आपका परिचय

रविवार, 6 जुलाई 2014

अविराम के अंक

अविराम साहित्यिकी 
(समग्र साहित्य की समकालीन त्रैमासिक पत्रिका)

खंड (वर्ष) : 3  / अंक :   / अप्रैल-जून  2014  (मुद्रित)

प्रधान सम्पादिका :  मध्यमा गुप्ता
अंक सम्पादक :  डॉ. उमेश महादोषी 
सम्पादन परामर्श :  डॉ. सुरेश सपन
मुद्रण सहयोगी :  पवन कुमार

अविराम का यह मुद्रित अंक रचनाकारों व सदस्योंको 14 मई 2014  को तथा अन्य
सभी सम्बंधित मित्रों-पाठकों को 18 मई  2014 तक भेजा जा चुका है। 10 जून  2014  तक अंक प्राप्त न होने पर सदस्य एवं अंक के रचनाकार अविलम्ब पुन: प्रति भेजने का आग्रह करें। अन्य  मित्रों को आग्रह करने पर उनके ई मेल पर पीडीऍफ़ प्रति भेजी जा सकती है। पत्रिका पूरी तरह अव्यवसायिक है, किसी भी प्रकाशित रचना एवं अन्य  सामग्री पर पारिश्रमिक नहीं  दिया जाता है। इस मुद्रित अंक में शामिल रचना सामग्री और रचनाकारों का विवरण निम्न प्रकार है- 


।।सामग्री।।

लघुकथा के स्तम्भ :

उर्मि कृष्ण (3)
सतीश राठी (6)
वेद हिमांशु (8) 

कविता अनवरत-1(काव्य रचनाएँ)
डॉ. सुधा गुप्ता व नारायण सिंह निर्दोष (10), 
भगवानदास जैन (11), 
रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ व डॉ.नलिन (12), 
डॉ.ओम्प्रकाश भाटिया ‘अराज’ व डॉ.मिथिलेश दीक्षित (13), 
डॉ.रामसनेही लाल शर्मा ‘यायावर’ व नरेश निसार (14), 
शुभदा पाण्डेय व अवधेश (15), 
किशन स्वरूप(16), 
डॉ.महाश्वेता चतुर्वेदी व डॉ.मालिनी गौतम (17), 
प्रो. रमेश सिद्धार्थ (18), 
शिरोमणि महतो व संतोष सुपेकर (19) 

विमर्श :
साहित्य को दलित और स्त्री-विमर्श में संकुचित कर दिया गया है: डॉ.बलराम अग्रवाल से डॉ उमेश महादोषी की लघुकथा पर बातचीत (20)
आलोचक के पूर्वाग्रह बनाम आलोचना के आग्रह :  श्याम सुन्दर निगम (29)

आहट (क्षणिकाएँ) :
सुदर्शन रत्नाकर, रजनी साहू (31),
इन्द्रा किसलय, डॉ.रघुनन्दन चिले व ज्योत्सना प्रदीप (32)

कथा कहानी : 
काला समय :  डॉ.बलराम अग्रवाल (33)

कविता अनवरत-2(काव्य रचनाएँ) :
तेज राम शर्मा व डॉ.दिनेश त्रिपाठी ‘शम्श’ (37),
शिवानन्द सिंह सहयोगी व माधुरी राऊलकर(38), 
डॉ. अशोक गुलशन, रमेश नाचीज व कृष्ण कुमार त्रिवेदी (39), 
अशोक अंजुम, विजय गिरि गोस्वामी ‘काव्यदीप’ व प्रदीप पराग (40), 
सूर्यनारायण गुप्त ‘सूर्य’ व अशोक कुमार गुप्त ‘अशोक’ (41)

व्यंग्य वाण :
जगन्नाथ विश्व (42)

कथा प्रवाह (लघुकथाएँ) :
भगीरथ (44), 
डॉ. योगेन्द्र नाथ शर्मा ‘अरुण’ (45), 
माधव नागदा व प्रताप सिंह सोढ़ी (46), 
प्रद्युम्न भल्ला (47), 
राजेन्द्र परदेसी (48), 
सिद्धेश्वर व मनजीत कौर (49), 
राधेश्याम भारतीय व अहफ़ाज़ अहमद कुरैशी (50), 
पूरन सिंह (51), 
अशोक आनन, प्रेम बहादुर कुलश्रेष्ठ ‘विपिन’ व राजेन्द्र प्रसाद यादव (52)

कविता अनवरत-3 (काव्य रचनाएँ) :
रामस्वरूप मूँदड़ा व देवी नागरानी (54), 
आकांक्षा यादव, सजीवन मयंक व मो. क़ासिम खॉन ‘तालिब’ (55), 
राम नरेश ‘रमन’ व कमलेश चौरसिया (56), 
सुभाष मित्तल ‘सत्यम’ व अशोक भारती ‘देहलवी’ (57) 

प्रसंग वश :
अविनाश दत्तात्रेय ‘कस्तूरे’ (58)

किताबें (संक्षिप्त समक्षाएँ) :
हिंदी लघुकथा के महत्त्वपूर्ण पड़ावों की पड़ताल : ओमप्रकाश कश्यप द्वारा डॉ. बलराम अग्रवाल संपा. ल.सं. ‘पड़ाव और पड़ताल-2’ (59)
प्रकृति काव्य का प्रथम हिन्दी हाइकु कोश : सतीशराज पुष्करणा द्वारा डॉ.सुधा गुप्ता व डॉ.उर्मिला अग्रवाल संपा. हा. सं. ‘हिन्दी हाइकु: प्रकृति-काव्यकोश’ (63)
विश्वसनीय रंगों की कहानियाँ : डॉ. आईदानसिंह भाटी द्वारा सुश्री  पुष्पलता कश्यप के कथा संग्रह ’पंख खोलते परिंदे’ (65)
प्रेम और अवसाद की कविताएँ :  सुदर्शन रत्नाकर द्वारा अनिता ललित के काव्य संग्रह ’बूँद बूँद लम्हे’ (66) की समीक्षाएँ।

स्तम्भ :
माइक पर/उमेश महादोषी का संपादकीय (आवरण 2)
हमारे आजीवन सदस्य (28)
चिट्ठियाँ (68), 
गतिविधियाँ (70), 
प्राप्ति स्वीकार (72)


इस अंक की साफ्ट (पीडीऍफ़) प्रति ई मेल (umeshmahadoshi@gmail.com)अथवा  (aviramsahityaki@gmail.com)  से मंगायी जा सकती है।

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3 टिप्‍पणियां:

  1. प्रो. मृत्युंजय उपाध्याय, वृंदावन, राजेन्द्र पथ, धनवाद-826001, बिहार

    अविराम साहित्यिकी, अप्रैल-जून 2014। जीवन में जो भी भ्रष्टता, अव्यवस्था, अशांति, अमानवीयता आदि है, उनकी शल्यक्रिया करना इन लघुकथाओं का अभीष्ट है। इतने से ही इन्हें चैन नहीं है। ये जीचवन के आलोक पक्ष (मानवीयता, दया, करुणा, परदुःख कातरता, त्याग, बन्धुत्व आदि) पर फोकस करते हैं और बार-बार इसका एहसास कराते हैं कि मानवता मरी नहीं है। आज भी ‘वहीं मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे’ (गुप्त) के प्रति कहानीकारों की प्रतिबद्धता आशा और विश्वास जगाती है। ‘प्रकृति की सीख’ (कस्तूरे) बताती है कि पत्थर की मार सहकर भी पेड़ फल दे सकते हैं तो मनुष्य का इतना पतन क्यों हो गया है। पूरन सिंह ‘रीति’ पर व्यंग्याघात करते हैं। बहू मर गई तो दूसरी बहू दान-दहेज के साथ आएगी। बेटियाँ माता-पिता के लिए भार हैं। वे आजहवन कुमारियाँ रह जाएँ तो पर्वाी नहीं, पर बेटे की शादी धूधाम से हो रही है। किशन स्वरूप अपनी दो ग़ज़लों में समकालीन सच का अनावरण करते हैं सत्ता मिल गई फिर हर हाल में लाभ ही लाभ है: ‘‘इस कुर्सी पर मैं बैठूँ या तुम बैठो अंतर क्या है/दोनों हाथों में लड्डू हैं, मुश्किल में आसानी में।’’ (पृ.16) शुभदा पाण्डेय प्रकृति का मनोरम, मोहक वितान तानती हैं तो इलेक्ट्रानिक युग के उपकरणों को प्रकृति के साथ मिला देती हैं- ‘‘पलाश टीपता है मोबाइल/सेमल के फेसबुक में।’’ (पृ.15)। डॉ. बलराम लघुकथाकार हैं तो प्रख्यात आलोचक भी। यह दोषी जी से उनकी बातचीत से पता चलता है। सभी बधाई के पात्र।

    श्रीकृष्ण कुमार त्रिवेदी, द्वीपान्तर, ला. ब. शास्त्री मार्ग, फ़तेहपुर-212601, उ.प्र.
    ....नये रचनाकारों को एक सशक्त मंच उपलब्ध कराकर आप साहित्य-शिक्षण एवं लेखन प्रशिक्षण का अत्यंत श्लाघ्य कार्य भी संपन्न कर रहे हैं। इसके लिए हार्दिक साधुवाद। आशा है कि रचनाकार इस सुविधा का लाभ उठायेंगे और अपने साहित्य की धार प्रखर करेंगे। डॉ. बलराम अग्रवाल का साक्षात्कार अत्यंत महत्वपूर्ण एवं उपयोगी है। लघुकथा के ब्याज से व्यक्त किए गए उनके विचार प्रायः समूचे साहित्य पर लागू होते हैं। उनके अगले विचार पढ़ने की उत्सुकता है। भाई श्यामसुंदर निगम का आलेख उनके और मेरे जैसे अनेक साहित्य शुभचिन्तकों की अनुभूति है। एकाध रचना में नई बोतल में पुरानी शराब है। ‘विस्तृत’ का ‘विस्त्रित’ टाइप हो गया है। प्रूफ की एकाध ऐसी त्रुटियाँ और भी हैं। ज्यादा सावधानी बरतें। ‘गतिविधियाँ’ स्तंभ में अन्य पत्र-पत्रिकाओं में भी प्रायः स्थान का नाम छोड़ दिया जाता है। इससे विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाती है। यह देखकर प्रशन्नता हुई कि पत्रिका प्रसार व्यापक विस्तार पा रहा है। हार्दिक बधाई।...

    प्रो.भगवानदास जैन, बी-105, मंगलतीर्थ पार्क, कैनाल के पास, जशोदानगर रोड, मणीनगर (पूर्व), अहमदाबाद-382445, गुजरात
    ....कहना न होगा कि अंक बहुविधि विपुल साहित्यिक सामग्री से सुसमृद्ध है। यद्यपि पत्रिका 3 वर्षीय शैशवावस्था में ही है किन्तु उसमें पाठक को प्रौढ़त्व के दर्शन सहज ही हो जाते हैं। छोटी-बड़ी बेशुमार पत्रिकाओं की भीड़ में अपनी निहायत सादगी के बल पर ‘अविराम साहित्यिकी’ जिस ज़िंदा दिली से जूझ रही है, वह निसंदेह काबिलेतारीफ है- वही मसल कि- ‘‘इस सादगी पे कौन न मर जाय ऐ ख़ुदा/लड़ते हैं फिर भी हाथ में तलवार भी नहीं।’’
    प्रस्तुत अंक की पुरअसर रचनाएँ हैं- कविताएँ (रामेश्वर काम्बोज हिमांशु, डॉ. यायावर, डॉ. मालिनी गौतम), ग़ज़लें (नरेश निसार, किशन स्वरूप, डॉ. महाश्वेता चतुर्वेदी, प्रो. रमेश सिद्धार्थ, डॉ. दिनेश त्रिपाठी आदि), श्री सुभाष मित्तल की कुण्डलियाँ भी अच्छी लगीं। अंकस्थ लघुकथाएँ भी समसामयिक बोध को बखूबी व्यंजित करती हैं। ‘विमर्श’ स्तंभ की समग्री साहित्यिक दृष्टि से अत्यंत मूल्यवान एवं महत्वपूर्ण होती है। डॉ. उमेश महादोषी के लघुकथा विषयक प्रश्नों के उत्तर डॉ. बलराम अग्रवाल ने खुलकर और बड़ी सहजता से दिए हैं। प्रश्न और उत्तर दोनों में समसामयिक सोच/चिंतन की गंभीरता गौरतलब है। यह स्तंभ अंक को संग्रहणीय बनाता है। अंक के ‘किताबें’ और ‘गतिविधियां’ जैसे स्तंभ भी महत्वपूर्ण होते हैं, जो पाठकों की जानकारी में इजाफा करते हैं। आपका विलक्षण संपादकत्व श्लाघ्य है।...

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  2. कुछ और पत्र-

    महेश सक्सेना, 555, न्यू कोट गाँव, जी.टी. रोड, गाजियाबाद, उ.प्र.

    ....इतना कहने का साहस अवश्य कर रहा हूँ कि पद्य की रचनाओं में छन्द मरना नहीं चाहिए। ऊँची दुकानों का फीका पकवान होता है, यह लोकोक्ति गलत नहीं है। इस अंक में मेरी मित्र श्रेष्ठ रचनाकार ने एक ग़ज़ल दी है। उन्होंने यह भी ध्यान नहीं दिया कि ग़ज़ल एक-दो जगह पर बह्र से खारिज है। गीत और ग़ज़ल छापने में सतर्कता बर्ती जाए। बस बात पर चर्चा पहले भी आपसे हुई थी। कवियों/शाइरों की जैसी की तैसी रचनाएँ छापना उत्तम नहीं होता। अच्छे शाइर और गीतकार रचनाएँ कम ही प्रकाशित कराने की ललक रखते हैं। गलत गीत/ग़ज़ल नवोदित पाठकों को क्या दे पाएंगी, ज्वलंत प्रश्न है।....साहित्य गणित के समान है और यदि गणित की किताब गलत छपती है तो नई पीढ़ी गलत ही सीखेगी। और तुकबंदियों से सारा साहित्य आच्छादित हो जाएगा।....

    डॉ. अ. कीर्तिवर्द्धन, 53, महालक्ष्मी एनक्लेव, जानसठ रोड, मुजफ्फरनगर-251001, उ.प्र.

    .....अविराम साहित्यिकी समय से प्राप्त हो रही है। देस भर से साहित्यकारों का जुड़ाव पत्रिका की गुणवत्ता तथा प्रसार का परिचायक है।... प्रत्येक अंक में विद्वान लेखकों द्वारा विषय की बारीकियों पर चर्चा सभी साहित्यकारों का मार्गदर्शन करती है। श्यामसुंदर निगम जी का ‘आलोचक के पूर्वग्रह बनाम आलोचना के आग्रह’ पढ़ा। विगत दिनों मुझे भी जालन्धर दूरदर्शन पर ‘आलोचना के बदलते आयाम’ परिचर्चा में भाग लेने का अवसर मिला। मेरा मानना है कि वरिष्ठ लेखकों अथवा आलोचकों को नवोदित साहित्यकारों की समालोचना करनी चाहिये। हमें चाहिए कि स्थापित मूल्यों से हटकर लेखक की नई दृष्टि, शैली से आत्मसात् होते हुये, लेखक के परिवेश को, तात्कालिक सामाजिक संरचना को समझते हुये लेखन में भाव पक्ष पर ध्यान दें। पहली बात तो यह है कि लेखक का चिन्तन अपने परिवेश से प्रभावित है। उस पर सामाजिक (जैसा उसने देखा-भोगा), धार्मिक व राजनैतिक विचारधारा का प्रभाव स्पष्ट होता है। हाल ही के चुनाव में, मेरा व्यक्गित झुकाव भाजपा, मोदी, राष्ट्रवाद की ओर था। स्वाभाविक रूप से उसके पक्ष में रचनाओं में झुकाव आयेगा। यदि यह सामग्री किसी वामपंथी अथवा कांग्रेसी विचारधारा के आलोचक को दी जाये तो वह अपने तर्क से इसे कचरा साबित कर देगा। यदि व्याकरण के नियमों की दृष्टि से देखा जायेगा तो यह मात्र सैद्धान्तिक अथवा निर्णयात्मक आलोचना बनकर रह जायेगी। निगम जी ने एक बहुत ही सार्थक एवं मार्गदर्शक बात कही- ‘‘आलोचक यदि पाठक के सोच को परिस्कृत कर सके, वैचारिक दृष्टि से समृद्ध कर सके, रचना के पाठ में रुचि बढ़ा सके तो शायद आलोचना अधिक अर्थवान हो सकेगी।’’ यहाँ पर यह भी आवश्यक है कि समीक्षा करते समय जो बिन्दु कसौटी पर खरे नहीं उतरे, उन्हें सुझाव के रूप में लेखक को इंगित करें- ‘‘अगर इसमें इन बिन्दुओं पर भी ध्यान रखा जाये तो और भी बेहतर हो सकता है’’ आदि। मगर कोई कवि-लेखक वरिष्ठ बनता है तो कनिष्ठ भी अवश्य होंगे। विद्वानों की महासभा में भी महाविद्वान मिलते हैं। यह तुलनात्मक स्थिति है, परम स्थिति नहीं। हमारा दायित्व है कि आलोचना/समीक्षा करते समय लेखक के श्रम को तो महत्व दें। .... अब समय आ गया है कि आलोचकों/समीक्षकों को अपनी दृष्टि बदलनी पड़ेगी।....

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  3. कुछ और पत्र-

    दिलीप भाटिया, 372/201, न्यू मार्केट, रावतभाटा-323307, राज.

    ...गुणवत्तापूर्ण उत्कृष्ट सम्पादन हेतु साधुवाद। लघुकथा के स्तम्भ में उर्मि दीदी को पढ़कर संवेदनशील रचनाएँ बहुत कुछ शिक्षा दे गईं। पर्दे के पीछे के साहित्यकारों को भी इस स्तम्भ के माध्यम से मंच पर लाइए। पत्रिका में पुराने प्रतिष्ठित साहित्यकारों के साथ उभरती प्रतिभाओं को स्थान देने से पत्रिका का प्रचार-प्रसार स्वतः ही होता चला जायेगा। सत्साहित्य लघु पत्रिकाओं तक ही सीमित रह पा रहा है। पर वही लेखक, वही पाठक भर हैं। हर लेखक अन्य लेखकों को पढ़ रहा है। पाठकों को जोड़ने की आवश्यकता है। लेखक मात्र प्रकाशन, सम्मान, पुरस्कार हेतु लिख रहे हैं, पाठकों के स्नेहपूर्ण पत्रों का उत्तर तक नहीं देते हैं। क्या कोई समाधान है?...

    डॉ. मालिनी गौतम, मंगल ज्योति सोसाइटी, संतरामपुर-389280, जिला पंचमहल, गुजरात

    ....अविराम साहित्यिकी का जन.मार्च 2014 अंक ससमय प्राप्त हुआ। मनोयोग से पढ़ा। लघु कथाएँ, जनक छन्द,डॉ. सतीश दुबे से राधेश्याम शर्मा की बातचीत प्रभावशाली लगे। यह जानकर खुशी हुई कि अविराम का अक्टू-दिस. 2014 अंक आजीवन सदस्यों पर केन्द्रित होगा।...

    मनीष कुमार सिंह, एफ-2, 4/273, वैशाली, गाजियाबाद-201010 (उत्तर प्रदेश)
    आशा है कि आप कुशल और सानंद होगें। ‘अविराम साहित्यिकी’ का प्रत्येक अंक रचना वैविध्य से पूर्ण होता है। लघु कथा और क्षणिका जैसी विधाओं को पर्याप्त स्घ्थान देने में आपकी पत्रिका अग्रणी है।

    भवेश चन्द्र जायसवाल, श्रीकृष्णपुरम् कॉलोनी, अनगढ़ रोड, मिर्जापुर-231001 (उत्तर प्रदेश)
    अविराम साहित्यिकी अप्रैल-जून 2014 अंक मिला। सभी रचनायें पठनीय लगीं। विषयों की विविधता का एक आकर्षण है अविराम साहित्यिकी में। पत्रिका के सम्पादन की आपकी कुशलता पर मैं मुग्ध हूँ। ज्ञानवर्धक एवं सुरुचिपूर्ण इस अंक के लिए बधाई स्वीकारें।....

    नयन कुमार राठी, 64, उदापुरा (नरसिंह बाजार के पास), इंदौर-452002, म.प्र.

    ...अविराम साहित्यिकी, अप्रैल-जून 2014 की प्रति प्राप्त हुई।...सभी सामग्री संदेशपरक एवं पठनीय है। अविराम साहित्यिकी का मतलब है बिना रुके साहित्यिकी यात्रा साहित्य के साधकों के साथ बढ़ती रहे। पुनः धन्यवाद एवं बधाई।....

    मो. कासिम खान ‘तालिब’, 14, अमीर कम्पाउण्ड, बी.एन.पी. रोड, देवास, म.प्र.

    ...पत्रिका को इन्दुधनुषी कहना भी उचित नहीं लगता। इन्द्रधनुष में तो सात रंग ही होते हैं किन्तु अविराम साहित्यिकी के हजारों रंग मन मस्तिष्क पर गहरी छाप छोड़ते हैं। पत्रिका अभी पढ़ रहा हूँ। सभी लेखकों, कवियों, शाइरों को शुभकामनाएँ।...

    विनय ‘सागर’ जायसवाल, 846, शाहबाद, गोंदनी चौक, बरेली-243003, उ.प्र.

    अविराम साहित्यिकी, अप्रैल-जून 2014 अंक प्राप्त हुआ। पत्रिका में लघुकथा, क्षणिकाओं एवं जनक छन्दों के साथ अन्य विधाओं को भी स्थान दिया गया है। अनेक अच्छे रचनाकारों की रचनाओं से पूर्ण अंक बेहद अच्छा बन पड़ा है। इसके लिए आप दोनों बधाई के पात्र हैं। आशा है आपकी लगन और सूझबूझ से पत्रिका नित्य नये सोपान छूती रहेगी। लेखक का मोबाइल नं. भी प्रकाशित करें तो और भी अच्छा रहेगा।

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