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सोमवार, 30 अप्रैल 2018

किताबें

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक  :  07-08, मार्च-अप्रैल 2018


{लेखकों/प्रकाशकों से अनुरोध है कृपया समीक्षा भेजने के साथ पुस्तक की एक प्रति (एक से अधिक नहीं) हमारे अवलोकनार्थ डा. उमेश महादोषी, 121, इन्द्रापुरम, निकट बी.डी.ए. कालौनी, बदायूं रोड, बरेली, उ.प्र. के पते पर भेजें। समीक्षाएँ ई मेल द्वारा कृतिदेव 010 या यूनिकोड मंगल फॉन्ट में वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल के रूप में ही भेजें।स्कैन करके या पीडीएफ में भेजी रचनाओं का उपयोग सम्भव नहीं होगा } 



राधेश्याम ‘भारतीय’

लघुकथा के घेरों को तोड़ने की कोशिश 
कुछ लघुकथा-समक्षीकों ने इस विधा के लिए अपने ही विधान रच डाले हैं, जैसे काल-सीमा, शब्द-संख्या, पात्र-संख्या आदि। लघुकथा को एक घेरे में कैद करके रख दिया है। यह बात कहीं न कहीं व्यथित करने वाली है कि किसी रचना के लिए इतने बंधन क्यों? इस घेरे पर डॉ.अशोक भाटिया जी ने गहरे से मंथन किया, वरिष्ठ लघुकथाकरों की श्रेष्ठ रचनाओं का अध्ययन-विश्लेषण किया और फिर उन मनगढंत बातों को तर्काें सहित खारिज किया है अपनी आलोचनात्मक पुस्तक ‘समकालीन हिन्दी लघुकथा’ में।
      इस पुस्तक को आठ अध्यायों में बाँटा गया। पहले अध्याय ‘लघु अनन्त लघुकथा अनन्ता’ में लिखा है कि
किसी रचना के लिए सामाजिक यथार्थ, शिल्प और भाषा तीनों मिलकर रचना का स्वरूप तय करते हैं। लघुकथा में पात्रों की संख्या, उसमें काल-दोष की बात बेमानी है क्योंकि उद्देश्य की दृष्टि से रचना की अन्विति ही महत्वपूर्ण है। लघुकथा अपने अपेक्षाकृत छोटे बाह्य आकार के रहते हुए भी बड़े फलक वाले विषय का चुनाव कर सकती, बशर्ते वह उस विषय का बेहतर निर्वाह कर सके। लघुकथा में एक क्षण या एक स्थिति का चित्रण की शर्त भी रचना विरोधी है, जो अनर्गल सीमाएँ बनाती है। विषय का चुनाव व निर्वाह सदा रचनाकार के कौशल पर निर्भर करता है। दूसरा अध्याय ‘हिंदी लघुकथा की विकास यात्रा’ है जिसमें लघुकथा के अस्तित्व का पौराणिक काल से जोड़ते हुए वर्तमान युग तक ले आए हैं। इस विकास यात्रा में यह स्पष्ट किया गया है कि सन् 1944 वह समय है, जब ‘लघुकथा’ शब्द का पत्र-पत्रिका में पहली बार प्रयोग हुआ है।
       तीसरे अध्याय में सामाजिक प्ररिप्रेक्ष्य में हिंदी लघुकथा के दो आयामों दलित चेतना और सांप्रदायिकता पर विस्तार से चर्चा हुई। इसमें धार्मिक संकीर्णता व सदाशयता के बिंदु पढ़ते हुए विस्मय होता है कि धर्म, संप्रदाय, जाति, क्षेत्र के कारण लाखों-करोडों को अपनी जान गंवानी पड़ी है। युगल की लघुकथा ‘नफरत’ ऐसे प्रश्न खड़े करती है जो अंतस को झकझोर कर रख देते हैं- ‘‘मजहब क्या इतनी अहमियत रखता है कि हम उसका बहाना लेकर दरिंदगी पर उतर आए? और इंसानों को काटते चलें? इस अध्याय में धार्मिक समन्वयता व संवेदनात्मक दृष्टि की लघुकथाओं के माध्यम से विवेचन किया गया है। स्पष्टतः जहाँ संवेदना है, वहाँ सहयोग, सौहार्द, सद्भाव सब होगा। साहित्य का भला और क्या उद्देश्य! दलित चेतना के संदर्भ में लेखक दलितों पर अमानवीय व्यवहार के कारणों से पर्दा हटाने का प्रयास करता है। एक लेखक उस दर्द को गहरे से महसूस करता है भले ही वह उस दुख का भोक्ता नहीं है। लेखक का दिल संवेदनशील होता है और इंसाफ के लिए आवाज उठाना उसका कर्तव्य भी बनता है। लेख में सीधे-सीधे ये बातें रखी गई है- भारत का इतिहास एक दृष्टि से कठोर जातिवाद का इतिहास रहा है जिसे ब्राह्मणवाद के द्वारा प्रारम्भ किया गया। हिंदुओं के प्रमुख धर्म-ग्रंथों- ऋग्वेद, गीता, पुराण आदि में जाति को ईश्वर का विधान बताया गया है, जो अवैज्ञानिक बात है। वर्ण व्यवस्था शक्तिशाली लोगों द्वारा अपने निहित स्वार्थाें के लिए बनाई गई है। इस लेख में दलितों के शारीरिक शोषण, मानसिक शोषण और कदम-कदम पर हुए भेदभाव का विश्लेषण बड़ी संवेदना एवं संजीदगी से हुआ है। 
      अध्याय चार में समाज की परिक्रमा में उन लघुकथाओं का विश्लेषण हुआ जो सामाजिक सरोकारों से जुड़ी होने पर वे समाज को एक नई दिशा देने में सफल हो पाई हैं। अध्याय पाँच में ‘हिंदी लघुकथा प्रमुख रचनाकार’ के तहत इक्कीस प्रतिनिधि रचनाकार, उन्नीस प्रमुख रचनाकारों का व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डाला गया है। बाकी सैकड़ों की संख्या में लघुकथाकारों के नाम दिए गए हैं। अध्याय छह ‘समकालीन लघुकथा: शिल्प और भाषा’ में लघुकथाकारों एव शोधार्थियों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें किसी रचना के लिए किस प्रकार की सावधानियाँ बरती जाए उन पर उदाहरण सहित दिया गया है। अध्याय सात ‘हिंदी लघुकथा: कलात्मक उत्कर्ष के आयाम’ में सात लघुकथाकारों की एक-एक श्रेष्ठ रचना पर मंथन हुआ, जिन्होंने अपनी शैली का लोहा मनवाया है। उन्हीं के आधार पर कहा जा सकता है कि किसी रचना को शास्त्रीय मान्यताओं में बाँधने की कोई आवश्यकता नहीं, रचनात्मक साहित्य अपना मार्ग स्वयं बना लेता है। मुझे आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि यह पुस्तक साहित्य जगत में अपना विशेष स्थान बनायेगी।
समकालीन हिन्दी लघुकथा : समालोचना : डॉ.अशोक भाटिया। प्रका.: हरियाणा साहित्य अकादमी, अकादमी भवन, पी-16, सेक्टर-14, पंचकूला, हरि.। मू.: रु. 220। सं.: 2014।
  •  नसीब विहार कालोनी, घरौंडा-132114, करनाल, हरियाणा/मो. 09315382236

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