आपका परिचय

गुरुवार, 29 अगस्त 2013

अविराम के अंक

अविराम साहित्यिकी 
(समग्र साहित्य की समकालीन त्रैमासिक पत्रिका)


खंड (वर्ष) : 2 / अंक : 2   / जुलाई -सितम्बर  2013   (मुद्रित)

प्रधान सम्पादिका : मध्यमा गुप्ता
अंक सम्पादक : डा. उमेश महादोषी 
सम्पादन परामर्श : डॉ. सुरेश सपन
मुद्रण सहयोगी : पवन कुमार




रेखांकन : सिद्धेश्वर 
अविराम का यह मुद्रित अंक रचनाकारों व सदस्यों को 19 अगस्त  2013  को तथा अन्य सभी सम्बंधित मित्रों-पाठकों को 28 अगस्त 2013   तक भेजा जा चुका  है। 10 सितम्बर 2013 तक  अंक प्राप्त न होने पर सदस्य एवं अंक के रचनाकार अविलम्ब पुन: प्रति भेजने का आग्रह करें। अन्य  मित्रों को आग्रह करने पर उनके ई मेल पर पीडीऍफ़ प्रति भेजी जा सकती है। पत्रिका पूरी तरह अव्यवसायिक है, किसी भी प्रकाशित रचना एवं अन्य  सामग्री पर पारिश्रमिक नहीं  दिया जाता है। इस मुद्रित अंक में शामिल रचना सामग्री और रचनाकारों का विवरण निम्न प्रकार है- 


।।सामग्री।।

लघुकथा के स्तम्भ :  महावीर प्रसाद जैन (3) 

अनवरत-1(काव्य रचनाएँ) :  सुभदा पाण्डेय(7), डॉ.सुरेन्द्र वर्मा व बी.एस.गौतम (8), स्व.राकेश वत्स (9), प्रशान्त उपाध्याय व शेर सिंह (10),  डॉ.रामसनेही लाल शर्मा ‘यायावर’ व डॉ.नलिन (11) तथा  राजेन्द्र परदेसी, डॉ. रामनिवास ‘मानव’ व  प्रतिभा माही (12)


मेरी लघुकथा यात्रा :  श्याम सुन्दर अग्रवाल (13)

विमर्श :  रचना का मौलिक अधिकार: भगवान अटलानी (16) व  निर्माण की प्रक्रिया में उथलपुथल तो होगी ही: रेखा चमोली (19)

आहट  :  डॉ. सुधा गुप्ता व सुदर्शन रत्नाकर की क्षणिकाएँ (21) 

बहस :  डॉ. विजय प्रकाश (22), श्रीकृष्ण कुमार त्रिवेदी (23), कृष्ण सुकुमार (24), डॉ. शरद नारायण खरे (25), कुँवर प्रेमिल (27), राजीव नामदेव ‘राना लिधौरी’ व खान अब्बास ‘संगदिल’ (28)।
कविता के हस्ताक्षर प्रदीप कान्त (30) व देवेन्द्र रिणवा (32)।

कथा कहानी  : अंतिम परत/डॉ. सतीश दुबे (34) जिन्दगी: थोमस जोर्ज/अनुवाद के.जी. बालकृष्ण पिल्लै (38) 
व्यंग्य वाण :  सुख उड़ने-उड़ाने का/डॉ.गोपाल बाबू शर्मा (40), देश की एकता में कवि सम्मेलनों का योगदान/ध्रुव तांती (41) एवं मदन बाबू/ओम प्रकाश मंजुल (42) 

अनवरत-2 (काव्य रचनाएँ) :  डॉ. सुरेश उजाला व प्रो. विनोद अश्क (44), विजय चतुर्वेदी व डॉ. मालिनी गौतम (45), प्रकाश श्रीवास्तव, प्रो. रमेश सिद्धार्थ व केशव शरण (46),  विज्ञान व्रत, अमित ‘अहद’ व सूर्यकान्त श्रीवास्तव (47) अजय अज्ञात व पूजा भाटिया प्रीति (48)  तथा वन्दना गुप्ता व विवेक चतुर्वेदी (49) 


कथा प्रवाह (लघुकथाएँ) :  डॉ.बलराम अग्रवाल व संतोष सुपेकर (50), हरनाम शर्मा व के.एल. दिवान (51), सिद्वेश्वर (52), उषा अग्रवाल (53),  सत्य शुचि व गुरुनाम सिंह रीहल (54),  अरविन्द अवस्थी (55),  बच्चन लाल बच्चन व मनोहर शर्मा ‘माया’(56),  अहफ़ाज अहमद कुरैशी व डॉ. नन्द लाल भारती (57),  डॉ. मुक्ता व डॉ. नरेन्द्र नाथ लाहा (58) तथा  सुखपाल सिंह व देशपाल सिंह सेगर (59) 

अनवरत-3 (काव्य रचनाएँ)  :  डॉ. रामशंकर चंचल व अशोक भारती  देहलवी (60), सुजीत आर. कर व गांगेय कमल (61), धर्मेन्द्र गुप्त ‘साहिल’, संजीव कुमार अग्रवाल व ऊषा कालिया (62) 

किताबें (संक्षिप्त समक्षाएँ) :  बदलते समय की सटीक कहानियां: डॉ.सतीश दुबे के कहानी संग्रह ‘कोलाज’ की (63), विद्योत्तमा के वास्तविक सत्य तक पहुंचने का प्रयास: डॉ. योगेन्द्रनाथ शर्मा के महाकाव्य ‘वैदुष्यमणि विद्योत्तमा’ की (65) व प्रेमचंद के साथ लघुकथा की कसौटी के औजारों की तलाश: डॉ0 बलराम अग्रवाल संपादित समालोचना पुस्तक ‘समकालीन लघुकथा और प्रेमचंद’ की (66) डॉ.उमेश महादोषी द्वारा संक्षिप्त समीक्षाएं।


माइक पर :
उमेश महादोषी का संपादकीय (आवरण 2) 

हमारे आजीवन सदस्य  : 
अविराम साहित्यकी के आजीवन  सदस्यों की सूची (6)


चिट्ठियाँ  :
विगत अंक पर प्रतिक्रियाएं (68)

गतिविधियाँ  :
संक्षिप्त साहित्यिक समाचार (70)

प्राप्ति स्वीकार :
त्रैमास में प्राप्त विविध प्रकाशनों की सूचना (72)


इस अंक की साफ्ट (पीडीऍफ़) प्रति ई मेल (umeshmahadoshi@gmail.com) अथवा  (aviramsahityaki@gmail.com)  से मंगायी जा सकती है।

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7 टिप्‍पणियां:

  1. डॉ. कमलकिशोर गोयनका, ए-98, अशोक विहार, फेज प्रथम, दिल्ली-110052

    ....‘क्षणिका’ पर अंक के बारे में कुछ न लिखकर एक प्रस्ताव करता हूँ- मॉरीशस के हिन्दी लेखक अभिमन्यु अनत 75 के हो गये, किन्तु किसी ने नेटिस नहीं लिया। वे 55 वर्षों से हिन्दी में लिख रहे हैं, 70 पुस्तकें हैं, 32 तो उपन्यास हैं, हिन्दी को विश्वमंच पर स्थापित करने वाले हैं। मैंने कुछ पत्रिकाओं को लिखा कि वे अभिमन्यु अनत अंक निकालें, सामग्री मैं उपलब्ध कराऊँगा, और अब कई पत्रिकाएँ अंक निकाल रही हैं। अभी मेरे प्रस्ताव पर साहित्य अकादमी, नई दिल्ली ने उन्हें अकादमी की महत्तर सदस्यता भी देने का निर्णय किया है। वे जनवरी, 14 में उन्हें बुलाकर सम्मानित करेंगे। क्या आप ‘अविराम साहित्यिकी’ का अभिमन्यु अनत अंक निकालना चाहेंगे? सम्भवतः आपको मालूम हो, प्रेमचंद के बाद हिन्दी का प्रवासी साहित्य मेरे अध्ययन का विषय है। अभिमन्यु पर ही मेरी 4 पुस्तकें हैं। आप विचार करें, और अपने निर्णय से अवगत करायें।
    ‘क्षणिका’ पर विशेषांक निकालें। छोटी विधाओं को जीवित रखने के साथ उनके विकास को भी सम्भव बनाना चाहिए, परन्तु कइै बार छोटी विधाओं में कमजोर रचनाओं की भीड़ लग जाती है और अच्छी रचनाएं छिप जाती हैं। क्षणिका अब स्वीकृत विधा है, मॉरीशस में ही कई कवियों ने क्षणिकाएँ लिखीं हैं और अच्छी लिखी हैं। साहित्य में किसी भी विधा कीे कोई एक अंतिम कसौटी नहीं होती। रचनाकार नित नए प्रयोग करते हैं और वे भी मानक बन जाते हैं। ‘क्षणिका’ में, जीवन का कोई सच एक क्षण में व्यक्त हो सके तो वह सफल क्षणिका है। इस जीवन सत्य में जीवन की आलोचना भी हो सकती है। इस पर मेरा विचार है कि क्षणिका लिखकर कोई लेखक यशस्वी नहीं हो सकता। वहाँ कबीर की प्रतिभा ही कमाल कर सकती है। बड़ा लेखक बनने के लिए बड़ी विधाओं में लिखना बड़ी मदद करता है।...

    श्रीकृष्ण कुमार त्रिवेदी, द्वापान्तर, लाल बहादुर शास्त्री मार्ग, फ़तेहपुर-212601, उ.प्र.
    ....पत्रिका गुणवत्ता के मानकों पर खरी उतरती है और सर्वोत्तम पत्र-पत्रिकाओं के मध्य प्रथम पंक्ति में स्थान की अधिकारिणी है। कृपया बधाई स्वीकार करें। ‘बहस’ मार्ग से कहीं-कहीं भटकी है। ‘साहित्य’ में शोध आदि का समावेश अवांछनीय लगता है। ‘चोरी’ का सीधा सा अर्थ दूसरे की वस्तु को अपना बनाकर दिखाना है। ‘लघुकथाओं’ में नयापन देखकर अच्छा लगा, कथ्य की पुनरावृत्ति का अभाव ही श्लाघ्य है। ‘समीक्षा’ में आपने ‘विद्योत्तमा’ को पौराणिक पात्र कहा है। वह पौराणिक पात्र कैसे हो गयी? और फिर उस पर महाकाव्य? वृहत् काव्य तो हो सकता है, महाकाव्य की अपनी कुछ शर्तें और लक्षण हैं। उनमें से ‘विवाह’ को छोड़कर और शायद ही कोई और लक्षण कृति के कथ्य में हो। युग महाकाव्यों का नहीं, प्रतीक काव्यों का है....(खेद प्रकाश: आद. द्विवेदी जी, निसन्देह उक्त समीक्षा में मुझसे लापरवाही हुई है। दरअसल पौराणिक व ऐतिहासिक दोनों तरह के पात्रों की चर्चा मेरा उद्देश्य था, एक जगह ऐसा स्पष्ट भी हुआ है। मेरी लापरवाही की ओर इंगित करने के लिए आभारी हूँ। जहाँ तक उक्त ग्रन्थ को महाकाव्य कहने का प्रश्न है, महाकाव्य के प्रमुख लक्षण उसमें हैं।-उ.म.)

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  2. कुछ और पत्र

    हितेश व्यास, 1-मारुति कॉलोनी, पंकज होटल के पीछे, नयापुरा, कोटा-324001, राजस्थान

    ....लघुकथा के हस्ताक्षर के रूप में महावीर प्रसाद जैन से मिलना सुखद लगा। उनकी लघुकथाओं में समय की पहचान, संवेदनशीलता- कमजोर के प्रति, सकारात्मकता- बुराई में अच्छाई देखने की और दांपत्य प्रेम है। मेरी लघुकथा यात्रा में श्याम सुन्दर अग्रवाल का सफ़र अच्छा लगा और उपलब्धिमूलक भी। लेखन में मौलिकता की समस्या और चोरी की बहस में सर्वप्रथम भगवान अटलानी के विचार देने चाहिए थे तदनन्तर डॉ.विजय प्रकाश, श्रीकृष्ण कुमार त्रिवेदी, कृष्ण सुकुमार, डॉ. शरद नारायण खरे, कुँवर प्रेमिल, राजीव नामदेव, अब्बास खान संगदिल आदि के। अटलानी के विचार महत्वपूर्ण व सघन हैं पर शेष सबने भी कोई न कोई नई बात कही है। सूत्र सम्मान लेते समय रेखा चमोली के वक्तव्यांश जो उनका आत्मकथ्य ही है, पढ़कर भला लगा क्योंकि उन्हें कृति ओर में पढ़ रखा था। सतीश दुबे ने मुझे अपना नव्य कथा संग्रह ‘कोलाज’ भेजा था, उसकी एक कहानी ‘अंतिम परत’ पढ़कर उनसे पुनः रू-ब-रू हुआ।...स्व.राकेश वत्स के परिचय से आत्मीयता हुई। डॉ.नलिन को मैं उनकी ग़ज़लों से जानता था, अब उनके नवगीत से आश्वस्तकारी साक्षात हुआ है। डॉ.सुधा गुप्ता की क्षणिकाओं में ओस भीगी सुबह ने भिगो दिया। कविता के हस्ताक्षर प्रदीप कान्त नवगीतों की पंक्तियों में प्रभावी हैं। देवेन्द्र रिडवा की आंचलिकता खींचती है। डॉ.मालिनी गौतम की अजनबी में यथार्थ व्यक्त हुआ है। प्रकाश श्रीवास्तव, विज्ञान व्रत, अमित अहद, अजय अज्ञात, विवेक चतुर्वेदी, अशोक भारती देहलवी, धर्मेन्द्र गुप्त साहिल की ग़ज़लों में कुछ के अधिकांश, कुछ के कोई-कोई शेर अच्छे लगे। डॉ.उमेश महादोषी की समीक्षाओं में कोलाज (डॉ.सतीश दुबे) व समकालीन लघुकथा और प्रेमचन्द (बलराम अग्रवाल) की समीक्षाएँ अच्छी बन पड़ी हैं। संजीव कुमार अग्रवाल ने दोहों में शहर के बहाने माँ-बाप का दर्द मुखरित हुआ है। अनवरत में डॉ. रामशंकर चंचल की प्रेम कविता ने स्पर्शित किया। सुखपाल सिंह, अहफाज़ अहमद, अरविंद अवस्थी, सिद्धेश्वर, बलराम अग्रवाल की लघुकथाएँ विधा के साथ न्याय करती हैं। सूर्यकान्त और वन्दना गुप्ता की कविताएँ श्लाघनीय हैं।

    निशांत, वार्ड नं. 6, निकट वन विभाग, पीलीबंगा-335803, जिला हनुमानगढ़ (राज.)

    ....इस अंक में ‘रचना का मौलिक अधिकार’ पर भगवान अटलानी के विचार विचारणीय हैं। उनकी सभी बातें जायज हैं। प्रकाशित होने के नाम पर किसी भी रचना के पर नहीं काटे जाने चाहिए। लेखक की मृत्यु के पश्चात उसकी रचनाएँ सैकड़ों जगह छप जाती हैं, जैसे आज प्रेमचंद की रचनाएँ छप रही हैं। अब तो इंटरनेट पर भी आने लगी हैं। तो फिर किसी लेखक की अच्छी रचना पर उसके जीते जी इतना प्रतिबन्ध क्यूँ है? वैसे पत्रिकाओं में पूर्व प्रकाशित रचनाएँ छपती भी रहती हैं।...रेखा चमोली का वक्तव्य भी अच्छा है।

    शशिभूषण बड़ोनी, आदर्श विहार, ग्राम व पोस्ट- शमशेर गढ़, देहरादून (उत्तराखण्ड)

    ....चित्रकार सिद्धेश्वर का इस अंक का मुख पृष्ठ न रेखांकन बहुत अच्छे हैं।...उनके अच्छे रेखांकनो के अलावा उनकी लघुकथा ‘खून की तलब’ लाजवाब है। विज्ञान व्रत की गजलें, बलराम अग्रवाल की लघुकथा ‘इक्याटू’, प्रदीप कांत के नवगीत, रेखा चमोली का पुरस्कार वक्तव्य, डॉ. रामसनेही लाल शर्मा ‘यायावर’ की कविता ‘इस शहर में’ व बी.मोहन नेगी जी व के. रविन्द्र के रेखाचित्र बहुत बेहतरीन लगे।...आपकी संतुलित समीक्षाओं की बात न करूँ तो भी गुस्ताखी होगी।...आपने डॉ.सतीश दुबे व डॉ. अरुण की किताबों पर अच्छे ढंग से लिखा है।....

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  3. कुछ और पत्र

    लाखन सिंह भदौरिया, भोजपुरा, मैनपुरी (उत्तर प्रदेश)

    ....आपकी अतीव उदारता एवं हिन्दी सेवा भावना के अनुराग रूप, अविराम साहित्यिकी त्रैमासिक के तीन अंक लगातार मिले। उक्त संग्रहणीय श्रेष्ठ अंकों को पाने के बाद मैं अभी तक अपनी ओर से उनकी पहुंच भी न दे सका।.....आपके कुशल और तत्परणतापूर्ण सम्पादन में अविराम साहित्यिकी सतत गतिवान रहे, ऐसी कामना है।....आशा है पत्रिका के अगले अंक भी पढ़ने को मिलते रहेंगे।...

    माधव नागदा, लालमादड़ी (नाथद्वारा) (राजस्थान)

    ....अविराम साहित्यिकी का जुलाई-सितम्बर अंक प्राप्त हुआ।....यह जानकर प्रशन्नता हुई कि अविराम का आगामी अंक क्षणिका विशेषांक है।...

    डॉ. शिव प्रसाद शुक्ल, डी-4, नीलकंठ बंगलोज, यमुना पार्क के पास, वल्लभ विद्यानगर, अणंद-388120 (गुजरात)

    ....अविराम साहित्यिकी का अंक पढ़ने से आपका संपादकीय एवं चयन सहज याद आता है। तकरीबन साहित्य की सभी विधाओं को 72 पृष्ठों में समेट लेते हो। लघु पत्रिका की अपनी सीमा के साथ सम्पादक के बुद्धि की चालाकी का भी पता चलता है। निश्चित रूप से आपकी गागर में सागर भरने की दृष्टि है। इलैक्ट्रानिक मीडिया के युग में प्रिन्ट मीडिया के रूप में ‘अविराम साहित्यिकी’ का प्रकाशन सुखद एवं चुनौतीपूर्ण है।... ‘अविराम साहित्यिकी’ को अविराम निकालते रहें, यही मेरी शुभकामना है। ई मेल एंव इंटरनेट पर भी आपने इसे रखा, यह भी काफी सराहनीय है।....

    कन्हैयालाल अग्रवाल ‘आदाब’, बंगला नं. 89, गवालियर रोड, नौलक्खा, आगरा-282001(उ.प्र्र.)

    ....‘अविराम साहित्यिकी’ का जुलाई-सितम्बर 13 अंक मिला। यह वास्तव में समग्र साहित्य की समकालीन पत्रिका है। 76 पृष्ठों के इस अंक में कहानी, लघुकथा, आलेख, परिचर्चा, ग़ज़ल, गीत हाइकु, तांका, छंदमुक्त कविता सभी कुछ तो है। साहित्यिक चोरी संबंधी परिचर्चा विचारोत्तेजक है। वैसे तो इस विषय में सबके अपने-अपने दृष्टिकोंण हैं, पर शरद नारायण खरे का मत ज्यादा खरा लगा। सतीश दुबे की कहानी ‘अन्तिम परत’ आधुनिक नारी के नये सोच और साहस की कहानी है। आप क्षणिका विशेषांक को और विशेष बनाने का प्रयास कर रहे हैं, उसमें इस विधा से संबंधित आलेख आदि शामिल करके, आशा है यह विशेषांक भी अति विशिष्ट होगा।....

    आचार्य भगवत दुबे, पिसनहारी-मढ़िया के पास, जबलपुर-482003 (म.प्र.)

    ‘‘त्रैमासिक साहित्यिकी, मिली आज ‘अविराम’
    लेख, काव्य, क्षणिका, कथा, औ’ लघुकथा सनाम
    औ‘ लघुकथा सनाम, पते रचनाकारों के
    सबने अंकित किये, दर्द अत्याचारों के
    समीक्षात्मक पृष्ठ, गहन गुरुतर साहित्यिक
    सुपठनीय ‘अविराम’, पत्रिका है साहित्यिक’’

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  4. कुछ और पत्र

    संतोष खरे, 7, राजेन्द्रनगर, सतना-485002 (म.प्र.)

    ....‘अविराम साहित्यिकी’ का जुलाई-सितम्बर 2013 अंक प्राप्त हुआ। आपने मुझे स्मरण किया और पत्रिका भेजी, इस हेतु आभार। इस अंक में लघु कथायें तथा इस पर विमर्श पढ़ने को मिला। अधिकांश रचनायें स्तरीय और पठनीय हैं। आपके इस प्रयास की सराहना करता हूं।

    श्रीकान्त व्यास, पोस्ट बाक्स-16, जी.पी.ओ. पटना-800001 (बिहार)

    ....‘अविराम साहित्यिकी’ का जुलाई-सितम्बर 2013 अंक प्राप्त हुआ।...प्रकाशित गद्य एवं पद्य की रचनाएं अच्छी लगी। प्रायः साहित्य की सभी विधाओं को इसमें स्थान दिया गया है। यह पत्रिका ‘गागर में सागर’ वाली कहावत केा चरितार्थ करती है। मेरा एक सुझाव है कि रचनाकारों के शीर्षक को थोड़ा और बड़ा करें, तो बेहतर रहेगा।

    ललितनारायण उपाध्याय, 96, आनन्द नगर, खण्डवा-450001 (म.प्र.)

    ....पत्रिका ‘अविराम साहित्यिकी’ का जानदार शानदार अंक है। संग्रहणीय व पठनीय है।

    मोहन सिंह रावत, बर्ड्स आई व्यू, इम्पायर होटल परिसर, तल्लीताल, नैनीताल-263002 (उत्तराखण्ड)

    ....मंटो को समर्पित यह अंक निश्चित ही संग्रहणीय है। अंक की सभी रचनाएं उत्कृष्ट हैं। पत्रिका के छोटे से कलेवर में आपने बहुत कुछ समेट लिया है। कहानी, कविताएं, बहस, मंटो का अफसाना और सभी नियमित स्तम्भ...। यह आपके संपादन कौशल का ही परिणाम है। बहस के लिए आपने हटकर विषय चुना है। लघु पत्रिकाओं में कुछ तो बहुत स्तरीय हैं, अतः उन्हें आर्थिक सहयोग प्रदान कर जीवित रखना रचनाकारों और पाठकों की नैतिक जिम्मेदारी है किंतु इस होड़ में अधिकांश ऐसी लघु पत्रिकाएं भी प्रकाशित हो रही हैं, जिन्हें नज़रअन्दाज करना ही उचित होगा।...

    शुभदा पाण्डेय, असम विश्वविद्यालय, शिलचर-788011 (असम)

    ....पत्रिका का सितम्बर 2013 अंक प्राप्त हुआ। के.जी. बालकृष्ण पिल्लै की अनुवादित कहानी बहुत अच्छी लगी। ‘जिन्दगी’ लघुकथा का अंत अच्छा लगा। कविताएं स्तरीय हैं। बहस की व्यथा व प्लॉट उचित व सामयिक है, विचार भी स्पष्ट रूप से उभरे हैं- ‘चोरों से सावधान।’ ध्रुव तांती जी के विचार सही व कवियों को प्रेरणा देने वाले हैं। देश के अनेक साहित्यकारों को आप जोड़े हुए हैं, वाकई पुरुषार्थ का काम है। हरिद्वार के पावन अंचल से जागरण का यह शंखनाद, अवश्य ही नींद से जगायेगा।...

    ओमेश परुथी, हिन्दू कॉलेज, सोनीपत-131001 (हरियाणा)

    ....‘अविराम साहित्यिकी’ भेजने के लिए धन्यवाद! छोटे से आकार में विराट सृजनधर्मिता समेटे यह पत्रिका अपनी अलग पहचान बनाती है। बधाई!...

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  5. श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ‘मंजुल’ के लम्बे पत्र को तकनीकी समस्यावश दो भागों में प्रकाशित किया जा रहा है। प्रस्तुत है पत्र का प्रथम भाग।

    ओमप्रकाश पाण्डेय ‘मंजुल’, कामायनी, कायस्थान, पूरनपुर, पीलीभीत (उत्तर प्रदेश)

    ....जुलाई-सितम्बर 2013 अंक प्राप्त हुआ।.....उक्त अंक नितांत सशक्त, फलतः सफल अंक है। समीक्ष्य अंक में यूँ तो सर्वस्व श्रेष्ठ है तथापि कुछ ऐसी सामग्री है, जिसका मोह वरण करने में असमर्थ हूँ। गद्य क्षेत्र में रेखा चमोली, सर्वश्री कृष्ण कुमार त्रिवेदी, राजीव नामदेव और अब्बास खान संगदिल के आलेख श्रेष्ठतर हैं। डॉ. विजय प्रकाश का आलेख भी श्रेष्ठतर है। उनने बिन्दु चार में जो भुक्त भोगा बताया है, वह मुझ अकिंचन के साथ भी एकाधिक बार हो चुका है। डॉ. विजय प्रकाश आलेख को आत्मकथ्यात्मकता से बचा ले जाते तो रचना श्रेष्ठतम की श्रेणी की हो सकती थी। इसी प्रकार श्री कृष्ण सुकुमार का आलेख भी श्रेष्ठतर है, जिसे पढ़कर पदम लाल पुन्नालाल वख्शी का ललित निबन्ध ‘क्या लिखूँ’ (समाज सुधार) याद आ गया। आलेख में व्यक्त उनकी चिन्ता से भी मैं सहमत हूँ- मैं ऐसे कुछ लेखकों के नाम गिना सकता हूँ, जो चोरी के माल को राष्ट्रीय पत्रिकाओं के मालघर में रखकर साहूकारी की संपत्ति बनाने में हुनरमन्द हैं। लघुकथाओं में सर्वश्री डॉ. बलराम अग्रवाल, संतोष सुपेकर, अरविन्द अवस्थी, डॉ. नरेन्द्र नाथ लाहा तथा सुखपाल सिंह की रचनाएँ श्रेष्ठतर हैं। सुश्री उषा अग्रवाल की यथार्थ और विवेक से पूर्ण लघुकथा भी श्रेष्ठतर है। श्री गुरुनाम सिंह रीहल की लघुकथा सदयता एवं सुहृदयता का संदेश देने के कारण श्रेष्ठतर है।... श्री बच्चन लाल बच्चन की रचना पर मैं कोई टिप्पणी नहीं करूँगा।... श्री देशपाल सिह सेंगर की रचना ‘भ्रम’ भी श्रेष्ठतर है, पर यह लघुकथा नहीं कही जा सकती। (संभव है यह उनका नहीं, मेरा भ्रम हो)। पद्य परिधि में डॉ. सुरेन्द्र वर्मा के ताँके मांसलता, बी.एस. गौतम की कविता सटीक मानवीयकरण एवं यथार्थवोध, डॉ. रामनिवास ‘मानव’ के ताँके दार्शनिकता तथा सुश्री सुदर्शन रत्नाकर की क्षणिकाएँ सच्ची प्रेरणा के कारण श्रेष्ठतर की श्रेणी के योग्य हैं। डॉ. सुरेश उजाला की कविता, प्रो. विनोद अश्क की शाइरी तथा विवेक चतुर्वेदी व श्री विज्ञान व्रत की ग़ज़लें भी श्रेष्ठतर रचनाएँ हैं। नक्सलवाद के गढ़, छत्तीसगढ़ के निवासी सुजीत आर. कर की कविता ‘साहित्य समाज का दर्पण है’ को चरितार्थ करने के कारण श्रेष्ठतर रचना है।
    वे रचनाएँ जो मेरी दृष्टि में श्रेष्ठतम हैं, हैं- डॉ. शरद नारायण खरे का आलेख, ‘रचना से प्रेरित होना और शैली का अनुकरण करना चोरी नहीं है’, यथार्थ के धरातल पर स्वाभाविक भाषा तथा संवादों में बनी-बुनी सामयिक, मार्मिक और लोकोपयोगी श्री सतीश दुबे की कहानी ‘अंतिम परत’, डॉ. गोपाल बाबू शर्मा का व्यंग्य ‘सुख उड़ने-उड़ाने का’ एवं श्री ध्रुव तोती का व्यंग्य ‘देश की एकता में कवि सम्मेलनों का योगदान‘ तथा श्री के.एल.दिवान की उपयोगी व अंधविश्वास घातिनी लघुकथा- ‘बिल्ली रास्ता काट गई’ काव्यांगन में स्व. रोकेश वत्स, सर्वश्री प्रदीप कान्त और संजीव अग्रवाल एवं सुश्री उषा कालिया की रचनाएँ श्रेष्ठतम की श्रेणी में हैं।
    श्री भगवान अटलानी के आलेख ‘रचना का मौलिक अधिकार’ एवं डॉ. राम सनेही लाल शर्मा ‘यायावर’ व श्री देवेन्द्र रिणवा की कविताओं को मैं अंक की सर्वोत्तम सामग्री समझता हूँ। श्री भगवान अटलानी द्वारा वर्णित विभास वर्मा की मान्यता एवं मानसिकता से मैं कतई सहमत नहीं हूँ, हालांकि श्री अटलानी जी ने भी मि. वर्मा की सोच को अगले पृष्ठों में अति आक्रामकता के साथ चेलेंज किया है। श्री अटलानी के इस विद्वतापूर्ण विस्त्रत आयामी और अनुभवगम्य आलेख के लिए जितनी प्रशंसा की जाये, कम है। उन्हें विशेष बधाई प्रेषित है।

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  6. श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ‘मंजुल’ के लम्बे पत्र का दूसरा भाग।

    अब थोड़ा सा खट्टा भी हो जाये- सुश्री सुभदा पाण्डेय की दोनों कविताएँ यूँ तो अच्छी हैं, पर उनने ‘एक अच्छी खबर’ में लिखा है, ‘हरी गीध की गोद’। मेरे विचार से ‘कोख हरी होती है’, गोद नहीं। दूसरी कविता ‘खेन्हर मास्टर’ की अंतिम पंक्तियों में गड़बड़ है, जिस कारण कविता अपेक्षाकृत अशक्त हो गयी है। श्री श्यामसुन्दर अग्रवाल के आलेख ‘क्षितिज से क्षितिज की ओर’ के बीच कहने को काफी है (पर नहीं कहूँगा, फोन पर कह चुका हूँ)। श्री अग्रवाल जी निसंदेह बहुत भाग्यशाली साहित्यकार हैं, जिन्हें आपने इतना कवरेज दिया है। {संपादकीय नोट: भाई मंजुल जी, आपने जो फोन पर कहा, उस पर भी और जो आपने यहां लिखा है, उस पर भी, हमने अपना दृष्टिकोंण आपके समक्ष फोन वार्ता में रख दिया था। चूंकि फिर भी आपने लिखित में प्रश्न कर ही दिया है तो उसका लिखित जवाब देना जरूरी है। श्री अग्रवाल जी का आलेख हमारी अपेक्षाओं के अनुरूप और हमारे अनुरोध पर हमें भेजा गया आलेख है। हमने उन्हें कवरेज नहीं दिया है और न हीं उन्हें कृतार्थ किया है। अपितु श्री अग्रवाल जी हमारे अनुरोध को स्वीकार करके अपना आलेख भेजकर हमें कृतार्थ किया है। मुझे लगता है कि आप श्री श्याम सुन्दर अग्रवाल जी के लघुकथा में दिये गये योगदान और उनके विनम्र स्वभाव- दोनों से पूरी तरह परिचित नहीं हैं। उनके बारे में मैंने कुछ अपको बताया भी था, और कुछ आप स्वयं भी लघुकथा जगत से मालूम कर सकते हैं। ‘मेरी लघुकथा यात्रा’ (जिस स्तम्भ में उनका आलेख प्रकाशित किया गया है) वरिष्ठ लघुकथाकारों के लघुकथा के विधागत विकास में योगदान और बहुत सी उन जानकारियों, जो अन्यथा प्रकाश में नहीं आ पाती हैं, के बारे में उन्हीं के शब्दों में प्रकाश डालने के उद्देश्य से नियमित रूप से प्रकाशित किया जा रहा है, तथा अब तक श्री अग्रवाल जी सहित 16 वरिष्ठ लघुकथाकार इस स्तम्भ में हमारे अनुरोध पर आकर कृतार्थ कर चुके हैं। इसका अनेक शोधार्थियों को लाभ मिल सकेगा। यह बात आपको समझनी चाहिए। सामान्य रूप से भी हम-सब कई सन्दर्भों में वरिष्ठ साहित्यकारों के अनुभवों और महत्वपूर्ण प्रसंगों को उनके शब्दों में विभिन्न माध्यमों से सोद्देश्य प्रकाश में लाते रहते हैं।} श्री कुंवर प्रेमिल का आलेख ‘अमानत में खयानत जैसा है’ शीर्षक को चरितार्थ करने वाला है। यह काफी हल्का और बहस के बहाने आत्मश्लाघा का साधन सिद्ध हुआ है। श्री के.जी.बालकृष्ण पिल्लै की (द्वारा अनूदित) कहानी ‘जिन्दगी’ ही या तो अजीब है या इसका अनुवाद निर्जीव है। कुछ स्थानों पर साहित्यकारों के चित्र न मिलने पर आपने वन्य जीव व चीजें छाप दी हैं। अच्छा होता चित्रों के लिए ये खांचे ही न निर्धारित किए जाते।...

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  7. कुछ और पत्र

    धर्मेन्द्र गुप्त ‘साहिल’, के-3/10,ए, मां शीतला भवन, गायघाट, वाराणसी-221001 (उत्तर प्रदेश)

    ....पूर्व अंक की भांति यह अंक भी गम्भीर एवं प्रभावपूर्ण रचनाओं से परिपूर्ण है। आपका श्रम प्रत्येक पृष्ठ पर दृष्टिगत हो रहा है। साधुवाद!.....

    अशोक कुमार गुप्त ‘अशोक’, 124/15, संजय गांधी नगर, नौबस्ता, कानपुर-21 (उत्तर प्रदेश)

    ....मुखपृष्ठ तथा अंदर के रेखाचित्र अपने में बेजोड़ हैं। इस अंक में लघुकथाएँ, गीत, कविताएँ, क्षणिकाएँ तथा दोहे सभी उत्तम हैं।अनेक प्रसंगों तथा सामाजिक चर्चाओं के कारण यह अंक संग्रहणीय बन पड़ा है। काव्य की/साहित्य की अनेक विधाओं को स्थान मिलना सुखद है।....

    कृष्ण मोहन ‘अम्भोज’, नर्मदा निवास, न्यू कॉलोनी, पचोर-465683, जिला-राजगढ़ (म.प्र.)

    ....‘अविराम साहित्यिकी’ समय पर प्राप्त हो रही है। ‘लघुकथा के स्तम्भ’ से हमें श्रेष्ठ रचनाकारों के जीवन परिचय मिल रहे हैं, यह हमारा सौभाग्य है। अंक में लघुकथाएं, गीत, कविता, ग़ज़लें सभी स्तरीय होते हैं। गागर में सागर भरने की आपकी क्षमता को प्रणाम।...

    मीना गुप्ता, द्वारा श्री विनोद गुप्ता, निराला साहित्य परिषद, कटरा बाजार, महमूदाबाद, सीतापुर-261203 (उत्तर प्रदेश)

    ....जुलाई-सितम्बर अंक मानसिक सन्तुष्टिदायक लगा। अंक में संकलित लघुकथाएं, काव्य प्रेरणाप्रद लगे। महावीर प्रसाद जैन जी की लघुकथा ने विशेष प्रभावित किया। विमर्श स्तम्भ अपनी बात कहने में सफल रहा।....

    महावीर उत्तरांचली, बी-4/79, पर्यटन विहार, बसुन्धरा, एंक्लेव, नई दिल्ली-110096

    आप निसन्देह उत्कृष्ट संपादक हैं क्योंकि लगभग तक़रीबन अंक मैंने ‘अविराम’ के पढ़े हैं और हर अंक ने मुझे स्वयं रचनाकार के रूप में कुछ नया करने को प्रेरित किया है। आपकी पत्रिका का स्तर ‘हंस’, ‘कथादेश’, ‘पाखी’ आदि पत्रिकाओं से ऊँचा है। हर अंक संग्रहणीय है।

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