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मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

बाल अविराम

अविराम का ब्लॉग :  वर्ष :  3,  अंक : 03-04,  नवम्बर-दिसम्बर 2013

।।बाल अविराम।।

सामग्री : इस अंक में श्री रामेश्वर काम्बोज हिमांशु की बाल कहानी 'कछुए की बहिन' तथा ‘फैज’ रतलामी की कविता 'भारत है हमारा प्यारा वतन'  बालचित्रकारी में क्रमशः राधिका शर्मा व स्तुति शर्मा की पेंटिंग्स के साथ। 



रामेश्वर काम्बोज हिमांशु



कछुए की बहिन
     
        कछुआ तालाब से निकला और धीरे-धीरे सरक कर खेत की मेंड़ पर आकर बैठ गया। उसे तालाब से बाहर का संसार बहुत ही प्यारा लगा। स्कूल से लौटते खिलखिलाते बच्चों को देखकर उसका मन मचल उठा। उसने सोचा- मैं भी बच्चों की तरह खिलखिलाता! कन्धे पर बस्ता लटकाकर स्कूल जाता!
      उसने अपना सिर निकालकर बच्चों की तरफ देखा। दो शैतान बच्चों ने उसे देख लिया। फिर क्या- दोनों उसे बारी-बारी से ढेले मारने लगे। कछुए ने अपने हाथ, पैर, सिर सब एकदम समेट लिए। खोपड़ी पर लगातार ढेलों की मार से उसे लगा कि वह मर जाएगा। लड़कों के साथ एक छोटी लड़की भी थी। वह चिल्लाई- ‘क्यों मार रहे हो? इसने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है?’
     ‘‘तुम्हें बहुत दुःख हो रहा है। वह तुम्हारा भाई है क्या?’’ एक शैतान लड़के ने कहा।
     ‘‘इसे राखी बाँध देना’’ -दूसरा लड़का कछुए को ढेला मारकर बोला।
     लड़की की आँखों में आंसू आ गए- ‘‘यह मेरा भाई हो या न हो, पर यह दुश्मन भी नहीं है’’।
     ‘‘अरे, ओ कछुए की बहिन! अपने घर चली जा’’ -दूसरा बोला।
     सभी बच्चे ‘कछुए की बहिन! कछुए की बहिन! कछुए की बहिन!’ कहकर जोर-जोर
पेंटिंग : राधिका शर्मा 
से हँसने लगे। उन दोनों शैतान लड़कों ने कछुए को उल्टा करके ढेलों के बीच रख दिया।
     लड़की चुपचाप अपने घर चली गई।
     घर पहुँचने पर उसका मन बहुत उदास हो गया। वह सोचने लगी- ‘‘बेचारा कछुआ! कब तक उल्टा पड़ा रहेगा?’’
     उसे लगा- जैसे वह सचमुच उसका भाई ही हो। वह चुपचाप घर से निकली और तालाब के किनारे जा पहुँची। कछुआ उल्टा पड़ा हुआ था। वह सीधा होने के लिए छटपटा रहा था। लड़की ने चारों तरफ देखा। आसपास कोई नहीं था। वह उसे उठाकर तालाब की तरफ दौड़ी। उसने कछुए को तालाब के पानी में छोड़ दिया।
     कछुए ने अपनी लम्बी गर्दन निकाली। चमकती छोटी-छोटी आँखों से लड़की की तरफ प्यार से देखा और गहरे पानी में उतर गया।
     लड़की खुश होकर घर की तरफ दौड़ी। अब उसे कोई ‘कछुए की बहिन’ कहे तो वह नहीं चिढ़ेगी।
    कछुए ने भी फिर कभी तालाब से निकल कर घूमने की हिम्मत नहीं की। 
  • फ्लैट न-76,(दिल्ली सरकार आवासीय परिसर) रोहिणी सैक्टर -11, नई दिल्ली-110085


‘फैज’ रतलामी

भारत है हमारा प्यारा वतन

भारत है हमारा प्यारा वतन
है सारे जहाँ से न्यारा वतन

हिन्दू ये कहे वरदान है ये
मुस्लिम ये कहे ईमान है ये
पंजाब कहे दिलदारा वतन
है सारे जहाँ से न्यारा वतन
भोर आये तो सूरज चमके है
रात आये तो चन्दा दमके है
है चारों दिशा उजियारा वतन
है सारे जहाँ से न्यारा वतन

इक सुबहे बनारस इसमें है
इक शामे अवध भी जिसमें है
हर एक की आंख का तारा वतन
पेंटिंग : स्तुति शर्मा है सारे जहाँ से न्यारा वतन

ये गंगोजमन बहती जायें
खेतों को ये पानी पिलवायें
गंगोत्री इसकी धारा वतन
है सारे जहाँ से न्यारा वतन

भारत है हमारा जान अपनी
है ऊंचा हिमालय शान अपनी
लहराता तिरंगा प्यारा वतन
है सारे जहाँ से न्यारा वतन

भारत ये सभी का मीत भी है
ऐ ‘फैज’ यहां संगीत भी है
ये बजता हुआ इकतारा वतन
है सारे जहाँ से न्यारा वतन
  • 48, समता नगर, (आनन्द कॉलोनी), रतलाम-457001(म.प्र.)

1 टिप्पणी:

  1. कछुए की कहानी पढी बहुत पसन्द आई लड़की छटपटाहट पढ़कर मन खुद में कहीं खो गया किसी पुरानी घटना में कभी वक्त मिलने पर शेयर करूँगी काम्बोज को हार्दिक बधाई

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