आपका परिचय

बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

ब्लॉग का मुखप्रष्ठ

 अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक  :  05-06,  जनवरी-फरवरी 2017



प्रधान संपादिका : मध्यमा गुप्ता
संपादक :  डॉ. उमेश महादोषी (मोबाइल : 09458929004)
संपादन परामर्श :  डॉ. सुरेश सपन 
ई मेल :  aviramsahityaki@gmail.com 


शुल्क, प्रकाशन आदि संबंधी जानकारी इसी ब्लॉग के ‘अविराम का प्रकाशन’लेवल/खंड में दी गयी है।


छायाचित्र : उमेश महादोषी




   ।।सामग्री।।
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अविराम विस्तारित : 

काव्य रचनाएँ {कविता अनवरत} :  इस अंक में डॉ. कपिलेश भोज, डॉ.जेन्नी शबनम, श्री तेजराम शर्मा, सुश्री उषा कालिया एवं सतीश चन्द्र शर्मा ‘सुधान्शु’ की काव्य रचनाएँ।

लघुकथाएँ {कथा प्रवाह} : इस अंक में डॉ.बलराम अग्रवाल, डॉ.अशोक भाटिया, श्रीके. एल. दिवान, डॉ.संध्या तिवारी एवं सुश्री वंदना सहाय की लघुकथाएँ।

हाइकु व सम्बंधित विधाएँ {हाइकु व सम्बन्धित विधाएँ} :  इस अंक में सुश्री आभा सिंह एवं श्री चक्रधर शुक्ल  के हाइकु।

जनक व अन्य सम्बंधित छंद {जनक व अन्य सम्बन्धित छन्द} :  इस अंक में श्री पं. गिरिमोहन ‘गुरु’  के जनक छंद

क्षणिकाएँ {क्षणिकाएँ एवं क्षणिका विमर्श {क्षणिका विमर्श} : 
अब से क्षणिकाओं एवं क्षणिका सम्बन्धी सामग्री के लिए ‘समकालीन क्षणिका’ ब्लॉग पर जायें।  इसके लिए इस लिंक पर क्लिक करें-      समकालीन क्षणिका

किताबें {किताबें} :  इस अंक में इस अंक में श्री रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ के काव्य-संग्रह ‘मैं घर लौटा’ एवं  श्री एस.एम. रस्तोगी ‘शान्त’ के काव्योपन्यास ‘सृष्टि जनक’
 की उमेश महादोषी द्वारा समीक्षाएँ। 


अन्य स्तम्भ, जिनमें इस बार नई पोस्ट नहीं लगाई गई है। इन पर पुरानी पोस्ट पढ़ी जा सकती हैं। 

सम्पादकीय पृष्ठ {सम्पादकीय पृष्ठ}:  
कहानी {कथा कहानी} : 
व्यंग्य रचनाएँ {व्यंग्य वाण} :  
माँ की स्मृतियां {माँ की स्मृतियां} :  
बाल अविराम {बाल अविराम} :
संभावना {संभावना} :  
स्मरण-संस्मरण {स्मरण-संस्मरण} : 
साक्षात्कार {अविराम वार्ता} :  
अविराम विमर्श {अविराम विमर्श} :
लघुकथा विमर्श {लघुकथा विमर्श} :  
हमारे सरोकार {सरोकार} : 
लघु पत्रिकाएँ {लघु पत्रिकाएँ} : 
हमारे युवा {हमारे युवा} :  
अविराम के अंक {अविराम के अंक} : 
अविराम की समीक्षा {अविराम की समीक्षा} : 
अविराम के रचनाकार {अविराम के रचनाकार} : 
गतिविधियाँ {गतिविधियाँ} :  

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक  :  05-06,  फरवरी-मार्च 2018 



।।कविता अनवरत।।


कपिलेश भोज




दो कविताएँ

विदीर्ण करो यह कुहासा

शिक्षा पर
जितने बढ़ रहे हैं प्रवचन और प्रशिक्षण
उतने ही
शिक्षकों और जरूरी साजोसामान से
खाली होते जा रहे हैं स्कूल और कॉलेज...
स्वास्थ्य पर/जितनी ही बढ़ रही हैं 
संगोष्ठियाँ और कार्यशालाएँ
डॉक्टरों और दवाओं से
उतने ही 
वंचित होते जा रहे हैं अस्पताल...
जनतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी पर
जितनी बढ़ रही हैं घोषणाएँ
लिखने-पढ़ने और सोचने-विचारने के 
नैसर्गिक अधिकार पर
उतने ही 
सख्त होते जा रहे हैं पहरे..
हे बन्धु!
कथनी और करनी के 
इस मायाजाल के उद्गम का
करो सन्धान
और 
विदीर्ण करो यह कुहासा
ताकि
देख सको इसके पार...

उम्मीदों के हरकारे

बदहाली 
और नाउम्मीदी की 
स्याह कठोर चट्टानों से घिरे
दुर्गम पथ से गुजरते
देखो
उम्मीदों के इन हरकारों को...
छिल गए हों
भले ही पैर
रेखाचित्र :
कमलेश चौरसिया
 
हिंस्र पशुओं के हमलों से
हो गए हों क्षत-विक्षत
मगर
नष्ट नहीं कर सका कभी
कोई भी झंझावात इन्हें 
पहचानो
ये ही तो हैं
हाँ, ठीक-ठीक पहचानो इन्हेंहर अँधेरे को 
चीर देने के लिए सन्नद्ध
तुम्हारे धनुर्धर 
जिनके शरों को चाहिए
केवल तुम्हारा संबल...
  • सोमेश्वर, जिला अल्मोड़ा-263637 (उत्तराखण्ड)/मोबा. 08958983636

अविराम विस्तारित

।।कविता अनवरत।।



जेन्नी शबनम




दो कविताएँ


प्रलय...   

नहीं मालूम कौन ले गया   
रोटी को और सपनों को   
सिरहाने की नींद को   
और तन के ठौर को   
राह दिखाते ध्रुव तारे को   
और दिन के उजाले को    
मन की छाँव को   
और अपनों के गाँव को    
धधकती धरती और दहकता सूरज   
बौखलाई नदी और चीखता मौसम   
बाट जोह रहा है   
मेरे पिघलने का   
मेरे बिखरने का   
मैं ढहूँ तो एक बात हो   
मैं मिटूँ तो कोई बात हो! 
  
खिड़की मर गई है...  

खिड़की सदा के लिए बंद हो गई है  
वह अब बाहर नहीं झाँकती  
ताज़े हवा से नाता टूट गया  
सूरज अब दिखता नही  
पेड़ पौधे ओट में चले गए  
बिचारी खिड़की  
उमस से लथपथ  
रेखाचित्र : डॉ. सुरेंद्र वर्मा  

घुट रही है  
मानव को कोस रही है  
जिसने  
उसके आसमान को ढँक दिया है  
खिड़की उजाले से ही नहीं  
अंधेरों से भी नाता तोड़ चुकी है  
खिड़की सदा के लिए बंद हो गई है  
गोया खिड़की मर गई है।

  • द्वारा राजेश कुमार श्रीवास्तव, द्वितीय तल-5/7, सर्वप्रिय विहार, नई दिल्ली-110016 

अविराम विस्तारित

।।कविता अनवरत।।



तेजराम शर्मा




सैक्टर के छोर पर अस्पताल

सैक्टर के छोर पर
बहुत बड़ा अस्पताल खुल गया है
चार-दिवारी ने घेर लिया है
आधे सैक्टर को
भीतर पूरा का पूरा आकाश
उसके घेरे में

अस्पताल की खिड़की से
वर्षा की फुहार में
मटमैली बूँदे टपकती है छत से
आँखों से

अस्पताल की सीमाओं के 
बहुत दूर से आती
रोशनदान से झाँकती
सूरज की एक किरण
पड़ती है पट्टियों से बँधी
बीमार आँखों पर
कितना भी अँधेरा क्यों ना हो वार्ड में
कुछ क्षणों के लिए ही सही
अनन्त आकाश का साम्राज्य
आ जाता है बंद आँखों के घेरे में

आशंकाओं भरी
अस्पताल की हवा में
दर्द और दवा की मिश्रित बू
सदा ही परेशान करती है
फिर भी प्रथम फुहार की
सौंधी गंध/बाहर की ख़बर दे जाती है
सारा दिन 
अपनी ही कराह के स्वरों में
उलझा रहता है अस्पताल
फिर भी सुबह-शाम
स्कूल और 
मंदिर की घंटियों के स्वरों का
रहता है इन्तजार रोगियों को

जीवन और मृत्यु 
आस-पास के बिस्तर पर
बतियाते रहते हैं देर रात तक
सुबह उठ कर आस-पास वाले
छायाचित्र : उमेश महादोषी 

दबी आवाज़ में इशारा करते हैं
खाली हुए बिस्तर की ओर

शाम ढले जब
मिलने वाले अस्पताल आते हैं
तो कुछ समय के लिए
घर बन जाता है अस्पताल
अस्पताल 
अब बहुत पास हो गया है
दूरी बहुत कम हो गई है
अस्पताल और घर के बीच

  • श्री राम कृष्ण भवन, अनाडेल, शिमला-171003, हि.प्र./मो. 09418573611

अविराम विस्तारित

।।कविता अनवरत।।



उषा कालिया






गौरैया

आज बड़े दिनों बाद
गौरैया मेरे आँगन में
चहचहाई है
मेरी बगिया के फूलों पर 
छायाचित्र : उमेश महादोषी 
एक नई रंगत आई है
आसमान पर परिन्दों की कतारें
फड़फड़ाई हैं
सुबह के उगते सूर्य में
अजब सी लाली छाई है
यह सब देख लगता है मुझे
परदेस में पिया को 
मेरी याद आई है।

  • घुग्गर नाले, चाणक्यपुरी, पालमपुर-176061, जिला कागड़ा, हि.प्र./मो. 09418833589 

अविराम विस्तारित

।।कविता अनवरत।।



सतीश चन्द्र शर्मा ‘सुधान्शु’




गीत
कर रहा संकोच महुआ

हो गये हैं पत्तियों से
पेड़ सूने से।

दे रहे न पेड़ अब 
ठंडी हवाएँ।
पंछियों ने घोंसले 
तक न बनाए।
दर्द मौसम दे रहा, 
दिन-रात दूने से।।

फूल अपनी सुगन्ध
छायाचित्र :
उमेश महादोषी
 

खोते जा रहे।
तितलियों को अब वे
तनिक न भा रहे।
कर रहे परहेज भौंरे
तलक छूने से।।

अतिक्रमित हैं मार्ग
शूलों से भरे।
कदम कोई कहो
भला कैसे धरे।
कर रहा संकोच महुआ 
नित्य चूने से।।

  • ब्रह्मपुरी, पिन्दारा रोड, बिसौली-243720, जिला बदायूँ, उ.प्र./मो. 9451644006

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक  :  05-06,  जनवरी-फरवरी 2017



।। कथा प्रवाह ।।

बलराम अग्रवाल




वे दो
      यह रेगिस्तानी ठूँठ-सा था। अकेला। उपेक्षित।
      और वह सद्य-प्रवाहिता नदी-सी। अपनाई और छोड़ी जाती हुई।
      हालात ने इसे बहरा बना दिया था।
      और उसे पगली।
      यह सुन नहीं पाता था।
      और उसे बकते रहने की बीमारी लग गई थी।
      मैंने देखा कि धरती के एक भीड़-भरे इलाके में दोनों एक दिन आमने-सामने बैठे थे। उकड़ू। इसने अपनी दोनों कुहनियों को घुटनों पर टिका रखा था और चेहरे को मुट्ठियों पर। उसने अपनी बायीं-हथेली इसके नंगे कंधे पर रखी हुई थी।
      यह मुँह-बाये अचरज से उसे ताक रहा था। जैसे कि मुद्दत बाद किसी ने अपना समझा हो।
      वह दायाँ-हाथ हवा में लहरा-लहरा कर अपनी व्यथा इसे सुनाए जा रही थी। जैसे कि जन्मों बाद मन की पीर सुनने वाला कोई मिला हो।
      यह पिघलता जा रहा था उपेक्षित कंधे पर गर्म हथेली के स्पर्श और उसके टिकाव से।
      वह घुली जा रही थी। अन्तहीन व्यथाओं को कहते-कहते, कहते-कहते।

अगर तू खुदा है

      अलग-अलग आदमी में अलग-अलग खटक होती है। कभी किसी बात को लेकर तो कभी किसी ‘आदमी’ को लेकर। बहुत-से लोगों में मुझे लेकर भी खटक रहती है और वो जिन्दगी भर रहती है। एक बेचारा ऐसा था जिसने शाम को घर लौटते समय शराब की बोतल खरीदने और दुकान से ही पीते हुए चलने को अपना नियम बना रखा था। रास्ते में एक मस्जिद पड़ती थी। वह उसके सामने रुकता। बोतल में बची बाकी सारी शराब को गले में उतारता और तर्जनी उठाकर मुझे चुनौती देता-
      अगर तू खुदा है तो मस्जिद को हिलाकर देख।
      या दो घूँट इसके पी और मस्जिद को हिलता देख।।
      ‘जुगनू’ नाम का वह शायर जब तक जिन्दा रहा, मुझे चुनौती देता रहा। असलियत तो यह है कि वह मरने के बाद आज तक भी मुझे चुनौती देता-सा नज़र आता है।
      दरअसल, मन्दिर को, मस्जिद को, गिरिजा को, गुरुद्वारे को एक बारगी शैतान तो हिला सकता है, मैं या मेरा कोई बंदा नहीं।
  • एम-70, उल्धनपुर, दिगम्बर जैन मन्दिर के पास, नवीन शाहदरा, दिल्ली-32/मो. 08826499115

अविराम विस्तारित

।। कथा प्रवाह ।।


अशोक भाटिया 



युग मार्ग
      मौसम करवटें बदल रहा था। इन दिनों ठंडक पर तपिश ने दबिश दे रखी थी। हवा थी, पर चल नहीं रही थी। वृक्षों के पत्ते विवश होकर हलचल बंद कर चुके थे।
      यह सुबह का समय था। किरयाने की इस दुकान पर इस समय बड़ी चहल-पहल रहती है। ठीक इसी समय एक साधारण-सा आदमी दुकान पर आया और अपने थैले में दूध के दो पैकेट डालकर खिसकने लगा। दुकानदार ने आवाज़ लगाई। हाँ भाई, पैसे?”
      “अभी दिए तो हैं।”
      “नहीं दिए।”
      पता चला कि वह पिछले दो दिन से पैसे दिए बिना इसी तरह दूध ले जा रहा है। एक ग्राहक के पूछने पर कि कितने पैसे दिए, उसने दूध का दाम गलत बताया। तभी उसका कालर पकड़ लिया गया। कुछ ग्राहक टिप्पणियाँ छोड़ने लगे, जिनका सार था कि ‘‘ये लोग ऐसे ही होते हैं।’’
        हवा में तपिश बढ़ चली थी। एक ग्राहक, जो ध्यान से सब देख रहा था, उस आदमी के पास आया। उसका कालर छुडवाकर एक तरफ ले गया। उस आदमी ने कुछ राहत महसूस की।
      “बच्चों के लिए ले जा रहे थे दूध?” यह सवाल पूछने पर उस आदमी का सर झुक गया। अब वहाँ चेहरे के नाम पर सिर्फ उसकी भद्दी मूंछों की एक पंक्ति दीख रही थी, जिस पर नाक मानो पेपरवेट की तरह रखी लगती थी। उस मरियल सूखे आदमी ने अपना झुका सर बहुत छोटी-सी ‘हाँ’ में हिलाया और एक बहुत बड़ा निःश्वास छोड़ा। निःश्वास के साथ उसके भीतर से निकली पीड़ा की तपिश को उस ग्राहक ने भी महसूस किया। उसने उस आदमी के कंधे पर हल्का-सा हाथ रखकर कहा- “ठीक है, आप जाओ।” फिर वह भरे मन से दुकानदार की तरफ लौटा। अभी वह साधारण आदमी दुविधा में वहीं खड़ा था।
      प्रिय पाठक! कहानी अभी अधूरी है। उस ग्राहक ने दुकानदार से कहा- “उसके दूध के पैसे?” और पर्स से रूपये निकालने लगा। इस सारे घटनाक्रम से ग्राहकों के सब क्रियाकलाप ठहर गए थे। वह ग्राहक दूध के रूपये निकाले, उससे पहले दुकानदार ने उसके परस पर हाथ रख दिया, फिर उसकी तरफ नर्मी से देखकर मुस्कराने लगा। वहाँ खड़े ग्राहक कुछ अच्छा, कुछ अजीब महसूस करने लगे थे। रुकी हुई हवा अब चल निकली थी। सामने वृक्ष पर पत्ते झूमने लगे थे। ठंडक अब तपिश को दबिश देने लगी थी....
  • 1882, सेक्टर-13, अरबन स्टेट, करनाल-132001 (हरियाणा)/मो. 09416152100

अविराम विस्तारित

।। कथा प्रवाह ।।



के. एल. दिवान



सोच
      थोड़ी देर पहले मैंने सोचा था, ‘‘तीन-तीन बच्चे पढ़ रहे हैं- प्रिंस, नीरज, हेमा। साल से ऊपर हो गया है। फीस नहीं आई। कल से इन बच्चों को वापस घर भेज दूँगा। मुझे संस्था के साथ भी इन्साफ करना है। कुछ और भी हैं। उनकी भी यही हालत है, उनको भी वापस भेजूँगा। 
     तीनों में हेमा बड़ी है। मैं उसे बुलाता हूँ। मन की बात कहता हूँ। हेमा का उत्तर है- ‘‘सर! प्रिंस की किडनियों में इन्फेक्शन है। आप देख लें, उसका चेहरा हमेशा सूजा रहता है। लगातार इलाज चल रहा है। पापा बीमार रहते हैं। मम्मी का तीसरी बार आप्रेशन होना है। मैं और नीरज दिन में ठेली लगाते हैं। उसी से घर के कुछ जरूरी ख़र्चे पूरे होते हैं। जैसा आप ठीक समझो। आप कहोगे तो कल से नहीं आयेंगे।’’ हेमा चुप हो जाती है। उसकी आँखें नम हैं। मैं उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहता हूँ- ‘‘तुम तीनों आते रहना, नाम नहीं कटेगा।’’
     अब मैं सोच रहा हूँ, काश! मैं इनकी कुछ आर्थिक मदद कर सकता। तभी मुझे डॉ. विजय वर्मा का ख़्याल आता है। वह मेरी बात नहीं टालेंगे। समय-समय पर उनसे चैक-अप करवाया जा सकता है। एडवाइज ली जा सकती है। कुछ दवाइयों की मदद भी मिल जाएगी। मैं उनसे बात करूँगा।
  • द्वारा लिटिल ऐन्जेल्स प्रीपरेटरी स्कूल, 59, श्यामाचरण एन्क्लेव, विष्णु गार्डन, पो. गुरुकुल कांगड़ी, हरिद्वार, उ.खंड/मो. 09756258731

अविराम विस्तारित

।। कथा प्रवाह ।।



संध्या तिवारी





मैं शर्मिन्दा हूँ

      कमल से भरे सरोवर के निकट पेट के बल अधलेटी मुद्रा में शकुन्तला दुष्यन्त का प्रेम पत्र पढ़ रही थी।
      उसने रसराज श्रृंगार के वशीभूत प्लावित हो अनजाने ही मेरा हाथ अपने हाथ में ले लिया, उसका बर्फ-सा ठंड़ा हाथ मुझमें सिहरन पैदा कर पाता, इससे पहले लता विटप से आच्छादित सुन्दर उपवन के रम्य वातावरण में मोती चुंगते हंस के श्वेत धवल पँख सहलाती दमयन्ती ने नल का प्रेम-पत्र वांचने के लिये, मुझे हाथ पकड़ अपने पास खींच लिया। मैंने पत्र पढ़ दमयन्ती की आँखो में झाँका, तो दूर-दूर तक राजा नल ही थे, मैं उसको कुछ कह पाती, कि संयोगिता की पुकार सुन उसके साथ उसके राजमहल के झरोखे में आ खड़ी हुई। उसने कबूतर को चुग्गा दिया और उसके गले में पड़ा पृथ्वीराज का प्रेमपत्र मेरे आगे बढ़ा दिया। उस प्रेमपत्र में चन्दवरदायी ने संयोगिता के सौन्दर्य और राजा की वीरता का ऐसा मर्मस्पर्शी वर्णन किया कि मैं संयोगिता के भाग्य से ईर्ष्या ही कर बैठी। ईर्ष्या के मुखर को मौन में दबा ही रही थी कि संयोगिता हर्षातिरेक से मेरे गले लग गयी।
      उसके गले लगते ही मेरे अन्तःवस्त्र में छिपा मेरा मोबाइल फोन वाइब्रेट कर उठा उसी की ‘काल’ होगी, मेरा रोम-रोम पुलकन से भर उठा। उससे बात करने को एकान्त ढूंढ़ ही रही थी कि वॉशरूम याद आया। हाँ वॉशरूम, बिल्कुल ठीक जगह।
      जीवन के सबसे खूबसूरत एहसास वॉशरूम में? 
...न्न्ना, दिमाग़ भन्ना गया।
लेकिन प्रेम-विवश मन कहाँ मानने वाला था ...
      वॉशरूम की दुर्गंध सहित प्रेम सुगंध घूँट ही रही थी कि बगल वाले वॉशरूम से ब्रिटिश कवयित्री ‘हॉली मैक्निश’ के अन्तःकरण के करुण उद्गार सुन सिहर उठी-

‘‘ मेरी बच्ची की शुरु शुरु की घूँटें
सराबोर हैं मल की दुर्गन्ध से
हर वक्त घबराई और असहज रहती हूँ 
इस समाज के डर से।
कि कहीं इस सभ्य समाज को न दिख जाये मेरे बदन की कौंध,
जो कि उनका मन और मान विचलन से भर उठे और ढ़ह जाये सभ्यता संस्कृति का महल,
ताश के पत्तों सा।’’

      सुनकर ऐसा लगा, धरती पर अकेली मैं ही नहीं, जो शर्मिंदा है अपने नैसर्गिक कृत्य पर ...

      तो क्या, शकुन्तला, दमयन्ती, संयोगिता सब, कवि-कल्पना या चित्रकार तूलिका का विभ्रम...?

  • 41, बेनी चौधरी, पीलीभीत-262001, उ0प्र0/मोबा. 09410464495

अविराम विस्तारित

।। कथा प्रवाह ।।



वंदना सहाय 



झूठे का सच 

      मनोरमा जी जब पूजा कर कमरे से बाहर निकलीं तो उन्हें तन्नुक कहीं दिखाई नहीं दिया। वे समझ गई कि तन्नुक आज फिर से काम करने समय पर नहीं आएगा। पीकर कहीं लुढ़का पड़ा होगा। होश आते ही वहाँ पहुँचेगा, ढेरों बहाने बनाता हुआ-‘‘क्या बताऊँ मेमसाब! आज तो सरकारी राशन की लाइन इतनी लंबी थी या छोटे वाले को बुखार हो गया था...’’
      वे ऊब चुकी थीं, उसकी आदतों से। उनके जी में आता था कि उसे काम से निकाल दें, पर अगले ही क्षण उनको उसके छोटे-छोटे बच्चों का ख्याल आता और मन दया से भर उठता था। उन्हें यह भी पता था कि अगर उन्होनें उसे निकाला तो उसके पीने की आदत की वजह से उसे कोई काम पर नहीं रखेगा। तन्नुक की जानकारी लेने के ख्याल से उन्होनें ड्राइवर को आवाज़ लगाई। मौक़ा देखते ही ड्राइवर भी कान भरने लगा- ‘‘अरे मेमसाब! यह तन्नुक भी आपके दयालु स्वभाव का गलत फायदा उठाता है। अपनी तनखा के पैसों को शराब में उड़ा देता है। फिर आपसे आए दिन किसी न किसी बहाने से पैसे माँगता रहता है।’’
      फिर, वही हुआ। शाम को रोनी सूरत बनाए तन्नुक पहुँचा और उसने कहना शुरू किया- ‘‘क्या बताऊँ मेमसाब। आज मेरे घर में खाने तक को राशन नहीं है। घर पर बच्चे भूख से बिलबिला रहे हैं। बारिश के चलते इस महीने बच्चे कई बार बीमार हुए। उनके इलाज में सारे पैसे खर्च हो गए।’’
      पर, ड्राइवर द्वारा कुछ ही समय पहले भरे गए कान ने कुछ भी सुनने से साफ़ इनकार कर दिया। उनका दयालु मन आज नहीं पसीजा। 
      रात को मनोरमा जी के खाने की मेज कई तरह के पकवानों से सज गई। सजे खाने की मेज को देखकर उनका मन वितृष्णा से भर उठा। वे सीधे ड्राइवर को ले कार से उसकी झुग्गी पहुँची। उन्होंने झूठे का सच देखा- मिट्टी का चूल्हा ठंडा पड़ा था, बच्चे बिलख रहे थे। तन्नुक सर घुटनों में डाले बैठा था और पत्नी तेज़ आवाज़ में उसे कोस रही थी।
  • फ्लैट नं-613, सुन्दरम-2, विंग-सी, मलाड ईस्ट, निकट टाइम्स ऑफ इण्डिया बिल्डिंग, मुम्बई-400097, महा. /मो. 09325887111

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  7,   अंक  :  05-06,  जनवरी-फरवरी 2017



।।हाइकु।।


आभा सिंह





पंद्रह हाइकु

01.

नदी के छोर
पानी में घुल जायें
चित्र बनायें।

02.

साँवला पानी
झुटपुटी झील में
छायाचित्र :
उमेश महादोषी
 

रात रूमानी।

03.

शाम यूँ ढले
मोरपंखिया जादू
झील में चले।

04.

माझी की पीर
नदिया में उतरी
नौका सिहरी।

05.

मल्लाह गाये
हवा में घुली हूक
लहरें मूक।

06.

सागर बना 
दिलफेंक मछेरा
दिन मछली।

07.

जुगनुओं ने 
जला ली हैं कंदीलें
रौशन झीलें।

08.

पोखर आँके 
चाँद की परछाँई 
पानी में झाँके।

09.

उजला चाँद
पन्नी की आरसी सा
झिलमिलाया।

10.

खामोशियाँ क्यों
ताल किनारे बैठीं
पाँव डुबोये।

11.

सूरज बाँके
झुरमुटों के नीचे
अल्पना आँके।

12.

हवा की सीटी
बाँसों से टकराये
धुन सी मीठी।

13.

हवा कालीन
ऊँचे उड़ते पत्ते
छायाचित्र :
डॉ. बलराम अग्रवाल 

जोश संगीन।

14.

काँपती बूँदें
लरजती कलियाँ
हवा झुलाये।

15.

छिटके तारे
नदिया में निहारे
काले नजारे।

  • मकान नं. 80/173, मध्यम मार्ग, मानसरोवर, जयपुर-302020, राज./मो. 08829059234