आपका परिचय

मंगलवार, 22 मई 2012

डॉ. तारिक असलम ‘तस्नीम’ जी की प्रख्यात साहित्यकार डॉ. सतीश दुबे जी से एक लम्बी बातचीत


अविराम  ब्लॉग संकलन :  वर्ष : 1, अंक : ०8, अप्रैल-मई  2012 


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 डॉ. तारिक असलम ‘तस्नीम’ जी की  प्रख्यात साहित्यकार डॉ. सतीश दुबे जी से एक लम्बी बातचीत 


{डॉ. तारिक असलम ‘तस्नीम’ जी ने प्रख्यात साहित्यकार डॉ. सतीश दुबे जी से एक लम्बी बातचीत की। इसमें डॉ. दुबे जी ने एक ओर अपने व्यक्तिगत लेखन के प्रेरणादायी स्रोत-बिन्दुओं पर प्रकाश डाला है, वहीं दूसरी ओर उन्होंने लघुकथा लेखन और आन्दोलन से जुड़े तथ्यपरक एवं कुछ निराशाजनक पहलुओं को भी स्पष्ट किया है। कहानी के सापेक्ष लघुकथा में होने वाली चूक को भी उन्होंने साफगोई से स्पष्ट किया है। इस बातचीत का एक अन्य पहलू यह है कि समाज के सरोकारों के पूरा होने में साहित्य किस तरह भूमिका निभाता है, और ऐसा होने पर तमाम पुरस्कारों/सम्मानों से परे रचनाकार को अपने श्रम की सार्थकता से किस तरह ऊर्जा और उत्साह मिलता है, डॉ. दुबे साहब ने अपने कुछ उदाहरण देकर स्पष्ट किया है। यह साक्षात्कार अविराम साहित्यिकी के जनवरी-मार्च 2012 के मुद्रित अंक में प्रकाशित किया गया था।


लघुकथाकार समय, समाज और यथार्थ को महत्व नहीं दे रहे / डॉ. दुबे



डॉ. सतीश दुबे 
डॉ. तारिक 


डॉ. तारिक :  आप एक लम्बे समय से साहित्य सृजनरत हैं, किन्तु आपके लेखन की वजहें कौन सी हैं? प्रेरणा स्रोत कौन रहे? हमें बताना चाहेंगे?
डॉ. सतीश दुबे :  जन्म देने के पश्चात माँ मुझे छोड़कर कब चली गई, पता नहीं। माँ कैसी थी, यह जिज्ञासा या बचपन में माँ की गोद नहीं मिलने की टीस अब तक कायम है। मैंने अपनी इसी व्यथा को अपने दूसरे लघुकथा संग्रह के समर्पण में ‘‘जन्मदात्री तुम कैसी थी?’’ शब्दों में व्यक्त कर, जीवन के सूनेपन की लम्बी कहानी व्यक्त की है। बहरहाल, माँ के प्यार-दुलार से वंचित बचपन पिताजी, जिन्हें प्रथम लघुकथा-संग्रह ‘‘सिसकता उजास’’ समर्पित कर लघुकथा-संसार में अपनी उपस्थिति दर्ज कराई, की दोहरी जिम्मेदारी में बीता। वे पैतृक कस्बा हातोद छोड़, जागीरदार की मिल्कियत वाले मालवा के ही एक गाँव फुलान में दीवान थे। हमारे क्वार्टर के सामने लम्बे-चौड़े परिसर में जागीरदार की विशाल कोठी थी। यह स्वतन्त्रता संग्राम के अंतिम वर्षों का समय था, संभवतः इसलिए जागीरदार-परिवार इन्दौर की ‘सन्तोष कुटी’ में शिफ्ट हो गया था। समझ के कपाट और आँखें खुलने वाले बचपन को इस क्षेत्र में रहते हुए जो देखने को मिला, वह था- गाँवों की संरचना, वहाँ के लोग, अभाव, गरीबी, अशिक्षा, अंधविश्वास, आस्था, प्रकृति के उपादानों के साथ ही जागीरदारी के उपयोग हेतु कौड़ी मूल्यों में तुलते घी के डिब्बे, अहलकारों के लिए लकड़ी चीरते, कंडील चिमनी साफ करते छोटे गरीब किसान-मजदूर और कर्ज नहीं चुका पाने की स्थिति में, सरे बाजार हरी किमड़ियों से पीटे जाते थरथराते कर्जदार...।
    बालमन पर गहरा असर डालने वाले ऐसे प्रसंगों, दृश्यों, घटनाओं और पात्रों ने लेखन के लिए कलम थामने पर उनके अर्थों को परिभाषित करने का अवसर दिया। प्रेरणा के इन स्रोत बिन्दुओं ने जहाँ विषय दिए वहीं पिताजी के आध्यात्मिक-लेखन ने लेखकीय-संस्कार। छः वर्ष की वय में इन्दौर आने पर, घर आने वाली पत्र-पत्रिकाओं को पढ़ने का अवसर मिला। और यूँ पत्रिकाओं से पुस्तकों की ओर रुझान बढ़ा। बांग्ला उपन्यास अनुवाद माध्यम से पढ़े और इसके साथ ही प्रेमचंद, यशपाल और उनकी परम्परा के लेखकों को।..... मेरे खयाल से इस अपर्याप्त को ही पर्याप्त मान लेना चाहिए।


डॉ. तारिक :  मूलतः आप किस विधा में लेखन करते हैं और क्यों?
डॉ. सतीश दुबे : मैं लेखन को शब्दों की आराधना मानता हूँ,  इसीलिए अपनी अभिव्यक्ति के लिए मैंने किसी विधा-विशेष की बागड़-बंदी नहीं की। लेखन का स्वरूप अन्तर्वस्तु के अनुरूप हो, यह कोशिश रहती है। दरअसल हकीकत तो यह है कि मैं लिखता नहीं हूँ, बल्कि अपने ही इर्द-गिर्द का जीवन, उससे जुड़े लोग, देखे-भाले अप्रत्याशित या संभावना-सोच से परे अनुभव मुझे लिखने को मजबूर करते हैं। मैं चाहता हूँ मेरा लेखन मनुष्य-जीवन और अपने समय के यथार्थ से सम्बद्ध हो।
  ऐसे विषय जो सोच के पर्दे पर उभरकर लुप्त हो जाते हैं, जिनसे व्यक्ति, समय या परिस्थितियों के चरित्र या स्थितियों को उस क्षण-विशेष की घटना, भाव या विचार के माध्यम से जानने का अवसर मिलता है तब मैं लघुकथा केा अपनी रचना प्रक्रिया के सच्चे साथी की तरह याद करता हूँ और इसी सन्दर्भ में विस्तृत फलक की जरूरत होने पर कहानी तथा उपन्यास को।


डॉ. तारिक :  आप लेखन के साथ 1981 से अनवरत एक दशक तक प्रकाशित लघुकथा की सम्पूर्ण पत्रिका (लघु) आघात से बतौर प्रधान सम्पादक जुड़े रहे हैं। उस समय और वर्तमान की लघुकथाओं में क्या अन्तर महसूस करते हैं?
डॉ. सतीश दुबे  :  सामान्यतः कुछ नहीं। वही पुरानी ढपली और राग। जीवन और समय में जिस तेजी के साथ बदलाव आ रहा है, उस रफ्तार की चौखट पर खड़ी लघुकथा अपने नये स्वरूप की प्रतीक्षा कर रही है। आज अनेक समस्याएँ हमारे सामने प्रकट रूप में उपस्थित हैं, फिर क्यों वो विचार और कल्पनाएँ लघुकथाओं में नहीं मिलती जो इसे दूसरी विधाओं के समक्ष चुनौती रूप में रख सकें।
   लघुकथा संसार चुप है, ऐसा नहीं। सुकेश साहनी/रामेश्वर काम्बोज, लघुकथा डाट काम के जरिए, पंजाबी पत्रिका ‘मिन्नी’, अ.भा. प्रगतिशील लघुकथा मंच पटना, अ.भा. लघुकथा परिषद, जबलपुर प्रतिवर्ष अ.भा. स्तर के लघुकथा सम्मेलन आयोजित कर तथा डॉ. कमल चौपड़ा वार्षिकी ‘संरचना’ प्रकाशन के माध्यम से इसी सन्दर्भ में प्रयासरत हैं। किन्तु इन प्रयासों के वैचारिक मंथन को ‘‘फालोअप’’ करने के लिए समर्पित रचनाकारों के चेहरे सामने नहीं आते। परम्परागत उत्सवधर्मिता ‘‘चैटिंग-इटिंग’’ तथा लेखकीय अहंतुष्टि की भावना से परे जरूरी है कि रचनाधर्मी या विधा के लिए कुछ कर गुजरने की सोच रखने वाली हस्तियाँ इस ओर पहल करें। पंजाबी-हिन्दी भाषायी सेतु ‘मिन्नी’ के वार्षिक सम्मेलन के अन्तर्गत रात्रिकालीन तीसरे सत्र में लघुकथा पाठ, उस पर आलोचनात्मक टिप्पणी तथा विधा में नए आयाम पर विचार विमर्श का आयोजन होता है। वैसे निरन्तर प्रयास हिन्दी भाषी क्षेत्र में होना चाहिए। तमाम ऐसी अन्य बातों के साथ महत्वपूर्ण यह है कि रचनाकार, कथा-विधा की धारा का प्रवाह जिस रूप में जारी है, उसका सूक्ष्म अवलोकन कर स्वयं अपने अन्दर कार्यशाला आयोजित कर लघुकथा-सृजन को सतही नहीं, गम्भीरता से ले तथा नए सृजनात्मक आयाम प्रदान करे। हाँ, और अंत में यह कि पिछले दशक में नए-पुराने कई लघुकथा-लेखकों की ऐसी रचनाएँ निश्चित आई हैं, जिन्हें आप अपने प्रश्न की तसल्ली के लिए देख सकते हैं। 


डॉ. तारिक :  वर्तमान समय में लघुकथा-लेखन के समक्ष कौन-सी चुनौतियाँ मौजूद हैं? वे सब जो वर्षाें से चली आ रही हैं। कृष्ण कमलेश ने इस विधा के लिए अनेक प्रयास किये थे, जिन्हें भुला दिया गया है। क्या यह उचित है?
डॉ. सतीश दुबे :  इस सन्दर्भ में कृष्ण कमलेश के साथ ही जगदीश कश्यप, रमेश बतरा, महावीर प्रसाद जैन जैसे मस्तिष्क में उभरने वाले नाम हैं। नींव के इन नायकों को भुलाया नहीं, इग्नोर किया जा रहा है और उनके स्थान पर अपनी कलम से स्वयं के लिए वरिष्ठ/प्रख्यात पुरोधा जैसे विशेषण जोड़ने वालों की स्थापना मुहिम जारी है।
    प्रसंगवश, इन नामों के साथ ‘कामों’ पर टिप्पणी करने का अर्थ होगा, किसी ख्यात व्यक्ति की वजह को याद करना। कृष्ण कमलेश वह शख्सियत है जिसने सातवें दशक में ‘अन्तर्यात्रा’ निकालकर लघुकथा-लेखन का माहोल बनाया, ‘कथाबिम्ब’ तथा ‘युगदाह’ के लघुकथा विशेषांक कमलेश के अनुभवों की ही देन हैं, लघुकथा के मुत्तालिक उनकी अनेक विशेष टिप्पणियों को देखा जाना इतिहास से गुजरना है। शकुन्तला किरण को लघुकथा पर शोधकार्य तथा पुष्पलता कश्यप को आलेख तथा लघुकथा लिखने की प्रेरणा इसी शख्स से मिली। एकल लघुकथा संग्रह की परम्परा में मेरे ‘सिसकता उजास’ के बाद कृष्ण कमलेश का ‘मोहभंग’ आया, फ्लैप पर जिसकी भूरि-भूरि प्रशंसा, विष्णु प्रभाकर जी ने की। जगदीश कश्यप की व्यक्तिगत नकारात्मक भंगिमा को नजरअंदाज कर उन कार्यों को याद करना चाहिए, जो उन्होंने लघुकथा की विधागत स्थापना के लिए मृत्युपर्यन्त किए। पुरानी पोथियों को खगालकर वैदिक-काल से आठवें दशक तक लघुकथा के विकास का इतिहास सर्वप्रथम जगदीश कश्यप ने लिखा। कालांतर में इस प्रकार के कार्यों को इसी की छवि माना जाना चाहिए। ‘मिनीयुग’ पत्रिका के लघुकथा स्तम्भ पर विशेष टिप्पणियों के साथ रचनाकार-रचना की प्रस्तुति, महावीर जैन को साथ में लेकर ‘समग्र’ लघुकथा-विशेषांक का सम्पादन, कालान्तर में विशेषांक की सामग्री को ‘छोटी-बड़ी बातें’ शीर्षक से पुस्तकाकार में प्रकाशन, पुस्तक की संकलित कुछ लघुकथाओं पर लघुकथा-लेखकों से इतर अवध नारायण मुद्गल की टिप्पणियाँ, जैसी योजनाओं को अंजाम देना इनकी विशेष देन है। जगदीश कश्यप जितने अच्छे लघुकथा-समालोचक रहे उतने ही रचनाकार। इस सन्दर्भ में उनके संग्रहों को देखा तथा उनका मूल्यांकन किया जाना चाहिए। श्रेष्ठ लघुकथाओं को प्रकाश में लाने के लिए उनकी सजगता को उनके सम्पादन में हाल ही में प्रकाशित संकलन ‘बीसवीं सदी की लघुकथाएँ’ में देखा जा सकता है। लघुकथा आन्दोलन की प्रथम पंक्ति में रमेश बत्तरा का नाम सम्मान के साथ लिया जाता है। रमेश भाई ने कथ्य और्र िशल्प के स्तर पर लघुकथा को नई भंगिमा प्रदान करने के साथ ‘सारिका’ के उपसम्पादक के नाते लघुकथा को विस्तृत आकाश प्रदान किया। किसी बड़ी पत्रिका के नकचढ़े ’उपो’ की अपेक्षा उन्होंने सहज भाव से देश के समस्त श्रेष्ठ रचनाकारों से समय-समय पर व्यक्तिगत सम्पर्क स्थापित कर उनकी लघुकथाओं को ‘सारिका’ में स्थान दिया। वे ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने मैत्रीभाव से अधिक रचनाभाव को महत्व देने की परम्परा कायम की। लघुकथा की रचनात्मकता पर टिप्पणियाँ, लघुकथा-आयोजनों, गोष्ठियों आदि से सम्बन्धित रपट का नियमित प्रकाशन तथा लघुकथा को हाशिए की अपेक्षा सम्मानजनक स्थान ‘सारिका’ में देकर अन्य पत्रिकाओं के समक्ष मिसाल कायम की। ‘सारिका’ का लघुकथा विशेषांक निकाले जाने सम्बन्धी कमलेश्वर जी की मंशा को रमेश बत्तरा ने अंजाम दिया। इस विशेषांक में लघुकथा-विषयक सामग्री तथा शताधिक लघुकथाएँ प्रकाशित कर, साहित्य और पाठकों के खेमों को कथा विधा की इस सबसे छोटी सहचरी की शक्ति और अहमियत से परिचित कराया।


डॉ. तारिक :  अभी जो लघुकथाकार हैं, वे ही लघुकथा की आलोचना-समीक्षा का भी निर्वाह कर रहे हैं, फलतः वे जिसे चाहते हैं उसकी रचना को श्रेष्ठ, कालजयी और विभिन्न उपाधियों से विभूषित करने में नहीं चूकते, जबकि उनकी रचनाएँ ही रचनात्मक-स्तर पर अनेक खामियों से भरी होती हैं। इस सम्बन्ध में आप क्या कहेंगे?
डॉ. सतीश दुबे :  लघुकथा विधा से सम्बद्ध प्रत्येक समर्पित सृजनधर्मी इस प्रवृत्ति से आहत है। अभी नहीं, यह सब लघुकथा को पाठक एवं साहित्य-जगत से विधा का विशिष्ट दर्जा प्राप्त होने के बाद से जारी है। मैंने इस मुद्दे पर इन्दौर से प्रकाशित ‘नई दुनियां’ में एक आलेख लिखा था- ‘लघुकथा को दरकार है तटस्थ समीक्षकों की’। क्या इस मनोवृत्ति से लघुकथा के विकास और रचनात्मक-स्वरूप का सही मूल्यांकन हो रहा है? आप हम कुछ कहें, इसकी बजाय लघुकथा के ‘रामचन्द्र शुक्लों’ ने आत्ममंथन के जरिए स्वयं तय करना चाहिए। मैं अनुभव कर रहा हूँ कि क्षेत्रीयता ही नहीं, क्षेत्रीयता में भी छोटे-छोटे द्वीप बने हुए हैं, बन रहे हैं।
    इस लेखन से जुड़ने वाले किसी भी उम्र के कुछ नए रचनाकार, गुणात्मक तथा निरंतर सृजन की अपेक्षा, विधा में अपनी स्थापना के लिए जोड़-तोड़ में जुटे हुए हैं। बाजारवादी सूत्रों को अपनाकर कम पूँजी में अधिक लाभ की नीति इन्हें मानक हस्ताक्षर तथा रचनाएँ उद्धरणीय बनने लगी हैं। नए-पुराने ऐसे पुरोधाओं के प्रशस्ति गान में लघुकथाकार-समीक्षक ही नहीं अकादमिक विद्वान भी सम्मिलित रहे हैं।
   मेरे अर्न्तमन की पीड़ा से निःसृत इस टिप्पणी का आशय व्यक्ति या व्यक्तियों की ओर नहीं, प्रवृत्ति की ओर संकेत करना है। लघुकथा विधा के लिए समर्पित हर सृजक इस मुद्दे पर गहरे से सोचे, यह अपेक्षा करना गैर-मौजूं नहीं होगा। इस मुद्दे पर गहरे से चिन्तन करना इसलिए ज़रूरी है कि आज लघुकथा संसार बहुत व्यापक है। उस संसार की चौकस-दृष्टि के मद्देनज़र समालोचक अपनी लेखकीय-नीति निर्धारित करें। संदेश यह जाना है कि लघुकथा के हर पक्ष में गहराई और सोच में तरलता है। समालोचक विधा का निर्माता माना जाता है, इसलिए उसकी छवि निर्माणकर्ता की हो, विध्वंसक की नहीं।


डॉ. तारिक :  आपकी दृष्टि में लघुकथा में किन-किन तत्वों का होना अनिवार्य है? ऐसे कुछ लेखकों के नाम बताइए, जिनकी रचनाएँ आपको पठनीय लगती हैं।
डॉ. सतीश दुबे :  लघुकथा, कथा विधा का संक्षिप्त-अभिव्यक्ति माध्यम है। ज़रूरी है कि इसकी सम्प्रेषणीयता, कथा का आस्वाद कराए। रचनाकार की शैली-क्षमता तय करती है कि कथ्य के अनुरूप गठन कैसे किया जाय। जाहिर है लघुकथा में कथ्य प्रमुख है और उसके अनुरूप पात्र, भाषा-शैली, संवाद, चरित्र-चित्रण तथा उद्देश्य।
   अब तक कई लघुकथाएँ पढ़ी हैं। अनेक रचनाकर इसमें निरन्तर सृजन कर रहे हैं। नए लोग जिनसे पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से रू-ब-रू होने का अवसर मिलता है, लघुकथा को वे सतही नहीं गम्भीरता से ले रहे हैं। ऐसे माहोल में ‘कुछ लेखकों’ के नाम गिनाना मुश्किल है।


डॉ. तारिक :  कुछ लोग अपने आलेखों में अपने मित्रों और शुभचिन्तकों के नाम गिनाने में खासे व्यस्त हैं। उनकी नज़र में वे ही महान हैं? इस बारे में क्या कहना चाहेंगे?
डॉ. सतीश दुबे :  यदि ऐसा है तो इसे साहित्यिक-धर्म नहीं, ‘अहो रूपं अहो ध्वनि’ की कूपमंडूक मानसिकता से ग्रस्त साहित्य का बाजारवादी राजनीतिकरण माना जाना चाहिए।
डॉ. तारिक: आप लघुकथा के अलावा, कहानी, उपन्यास, बच्चों तथा नव-साक्षरों के लिए पुस्तको के साथ कविताएँ भी लिखते रहे हैं। इस उम्र में भी यह कैसे संभव हो पाता है?
डॉ. सतीश दुबे: लेखन से मेरे जीवन को ऊर्जा और शक्ति मिलती है। इसे खुदा की देन ही मानिए कि हर विधा में चलाई कलम सार्थक साबित हुई है। मित्रों, अग्रजों तथा पाठकों से मिलने वाली सराहना हर लेखक की तरह मेरे लिए भी हमेशा प्रेरक रही है।
    लेखक की कोई उम्र नहीं होती। हकीकत तो यह है कि आगे बढ़ने की बजाय हर उम्र का काफिला मेरे दिल में ठेठ अन्दर पड़ाव डाले पड़ा है। उससे मुझे हर प्रकार के लेखन में सहायता मिलती है। मेरी इच्छा है मस्तिष्क और उँगलियों के यथावत चलते रहने तक मैं लिखता रहूँ। जब कभी मन मायूस होने लगता है, अन्तर्मन की आवाज पूरे शरीर में हलचल मचाकर कहने लगती है- ‘खुदी को कर बुलन्द, इतना कि-/हर तदबीर से पहले/खुदा भी पूछे कि-/ बंदे बता तेरी रज़ा क्या है!’


डॉ. तारिक :  आपने कई विधाओं में सक्रिय लेखन किया है किन्तु सर्वाधिक संतुष्टि और सफलता किस विधा में मिलती है?
डॉ. सतीश दुबे :  सफलता हर विधा में और संतुष्टि कथा-विधा में।


डॉ. तारिक :  कुछ लोग लघुकथा को दोयम दर्जे का और कुछ हद तक चुटकुलों से अलग मानते हैं? बावजूद इसके हंस, नया ज्ञानोदय, पाखी से लेकर दैनिक समाचार-पत्रों में लघुकथाएँ छापते हैं? इससे वे क्या सिद्ध करना चाहते हैं?
डॉ. सतीश दुबे :  जाहिर है वे लघुकथा को दोयम दर्जे का नहीं, साहित्य का महत्वपूर्ण हिस्सा मानते हैं। आपने देखा होगा ये प्रतिष्ठित पत्रिकाएँ लघुकथा का सम्मान के साथ प्रकाशन ही नहीं, उन पर पाठकों से प्राप्त प्रतिक्रियाएँ भी प्रकाशित करती हैं। डॉ.शोभनाथ यादव मुंबई से प्रकाशित ‘प्रगतिशील आकल्प’, टैबलाइज्ड साहित्यिक पत्र में एक रचनाकार की लघुकथाएँ पूरे पृष्ठ पर सपरिचय प्रकाशित करते हैं। इन पत्र-पत्रिकाओं के इस अवदान की वजह से लघुकथा की रचनात्मकता पर उठने वाली उँगलियाँ अब लड़खड़ाने लगी हैं।


डॉ. तारिक : आपकी नज़र में आपकी बेहतरीन लघुकथाएँ और कहानियाँ कौन सी हैं? कुछ एक नाम बताइए।
डॉ. सतीश दुबे :  कहानियाँ : साबजी, लखमी संग सत्रह घण्टे, नंदीजी, औरत जो शिखर पर खड़ी थी, लोहांगी, दगड़ू, समर्पण, बूढ़ा रो रहा था, शून्य, सम्बन्धों के विरुद्ध, जीने के क्रम में, अंतहीन घाटियों से दूर, अंतर्मन से हंसने वाला आदमी, अहसास, महामारी, एक खुशबूदार लड़की, कटघरे, पत्थर पर फसल, अंडरस्टैण्ड, लवीश चाचाजी।
लघुकथाएँ : संस्कार, फैसला, योद्धा, वादा, अंतिम सत्य, सल्तनत कायम है, शैतान, अहसास, बंदगी, विनीयोग, पासा, भीड़, रीढ़, पाँव का जूता, शिनाख्त, तलाश, भीड़ में खोया आदमी, रिश्तों की सरहद, सुहाग का चूड़ा, शिष्यत्व, फीनिक्स, फैसला, झंझट, जल्लाद, बंदगी, कागज की आग, बाबूजी, नश्तनू, आकांक्षा, बौना आदमी, संजीवनी, अतिथि, चौखट, बहिष्कार, बर्थ डे गिफ्ट, बरकत, जिन्दगी, क्यों, ड्रेस का महत्व, बहुरुपिए, धरमभाई, गब़रू चरवाहा, अर्थ, दिन, स्टैच्यू, धर्मनिरपेक्षता, पेड़, तपस्वी, जाजम, एषणा, अनुभव, कौए, रिटायरमेन्ट, फूल। (सन् 2011 में प्रकाशित ‘बँूद से समुद्र तक’ में संकलित 21 वीं सदी की लघुकथाएँ इसमें सम्मिलित नहीं हैं।)


डॉ. तारिक  : आज जिस तरह की लघुकथाएँ और कहानियाँ लिखी जा रही हैं, क्या वे आपने समय और समाज को सही अंदाज में पेश करने में समर्थ हैं? यदि नहीं तो क्यों?
डॉ. सतीश दुबे : प्रत्येक रचनाकार अपने परिवेश और अनुभवों से सामान्य से इतर कथ्य बटोरकर उसे रचनात्मक आकार देता है। तय है हर लेखक की सूक्ष्म दृष्टि अर्न्तवस्तु का बीज रूप में चयन करती है। बावजूद इसके बदलाव की दस्तक से समूचा भू-भाग समान रूप से प्रभावित होता है। यह बदलाव ही अपने समय का यथार्थ है।
   लेखक और पाठक के नाते आप महसूस कर रहे होंगे आज अपने समय के समाज से जितना कहानीकार जुड़ा है, उतना लघुकथाकार नहीं। कहानी के बीज को चुनने से पल्लवित करने की प्रक्रिया में कहानीकार को गम्भीरता बरतनी होती है। आज जो कहानियाँ आ रही हैं, उनमें लेखक का आज का अपना समय है। किन्तु अधिकांश लघुकथाकार, लेखन को गम्भीरता की अपेक्षा सतही-सपाट रूप में ले रहे हैं। उनके विषय अपने हैं पर उनमें ताज़गी नहीं है। शायद वे समय, समाज और यथार्थ जैसे शब्दों को उतना महत्व नहीं देते, जितने स्कोर बनाने वाले फटाफट लेखन को।


डॉ. तारिक :  लेखन के प्रारम्भिक दौर में आपने किस विधा को तरजीह दी थी... और क्यों?
डॉ. सतीश दुबे : मेरे लेखन की पारी व्यंग्य से शुरू हुई, जिसे आज भी विधा का दर्जा प्राप्त नहीं है। बचपन में पिताजी की चौपाल-कचहरी में कई प्रकार के लोग आया करते थे। किसी प्रकरण के बहस-मुबाहिसों के दौरान अपने पक्ष की पुष्टि के पारस्परिक तर्कों में कार्य-व्यापार या व्यक्ति चरित्रगत विसंगतियों पर जिस सेंस ऑफ ह्यूमर मिश्रित भाषा-बोली का इस्तेमाल होता था उसमें चोट करने वाला व्यंग्य या हास्यपुट से भरपूर चुटकियाँ होती थीं। एक ओर बैठे हुए यह सब सुनते हुए मुझे बड़ा आनन्द आता था। इस आनन्द में निश्चित व्यंग्य की मारक क्षमता से साक्षात्कार का भाव छिपा होता था। इन्दौर में पढ़ाई कर रहे मझले भाई साहब के पास आने पर यह महौल मुझे पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से मिला। भाई साहब को पत्र-पत्रिकाएँ पढ़ने का शौक था। इसी के तहत मुझे गोपाल प्रसाद व्यास की कविताएँ, श्यामसुन्दर व्यास का व्यंग्य संग्रह ‘गिलिट के झुमके’ कृष्णचन्दर के ‘गधे की दोनों आत्मकथाएँ’, हरिशंकर परसाईं और शरद जोशी की फुटकर रचनाएँ पढ़ने को मिली।
   और लिखने की मनःस्थिति बनते ही सबसे पहले व्यंग्य पर कलम चलाई। 1960 में नोंकझोंक, सरिता और जागरण में कुछ महीनों  के अन्तराल से व्यंग्य रचनाएँ प्रकाशित हुई। इसके बाद रामावतार चेतन की पत्रिका, साप्ताहिक हिन्दुस्तान तथा अन्यत्र प्रकाशन शुरू हुआ। यही वह समय था जब मैंने सर्वप्रथम व्यंग्य के धरातल पर लघुकथा के प्रारूप को तराशने की कोशिश की।
   इस शहर से प्रकाशित साप्ताहिक ‘लाल भारत’ में अस्सी के अंतिम दशक के कुछ वर्षों तक तत्कालीन स्थितियों पर ‘राम झरोखा बैठिके सबका मुजरा लेय’ स्तम्भ से जुड़ने का मौका मिला। कालांतर में व्यवस्थित व्यंग्य लेखन भले ही छूट गया हो, लेकिन मेरे हर प्रकार के कथा-लेखन में अन्तर्धारा के रूप में आज भी मौजूद है और इसे मित्रों तथा पाठकों के साथ मैं अपने लेखन की शक्ति मानता हूँ।


डॉ. तारिक : आपने हिन्दी-साहित्य जगत को जिस रूप में सेवाएँ दी, उस अनुपात में आपको मान-सम्मान और पुरस्कार से सम्मानित नहीं किए जाने के क्या कारण रहे?
डॉ. सतीश दुबे :  तस्नीमजी, मान-सम्मान और पुरस्कार इन तीन शब्दों ने साहित्य जगत में ऐसे अशुभ मुहूर्त में प्रवेश किया कि इनकी वजह से पूरा वातावरण विषैला हो गया। साहित्य की धूमिल छवि, लेखकों के बीच खांचेबन्दी, खरीद-फरोख्त आदि अनेक विसंगतियां इन्हीं की देन है। यह तय है कि सम्मान यदि योग्य सृजक को उसके विशिष्ट अवदान के लिए दिया जाता है तो इससे सम्मान और सम्मानित किए जाने वाले सृजनधर्मी का गौरव समाज में बढ़ता है। किन्तु यदि सम्मान तुष्टि नीति के तहत चित्रा मुग्दल के शब्दों मेें ‘तू मेरी पीठ खुजाल, मैं तेरी पीठ खुजालूँ’ की तर्ज पर दिया जाता है तो इससे पुरस्कार और सम्मान दोनों लांक्षित होते हैं।
   मैने अपने को इस मैराथन दौड़ से हमेशा बचाए रखा। जो और जैसा भी मिला, वह मान-सम्मान पुरस्कार को सही अर्थ में परिभाषित करने वाला मिला। बिना किसी एषणा के यदि लेखन निष्ठा, आस्था, समर्पण भाव से किया जाय तो उसका मूल्यांकन बिना किसी पहल या सम्पर्क के विशिष्ट अंदाज में पुरस्कार सम्मान से बढ़कर कैसे होता है यह मैंने अनुभव किया।


डॉ. तारिक :  जैसे?
डॉ. सतीश दुबे : जैसे जामिया इस्लामिया विश्वविद्यालय, नई दिल्ली द्वारा ‘जामिया प्रेमचंद अभिलेखागार तथा साहित्य केन्द्र’ की स्थापना के बाद प्रेमचंदजी पर लिखे गए मेरे प्रकाशित-अप्रकाशित शोध-प्रबन्ध को विशिष्ट दर्जा देकर केन्द्र में रखने का निदेशक मोहतरमा सबिहा अंजुम जैदी का आग्रह करना। सच मानिए जिस दिन मुझे सबिहाजी का फोन आया, मैं आश्चर्यचकित था कि 1971 में सम्पन्न मेरे कार्य और फोन नम्बर की जानकारी उन्हें कहाँ से और कैसे मिली! यही नहीं बाद में उन्होंने प्रेमचंद पर मेरे आलेख तथा ‘वरदान’ उपन्यास के मझगांव की खोज सम्बन्धी फोटो के साथ मेरा साहित्य भी केन्द्र में संग्रहीत या डिसप्ले करने के लिए व्ही.पी.पी. द्वारा बुलवाया।
   इसी प्रकार मई 2010 में मुम्बई के विदेश एंटरटेनमेंट की प्रोड्यूसर नीतू जोशी की मोबाइल कॉल आई कि ‘वे पिछले दिनों अपनी ‘‘यक्ष’’ फिल्म के प्रोमो के लिए जब इन्दौर आईं थीं तब उन्हें मेरी किताब ‘डेरा बस्ती का सफरनामा’ हाथ लगी। उसे उन्होंने पूरा पढ़ा तथा वे इसकी कथावस्तु पर फिल्म बनाने के लिए मिलना चाहती हैं।’
   मालवा के 150 किलोमीटर भू-भाग के 75 गांवों के रहवासी बाँछड़ा जरायमपेशा समाज में माँ द्वारा कोखजाई पहली बेटी को समाज के बाहर प्रथा के अन्तर्गत रस्म अदायगी के बाद बेचना तथा ग्राहक द्वारा छोड़ दिए जाने के बाद देह-व्यापार में लिप्त होना जैसी हकीकत से भरी प्रामाणिक कथावस्तु पर ‘भुनसारा’ टाइटल से फिल्म बनी तथा विरोध के बावजूद प्रदर्शित हुई।
   उपन्यास साहित्य जगत में तो चर्चा में था ही, फिल्म के कारण इसे अधिक प्रचार-प्रसार मिला। धीरे-धीरे मीडिया का ध्यान इस प्रथा बनाम देह-व्यापार की ओर गया तथा विरोध के स्वर उभरने लगे। ‘इण्डिया टुडे’ ने 30 मार्च 2011 अंक में ‘देह व्यापार के कबीले’ शीर्षक से कव्हर-स्टोरी में विस्तार से लिखा तथा ‘मेहमान का पन्ना’ में बतौर उपन्यासकार इस बिषय पर लिखने के लिए मुझसे आग्रह किया। नतीजतन, प्रशासन को हरकत में आना पड़ा तथा डेरों पर छापे पड़ने लगे। फलस्वरूप यह हकीकत सामने आई कि यह समुदाय अपनी ही नहीं, खरीद-फरोख्त कर दूसरी लड़कियों को भी इस घिनोने कृत्य में झोंक रहे थे और पूरा समुन्नत समाज चुप था। अपने उपन्यास की वजह से हुई इस मुहिम से मुझे लगा सचमुच साहित्य को ‘समाज का दर्पण’ या ‘समाज में बदलाव लाने का सशक्त माध्यम’ जैसी उक्तियाँ यूँ ही प्रचलित नहीं हैं।
   ‘हाँ, ऐसा ही वाक्या 40 वर्ष पूर्व भी हुआ था। निमाड़ अंचल के परिवेश-विशेष पर मैंने एक कहानी ‘पाप का सांप’ (‘धुंध के विरुद्ध’ में संकलित) लिखी थी। एक मजदूर-पेशा नारी की अस्मिता की पक्षधर इस कहानी के कथानक की जीवंतता और सम्प्रेष्य प्रभाविति की वजह से कहानी पढ़कर वहाँ के लोग हरकत में आ गए। अखबार की प्रतियाँ जलाना, लेखक के विरुद्ध प्रदर्शन, जान से मारने की धमकी, उच्चाधिकारियों से शिकायत, अदालत में मानहानि दावे के प्रयास, पंचायत में निंदा प्रस्ताव जैसी हंगामा भरी प्रतिक्रियायें कस्बेनुमा छोटे से गांव में कई दिनों तक जारी रहीं। दल-विभाजन से अप्रिय घटनाएँ न हो, इसलिए जैसे-तैसे प्रकरण शांत हुआ।
   बताइए एक रचनाकार के लिए इससे बड़ा, इससे भी बड़ा कोई सम्मान या पुरस्कार हो सकता है?


 डॉ. तारिक : कुछ लोगों का आपकी सफलता हजम नहीं होती, इसलिए वे आपको अहंकारी मानते हैं? इस सम्बन्ध में आप क्या कहना चाहेंगे? यह बात हाल ही में आपके शहर के एक लेखक ने कही है।
डॉ. सतीश दुबे : इस सम्बन्ध में मैं क्या कह सकता हूँ, यह तो अपना-अपना स्वभाव है। वैसे अपने तई मैं तो ऐसा नहीं सोचता। मेरे जीवन का तो उद्देश्य रहा है- ‘औरों को हंसते देख/हंसो और सुख पाओ/अपने सुख को विस्तृत कर लो/सबको सुखी बनाओ।’


डॉ. तारिक :  एक बार फिर पीछे की ओर लौटते हुए जानना चाहूँगा कि अपने दौर में लघु आघात और मिनी युग ने जो कार्य किए, इसे कोई दूसरी पत्रिका नहीं दोहरा सकी। इसकी वजह क्या है?
डॉ. सतीश दुबे : अपने स्तर पर पत्रिका निकालना ‘घर फूंक तमाशा‘ जैसा काम है। इसके लिए समर्पण, त्याग, लगन, संयम और धैर्य की जरूरत होती है। ‘सोच’ आत्मकेन्द्रित दायरे में सिकुड़ते जाने के कारण अब यह सब असम्भव सा लगता है। आपने देखा होगा सतीश दुबे, विक्रम सोनी या जगदीश कश्यप इन पत्रिकाओं से अपने चेहरे बचाते थे, उनका उद्देश्य था दूसरे चेहरे,, फिर वे रचनाकार से सम्बन्धित हों या विधा से, सामने आए। क्या आज ऐसा सम्भव है?
   मुझे खुशी है कि विपरीत माहौल के बावजूद पंजाबी में ‘मिन्नी’ तथा हिन्दी में ‘संरचना’ और ‘हमसफर’ के माध्यम से श्यामसुंदर अग्रवाल, कमल चौपड़ा तथा आप याने तारिक असलम ‘तस्नीम’ इस धारा को जारी रखने हेतु प्रतिबद्ध नज़र आ रहे हैं।



  • डॉ.सतीश दुबे: 766, सुदामा नगर, इन्दौर-9(म.प्र.)
  • डॉ. तारिक असलम ‘तस्नीम’: 6/2,हारुन नगर कालोनी, फुलवाशरीफ,पटना-5(बिहार) 

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