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सोमवार, 30 अप्रैल 2018

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक  :  07-08,  मार्च-अप्रैल 2018



।। कथा कहानी ।। 

लक्ष्मी रानी लाल



कोई और रास्ता न था
     अंधकार भरे आकाश में अपने असंख्य सपनों को उसने टूटते देखा था। समय ने उसे हमेशा छला ही है। समय के विष को घुटकने की अब तक वह अभ्यस्त हो चुकी है, पत्थरों जैसा धीरज रखना उसने अपनी माँ से सीखा है। लेकिन आज पत्थरों जैसी बर्दाश्त की उसकी वह शक्ति कहाँ चली गई! हृदय रो रहा था पर आँखें गीली न थी। सारे आँसू तो उसने निःस्तब्ध रात्रि में ही बहा लिए थे।
      सामानों की खटर-पटर सुबह से सुप्रिया सुन रही थी। पर्दे के पीछे से उसने झाँककर देखा, ट्रक आ चुका था। उसके हृदय के अंदर दर्द की लहरें हिलोरें लेने लगीं। अपने लौह-सदृश इस अटल निर्णय को लेने में उसे वक्त बहुत लगा था। कोमल संवेदनाओं के रेशमी तारों को वह झटके से तोड़ती गई थी। हर एक रेशमी तार को तोड़ते वक्त हाथ ही नहीं, हृदय भी लहूलुहान हो गया क्योंकि ये तार हृदय से जुड़े थे। माया, ममता व स्नेह से सिंचित तार आज बेमानी हो उठे।
      स्मृति की गठरी वह खोलना नहीं चाहती। गठरी समेटने के बाद बेहद अकेलापन महसूस होगा। मन के हाथों विवश होकर वह स्मृतियों के गलियारे में जी-भर भटकती। कुछ अनमोल पलों को सहेजकर हृदय में समेट लेती। मानो वह सुशांत को बाँहों में समेट रही हो। उसके घुँघराले बालों में अपनी स्नेहसिक्त उँगलियाँ उलझा रही हो। उन पलों की स्मृति ही शेष थीं। मातृहीन सुप्रिया ने बाल्यावस्था में ही छोटे भाई सुशांत की उँगलियाँ थाम लीं। कच्ची उम्र जिम्मेदारियों के बोझ तले दबने लगी। गनीमत थी कि पिता ने पुनर्विवाह नहीं किया। अपने दोनों बच्चों को शीतल छाँव में पलते देखकर नियति ने सुप्रिया के साथ क्रूर मजाक किया। जब बेटी के हाथ पीले करने का समय आया पिता ने छोटे भाई की जिम्मेदारियों को उन हाथों में सौंपकर हमेशा के लिए आँखें मूँद लीं। सुप्रिया ने अपने विषय में कुछ भी सोचना उसी समय बंद कर दिया। प्रतियोगिता परीक्षा में सफल होकर वह बैंक में नियुक्त हो गई।
      सुशांत की शिक्षा-दीक्षा पर उसने समस्त ध्यान कंेद्रित कर दिया। उसकी चेष्टा रहती थी कि सुशांत के पालन-पोषण में कोई ऐसी त्रुटि न रह जाए कि उसे माता-पिता का अभाव खले। उसकी निष्ठा देखकर रिश्तेदार दाँतों तले उँगली दबाते। उज्वल गौरवर्ण, रसीली निष्पाप आँखें तथा स्नेह प्रवण चेहरे की मलिका सुप्रिया के ब्याह की बात छेड़ने से करीबी रिश्तेदार कतराते कि कहीं सुशांत की जिम्मेदारियों का बोझ उनके सिर न आ जाए। बढ़ती उम्र के साथ-साथ सुप्रिया ने समय के साथ चलना सीख लिया। सुशांत ने बड़े होने पर सुप्रिया को कई बार कहा- ”दीदी, तुम ब्याह कर लो। मैं तुम्हारे रिश्ते की बात चलाऊँगा।“ सुप्रिया का जवाब होता- ”अरे नहीं, मेरी शादी की बात भूल जा। तेरी नौकरी होते ही घर में बहू लाऊँगी। पहले एक छोटा घर बनवाऊँगी ताकि बहू को कष्ट न हो।“
      बैंक से कर्ज लेकर सुप्रिया ने छोटा सा मकान खरीद लिया। इस बीच एक प्राइवेट कंपनी में सुशांत की नियुक्ति हो गई। सुप्रिया अवसर की प्रतीक्षा में थी। वधू की तलाश में वह लगी ही थी। अच्छी लड़की मिलते ही उसने चट मँगनी पट ब्याह कर दिया। इला को बहू के रूप में पाकर सुप्रिया निहाल हो गई, उसका हरसंभव खयाल किया। इला ने भी मोहक हँसी के जादू से सभी को मोह रखा। 
      वर्ष बीतने से पहले ही इला ने आदर्शवादिता का नकाब चेहरे से उतार फेंका। सुशांत के दफ्तर से आते ही उसके कान भरना शुरू कर दिया। उसके वाक्चातुर्य के कारण सुप्रिया उसे अविश्वास के घेरे में लेने में असमर्थ रही। सुशांत के व्यवहार में आए परिवर्तन से सुप्रिया आश्चर्यचकित थी। छोटी-छोटी बातों पर वह आक्रोश प्रकट करता। पुरानी स्मृतियाँ सुप्रिया को कचोटतीं। भाई-बहन के आपसी रिश्तों में दरार पड़ने की आशंका स्वप्न में भी नहीं थी। उस दिन सुप्रिया को गहरा सदमा पहुँचा, जब उसे बेसहारा छोड़ पति-पत्नी अन्यत्र रहने चले गए। सुशांत के व्यवहार से सुप्रिया दुःखी अवश्य थी पर घर छोड़कर जाना वह सहन करने में असमर्थ थी। अब घर का कोना-कोना उदासी भरा था। अकेली तो वह थी ही, सूनापन उसे डसने लगा। उसे हर वक्त यही चिंता सताती कि सुशांत का ख्याल इला रख पाती है या नहीं। समय पर भोजन बनाकर देती है या भूखा-प्यासा दफ़्तर चला जाता है। बाहर का खाना खाकर स्वास्थ्य ख़राब न कर ले। समय तेज़्ाी से करवट लेने लगा। सर्दी-गर्मी आती जाती रही पर सुशांत ने सुप्रिया की खोज खबर नहीं ली। इस बीच उसे दो बच्चे भी हो चुके थे। उन्हें देखने की उत्कंठा सुप्रिया को बनी रहती पर अपनी इच्छा को वह हृदय के किसी कोने में दबा देती।
      सुप्रिया प्रायः तनावग्रस्त रहती। एक दिन उसे चक्कर आया, वह गिर पड़ी। सहयोगियों ने अस्पताल पहुँचा दिया। सुशांत को सूचना मिली तो भागा-भागा अस्पताल पहुँचा। होश आते ही सुप्रिया ने सुशांत को देखा। सारे गिले-शिकवे भूल वह सुशांत के हाथ पकड़कर निःशब्द उसे देखती रही। लाख छिपाने पर भी पलकें भीग र्गईं। सुशांत भावविभोर हो उठा- ‘‘दीदी, मेरे पास तुम रहो। वहाँ तुम्हें कोई देखने वाला नहीं।’’ क्रोध से इला की कनपटियाँ गर्म हो उठीं। मगर उसने क्रोध दबा लिया। मीठी मुस्कान बिखेरते हुए कहा- ‘हमें खुशी होती अगर आपकी सेवा का सौभाग्य प्राप्त होता, पर बात यह है कि मकान-मालिक मकान खाली करने की नोटिस दे चुका है।
      सुप्रिया की तबीयत संभल चुकी थी। उसने तपाक से कहा- ‘‘तुम मेरे पास आ जाओ। वह तुम्हारा भी घर है।’’ इला को इसी उत्तर की अपेक्षा थी। सुप्रिया को उसी दिन अस्पताल से छुट्टी मिल गई। दूसरे दिन इला अपना लाव-लश्कर समेट सुप्रिया के घर आ गई।
      सुप्रिया के पाँव खुशी से जमीन पर नहीं पड़ते। इला ने फिर अपनी वाक्पटुता से सुप्रिया का हृदय जीत लिया। इला ने उसे कार्यभार से मुक्त कर दिया। अपने दोनों भतीजों सागर व समीर के साथ खेलने में वह व्यस्त हो जाती। बच्चों की किलकारियों से घर गूँज उठा।
      अविवाहित सुप्रिया को जैसे अमूल्य निधि मिल गई। दोनों बच्चे उससे चिपके रहना चाहते। सुप्रिया वात्सल्य सुख में डुबकी लगा कर भाव-विभार हो उठी। सहेलियों के समझाने का उस पर असर नहीं पड़ा। रिश्तेदारों की बातों में वह आ गई- ‘‘देख सुप्रिया, तेरे आगे नाथ न पीछे पगहा है, ऐसे में छत भाई को दे देगी तो उसे अलग से ज़्ामीन ख़रीदकर घर बनाने की ज़्ारूरत नहीं होगी और तुम्हें भी सहारा मिल जाएगा।’’ बुआ ने सुप्रिया को आश्वस्त किया। सुप्रिया ने कहना चाहा- ‘बुआ अपनी पूरी ऊर्जा मैंने सुशांत को अपने पाँव पर खड़े होने में खर्च कर दी। उससे अपेक्षा तो मैंने तब की थी कि मेरा सहारा बनकर रहेगा पर हुआ क्या? इला से ब्याह करते ही मुझे वह बेसहारा छोड़ घर से चला गया।’ पर वह कुछ न कह सकी।
      सुप्रिया ने सहर्ष घर की छत पर सुशांत को घर बनाने की अनुमति दे दी। इला का मकसद अब पूरा हो चुका था। छत पर घर बनते ही सुशांत का परिवार अपने घर में शिफ़्ट कर गया। सुप्रिया फिर अकेली हो गई। सब कुछ इतनी जल्दी बदलने की उसने कल्पना नहीं की थी। सागर व समीर ने सुप्रिया के पास आना छोड़ दिया। इला ने तोतेचश्म की तरह नज़्ारें फेर लीं। सामने होती तो अजनबी-सी रहती। सुशांत कार्य की अधिकता का रोना लेकर पीछा छुड़ा लेता। सुप्रिया पूर्ववत सहन करती रही, पर जब दोनों ने दुश्मनी निभानी शुरू की तो सुप्रिया से सहन नहीं हुआ। इला सदा साजिश के फंदे सुप्रिया पर फेंक उसे लपेट लेती। रिश्ते दम तोड़ने लगे तो सुप्रिया ने कठोर निर्णय ले लिया। 
      सुशांत के दफ़्तर से लौटने की प्रतीक्षा में सुप्रिया बरामदे में टहल रही थी। सुशांत ने जैसे ही सीढ़ियों पर चढ़ने के लिए कदम बढ़ाए कि सुप्रिया ने रोक लिया- ‘‘तुमसे कुछ बातें करनी है, कुछ देर रूक जाओ।’’ दीदी की आँखों की भाषा पढ़कर सुशांत सहमकर रूक गया। चेहरे से पसीना पोंछता बरामदे में पड़ी कुर्सी पर पसर गया। सुप्रिया ने संयत होकर कहा- ‘‘तुमने कभी बताया था कि मकान में तुम्हारा चार लाख खर्च हुआ है तो ये रखो साढ़े चार लाख का चेक।’’ सुशांत घबराकर खड़ा हो गया- ‘‘क्या बात है दीदी?’’
      ‘‘बैठो, अभी बताती हूँ। मैंने इस घर को बिल्डर को दे दिया है। एग्रीमेंट साइन हो चुका है। मैंने अपनी व्यवस्था कर ली है। तुम अपनी व्यवस्था कर लो। हमें घर खाली करना है।’’
      ट्रक की आवाज़्ा सुनकर उसने खिड़की से झाँका। ट्रक धूल उड़ाती जा रही थी, पीछे-पीछे स्कूटर पर सुशांत थका-हारा सपरिवार चला जा रहा था। सुप्रिया बिस्तर पर निढाल गिर पड़ी। आँसू पोंछकर उसने सोचा- क्या करती? इसके सिवा कोई रास्ता भी तो नहीं था।

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