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रविवार, 5 नवंबर 2017

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  6,   अंक  :  11-12,  जुलाई-अगस्त  2017




।। व्यंग्य वाण ।।


ध्रुव तांती




शौचालय और हमारा चिंतन 


      देश में बने बहुत से ‘आलय’, जैसे- विद्यालय, देवालय, चित्रालय, चिकित्सालय की तरह ‘शौचालय’ का भी अपना महत्व है। विद्यालय, जहाँ शिक्षा दी जाती है, वहाँ ज्ञान का अर्जन किया जाता है। देवालय में जहाँ आत्मा का शुद्धीकरण होता है, वहीं देवता सहायता के लिए तत्पर भी रहते हैं। शौचालय में शारीरिक शुचिता लाने की क्रिया अपनायी जाती है। हम स्वस्थ रहते हैं। विद्यालय या देवालय जाने में चूक हो सकती है, कोई बात नहीं। मगर, शौचालय की उपस्थिति शत-प्रतिशत होनी चाहिए। इसमें गड़बड़ी होने से चिकित्सालय की शरण लेनी पड़ती है। शरीर से मलत्याग करना आवश्यक है और इससे शौच क्रिया द्वारा ही निवृत हुआ जा सकता है।
      इस तरह से हम इस निष्कर्ष पर आ टपकते हैं कि मानव-जीवन में शौचालय का महत्व चिकित्सालय से जरा भी कम नहीं। सम्प्रति अपने देश में शौचालय दो रूपों में पाया जाता है- एक, ओपन मैदान, जहाँ ‘आलय’ नाम की कोई चीज नहीं दिखती और दूसरा तो हम-आप जानते ही हैं- दीवारों से घिरा कमरानुमा। इन शौचालयों का महत्व केवल ‘शौच’ की दृष्टि से ही नहीं होता है अपितु ‘शौच’ के साथ ‘सोचने’ की महान प्रक्रिया भी इन दोनों स्थलों पर अपनायी जाती है।
      कहा जाता है कि जितना ज्ञान हमें विद्यालय में अध्ययन करने से नहीं होता है, उतना ज्ञान का अर्जन शौचालय में बैठकर सोचने से होता है। इसीलिए, बड़े-बड़े राजनेता, उत्तम प्रकृति के लोग शौचालय में अधिक से अधिक समय बिताना चाहते हैं। वे उक्त अवधि में पूरा का पूरा दैनिक पत्र पढ़कर अपने चिंतन को परिपक्व बनाते हैं। इस बीच चाहे जितनी कॉल आ जायें, ‘‘साहब ट्वालेट यानी शौचालय में हैं’’ यह मंत्र वाक्य प्रचारित होते रहता है। भले ही वे शौचालय के इर्द-गिर्द के कमरे में ही क्यों न हों। आपको आश्चर्य होगा कि बड़े-बड़े ओहदे वाले लोग भी यह सूचना पाकर कि साहब शौचालय में करीब दो घंटे से विराजमान हैं, स्वतः इस निष्कर्ष पर पहुँच जाते हैं कि सम्प्रति वे (साहब) देश की किसी गंभीर समस्या का हल ढूँढ़ने में तल्लीन हैं। क्योंकि शौचालय जैसा शांत, निरापद स्थल चिंतन के लिए मिलना मुश्किल है। ऐसी स्थिति में उन्हें डिस्टर्ब करना उचित नहीं। 
      हमने अनुभव किया है कि हिन्दी साहित्य में शौचालय की महत्ता पर कम ही लिखा-पढ़ा गया है। ऐसा नहीं होना चाहिए। जिस देश के नागरिक विद्यालय, चिकित्सालय या फिर देवालय के लिए धरना, प्रदर्शन, अनशन आदि चौक-चौराहे पर करते हैं; वहीं से शौचालय के लिए भी बुलंद आवाज उठनी चाहिए। हमारा तो नारा है- ‘‘अंधकार है वहाँ, जहाँ आदित्य नहीं है;/रोगी है वह देश, जहाँ शौचालय नहीं है।’’
      सरकार को हमारी सलाह पर कुछ पहल करनी चाहिए। वह निर्देश तो जारी कर ही सकती है कि इस देश के सभी नागरिक इस बात की गै्रन्टी दें कि शारीािक शुचिता के लिए हरेक घर में एक अदद शौचालय का प्रबंध कर लिया गया है। चाहे उनके रहने के लिए घर हो या न हो अथवा वे खुले आकाश या गाछ-वृक्ष के नीचे ही क्यों न सोते हों। यह कोई शर्मिन्दगी की बात नहीं है। जरूरत है कि जनता शौचालय में कुछ पल बैठकर देश हित की बात सोचे।
      हम अन्दाजा लगाते हैं कि प्रत्येक परिवार में शौचालय बन जाने से देश में भयंकर से भयंकर बीमारी का नामोनिशान मिट जायेगा। चिकित्सक अपना धंधा छोड़ साहित्य में ‘कविकर्म’ को अपनायेंगे। शरीर स्वस्थ होगा और हम जानते हैं कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ दिमाग का वास होता है। इसलिए, हमें शौचालय में बैठकर सोचने का अभ्यास करना चाहिए। क्या पता, कब और किसे बुद्ध, महावीर या कबीर की तरह कोई चमत्कारिक सोच हाथ लग जाये और मानव कल्याण हो जाये। हम जानते हैं कि हमारी सारी समस्याओं का एक मात्र हल ‘शौचालय’ है। शायद यही कारण है कि जनता द्वारा अपने प्रतिनिधि की खोज करने पर प्रायः पता चलता है कि ‘‘वे अभी शौचालय में हैं।’’

  • ग्राम व पोस्ट : मैना ग्राम वाया महिषी, जिला: सहरसा-852216 (बिहार)/मो. 09431463466

शनिवार, 27 अगस्त 2016

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  5,   अंक  :  05-12,  जनवरी-अगस्त  2016


।। व्यंग्य वाण ।।

सामग्री :  इस अंक में डॉ.सुरेन्द्र वर्मा का व्यंग्यालेख- 'जुगाड़ से जुडि़ये' एवं ओमप्रकाश मंजुल का व्यंग्यालेख- 'काश! मैंने भी सम्मान हथिया ही लिया होता' 



डॉ. सुरेन्द्र वर्मा



जुगाड़ से जुडि़ये
      हम भारतवासी जुगाड़ के लिए मशहूर हैं. हर समय कोई न कोई जुगाड़ बैठाते रहते हैं कि कामयाबी मिल सके। अपने से ज्यादह हमें जुगाड़ में विश्वास है। जब कोई सफल हो जाता है हम यह मान बैठते हैं कि उसने कोई न कोई जुगाड़ ज़रूर लगाया होगा तभी कामयाब हो पाया।
      कहते हैं कि एक विदेशी जब भारत आया तो उसे यहाँ कई कठिनाइयों का सामना करना पडा। जब भी कोई कठिनाई वह यहाँ बतलाता उसे कहा जाता घबराइए नहीं, कोई न कोई जुगाड़ लगाते हैं और सचमुच कुछ ऐसा जुगाड़ बैठाया जाता कि उसकी समस्या हल हो जाती। वह इस जुगाड़ को और इसके बैठाए जाने को स्वयं देख नहीं पाता लेकिन उसकी कठिनाई तो बेशक हल हो ही जाती थी। वापस जाने पर उसने अपने देशवासियों से कहा कि हिन्दुस्तानियों के पास न जाने कौन सा एक ऐसा अदृश्य संयंत्र है कि जिसे जुगाड़ कहते हैं और जिसे लगाकर-बैठाकर वे कैसी भी समस्या हो, हल कर लेते हैं।
      भारत में दो प्रकार के लोग होते हैं, कुछ जुगाड़ी होते हैं, कुछ अनाड़ी होते हैं। जो अपनी कामयाबी के लिए जुगाड़ नहीं बैठा पाता, अनाड़ी है। उसे चाहिए कि जुगाड़ की कला और विज्ञान दोनों को आत्मसात करें।
      लन्दन से खबर आई है कि भारतीय मूल के तीन लेखकों द्वारा लिखी गई एक किताब में इस जुगाड़ की जमकर तारीफ़ की गई है। किताब में पश्चिमी देशों की कंपनियों को सुझाया गया है कि वे गला-काट प्रतिस्पर्धा के इस दौर में कामयाबी पाने के लिए नए तरीके, नए सूत्र ईजाद करें। जुगाड़ की वकालत करने वाली और इसे व्याख्यायित करने वाली किताब का नाम, काफी लंबा-चौड़ा है- ‘जुगाड़ इन्नोवेशन दृ थिंक फ्रूगल, बी फ्लेक्सिबल, जेनरेट ब्रेकथ्रू ग्रोथ’। जुगाड़ के महत्वपूर्ण सूत्र पुस्तक के नाम में ही स्पष्ट कर दिए गए हैं। सोच में मितव्ययता, आचरण में लचीलापन अच्छी उपज के लिए कुछ नया कर गुज़रना ही वस्तुतः जुगाड़ का मर्म है। लेखकों का कहना है कि भारत में यह नुस्खा बरसों पुराना और कम खर्चीला है।
      जुगाड़ संबंधी इस पुस्तक पर उत्साहजनक प्रतिक्रियाएं आईं हैं। कुछ अन्य सूत्र सिद्धांत भी स्पष्ट किए गए हैं। जैसे (1) प्रतिकूल स्थिति में भी मौकों की खोज (2) कम मेहनत में ज्यादह लाभ कमाना (3) सोच समझ कर काम करना (4) मुस्कान बरकरार रखना और (5) अपने दिल की बात सुनना।
      तो मित्रो, जुगाड़ कोई हलके में लेने की चीज़ नहीं है। इसमें कई सूत्र-सिद्धांत काम करते हैं, कई तरकीबों से मिलकर यह बना है। यह एक युक्ति-संघात है, कई उपायों का समुच्चय है। इसे बैठाने में दिल और दिमाग दोनों की ज़रुरत होती है। यह कला भी है और विज्ञान भी है। हर कोई जुगाड़ नहीं बैठा सकता। बड़ी कलाकारी की ज़रुरत है। न जाने कहाँ कहाँ से बिखरी हुई आवश्यक सामग्री इकट्ठा की जाती है ताकि उसका इस्तेमाल अपने हित में किया जा सके। थोड़ा-थोड़ा सामग्री का जोड़ना, इकट्ठा करना और उसे संभालना- इन सभी कामों में वैज्ञानिक वृत्ति निहित है।  
      जुगाड़ अब केवल अटकल नहीं रहा। विद्वानों ने जुगाड़ का क्या रहस्य है, इसे अंततः जुगाड़ ही लिया है। क्या आप इस बात से सहमत नहीं हैं कि इन दिनों बड़ी-बड़ी संस्थाओं में, व्यापार प्रबंधन के भारी भरकम पाठ्य-क्रमों के जरिए, छात्रों को जुगाड़ ही की शिक्षा तो दी जा रही है! सच्ची बात यही है।     

  • 10, एच.आई.जी.; 1-सर्कुलर रोड, इलाहाबाद (उ.प्र.)/ मोबाइल :  09621222778


ओमप्रकाश मंजुल




काश! मैंने भी सम्मान हथिया ही लिया होता

     आयी माया को टटिया लगा कर रोकने वाले हम जैसे बेबकूफ और अभागे ही होते हैं। (यहाँ ‘माया’ का मतलब किसी कुमारी या ब्याही माया नामक लेडी से नहीं, धन की देवी, लक्ष्मी से है।) सम्मान न लेने का मुझे आजीवन मलाल रहेगा। पर, अब पछताना तो ऐसा ही है, जैसे बाप की बात जवानी के जोश में बेटा नहीं मानता और आगे बुढापे में पछताता है। सुदूर पूर्व में एक सरकारी संस्था ने अपुन को भी सादर सानुरोध एक असरकारी सम्मान देने की पेशकश की थी। पर, मैं सम्मान को न लेने के लिए ऐसे मना कर बैठा, जैसे बिहार में महागठबंधन में शामिल न होने के लिए मुलायम सिंह ने मना किया था। मुलायम यादव राजनीतिक नहीं तो पारिवारिक या जाति-बिरादरी के नाते ही लालू यादव की बात मान लिये होते, तो आज महाफायदे में रहते। ऐसे ही मैं भी उस समय सम्मान को उठा लाता, तो आज डबलफायदे में रहता। प्राप्त पुरस्कार राशि से अधिक तो आज उस पर ब्याज मिल गया होता। सम्मान्यों की लाईन में लगने के लिए मैं जिन लोग-लुगाइयों के चरण कमलों पर पड़ा था, आज मैं उनके सर माथे पर होता। सबसे बड़ा बेनीफिट यह होता कि सम्मान लौटाने वाले कलमकारों, कलाकारों, कलावन्तों और विज्ञानविदों के रैला में पड़ कर मुझ जैसे बथुआ को भी गेहूँ के साथ पानी लग गया होता। पर, ‘अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुंग गईं खेत।’ 
      बिहार में भाजपा को हराने वाले शत्रु की तरह मेरी पीठ में छुरा भोंकने वाला शत्रु भी कोई दूसरा न होकर मेरा एक दिखावे का मित्र था। वह स्वार्थी तो था ही ऊपर से दूसरी लाईन का नेता भी था। इसी ने ईर्ष्यावश मुझे उल्टी पट्टी पढ़ाकर सम्मान लेने से रोक दिया था। मुझे क्या पता था वह कि जैसा चेहरे से लगता है वैसा ही दिल से भी फिल्मी विलेन निकलेगा? एक पंच और भी फंस गया था, जिस कारण मैंने सम्मान नहीं लिया। यह आपको ही अपना समझकर बता रहा हूँ। आशा है आप केजरीवाल जैसी गम्भीरता नहीं दिखायेंगे और मैटर को अपने तक ही सीमित रखेंगे। असल में मेरे, ‘दूर-दूर की कौड़ी : चालाकी से जोड़ी’ नामक जिस कविता संग्रह पर पुरस्कार प्रस्तावित हुआ था, उसका कच्चा माल मैंने दूर-दूर छपी पुस्तिकाओं व पत्रिकाओं से उड़ाया था। ठीक इसी वक्त एक चर्चित राज्य के चर्चित कानून मंत्री की फर्जी डिग्रियों का भंडाफोड हो गया। फर्जी संग्रह को लेकर कहीं मेरी भी फजीहत न हो जाये, इस भय से अपुन ने सम्मान को ग्रहण न करना ही मुनासिब समझा। पर, लोगों के बड़े-बड़े फर्जीबाड़ों को याद करता हूँ, तो सम्मान न लेने के लिए मेरे दिल में रह-रहकर हूक उठती है। मिस्त्री से वरिष्ठ अधिशासी अभियन्ता बनने वाले यादव नामधारी महाशय और एक विशेष छवि के खोल से निकलकर एक उत्तम प्रदेश के राज्य लोक सेवा आयोग जैसे महत्वपूर्ण संगठन के सर्वोच्च पद को सुशोभित करने वाले महापुरुष की फर्जीली मनोहर कहानियाँ नेताओं की फोरजरीली सत्यकथाओं के सामने कहीं नहीं ठहरती। न मालूम कितने विधायक और सांसद फर्जी डिग्रियों की बैसाखियों पर सम्मानीय बन चुके हैं। सुनने में आया है कि देश के एक उत्तम प्रदेश में भी फर्जी डिग्री वाले मंत्री बने हैं। जिस देश में शिक्षामंत्री तथा कानूनमंत्री की और कानून परीक्षा डिग्रियां ही संदिग्ध हों, वहाँ सम्मान की रेवड़ियाँ लुटाने और लौटाने की बहस ही अर्थहीन है। ऐसी स्थिति में मुझ जैसे नाचीज ने भी यदि सम्मान हथिया लिया होता, तो न मेरी नैतिक्ता में कोई कमी आ जाती, न देश के सम्मान में ही बट्टा लगता।

  • कामायनी, कायस्थान, पूरनपुर-262122, जिला पीलीभीत, (उत्तर प्रदेश)/मो. 09457822961

बुधवार, 26 अगस्त 2015

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  4,   अंक  :  07-12,  मार्च-अगस्त 2015

।। व्यंग्य वाण ।।

सामग्री : इस अंक में दिलबागसिंह विर्क का व्यंग्यालेख 'अनोखे हैं मि. अनोखे लाल' तथा ओम प्रकाश मंजुल का व्यंग्यालेख 'काग-रेस सुषमा के पीछे क्यों पड़ी है?' ।


दिलबागसिंह विर्क





अनोखे हैं मि. अनोखे लाल 

     अनोखे लाल जी को तो आप जानते ही होंगे? क्या कहा, नहीं जानते? आप भी कमाल करते हैं। आपके शहर में आपके मोहल्ले की आप वाली गली में आपके घर के पास ही उनका घर है। रोज सुब्ह-शाम दुआ-सलाम भी होती है आपकी उनसे, फिर भी आप कहते हैं कि आप उन्हें जानते नहीं।
     अब तो कुछ-कुछ याद आ रहा होगा। हाँ, हाँ, वही अनोखे लाल जी, जो बातें ऐसे करते हैं जैसे राज्य के मुख्यमंत्री उनकी जेब में हों। किसी भी दफ़्तर का कोई भी काम करवाने का आश्वासन आप कभी भी उनसे प्राप्त कर सकते हैं। आपने भी कहे थे उनसे दो-चार काम। एक तो अपना बकाया निकलवाने का काम, जिसका दस प्रतिशत कमीशन देना पड़ा था आपको। दूसरा श्रीमती जी के तबादले का काम, जिसके लिए तीस हजार थमाए थे आपने अनोखे लाल जी को। इसके अतिरिक्त आपने अपने लाल को, जिसे अपना नाम भी नहीं लिखना आता, दसवीं पास करवाने का ठेका दिया था उनको। अब तो ध्यान में आ गया न। कितनी मेहनत करते हैं अनोखे लाल जी। आपके बेटे के लिए परीक्षा केंद्र से लेकर शिक्षा बोर्ड़ तक कितने चक्कर लगाए थे उन्होंने। हर काम के पीछे उनका समर्पण काबिले-तारीफ है।
     अब यह न कहना कि वे तो रोज दो बार चाय आपके घर पीते हैं। आपकी गाड़ी भी यदा-कदा उन्हें उनकी मंज़िल तक पहुँचाती है। देखो भाई, जब वे काम आपका करवाते हैं तो इतना हक़ तो उनका बनता ही है। काम करवाकर तो आप बहुत ख़ुश होते हैं मगर इन छोटी-छोटी बातों को लेकर परेशान हो उठते हैं। अजी बनिए मत, मुझे सब पता है। जब भी अनोखे लाल जी आपके घर आते हैं आपका रंग उतर जाता है। उनकी छोटी-छोटी फ़रमाइशों पर आप मन-ही-मन खूब झल्लाते हैं। उनको इंकार करने की हिम्मत तो आप में होती नहीं, इसलिए उनके जाते ही आप अपना सारा गुस्सा हाथ में पकड़े हुए अख़बार को जमीन पर पटककर निकालते हैं। ये बातें आपको शोभा नहीं देती।
     अब आप याद करें, जब आपको मोहल्ले में, दफ़्तर में कभी कोई परेशानी होती है तो आपको सबसे पहले किसकी याद आती है- अनोखे लाल जी की ही न। सब जानते हैं मुसीबत के वक्त न कोई भाई साथ देता है, न दोस्त। आप अपने अनुभव के कारण ही ऐसे समय अनोखे लाल की शरण लेते हैं। बुद्ध शरणम् गच्छामि कहने वाले को हो सकता है कभी निराशा हाथ लगे, मगर अनोखे लाल शरणम् गच्छामि कहने वाले को न आज तक निराशा हाथ लगी है, न लगेगी। आप भी तब उनसे कैसे बातें करते हैं, जरा सोचिए। चलो मैं ही बताए देता हूँ। तब आपके चेहरे पर बनावटी-सी मुस्कान चिपकी रहती है। आपकी बोली में क्विण्टल भर चीनी घुली रहती है, जिसके कारण उसकी मिठास इतनी अधिक होती है कि सुनने वाले को शूगर होने की पूरी-पूरी संभावना रहती है मगर यह तो अनोखे लाल जी का हौंसला है कि वह इस मिठास को न सिर्फ निगल जाते हैं अपितु इसे पचा भी लेते हैं। दरअसल वे आदी हैं इन बातों के। आपके जैसे अनेक लोग मिलते हैं उन्हें। संकट के समय आप उनकी सेवा करने को इतने आतुर होते हैं कि अगर वे एक इशारा कर दें तो आप सूर्य देवता को हिंद महासागर में डुबो दें, लेकिन काम निकलते ही आपके तेवर बदल जाते हैं।
     आपको सोचना चाहिए कि हर चीज़ की कीमत चुकानी पड़ती है। अगर आप अनोखे लाल जी से काम करवाते हैं तो आपको भी उनके काम आना चाहिए। आपको उनकी छोटी-छोटी जरूरतों का ख्याल रखना चाहिए। आपको भी अनोखे लाल जैसा बनना चाहिए जो हर समय श् न सावन हरे न भादों सूखे श् की तर्ज पर सदा एक-सा व्यवहार करते हैं और सबसे मुस्कराकर मिलते हैं। उनकी मुस्कराहट असली होती है, आपकी मुस्कारहट जैसी बनावटी नहीं। ऐसा नहीं कि वे आपकी नीयत से परिचित नहीं, बल्कि उन्हें पूरी ख़बर होती है कि आप मुसीबत में फँसे होने पर ही उनको याद करते हैं वरना तो एक कप चाय पिलाते आपकी नानी मरती है। ये तो महानता है अनोखे लाल जी की कि वे इस बात को दिल पर नहीं लेते और वक़्त-बेवक़्त अपनी छोटी-छोटी फ़रमाइशों के साथ अपनी याद दिलाने के मक़सद से आपके दरवाजे पर दस्तक देते रहते हैं।
     अब आप सोच रहे होंगे कि मुझे इन सब बातों की इतनी सटीक जानकारी कैसे है। आप शायद घबरा भी गए होंगे कि कहीं मैंने आपके पीछे कोई जासूस तो नहीं छोड़ा हुआ। घबराइए मत, ऐसा कुछ नहीं है। वास्तविकता तो यह है कि जैसे आप हैं, वैसा ही मैं हूँ। बिल्कुल आपके जैसा ही व्यवहार मेरा है। रही बात अनोखे लाल जी की तो एक अनोखे लाल मेरे घर के पास भी रहते हैं। यदि इससे भी ज्यादा जानने की इच्छा है तो सच्चाई यह है कि हर शहर के हर मोहल्ले की हर गली में कम-से-कम एक अनोखे लाल अवश्य होता है। इन अनोखे लालों की बदौलत ही आम जनता के काम हो रहे हैं वरना भारत के नेताओं और अधिकारियों का कद इतना ऊँचा है कि उनसे मिलना, उनसे अपनी समस्या कहना आम आदमी के बूते की बात नहीं। यह तो दलालों, क्षमा करना मैं गलत और असभ्य शब्द का प्रयोग कर गया, दलाल या मध्यस्थ नहीं,बल्कि सभ्य भाषा में कहें तो समाज सेवकों की मेहरबानी से आम जनता की सुनवाई होती है। अगर इस देश में समाज सेवक यानि अनोखे लाल न हों तो देश में पूरी तरह अव्यवस्था फैल जाए।
     आप अपने मोहल्ले के अनोखे लाल के क्रिया-कलापों पर कुछ दिन नजर रखें। आप इनकी दिनचर्या देखकर हैरान रह जाएँगे। भारत के अधिकाँश लोग आलसी हैं जो अपने हर काम के लिए किसी-न-किसी का सहारा ताकते रहते हैं, मगर अनोखे लाल आलसी नहीं होगा। हो ही नहीं सकता, पूरे मोहल्ले की जिम्मेदारी जो रहती है उसके कंधों पर। इस जिम्मेदारी को निभाने के लिए आलस्य तो छोड़ना ही पड़ता है और अनोखे लालों ने अपना आलस्य हम लोगों को दे रखा है। वे खुद मेहनती आदमी हैं । दिन भर इधर से उधर घूमना, इस दफ़्तर से उस दफ़्तर के चक्कर लगाना उनका रोजमर्रा का काम है। सचमुच अनोखे होते हैं मि. अनोखे लाल।

  • ग्राम व पोस्ट- मसीतां, डबवाली, सिरसा-125104 (हरियाणा) / मोबाइल : 09541521947




ओम प्रकाश मंजुल





काग-रेस सुषमा के पीछे क्यों पड़ी है? 
      जब से सुषमा स्वराज मोदी सरकार में मंत्री बनी है, कांग्रेस तभी से उनके पीछे पड़ी हुई है। पिछले दिनों विदेशों में फंसी भारतीय नर्सो को सुषमा जी ने अति त्वरा और तत्परता से निकाल कर भारत पहुँचाया था। कांग्रेस ने इसकी प्रशंसा तो नहीं की, उल्टे सुषमा जी की कार्यशैली पर सवाल उठाती रही। अब ललित मोदी केस से तो काग-रेस में स्वराज का विरोध की कौआ-रे रे दौड़ छिड़ी हुई है, मानो कागरेसियों में इस बात की होड़ हो कि स्वराज का विरोध अधिक देर तक बुलंद आवाज में कौन करता रह सकता है ?
      कांग्रेस अक्सर महिला आरक्षण का राग अलापा करती है और इसकी अध्यक्ष भी एक महिला ही है। उसी कांग्रेस द्वारा एक सबल महिला को अबला बनाने की मुहिम समझ में नहीं आती। कांग्रेस अपने निरपेक्षेतावादी मुखौटे के प्रदर्शन का मौका भी कभी नही गंवाती। सुषमा के मामले से लगता है कि कांग्रेस धर्म निरपेक्ष भले ही हों, पर लिंग निरपेक्ष के मामले में उसमें भी सपा वाला लफड़ा है। (मुलायम सुषमा जैसी महिलाओं के कायल भी रहे है और उनने ही महिला आरक्षण का सर्वाधिक विरोध भी किया है।) इन निरपेक्ष लोगो से पूछा जाये कि भई! लिंग ने क्या बिगाड़ा है, जो इसके साथ पक्षपात किया जाता है। लिंग व्यक्ति से है या व्यक्ति लिंग से है? सुषमा की जगह यदि कोई पुरूष होता, तब भी कांग्रेस क्या इतना विरोध करती? महिलावादी कांग्रेस की हरकतों से लगता है, कि उस की हिट लिस्ट में दूसरे नंम्बर पर मानव संसाधन मंत्री स्मृति ईरानी हैं। 
      दरेसल, व्यक्ति में चंदन की तरह जो विशेष गुण होता है, उसी के कारण ईर्ष्यालु, लोग उसे नीचा दिखाने के लिए सोचते रहते है। चंदन पर किसी शा’इर ने कितना अच्छा कहा है, ’दर्दे सर के वास्ते संदल लगाना है मुफीद। इसका घिसना और रगड़ना दर्दे सर से कम नहीं।’ मुझे नहीं लगता कि आज सुषमा की जगह कोई कुषमा होती, तो उसका भी इतना विरोध किया जाता। 
      सुषमा जी को पहले ही देश निकाला दिया जा चुका है। अब नादान लोग उनसे स्तीफा मांग रहे है। अब उनके पास देने को रह ही क्या गया है? हनुमान जी से आप बेटा मांग रहे हैं। वे ऐसे ही होते तो उनका अपना कोई बेटा न होता। (कभी-कभी लोग मांगने में भी गलती कर देते हैं। देवी-देवताओं से बेटा ही मांगते है, ‘अच्छा बेटा’ नहीं मांगते। नतीजा सामने है, देवी-देवता याचक को बेटा तो देते है, पर अच्छा नहीं देते। स्टाक में जैसे होते है, उसी में से एक उठाकर दे देते हैं। जैसे देते है सामने है।)
      सुषमा जी के विदेश मंत्री बनने से विदेषों में इण्डिया की नाक भी सुषमा जी की नाक की तरह  ऊँची हुई है। दुनिया के सामने भारत की नारी-कटिबद्धता प्रकट हुई है। सुषमा जी के हर क्रिया-कलाप में निरालापन होता है। वे यदि विदेशी समकक्षों या ऊपर वालों से हाथ मिलाती है, तो उनके हाथ मिलाने का अंदाज भी इतना निराला व सुखद होता है कि लोगबाग मिले हुए हाथों को देखते रह जाते है। ऐसी विदेश मंत्री पर फक्र होना चाहिए, न कि उसे हटाने की फिक्र। सोनिया जी की उनके प्रति सहानुभूति और भी अधिक होनी चाहिए, क्योंकि वे महिला भी हैं, विदेशी भी हैं और सुषमा जी की तरह ही सुंदर भी हैं। इससे बड़ा संयोग क्या होगा कि ’सुषमा’ और ’सोनिया (सोणी) दोनो शब्द भी सुन्दरता के पर्यायवाची हैं। कभी मुझे सुषमा जी की याद आती है और कभी सोनिया जी की। कभी मुझे तुलसी का कथन, ’मोह न नारि नारि के रूपा’ याद आता है, तो कभी सीजर का कथन, ’‘ब्रूटस! दाउ टू ...’’  (सीजर यह संवाद अपने मित्र, ब्रूटस से तब कहता है, जब वह भी सीजर के शत्रुओं के साथ मिलकर सीजर पर चाकू से बार करता है।)

  • कामायनी, कायस्थान, पूरनपुर-262122, जिला : पीलीभीत (उत्तर प्रदेश) / मोबाइल : 09457822961

शुक्रवार, 29 अगस्त 2014

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन :  वर्ष  : 3,   अंक  : 11-12,  जुलाई-अगस्त  2014


।। व्यंग्य वाण ।।

सामग्री :  श्री दिनेश रस्तोगी की दो व्यंग्य गजलें।


दिनेश रस्तोगी




दो व्यंग्य गज़लें

01.                   
मंत्री जी और साला  है।
भूत के हाथ में भाला है।
काली मांद का कारिन्दा,
उसका दिल भी काला है।
राजघाट के एक तरफ,
राजनीति का नाला है।
लोकतंत्र है नाम मगर,
सब गड़बड़ घोटाला है।
शोषण की शिकार है जो,
उसके मुंह पर ताला है।
इस करबट या उस करबट,
रेखा चित्र : डॉ. सुरेन्द्र वर्मा 

ऊंट बैठने .....वाला है।
जिससे हम समझे महफूज़,
पड़ा उसी से ....पाला है।

02.
बुद्धिमानों! आपदा का दौर है।
मूर्ख होने का मज़ा कुछ और है।
हुये होंगे तब के सब नेता महान,
आजकल तो गुंडई सिरमौर है।
खा के क्या अपना बनाओगे उसे,
जिस्म से जो पास, दिल इंदौर है।
उम्र दफना कर कमाते जितना हो,
एक मंत्री के वो मुंह का कौर है।
इस प्रदूषण ने कर दिया सारा उलट,
अब न वो बारिश,न अब वो बौर है।
क्या निकालें बाल की हम खाल अब,
जब कि सिर में अब न उनका ठौर है।

  • निधि निलयम, 8-बी, अभिरूप; साउथ सिटी, शाहजहांपुर (उ.प्र.)242226 / मोबाइल : 09450414473



रविवार, 6 जुलाई 2014

अविराम विस्तारित



अविराम  ब्लॉग संकलन :  वर्ष  : 3,   अंक  : 09-10,  मई-जून 2014


।। व्यंग्य वाण ।।

सामग्री : इस अंक में आशीष दाशोत्तर की व्यंग्य रचना ‘आप‘का क्या होगा जनाबेआली?‘

आशीष दशोत्तर

                                                     


आप‘का क्या होगा जनाबेआली?   

     ‘अपनी तो जैसे-तेसे,थोड़ी ऐसे या वैसे कट ही गई,पर ‘आप‘का क्या होगा जनाबेआली?‘ हमारी प्रिय पार्टियों के नेता आजकल इसी गीत को गा रहे हैं। और ‘आप‘को चिढ़ा रहे हैं। हमने तो ‘आप‘को पहले ही कहा था कि कुर्सी के चक्कर में मत पड़िए। यह कुर्सी अच्छे-अच्छों का तेल निकाल देती है। आदमी आता ज़मीन पर है मगर उसे छत पर ही चढ़ना पड़ता है। ‘आप‘ने भी कभी सोचा न होगा कि खुदा ऐसे भी दिन दिखाएगा। वो एक दिन वाले सीएम की पिक्चर देखकर आपके भीतर का नायक जाग गया और ‘आप‘ यह ग़लती कर बैठे। अब इसमें ‘आप‘की भी कुछ गलती नहीं है। कुर्सी का मोह होता ही ऐसा है। बार-बार बेइज्जत हो कर भी उसी को पाने की चाह होती है। 
          वाह क्या बात है इस कुर्सी में। इतना प्रेम हो भी क्यूं नहीं। आखिर कुर्सी पाने पर ही तो इज्जत बढ़ती है। और फिर आजकल तो सभी कुछ कुर्सी  होने से ही प्रभावी होने लगा है। शादी ब्याह में कुर्सी ढूंढते कई लोग मिल जाएंगे। कईयों की तो नज़र ही कुर्सी पर रहती है । एक उठा नहीं कि दूसरे ने खींची। महिलाएं तो अक्सर कई कुर्सियां रोककर बैठतीं है। यानी कुर्सी की लीला न्यारी है। हर कोई कुर्सी को पाने के लिए किसी न किसी का समर्थन पाने में लगा हुआ है। एक बार कुर्सी मिल जाए फिर देखते हैं कौन क्या करता है। हमारे एक साथी को एक बार कुर्सी क्या मिल गई ,उनके पैर ज़मीन पर नहीं पड़ रहे थे। हमने कहा कुर्सी मिलने में क्या है, कोई चिराग मिल गया है क्या? वे कहने लगे, इससे तो मेरी मार्केट वेल्यू और बढ़ गई है। मेरे प्रशंसको की मेरे प्रति सहानुभूति बढ़ी है। हमने कहा कि अब आपको समाज को राह दिखाना पड़ेगा। आपको देखकर लोग अपनी दिशा तय करेंगे। आखिर ‘आप‘ कुर्सी वाले हो गए हैं। कोशिश कीजिएगा कि आपको कहीं छत पर न चढ़ना पड़े। आपके इस तरह के उत्थान से समाज पर गलत असर पड़ेगा। इस पर वे नाराज हो गए। कहने लगे, राह दिखंने का ठेका हमने ही ले रखा है क्या? राह दिखानी ही है तो तो वे दिखाए जो अब तक कुर्सी पर चिपके थे।या फिर वे दिखाए जिनके हाथों से मुंह तक आया निवाला हमने छीन लिया है। 
     हमने कहा आपकी बात सही है पर ‘आप‘के पास कुर्सी है । इस कुर्सी की खातिर ‘आप‘को कुछ तो करना ही होगा। और वैसे भी समाज को राह दिखाने के लिए किसी के पास समय कहां है? मुंह की खा चुके फिर से जनता की सेवा करने के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं। जो लालकिले पर झण्डा फहराने के लिए बेताब हैं वे पहले खुद साधन सम्पन्न बनने में जुटे हैं। घर-घर घूमकर ये जनता को सुख-सुविधा उपलब्ध कराने के प्रति ये सेवक दृढ़ संकल्पित नज़र आ रहे हैं। जनता को यकीन दिलाया जा रहा है कि उसकी किस्मत बदलने वाली है। और जनता भी जनसेवकों की इस बात पर विश्वास करते हुए अपनी किस्मत बदलने का इंतज़ार कर रही है। रही बात तीसरे मोर्चे नामक संस्था की तो ऐसे लोग अभी सोच रहे हैं कि कौन साथ में आ सकता है और कौन नहीं। वैसे भी इस तीसरे मोर्चे की जगह तो ‘आप‘ ने कब्जा कर ही लिया है। तीसरा मोर्चा बनाकर समाज की नींव मज़बूत करने से पहले वे अपनी नींव मज़बूत कर रहे हैं। उनका मानना है कि वे एक बार मज़बूत बन जाएं फिर मुल्क को तो चुटकियों में मजबूत बना देंगे।
     यानी हर कोई अपने-अपने मिशन में पूरी निष्ठा से जुटा हुआ है। इसीलिए ‘आप‘से ही यह अपेक्षा की जा रही है कि समाज को सही राह दिखाएं। वे कहने लगे, हम भी अपनी पूरी कोशिश करेंगे। कुर्सी की खातिर जितनी भी मशक्कत करना पड़े करेंगे। ‘आप‘ तो हमारे पक्ष में हवा बनाए रखिएगा। कहीं कोई हमारी कुर्सी खींचने की कोशिश करे तो ‘आप‘ उसकी कुर्सी खींच दें। हम वादा करते हैं कि इससे हमारे दिल में ‘आप‘के लिए कायम कुर्सी का अस्तित्व बना रहेगा।

  • 39, नागर वास, रतलाम (म.प्र.) 457001 // / मोबा. : 09827084966

रविवार, 30 मार्च 2014

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन :  वर्ष  : 3,   अंक  : 07-08, मार्च-अप्रैल 2014



।। व्यंग्य वाण ।।

सामग्री :  इस अंक में ललित नारायण उपाध्याय की व्यंग्य रचना। 


ललित नारायण उपाध्याय



सुखदायी वातावरण

    कहते हैं जब पृथ्वी पर बहुत गन्दगी बढ़ गयी तो उसे हटाने के लिए प्रभु ने ‘सूकर’ या सुअर का अवतार लिया, इससे अधिक मेरा धार्मिक ज्ञान नहीं है। परन्तु इस बार प्रभु को न जाने क्या सूझी कि उन्होंने सूकर अवतार लेकर सीधे कीचड़ और दलदल में प्रवेश कर लिया। वहाँ ठंडी-ठंडी बयार बह रही थी। वातावरण एकदम ठंडा व सुखदायी था। प्रभु कई दिनों तक उसमें पड़े रहे।
   एक दिन लक्ष्मी माता पधारी। बोली- ‘बाहर निकलते हो कि अस्त्र चलाऊँ?’ प्रभु पर कोई असर नहीं हुआ, उल्टे और कीचड़ में छुप गये। लाचार माताश्री लौट पड़ी। उधर देवताओं में हलचल मच गयी, तब देवीजी ने चण्डी माता का स्वरूप लिया और बोली- ‘बेटा अपन जैसों को यह शोभा नहीं देता। बाहर निकल आओ।
   प्रभु बोले- ‘आपकी आज्ञा को टाल नहीं सकता, परन्तु एक शर्त है। इस अवतार केा स्थायी बनाने के लिए
रेखा चित्र : महावीर रंवाल्टा 
मेरी शक्ल तय कर दो। लोगों ने देखा- वहां एक आदमी प्रकट हुआ। उसके सिर पर टोपी थी। कुरता-पायजामा-जाकेट वह पहना हुआ था, उसकी मुद्रा अत्यंत हुसमुख थी और वह हाथ जोड़कर खड़ा था। वह कर्म और शरीर से ‘काला कलूटा’, परन्तु उसका रूप सुन्दर था। उसके एक हाथ में सूटकेस, दूसरे में वादों की लिस्ट और जेब में शराब की बॉटल थी......।

    इसी क्षण प्रभु गायब हो गये। वह मुस्कराता रहा। देखते-देखते लोगों ने इसे पद दिया, पद मिलते ही उसने पैसा कमा लिया और कीचड़ में समा गया। कहते हैं- तब से नेता बनते ही कीचड़ में समा जाने की परिपाटी चली आ रही है। 

  • ईश कृपा सदन, 96, आनन्द नगर, खंडवा-450001 (म.प्र.)

रविवार, 2 फ़रवरी 2014

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन :  वर्ष  : 3,   अंक  : 05-06, जनवरी-फरवरी 2014


।। व्यंग्य वाण ।।

सामग्री :  इस अंक में गोविन्द चावला 'सरल' की व्यंग्य कविता। 



गोविन्द चावला ‘सरल’



नेताजी बोले पी.ए. से...


नेताजी जब बोल चुके, युवकों ने शोर मचाया।
उल्लू रहे बनाते हमको, आज समझ में आया।
अब यह सुन लो, या तो हमको नौकरी दिलवाओगे।
वरना याद रहे, लौटकर यहाँ नहीं आओगे।

नेताजी बोले पी.ए. से, ये नाम नोट तुम कर लो।
अनिल सिंह के रेखाचित्र का अंश 

अपनी चतुरंगी सेना में, इनको भर्ती कर लो।
लूटपाट बन्दूक चलाना, इनको सिखलायेंगे।
अगले वर्ष की मतपेटियाँ, इनसे ही उठवायेंगे।
  • 28-ए, दुर्गा नगर, अम्बाला छावनी (हरियाणा)

मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

अविराम विस्तारित

अविराम का ब्लॉग :  वर्ष  : 03,  अंक  :  03-04,  जुलाई-अगस्त  2013  

।।व्यंग्य वाण।।

सामग्री : इस अंक में श्री दिनेश रस्तोगी व डॉ. गोपाल बाबू शर्मा की व्यंग्य कविताएँ। 




दिनेश रस्तोगी 



व्यंग्य ग़ज़ल

आंखों में हुशियारी रख।
मतलब की बस यारी रख।

सच में थोड़ा झूठ मिला,
भीतर से मक्कारी रख।

माल वही जो अंटी में
थोड़ी-बहुत उधारी रख।

रिश्ते बस कंधा देंगे,
तू भी दुनियादारी रख।

मदद मांगने आये जो,
उस पर तू लाचारी रख।

सभी रहेंगे दर से दूर,
छाया चित्र : डॉ बलराम अग्रवाल 

कुत्ता कोई शिकारी रख।

डी.एन.ए. दारुण दुःख दे,
गूंगी हो वो नारी रख।

जेल अगर अटपटी लगे,
छद्म कोई बीमारी रख।

वैसे भी पीड़ित जनता,
इस पर बोझ न भारी रख।

गूढ़ पद्य क्या समझेगा,
ग़ज़ल मेरी अखबारी रख।

  • निधि निलयम्, 8-बी, अभिरूप, साउथ सिटी, शाहजहांपुर-242226 (उ0प्र0)





डॉ. गोपाल बाबू शर्मा



{डॉ. गोपाल बाबू शर्मा का व्यंग्य कविता संग्रह ‘बिन कुर्सी सब सून’ इसी वर्ष प्रकाशित हुआ है। प्रस्तुत हैं उनके इस संग्रह से दो व्यंग्य कविताएं।}

मंत्री जी का तर्क

भूतपूर्व मंत्री जी को,
अपहरण के एक मामले में,
पुलिस ने उठाया।
मंत्री जी ने उल्टा आरोप लगाया-
‘‘राजनीति के कारण 
मुझे लोगों ने झूठा फंसाया।’’

उन्होंने अपने बचाव में
तर्क का सहारा लिया
और सवाल खड़ा किया-
छाया चित्र : उमेश महादोषी 

‘‘भला मैं पैसों के लिए
अपहरण क्यों कराऊँगा?
मैं इतनी छोटी बात पर
नियत डिगाऊँगा?
मेरे कई-कई धंधे हैं,
और दो सौ करोड़ सालाना का 
टर्न ओवर है।
सुख-सुविधाओं से सम्पन्न
आलीशान घर है।

बाज़ार में 
जो भी उतरती है लग्जरी कार,
उसका होता हूँ,
मैं ही पहला खरीद-दार।
मेरे मैनेजर भी,
एअर कण्डीशण्ड कारों में चलते हैं
विरोधी लोग,
मेरे वैभव को देख जलते हैं।’’
पर 
माननीय मंत्री जी ने,
यह नहीं बताया,
कि कुछ ही सालों में,
छप्पर फाड़ कर,
इतना सब कहाँ से आया?

पाक दोस्ती

आइए,
हम और आप
अच्छे दोस्त बन जाएँ,
दिल नहीं,
हाथ मिलाएँ।

आपका काम होगा 
कि आप अपने झण्डे गाड़ें
हमारे उखाड़ें।
हम मिमियाएँ
और आप दहाड़ें।
जितना हो सके,
माहोल बिगाड़ें।
रेखा चित्र : महावीर रन्वाल्टा 

आप कूड़ा-कर्कट बिखराएँ,
और हम
एक शुभचिन्तक के नाते,
झाड़ू लगाएँ। 

आप हमें धमकाएँ,
आतंक फैलाएँ,
हम शान्ति-गीत गाएँ।
आइए,
हम और आप
अच्छे दोस्त बन जाएँ।

  • 46, गोपाल विहार कॉलोनी, देवरी रोड, आगरा-282001 (उ.प्र.) 

गुरुवार, 29 अगस्त 2013

अविराम विस्तारित

अविराम का ब्लॉग :  वर्ष  :  2,  अंक  :  11-12,  जुलाई-अगस्त  2013  

।।व्यंग्य वाण।।

सामग्री : आशीष दशोत्तर का व्यंग्यालेख 'वीसा की महिमा' 




आशीष दशोत्तर




वीसा की महिमा

     विदेश का मोह हो तो ऐसा। बार-बार बेइज्जत हो कर भी वहीं जाने की चाह, वाह क्या बात है। विदेश से इतना प्रेम हो भी क्यूं नहीं। आखिर विदेश जाने पर ही तो देश में इज्जत बढ़ती है। और फिर आजकल तो सभी कुछ विदेशी होने से ही प्रभावी होने लगा है। देशी माल पर परदेशी मुहर उसकी कीमत बढ़ा देती है। इस मुहर को लगवाने के लिए बाहर अपमानित भी होना पड़े तो क्या फर्क पड़ता है? वीसा की चाह में दिन-रात एक कर चुके और तमाम तरह की तिकड़में लगा चुके वे कल हमसे टकरा गए। बार-बार अपमानित होते देख उनसे हमने कहा कि यह ठीक नहीं है, आपके अपमानित होने से आपकी इमेज पर प्रभाव पड़ता है। वे कहने लगे, इससे तो मेरी मार्केट वेल्यू और बढ़ गई है। मेरे प्रशंसको की मेरे प्रति सहानुभूति बढ़ी है। हमने कहा कि आपके प्रशंसकों ने बाज़ार में हवा फैला रखी है कि आप समाज को राह दिखाते हैं। आपके अपमानित होने से समाज पर क्या असर पड़ेगा? इस पर वे नाराज हो गए। कहने लगे, राह दिखाने का ठेका हमने ही ले रखा है क्या? राह दिखानी ही है तो ठेकेदार दिखाए, समाज की चिन्ता करने वाले समाज सेवक दिखाएं। हमें तो बस वीसा चाहिए। वो भी अमेरिका का। उनकी ज़िद को देखते हुए हमने सोचा कि वे काफी ज़िद्दी हैं। कुछ भी कर सकते है। वे जो कहते हैं वो बात सही भी है। मग़र उन्हें कौन समझाए कि ठेकेदारों ने देश का बेड़ा गर्क करने का ठेका ले रखा हैं। यह ठेका अभी निरस्त होने की स्थिति में दिखता नहीं है। इसको लगातार एक्सटेंशन मिलता जा रहा है।
    सेवक बन चुके लोग, जनता की सेवा करने के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं। पहले खुद साधन सम्पन्न बनकर, जनता को सुख-सुविधा उपलब्ध कराने के संकल्प के प्रति ये सेवक दृढ़ संकल्पित नज़र आ रहे हैं। जनता को यकीन दिलाया जा रहा है कि उसकी किस्मत बदलने वाली है। और जनता भी सेवकों की इस बात पर विश्वास करते हुए अपनी किस्मत बदलने का इंतज़ार कर रही है। वैसे समाजसेवकों के प्रयास भी कमतर नहीं हैं। समाज की नींव मज़बूत करने से पहले वे अपनी नींव मज़बूत कर रहे हैं। उनका मानना है कि वे एक बार मज़बूत बन जाएं फिर समाज को तो चुटकियों में मजबूत बना देंगे। समाज के लोग जो खुद को ‘सामाजिक प्राणी कहते वक्त गर्व का अनुभव करते है, वे अपने इन समाज सेवकों की मज़बूत होती नींव को देख रहे हैं, और इस मज़बूती से संतुष्ट भी हैं।
     यानी हर कोई अपने-अपने मिशन में पूरी निष्ठा से जुटा हुआ है। इसीलिए आपसे ही यह अपेक्षा की जा रही है कि समाज को सही राह दिखाएं। वे कहने लगे, हम भी अपनी पूरी कोशिश कर रहे हैं कि  पथप्रदर्शक बने रहें। समाज की तमाम बुराइयों को हकीकत में पेश कर हम नागरिकों को नफ़रत करना सिखा रहे हैं। नायक और खलनायक के भेद को मिटाकर बन्धुत्व की भावना का विकास कर रहे हैं। समाज की बुराइयों को ‘नवीनतम तकनीक’ के जरिये इस तरह पेश कर रहे हैं कि लोगों को ‘बुराई‘ बुरी लगे ही नहीं। बुराइयाँ अच्छाइयों में तब्दील हों या बुराई ही अच्छी लगने लगे, इसमें फ़र्क क्या पड़ता है? हम तो बार-बार अपमानित हो कर भी विदेश जा ही इसीलिए रहे हैं ताकि समाज को बता सकें कि चाहे जितना अपमान हो हिम्मत कभी नहीं हारना चाहिए। वीसा के लिए इसीलिए तमाम कोशिश कर रहे हैं। आप भी हमारे लिए दुआ करें। हो सके तो किसी से पत्र लिखवा दें। यह निगौड़ी वीसा एक बार मिल तो जाए फिर हम सबको देख लेंगे।

  • 39, नागर वास, रतलाम-457001 (म.प्र.)

सोमवार, 31 दिसंबर 2012

अविराम विस्तारित

अविराम का ब्लॉग :  वर्ष : 2,  अंक : 04,  दिसम्बर 2012 

।।व्यंग्य वाण।।

सामग्री : गोविन्द चावला ‘सरल’ व रमेश मनोहरा की हास्य एवं व्यंग्य का पुट लिए कविताएँ।


गोविन्द चावला ‘सरल’




कहाँ मिलता है.....


आपकी बगल में हो सकता है गीत सुनाने वाला।
कहाँ  मिलता  है  मगर  आज  हँसाने  वाला?

सोम रस पी गए राजा भोज के भिखारी भी
हमें नहीं मिलता कोई, ठर्रा पिलाने वाला।

आपका रंग भी मोतियों सा निखर जाएगा
बहुत जल्दी हूँ मैं, साबुन वो बनाने वाला।

मरीज पूछता है, डाक्टर मुझे खुजली क्यों है?
यह पूछता है साल में इक बार नहाने वाला।

न जाने कौन ले गया, मेरे गधे के सर से सींग
बहुत परेशान है नत्थू धोबी लुध्याने वाला।
रेखांकन : पारस दासोत 

अब न घबराएँ आपके कष्ट हैं मिटने वाले
गला दबाना सीख रहा है, पाँव दबाने वाला।

अरे हम हैं न, उँगली निकालने के लिए
ढूँढ़कर लाओ कोई उँगली फँसाने वाला।

सभी खाते हैं मुझे भगवान बचाओ, गुड़ ने कहा
बोले भगवान, भाग जा, मैं भी हूँ तुम्हें खाने वाला।

मैं भी तो चैन से सो जाता ‘सरल’ तुम जैसे
काश! मिल जाता कोई नींद चुराने वाला।

  • 28-ए, दुर्गा नगर, अम्बाला केन्ट (हरियाणा)



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रमेश मनोहरा

गहरा नाता

पहले तो उसने
उसके मन को टटोला
फिर धीरे से 
छाया चित्र : डॉ बलराम अग्रवाल 
बाबू के पास आकर बोला
रिश्वत का
क्यों बढ़ाया रेट?
जब कि खाली है
हमारा पेट
बाबू धीरे से मुस्काया
फिर यूँ समझाया-
रिश्वत और महंगाई का 
गहरा नाता है
महँगाई से ही
रिश्वत की दर को
आँका जाता है

  • शीतला गली, जावरा-457226, जिला रतलाम (म.प्र.)

गुरुवार, 22 नवंबर 2012

अविराम विस्तारित

अविराम का ब्लॉग :  वर्ष : 2,  अंक : 02,  अक्टूबर  2012 


।।व्यंग्य वाण।।
सामग्री : ओम प्रकाश मंजुल का व्यंग्यालेख ‘नेता! यह मधुमय देश हमारा’



ओम प्रकाश मंजुल



‘नेता! यह मधुमय देश हमारा’


          भारत को ऋषि प्रधान देश भी कहा जाता है और कृषि प्रधान देश भी। कोई इसे ‘जगद्गुरु’ कहता है तो कोई ‘सोने की चिड़िया’। दुनियाँ में मिश्र, यूनान जैसे मात्र दो-तीन देश ऐसे हैं, जिनके मात्र दो-तीन नाम हैं। पर ‘हिन्दुस्थान’ के दो या तीन नहीं, ‘भारत’, ‘आर्यावर्त’, ‘हिन्द’, ‘हिन्दुस्तान’, ‘भरतखण्ड’, ‘भारतखण्ड’, ‘भारतवर्ष’, ‘इण्डिया’ आदि अनेक नाम हैं (इसका श्रद्धा, वितृष्णा या व्यंग्य से, जिसे जो अच्छा लगे, वही नाम पुकारे)। पर अपने आज के देश पर दृष्टि डालें तो यह न ‘आर्यावर्त’ लगता है, न भारतवर्ष लगता है। यह सिर्फ और सिर्फ ‘नेतावर्त’ लगता है और ‘भारत-भुवि’ नेताओं की ‘ड्रीमलैण्ड’ लगती है। यहाँ की प्रजा (जनता) के पास कुल मिलाकर जितनी सम्पत्ति है, उससे अधिक सम्पत्ति यहाँ के राजाओं (नेताओं) के पास है। (क्या इन राजाओं को भगवान ने ऊपर से आकर इतनी परिसंपत्तियाँ बाँटी हैं?) कुछ समय पूर्व ही कलमाड़ी, फिर राजा, बाद को बादशाह आदि का नाम आया था। इससे भी पूर्व झारखण्ड के तत्कालीन मुख्यमंत्री मधुकोड़ा का नाम चर्चा में रहा। यहाँ एक मधुकोड़ा नहीं, अनेक मधुकोड़ा हैं। एक मधुकोड़ा की पोल खुल गयी, इसलिए वह पकड़ा गया। और भी मधुकोड़ाओं में जिनके कारनामें किसी विध उजागर हो जाते हैं या उजागर कर लिए जाते हैं, उन्हें जेल भेज दिया जाता है। जिनकी कलई नहीं खुलती, वे छुट्टा घूमते हैं, आज भी घूम रहे हैं। हमारा देश ही मधुमय है। जय शंकर प्रसाद अति पूर्व में अपने नाटक ‘चन्द्रगुप्त’ में ‘अरुण यह मधुमय देश हमारा’ कह गये हैं। कवि के बारे में कहा गया है कि वह ‘भविष्यदृष्टा’ होता है। प्रसाद जी का कथन इसका सबल प्रमाण है। आज भारत अपने मधुकोड़ाओं की मीठी मार से बुरी तरह ग्रस्त है। कोई अचरज नहीं, ये नेतागण मिलकर कल देश का नाम ही ‘नेतावर्त’ या ‘नेतावर्ष’ कर लें, जैसे कि मिलकर और करतल ध्वनि के साथ एकमत या सर्वमत होकर अपने वर्ग के वेतन-भत्ते अपने आप ही बढ़ा लेते हैं (भले ही वे  किसी भी पार्टी के हों। इन 64 वर्षों में ही यहाँ के विधायक और सांसद 35 बार ऐसा कर चुके हैं)।
रेखांकन : अनिल सिंह  (रानीखेत )
    ‘नेता’ आज की सबसे बड़ी समस्या हैं। जिस देश में आई.ए.एस. की चरित्र-पंजिका अंगूठा छाप नेता (भी) लिखता-लिखवाता हो, उसके भविष्य की कल्पना की जा सकती है। भारत की बुनियाद ही कच्ची है, भीतियों की बात छोड़िए। जिस दिन देश में ‘नेता युग’ का अन्त हो जायेगा, उसी दिन ‘त्रेता युग’ अर्थात ‘राम राज्य’ आ जायेगा। किसी कवि ने आज के भारत के नेता या भारत के आज के नेता के बारे में कितना सही कहा है-
‘‘गूँगा बोले, अंधा देखे, ऐसा भी हो सकता है।
लंगड़ा लम्बी दौड़ लगाये, ऐसा भी हो सकता है।
यह चौराहे का गुण्डा है, इसको झुककर नमन करो,
कल शायद नेता बन जाये, ऐसा भी हो सकता है।।’’

  • कामायनी, कायस्थान, पूरनपुर, जिला-पीलीभीत (उ.प्र.)