आपका परिचय

मंगलवार, 20 सितंबर 2011

अविराम के अंक

अंक : 9/सितम्बर  2011
प्रधान सम्पादिका : मध्यमा गुप्ता
 सम्पादक : डा. उमेश महादोषी
सम्पादन परामर्श : सुरेश सपन
 मुद्रण सहयोगी : पवन कुमार


अविराम का यह मुद्रित अंक २3 से २८ सितम्बर २०११ के मध्य प्रेषित किया जायेगा। रचनाकार बन्धु अंक प्राप्त होने की प्रतीक्षा अक्टूबर २०११ के प्रथम सप्ताह के अंत तक करने के बाद ही न मिलने पर पुन: प्रति भेजने का आग्रह करें इस मुद्रित अंक में शामिल रचना सामग्री और रचनाकारों का विवरण निम्न प्रकार है-

प्रस्तुति :  मध्यमा गुप्ता का पन्ना (आवरण 2)
माइक पर :  उमेश महादोषी (आवरण 2)
लघुकथा के स्तम्भ :  डॉ. सतीश दुबे (3), भगीरथ परिहार (6) व विक्रम सोनी (9)
अनवरत-१ :  डॉ. हरमहेन्द्र सिंह बेदी (11), शिव डोयले (11), डॉ. राम निवास ‘मानव’ (12), डॉ. विजय प्रकाश (13),गणेश भारद्वाज ‘गनी’ (14). जसबीर चावला (15),डॉ. रुक्म त्रिपाठी (16) एवं विज्ञान व्रत(16) की काव्य रचनाएँ।
कथा-कहानी :  विजय (17) एवं शिवानन्द सिंह ‘सहयोगी’ (28) की कहानियां।
आहट :   डॉ. रमा द्विवेदी, पूजा येरपुड़े, डॉ. ए. कीर्तिबर्द्धन, सीमा स्मृति एवं गिरीश जैन ‘गगन‘ की क्षणिकाएँ (30)
व्यंग्य-वाण :  निशान्त का व्यंग्य लेख (31)
 कविता के हस्ताक्षर :  महेश चन्द्र पुनेठा (33)
 कथा प्रवाह :  सूर्यकान्त नागर (35), महावीर रंवाल्टा (36), मनोज सेवलकर (37), पूनम गुप्ता (37), चन्दन सिंह चौहान (38), सीताराम गुप्ता (39), अनीता वर्मा (39), अंकु श्री (40), शिव प्रसाद ‘कमल’ (41) एवं सत्य शुचि (41) की लघुकथाऐं
अनवरत-२ :  सालिग्राम सिंह ‘अशान्त’ (42), त्रिलोक सिंह ठकुरैला (42), सत्येन्द्र तिवारी (43), डॉ. राजेन्द्र मिलन (43), शिरोमणि महतो (44), अचल राज पाण्डे (44) एवं डॉ. नसीम अख्तर (45) की कवितायें
किताबें  :  सात सुरों की साधना/रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु‘ (46), सिलवटों वाले चेहरों की कथाएँ/ज्योति जैन (48), एक जन्म में सात जन्मों का जीना/डॉ. हरदीप कौर सन्धू (50), ‘चन्दनमन’ एक अद्वितीय हाइकु संग्रह/अर्पिता अग्रवाल (53), प्रगतिशील विचारधारा की प्रयोगधर्मी कविताएँ (55) एवं संदेशप्रद बाल कविताएँ (56)/ राम कुमार आत्रेय, समकालीन यथार्थ को अभिव्यक्त करता त्रिपदिक छन्द (57), कविता और दार्शनिकता के मध्य तीखी लघुकथाएँ (59), उत्तराखण्ड की  धड़कनों की अनुभूति (61) एवं मनुष्यता की राह दिखाती कविताएँ (62)/डा. उमेश महादोषी
चिट्ठियाँ :  अविराम के गत अंक पर प्रतिक्रियाएं (64)
गतिविधियाँ :  संक्षिप्त साहित्यिक समाचार (66)
प्राप्ति स्वीकार :  त्रैमास में प्राप्त विविधि प्रकाशनों की सूचना (68) 

                            इस अंक की साफ्ट प्रति ई मेल (umeshmahadoshi@gmail.com) से मंगायी जा सकती है।
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                            7 टिप्‍पणियां:

                            1. सितम्बर 2011 अंक पर कुछ मित्रों की प्रतिक्रियायें इस प्रकार हैं

                              डॉ. ओम्प्रकाश भाटिया ‘अराज’, बी-2-बी-34, जनकपुरी, दिल्ली-110058

                              ....अविराम का नया अंक प्राप्त हुआ। बहुत कुछ पढ़ गया। कमण्डलु में गंगा भरी है। यद्यपि बारीक छपाई को लेन्स की सहायता से पढ़ना पड़ा, किन्तु कई लघुकथाएँ, समीक्षाएँ और कम्प्यूटर का सहारा लेने की विधि आदि बरबस आकृष्ट कर गई। अंक पूर्ववत् से उत्तर/बरतर ही है। आपकी खोजी दृष्टि ने मेरे कई जनक छन्दों को जैसे व्याख्यायित किया उसकी नवीनता मुझे भी बहुत कुछ समझा गई। ......मेरा ‘धर्म’ वैज्ञानिक है, अनुभूत है। उसमें ब्रह्म है- चेतना। एकोदेवः। भक्ति-ज्ञान-कर्म अभिन्न क्रियाएँ एकत्र हैं। उन्हीं से मैं ब्रह्म होने की साधना कर रहा हूँ। वह मज़हब, रिलिजन, दल बाँधने जैसी प्रक्रियाओं से बहुम भिन्न है। वह व्यवहारिक पथ है, सबके लिए उपयुक्त है।...

                              डॉ. यागेन्द्र नाथ शर्मा ‘अरुण’, 74/3, न्यू नेहरूनगर, रुड़की, जिला: हरिद्वार (उ.खण्ड)

                              ....‘अविराम’ त्रैमासिक संकलन देखकर गद्गद् हूँ। रुड़की के सन्नाटे को अविराम के खनकते स्वरों से तोड़कर आपने प्रिय सुरेश सपन की याद भी करा दी है। अंक-9 तक की आपकी सारस्वत यात्रा आस्वस्त करती है कि आप सचमुच कुछ कर गुजरने का माद्दा रखते हैं। आपके प्रयास ने मन को खुशी से भर दिया है।....

                              प्रो. हितेश व्यास, 1-मारुति कॉलोनी, पंकज होटल के पीछे, नयापुरा, कोटा-324001(राज.)

                              ....अविराम का वार्षिक शुल्क आप दिसम्बर अंक में बताएंगे और सितम्बर का निःशुल्क अंक 72 पृष्ठ का कर दिया जबकि भविष्य में अंक 52 पृष्ठीय रहेंगे। एक तरफ शुल्क-सुनामी की चेतावनी, दूसरी तरफ अधिक पृष्ठों की राहत। डॉ. सतीश दुबे, भगीरथ परिहार और विक्रम सोनी लघुकथा के मील के पत्थर हैं। भगीरथ परिहार के लघुकथा संग्रह ‘पेट सबके हैं’ के लोकार्पण में कृति परिचय मैंने ही दिया था। मेरे पास लघु आघात के अंक तब के हैं जब वह प्रकाशित होती थी। मेरी नियुक्ति राजस्थान के सीमांत जिले बाड़मेर में थी, जहाँ लघु पत्रिकाओं का नामोनिशान नहीं था। जब भी जोधपुर आता वहाँ स्टेशन रोड पर मंगल सिंह बुकसेलर की दुकान से पत्रिकाएँ खरीदता। ये 1979-97 का समय था। मंगल सिंह तो मेरी कविता में किरदार की तरह आया है। पर अभी तो महाआघात यह है कि विक्रम सोनी अस्वस्थ हैं। वे शीघ्र स्वस्थ हों। इन तीनों की लघुकथाएँ तो लाइट हाउस, आकाशदीप की तरह हैं। विजय की कहानी ‘किधर, कब और कहाँ’ को आपने इधर और अब 10 पृष्ठ दिये हैं, यह तो 52 पृष्ठीय पत्रिका के साथ ज्यादती है। कहानी ठीक-ठाक शुरू होती है लेकिन जातिवाद के दुष्चक्र में ऐसी फँसती है कि अभिमन्यु की तरह निकल ही नहीं पाती। विजय जी की महानता में मुझे संदेह नहीं है, किन्तु महान की हर रचना महान नहीं होती। हो सकता है ये मेरा अपना नजरिया हो। नवगीतों में डॉ. विजय प्रकाश के नवगीत ‘उत्तर नहीं दिया’ ने प्रभावित किया। दूसरा नवगीत ‘मन करता है’ शायद उम्र (60.5 वर्ष) की वजह से संप्रेषित न हुआ हो। गणेश भारद्वाज गनी की कविता ‘यह किसका घर है’ कथापरकता के कारण अच्छी लगी। जसवीर चावला की कविता ‘नील अश्वारोही’ के गूढ शब्दों ने और दूसरी रचना ‘दे रहा हूँ’ की अन्तिम पंक्ति ने मजा किरकिरा कर दिया। विज्ञान व्रत की दूसरी ग़ज़ल के तमाम शेर अच्छे हैं और पहली का एकाध। डॉ. रमा द्विवेदी, सीमा स्मृति, पूजा येरपूड़े की क्षणिकाएँ दीर्घकालीन हैं। पुनेठा की कविता ‘दुपहिया चलाती युवतियाँ’ में सशक्त स्त्री विमर्श है। महावीर रवांल्टा की लघुकथा ‘हाथ’ ने रुला दिया। पूनम गुप्ता की लघुकथा ‘प्यार’ में प्यार का यथार्थ है। चन्दन सिंह चौहान की कथा ‘प्रभु जूठन खात हैं’ दुधारी तलवार है। लघुकथा की लघुकथा और व्यंग्य का व्यंग्य। अनिता वर्मा की लघुकथा जोड़-तोड़ में जीवन का गणित है। अंकुश्री की लघुकथा प्रतिक्रिया में नाटकीयता तो है ही, मंचनीयता भी है। शिवप्रसाद कमल की लघुकथा में पेंशन की त्रासदी है। सत्य शुचि की ‘किराये का घर’ में महेश पुनेठा का-सा सबल स्त्रीविमर्श है। समीक्षाएँ संक्षिप्त नहीं हैं। पत्रिका के कलेवर को देखते हुए भी और वैसे भी दीर्घता से समीक्षा का तनाव ढीला हो जाता है।

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                            2. सितम्बर 2011 अंक पर कुछ और मित्रों की प्रतिक्रियायें इस प्रकार हैं

                              डॉ.अशोक भाटिया, अध्यक्ष, स्नात.हिन्दी विभाग, राजकीय महिला महाविद्यालय, करनाल (हरि.)


                              ...पत्रिका देखने में साधारण सी लगती है, किन्तु पृष्ठ पलटते ही बेहतर साहित्य को पाकर संपादक के परिश्रम का तथा प्रस्तुति को देखकर संपादक की सुरुचि का तुरन्त परिचय मिल जाता है। हिन्दी लघुकथा के स्तंभ शीर्षक के अन्तर्गत आप एक तरह से हिन्दी लघुकथा का इतिहास पाठकों के समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं। इतनी पुस्तकों की समीक्षाएँ लिखवाना बड़ा ही दुष्कर कार्य है। डा. ओम्प्रकाश भाटिया ‘अराज’ ने जनक छन्द के माध्यम से अनेक युवा कवियों को छंद लिखने का शऊर सिखाया है, लेकिन इसका दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष यह है कि उनमें से ही कुछ स्वयं को जनक छंद के जनक व आचार्य कहने से बाज नहीं आते। साहित्य में ऐसी घातक प्रवृत्ति को हतोत्साहित किया जाना चाहिए।.....

                              आचार्य भगवत दुबे, 2672, ‘विमल स्मृति’, पिसनहारी मढ़िया के पास, जबलपुर-482003 (म.प्र.)


                              ...मध्यमा जी एवं आपकी सम्पादकीय टिप्पणियां महत्वपूर्ण हैं। डॉ. रामनिवास ‘मानव’ के हाइकु गागर में सागर के समान हैं। विज्ञान व्रत कम शब्दों एवं छोटी बहरों में बड़ी बात कहते हैं। लघुकथाएं व्यंग्यात्मकता से परिपूर्ण है, इनमें समकालीन युगवोध झलकता है। अविराम हिन्दी की अच्छी पत्रिका है। इसमें आपका सारस्वत श्रम झलकता है।...

                              युगल, मोहीउद्दीन नगर-848501. समस्तीपुर (बिहार)


                              ...लघुकथा के कुछ वरिष्ठ हस्ताक्षर की अच्छी लघुकथाएँ पढ़ने को मिली। छोटी पत्रिकाएँ नये लेखकों को तरजीह देकर लेखन को प्रोत्साहित तो करती ही हैं, साथ ही उनकी कलम से निकली अच्छी और बड़ी बातें पाठकों के सामने रखती हैं। रामनिवास हाइकु के उस्ताद रहे हैं। इस अंक में छपे उनके हाइकुओं में तीन पसन्द के हैं। ‘यह किसका घर है’ ग़नी की अच्छी रचना है। प्रतीक और उपमान चुनते समय डॉ. रमा द्विवेदी जी को ज्यामिति और सौरमंडल के ग्रहों के चक्र का ध्यान रखना चाहिए था। पृथ्वी और सूर्य में कौन किसका चक्कर लगाता है?....

                              दिनेश चन्द्र दुब(म.प्र.), 68, विनयनगर-1, ग्वालियर-12 (म.प्र.)


                              .....पुनेठा जी की कविताओं ने यह पास्टकार्ड लिखने पर बाध्य कर दिया। काश! ऐसी कहानियाँ भी होती।...हाँ क्या यह संभव नहीं कि इतनी बढ़िया लघु पत्रिका में ढेरों पृष्ठों में जो गतिविधियाँ छपती हैं, उनकी जगह बढ़िया कविता, कहानी छपे तांकि अंक संरक्षित करना पड़े। अन्य प्रकार की बातों के लिए कोई पृथक अंक ही किसी माह छापें। यह गतिविधियां बड़ी पत्रिकाओं में पृष्ठ भरने के लिए प्रकाशित होती हैं। पृष्ठ 45 के आगे के सारे पृष्ठ काश गम्भीर कहानी, या किसी गहन आलेख में उपयोग होते तो क्या आनन्द रहता!....



                              संतोष सुपेकर, 31, सुदामानगर, उज्जैन-456001 (म.प्र.)

                              ....हर अंक में आप वाकई गागर में सागर भर देते हैं। कविताएँ, लघुकथाएँ, लम्बी कहानियाँ, ग़ज़ल, हाइकु, समीक्षाएँ, पुस्तकों की जानकारियाँ, व्यंग्य; 70 पृष्ठों में क्या नहीं है! आपका प्रयास, आपकी अभिरुचि सचमुच स्तुत्य है। आदरणीय विक्रम सोनी जी के बारे प्रकाशित कर न सिर्फ आपने लघुकथा विधा बल्कि उसके एक प्रमुख संस्थापक, नींव के पत्थर का सम्मान किया है। महावीर रंवाल्टा की लघुकथा ‘हाथ’ एवं शिव डोयले की कविता ‘बच्चा हँसता है’ बहुत मार्मिक रचनाएँ हैं। दोनों लेखकों को हार्दिक बधाई। परम आदरणीय सतीश दुबे एवं सूर्यकान्त नागर की रचनाएँ प्रभावी एवं संग्रहणीय हैं।.....

                              डॉ. गोपाल बाबू शर्मा, 46, गोपाल विहार कालोनी, देवरी रोड, आगरा-282001 (उ.प्र.)

                              ....‘खुशनुमा सुबह’, ‘सुपारी’, ‘रिपोर्टिंग’ लघुकथाएँ विशेष रूप से प्रभाव छोड़ती हैं। श्री विजय की कहानी ‘किधर, कब और कहाँ’ जिन्दगी की असलियत को सामने रखती है। डॉ. विजय प्रकाश का नवगीत ‘उत्तर नहीं दिया’ भावपूर्ण है। विज्ञान व्रत जी का तो कहना ही क्या! उनकी ग़ज़लें मन को छू लेती हैं। श्री रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ तथा डॉ. हरदीप कौर सन्धु ने अपने सुधी समीक्षक होने का परिचय दिया है। अन्य सामग्री भी पठनीय है।.....

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                            3. सितम्बर 2011 अंक पर कुछ और मित्रों की प्रतिक्रियायें इस प्रकार हैं

                              डॉ. सरेन्द्र गुप्त, आर.एन.-7, महेश नगर, अम्बाला छावनी-131001 (हरि.)

                              ....‘आकार में छोटी सी लगने वाली इस पत्रिका के जुलाई-सितम्बर 2011 के अंक में उत्कृष्ट, पठनीय एवं स्तरीय रचनाओं को स्थान दिया गया है। ‘लघुकथा के स्तम्भ’ के अन्तर्गत लघुकथा के तीन वरिष्ठतम विद्वानों डॉ. सतीश दुबे, श्री भगीरथ परिहार तथा श्री विक्रम सोनी का उनके चित्रों सहित परिचय और उनकी तीन-तीन उत्कृष्ट रचनाओं को लगाना स्तुत्य कार्य है। यह वास्तव में पत्रिक की अलग पहचान बनाता है। डॉ. रामनिवास ‘मानव’ के दस हाइकु, डॉ. विजय प्रकाश के दो नवगीत, गणेश भारद्वाज ‘गनी’, जसवीर चावला की कविताएँ, डॉ. रुक्म त्रिपाठी के दोहे, विजय की कहानी ‘किधर, कब और कहाँ’ आदि रचनाएँ इस अंक की विशिष्ट उपलब्धि हैं। ‘व्यंग्य वाण’ के अन्तर्गत निशान्त का ’सिंगापुर ने भारत को मूर्ख कहा’ गहरी अन्तर्दृष्टि लिए हुए है, जिसमें भारत की चरमराती राजनीतिक, सामाजिक व्यवस्था पर सहज-सरल भाव में गहरा व्यंग्य किया गया है। सूर्यकान्त नागर, महावीर रंवाल्टा, मनोज सेवलकर, पूनम गुप्ता, चन्दन सिंह चौहान, सीताराम गुप्ता, अनिता वर्मा, अंकुश्री, शिव प्रसाद ‘कमल’ तथा सत्य शुचि आदि की लघुकथाएँ प्रभावित करती हैं। किताबों की समीक्षा तथा साहित्यिक समाचार भी अंक की सार्थकता को प्रमाणित करते हैं। पत्रिका साहित्य की एक सृजनात्मक पत्रिका के रूप में अपनी पहचान बना चुकी है, यह कहना बिल्कुल सत्य है। विशिष्ट प्रस्तुति, साज-सज्जा व सामग्री के चयन के कारण आपका यह प्रयास अभिनन्दनीय है।....

                              डॉ. सुभाष रस्तोगी, 348/45-ए, चण्डीगढ़

                              ....डॉ. सतीश दुबे की लघुकथाएँ व्यवस्था के विद्रूप को तो रेखांकित करती ही हैं, लघुकथा के बदलते मिजाज को भी उजागर करती हैं। डॉ. रामनिवास ‘मानव’ के दस हाइकु, डॉ. हरमहेन्द्र सिंह बेदी, शिव डोयले, डॉ. विजय प्रकाश और जसवीर चावला की कविताएँ हमारे सामने समकालीन कविता का भरा-पूरा परिदृश्य उपस्थित करती हैं। एक सार्थक अंक के लिए साधुवाद। ‘अविराम’ का यह अंक वास्तव में समग्र साहित्य का आइना बनकर सामने आया है।....

                              सूर्यकान्त नागर,81, बैराठी कॉलोनी न.ं2, इन्दौर-14 (म.प्र.)

                              ....अंक पठनीय है, जानकारीपूर्ण।

                              सुधीर निगम, 104 ए/315, रामबाग,कानपुर-208012 (उ.प्र.)

                              ....आप पत्रिका का शुल्क निर्धारित करने जा रहे हैं। शुल्क की मात्रा इतनी होनी चाहिए जिससे आप 52 के स्थान पर 72 पृष्ठों की पत्रिका निकाल और वर्ष में एक विशेषांक सुविधा पूर्वक निकाल सकें। आपका सँपादक मंडल तो समर्थ है ही।

                              डॉ. रामनिवास ‘मानव’, ‘अनुकृति’, 706, सैक्टर-13, हिसार-125005 (हरि.)

                              ...अंक बहुत बढ़िया निकाला है। स्तरीय सामग्री का सुन्दर संयोजन अपने किया है।.......

                              डॉ. सेराज खान बातिश, 3-बी, बंगाली शाह वारसी लेन, दूसरा तल्ला,फ्लैट नं.4, ख्रिदिरपुर, कोलकाता-700023 (प.बंगाल)

                              ...यह कृशकाय पत्रिका अपने अन्दर साहित्य की प्रायः सभी विधाओं को समेटे हुए है, यह देखकर आश्चर्य होता है। इसके कलेवर में ख्यातिनाम शुद्व साहित्यिक पत्रिकाओं की सारी विशेषताएँ हैं। हां इसकी स्तरीय रचनाएँ हमें मनोरंजित ही नहीं, समृद्व भी करती हैं। इस अंक में जहाँ डॉ. रुक्म की छोटी रचना (दोहा) प्रकाशित है, वहीं विजय की लम्बी कहानी भी प्रकाशित की गई है। विजय, डा. सतीश दुबे, विक्रम सोनी, महेश चन्द्र पुनेठा आदि की रचनाओं से पूर्ण तथा नसीम अख्तर, अर्पिता अग्रवाल, पूनम गुप्ता, चन्दन सिंह चौहान के सृजन प्रकाश से सजी पत्रिका सही अर्थो में साहित्य के प्रति समर्पित पत्रिका है। यह कहा जा सकता है कि डा. उमेश महादोषी साहित्यिक लघु पत्रिका में एक प्रकार से नई चेतना का संचार लिये हुए हैं, उनके लगन, परिश्रम और मिशन को सलाम!...

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                            4. सितम्बर 2011 अंक पर कुछ और मित्रों की प्रतिक्रियायें इस प्रकार हैं

                              शालिग्राम सिंह अशान्त, एस.पी. निवास के पीछे, एस.डी.ओ. रोड, हाजीपुर, वैशाली (बिहार)

                              ....अविराम आपके कुशल सम्पादकत्व में राष्ट्रीय स्तर पर अपना सौरभ बिखेरे, यही मंगल-कामना है। सत्तर पृष्ठों के इस त्रैमासिक में आपने गागर में सागर और बिन्दु में सिन्धु समाहित कर देने का प्रशंसनीय प्रयास किया है।.... ‘अविराम’ में जो गीत, ग़ज़ल, लघुकथाएँ, त्रिपदिक, कहानी और समीक्षात्मक आलेख प्रकाशित किए हैं, वे सभी स्तरीय हैं, पठनीय ही नहीं, अपितु संग्रहणीय भी हैं। ये रचनाएँ आपके सम्पादन-कौशल के पुष्ट प्रमाण हैं। एक पत्रिका के रूप में आपके निर्देशन में उत्तराखण्ड की अजस्र साहित्यिक आभा केा आसेतु हिमालय अनवरत आभासित करती रहेगी, ऐसा मेरा विश्वास है।...

                              अनिल द्विवेदी ‘तपन’, ’दुलारे निकुँज’, 46-सिपाही ठाकुर, कन्नौज-209725 (उ.प्र.)

                              ...प्रकाशित लेख, रचनायें, लघुकथायें आदि सारगर्भित एवं हृदयस्पर्शी हैं। पुस्तकों और पत्र-पत्रिकाओं के बिषय में अच्छे ढंग से जानकारी दी गई। अच्छा लगा। काफी लगन और मेहनत से अंक को संवारा आपने, अस्तु हार्दिक शुभकामनायें स्वीकर करें।....

                              पं. ज्वालाप्रसाद शांडिल्य ‘दिव्य’, 251/1, दयानन्द नगरी, ज्वालापुर, हरिद्वार-249407(उ.खण्ड)

                              ...‘अविराम’ त्रैमासिक अंक सितम्बर 2011 प्राप्त हुआ। स्वाध्याय और चिन्तन कर पाया कि आपका प्रयास वास्तविक राष्ट्रीय चिन्तन का समन्वय रखता है। समग्र प्रकाशित सामग्री समयानुकूल उद्बोधन प्रस्तुत करने में सक्षम है।
                              सादर निर्मल भाव मन, प्रस्तुत प्रेम अपार।
                              वंदन है शुचि कर्म को, कर लीजे स्वीकार।।

                              मोती-माणिक तुल्य है, गद्य-पद्य हर शब्द।
                              संशय इसमें है नहीं, बोल रहा हर शब्द।।
                              (आद.शांडिल्य जी का हमारे एवं अविराम के प्रति बेहद आत्मिक स्नेह है, जिसे उन्होंने टिप्पणी के साथ उपरोक्त एवं छः अन्य दोहों में व्यक्त किया है। उनकी काव्यात्मक स्नेहिल भावनाओं के प्रति हम आदर और अपनी कृतज्ञता प्रकट करते हैं।- उमेश महादोषी)

                              मृदुलमोहन अवधिया, 1899, देवताल गढ़ा, जबलपुर-482003 (म.प्र.)

                              .....समस्त सामग्री पठनीय एवं मननीय है। आपकी साहित्य-सेवा प्रणम्य एवं वन्दनीय है। मेरा अनेकशः आशीर्वाद एवं शुभकामनाएँ अर्पित हैं।

                              उर्मि कृष्ण, ए-47, शास्त्री कॉलोनी, अम्बाला छावनी-133001(हरि.)

                              .....इस त्रैमासिक को आपने अच्छा साहित्यिक बनाने का प्रयत्न किया है। बिना किसी सजावट और तामझाम के पत्रिका को निकालना और श्रेष्ठ रचनाओं का चयन कर आपने बधाई का कार्य किया है। बहुत से नये कवियों का परिचय इसमें मिलता है। लघुकथाओं का चुनाव भी अच्छा किया गया है।...





                              डॉ. नसीम अख़्तर, जे.4/59, ‘गुलशने-अबरार’ हंस तले, वाराणसी-221001(उ.प्र.)

                              ...इस मुख़्तसर सी पत्रिका में ढेर सारी पठनीय चीज़ें सजा दी हैं। पत्रिका समन्दर को कूज़े में बन्द करने में मिस्दाक़ है। मैं आपके इस ख़ूबसूरत पेशकश की क़द्र करता हूँ। ‘अविराम’ के तअल्लुक़ से एक क़त्अ हाजिर है-
                              पत्रिका ‘अविराम’ है या अन्जुमन है दोस्तो
                              चाँद-तारों से सजा, सुन्दर गगन है देस्तो
                              दिल की आँखों ने पढ़ा जब तो ज़बाँ ने ये कहा
                              ये कहानी का नगर, शहरे-सुखन है दोस्तो

                              विवेक सत्यांशु, 14/12, शिवनगर कालोनी, अल्लापुर, इलाहाबाद-211066 (उ.प्र.)

                              ....समकालीन परिदृश्य में ‘अविराम’ ने बहुत कम समय में अपना महत्वपूर्ण स्थान बना लिया है।.....

                              शब्बन खान ‘गुल’, दरगाह रोड, बख्शीपुरा, शहर बहराइच-271801 (उ.प्र.)

                              .....पत्रिका गहरे तक प्रभावित करती है। आप सहित्य की ताकतवर लेकिन उपेक्षित विधा ‘क्षणिका’ को आगे लाने के लिए प्रयास कर रहीं हैं, इसके लिए साधुवाद। इस अंक के सभी रचनाकार एक से बढ़कर एक लगे। आपके मंजे संपादन से पत्रिका कंचन की तरह दमकती लगी। साहित्य से जुड़ी सूचनाओं के कारण पत्रिका और उपयोगी बन पड़ी है।...

                              प्रो. महेश दुबे, 1102, साईं अंश, प्लाट नं.7, सेक्टर-11, सानपाड़ा, नवी मुम्बई-400705 (महा.)

                              ....पत्रिका में प्रस्तुत सामग्री पठनीय और स्तरीय है, और विविध विधाओं के कारण रोचक है।....

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                            5. सितम्बर 2011 अंक पर कुछ और मित्रों की प्रतिक्रियायें इस प्रकार हैं

                              गुरुप्रीत सिंह, बागीचा, तह. रायसिंह नगर, श्रीगंगानगर-335051 (राज.)

                              पहला पत्र: ....आपने पत्रिका में गद्य को जो स्थान दिया है, प्रशंसनीय है। स्तम्भ ‘आहट’ की सम्पूर्ण क्षणिकाएँ श्रेष्ठ हैं, आपका क्षणिका चयन उत्तम है। पत्रिका प्रथम बार देखने को मिली, एक लम्बे समय के बाद एक सार्थक पत्रिका के दर्शन हुए, जिसमें गद्य को उचित स्थान दिया है। अधिकतर पत्रिका पद्य, निरर्थक पद्य से भरी होती है। पत्रिका का नेट पर ब्लॉग होना भी महत्वपूर्ण है।....


                              दूसरा पत्र: ....मैं पृष्ठ संख्या 28 पर शिवानन्द सिंह ‘सहयोगी’ की कहानी ‘वंशरोपन’ पर चर्चा करना चहता हूँ। प्रथम तो कहानी में सार्थकता नहीं है, द्वितीय कहानी को विस्तार ज्यादा दे दिया। कहानी ‘भवसागर’ की है और ‘रामदहिन’ को मिल मतलब बीच में ला बैठाया। ‘भवसागर’ व ‘रामदहिन’ भाई हैं, इनसे ‘रामू’ का क्या सम्बन्ध, कहीं कोई स्पष्टीकरण नहीं। सबसे बड़ी बात आप इस कहानी को किस श्रेणी में रखोगे-यथार्थवादी, उपदेश प्रधान, आदर्शवादी या कोई अन्य। वास्तव में कहानी में कोई सार्थकता नहीं है, लेखक महोदय ने लिख दी और आपने न जाने क्या सोचकर प्रकाशित कर दी। आपके उत्तर का इन्तजार है। ई मेल जरूर करें। कृपया अपना उत्तर/स्पष्टीकरण जरूर दें हो सकता है मेरी भूल हो पढ़ने में। अन्यथा न लें।....



                              {प्रिय गुरुप्रीत जी, यह पारिवारिक एवं सामाजिक सम्बन्धों पर आधारित कहानी है, जो हमें खोते जा रहे सम्बन्धों के महत्व का स्मरण कराती है। इस दृष्टि से देखेंगे, तो मुझे विश्वास है कि कहानी आपको भी सार्थक लगेगी। रामू रामदहिन का बेटा है, पर हताशा में पलायन कर जाता है। परन्तु उसकी जिम्मेवारी को भवसागर पूरा करता है। इसी से कहानी की सार्थकता निकलकर आती है। बिना रामदहिन के भवसागर की कहानी का कोई अर्थ नहीं। रामदहिन के बिना कहानी की बजाय भवसागर की परिचय गाथा मात्र होती यह रचना।-- उमेश महादोषी}


                              राजीव नामदेव ‘रानालिधौरी’, नई चर्च के पीछे, शिवनगर कालोनी, टीकमगढ़-472001(म.प्र.)

                              ....इस अंक में डॉ. सतीश दुबे, भगीरथ परिहार एवं विक्रम सोनी तीनों अग्रणी लेखकों का परिचय एवं लघुकथाएँ बहुत अच्छी लगीं। कविताएँ एवं क्षणिकाएँ भी प्रभावित करती है। ‘इन्टरनेट पर अविराम’ पढ़कर बहुत अच्छा लगा। इन्टरनेट के माध्यम से निश्चित ही ‘अविराम’ की प्रसिद्धि में ‘श्री वृद्धि’ होगी। पत्रिका देश के साथ-साथ विदेश में भी पढ़ी जा सकेगी।....

                              महावीर रवांल्टा, ‘संभावना’, महरगाँव, पत्रालय: मोल्टाडऋी पुरोला, उत्तरकाशी-249185 (उ.खण्ड)

                              ....अंक की रचनाएँ अच्छी लगीं। नामोल्लेख न कर सभी रचनाकारों को बधाई।...

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                            6. सितम्बर 2011 अंक पर कुछ और मित्रों की प्रतिक्रियायें इस प्रकार हैं

                              डॉ. ब्रह्मजीत गौतम, ‘गौतम कुटी’, बी-85, मिनाल रेजीडेन्सी, जे.के.रोड, भोपाल-462023 (म.प्र.)

                              ....छोटे से कलेवर में आप पर्याप्त सामग्री दे देते हैं, वह भी विविधतापूर्ण, सबकी रुचियों का ध्यान रखते हुए।....

                              शशिभूषण बड़ोनी, आदर्श विहार, ग्रा. व पो. शमशेरगढ़, जिला: देहरादून (उ.खण्ड)

                              ....अविराम का अंक 09 (सितम्बर 2011) बहुत अच्छी सामग्री से सुसज्जित मिला। आभारी हूँ। ब्लॉग पर भी रचनाएँ आ रही हैं, बहुत अच्छा! निरन्तर प्रगति पथ पर ....

                              अनिमेष, एस.पी. कोठी के पीछे, एस.डी.ओ. रोड, हाजीपुर, वैशाली (बिहार)

                              ....‘अविराम’ का अंक देखा। सुन्दर रचनाएँ प्रकाशित हैं। आलेख और सम्पादकीय प्रभावोत्पादक हैं।....

                              कृष्णलता यादव, 1746, सैक्टर-10ए, गुड़गाँव-122001 (हरि.)

                              ....विषयों की विविधता, त्रुटिहीन छपाई और निःशुल्क वितरण आदि के आधार पर आप साधुवाद के पात्र हैं। पुस्तक समीक्षाओं के माध्यम से जनक छन्द, हाइकु व तांका की संक्षिप्त जानकारी मिली। रचनाओं के साथ रेखांकन से अर्थवत्ता को बल मिला है।.....

                              प्रदीप गर्ग ‘पराग’, 1785, सेक्टर-16, फरीदाबाद (हरि.)

                              ....सितम्बर अंक पठनीय एवं संग्रहणीय है। लघुकथाएँ, हाइकु, नवगीत, कथाएँ, कविताएँ, समीक्षा सम्पूर्ण सामग्री उच्च स्तर की है, जो आपके कुशल सम्पादन की सराहनीय प्रस्तुति है।.....

                              खान रशीद ‘दर्द’, हॉटल सांवरिया के सामने, के.बी. राजमार्ग, बड़बानी-451551 (म.प्र.)

                              ....अंक प्रथम दृष्टया ही मन को भा गया। आवरण पृष्ठ, मुद्रण और रचनाएँ सभी सुन्दर और प्रभावी हैं, यह पत्रिका अपने लघु कलेवर में भी समन्दर समेटे है... ‘रचनाएँ सब खास हैं, किसे कहूँ मैं आम।/धन्य हो गया ‘दर्द’ मैं, पढ़कर ये अविराम।।’...

                              कुंदन सिंह सजल, उदय निवास, रायपुर (पाटन), सीकर-332718 (राज.)

                              ....अविराम त्रैमासिक निरन्तर मिल रही है। आपके सम्पादन की छाप स्पष्ट लक्षित होती है। इस असंवेदनश्ील समय में पत्रिका जैसी स्वच्छ परम्परा प्रारंभ करने के लिए आप हार्दिक बधाई के पात्र हैं।.....

                              शशांक मिश्र भारती, दुबौला-रामेश्वर-262529, पिथौरागढ़ (उ.खण्ड)

                              ...सुन्दर आवरण व सामग्री संयोजन अपना प्रभाव छोड़ने में समर्थ है। आपका परिश्रम रचनाकारों की उत्कृष्ट सामग्री अंक को पठनीय-संग्रहणीय बनाने का कार्य करती है। पत्रिका के लघुकथा, अनवरत-1, कथा-कहानी, आहट, कविता के हस्ताक्षर, कथा प्रवाह, अनवरत-2 स्तम्भ अपने अनूठे संयोजन, रचनाकर के व्यक्तित्व व कृतित्व से परिचय कराने पर महत्वपूर्ण बन गये हैं। रचनाधारित चित्र उसको प्रभावपूर्ण बनाने का कार्य करते हैं। चित्रांकन-लेखकों की जितनी प्रशंसा की जाए, कम है।.....

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                            7. अंक 9, सितम्बर 2011 पर देर से प्राप्त पत्र

                              डॉ. सतीश दुबे, 766, सुदामानगर, इन्दौर-45200 (म.प्र.)
                              .....अविराम का प्रकाशन सही मायनों में साहित्य के प्रति समर्पण है। अपने स्तर पर पत्रिका-प्रकाशन और निःशुल्क वितरण, मेरे ख्याल से ऐसी मिसाल के लिए किसी अन्य पत्रिका का उल्लेख करने के लिए शायद गहन स्तर पर शोध करना पड़े। विशेष यह कि आपने पत्रिका के स्तर को बनाए रखने के लिए कोई समझौता नहीं किया। यही नहीं साहित्य-जगत का बड़ा वर्ग न केवल पत्रिका का अपितु आपके व्यक्तित्व का भी प्रशंसक है। सितम्बर अंक में आपने ‘लघुकथा के स्तम्भ’ में बिना किसी व्यक्तिगत व्यामोह के विशिष्ट सामग्री प्रस्तुत की है। निश्चित रूप से नई पौध के लिए यह उपयोगी साबित होगी।.....

                              देवी बी नागरानी, 9-डी, कॉर्नर व्यू सोसाइटी,15/33 रोड, बान्द्रा(वेस्ट), मुम्बई-400050(महा.)
                              .....एक पूर्ण साहित्य आभा से दमकते संकलन में डॉ.सतीश दुबे की लघुकथाएं मन को छू गईं। भगीरथ परिहार की सुपारी, न्याय व्यवस्था के सामने तक सवाल!! श्री रामेश्वर काम्बोज हिमांशु जी का ‘सात सुरों की सफल साधना’ एक विशिष्ट रुचिकर लेख सम्प्ूर्ण छन्द रचना के साथ संग्रहणीय है। सोने पे सुहागा रहा डॉ. हरदीप कौर संधू का ‘एक जन्म में सात जन्मों का जीना’।....राधिका का आलाप- ’मैं नहीं हारा/है सााथ न सूरज/चांद न तारा’। ‘चन्दनमन’ हाइकू संकलन की समीक्षा नेट पर पढ़ी थी। यह हाइकु सिल्प को एक मंच देने के लिए खास बधाई।...

                              वासुदेव रंगवाला, जिन्दल फॉइल एवं फ्लाक, 53, ब्रिजवे कॉलोनी एक्स. तिरुपुर-641607 (त.ना.)
                              .....एक अहिन्दी भाषी राज्य में इस प्रकार की साहित्यक पत्रिका प्राप्त बहुत खुशी होती है। हमारे यहां हिन्दी की पत्रिकाएं किसी भी बुक स्टाल पर नहीं मिलतीं। आपकी पत्रिका में कविता, कथा, कहानियां आदि पढ़कर बहुत अच्छा लगा। आपके सराहनीय सम्पादन को तारीफ के लायक है। पत्रिका बहुत अच्छी है।...

                              कमल कपूर, 2144/9, फरीदाबाद-121006(हरियाणा)
                              .....सदानीरा पतितपावनी निर्मल गंगा जी की लहरों का परस कर मानो आपकी सुन्दर-सौम्य एवं सार्थक पत्रिका ‘अविराम’ मिली। अपनी गुणवत्ता के कारण मन भा गई। मात्र एक कम 70 पृष्ठों पर आप जो श्रेष्ठ से श्रेष्ठ दे सकते थे, आपने दिया। लघुकथाओं का स्तर अति ऊँचा है। डॉ. सतीश दुबे, भगीरथ परिहार, विक्रम सोनी की तमाम लघुकथाएँ तो श्लाघनीय हैं ही, शेष लघुकथाएँ भी स्तरीय और समय की मांग की पूर्ति सी हैं। ‘कथा प्रवाह’ में आद. सूर्यकान्त नागर सहित सब लेखकों ने लघुकथा के मर्म को पकड़ा है। काव्य पक्ष भी सरस है और काव्य की लगभग सभी विधाओं को समेटे हुए है।....

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