आपका परिचय

शुक्रवार, 29 जून 2012

अविराम विस्तारित


अविराम का ब्लॉग :  वर्ष : 1,  अंक : 10,  जून  2012  

।।हाइकु।।

सामग्री :  डॉ. सुधा गुप्ता, रामेश्वर काम्बोज हिमांशु, डॉ. श्याम सुन्दर दीप्ति,  डॉ. मिथिलेश दीक्षित, डॉ. उर्मिला अग्रवाल, डॉ. सतीशराज पुष्करणा, डॉ. अनीता कपूर, कमला निखुर्पा, सुभाष नीरव, डॉ. जेन्नी शबनम, डॉ. भावना कुँअर, मंजू मिश्रा, रचना श्रीवास्तव
, डॉ. हरदीप कौर सन्धु एवं  प्रगीत कुँअर के तांका।

(हाल ही में वरिष्ठ साहित्यकार श्री रामेश्वर काम्बोज हिमांशु एवं डॉ. भावना कुँअर के सम्पादन में 29 समकालीन कवियों का तांका संग्रह ‘भाव-कलश’ प्रकाशित हुआ है। इस बार इसी संग्रह से प्रस्तुत हैं पन्द्रह कवियों के चयनित तांका।)

डॉ. सुधा गुप्ता





1.
ढोनी पड़ती 
अपनी सलीब तो
हर किसी को
सिर्फ अपने काँधे
कोई बोझा न बाँटे
2.
कहाँ खो गए
शहदीले वे दिन
साँझ गुलाबी
घोर बियाबान में
भटकती उदासी
3.
आकाश गंगा
रेखांकन : बी मोहन नेगी 
मोतियों-भरी माँग
निशा रानी की
अलके लीं सँवार
अभिनव श्रृंगार।
4.
वासन्ती रात
चाँद सफ़र पर
साथ न कोई
निकला है अकेला
वो अलमस्त मौला
5.
वन तीतर
जंगल का डाकिया
बड़ा ही व्यस्त
रहता पुकारता
फिरे डाक बाँटता।




रामेश्वर काम्बोज हिमांशु





1.
सहज भाव
तिरती जाती पार
हल्की है नाव
भारी होती डूबती
खा लहरों की मार।
2.
आँसू के पीछे
इतिहास भी होगा
रुदन होगा
बीती मधु ऋतु का
कुछ हास भी होगा।
3.
जो-जो खो गया
कई बरस हुए
रेखांकन : शशि भूषण बड़ोनी 
कहीं धूल में,
वह मुझको मिला
खिलते हुए फूल में।
4.
दिल में छेद
बन बाँसुरी बहे
दर्द की नदी
समझेगा भी कौन
जीवन बना मौन।
5.
वक़्त निर्मम
उड़ा ले जाता खुशी
देकर ग़म
कई बरस बीते
नयन नहीं रीते।




डॉ. श्याम सुन्दर दीप्ति





1.
शीशा न देखूँ
ठीक लगे है सब
टूट जाता हूँ
शीशे को जब कभी
हल मैं सुनाता हूँ
2.
पढ़ना है तो
ज़िन्दगी की किताब
लिखना है तो
दर्द की तकदीर
दृश्य छायाचित्र : डॉ उमेश महादोषी 
पोंछे आँखों का नीर।
3.
वह बाँस ही
है बनता बाँसुरी
सीने पर जो
करवा कर छेद
छेड़े स्वर माधुरी





डॉ. मिथिलेश दीक्षित





1.
पके हैं डैने
थके नयन अब,
अकेला पंछी
थकित-व्यथित है
उड़ान भर-भर
2.
सदा चले हैं
थक न सके हम
आज तक भी,
ऊँचाई चढ़-चढ़
उड़ान भर-भर!
दृश्य छायाचित्र : डॉ उमेश महादोषी 
3.
मानव-तन
असीम शक्तिमय
प्रत्येक कण,
एक छोर संघर्ष
एक छोर उत्कर्ष!
4.
टाँक देती हूँ
क्षितिज पर एक
टाँका रोज़ ही,
जो कढ़ाई हो रही
आँक लेती रोज़ ही!





डॉ. उर्मिला अग्रवाल





1.
बोई मुस्कानें 
सींचा अश्रु-जल से
फल ये मिला
अश्रु नहाई हँसी
सागर-सी जिन्दगी।
2.
सागर तीरे 
रेत पे लिखा नाम
लहर आई
और लौट भी गई
मिले सब निशान।
3.
कभी निष्कम्प
कभी कँपकँपाती
दीपक की लौ
कितनी समानता!
ज़िन्दगी से इसकी।
4.
पलता रहा
रेखांकन : डॉ सुरेन्द्र वर्मा 
ऐसा अनाम रिश्ता
हम दोनों में
जिसे आज तक भी
कोई नाम न मिला।
5.
कभी होगा ये
खो जायेंगे सपने
रीतेगा मन
और लपेट लेंगे
निराशा के कुहासे।





डॉ. सतीशराज पुष्करणा





1.
रात में खिला
चाँद आसमान में
तेरा चेहरा
हँसते गुलाब-सा
नज़र आया मुझे।
2.
अच्छा हो वक़्त
रात भी होती भली
वरन् क्या कहें
दृश्य छायाचित्र : डॉ उमेश महादोषी 
दिन भी चुभता है
सुइयों की तरह।
3.
तुम नहीं थे
फिर भी न जाने क्यों
खुली आँखों में
दिखाई दिए तुम
जगह-जगह पे।

डॉ. अनीता कपूर





1.
बरसी घटा
पानी-पानी हुई मैं
बरसी घटा
उम्र के नभ खिला
दर्दीला इन्द्रधनुष
2.
बरसों बाद
हुई है मुलाक़ात
कांपे है मन
हँसी अधूरी नज़्म-
दृश्य छायाचित्र : डॉ उमेश महादोषी 
‘मुझे पूरा तो करो’
3.
टुकड़ा धूप
थामकर उँगली
सूरज की वो
सीढ़ियाँ अँधेरे की 
फिर उतर गया

कमला निखुर्पा





1.
आइना दिखा
बादलों को चिढ़ाए
कूदे पहन
मोतियों का लहँगा
झरना बन जाए।
2.
चंचल नदी 
भूली है चपलता
गति मंथर
उड़ गई चूनर
फैला पाट-आँचल।
3. 
बात अधूरी
गीत हुए न पूरे
साँसें भटकीं
आस रही अधूरी
ये उम्र हुई पूरी।
4.
भाव नदिया 
गहरी है बहुत
जितना डूबें
मिले किनारे नए
जो डूबे वो ही जाने।

सुभाष नीरव





1.
बरसे मेघ
मन मयूर नाचा
हुआ विभोर
पुलकित इच्छाएँ
आनन्द गीत गाएँ।
2.
श्रम के बल
कामयावी के ध्वज
जो फहराते
नई इबारत वो
जग में लिख जाते।
3.
तितलियों-सी
मन की कामनाएँ
अपने पीछे
हरदम दौड़ाएँ
बाज कभी न आएँ।

डॉ. जेन्नी शबनम





1.
तोतली बोली
माँ-बाप को पुकारे
वो नौनिहाल,
सुन-सुन के बोली
माँ-बाप हैं निहाल!
2.
तेरी जोगन
तुझ में ही समाई
थी वो बावरी
सह के सब पीर
बनी मीरा दीवानी
3.
चहकती है
खिली महकती है
ज़िन्दगी प्यारी
जीना ही है जी-भर
बीते सारी उमर!

डॉ. भावना कुँअर





1.
अलसाया-सा
मलता था सूरज
उनींदी आँखें 
खोल न पाए पंछी 
फिर अपनी पाँखें
2.
पीर की गली
मिला, ओर न छोर
कहाँ मैं जाऊँ 
रिसता मन लिये
क्या होगी कभी भोर?
3.
नोंचे किसने
पेड़ों से ये गहने
कैसे आएगी
वो मधुर कोकिला
सुख-दुःख कहने।
4.
आसमान से 
टूट पड़ा झरना
नहाने लगे
बाग और बगीचे
जंगल में हिरना।
5. 
नैन झील में
तैरते रहे मोती
भावों से घिरी
पतवार, लिये मैं
उनको रही खेती।



मंजू मिश्रा





1.
मुँडेर पर
अटकी हुई धूप
जब उतरी,
जाते-जाते ले गयी
उजालों का भरम
2.
प्रेम की धारा
तन-मन भिगोती
यादों के मोती
दृश्य छायाचित्र : अभिशक्ति 
गूँथ-गूँथ, जीवन
माला जैसे पिरोती।
3. 
सूरज चोर
फ़रियादी है चाँद
और चोरी में 
गये तारे-सितारे
फ़ैसला करे कौन? 

रचना श्रीवास्तव





1.
सुनता नहीं
शब्दों की फ़रियाद
कोई भी आज
बहरों की दुनियां
फिर क्यों दी आवाज?
2.
भावों की वर्षा
बंजर जज्वात में
सूख जाती है
उगती नागफनी
हिना लगे हाथों में।
3.
गली में आई
उजाले की किरण
शब्दों को धोया
बही काव्य की धारा
कविता महक उठी।





डॉ. हरदीप कौर सन्धु





1.
बीते वो पल
उड़ते छींटों जैसे
भिगोते रहे
कभी ये तन्हा मन
कभी मेरा दामन
2.
चंचल मन
पलकों पे सपने
सजाकर तू
दृश्य छायाचित्र : रोहित कम्बोज 
पाखी बन उड़ जा
विशाल अम्बर में।
3.
यूँ चलते ही 
अगर कोई बने
मन का मीत
लगे मधुर गीत
गुनगुनाते रहो।
4.
जादू-भरा है
आखर-आखर में
कायल हुए
शब्दों से बुनी ऐसे
फुलकारी हो जैसे! 





प्रगीत कुँअर



1.
हर तरफ
फिरते हैं कितने 
रूखे चेहरे,
दिलो-दिमांग तक
देते ज़ख़्म्म गहरे
2.
दृश्य छाया चित्र : अभिशक्ति 
देखो चली है
ठंडी हवा छू मुझे
उनकी गली
पूरे उपवन में 
मची है खलबली।
3.
देती दस्तक
जानी पहचानी-सी
कोई आहट
ख़्यालों के सैलाब से
पहुँचे दिल तक।

2 टिप्‍पणियां:

  1. यूँ तो ‘भाव कलश’ में ये ताँके पहले भी पढ़ चुकी हूँ, पर पता नहीं यह इस विधा का कमाल है या इन सशक्त कलमों का जादू, हर बार एक नया सा ही अहसास होता है...।
    आभार,
    प्रियंका

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  2. मेरे ताँका को यहाँ स्थान देने के लिए ह्रदय से आभार. सभी कवियों को बधाई. अविराम की प्रतिष्ठा एक नए आयाम को छुए, शुभकामनाएँ.

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