आपका परिचय

शनिवार, 8 दिसंबर 2012

अविराम के अंक

अविराम साहित्यिकी 
(समग्र साहित्य की समकालीन  त्रैमासिक पत्रिका) 

खंड (वर्ष) : 1/ अंक : 3 / अक्टूबर-दिसम्बर 2012  

प्रधान सम्पादिका : मध्यमा गुप्ता

इस विशेषांक के अतिथि संपादक : डॉ. बलराम अग्रवाल 

अंक सम्पादक : डा. उमेश महादोषी 
सम्पादन परामर्श : डॉ. सुरेश सपन
मुद्रण सहयोगी : पवन कुमार


यह अंक :

समकालीन लघुकथा : यात्रा, विमर्श और सृजन


अविराम का यह मुद्रित अंक रचनाकारों व सदस्यों को 19 नवम्बर 2012 को तथा अन्य सभी सम्बंधित मित्रों-पाठकों को 25 नवम्बर 2012 तक भेजा जा चुका  है। अंक प्राप्त न होने पर सदस्य एवं अंक के रचनाकार अविलम्ब पुन: प्रति भेजने का आग्रह करें। अन्य  मित्रों को आग्रह करने पर उनके ई मेल पर पीडीऍफ़ प्रति भेजी जा सकती है। पत्रिका पूरी तरह अव्यवसायिक है, किसी भी प्रकाशित रचना एवं अन्य  सामग्री पर पारिश्रमिक नहीं  दिया जाता है। इस मुद्रित अंक में शामिल रचना सामग्री और रचनाकारों का विवरण निम्न प्रकार है- 


।।सामग्री।।

अ.संपादकीय : 

घटना कथा नहीं होती, बनायी जाती है :  बलराम अग्रवाल (3)।

मेरी लघुकथा यात्रा : 

कमलेश भारतीय (5), सिमर सदोष (8), सतीश दुबे (11), बलराम (15), चित्रा मुद्गल (17), युगल (20), रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ (25), सुकेश साहनी (26), अशोक भाटिया (28), माधव नागदा (29), मालती बसंत (महावर) (30), पारस दासोत (31) एवं अशोक गुजराती (33) के अपनी लघुकथा यात्रा पर आलेख।

रोचन्ते रोचना दिवि : 

विष्णु प्रभाकर (35), रामनरायण उपाध्याय (36), हरिशंकर परसाई (36), श्याम सुन्दर व्यास (37), शरद जोशी (37), सुरेन्द्र मंथन (38), कृष्ण कमलेश (39), जगदीश कश्यप (39), रमेश बतरा (40) एवं कालीचरण प्रेमी (41) की लघुकथाएँ।

बातचीत : 

सूर्यकांत नागर-ब्र.कानूनगो (42), भगीरथ-अर्चना वर्मा (47), शैलेन्द्र कुमार शर्मा-संतोष सुपेकर (51) एवं पुरुषोत्तम दुबे-प्रताप सिंह सोढ़ी (54) की समकालीन लघुकथा सं जुड़े विभिन्न मुद्दों पर वार्ताएँ।

वयं स्याम यशसो जनेषु : 

सतीश दुबे (55), भगीरथ (55), सिमर सदोष (56), पृथ्वीराज अरोड़ा (57), कमलेश भारतीय (58), शंकर पुणतांबेकर (58), बलराम (59), चित्रा मुद्गल (60), शकुन्तला किरण (60), सूर्यकान्त नागर (61), मधुदीप (62), महेश दर्पण (62), रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ (63), अशोक भाटिया (64), मालती बसंत (64), पवन शर्मा (65), विक्रम सोनी (65), सुकेश साहनी (66), कमल चोपड़ा (67), श्याम सुन्दर अग्रवाल (68), सुभाष नीरव (68), श्याम सुन्दर दीप्ति (69), सतीशराज पुष्करणा (70), असग़र वजाहत (71), फजल इमाम मल्लिक (71), श्याम सखा ‘श्याम’ (72), एन॰ उन्नी (73), माधव नागदा (73), सत्य शुचि (74), रूपसिंह चन्देल (74), उर्मि कृष्ण (75), मुकेश शर्मा (76), पारस दासोत (76), सुरेश शर्मा (77), रामकुमार आत्रेय (77), युगल (78), आशा शैली (79), तारिक असलम ‘तस्नीम’ (80), रतन चन्द ‘रत्नेश’ (80), के.एल. दिवान (81), रामयतन यादव (81), मिथिलेश कुमारी मिश्र (82), अशोक मिश्र (83), दिनेश पाठक ‘शशि’ (83), ओमप्रकाश कश्यप (84), प्रतापसिंह सोढ़ी (85), प्रेम गुप्ता ‘मानी’ (85), राजेन्द्र परदेसी (86), सतीश राठी (87), घनश्याम अग्रवाल (87), नरेन्द्रनाथ लाहा (88), कुँवर प्रेमिल (88), मो.मुइनुद्दीन ‘अतहर’ (89), विजय (89), अशफाक अहमद (90), संतोष सुपेकर (90), दिलबाग विर्क (91), सीताराम गुप्ता (91), पवित्रा अग्रवाल (92) , शरद सिंह (93), मोहसिन खान (94), ज्योति जैन (94), उमेश मोहन धवन (95), असफाक कादरी (95), विधु यादव (96), मीरा जैन (97), नियति सप्रे (98), छाया गोयल (98), मृणालिनी घुले (99), सुधा भार्गव (99), देवेन्द्र गो. होलकर (100), सुरेन्द्र कृष्णा (100), सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा (101), महावीर उत्तरांचली (102), रामकुमार घोटड़ (102), त्रिलोक सिंह ठकुरेला (103), नीलम राकेश (103), राजेंद्र देवधरे ‘दर्पण’ (104), राजेन्द्र वर्मा (104), राजेन्द्र नागर ‘निरन्तर’ (105), प्रभुदयाल श्रीवास्तव (105), जितेन्द्र ‘जौहर’ (106), दिलीप भाटिया (106), सरस्वती माथुर (106), भवानी सिंह (107), पी0 के0 शर्मा (108), बालकृष्ण गुप्ता ‘गुरु’ (109), कमलेश व्यास ‘कमल’ (109), हसन जमाल (110), योगेन्द्रनाथ शुक्ल (110), किशोर श्रीवास्तव (111), उषा अग्रवाल ‘पारस’ (111), राजेन्द्र मोहन त्रिवेदी‘बन्धु’(112), वेदप्रकाश अमिताभ (113), शोभा रस्तोगी ‘शोभा’ (113), रेनू चौहान (114) एवं शैलबाला अग्रवाल (114) की लघकथाएँ। 

माइक पर : 

उमेश महादोषी की अंक प्रस्तुति (आवरण 2)

चिट्ठियाँ : 

विगत अंक पर प्रतिक्रियाएं (116)। 

गतिविधियाँ : 

संक्षिप्त साहित्यिक समाचार (118)।

प्राप्ति स्वीकार : 

त्रैमास में प्राप्त विविध प्रकाशनों की सूचना (120)

6 टिप्‍पणियां:

  1. लघुकथा विशेषांक पर कुछ मित्रों के पत्रांश-

    प्रो.मृत्युंजय उपाध्याय,वृन्दावन, मनोरमनगर,एल.सी.रोड,घनवाद-826001(झार)
    ....जीवन जितना क्षिप्र, कर्मसंकुल और आपाधापी वाला होता है, मनुष्य क्षणिकाओं और लघुकथाओं की ओर उतना ही भागने लगता है। अभिव्यक्ति की बेचैनी बिना व्यक्त हुए दम कहाँ ले पाती है! फलतः लघुकथाएँ स्पेस लेती हैं। जीवन के मूल्यक्षरण, बाजारवाद, भूमण्डलीकरण, उपभोक्तावाद, टूटते-दरकते पारिवारिक संबन्ध, मनुष्य के छल, विश्वासघात, ठगवृत्ति, नारी की दुर्दशा,, उसके पतन में पुरुष की भागेदारी, राजनीतिक छल छद्म, प्रजातंत्र की जगह तंत्र के स्थान आदि पर केन्द्रित लघुकथाएँ प्रेरक, दृगोन्मीलक और वर्तमान समाज का अविकृत दर्पण हैं। यह तो हुआ लघुकथा का विनियोग (application) पक्ष। इसके सैद्धान्तिक पक्षों पर भी लघुकथाकारों ने सटीक टिप्पणी की है। उनका भोगा सच सबके सामने आया है। माधव नागदा मानते हैं, ‘‘परिवेश में घटित होने वाली कई घटनाएँ, लोगों की आदतें, परिस्थितियों के प्रति उनकी प्रतिक्रियाएँ, संघर्ष के तौर-तरीके, भोले अंधविश्वास, पाखण्ड, धूर्तता और सरलता, प्रेम और घृणा, जातीय और आर्थिक भेदभाव आदि कई ऐसी चीजें हैं, जो कथ्य के तौर पर किसी और विधा की माँग करने लगीं’’ और वह उनकी ओर (लघुकथा) प्रवृत्त हुए। सभी लेखक साधुवाद के सच्चे अधिकारी हैं।...

    पारस दासोत, प्लॉट नं.129,गलीनं.9-बी, मोतीनगर, क्वींसरोड, वैशाली, जयपुर-21
    ....अंक ने ‘लघुकथा की यात्रा’ को उसका विसाल कद (महान कद) सौंपते हुए एक अनूठा इतिहास रचा है। आपने लघुकथाकारों को जो ऊँचाई दी, वह, लघुकथा जगत को किसी ने पहली बार दी है। विश्वास है लघुकथा-जगत इस ऊँचाई को, सम्भाले, संजोए रखेगा। भाई बलराम अग्रवाल के सम्पादन ने, इस अंक को संग्रहणीय ही नहीं, शोधार्थियों के लिए अमूल्य बना दिया है। पुनः, मेरा ही नहीं समूचे लघुकथा जगत का आभार स्वीकारें!...

    प्रतापसिंह सोढ़ी, 5,सुख शांति नगर, बिचौली हप्सी रोड, इंदौर-16(म.प्र.)
    ....एक प्रामाणिक पीठिका के अभाव में साहित्य की कोई विधा स्वीकारोक्ति का अभिमत नहीं पा सकती। साहित्य के इतिहास का अपने ढंग से सृजनात्मक परिवेश हुआ करता है, जो सब तरह से उसमें विश्लेषित होने वाली सद्य-स्फुट धाराओं का संयोजनात्मक दृष्टि से रेखांकन करता है। जब दो दृष्टि सम्पन्न साहित्यकार किसी विधा पर विशेषांक निकालते हैं तो वह अंक अपने श्रेष्ठ स्तर के कारण एक दस्तावेज का रूप धारण कर लेता है। अतिथि सम्पादक डॉ. बलराम अग्रवाल लम्बे अर्से से लघुकथा विधा में एक स्थापित लघुकथाकार, सम्पादक एवं समीक्षक के रूप में निष्ठावान एवं समर्पित साहित्यकार हैं। अतिथि सम्पादक के रूप में उन्होंने इस विशेषांक को एक नया आयाम दिया है। श्रेष्ठ लघुकथाओं का चयन, शीर्ष लघुकथाकारों की लघुकथा-यात्रा को इस अंक में सम्मिलित कर अविस्मरणीय कार्य किया है।...

    राधेश्याम, 184/2, शील कुंज, आई.आई.टी., रुड़की (उ.खंड)
    ....कई बार सोचा पत्र लिखूँ पर समय हाथ से फिसलता गया।....अविराम मेरा मनोरंजन कर रहा है। अनेकानेक धन्यवाद।....रुड़की शहर का नाम साहित्यिक क्षेत्र में आपसे रोशन है, दूर-दूर के हिन्दी प्रेमियों का सहयोग आपको यानी पत्रिका को प्राप्त है, ये गर्व की बात है।....

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  2. लघुकथा विशेषांक पर कुछ और मित्रों के पत्रांश-

    मधुदीप, निदेशक- दिशा प्रकाशन, 138/16 त्रिनगर, दिल्ली-110035
    ....भाई बलराम अग्रवाल ने इस अंक को तैयार करने में बहुत ही मेहनत की है। उनका कुशल सम्पादन पत्रिका के प्रत्येक पृष्ठ पर बिखरा हुआ है। बहुत समय बाद इतनी श्रेष्ठ लघुकथाओंें के साथ इस विधा पर इतने सारगर्भित लेख और वरिष्ठ लघुकथाकारों की लघुकथा-विषयक यात्रा पढ़ना बहुत ही सुखद अनुभव रहा।....

    माधव नागदा लालमादड़ी (नाथद्वारा)-313301(राज.)
    ....लघुकथा विधा पर यह एक अनूठा अंक है। डॉ. बलराम अग्रवाल ने साहित्य के तीन अंग यात्रा, विमर्श और सृजन का समायोजन बड़ी सूझ-बूझ के साथ किया है। यात्रा में उन लघुकथाकारों के संघर्ष को मान दिया गया है जो बरसों से इस विधा के लिए समर्पणपूर्वक काम करते आ रहे हैं तो विमर्श के अन्तर्गत लघुकथा विधा की दशा और दिशा को रेखांकित करने वाले चार सार्थक साक्षात्कार दिए गये हैं। पूर्व में व्यंग्य को लघुकथा से अलगाने के कई प्रयास किए गये हैं जिनमें स्वयं भगीरथ भी आगीवान थे परन्तु अब उनका यह कहना कि सामाजिक विसंगतियों, पाखंडों और विडम्बनाओं को अभिव्यक्त करने के लिए व्यंग्य की तेज धार चाहिए, आश्वस्तिकारक है। वस्तुतः यदि व्यंग्य, लघुकथा में अंडरकरंट की तरह उपस्थित हो तो कोई हानि नहीं है बल्कि लघुकथा की सामर्थ्य को बढ़ाता ही है।....

    डॉ. सेराज खान बातिश, 3-बी, बंगाली शाह वारसी लेन, दूसरा तल्ला, फ्लैट नं.4, खिदिरपुर, कोलकाता-700023 (प.बं.)
    ....मुखपृष्ठ पर लोक परिचित कवि रघुवीर सहाय की ‘नैतिकता बोध’ पढ़कर आश्चर्य हुआ कि रघुवीर सहाय एक समर्थ कथा सर्जक भी थे। संपादकीय में बड़ी गंभीरता से लघुकथा को साहित्य की मुख्यधारा में बने रहने के संघर्षों पर बात की गई है। इस विधा को स्थापित करने के लिए लघु पत्रिकाओं ने बड़ी अहम भूमिका अदा की है और आज भी कर रही हैं। एक साथ अपने समय के शीर्ष लघुकथाकारों को पढ़कर बहुत कुछ सीखा जा सकता है। यह अफसोस हो रहा है कि मैं इस सूची में नहीं हूँ। इनसे होकर गुजरना अपने समय के हालात से गुजरने के बराबर है।....इसके अलावह लघुकथाओं पर बातचीत और आलेख भी बड़े काम के हैं।...

    डॉ.रामसनेही लाल शर्मा ‘यायावर’, 86,तिलकनगर, बाईपास रोड,फीरोजाबाद
    ....आपने इसे सर्वांगपूर्ण बनाने में विशेष श्रम किया है। मुझे यह देखकर अच्छा लगा कि आपने स्व. जगदीश कश्यप की लघुकथा को भी स्थान दिया है। कुछ लघुकथायें प्रेमचन्द जी ने तथा माखन लाल चतुर्वेदी जी ने भी लिखीं थी। यदि वे भी रहती तो अंक और सुन्दर हो जाता, परन्तु इस रूप में भी यह अप्रतिम है।...

    भारतेन्दु मिश्र, एल-187/सी, दिलशाद गार्डन, दिल्ली-95
    ....आवरण और अन्दर का ले आउट बहुत अच्छा न होते हुए भी कहानियों (लघुकथाओं) का चयन अच्छा किया गया है। भाई बलराम अग्रवाल जी ने सचमुच मेहनत की है। विशेष बात यह है कि रुड़की जैसी जगह से इतनी सुन्दर साहित्यिक पत्रिका आप निकाल रही हैं, यह बहुत आश्वस्ति का सूचक है।....

    संतोष सुपेकर, 31, सुदामानगर, उज्जैन-456001 (म.प्र.)
    ....शताधिक लंबी इस विधा की राह में मील का पत्थर सिद्ध होगा आपका एवं परम आदरणीय डॉ. बलराम अग्रवाल का यह प्रयास। ज्ञानवर्धक, प्रेरक सम्पादकीय, मेरी लघुकथा यात्रा, साक्षात्कार सभी कुछ आपके उत्तम सम्पादकीय कौशल से होकर गुजरे हैं। लघुकथा विधा के तमाम बड़े और महत्वपूर्ण हस्ताक्षर इस विशेषांक के माध्यम से खुलकर एक जाजम पर आए हैं। सम्पादकीय में मेरे छोटे से सहयोग को आपने रेखांकित किया, मैं आभारी हूँ।...

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  3. लघुकथा विशेषांक पर कुछ और मित्रों के पत्रांश---

    बालकृष्ण गुप्ता ‘गुरु’, डॉ. बख्शी मार्ग, खैरागढ़-491881(छ.गढ़)
    ....गागर में सागर भरने के प्रयास में सागर का खारापन भी कुछ समा जाए तब तो तारीफ के शब्दों में संतुलन बनाना ही पड़ेगा, क्योंकि दोनों स्वाभाविक हैं। कुछ रचनाएँ लघु तो थीं पर उनमें कथा खोजने का प्रयास करना पड़ा। लेखकीय सहयोग के आधार पर 76 पृष्ठों की पत्रिका को 124 पृष्ठों तक ले जाना गैर जरूरी था। डॉ. सतीश दुबे- पड़ाव दर पड़ाव लंबी यात्रा में ’’बावजूद इसके मैं अपनी रचना प्रक्रिया में उन कमजोर बिन्दुओं को तलाशने की कोशिश कर रहा हूँ, जिसकी वजह से मेरी दो लघुकथाएँ भी मेरे समकालीन और चहेते मित्रों की, सुकेश साहनी प रामेश्वर काम्बोज द्वारा संपादित सद्य प्रकाशित संकलन के लिए ‘मेरी पसंद’ नहीं बन पाई।’’ वहीं दूसरी ओर बलराम- ‘कथा यात्रा का लघु कोना बने विराट’ में लिखते हैं- वह पाठक है, जिसे रचनात्मक साहित्य का चौथा खम्भा कह सकते हैं, जिसके बगैर साहित्य का रंगमहल भरभरा कर गिर पड़ेगा। मेरी एक लघुकथा ‘सार्थकता’ (अगस्त 2012 नवनीत में प्रकाशित) पहले दो छोटी पत्रिकाओं से वापस आ चुकी थी। अंत में ‘यज्ञ करते हाथ जलते हैं’ साहित्य और लघु पत्रिकाओं के मामले में भी सही है। कहना, लिखना सरल है, करना कठिन है। बहरहाल अंक अच्छे निकल रहे हैं, प्रयास सराहनीय है।...

    अखिलेश अंजुम, 2-झ-4, दादाबाड़ी, कोटा-324009(राजस्थान)
    ....भाई बलराम अग्रवाल के सम्पादन में समग्र लघुकथा विशेषज्ञों को देखकर प्रसन्न होना स्वाभाविक है। बरसों पहले कोटा में लघुकथा पर सम्पन्न एक आयोजन में प्रतिभागी के रूप में उनके सानिध्य का अवसर मिला था उनके साथियों के साथ।...
    सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा, डी-18, श्यामपार्क एक्स.साहिबाबाद-201005(उ.प्र.)
    ....आश्चर्यजनक कलेवर की समृद्ध पत्रिका। स्वयं को उकेरते हुए लघुकथा लेखन के मूर्धन्य कथाकारों का स्वयं मूल्यांकन। बलराम(अग्रवाल) जी के संपादन में चुनी हुई लगभग हर प्रान्त के रचनाकारों से सज्जित, सभी मानवीय संवेदनाओं को पन्नों पर शब्दांकित करती रचनाएं- लघुकथा को परिभाषित करता मुकम्मल दस्तावेज...बहुत अच्छा लगा। इतनी सारी लघुकथाओं का संग्रहणीय दस्तावेज। किस-किस का उल्लेख किया जाये। एक का भी नाम ले लिया तो दूसरे के साथ नाइंसाफी हो जाएगी। फिर भी के.एल.दिवान की ‘प्यार की वर्षा’ हो फिर तारिक असलम की ‘काबिल लोग’ हो, एक के बाद एक सभी लघुकथाएं प्रभाव छोड़ती हैं।...

    शुभदा पाण्डेय, असम विश्वविद्यालय, शिलचर-788011 (असम)
    ....छोटे आकार में तीव्र प्रभाव की बातें लिखी गई हैं। अनेक समस्याओं का सजीव चित्रण है। कथाकार अपनी पैनी बात से अपने उद्गार में सफल हैं। दहेज, जाति-प्रथा, भ्रष्टाचार, बूढ़ों का अपमान, भ्रूण-हत्या आदि सभी ज्वलन्त समस्याओं पर कथाएँ पढ़ने को मिलीं। नकारात्मक के साथ सकारात्मक बिन्दुओं की भी चर्चा है।....

    अब्दुल सत्तार अन्जान, बगोदा मार्ग, नयापुरा, तराना,उज्जैन-456665
    ....बिना विराम के अंक की सम्पूर्ण सामग्री पढ़ गया हूँ।...साहित्य, कला, संस्कृति आदि से जिनका भी जुड़ाव होता है, उनके सामने अर्थाभाव की समस्या तो आना ही है। लघुकथा का आज साहित्य में सुदृढ़ स्थान स्थापित हो चुका है। आपने इस अंक में, जो भी लघुकथा को स्थान दिया है, वह सम्पूर्ण प्रभाव छोड़ने में सक्षम है।

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  4. लघुकथा विशेषांक पर कुछ और मित्रों के पत्रांश---

    हरपालसिंह ‘अरुष’, 95,श्रीहरिवृंदावन सिटी-1, जानसठ रोड, मु.नगर(उ.प्र.)
    ....लघुकथा पर सामग्री और पर्याप्त संख्या में लघुकथाएं अंक को वजनदार बनाने में योग करती हैं। आशा है आगे भी अच्छे अंक आते रहेंगे।...

    डॉ.रामकुमार आत्रेय, 864-ए/12, आजादनगर, कुरुक्षेत्र-136119(हरि.)
    ....खूब! बहुत खूब! सीमित साधनों के बावजूद आपने ‘अविराम’ का लघुकथा विशेषांक निकालकर एक बढ़िया काम किया है। विशेषांक भी स्तरीय! आपके साथ-साथ अतिथि संपादक श्री बलराम अग्रवाल को बधाई।.....

    विवेक चतुर्वेदी, 164-10-2, मौ. बाजार कला, उझानी-243639,बदायूँ(उ.प्र.)
    ....अंक-3 तक आते-जाते पत्रिका एक सशक्त विस्तार पा चुकी है, जो कि हर्ष का विषय है। श्रेष्ठ लघुकथाओं की उपस्थिति इस अंक को पठनीय बनाती है।...

    डॉ.नरेन्द्र नाथ लाहा,27, ललितपुर कॉलोनी, डॉ.पी.एन.लाहा मार्ग, ग्वालियर(म.प्र.)
    ....लघुकथाओं का शानदार संकलन है। मध्यमा जी, बलराम जी व आपको बधाई। लेखकों को बधाई।...

    डॉ.रामकुमार घोटड़, राजगढ़ (चूरू)-331023 (राजस्थान)
    ....समकालीन लघुकथा का यह एक विशिष्ट लघुकथा संकलन है। लघुकथा सृजन, लेखकीय व्यक्तित्व लघुकथा यात्रा एवं लघुकथा विषयक विमर्श देकर आपने इसे एक संग्रहणीय जरूरी अंक बना दिया है। अंक में अतिथि संपादक अलराम अग्रवाल की कड़ी मेहनत चमकती है, निश्चित ही बलराम जी ने इस लघुकथांक को विशिष्ट आयाम दिये हैं। भारत भर के लघुकथाकारों को एकत्रित करके प्रकाशित करना व निःशुल्क अंक प्रेषित करना, आपका लघुकथा विधा के प्रति निस्वार्थ समर्पण भाव दर्शाता है। साधुवाद। अगर इस अंक को एक अच्छा सा प्रभावशाली शीर्षक देकर पुस्तकीय रूप दिया जाये तो हिन्दी लघुकथा विधा की एक साहित्यिक धरोहर बन जायेगा।....

    आनंद, ग्राम व डाक- पुर, जिला-भिवानी-127032 (हरियाणा)
    ....पत्रिका गागर में सागर है। इतने पृष्ठों में इतनी श्रेष्ठ रचनाओं का संकलन अच्छी सूझ-बूझ का परिचायक है। सब कुछ सुरुचिपूर्ण, पठनीय और मननीय।...

    डॉ. मोहसिन खान, जे.एस.एम. महाविद्यालय, अलीबाग, रायगढ़ (महाराष्ट्र)
    ....सबसे पहले आपके प्रयास, जज़्बे और परिश्रम की हृदय से प्रशंसा करता हूँ, आपने बड़ी ही लगन के साथ यह कार्य संपन्न किया है। आपको शत-शत अभिनन्दन!...

    दिलीप भाटिया, 372/201, न्यू मार्केट, रावतभाटा-323307(राजस्थान)
    ....यह विशेषांक एक लघुकथा संकलन पुस्तक बन गया है।....संवेदनशील रचनाओं का उत्कृष्ट संकलन है।...

    भवानी सिंह, 85, गायत्रीनगर-ए, महारानी फार्म, दुर्गापुरा, जयपुर-18(राज.)
    ....अविराम का हर अंक उत्कृष्ट सामग्री से भरपूर होता है। इस अंक में लघुकथाकारों की
    उत्कृष्ट रचनाएं प्रकाशित कर एक अच्छा प्रयास किया गया है।...

    शशांक मिश्र भारती, दुबौला-रामेश्वर पिथौरागढ़-262529 (उत्तराखण्ड)
    .....अनुभवी व विद्वान सम्पादक के हाथों अंक लघुकथा पर ऐतिहासिक बना है। मेरी लघुकथा यात्रा महत्वपूर्ण स्तम्भ रहा है, जिसमें रचनाकारों की लघुकथा यात्रा की आत्मकथात्मक शैली में उपयोगी जानकारी मिल रही है। रोचन्ते रोचना दिवि अनूठी व उद्देश्योपरक श्रृद्धांजलि है। वयं स्याम यशसो जनेषु में विविध विषयों पर नये-पुराने सत्तानवे रचनाकारों की लघुकथायें समाज-देश की अनेक ग्रन्थियों को खोलती दिखती हैं। बातचीत में निष्कर्ष तक पहुंचाने का सार्थक संवाद है। आवरण दो संपादकीय माइक, चिट्ठियां, गतिवधियां व प्राप्ति स्वीकार अंक को महत्वपूर्ण व संगृहणीय बनाने का कार्य करते हैं। अतिथि संपादकीय तो कहें इस विशेषांक को जीवन्तता देने का आधार है, उनका सन्देश सर्वस्वीकार्य होना चाहिए कि जिन्दा रहने के लिए जरूरी है मैदान में बने रहना।...

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  5. लघुकथा विशेषांक पर एक और मित्र का पत्रांश---

    डॉ अशफाक अहमद, टीचर्स कॉलोनी, जाफरनगर, नागपुर-440013 (महा.)
    ....इस अंक में जहाँ 100 से अधिक लघुकथाओं का समावेश है, वहीं लघुकथा के संबन्ध में विशेष रूप से चिन्तन मन्थन भी किया गया है। लघुकथा की यात्रा का जायजा लेकर उसकी खामियों और खूबियों को उजागर किया गया है। साथ ही नये लघुकथाकारों को न केवल लिखने के लिए प्रोत्साहित किया गया है बल्कि उन्हें सुन्दर अच्छी लघुकथा लिखने के लिए सही दिशा भी दी गई है। जिस प्रकार चिलचिलाती धूप और गरमी में एक क्षण के लिए ही सही, ठन्डी हवा का झोंका आता है और तपते शरीर को सुकून व समाधान दे जाता है और हम देर तक उस झोंके का आनन्द लेते रहते हैं, लघुकथा भी समस्याओं के इस युग में ठन्डी हवा का झोंका ही है। इस अंक में यह प्रयास भी किया गया है कि देश के विशेष रूप से लघुकथा लिखने वालों को शामिल किया गया है साथ ही पीछे मुड़कर भी आने वालों का पता पूछा गया है और उन्हें भी जगह दी है। मैं आपको इसके लिए मुबारकबाद देता हूँ कि आपने उन मित्रों को भी उनकी कथाओं के माध्यम से याद किया है जो अब इस संसार में नहीं हैं। पत्रिका निकालन एक बड़ा कठिन कार्य है, विशेष रूप से उन पाठकों का अकाल पड़ा है जो खरीद कर पढ़ते हैं।.... ‘आँखों में रहा दिल में उतरकर नहीं देखा/कश्ती के मुसाफिर ने समन्दर नहीं देखा/मैं जब से चला हूँ मेरी मंजिल पे नजर है/आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा’’।...

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  6. मै लघु कथाएँ पढ्ना चाहता था लेकिन नही पा रहा हुँ । मुझे कुछ जानकारी देनेका कष्ट किजिएगा कि कैसे यहाँ प्रकाशित कथाएँ पढि जाती है ।

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