आपका परिचय

शुक्रवार, 26 मई 2017

अविराम के अंक

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  6,   अंक  :  05-06,  जनवरी-फ़रवरी  2017



अविराम साहित्यिकी 
(समग्र साहित्य की समकालीन त्रैमासिक पत्रिका)
खंड (वर्ष) :  5 / अंक : 4  / जनवरी-मार्च  2017 (मुद्रित)

प्रधान सम्पादिका :  मध्यमा गुप्ता

अंक सम्पादक :  डॉ. उमेश महादोषी 

सम्पादन परामर्श :  डॉ. सुरेश सपन

मुद्रण सहयोगी :  पवन कुमार 



अविराम का यह मुद्रित अंक रचनाकारों व सदस्योंको 14 फरवरी 2017  को तथा अन्य सभी सम्बंधित मित्रों-पाठकों को 18 फरवरी 2017 तक भेजा जा चुका है। 10 मार्च 2017  तक अंक प्राप्त न होने पर सदस्य एवं अंक के रचनाकार अविलम्ब पुनः प्रति भेजने का आग्रह करें। अन्य मित्रों को आग्रह करने पर उनके ई मेल पर पीडीफ़ प्रति भेजी जा सकती है। पत्रिका पूरी तरह अव्यवसायिक है, किसी भी प्रकाशित रचना एवं अन्य सामग्री पर पारिश्रमिक नहीं दिया जाता है। इस मुद्रित अंक में शामिल रचना सामग्री और रचनाकारों का विवरण निम्न प्रकार है-


।।सामग्री।।

प्रेरणा पुंज

डॉ. योगेन्द्रनाथ शर्मा ‘अरुण’  (4)
डॉ. सुधा गुप्ता  (5)
डॉ. बलराम अग्रवाल  (6)
रामेश्वर काम्बोज हिमांशु  (7)
नारायण सिंह निर्दाेष  (8)
मधुदीप  (9)

आजीवन सदस्य-1

शिवानन्द सिंह सहयोगी  (10)
डॉ. नलिन  (11)
संतोष सुपेकर  (12)
ऊषा कालिया  (13)
डॉ. रामसनेही लाल शर्मा ‘यायावर’  (14)
स्वराज सिंह काम्बोज  (15)
डॉ. जेन्नी शबनम  (16)
तोबदन  (17)
रामनरेश ‘रमन’  (18)
उषा अग्रवाल ‘पारस’  (19)
महावीर रंवाल्टा  (20)
राधेश्याम पाठक ‘उत्तम’  (21) 
सत्य शुचि  (22)
डॉ. मिथिलेश दीक्षित  (23) 
डॉ. ए.कीर्तिबर्द्धन  (24) 
राजेश उत्साही  (25) 
प्रकाश श्रीवास्तव  (26)
मनोहर शर्मा ‘माया’  (27)
संजीव कुमार अग्रवाल  (28)
विज्ञान व्रत  (29)
रामस्वरूप मूंदड़ा  (30)
प्रताप सिंह सोढ़ी  (31)
के. एल. दिवान  (32)
सुदर्शन रत्नाकर  (33)
डॉ.सतीश चन्द्र शर्मा ‘सुधांशु’  (34)
नित्यानन्द गायेन  (35)
डॉ. मालिनी गौतम  (36)
कमलेश चौरसिया  (37)
वंदना सहाय  (38)
डॉ. रघुनन्दन चिले  (39)
कन्हैयालाल अग्रवाल ‘आदाब’  (40)
रजनी साहू  (41)
माधुरी राऊलकर  (42)
डॉ. मालती बसंत  (43)
डॉ. अशोक कुमार गुप्त ‘अशोक’  (44)
कमलेश सूद  (45)
लक्ष्मण लाल योगी  (46)
डॉ. रामकुमार घोटड़  (47)
सुमन शेखर  (48)
डॉ. कपिलेश भोज  (49)
डॉ. विनोद निगम  (50)
पुष्पा मेहरा  (51)
केशव चन्द्र सकलानी ‘सुमन’  (52)
उमेश शर्मा  (53)
चक्रधर शुक्ल  (54)
कृष्णचन्द्र महादेविया  (55)
रामेश्वर दयाल शर्मा ‘दयाल’  (56)
विभा रश्मि  (57)
आभा सिंह  (58)
डॉ. अशोक भाटिया  (59)
आजीवन सदस्य-2

अन्य आजीवन सदस्य 
परिचय संकेत  (60)

अन्य सदस्य

तेज राम शर्मा  (63)
शशिभूषण बड़ोनी  (64)
हरनाम शर्मा  (65)
डॉ. मधुकांत  (66)
रमेश मिश्र ‘आनंद’/अहफ़ाज़ अहमद कुरैशी  (67)
सुरेन्द्र गुप्त ‘सीकर’  (68)
अशफाक अहमद/राजेश्वरी जोशी  (69) 
कोमल वाधवानी ‘प्रेरणा’  (70)
धृति वेडेकर/इन्द्रा किसलय  (71)

स्मृति अशेष 
(स्व. डॉ. सतीश दुबे को श्रद्धांजलि)

दुबे जी की लघुकथाएँ (72) व उमेश महादोषी का आलेख ‘‘डॉ. सतीश दुबे का रचनात्मक व्यक्तित्व: पिचहत्तर वर्षीय यात्रा का सर्वेक्षण’’(75)

स्तम्भ 
माइक पर : उमेश महादोषी का संपादकीय (आवरण 2)
सिर्फ आभार नहीं....! (3)
गतिविधियाँ (86)
प्राप्ति स्वीकार (88)
सूचनाएँ (28, 62, आवरण-3 व 4)  

अविराम के अंक

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  6,   अंक  :  05-06,  जनवरी-फ़रवरी  2017




अविराम साहित्यिकी 
(समग्र साहित्य की समकालीन त्रैमासिक पत्रिका)
खंड (वर्ष) :  5 / अंक : 3  /  अक्टूबर-दिसम्बर  2016 (मुद्रित)

प्रधान सम्पादिका :  मध्यमा गुप्ता

अंक सम्पादक :  डॉ. उमेश महादोषी 

सम्पादन परामर्श :  डॉ. सुरेश सपन

मुद्रण सहयोगी :  पवन कुमार 



अविराम का यह मुद्रित अंक रचनाकारों व सदस्योंको 14 नवम्बर 2016  को तथा अन्य सभी सम्बंधित मित्रों-पाठकों को 18 नवम्बर 2016 तक भेजा जा चुका है। 10 दिसम्बर 2016  तक अंक प्राप्त न होने पर सदस्य एवं अंक के रचनाकार अविलम्ब पुनः प्रति भेजने का आग्रह करें। अन्य मित्रों को आग्रह करने पर उनके ई मेल पर पीडीफ़ प्रति भेजी जा सकती है। पत्रिका पूरी तरह अव्यवसायिक है, किसी भी प्रकाशित रचना एवं अन्य सामग्री पर पारिश्रमिक नहीं दिया जाता है। इस मुद्रित अंक में शामिल रचना सामग्री और रचनाकारों का विवरण निम्न प्रकार है-      


।।सामग्री।।  

अनवरत-1 (काव्य रचनाएँ)

अमर कवि निरंकार देव ‘सेवक’ (3) 
मृत्युंजय उपाध्याय (6) 
हृदयेश्वर (7) 
आनन्द तिवारी पौराणिक (8)
नारायण सिंह निर्दोष/विनोद अश्क (9) 
राजेन्द्र परदेेसी/वासुदेव उबेराय (10) 
हितेश व्यास  (11) 
आभा सिंह/चकोर चतुर्वेदी (12) 
रमेश राज (13) 

स्मरण

काफिला का सक्रिय सहयात्री - विक्रम सोनी : डॉ. सतीश दुबे (14)

आहट (क्षणिकाएँ)

डॉ. शील कौशिक/मंजू मिश्रा (18)

सवालों से सामना

न गाँव को मैं छोड़ पाया न गाँव मुझे: श्याम सुन्दर निगम (चक्रधर शुक्ल के सवालों पर) (19) 

विमर्श   

सोशल मीडिया पर हिन्दी लघुकथा-02/डॉ. जितेन्द्र ‘जीतू’ (25)   

कथा कहानी (कहानियाँ)

शिउली : लक्ष्मी रानी लाल (28)
वो चेहरा : ज्योत्सना कपिल (33)

व्यंग्य वाण

शौचालय और हमारा चिंतन : ध्रुव तांती (37) 

कथा प्रवाह-1 (लघुकथाएँ)  

पारस दासोत (39)
मधुदीप (40)
प्रताप सिंह सोढ़ी (41)
हरनाम शर्मा (42)

अनवरत-2 (काव्य रचनाएँ)  

सीताराम गुप्ता (43) 
आचार्य भगवत दुबे (44)
अमरेन्द्र सुमन (45) 
रामेश्वर दयाल शर्मा ‘दयाल’ (46)
नरेश राजवंशी (47) 

कथा प्रवाह-2 (लघुकथाएँ)  

मनीष कुमार सिंह (48)
विभा रश्मि (49)
कमल कपूर (50)
सुदर्शन रत्नाकर/ओमप्रकाश बजाज (51)
गार्गीशरण मिश्र ‘मराल’ (52)
राम निवास बाँयला/कमलेश चौरसिया (53)

सरोकार

यथार्थ दुनिया का एक व्यावहारिक सत्य : डॉ. उमेश महादोषी (54) 

लघुकथा : अगली पीढ़ी (लघुकथाएँ)  

सुवेश यादव (58)
नीलिमा शर्मा/कुणाल शर्मा  (59)
जगदीश राय कुलरियाँ (60) 
मुन्नूलाल/शोभना श्याम (61)

किताबें (संक्षिप्त समीक्षाएँ)
वैविध्य और भाषा का अनूठा संगम : डॉ. सतीश दुबे के हाइकु संग्रह ‘सात सौ सत्रह हाइकु मंत्रम्’ की डॉ. बुला कार द्वारा समीक्षा (63)

स्तम्भ 
माइक पर : उमेश महादोषी का संपादकीय (आवरण 2)
आजीवन सदस्य (27, 36 व 38)
गतिविधियाँ (65)
प्राप्ति स्वीकार (68, 32 व 62)
सूचनाएँ (17, 24, व अंतिम आवरण)

बुधवार, 24 मई 2017

ब्लॉग का मुखप्रष्ठ

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  6,   अंक  :  01-04,  सितम्बर-दिसम्बर  2016


प्रधान संपादिका : मध्यमा गुप्ता
संपादक :  डॉ. उमेश महादोषी (मोबाइल: 09458929004)
संपादन परामर्श :  डॉ. सुरेश सपन 
ई मेल :  aviramsahityaki@gmail.com 


शुल्क, प्रकाशन आदि संबंधी जानकारी इसी ब्लॉग के ‘अविराम का प्रकाशन’लेवल/खंड में दी गयी है।




छायाचित्र : उमेश महादोषी 

।।सामग्री।।
कृपया सम्बंधित सामग्री के पृष्ठ पर जाने के लिए स्तम्भ के साथ कोष्ठक में दिए लिंक पर क्लिक करें।


सम्पादकीय पृष्ठ {सम्पादकीय पृष्ठ}:  नई पोस्ट नहीं।

अविराम विस्तारित : 

काव्य रचनाएँ {कविता अनवरत} : इस अंक में श्रीकृष्ण ‘सरल’, आचार्य देवेन्द्र ‘देव’, नवल जायसवाल व शिवशंकर यजुर्वेदी  की काव्य रचनाएँ।

लघुकथाएँ {कथा प्रवाह} : इस अंक में   स्व. (डॉ.) सतीश दुबे  की लघुकथाएँ।

कहानी {कथा कहानी} : इस अंक में लक्ष्मी रानी लाल की कहानी ‘शिउली’।

लघुकथा : अगली पीढ़ी  {लघुकथा : अगली पीढ़ी} : इस अंक में  कृष्णचन्द्र महादेविया की लघुकथाओं पर उमेश महादोषी की प्रस्तुति ।

क्षणिकाएँ {क्षणिकाएँ} : अब से क्षणिकाओं एवं क्षणिका सम्बन्धी सामग्री के लिए ‘समकालीन क्षणिका’ ब्लॉग  जाने के लिए इस लिंक पर क्लिक करें-

हाइकु व सम्बंधित विधाएँ {हाइकु व सम्बन्धित विधाएँ} :  इस अंक में डॉ. पुरुषोत्तम दुबे के हाइकु।

किताबें {किताबें} :  इस अंक में डॉ. मीरा गौतम के काव्य-संग्रह ‘मुझे गाने दो मल्हार’ की डॉ. योगेन्द्रनाथ शर्मा ‘अरुण’ द्वारा, मधुकांत की व्यंग्यात्मक रचनाओं के संग्रह ‘ख्यालीराम कुंआरा रह गया’ की डॉ. अनीता देवी द्वारा, रामस्वरूप मूंदड़ा के हाइकु संग्रह ‘ध्वनि’ की ग्यारसी लाल सेन द्वारा तथा नरेश कुमार ‘उदास’ के क्षणिका संग्रह ‘माँ आकाश कितना बड़ा है’ की कमलेश सूद द्वारा समीक्षाएँ।

अविराम विस्तारित

               अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  6,   अंक  :  01-04,  सितम्बर-दिसम्बर  2016




।।कविता अनवरत।।



अमर महाकवि
श्रीकृष्ण ‘सरल’



{मित्र संतोष सुपेकर जी ने अमर शहीदों की गाथाओं के गायक महाकवि श्रीकृष्ण ‘सरल’ जी की कृति ‘क्रान्ति-गंगा’ उपलब्ध करवाकर हमें उपकृत किया। सरल जी ने ‘क्रान्ति-गंगा’ की प्रेरणादायी भूमिका में प्रसंगवश अपने कुछ चर्चित गीत भी दिए हैं, जिनमें अखिल भारतीय क्रान्तिकारी सम्मेलन, देहरादून की तीनों दिनों की कार्यवाही के शुभारम्भ में क्रमशः पढ़े गए तीनों गीत भी शामिल हैं। उनमें से तीसरे दिन पढ़ा गया गीत यहाँ हमारे पाठकों के लिए। सभी चित्र ‘क्रान्ति-गंगा’ से साभार।}


काँटे अनियारे निखता हूँ

अपने गीतों से गंध बिखेरूँ कैसे
मैं फूल नहीं, काँटे अनियारे लिखता हूँ।
मैं लिखता हूँ मझधार, भँवर, तूफान प्रबल
मैं नहीं कभी निश्चेष्ट किनारे लिखता हूँ।

महान क्रान्तिकारी
दुर्गा भाभी के साथ सरल जी 
मैं लिखता हूँ उनकी बात, रहे जो औघड़ ही
जो जीवन-पथ पर लीक छोड़ कर चले सदा,
जो हाथ जोड़कर, झुक कर, डर कर नहीं चले
जो चले, शत्रु के दाँत तोड़कर चले सदा। 

मैं गायक हूँ उन गर्म लहू वालों का ही
जो भड़क उठें, ऐसे अंगारे लिखता हूँ।
मैं फूल नहीं, काँटे अनियारे लिखता हूँ।




हाँ वे थे, जिनके मेरु-दण्ड लोहे के थे
शहीद भगत सिंह की माता जी
विद्यावती जी के साथ सरल जी



जो नहीं लचकते, नहीं बल खाते थे,
उनकी आँखों में स्वप्न प्यार के पले नहीं
जब भी आते, बलिदानी सपने आते थे।

मैं लिखता, उनकी शौर्य-कथाएँ लिखता हूँ
उनके तेवर के तेज दुधारे लिखता हूँ।
मैं फूल नहीं, काँटे अनियारे लिखता हूँ।

  



अमर शहीद
अशफाक उल्ला खाँ का स्केच

जो देश धरा के लिए बहे, वह शोणित है
अन्यथा रगों में बहने वाला पानी है,
इतिहास पढ़े या लिखे, जवानी वह कैसे
इतिहास स्वयं बन जाए, वही जवानी है।

मैं बात न लिखता पानी के फव्वारों की
जब लिखता, शोणित के फव्वारे लिखता हूँ।
मैं फूल नहीं, काँटे अनियारे लिखता हूँ।




  • सरल जी के पुत्र का पता : श्री प्रदीप शर्मा ‘सरल’, 27, क्रान्ति-कुँज, दशहरा मैदान, उज्जैन, म.प्र.

अविराम विस्तारित

      अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  6,   अंक  :  01-04,  सितम्बर-दिसम्बर  2016



 
आचार्य देवेन्द्र ‘देव’




तीन गीत
हृदय को यह स्वीकार नहीं

प्रणय निवेदन करे,
हृदय को यह स्वीकार नहीं।
फिर भी कैसे कह दे-
‘हमको तुमसे प्यार नहीं’।।

पुरवाई जब-जब चलती है
घन घिर आते हैं।
प्यासे सरिता और सरों की,
तपन बुझाते हैं।
अधर चाहते अधरों का 
कोई उपकार नहीं।।

प्रीति पगे तो अनायास ही
सुधा-कलश छलके।
रेखाचित्र : सिद्धेश्वर
अन्तस् की कामना सयानी
आँखों से झलके।
प्राण सहेंगे आभारों का
किंचित् भार नहीं।।

चाहों के गीतों में
आहों का संगीत रहे।
भावुकता कहती है
‘मेरे प्रिय की जीत रहे’।
किन्तु, चाहता मानी मन
अपनी भी हार नहीं।।

कोई भला बताए
कोई भला बताए
क्यों मैं रहूँ उदास नहीं?
अपना दिल रह रहा आजकल,
अपने पास नहीं।

पगलाया-पगलाया फिरता,
जाने कहाँ-कहाँ?
खोज रहा मुमताज
मिलाने को यह शाहजहाँ।
शाहजहाँ को जबकि,
मिलन की कोई आस नहीं।

अवसर दिया समय ने,
रेखाचित्र : कमलेश चौरसिया 
हिल-मिलकर झूला झूलें।
अपने ढँग से अपना-अपना, 
आसमान छू लें।
वह तो रत्ना बनी,
किन्तु, मैं तुलसीदास नहीं।

किस्मत के उन पृष्ठों का,
कैसा कटना-फटना?
जिन पर विधि ने स्वयं लिखा हो,
‘पिऊ-पिऊ’ रटना।
बुझा सकी कोई बारिश,
चातक की प्यास नहीं।

यादों की गन्ध नहीं जाती
उलटे-पुलटे, धोये-पोंछे,
कर लाखों जतन लिये, लेकिन,
दिल की किताब के पन्नों से
यादों की गन्ध नहीं जाती।

जब कभी अकेले में होता,
मन सुधियों की गठरी ढोता।
स्वप्नों की पलकें खुल जातीं,
तो, चेहरा आँसू से धोता।

सो गया नियति का हरकारा,
चिट्ठी न अभी तक लाया है,
दिन-रात भेजती रहती हैं
ये आहें लिख-लिखकर पाती।

मेरे प्रिय की बातें करती
मैना तोते के कानों में।
जिनको सुनने नभ से बादल
रेखाचित्र : डॉ. सुरेंद्र वर्मा 
उतरा करते मैदानों में।

मेरे भी कान लगे रहते
हर एक घड़ी, हर एक निमिष,
पूरे दिन चैन नहीं मिलता,
रातों को नींद नहीं आती।

‘अच्छी होती है कभी-कभी
क़िस्मत की आँख-मिचौली भी।
पक कर मीठी हो जाती है
कड़वे नीम की निबौली भी।’

जब कभी झुलसने लगता है
मन खुद के अन्तर्दाहों से,
तब कोई गौरैया आकर 
यह कहकर मुझको समझाती।
  • ‘माल-द्वीप’, 44, उमंग, भाग-2, महानगर, बरेली-243006 (उ.प्र.)/मोबा. 09412870495

अविराम विस्तारित

                    अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  6,   अंक  :  01-04,  सितम्बर-दिसम्बर  2016



नवल जायसवाल 


प्रयागराज का सत्य

आटा बोलता नहीं तो क्या हुआ
सहता बहुत है
दबाव और आँच, दोनों



प्रकाश कहता रहा
अपनी आत्मकथा
मैंने अपने
झुर्रियों वाले हाथ देखे
और नाखूनों की धार
तुरन्त तेज कर दी



मेरी नज़रें कष्ट देती हैं
रेखाचित्र : कमलेश चौरसिया 
मेरे हाथों की तरह
लम्बी और सीधी हैं
वे किसी की भी
आँख से टकराकर
पहचान लेती हैं
जो मैं जानना चाहता हूँ



मैंने अपने लहू को
खौलने के लिए
भट्टी के ऊपर रखी
कढ़ाई में डाल दिया है
मैं उससे चिपकना नहीं चाहता
पास रहकर भी



तन-तन, मन-मन
काया मेरी छरहरी-सी
दौड़ना चाहती है
रेल की पटरियों पर
बरसात के बिना भी
हरे घास के बगल से
निःसंकोच



मैं अन्त की परिभाषा नहीं जानता
आदि अतीत को दे आया हूँ
वह सम्हाल लेगा
किनारों की तलाश में है वह
अपने प्रलोभन को कह भी दें तो
शायद, सम्भव, स्यात
घुटनों तक पानी में खड़े होकर



मेरा दुश्मन
जो कभी दोस्त भी था
कह रहा है वह सब
जो एक निहायत ही
एकान्त वाले कमरे में
तय करके गया था
आजादी की गोपनीयता के बारे में



घर की छत
कभी टपकती नहीं थी
मैंने अपने ही बिस्तर से
देखा एक बूंद
टपकना चाहती है
आकार तो बड़ा कर रही है
न जाने कब टपक पड़े
नींद को दे दूँगा
बाढ़ की श्रृंखलाएँ और म्यूरल्स



मैं इतना सब
अपनी देह के बिना
नहीं कर सकता
माध्यम है
अनेक प्रकार की
आत्माओं की सभा करने का
मृत्यु शैय्या पर जाने से पूर्व



मैंने विधवाओं का
जीवन भी देखा है
मरने वाला दे जाता है
अपनी शेष आयु भी
वह आत्मसात् कैसे करे
सहती है सब
रेखाचित्र :  रमेश गौतम 
या/थोप देती है अपना आतंक



निरन्तर शब्द
कोष से निकलकर
मेरे सामने आ गया है
मैं उसकी हत्या कर देना चाहता हूँ
अनगिनत मित्रों के साथ
रिश्तेदारों के साथ/चीख लूँ
प्रयागराज जाने से पूर्व।

  • प्रेमन, बी-201, सर्वधर्म कोलार रोड, भोपाल-462042 (म.प्र.)/फोन : 0755-2493840

अविराम विस्तारित

               अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  6,   अंक  :  01-04,  सितम्बर-दिसम्बर 2016




शिवशंकर यजुर्वेदी




झिलमिल सपनों के राजहंस

अधरों की मधुरिम छुअन क्षणिक
युग-युग की प्यास जगा बैठी।
मुरझाये उपवन के मन में
मधुमासी आस जगा बैठी।

बस गये स्नेह संवाद सहज
यूँ श्वाँस सरित की कलकल में
जैसे सुगंध हो रची-बसी
पाँखुरी-पाँखुरी शतदल में
अल्हड़ पुरवा की अठखेली
स्वर्गिक अभिलाष जगा बैठी।

अधरों की मधुरिम छुअन क्षणिक
युग-युग की प्यास जगा बैठी।


रेखाचित्र : रमेश गौतम 
झिलमिल सपनों के राजहंस
उतरे दृग मानसरोवर में
हो गई समाहित समल सृष्टि
लगता है ढाई आखर में
परिचय विहीन पावन श्रद्धा
अद्भुत विश्वास जगा बैठी।

अधरों की मधुरिम छुअन क्षणिक
युग-युग की प्यास जगा बैठी।

यामिनी-दिवस, प्रातः-संध्या
ज्यों बंधे प्रतीक्षा बंधन में
करबद्ध खड़ीं त्यों आशायें
मधुमिलन पर्व अभिनन्दन में
चाँदनी झाँकती मेघों से
कण-कण उद्भाष जगा बैठी।

अधरों की मधुरिम छुअन क्षणिक
युग-युग की प्यास जगा बैठी।

  • 517, कटरा चाँद खाँ, बरेली-243005 (उ.प्र.)/मोबा. 09319467998

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  6,   अंक  :  01-04,  सितम्बर-दिसम्बर  2016





।। कथा प्रवाह ।।


डॉ.सतीश दुबे साहब को स्मरण करते हुए

{लघुकथा के आधार स्तम्भ और महान सृजक  डॉ. सतीश दुबे साहब विगत 25 दिसम्बर 2016 को  इस दुनिया  विदा हो गए।  श्रद्धेय दुबे साहब भौतिक शरीर के साथ भले हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन लघुकथा के बीच से उठकर वह कभी नहीं जा सकते। लघुकथाकारों में वह वरिष्ठतम थे। सातवें दशक से आरम्भ करके अपने जीवन के अंतिम क्षणों तक उन्होंने लघुकथा के लिए काम किया। सृजन से लेकर लघुकथा के रूप-स्वरूप के निर्धारण, विवादों के समाधान, लघुकथा समीक्षा-समालोचना और नई पीढ़ी को तैयार करना, उनका योगदान हर क्षेत्र में उल्लेखनीय रहा। लघुकथा को विधा के रूप में स्वीकार्यता के लिए जिस समग्र दृष्टि और व्यापक आधार की आवश्यकता थी, उसके लिए की गई हर पहल में दुबे साहब शामिल थे। सच बात तो यह है कि लघुकथा का वर्तमान मुकाम दुबे साहब के बिना संभव नहीं था।
      अविराम के प्रति उनका स्नेह अपरिमित था। उनकी हीरक जयंती के अवसर पर कुछ पत्रिकाओं ने विशेषांक प्रकाशित किए थे, जिन्हें पढ़ने के बाद मैंने उन अंकों को आधार बनाकर उनके व्यक्तित्व और रचनात्मकता पर एक सर्वेक्षणात्मक आलेख लिखने का अपना मंतव्य उनके समक्ष रखा था, उन्होंने उस आलेख की प्रतीक्षा भी की, किन्तु दुर्भाग्य से उसके पूरा होने पर ईश्वर ने इतना समय नहीं दिया कि हम वह आलेख उन्हें पढ़वा पाते। दुबे साहब को स्मरण करते हुए उनकी कुछ लघुकथाओं के साथ उस आलेख को भी हम यहाँ प्रस्तुत कर रहेे हैं। }

डॉ. दुबे साहब की कुछ लघुकथाएँ

उत्स
      लम्बे-चौड़े पाटवाली नदी की ओर गहन-गम्भीर विचार में खोकर उन्होंने इशारा किया- ‘‘नदी की ओर देख रही हो ना? पानी सूख जाने के कारण, देखो प्रवाह, गहराई, इसके जल से अठखेलियां करती हुई तरंगे सब गायब हो गई। इसके जीवन से लुप्त हो गईं। यहाँ तक कि इस शिवालय की मूर्ति-पूजा और घंटियाँ बजना भी बंद हो गईं। न आदमी, न जानवर! पशु-पक्षी सब कन्नी काट गये। समझी ना! जीवन भी यही है। पर इससे सबक लेने की बजाय हम मोहपाश में बँधते जाते हैं। यह जानते हुए भी, पाट कितना भी चौड़ा हो, पानी सूख जाने पर अर्थ ही बदल जाता है.....।’’
      ‘‘अब मैं अपनी बात भी कहूँ....। आपकी निगाह किनारे पर खड़े हुए वृक्षों की ओर है कि नहीं? बताइये! ये हरे-भरे वृक्ष, हवा में लहराते हुए किसका गुण गा रहे हैं? नदी की ये रेत, बड़ी-बड़ी चट्टानें, नदी के उस पानी का अस्तित्व नहीं है क्या? इनका उत्स कहाँ से है? वृक्षों के पत्तों की जड़ों में पानी कौन सा कायम है? श्रीमान जी! पानी सूख जाने से अस्तित्व नष्ट नहीं हो जाता। एक बात और, किसी बढ़ई से पूछ देखिये कि, वृक्ष का डूंड या जड़ काटना आसान है कि टहनियाँ।’’ पत्नी ने गहरे चुभकर चुटकी ली।
      वे फिर अपनी पराजय अनुभव कर रहे थे। उसने उनके चेहरे को पढ़ा तथा मुस्कुराई- ‘‘यहाँ भी क्या यह खटराग लेकर बैठ गये, लीजिये मैं आपको एक गाना सुनाती हूँ....।’’
      गाना सुनकर उन्हें लगा, नदी तरल है, सूख जाने पर भी ठंडी लहरों के झोंके देने की क्षमता उसमें है।
      उनका मूड एकदम बदल गया।

आकाशी छत के लोग
      बालकनी में बैठे-बैठे आसपास की लंबी सैर करने के बाद दृष्टि सामने के जिस मैदान पर स्थिर हो जाया करती है, आज वह वहीं खड़ा था।
      निपट अँधेरे के बीच आग से निकलने वाले स्वर्णिम प्रकाश में दमकते हुए अनेक चेहरे। हथेलियों से रोटियाँ थेप रही औरतें, उनके आसपास बैठे आदमी, बच्चे-खच्चे। ‘आए की खिलाव मोटी-छोटी रोटी, पिलाव प्यासे को पानी’ आदर्श के सामने मत्था टेक वह उनकी हँसी-खुशी के वातावरण में खो गया।
      ‘‘आप लोग कहाँ के रहने वाले हैं?’’
      ‘‘रेणे वाले तो राजस्थान मेवाड़ में हैं जी, पर ये पूरी धरती माता हमारा घर और आसमान हमारी छत है जी, और साबजी आप...?
     ‘‘वो सामने वाली बिल्डिंग की तीसरी मंजिल के बीच वाले फ्लैट में....।’’
     इशारे की अंगुली वह नीची भी नहीं कर पाया था कि, बातचीत में हस्तक्षेप कर मुखर हो रही एक युवती हाथ हिलाते हुए बोली- ‘‘ऐसा कैसा घर जी आपका, जां से न धरती छी सको, न आसमान देख सको....।’’
     टिप्पणी सुन हतप्रभ सा निरुत्तर-मुद्रा में वह युवती की ओर देखने लगा। वह समझ नहीं पा रहा था, संवाद का अगला सिलसिला कहाँ से शुरू करे।

अगला पड़ाव
    अपने बच्चों की अब तक की जीवन-यात्रा से सम्बन्धित विभिन्न अनुभवों, प्रसंगों, उम्रानुकूल चर्चा-चुहुल, बलात खोखले हंसी-ठट्ठों के बावजूद दिल-दिमांग के खालीपन की यथावत ऊब से निजात पाने के लिए कुर्सियाँ लगाकर दोनों आँगन में बैठ गए।
    इधर-उधर निगाह घुमाते हुए अचानक बापू की निगाह बाउन्ड्री-वॉल के समतल भाग पर बीच में पड़े दानों को एक-दूसरे की चोंच में खिलाते हुए चिड़ा-चिड़िया की गतिविधियों पर जाकर ठहर गई। उन्होंने बा को हरकत में लाने के लिए इशारा करते हुए पूछा- ‘‘इन परिंदों को पहचाना, नहीं ना...? मैं बताता हूँ, यह वही युगल-जोड़ी है, जिन्होंने दरवाजे के साइड में लगे वुडन-बोर्ड की खाली जगह पर तिनका-तिनका चुनकर घोंसला बनाने से चूजों के पंखों में फुर्र होने की शक्ति आने तक की प्रक्रिया को अंजाम दिया था। ये वे ही तो हैं जो आज भी यदाकदा दरवाजे की चौखट पर मौन बैठे रहते हैं और तुम कमेन्ट्स करती हुई कहती हो- ‘‘देखो बेचारों की सूनी आँखें बच्चों का इंतजार कर रही हैं....।’’
    ‘‘आप भी ना, कुछ तो भी बातें करते हो। अच्छा ये बताओ, आपने इन्हें कैसे पहचाना?’’
    ‘‘अरे, जो हमारे आसपास प्रायः दिखते हैं, उन्हें कौन नहीं पहचान लेगा? वैसे भी परिन्दों के संसार का यह नियम है कि वे बसेरा बनाने के लिए चुना गया वृक्ष और घर, विशेष परिस्थितियों तक छोड़ते नहीं हैं...।’’
    बापू ने महसूस किया बा का ध्यान उनकी बातों की ओर कम, चिड़ा-चिड़िया की गतिविधियों पर अधिक केन्द्रित था। अपने ध्यान से उपजी सोच को बापू के साथ बाँटते हुए वह बोली, ‘‘लगता है अपने फर्ज से निपटकर इन्होंने अपनी नई जिन्दगी शुरू कर दी है।’’
    बापू ने महसूस किया यह कहते हुए बा के चेहरे पर उत्साह और प्रसन्नता के भाव तरल बदलियों की तरह घुमड़ रहे हैं।

  •  परिवार संपर्क :  श्रीमती मीना दुबे, 766, सुदामा नगर, इन्दौर 452009 (म.प्र.)/मो. 09617597211

आलेख
डॉ. सतीश दुबे का रचनात्मक व्यक्तित्व :  पिचहत्तर वर्षीय यात्रा का सर्वेक्षण

इस आलेख को निम्न लिंक (डॉ. बलराम अग्रवाल संचालित ब्लॉग 'जनगाथा') पर पढ़ा जा सकता है-

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  6,   अंक  :  01-04 , सितम्बर-दिसम्बर 2016 



।।हाइकु ।।


डॉ. पुरुषोत्तम दुबे




हाइकु

01.
नदिया बहे
भँवर में न जाना
किनारा कहे।

02.
ओक से पीना
स्वाद खूब पानी का
पीकर जीना।

03.
पानी का रेला
बह निकला फिर
रेलम पेला।
रेखा चित्र : स्व. पारस दासोत 

04.
पानी माँगेगा
न खेल प्रकृति से
सूली टाँगेगा।

05.
पानी का रंग
मिला दो जिस रंग
उसके संग।

  • ‘शशीपुष्प’, 74 जे/ए, स्कीम नं.71, इन्दौर-452009 (म.प्र.)/मोबा. 09407186940