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गुरुवार, 31 जनवरी 2013

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अविराम  ब्लॉग संकलन :  वर्ष :  02, अंक :  05,  जनवरी  2013


इन्दौर में अविराम के लघुकथांक पर चर्चा


फोटो : बाएं से दायें सदाशिव कौतुक, डॉ पुरुषोत्तम दुबे,
डॉ बलराम अग्रवाल, सुरेश शर्मा एवं प्रताप सिंह सोढ़ी 
     विगत दिनों अविराम साहित्यिकी के लघुकथांक (अक्टूबर-दिसम्बर 2012) पर इन्दौर में एक चर्चा का आयोजन किया गया। इस अवसर पर विशेषांक के अतिथि संपादक डॉ. बलराम अग्रवाल विशेष रूप से उपस्थित रहे। शहर के प्रसिद्ध शासकीय देवी अहिल्या पुस्तकालय के व्यवस्थित कक्ष में सर्वश्री प्रतापसिंह सोढ़ी, सुरेश शर्मा व डॉ. पुरुषोत्तम दुबे के प्रयासों से आयोजित इस कार्यक्रम में अविराम के लघुकथा विशेषांक पर चर्चा एवं डॉ. बलराम अग्रवाल जी से बतियाने के लिए नगर के सभी शुलभ साहित्यकारों/लघुकथाकारों को आमंत्रित किया गया था। अनेक साहित्यकारों की उपस्थिति में सर्वप्रथम श्री सोढ़ी जी ने डॉ. बलराम अग्रवाल व्यक्तित्व के मेधावी पक्ष को रेखांकित करते हुए ‘अविराम साहित्यिकी’ के लघुकथा विशेषांक के संपादन में अतिथि संपादक के रूप में उनकी भूमिका को सिद्धहस्त, उपयोगी और महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने डॉ. बलराम के संपादकीय से ‘घटना स्वयं में कथा कभी नहीं होती, कथा उसे बनाया जाता है’ विचार को रेखांकित करते हुए उस पर तफसील से प्रकाश डाला। 
      इस अवसर पर डॉ. बलराम अग्रवाल का पुष्पहरों से भावभीना स्वागत किया गया। लघुकथाकार प्रतापसिंह सोढ़ी, हरेराम बाजपेयी ‘आश’, सदाशिव कौतुक, डॉ. पुरुषोत्तम दुबे, डॉ. योगेन्द्रनाथ शुक्ल, जवाहर चौधरी, सुरेश शर्मा, ज्योति जैन, नियति सप्रे प्रभृति साहित्यकारों ने पुष्पमालाओं से डॉ. बलराम अग्रवाल के प्रति सम्मान-भाव व्यक्त किए।
      विशेषांक पर चर्चा के उपरान्त सभी उपस्थित लघुकथाकारों को उनकी एक-एक लघुकथा के पाठ का अवसर भी दिया गया। इसके उपरान्त डॉ. बलराम अगवाल ने अपने अतिथि उद्बोधन में लघुकथा के समकालीन लेखन पर विस्तार से अपने विचार रखे तथा अविराम के विशेषांक में प्रकाशित सामग्री के ‘क्यों और कैसे’ के उत्तर में अपनी बेबाक टिप्पणियाँ दर्ज करायीं। कार्यक्रम का कुशल व संयमित संचालन सदाशिव कौतुक ने किया। {समाचार सौजन्य: डॉ. पुरुषोत्तम दुबे, संपा. छह शब्द, 74 जे/ए, स्कीम नं.71, इन्दौर-9 (म.प्र.)}



शताब्दी पुरस्कार रामदरश मिश्र और प्रभाकर श्रोत्रिय को

श्री मध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति, इन्दौर द्वारा दिया जाने वाला अखिल भारतीय शताब्दी पुरस्कार इस बार वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. रामदरश मिश्र (दिल्ली) और डॉ. प्रभाकर श्रोत्रिय (गा.बाद) को संयुक्त रूप से तथा प्रान्तीय पुरस्कार श्रीमती ज्योत्सना मिलन (भोपाल) को उनके साहित्यिक अवदान के लिए दिया जाएगा। साहित्य अकादमी, नई दिल्ली में सम्पन्न निर्णायक मण्डल की बैठक, जिसमें सर्वश्री विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, अच्युतानन्द मिश्र, श्रीमती राजी सेठ और पाण्डेय शशिभूषण ‘शीतांशु’ शरीक थे, में यह निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया। उल्लेखनीय है कि एक लाख रु. राशि का यह अ.भा. पुरस्कार गम वर्ष डॉ. आनंदप्रकाश दीक्षित (पुणे) को और प्रान्तीय पुरस्कार श्री रमेश दवे (भोपाल) को दिया गया था। सम्मान समारोह मार्च में इन्दौर में आयोजित होगा। (समाचार सौजन्य: सूर्यकान्त नागर, संयोजक-श्री मध्यभारत हिन्दी साहित्य समिति, इन्दौर)   



भाव जगत के कथाकार इलाचंद्र जोशी  का स्मरण


फोटो : संगोष्ठी को संबोधित करती
भाषा विज्ञान विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय
 की पूर्व अध्यक्ष प्रो. ऊषा सिन्हा
कुमाऊँ विश्वविद्यालय की रामगढ़ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ ने जन्मदिन (13 दिसम्बर, 2013) पर भाव जगत के कथाकार इलाचंद्र जोशी का भावपूर्ण स्मरण किया। सृजन पीठ द्वारा राजकीय उच्च्तर माध्यमिक विद्यालय, मल्ला रामगढ़ (नैनीताल) में इलाचंद्र जोशी के व्यक्तित्व-कृतित्व पर आयोजित संगोष्ठी को संबोधित करते हुए मुख्य व्याख्याता लखनऊ विश्वविद्यालय के भाषा विज्ञान विभाग की पूर्व अध्यक्ष प्रो. ऊषा सिन्हा ने कहा कि आधुनिक हिंदी साहित्य एवं मनोविज्ञान के क्षेत्र में अपनी पहचान बनाने वालों में इलाचंद्र जोशी प्रमुख हैं। वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। विभिन्न विधाओं पर गम्भीर रचनाएँ उनकी हिंदी साहित्य को अमूल्य देन हैं। जोशी जी ने यद्यपि सभी विधाओं में लेखनी चलायी लेकिन उन्हें सर्वाधिक ख्याति मनोविश्लेषणात्मक उपन्यास के क्षेत्र में मिली। पात्रों की मानसिक स्थिति का जो सजीव चित्रण उनकी कहानियों और उपन्यासों में मिलता है, वह अन्यत्र दुर्लभ है।
प्रो. सिन्हा ने कहा कि प्रेमचंद ने अपनी कहानियों में सामाजिक कुरीतियों के बाह्य जगत को उद्घाटित किया परन्तु इलाचंद्र जोशी ने व्यक्ति के बाह्य जगत से कहीं अधिक महत्व आन्तरिक जगत को दिया है। उन्होंने हिंदी में पहले-पहल मनोविश्लेषण प्रधान उपन्यासों की परम्परा का सूत्रपात किया। चरित्रों के भाव जगत के सूक्ष्म विश्लेषण में उनके उपन्यास बेजोड़ हैं। उनकी विशेषता थी कि अध्ययनशील होते हुए भी दार्शनिकता का प्रभाव उनकी रचनाओं में नहीं दिखाई देता जिस कारण वे आम आदमी के अधिक निकट हैं। 
महादेवी वर्मा सृजन पीठ के निदेशक प्रो. देव सिंह पोखरिया ने कहा कि इलाचंद्र जोशी अपने समय के उन प्रबुद्ध साहित्यकारों में थे जिन्होंने भारतीय एवं विदेशी साहित्य का व्यापक अध्ययन किया था। उन पर रवीन्द्रनाथ टैगोर के व्यक्तित्व का विशेष प्रभाव रहा तथा सदैव लिखते रहने की प्रेरणा उन्हें शरतचन्द्र से मिली। जोशी जी कथाकार एवं उपन्यासकार होने के साथ एक सफल सम्पादक, आलोचक तथा पत्रकार भी थे। उनकी मनोविश्लेषणात्मक शैली अन्य लेखकों से बिल्कुल अलग है। इस शैली के कारण ही उनका साहित्य प्रायः दुरूह एवं जटिल प्रतीत होता है।
        रा0उ0मा0वि0 मल्ला रामगढ़ के प्राध्यापक मुख्तार सिंह ने कहा कि इलाचंद्र जोशी का संपूर्ण जीवन संघर्षमय रहा। बचपन में पिता की मृत्यु, आर्थिक संकट का निरंतर बने रहना, नौकरी करना और छोड़ना उनका स्वभाव बन गया था। इन विषम परिस्थितियों के बावजूद वह टूटे नहीं बल्कि इन स्थितियों को उन्होंने अपनी रचनाओं का हिस्सा बनाया। उनका बहुचर्चित उपन्यास ‘जहाज का पंछी’ एक तरह से उनके अपने जीवन की गाथा है।
       सृजन पीठ के शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत ने बताया कि 1960 में इलाचंद्र जी कुछ महीनों तक महादेवी वर्मा के रामगढ़ स्थित घर ‘मीरा कुटीर’ में रहे जहाँ उन्होंने ‘ऋतुचक्र’ नामक उपन्यास लिखा। पहाड़ी जीवन को लेकर लिखा गया उनका यह एकमात्र उपन्यास है। उल्लेखनीय है कि महादेवी जी के घर ‘मीरा कुटीर’ में ही कुमाऊँ विश्वविद्यालय की महादेवी वर्मा सृजन पीठ स्थापित है।
       राजकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, मल्ला रामगढ़ के प्रधानाचार्य देवेन्द्र कुमार जोशी ने महादेवी वर्मा सृजन पीठ की पहल की सराहना करते हुए कहा कि इस आयोजन से भूले-बिसरे साहित्यकार इलाचंद्र जोशी के व्यक्तित्व के छुए-अनछुए पहलुओं को जानने का अवसर मिला। निरंतर संघर्षरत रहकर जोशी जी ने साहित्य जगत में जो मुकाम हासिल किया, निसंदेह उससे विद्यार्थियों को प्रेरणा मिली होगी। इस प्रकार के आयोजनों की विद्यार्थियों में साहित्यिक जागरूकता उत्पन्न करने में विशेष भूमिका है। उन्होंने भविष्य में भी पीठ द्वारा विद्यालय में साहित्यिक गतिविधियाँ आयोजित कर विद्यार्थियों को साहित्य के प्रति जागरूक व प्रोत्साहित करने पर बल दिया। छात्रा दिलमाया थापा ने अपनी मौलिक कविता का पाठ किया। इससे पूर्व गणमान्य अतिथियों द्वारा इलाचंद्र जोशी के चित्र पर माल्यार्पण से संगोष्ठी का प्रारम्भ हुआ। 
        इस अवसर पर पीताम्बर दत्त भट्ट, प्रभात कुमार साह, ताहिर हुसैन, मुख्तार सिंह, ईश्वरी दत्त जोशी, शेखर चन्द्र गुणवन्त, बसन्त सिंह बिष्ट, रमेश सिंह रावत, साबिर खाँ, प्रमोद रैखोला, बहादुर सिंह आदि उपस्थित थे। संगोष्ठी का संचालन पीठ के शोध अधिकारी मोहन सिंह रावत ने किया।  {समाचार  प्रस्तुति : मोहन सिंह रावत बर्ड्स आई व्यू, इम्पायर होटल परिसर, तल्लीताल, नैनीताल-263 002(उत्तराखण्ड)}




अटलानी जी के नाटक संग्रह ‘सपनों की सौग़ात’ का विमोचन 


फोटो : दायें से बायें सुप्रसिद्ध डान्सर सिन्धु मिश्रा,
 डॉ. मुरलीधर
 जैटली,भगवान अटलानी, लक्ष्मण कोमल,
हीरो ठाकुर एवं जया जादवानी


हिन्दी व सिन्धी के वरिष्ठ लेखक भगवान अटलानी के ग्यारह एकांकियों के संग्रह ‘सपनो की सौगात’ का भारतीय कला केन्द्र, नई दिल्ली में विमोचन हुआ। प्रसिद्ध लेखक डा. मुरलीधर जैतली, लक्ष्मण कोमल, हीरो ठकुर, जया जादवानी, भरत नाट्यम की ख्यात नृत्यांगना सिन्धु मिश्रा तथा सिन्धी गुलिस्तान की प्रधान सम्पादिका अंजली तुलसियानी ने संयुक्त रूप से किया। मंच, आकाशवाणी, कठपुतली, इतिहास, विज्ञान तथा लोककथाओं पर केन्द्रित संग्रह की सभी एकांकियां सामाजिक व प्रगतिकामी विषयो पर आधारित हैं। पुस्तक का प्रकाशन नेशनल पब्लिशिंग हाउस ने किया है।
भगवान अटलानी की अब तक विभिन्न विधाओं मे इक्कीस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उन्हें राजस्थान साहित्य अकादमी के सर्वोच्च सम्मान मीरा पुरस्कार से नवाज़ा जा चुका है। वे राजस्थान सिन्धी अकादमी के अध्यक्ष रहे हैं। (समाचार सौजन्य: भगवान अटलानी, डी-183, मालवीय नगर, जयपुर-302017)        

सरल जी जैसा दूसरा कोई नहीं: सूर्यकान्त नागर

(श्रीकृष्ण जयन्ती समारोह में लघुकथा फोल्डर का हुआ विमोचन)


‘‘सरल जी जैसा दूसरा कोई नहीं है। विश्व में सबसे ज्यादा महाकाव्य रचने का गौरव राष्ट्रकवि श्रीकृष्ण सरल जी को प्राप्त है। देश के अमर शहीदों पर जिन परिस्थितियों में उन्होंने रचना की, वे पििस्थतियां बिल्कुल प्रतिकूल थीं।’’ यह बात वरिष्ठ साहित्यकार श्री सूर्यकान्त नागर ने उज्जैन में श्रीकृष्ण सरल जयंती पर आयोजित समारोह मुख्य अतिथि के रूप में अपने उद्बोधन में कही। शा. शिक्षा महाविद्यालय एवं ‘सरल काव्यांजलि’ के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस समारोह की अध्यक्षता करते हुए वरिष्ठ साहित्यकार श्री बी.के. शर्मा ने कहा कि सरल जी सदियों तक प्रासंगिक रहेंगे। विशेष अतिथि कवि व उपायुक्त (विकास) श्री प्रतीक सोनवलकर ने कहा कि सरल जी का साहित्य शासन द्वारा हर विद्यालय में पढ़ाया जाना चाहिए। श्री जगदीश गुप्त (ग्वालियर) व श्री अनिल सिंह चन्देल ने भी सरल जी के बारे में विचार व्यक्त किए।
    इस अवसर पर संतोष सुपेकर द्वारा संपादित राधेश्याम पाठक ‘उत्तम’ व राजेन्द्र देवधरे ‘दर्पण’ की लघुकथाओं के फोल्डर ‘शब्द सफर के साथी’ का विमाचन अतिथियों द्वारा किया गया। फोल्डर के दोनों लघुकथाकारों ने अपनी लघुकथाओं का पाठ भी किया। ख्यात समीक्षक डॉ. शेलेन्द्र कुमार शर्मा ने लघुकथा के बारे में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा, ‘‘लघुकथा सहलाती नहीं, ना ही वह लोरी बन सुलाती है। वह तो आम आदमी को जगाने का काम करती है। लघुकथा की शक्ति अणुशक्ति के समान है।’’ इस अवसर पर डॉ. उमा बाजपेयी, श्री जगदीश शर्मा एव डॉ. रेखा कोशल का सम्मान भी किया गया।
    प्राचार्य श्री ए.पी.पाण्डेय ने अतिथियों का परिचय दिया। संतोष सुपेकर ने सभी का आभार व्यक्त किया। संचालन श्री जे.पी.आर्य व परमानंद शर्मा ‘अमन’ ने किया। (समाचार सौजन्य: डॉ. संजय नागर, प्रचार सचिव: सरल काव्यांजलि)

1 टिप्पणी:

  1. हिन्दी की सम्पूर्ण मासिक पत्रिका ।गागर में सागर सी सार गर्भित और उपयोगी।

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