आपका परिचय

रविवार, 2 फ़रवरी 2014

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन :  वर्ष  : 3,   अंक  : 05-06, जनवरी-फरवरी 2014


।। कथा प्रवाह ।।

सामग्री :  इस अंक में सर्वश्री पारस दासोत, मधुदीप, पुष्पा जमुआर, महावीर रवांल्टा, डॉ.नन्द लाल भारती, भावना सक्सेना की लघुकथाएं।


पारस दासोत




एक और पाठ

     ‘‘दिन भर मजदूरी करने के बाद,....
      मैं, जब अपनी मजदूरी लेने मुनीम जी के पास पहुँची, मैंने पोथी में मेरे नाम के आगे बीस रुपये लिखे देखकर, पन्द्रह रुपये लेने से मना कर दिया। और मैं रुपये, मुनीम जी के आगे पटक, अपने घर चली आयी।
      मैं, क्यों अपनी मजूरी कम लेती! मैंने पढ़ना-लिखना सीख जो लिया! मुनीम जी, यह क्या बक रहे थे- ‘‘पढ़ने-लिखने से क्या होता है! उसे ‘महाभारत’ पढ़ना आता है, पर वह रजिस्टर में आठ सौ रुपये की प्राप्ति पर अपने दस्तखत कर, केवल तीन सौ रुपये ही पाता है!’’
रेखा चित्र : हिना फिरदोस 
     ‘‘धत्त ऽऽ! मैं मुनीम नहीं बनूँगी!’’
     मैं अपने बच्चों को क्या खिलाती! आज शाम, चूल्हा जला ही नहीं। रामी रोते-रोते सो गयी। मैं उसको दूध पिलाती, तो कैसे! मेरा दूध, कमरतोड़ मेहनत ने, सुखा जो दिया। रामा, रोटी माँगते-माँगते सो गया और मैं, आधी रात बीते जाग रही हूँ! इसलिए नहीं, मैं भूखी हूँ, इसलिए कि अपना पाठ याद करके, सुबह मुझे प्रौढ़ शिक्षा केन्द्र पर, सुनाना है।’’
  • प्लॉट नं.129, गली नं.9 (बी), मोतीनगर, क्वींस रोड, वैशाली, जयपुर-301021 (राज.)





मधुदीप




अवाक्

    अपने झोंपड़े के सामने झिलंगी-सी चारपाई में बैठा सुखिया गहरी उधेड़-बुन में उलझा हुआ था। दीवाली पर साहूकार से पॉंच रुपये सैंकड़ा ब्याज पर लिए दो हजार रुपये दशहरा आते-आते चार हजार कैसे हो गये! वह ठहरा निपट अनपढ़, कैसे हिसाब लगाए!
    हाथ की बीड़ी बुझने को थी, उसने सुट्टा लगाकर उसे सुलगाया। सामने से उसका बेटा पीठ पर भारी स्कूल-बैग लटकाए आ रहा था।
     ‘‘बेटे सुन! तुझे ब्याज के सवाल आते हैं?’’ प्रश्न सुन बेटा उनका मुँह ताकने लगा।
     ‘‘अरे, चुप क्यों है, बता न।’’
     बेटे न ‘ना’ में सिर हिला दिया।
     ‘‘पढ़ता तो तू सातवीं में है पर ब्याज के सवाल भी ना आते।’’ सुखिया ने माथा पकड़ लिया।
     बेटा चुपके-से अन्दर जाने लगा।
रेखा चित्र : राजेन्द्र परदेसी 
     ‘‘सुन! बस्ता अन्दर रख और मेरे साथ चल।’’
     ‘‘कहाँ?’’ बेटा आश्चर्य से ताकने लगा।
     ‘‘मास्टरजी के पास, पूछता हूँ कि वे तुझे कुछ पढ़ाते भी हैं या नहीं।’’
     ‘‘पर बापू! मैं स्कूल में पढ़ने के लिए थोड़े ही जाता हूँ।’’
     ‘‘तो...!’’
     ‘‘बापू, मैं तो स्कूल में इसलिए जाता हूँ कि वहाँ दोपहर में भरपेट खाना मिले है। और देख बापू, मैं छोटे के लिए भी लाया हूँ।’’ बेटे ने बस्ते में से पोलीथीन निकालकर बाप को दे दी।
    सुनकर सुखिया सन्न रह गया।
    ‘‘पर मास्टरों को तो तनखा पढ़ाने की मिले है, उन्हें तो बच्चों को पढ़ाना चाहिये!’’
    ‘‘पर बापू! मास्टरजी तो खाना बनाने में और बाँटने में लगे रह हैं, वे पढ़ावें कब!’’
     अब सुखिया अवाक् खड़ा था।
  • दिशा प्रकाशन, 138/16, त्रिनगर, दिल्ली-110035


पुष्पा जमुआर




अपना अधिकार

     ‘‘क्या बात है राकेश आज बहुत उदास लग रहे हो?’’
     राकेश ने कोई उत्तर न दिया और मौन बैठा रहा। उदय ने पुनः प्रश्न को दोहराया, ‘‘राकेश! चुप क्यों हो? बताओ, मैं तुम्हारे लिए क्या कर सकता हूँ?’’
      ‘‘कोई कुछ नहीं कर सकता.... बताने से फायदा?’’
      ‘‘बताओ तो सही....।’’
      ‘‘क्या बताऊँ! आज कई दिन से हमारे घर में महाभारत चल रहा है....।’’
      ‘‘महाभारत! कैसा महाभारत! साफ-साफ कहो न....।’’
      ‘‘मम्मी चाहती हैं मैं इंटर में बायलॉजी लूँ ताकि डाक्टर बन सकूँ....।’’
      ‘‘तो....!’’
      ‘‘पूरी बात तो सुन! पापा चाहते हैं कि मैं मैथ लेकर भविष्य में उन्हीं की तरह इंजीनियर बन सकूं.....।’’
रेखा चित्र : शशि भूषण बड़ोनी 
      ‘‘पर तुम क्या चाहते हो?’’
      ‘‘मैं तो एन.डी.ए. ज्वाइन करना चाहता हूँ... मुझे पूर्ण विश्वास है कि मैं स्लेक्ट भी हो जाऊँगा।’’
      ‘‘तो फिर देर किस बात की.... आगे बढ़ो।’’
      ‘‘पर... मम्मी... पापा... का क्या करूँ?’’
      ‘‘अजीब आदमी हो.... पढ़ना तुम्हें है, जीवन तुम्हारा है, रुचि तुम्हारी है.... निर्णय भी तुम्हें ही करना चाहिए...।’’
      ‘‘तो भी यार....।’’
      ‘‘कुछ नहीं, साहस पैदा करो और बहुत ही आदर एवं शालीनता से अपने मम्मी-पापा का अच्छा मूड देखकर उन्हें निर्णय से अवगत करा दो...।’’
      ‘‘तुम ठीक कहते हो... यही करूँगा मैं।’’  
  • ‘काशी निकेतन’, रामसहाय लेन, महेन्द्रू, पटना-800006 (बिहार)


महावीर रवांल्टा




उदासी

     ‘‘अरे बेटा इस हाथ पर इस बार ऐसी पट्टी बांध दे, जिससे सुबह शौच जाने के बाद पानी बरतने में मुझे दिक्कत न हो’’। अस्पताल में उपचार के लिए आए बुजुर्ग ने वार्ड ब्यॉय से अनुरोध किया।
     ‘‘बांध दूंगा, पर बाबा इस पर पानी नहीं पड़ना चाहिए, वरना मेरी सारी मेहनत बेकार’’।
     ‘‘यह कैसे हो सकता है, फिर मैं शौच जाने के बाद पानी कैसे बरतूंगा?’’ बुजुर्ग
रेखा चित्र : उमेश महादोषी 
ने अपनी लाचारी सामने रखी।
     ‘‘तो क्या हुआ, दूसरा हाथ कब काम आयेगा!’’ बुजुर्ग की ओर देखे बिना वार्ड ब्यॉय ने कहा। 
     सुनकर बुजुर्ग के चेहरे पर गहरी उदासी उभरी।
     ‘‘बेटा वही होता तो.....’’ कहते हुए बुजुर्ग ने अपना दूसरा हाथ आगे कर दिया, जो हाथ नहीं सिर्फ ठूँठ भर था।
     उसे देखकर वार्ड ब्यॉय कुछ कहने की स्थिति में नहीं रह गया था। बुजुर्ग के चेहरे की उदासी कुछ पल के लिए उसके चेहरे पर व्याप गयी थी।
  • ‘सम्भावना’ महरगॉव, पत्रा.- मोल्टाड़ी, पुरोला, उत्तरकाशी-249185, उत्तराखण्ड 


डॉ.नन्द लाल भारती 




पागल आदमी

     रंजू के पापा दफ्तर से आ रहे हो ना....?
     कोई शक भागवान....?
     शक कर नरक में जाना है क्या ....?
     हुलिया तो ऐसी ही लग रही है जैसे पागल कुत्ता पीछे पड़ा था। 
     कयास तो ठीक है। 
     कहाँ मिल गया। 
     वही जहां उम्र का मधुमास पतझड़ हो गया। 
     मतलब? 
     दफ्तर में। 
     मजाक के मूड में हो क्या...?
     नहीं, असलियत बयान कर रहा हूँ। तीन दिन-रात एक कर दफ्तर शिफ्ट करवाया। उच्च अधिकारी छुट्टी पर या दौरे पर चले गए। मजदूरी और गाड़ी के भाड़े का भुगतान मुझे ही करना पड़ा जेब से। उसी भुगतान पर अपयश लग गया।
रेखा चित्र :  महावीर रवांल्टा 
     ईमानदारी और वफादारी पर अपयश?
     जी भागवान छोटा होने का दंड मिलता रहा है। इसी भेद ने उम्र का मधुमास पतझड़ बना दिया। 
     अपयश कैसे लग सकता है। 
     लग गया भागवान। 
     कौन लगा दिया। 
     वही पागल आदमी जो उच्च ओहदेदार बनने के लिए दो खानदानो की इज्जत दाव पर लगा दिया। अब पद के मद में पागल कुता हो रहा है। 
     रंजू के पापा पद के मद में पागल आदमी हो या पागल कुत्ता दोनों की मौत भयावह होती है। संतोष रखिये। 
  • आजाददीप, 15-एम, वीणा नगर, इन्दौर (म.प्र.)


भावना सक्सेना




तैयारी

    कईं दिन से कार्यालय में सब बहुत व्यस्त थे। पूरे कार्यालय की सफाई कराई गई थी। एक कमरा विशेष रूप से खाली कर उसमें बैठने की व्यवस्था की गई थी। कोने की गोल मेज़ पर गुलाबों का बड़ा सा गुच्छा महक रहा था। श्रेणी चार कर्मचारियों को विशेष निर्देश थे, हर आधे घंटे पर पानी, शीतल पेय, चाय कॉफ़ी आदि को पूछते रहें और श्रेणी तीन के कर्मचारी के पास जमा काजू, बादाम, चिप्स, कुकीस आदि ले कर सेवा करते रहें।
     होटल का इंतजाम भी दुरुस्त है। शहर के सबसे अच्छे होटल में रहने का प्रबंध किया गया है। द्वितीय श्रेणी
रेखा चित्र  : महावीर रवांल्टा 
के कर्मचारी ने निर्देशानुसार वहाँ भी गुलाबों का गुच्छा, फलों की टोकरी, मिनरल वॉटर, और एक व्हिस्की की बोतल पहले ही रख दी है। चार दिन का कार्यक्रम मिनट दर मिनट बन चुका है। एक ड्राइवर और एक अधिकारी को साथ रहना है, कुछ रमणीय पर्यटन स्थल दिखाये जाने है, बाज़ार खरीददारी करानी है, प्रत्येक अधिकारी के घर पर आयोजित लंच डिनर भी कार्यक्रम में शामिल हैं, सभी के लिए उपहार लाये जा चुके हैं। 
    तैयारी पूरी है, आज रात्रि के विमान से चार व्यक्तियों की ऑडिट पार्टी आ रही है।
  • 64, प्रथम तल, इंद्रप्रस्थ कॉलोनी, सेक्टर 30-33, फरीदाबाद, हरियाणा-121003

2 टिप्‍पणियां:

  1. bndhu vr umesh ji aap ka hardik aabhar vykt krta hoon kripya swikar kren sath hi rekhankn krne vale b mohan ji ka ka bhi hardik aabhar hai
    dr ved vyathit
    09868842688

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  2. Hello Uncleji,

    Greetings. This is Ashish Gairola. I am glad to see that you started doing what you were good at. I spoke with Abhishakti today. Nice to see you on web.

    Pranam
    Ashish

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