर वास्तविक स्थिति का आकलन बेहद मुश्किल काम है और उससे भी मुश्किल काम है स्थितियों को समझकर उद्देश्य प्राप्ति के रास्तों की पहचान और उन पर चलकर चीजों को ठीक करना। यह कठिनाई प्रमुखतः हर बिन्दु पर मतभिन्नता, उसकी दृढ़ता और उस दृढ़ता से जनित व्यक्तिगत अहं एवं सत्तापिपासा के रास्ते कठोर मनभिन्नता के साथ अपने ही लालची लोगों के माध्यम से बाहरी षणयंत्रों के कारण भी है। मनभिन्नता की गहराती लकीरों ने आज समय को बेहद मुश्किल बना दिया है। चीजों का विरोध आज चेहरों के विरोध में बदल चुका है। लोगों के लिए आज अच्छी-बुरी चीजों का अर्थ नहीं रह गया है। अर्थ है तो पक्ष-विपक्ष में खड़े चेहरों का। बिना वस्तुस्थिति को समझे ही विरोध करना आज रीति बन चुका है। आजकल ऐसे उदाहरण नित्य देखने को मिलते हैं। लेकिन इतिहास इस बात का भी साक्षी है कि समय-समय पर विखण्डन की स्थितियों को सम्हालने के लिए विशेष शक्ति का उदय हुआ और उस शक्ति की प्रेरणाओं व प्रयासों से हमारा समाज पुनः अखण्ड स्थिति में पहुँचा। जब सकारात्मकता की हवा चलती है तो तमाम नकारात्मक प्रवृत्तियाँ और उनके प्रवर्तक अलग-थलग पड़कर निष्प्रभावी हो जाते हैं। आज किसी ऐसी ही शक्ति की आवश्यकता है, जो आम जन को अपनी दूरगामी दृष्टि और अहं व मोह से रहित तार्किक एवं बहुआयामी सतत संघर्ष के माध्यम से यह अहसास करवा सके कि यदि हमने समय रहते अपने मूल चरित्र को उसकी समग्र और अद्यतन प्रासंगिकता के साथ ग्रहण नहीं किया, तो दूसरों पर नियंत्रण की महत्वाकांक्षा में डूबी अहंकारी शक्तियाँ शीघ्र ही हमें अस्तित्वविहीन कर देंगी। 
       यहाँ ‘अहं व मोह से रहित तार्किक एवं बहुआयामी सतत संघर्ष’ के सन्दर्भ को थोड़ा स्पष्ट करना जरूरी है। कुछ सकारात्मक मुद्दों पर आंदोलनो के रूप में अनेकानेक प्रयासों का हश्र हम देख चुके हैं। अधिकांश आंदोलनों को अन्ततः सत्ताप्राति की ओर बढ़ते एवं उस तक पहुँचने के साथ समाप्त हो जाते, यहाँ तक कि अपना चरित्र भी गंवाते देखा है। कुछ आन्दोलन दो-चार कदम चलकर छोटी-छोटी सफलताओं को ही अपना गन्तव्य मानकर ठहर जाते हैं। हमारी आजादी का आन्दोलन, जयप्रकाश आन्दोलन और अभी-अभी कथित भ्रष्टाचार के विरुद्ध अन्ना जी के नेतृत्व में किया गया आन्दोलन, सबके हश्र हमारे सामने हैं। आजादी के आन्दोलन के सन्दर्भ में मुझे लगता है आजादी गन्तव्य का एक (पहला) पड़ाव मात्र होना चाहिए थी। उसके बाद अपने लोगों की मानसिकता एवं चरित्र को गुलामी के वातावरण और परिस्थितियों के प्रभाव से मुक्त कराने तथा अपनी मौलिक राष्ट्रीय अवधारणा को ग्रहण करने के लिए लोगों को तैयार करना प्रमुख काम होना चाहिए था। यह काम उस आन्दोलन ने नहीं किया। अपितु आजादी के संघर्ष से निकले कुछ चालाक लोगों के हाथ में सत्ता सौंपकर उन्हें एक भ्रष्टाचारी एवं अकर्मण्य तन्त्र की स्थापना के लिए खुला छोड़ दिया गया। उस तन्त्र की कमजोरियों व संरक्षण का लाभ उठाकर हमारे देश में राष्ट्रविरोधी तत्व किस तरह शक्ति संचय करते रहे हैं, इसके परिणाम आज दिखाई देने लगे हैं। आजादी का पूरा आन्दोलन विदेशी नियंत्रण से मुक्ति एवं सत्ता प्राप्ति तक सीमित होकर रह गया। आश्चर्यजनक है कि उस आन्दोलन के प्रतिभासंपन्न लोगों ने अंग्रेजी शासन और उससे पूर्व के मुगलिया शासनों के कारण भारतीय जनमानस में आये नकारात्मक प्रभावों व प्रवृत्तियों तथा अवशिष्ट राष्ट्रविरोधी तत्वों  व विचारों का नोटिस तक लेने की आवश्यकता नहीं समझी। जयप्रकाश आन्दोलन भी मुझे नहीं लगता समाज के लिए अपेक्षानुरूप कुछ विशेष कर पाया। उस आदोलन में दिए गए ‘सम्पूर्ण क्रान्ति’ के नारे में जिन सात क्रान्तियों (राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, बौद्धिक, शैक्षणिक व आध्यात्मिक) को शामिल किया गया था, उनके छोटे से अंश मात्र पर भी तो काम नहीं हो सका। पूरा आन्दोलन केवल और केवल केन्द्रीय सत्ता को उखाड़ फेंकने तक सीमित होकर रह गया। वह भी छोटे से समय अन्तराल मात्र के लिए। अन्ना आंदोलन का हश्र तो सबसे अधिक चौंकाने वाला है, जिसका नायक बिना कोई सकारात्मक परिणाम दिए आश्चर्यजनक रूप से फूले हुए गुब्बारे से हवा निकल जाने वाली स्थिति में पहुँच चुका है। इसके पीछे अपनों के द्वारा ही कोई ब्लैकमेलिंग की स्थिति है या आन्दोलन ही पर्दे के पीछे के किसी स्रोत विशेष से प्रायोजित था, सब कुछ अँधेरे में है। लगता है जैसे आन्दोलनकारी मानकर चले थे कि भ्रष्टाचार सिर्फ वही है, जिसे वह अपनी सुविधा के लिए भ्रष्टाचार मानते हैं और वह भी सिर्फ और सिर्फ सरकारों के स्तर पर होता है, जिसे वे एक-दो सप्ताह में लाख-दो लाख की भीड़ एकत्र कर समाप्त कर देंगे। इसे एक राजनैतिक चाल से अलग और क्या माना जा सकता है! संभव है अन्ना जी का उपयोग करने के बाद उनकी सक्रियता का अन्त कैसे और किस रूप में किया जायेगा, यह भी पहले ही सुनिश्चित कर लिया गया हो। यदि आन्दोलनकारियों के पास धैर्य और दूरगामी सोच के साथ वास्तविक सामाजिक उद्देश्य होते तो यह आन्दोलन ऐसी स्थिति में पहुँचने की ओर अग्रसर हो सकता था, जहाँ आठ-दस वर्ष के संघर्ष के माध्यम से कई बड़े सामाजिक उद्देश्य प्राप्त किए जा सकते थे। इस आन्दोलन की परिणति ने भविष्य में किसी भी बड़े आन्दोलन की संभावनाओं को गम्भीर क्षति पहुँचाई है। हर आन्दोलन के अग्रेताओं को सोचना चाहिए कि सत्ता प्राप्ति सामाजिक उद्देश्यों की प्राप्ति का रास्ता नहीं होती, अपितु जनमानस के चरित्र एवं सामाजिक चिन्तन, मान्यताओं व स्वीकार्यताओं में बदलावों के माध्यम से सत्ताओं को अपने चरित्र में बदलाव लाने के लिए प्रभावी रूप से प्रेरित करके ही वास्तविक परिवर्तन लाया जा सकता है। ऐसे परिवर्तन की अपनी सहज स्वीकार्यता भी होगी और उसके दीर्घकालीन प्रभाव भी। निसन्देह इसके लिए बड़े धैर्य की आवश्यकता होगी। ऐसा कोई परिवर्तन जब भी आयेगा लम्बे किन्तु सघन संघर्ष से ही आयेगा, जिसमें उद्देश्य के प्रति समर्पण होगा, जो अहं, मोह और व्यक्तिगत अपेक्षाओं की प्राप्ति के लालच से सर्वदा दूर होगा। जनतंत्र में लोगों के बदले बिना सरकारों का चरित्र नहीं बदल सकता, इसलिए किसी भी परिवर्तनगामी कार्यवाही का प्राथमिक उद्देश्य लोगों को बदलना होना चाहिए। और लोगों को बदलने की प्रक्रिया का कोई शार्टकट नहीं होता। यह प्रक्रिया परिवर्तन के कई पड़ावों से होकर गुजरती है। कोई एक पड़ाव वास्तविक परिवर्तनगामी आन्दोलन का गन्तव्य नहीं हो सकता।
      जहाँ तक हमारी आन्तरिक कमजोरियों का प्रश्न है, हमारी सामाजिक संरचना और समाज के विभिन्न अवयव समूहों से सम्बद्ध लोगों के असमान सामाजिक एवं आर्थिक विकास के साथ सामाजिक भेदभाव की परम्पराओं व नीतियों ने हमारे सामाजिक-राष्ट्रीय ढाँचे को अपूरणीय क्षति पहुँचाई है। यह एक कठोर सत्य है कि हम अपनी सामाजिक संरचना को मानवीय गुणवत्ता की दृष्टि से अपेक्षा एवं आवश्यकतानुरूप उच्चीकृत एवं अद्यतन नहीं कर पाये हैं। इसके पीछे के जो भी कारण हैं, उनके विश्लेषण एवं सुधार के लिए व्यापक रूप से मान्य प्रयासों की आवश्यकता है। निसन्देह हमारे समाज की संरचना बहुधर्मी, बहुजातीय, बहुभाषी, बहुवैचारिक है। तमाम संरचनात्मक अवयवों के अन्दर भी सामाजिक-सांस्कृतिक दृष्टि से अनेक उप अवयव हैं। यद्यपि मानवीय एवं सामाजिक समानता की दृष्टियों से देखा जाये तो विभिन्न अवयवों-उप अवयवों के मध्य हितों का टकराव नहीं होना चाहिए, किन्तु कुछ समूहों के अनावश्यक अहं एवं श्रेष्ठता बोध के चलते गंभीर टकराव होते हैं। दुर्भाग्य से हमारे समाज के मार्गदर्शक माने जाने वाले सामाजिक, बौद्धिक, राजनैतिक नेताओं एवं विशेषतः आध्यात्मिक व्यक्तित्वों ने जिस संवेदनशीलता, सदाशयता, निष्पक्षता से मानवीय मूल्यों को सर्वोपरि रखकर सामाजिक समरसता के रास्ते पर समाज व राष्ट्र को ले जाना चाहिए था, वे अपने कर्तव्य पालन में असफल रहे हैं। ऐसे प्रयासों के लिए यदि कुछ सामाजिक आन्दोलन हुए भी हैं तो वे भी पूर्णतः विफल रहे हैं। अधिकांश आन्दोलन अपने ही कुछ कार्यकर्ताओं व नेताओं की स्वार्थपूर्ति का साधन बनकर रह गये हैं। इस दिशा में समुचित लक्ष्य पाने के लिए विशुद्धतः विशाल सामाजिक संगठन, जो ‘अहं व मोह से रहित तार्किक एवं बहुआयामी सतत संघर्ष’ के लिए प्रतिबद्ध भी हो और सक्षम भी, की आवश्यकता है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ एक ऐसा संगठन है, जो अपनी स्वीकार्यता का दायरा बढ़ा सके और अपनी कुछ गतिविधियों को व्यापक आन्दोलन का आकार दे सके तो वह हमारे राष्ट्र को सामाजिक-सांस्कृतिक विघटन की प्रक्रिया से निकाल कर वैचारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनैतिक अखंडता की ओर ले जाने में सक्षम है। देश में किसी अन्य संगठन के पास इतनी व्यापक प्रतिबद्धता, गहन समर्पण, संघर्ष की क्षमता एवं संरचनात्मक ढांचा है ही नहीं कि उसके बारे में सोचा जा सके। चूँकि अन्य अनेक सामयिक आन्दोलनों का हश्र लोग देख चुके हैं, अतः किसी नई संगठनात्मक संरचना के बारे में सोचना भी संभव नहीं है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने काफी कुछ किया है व वर्तमान में काफी कुछ कर रहा है, लेकिन उसने जो कुछ किया है, उसके सापेक्ष बहुत बड़ा अंश शेष है, जिसको अपेक्षित परिणति तक ले जा पाना स्वीकार्यता के दायरे को बिना बढ़ाये एवं अपने अन्तःस्वरूप को एक आन्दोलनात्मक ऊर्जा से जोड़े बिना संभव नहीं है। सामाजिक विषमता को दूर तथा जरूरतमंदों की प्राथमिक जरूरतों को पूरी किए बिना हम अपने लोगों को राष्ट्रविरोधी विचारधाराओं एवं उन्हें संचालित करने वाले तत्वों के चंगुल से बचा नहीं सकेंगे। हमारी सबसे बड़ी आवश्यकता है कि हम अपने तमाम लोगों को समान मानवीय अधिकारों के दायरे में ला सकें।
     हमारा समाज अपनी सहिष्णुता के लिए विश्व भर में जाना जाता रहा है। हम हर किसी को अपना स्वीकार कर लेते हैं। हम हर किसी को अपने घर में स्थान दे देते हैं, लेकिन दुर्भाग्य से हमारी यह अच्छाई हमारे लिए ही लगातार पीड़ा और विघटन का कारण बनती चली गई है। आने वाले व्यापारी बनकर आते हैं, शासक बन जाते हैं। निवेशक बनकर आते हैं, सरकारों में दखल देने लग जाते हैं। मानवीय उन्नयन के नाम पर विचार लेकर आते हैं, वैचारिक-सांस्कृतिक प्रदूषण फैलाने लग जाते हैं। बुराइयों एवं असमानता से संघर्ष के नाम पर हमारे लोगों को खूनी रास्ते पर चलने के लिए उकसाते हैं। लड़ाते हैं, विभाजित करते हैं। विकास की चाकलेट दिखाकर धर्म परिवर्तन कराने लग जाते हैं। साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों में साझेदारी के नाम पर आकर हमारी सुरक्षा में सेंधमारी करते हैं। हमने कभी नहीं सोचा कि जो देश अपनी संस्कृति एवं सामाजिक-वैचारिक अखंडता के लिए प्रतिबद्ध हैं, वे दूसरों की अच्छी या बुरी कैसी भी वैचारिकता को अपने घर में स्थान नहीं देते। दूसरों को अपने घर में बराबरी का सम्मान देने में भी वे हजार बार सोचते हैं। दूसरों की विचारधारा को किस दृष्टि से देखते हैं, यह बताने की आवश्यकता नहीं है। मैं यह नहीं कहता कि हम भी उन जैसे ही हो जायें, लेकिन किसी को अपनाते समय, किसी को घर में स्थान देते समय, किसी के विचार को सुनते समय तमाम चीजों के बारे में सचेत तो रहें, दूसरों के उद्देश्य पर दृष्टि रखें, दूसरों के किसी भी तरह के संभावित/प्रस्तावित योगदान का अपने राष्ट्रीय सन्दर्भों में परीक्षण करें। हम जानने का प्रयास करें कि कोई हमारे साथ क्यों खड़ा होना चाहता है? हमें विश्लेषण करना चाहिए कि कैसे अनेकों संस्थाएं गैर सरकारी संगठनों के नाम पर देश को तोड़ने के काम में लगी हैं। हमारे ही कई लोगों को ये संस्थाएँ महान बनाकर प्रस्तुत करती हैं, सरकारों में दखल देकर उन्हें उच्च स्तरों पर सम्मानित करवाकर राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय व्यक्तित्व के रूप में स्थापित करती हैं, फिर उनके जरिए हमें अस्थिर और विभाजित करने वाली करने वाली गतिविधियों को चलाती हैं। हमारे देश में अनेक राष्ट्रनिरपेक्ष (जो कई बार तो राष्ट्रीय सन्दर्भों में समस्या बन जाते हैं।) लोगों को महान व्यक्तित्व के रूप में जानने-मानने की व्यापक रीति-सी स्थापित होती चली गई है। क्या यह चिंताजनक नहीं है? यदि हम सहिष्णुता और सहृदयता के नाम पर घुसपैठियों को घर में घुसायेंगे तो हमारा क्या हश्र होगा, हमारे सामाजिक व राजनैतिक, दोनों स्तरों के नेतृत्व को सोचना चाहिए और देश में चल रही अनेक संस्थाओं और रातोंरात महान बन गए व्यक्तियों की सम्पूर्ण पृष्ठभूमि, उनके वैचारिक दृष्टिकोंण और गतिविधियों की व्यापक समीक्षा होनी चाहिए। जहाँ सामाजिक विघटन की प्रेरक एवं राष्ट्रविरोधी संलिप्तताएँ पाई जायें, वहाँ उन्हें बेनकाब किया जाये। लेकिन समान्तर रूप से सबसे अधिक आवश्यकता इस बात की है कि एक सतत आन्दोलनबद्ध कार्यवाही के रूप में ऐसी चीजों के प्रति जनता को भी जागरूक बनाया जाये।
      समूचा विश्व जानता है कि भारतीय संस्कृति मानवीय जीवन के सबसे अधिक सामाजिक प्रतिबद्धता, कलात्मक सौन्दर्य, संवेदनात्मक समझ व लोकहितकारी वैज्ञानिक आधारों पर खड़ी है। मानवता को समृद्ध करने वाले मूल्य हमारी संस्कृति में सबसे अधिक और सबसे सघन व प्रभावशाली रूप में विद्यमान हैं। लेकिन हमारी आन्तरिक कमजोरियों और स्वभावगत विनम्रता के चलते विधर्मी और विदेशी शक्तियों ने हमारे ऊपर शासन करते हुए हमारी संस्कृति को न केवल प्रदूषित किया, अपितु उसे नष्ट करने का हर संभव प्रयास किया है। हमारे विचार और दर्शन को विघटित एवं विवादित बनाने वाली कार्यवाहियाँ हुई हैं। हमारा कमजोर हो चुका सामाजिक एवं राजनैतिक नेतृत्व हमारी सांस्कृतिक, वैचारिक एवं राष्ट्रीय अखंडता को बचाकर रख पाने में अक्षम सिद्ध हुआ। आजादी के बाद, जैसे सशक्त नेतृत्व की आवश्यकता हमारे राष्ट्र को थी, वैसा नेतृत्व कुछ स्वभावगत, कुछ परिस्थतियोंवश और कुछ दबावों के चलते हमें मिल नहीं पाया। यदि कभी अल्पकालिक रूप से समर्थ राजनैतिक नेतृत्व मिला भी तो सांस्कृतिक-वैचारिक नेतृत्व अपेक्षानुरूप नहीं मिल पाया। हमने कभी यह समझने की आवश्यकता नहीं समझी कि सक्षम राजनैतिक नेतृत्व कभी भी सक्षम सामाजिक, सांस्कृतिक-वैचारिक नेतृत्व के सहयोग के बिना राष्ट्र को अपेक्षित दिशा और शक्ति प्रदान नहीं कर सकता। एक लम्बे अन्तराल के बाद आज देश को सक्षम-समर्पित एवं लोकप्रतिबद्ध राजनैतिक नेतृत्व मिला है तो सामाजिक व सांस्कृतिक-वैचारिक क्षेत्रों से उसे अपेक्षित सहयोग मिलना तो दूर, इन क्षेत्रों से लगातार क्रूरतापूर्ण और विचलित करने वाली कार्यवाहियों का सामना करना पड़ रहा है। यह बेहद शर्मनाक है कि सामाजिक व सांस्कृतिक-वैचारिक क्षेत्रों के अनेक प्रमुख माने जाने वाले लोग स्वार्थवश राष्ट्र के विरुद्ध लगातार षणयंत्रों में सहभागी बनते प्रतीत हो रहे हैं। ये लोग काफी कुछ अपने उद्देश्यों में सफल हो पा रहे हैं तो इसके पीछे भी प्रमुख कारण यही है कि आज हमारे लोग, विशेषतः पिछले पचास-साठ वर्षों में पैदा हुई पीढ़ी के लोग हमारी मौलिक सांस्कृतिक-वैचारिक दृष्टि और दर्शन के मर्म को समझते नहीं हैं। इस दिशा में व्यापक जन-जागरण की आवश्यकता है। जाने-अनजाने में राजनैतिक-आर्थिक जागरूकता पर देश में कुछ काम हुआ है, कुछ काम सामाजिक जागरूकता पर भी हुआ है लेकिन सांस्कृतिक-वैचारिक जागरूकता पर अपेक्षित सकारात्मक काम नहीं हुआ है। अपितु इस दिशा में नकारात्मक काम कहीं अधिक हुआ है। किसी भी समाज व राष्ट्र का वास्तविक विकास और समृद्धि सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक एवं वैचारिक विकास व समृद्धि का एक संयुक्त पैकेज होता है। जब तक इन सभी पक्षों पर एक साथ सकारात्मक काम नहीं होगा, तब तक हमारे लोग अपनी अखंडता के महत्व की समझ और उसे बनाए रखने की प्रतिबद्धता के साथ संबद्ध नहीं हो पायेंगे। दुर्भाग्य से पूरे देश में इस दिशा में ठोस प्रयासों एवं इच्छा शक्ति का अभाव ही दिखाई देता है।
     यदि हम अपनी आंतरिक कमजोरियों को दूर करने का संकल्प ले सकें, दूसरों के गुप्त सामाजिक, सांस्कृतिक-वैचारिक व राजनैतिक आक्रमणों से सावधान रह पायें और अपनी मौलिक दृष्टि और दर्शन को प्रदूषण से बचाकर सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक एवं वैचारिक विकास व समृद्धि के संयुक्त पैकेज पर आधारित विकास और समृद्धि के मंत्र को स्वीकार व क्रियान्वित कर सकें, तो हमारी युगकालीन सामाजिक-राष्ट्रीय आवश्यकताओं को अद्यतन व संपोषित करने की दृष्टि एवं सक्रियता हमें स्वयमेव मिल जायेगी। लेकिन इस तथ्य को जन-जागरण के मंच के रूप में व्यापक स्तर पर हम स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं, यह बेहद चिंतनीय स्थिति है। कम से कम राष्ट्रीय विचारधारा के पोषक संगठनों एवं व्यक्तियों के साथ वर्तमान सरकार से भी इस दिशा में ठोस एवं व्यापक पहल करने की अपेक्षा है। 
     हमें यह बात समझ लेनी होगी कि यदि हम अपने राष्ट्र के प्रति समर्पित नहीं होंगे, उसके प्रति निष्ठावान नहीं होंगे तो हम अपने मानवीय अधिकारों और जीवन की निर्वाधता के लिए आवश्यक न्यूनतम आजादी को भी बचाकर नहीं रख पायेंगे।
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