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मंगलवार, 31 जुलाई 2012

अविराम विमर्श


अविराम  ब्लॉग संकलन :  वर्ष : 1, अंक : 11, जुलाई   2012



।।सामग्री।।
विधागत विमर्श पर तीन आलेख-  1. हाइकु : क्षण की अनुभूति का काव्य / रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’; 2- क्षणिका का रचना-विधान /  डॉ बलराम अग्रवाल एवं 3- क्षणिका की सामर्थ्य / डा. उमेश महादोषी



रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’



हाइकु : क्षण की अनुभूति का 

काव्य

     ‘‘क्षण की इकाई जितनी छोटी है, उतनी ही महत्त्वपूर्ण और प्रभावकारी  है। संस्कृत की एक सूक्ति है-‘आयु का एक क्षण सौ करोड़ सोने की मुद्रा में भी प्राप्त नहीं हो सकता।’ यही बात जापानी छन्द हाइकु पर भी लागू होती है। इस छन्द में क्षण की अनुभूति बहुत महत्त्वपूर्ण है। इस क्षण पर, भाव की स्फुलिंग पर जिसकी पकड़ मज़बूत होगी, भाषा के सन्धान में जिसे निपुणता प्राप्त होगी; वही इस विधा में सफल हो सकता है। जो एक पंक्ति को तोड़कर कुछ भी घसीट देने को हाइकु समझते हैं और जो इसे आसान विधा और प्रसिद्धि का शॉर्टकट समझकर मैदान में उतर पड़े हैं; उनके लिए इसमें सफलता की कम ही गुंजाइश है। ‘हाइकु’ के अखाड़े में इस तरह के सूरमाओं की कमी नहीं। हाइकु के लिए 5+7+5=17 अक्षर और कभी वर्ण की बात की जाती है। यहाँ यह समझ लेना ज़रूरी है कि ‘अक्षर’ को आम बोलचाल के रूप में न लिया जाए। ‘अक्षर’ का तकनीकी और भाषावैज्ञानिक अर्थ है- वह ध्वनि या वे ध्वनियाँ जो साँस के एक स्फोट में उच्चरित होती हैं। जब हम तकनीक की बात करें तो ‘अक्षर’ को वर्ण का पर्याय नहीं माना जा सकता। हाइकु छन्द में वर्ण से आशय है- स्वर और स्वरयुक्त व्यंजन न कि हल् (स्वर रहित व्यंजन)। ‘जानता’ शब्द में दो अक्षर हैं- ‘जान्’ और ‘ता’, तीन स्वरयुक्त वर्ण हैं- जा, न और ता। अतः हाइकु के छन्द की शास्त्रीय बात करते समय इसे ज़रूर ध्यान में रखा जाए’’(‘चन्दनमन’ की भूमिका : रा. का. ‘हिमांशु’ और डॉ0 भावना कुँअर)
    ताँका जापानी काव्य की कई सौ साल पुरानी काव्य शैली है। इस शैली को नौवीं शताब्दी से बारहवीं शताब्दी के दौरान काफी प्रसिद्धि मिली। उस समय इसके विषय धार्मिक या दरबारी हुआ करते थे। इसकी संरचना 5+7+5+7+7=31वर्णों की होती है। एक कवि प्रथम 5+7+5=17 भाग की रचना करता था तो दूसरा कवि दूसरे भाग 7+7 की पूर्त्ति के साथ शृंखला को पूरी करता था। फिर पूर्ववर्ती 7+7को आधार बनाकर अगली शृंखला में 5+7+5 यह क्रम चलता; फिर इसके आधार पर अगली शृंखला 7+7की रचना होती थी। इस काव्य-शृंखला को रेंगा कहा जाता था। इस प्रकार की शृंखला सूत्रबद्धता के कारण 100 की संख्या तक भी पहुँच जाती थी। ताँका कविता के इसी प्रथम भाग को होक्कु (hokku) अर्थात् आधार कविता/मूल कविता (starting verse) कहा जाता था। यही होक्कु बाकी कविता का सुर निश्चित करता था। यही कारण था कि आधार कविता यानी होक्कु के रचयिता को अपने अन्य साथियों से प्रशंसा प्राप्त होती थी। 19वीं शताब्दी तक मासा-ओका-शिकि द्वारा होक्कु की रचना स्वतन्त्र और व्यक्तिगत रूप में होने लगी। इसी होक्कु शब्द से ‘हाइकु’ का उद्भव हुआ है। सन् 1600-1868 तक की अवधि में ग्राम्य अंचल में उत्पन्न मात्सुओ बाशो, योसा बुसोन और कोबायाशी इस्सा प्रकृति के बहुत निकट रहे। इन कवियों ने, देश के विभिन्न अंचलों की यात्राएँ कीं। भ्रमण के द्वारा इन्होंने अपने अंचल को गहनता से समझा। ये कवि जापानी यायावर साहित्यकारों की परम्परा में आते हैं। बाशो (1644-94) को हाइकु परम्परा का जनक माना जाता है। इससे यह निष्कर्ष तो स्पष्ट रूप से निकलता है कि अन्तः प्रकृति और बाह्य प्रकृति को समझे बिना अच्छा काव्य नहीं लिखा जा सकता।
    दरबारों में उस समय एकाधिक लोग ताँका लिखते थे। अब हम एकल रूप में लिखते हैं। आज यह अलग-अलग होना सम्भव भी नहीं और होता भी नहीं। उसका विषय दरबारी या धार्मिक होता था। अब क्योंकि तांका स्वतन्त्र लिखा जाता है, अतः उसके दो भाग नहीं हो सकते। अब यह दरबारी प्रक्रिया या समूह का श्रंखलाबद्ध रचनाकर्म नहीं है। यह अपने आप में किसी एक कवि का ही प्रयास है और बरसों से पूरी तरह से कम्पैक्ट रूप में लिखा जा रहा है, भले ही कम लिखा जा रहा हो। पाँचों पंक्तियाँ एक ही विषय पर हों, तीसरी पंक्ति की बात तीसरी में ही सहज रूप में पूरी हो, चाहे चौथी में या आगे पाँचवीं में, कोई हर्ज़ नहीं, लेकिन तीन में ही पूरी होना अनिवार्य कर दिया जाए तो उसे हाइकु ही लिखना चाहिए। इससे एक और दिक्कत नहीं आनी चाहिए; वह यह है कि चौथी और पाँचवीं पंक्ति उससे अलग-थलग न पड़ जाए, पूरी तरह न कट जाए। डॉ0 सुधा गुप्ता और उर्मिला अग्रवाल के ताँका के स्वतन्त्र संग्रह भी आ चुके हैं।
    ताँका से ही बरास्ते होक्कु, ‘हाइकु’ का जन्म हुआ है; वह इसलिए कि जब तीन पंक्तियाँ अपने आप में पूर्ण होंगी तभी तो हाइकु बनेंगी। ताँका नाम तो तभी सार्थक होगा जब पाँच पंक्तियाँ होंगी। जापानी भाषा के विद्वान् और हिन्दी जगत में हाइकु के लिए विशिष्ट कार्य करने वाले डॉ0 सत्यभूषण वर्मा जी ने वर्तनी के तौर पर ‘हाइकु’ को ही स्वीकार किया है। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो भ्रमवश या अनजाने में हाइकु के स्थान पर हैकु को ही ठीक समझ लेते हैं। ऐसे लोगों को http://www.oxfordadvancedlearners dictionary.com/dictionary/haiku  का सन्दर्भ देखना चाहिए ।
    वसुधैव-कुटुम्बकम् का गुणगान करने वाले कुछ लोग हाइकु को विदेशी छन्द कहकर भी नाक-भौं सिकोड़ते हैं। साहित्य के क्षेत्र में यह कठमुल्लापन एक प्रकार की विद्रूपता ही कही जाएगी। विदेशों का सब सामान खरीद लेंगे, इस्तेमाल करेंगे, हाइकु से परहेज़ है। यह तो वही हुआ गुड़ खाएँ और गुलगुलों से परहेज़।
    साहित्य में ऐसे लोग भी हैं, जो सदैव विधाओं के शॉर्ट कट से अपना स्थान बनाना चाहते हैं, रचनाकर्म से नहीं। ऐसे लोग आँय-भाँय-शाँय कुछ भी लिखकर उन्हें हाइकु की संज्ञा दे रहे हैं। ऐसे लोग इस विधा को बरसों से नुकसान पहुँचा रहे हैं। कई कवियों की इस तरह की सामग्री डाक से मिली है, जिसे पढ़कर बहुत निराशा हुई। आने वाले समय में बाढ़ के पानी को निथारना तो पड़ेगा ही। इस काम को चाहे कोई भी करे।
    हाइकु में निरन्तर बेहतर लिखा जा रहा है। विगत वर्षों में नई पीढ़ी के रचनाकारों में ड़ॉ. भावना कुँअर ने हिन्दी जगत में अपना अलग स्थान बनाया है। पूर्णिमा वर्मन अनुभूति वेब पत्रिका से विश्व भर में हिन्दी हाइकु को स्वरूप दे चुकी हैं। इसी कार्य को डॉ. हरदीप सन्धु ‘हिन्दी हाइकु’ ( www.hindihaiku.wordpress.com) का नियमित सम्पादन करके और स्वयं सर्जनरत रहकर विश्वभर के हाइकुकारों को जोड़ चुकी हैं। पूर्व स्थापित रचनाकारो में से मंजु मिश्रा, रचना श्रीवास्तव, कमला निखुर्पा, निर्मला कपिला, प्रियंका गुप्ता, डॉ. जेन्नी शबनम, सुभाष नीरव, सुरेश यादव आदि ने बहुत अच्छे हाइकु लिखे हैं। सामान्य अंक के अतिरिक्त दीपावली, नया वर्ष, वसन्त, होली, मातृ दिवस के अवसर पर 500-600 हाइकुओं का संग्रह तैयार किया चुका हैं। एक वर्ष की अवधि में डॉ. सुधा गुप्ता  और डॉ. उर्मिला अग्रवाल (ताँका संग्रह), डॉ. कुँअर बैचैन, रेखा रोहतगी क्षण की अनुभूति, डॉ मिथिलेश दीक्षित (हाइकु संग्रह) के एकल संकलनों ने हाइकु विधा को नया आयाम दिया है। 
  • फ्लैट नं. 76 (दिल्ली सरकार),  रोहिणी सेक्टर-11, नई दिल्ली-5





डॉ बलराम अग्रवाल



क्षणिका का रचना-विधान


             हर सदी साहित्य को कुछ न कुछ नया देकर जाती है। कितना और क्या देती है, यह बहुत-कुछ उस सदी के ‘वातावरण’ पर निर्भर करता है। यहाँ वातावरण से तात्पर्य कालखण्ड की घटनाओं, उनके कारणों और प्रभावों से है। बीसवीं सदी ने साहित्य को अपेक्षाकृत कुछ अधिक ही दिया है, विशेष रूप से कथा और काव्य-साहित्य को। अन्य उपलब्धियों के साथ-साथ कथा-साहित्य में ‘लघुकथा’ और काव्य में ‘क्षणिका’ का पल्लवित होना बीसवीं सदी की महान उपलब्धि है। इस उपलब्धि में लघुकथा की 
विधागत प्रतिष्ठा के लिए किये गये विशेष प्रयास सौभाग्य के रूप में शामिल हैं; जबकि ‘क्षणिका’ इस प्रकार के प्रयासों से वंचित रही है।
    सन् 1938 में सुमित्रानन्दन पन्त द्वारा सम्पादित ‘रूपाभ’ के प्रकाशन से प्रारम्भ नयी कविता से जुड़े लगभग सभी समर्थ रचनाकारों की कलम ने क्षणिकायें लिखी हैं। परन्तु दुर्भाग्य की बात यह रही कि क्षणिका को काव्य की धारा के रूप में परखने की तरफ किसी का ध्यान नहीं गया। नतीजतन प्रभाव व रसानुभूति की दृष्टि से बेहद तीक्ष्ण एवं रंजक होने के बावजूद क्षणिका के स्वतन्त्र अस्तित्व के स्वीकार्य की सम्भावनायें क्षीण हो रही हैं।
   पारम्परिक छन्द विधान से मुक्त कविता के जितने भी आन्दोलन हुए, लगभग सभी के दौेरान क्षणिका-लेखन हुआ और प्रत्येक स्थापित कवि के द्वारा हुआ, यह क्षणिका की जीवन्तता का प्रमाण है। इससे सिद्ध होता है कि विधायें आन्दोलनों के जरिये उत्पन्न नहीं की जा सकती, बल्कि रचना की निर्विवादिता और विभिन्न कालखण्डों में समसामयिक सामाजिक परिवेश के मध्य अभिव्यक्ति की सहजता उन्हें प्रस्फुटित और पुष्पित-पल्लवित करती है।
   पिछले दिनों क्षणिका पर जो थोड़ा सा कार्य हुआ है, उसमें वे सारी बातें भी क्षणिका के बारे में कहीं गई हैं, जो लघुकथा के बारे में उसके उन्नयन-काल (गत सदी के आठवें दशक के प्रारम्भ) में कही जाती थीं। मसलन- पत्र-पत्रिकाओं में फिलर के रूप में उसकी प्रयुक्ति, लघु-पत्रिकाओं के सम्पादकों द्वारा अधिक रचनाकारों को छाप डालने की 
सुविधा आदि। यही हाल इसको परिभाषित-विश्लेषित करने का भी है। मसलन- क्षणिका को क्षण भर में कौंध दिखला जाने वाली कविता कहना, लघु-अनुभूति, विचार-खण्ड की काव्यात्मक अभिव्यक्ति होना आदि-आदि। ये सभी आरोप, आशंकायें, परिभाषायें और विश्लेषण गलत हैं, एकदम गलत हैं। क्षणिका लघु-कविता नहीं है, बिल्कुल उसी तरह- जिस तरह लघुकथा लघु-कहानी नहीं है। आज की लघुकथा ने प्रारम्भिक आरोपों-आशंकाओं को झुठला दिया है, उनसे मुक्ति पा ली है। क्षणिका के सामने ये चुनौतियाँ बाकी हैं।
   क्षणकाय होना क्षणिका का अभिशाप नहीं, उसका गुण है। उसके लेखन को, उसके प्रकाशन को वर्तमान युग की ऊहापोह और भाग-दौड़ से जोड़ने के प्रयास बेहद बचकाने और उसके प्रति बेहद सतही दृष्टिकोंण प्रदर्शित करने वाले हैं। साहित्य आज स्वानुभूतियों की वृहदता को नहीं, उनकी गहनता को उद्भाषित करता है। उसकी विशालता यह है कि वह आदमी के साथ समन्वित हुआ है। विज्ञान ने अपने उत्कर्ष के साथ-साथ आदमी की संवेदना को जिस-जिस स्तर पर छीलने का प्रयास किया है; उस-उस स्तर पर स्वयं को कायम रखने के लिए साहित्य ने स्वयं में कुछ मौलिक परिवर्तन किये हैं। कुछ त्यागा है, कुछ अपनाया है ( कहना न होगा कि समयानुसार ऐसे परिवर्तन ही किसी साहित्य के चेतनाशील और प्रगतिशील होने के प्रमाण हैं)। आशय यह है कि क्षणिका काव्य साहित्य के स्वाभाविक परिवर्तन एवं विकास के फलस्वरूप स्वतन्त्र काव्य-धारा के रूप में सामने आयी है, आवश्यकता है इसके रचना विधान को स्पष्ट करने की।
   हिन्दी साहित्य की प्रगतिशील आलोचना के आद्य-हस्ताक्षर डा0 राम विलास शर्मा ने एक जगह कहा है- ‘अनेक लेखक कला के प्रति उदासीन रहकर साहित्य को प्रभावशाली बनने से रोकते हैं। साहित्य रचने के लिए भाषा सीखने; कहानी, उपन्यास या पद्य-रचना का कौशल सीखने की तरफ वे ध्यान नहीं देते।’ लघुकथा  में जो अनगढ़ता थी, उसे अनेक सामर्थ्यवान लघुकथाकारों ने लघुकथा लेखन के तकनीकी पक्ष को लेखकों, पाठकांे व आलोचकों के सम्मुख प्रकट कर शनैः-शनैः दूर किया है। सौभाग्य से क्षणिका में न अनगढ़ता है और न ही स्तरहीनता। लेकिन यह बात सिर्फ उन क्षणिकाओं पर ही लागू होती है, जिन्हें या तो प्रतिष्ठित कवियों के द्वारा लिखा गया है या इसके विधागत स्वीकार्य के प्रति सचेत एवं चेष्टाशील रचनाकारों द्वारा। आम रचनाकारों (विशेषतः नवोदितों) के समक्ष क्षणिका-लेखन का तकनीकी पक्ष स्पष्ट नहीं है।
    काव्य-साहित्य में कविता से क्षणिका किस तरह भिन्न है, इसके लिए मुख्य रूप से निम्न बातों पर विचार करना अति आवश्यक है।
1. अभिव्यक्ति की सघनता:  अनुभूत विषय की अभिव्यक्ति के दौरान कविता में शाब्दिक-विरलता हो तो भी कविता अपना अर्थ, अपना मन्तव्य प्रकट कर देती है। यह भी देखा जाता है कि पाठक अथवा श्रोता के साथ मानसिक तादात्म स्थापित करने के लिए कविता को घोर विरलता की ओर ले जाने को भी कवि ‘दोष’ नहीं मानता है! क्षणिका ‘शाब्दिक विरलता’ की छूट नहीं देती। ‘शाब्दिक सघनता’ का  सीधा सम्बन्ध अनुभूति की गहनता से है। अनुभूति जितनी गहन होगी, अभिव्यक्ति उतनी ही सघन होगी। और अभिव्यक्ति जितनी सघन होगी, कविता उतनी ही जीवन के निकट होगी।
2. अर्थ की व्यापकता: शब्द की एकार्थता को तोड़कर उसकी बहु-आयामी सम्भावनाओं और लक्षणों को सर्वप्रथम मुक्तिबोध ने साहित्य में प्रकट किया। बिम्बों और प्रतीकों को उनके पारम्परिक अर्थ की सीमा से बाहर लाने के मुक्तिबोध के प्रयासों को लीलाधर जगूड़ी ने प्रमुख रूप से आगे बढ़ाया है। शब्दों, बिम्बों या प्रतीकों के ऐसे अभिनव प्रयोग कविता की तुलना में क्षणिका को निःसन्देह अधिक सशक्तता और उत्कृष्टता प्रदान करते हैं।
3. चरमोत्कर्ष: कवि आज जीवन की ऊबड़-खाबड़ और खुरदरी जमीन पर खड़ा होकर काव्य-रचना करता है। इह जीवन की भयावहता और उग्रता से उसका बेरोक सामना है। इस साक्षात्कार ने कवि कल्पना के दरख्तों को हिला डाला है। कवि अब स्वप्नजीवी नहीं रहा। उसने युगों से चुनौती बने चले आ रहे, अपने चारों ओर फैले शब्द-जाल से मुक्ति का मार्ग खोज लिया है। क्षणिका के माध्यम से अभिप्रेत विषय को वह सीधे पाठक तक पहुँचाता है। कविता की भांति बिषय को भूमिका के मार्ग से चरमोत्कर्ष तक पहुँचाने के पारम्परिक तौर से वह निश्चय ही भिन्न भी है और अनुकरणीय भी।
   इसके साथ ही कुछ ऐसे भी कारक हैं, जो क्षणिका को अपेक्षाकृत स्तरहीनता प्रदान करते हैं। अनर्गल आलोचना से इसे बचाने के लिए अत्यावश्यक है कि इन दोषों से क्षणिका को मुक्त रखा जाये। ये दोष मुख्यतः निम्न हैं-
1. प्रचलित हास्य का समावेश: क्षणिका में हास्य अथवा व्यंग्य का समावेश कोई आवश्यक शर्त नहीं है। बेहद गम्भीर व दार्शनिक विषयों पर भी क्षणिकाएं उपलब्ध हैं, परन्तु अकुशल रचनाकार क्षणिका को प्रचलित हास्य की पुनः प्रस्तुति का माध्यम मान बैठते हैं। ऐसी किसी भी काव्य रचना को उसके लघु-कलेवर के बावजूद भी क्षणिका की संज्ञा नहीं दी जा सकती जो चुटुकुले का पर्याय बन गई हो।
2. सपाटबयानी: कलात्मक लेखन ही साहित्य की परिधि में प्रवेश की योग्यता रखता है। साहित्य में यदि कला नहीं है तो वह सूचना मात्र है। क्षणिका अपनी बात को कम शब्दों में व्यक्त करने का कलात्मक प्रकार है। शब्दों का सटीक प्रयोग रचनाकारों को सपाटबयानी से बचाकर कलात्मकता की ओर ले जाता है।
3. अभिव्यक्ति की दुरूहता: क्षणिका में सपाटबयानी से बचाव जितना आवश्यक है, उतना ही आवश्यक है अभिव्यक्ति की दुरूहता से उसका बचाव। दुरूह अभिव्यक्ति कभी-कभी क्षणिका की अपूर्णता का आभास दिलाती है। क्षणिका के इस दोष से यथासम्भव बचना चाहिए।
4. शीर्षक की अनुपयुक्तता: लघुआकारीय रचना होने के कारण विषय की व्याख्या का कार्य कई बार शीर्षक से करना होता है। अनुपयुक्त शीर्षक क्षणमात्र में क्षणिका के अर्थ का अनर्थ कर डालने की सामर्थ्य रखता है। अनेक स्तरीय क्षणिकाएं केवल शीर्षक की अनुपयुक्तता के कारण अर्थहीन हो जाती हैं।
   संक्षेप में, हम कह सकते हैं कि क्षणिका न सिर्फ आकारीय अलगाव (भिन्नता) के कारण बल्कि अनेक वैचारिक कारणों व रचना-विधान की भिन्नता के कारण भी कविता से नितान्त भिन्न है। गुणों व प्रभावों की दृष्टि से यह निश्चय ही कविता की तरह काव्य की स्वतन्त्र धारा है। अतः क्षणिका के अस्तित्व को न सिर्फ स्वीकार किया जाना आवश्यक है, बल्कि इसके उन्नयन और विस्तार हेतु सार्थक व संयुक्त प्रयास भी आवश्यक हैं।



  •  एम-70, उल्धनपुर, नवीन शाहदरा, दिल्ली-110032






डा. उमेश महादोषी






क्षणिका की सामर्थ्य


            प्रत्येक कर्म- सामाजिक, वैचारिक या कोई कला कर्म हो, भले ही नया हो या पुराना, यदि वह सकारात्मक, सामाजिक सन्दर्भों में प्रभावपूर्ण और आकर्षक है, तो अपनी अलग पहचान और सामाजिक मान्यता का अधिकारी होता है। समाज के लिए भी उसे पहचानना एवं मान्यता देना व्यावहारिक होने के साथ न्यायसंगत भी होता है। लेकिन क्या समाज अपनी इस जिम्मेवारी को स्वाभाविक रूप से पूरी करता है? यदि ऐसा होता तो विशेषतः हर नई चीज को अपना स्थान हासिल करने के लिए अनावश्यक संघर्ष न करना पड़ता, उसे अपने आपको सिद्ध करने के लिए विरोधों और व्यवधानों की अग्नि-परीक्षा से नहीं गुजरना पड़ता। 
   साहित्य एवं कला की नई विधाओं और उनके विविध रूपों के बारे में भी यह बात समान रूप से लागू होती है। विगत सदी में काव्य एवं कथा साहित्य की कई महत्वपूर्ण विधायें स्थापित हुई, जिन्हांेने हमारे साहित्य को न सिर्फ समृद्ध किया, प्रभावशाली भी बनाया है, पर अग्नि-परीक्षा से सभी को गुजरना पड़ा। बाह्य वातावरण की शंकालु एवं विरोध दृष्टि, जो मुख्यतः पीढ़ी-अन्तराल के रूप में देखने को मिलती है, के साथ आन्तरिक विरोधाभास भी इस अग्नि परीक्षा के कारण बनते रहे हैं। पर इस सम्पूर्ण प्रक्रिया में एक अच्छी बात यह होती है कि इससे बहुत सारा विचार-मन्थन हो जाता है, जिससे बहुत सारी शंकाओं और नकारात्मक चीजों का समाधान हो जाता है। भले ही सभी कमजोरियां/नकारात्मक चीजें हमेशा के जिए समाप्त नहीं होती हैं, अन्ततः अच्छी और सामर्थ्यवान चीजें निकलकर सामने जरूर आती हैं। यही वास्तविक सत्व है। नई कविता और लघुकथा के उदाहरण हमारे सामने हैं। इन विधाओं में कमजोरियां आज भी हैं, पर उनके समग्र मूल्यांकन में उनकी सामर्थ्य को भुलाना सम्भव नहीं रह गया है। मुक्तिबोध जी ने अपने समय में कहा था- ‘नयी कविता के निकृष्ट उदाहरणों को चुनकर उस पर दोषारोपण करना व्यर्थ है, उसके श्रेष्ठ उदाहरणों को लेकर ही उसके बिषय में कुछ कहा जा सकता है।’ उनका यह कथन आज भी प्रासंगिक तो है ही, कला और साहित्य की हर विधा के बारे में हमारा मार्गदर्शन भी करता है। इसी दृष्टिकोंण से हमें क्षणिका की सामर्थ्य के बारे में भी सोचना होगा।
   विचार-मन्थन की दृष्टि से क्षणिका पर बहुत अधिक कार्य नहीं हुआ है, पर क्षणिका में लेखन पर्याप्त मात्रा में हुआ है। किसी न किसी रूप में पिछली सदी के चौथे दशक से क्षणिका लेखन हो रहा है। आज अधिकतर कवि क्षणिका लिख रहे हैं। क्षणिका पर कुछेक पूर्ण संग्रह-संकलन भी सामने आये हैं, पत्र-पत्रिकायें क्षणिकायें छाप रहीं हैं और अर्न्तजाल (नेट) पर कविता से जुड़ी अधिकतर साइटों पर क्षणिका देखने को मिल रही है। लेकिन क्षणिका में इतना अधिक लेखन होने और इतना अधिक समय हो जाने के बावजूद क्षणिका के रूप-स्वरूप को लेकर बहुत सारे रचनाकारों में गम्भीरता दृष्टिगत नहीं होती। जरूरी है कि जो रचनाकार अच्छी क्षणिका लिख रहे हैं/लिखने में समर्थ हैं, वे चलताऊ क्षणिका लेखन से बचें। दूसरे जो साहित्यकार दूसरी विधाओं में बहुत अच्छा लिख रहे हैं, उनकी मान्यता तो क्षणिका को गम्भीरतापूर्वक समझने की हो! कई ऐसे साहित्यकार जब क्षणिका में चलताऊ या अगम्भीर लेखन करते हैं, तो निश्चय ही या तो वे क्षणिका के रूप-स्वरूप को समझना नहीं चाहते या फिर उनके लिए क्षणिका फिलर, रचनाओं की संख्या बढ़ाने या समय गुजारने के माध्यम से अधिक कुछ नहीं प्रतीत होती। उनकी अपनी प्रतिष्ठा के अनुरूप उनसे इतनी अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि क्षणिका को उसके अच्छे उदाहरणों के माध्यम से समझने के बाद ही क्षणिका में लेखन करें। वैसे तो हर रचनाकार से यही अपेक्षा होती है, पर जो किसी न किसी विधा के प्रतिष्ठित रचनाकार हैं, उनको सतर्क रहना कहीं अधिक जरूरी होता है, क्योंकि वे रचना की सामर्थ्यहीनता को उसकी विधा के प्रति अपनी निजी धारणा की ढाल से नहीं ढक सकते। खैर! यह चिन्ता का एक विषय जरूर है, पर कई साहित्यकारों के अच्छे उदाहरण भी आश्वस्त करने के लिए देखने को मिल रहे हैं कि ऐसी चीजें समय के साथ ठीक हो जायेंगी। जरूरत है इन अच्छे उदाहरणों को सामने रखकर क्षणिका के सही और समर्थ स्वरूप की पहचान और उसे सामान्य स्वीकृति दिलवाने के प्रयासों की।
    सही और समर्थ की पहचान के लिए यह जानना भी जरूरी है कि क्षणिका में वस्तुतः लिखा क्या जा रहा है और उसमें प्रासंगिक व क्षणिका के विधागत रूप-स्वरूप की पहचान एवं मान्यता की दृष्टि से खास क्या है! क्षणिका के नाम पर हो रहे लेखन में जिस तरह की रचनायें शामिल हैं, उनमें प्रमुख हैं- 
1)  हास्य-व्यंग्य प्रधान लघु आकारीय रचनायें। इस श्रेणी में क्षणिका के नाम पर हो    रहे अधिकांश लेखन में सही मायनों में हास्य-व्यंग्य भी मौजूद नहीं होता है। क्षणिका को जो चीज सामर्थ्यवान बनाती है, वह हास्य-व्यंग्य की रचनाओं में पैदा की जा सके, तो मुझे उसे क्षणिका मानने में कोई आपत्ति नहीं। पर हास्य-व्यंग्य के नाम पर दोहराव, चुटुकुलेबाजी या फूहड़पन को तो क्षणिका नहीं माना जा सकता। फिर चुटुकुला अपने आप में एक विधा है, और उसका भी अपना एक स्तर होता है। उसी में लिखा जाये! 
2) लघु आकारीय नई/छन्द मुक्त कविता। इसमें दो राय नहीं कि क्षणिका का लघु आकारीय होना उसका एक आवश्यक लक्षण है और यह छन्द मुक्त भी होती है, एवं नई कविता का रूप-सादृश्य भी दिखता है, पर कुछ बातों, विशेष रूप से बिम्बों के उपयोग, सम्प्रेषणीयता और सामर्थ्य की दृष्टि से यह नई कविता से सर्वथा भिन्न होती है। इसलिए प्रत्येक लघु आकारीय नई या छन्द मुक्त कविता क्षणिका नहीं होती। इस अन्तर की तुलना लघु कहानी और लघुकथा के मध्य अन्तर से की जा सकती है।
3) वक्तव्यपरकता। कला की पूर्ण अनुपस्थिति में कोई वक्तव्य कविता नहीं बन सकता। जब कविता नहीं बन सकता तो क्षणिका कैसे बन जायेगा? कविता बनने के लिए कला का थोड़ा-बहुत अंश तो उसमें होना ही चाहिये। दरअसल जब कविता की समीक्षा में हम कवि के द्वारा सम्प्रेषित वक्तव्य की प्रशंसा करते हैं, तो वहां वक्तव्य का सन्दर्भ कवि के द्वारा दुरूहता व जटिलता में बिना उलझे किसी पक्ष या विपक्ष में सीधे और सरल शब्दों में अपनी बात को अभिव्यक्त करने से होता है। वहां भी कविता कला के अंश से वंचित या हीन नहीं होती है, पर कई रचनाकार ऐसा ही समझ लेते हैं।
4) शाब्दिक व्याख्यायें एवं परिभाषायें। किसी शब्द विशेष की व्याख्या या परिभाषा देने का कार्य भी क्षणिका में खूब हो रहा है। ऐसी किसी-किसी रचना में शब्द-कौशल दिख सकता है, पर अधिकांशतः इन व्याख्याओं और परिभाषाओं में कविता अवतरित नहीं ही हो पाती है। दरअसल शब्दों की व्याख्या और परिभाषा का काम कवि की सामर्थ्य को संकुचित करता है, सो कवि ऐसी प्रत्यक्ष कोशिशों से बच सके, तो ही अच्छा है।
5) प्रभावपूर्ण लेखन। उपर्युक्त एवं ऐसी ही अन्य श्रेणियों का लेखन क्षणिका के काव्य-सामर्थ्य पर प्रश्न-चिह्न लगाता है, पर ऐसा भी नहीं है कि क्षणिका में यही सब लिखा जा रहा है और उसके प्राण-तत्व को पहचानने वाले रचनाकारों की कमी है। बेहद प्रभावपूर्ण क्षणिकायें भी लिखी जा रही हैं, और उन्हीं के माध्यम से क्षणिका की विधागत पहचान और मान्यता की बात की जा सकती है, जो नहीं की जा रही है पर की जानी चाहिये। 
    प्रभावपूर्ण क्षणिका लेखन में जो विशेष बात उसे क्षणिका बनाती है, उसे पहचाने बिना क्षणिका को समझना सम्भव नहीं है। इस बारे में एक बात, जिसे कुछ-कुछ मैंने 1991 में प्रकाशित अपने क्षणिका संग्रह ‘आकाश में धरती नहीं है’ की भूमिका में भी कहा था, यहां रखना चाहता हूँ। जब वातावरण में विद्यमान कोई बिषय या घटना किसी क्षण विशेष में (बहुत थोड़े समय में ही या अचानक) हमें प्रभावित करके हमारी विवेक दृष्टि या भाव दृष्टि को बहुत दूर तक खींच ले जाती है और उसी क्षण उसे हमारी सम्वेदन दृष्टि में समाहित करके उसे अत्यन्त गहराई तक प्रभावित करती हैै, तो ऐसे क्षण में हमारे कवि के अन्तर की प्रतिक्रिया सीधी और सरल रूप में केन्द्रीकृत होकर घनीभूत अभिव्यक्ति पाती है और उसकी दो स्वाभाविक विशेषतायें सामने आती हैं- एक तो ऐसी अभिव्यक्ति (रचना) लघुकाय होती है (काव्यात्मक वातावरण और उसके अलंकरणों के संविलयन से विलग), दूसरे स्पष्ट तौर पर त्वरित सम्प्रेषणीय व गहन प्रभाव वाली होती है। ऐसी रचना मुख्यतः बिषय के घटनाओं पर प्रत्यारोपित न होने एवं भावात्मक व संवेदनशीलता के कारण कविता की विधा होती है, छन्दबद्धता के नियमों एवं संगीतात्मक व रागात्मक प्रतिबद्धताओं से मुक्त होने के कारण छन्दबद्ध व गेय लघु आकारीय काव्य विधाओं/रूपों से भिन्न होती है और मुख्यतः भाव या विचार की सरलीकृत और केन्द्रीकृत सघनता और उसकी त्वरित व तीव्र सम्प्रेषणीयता के कारण नई/छन्द मुक्त कविता से भिन्न होती है। 
   एक और बात- 1990 के करीब आगरा से प्रकाशित लघु पत्रिका ‘अंकुर आवाज’ का छोटा सा क्षणिका विशेषांक मेरे सम्पादन में आया था, उसके सम्पादकीय में मैंने कविता में बिम्बों के विभिन्न उपयोगों का उल्लेख करते हुए क्षणिका को बिम्ब के सीधे, स्वतन्त्र और पूर्ण प्रयोग से जोड़ा था। बिम्ब आधारित कविताओं में वे कवितायें क्षणिका की श्रेणी में आ जाती हैं, जिनमें बिम्ब वातावरण में प्रविष्ट जरूर होता है, पर समाविष्ट नहीं होता। अपितु सीधा विषयगत तथ्य और उसकी गहराई को उद्घाटित करता हुआ चरमोत्कर्ष तक पहुँचता है। वह न तो वातावरण को स्पष्ट करने की गुंजाइश छोड़ता है, न ही स्थितियों/परिस्थितियों के चित्रण/विश्लेषण की। फलतः  इस प्रकार की रचनाओं में भावात्मक सघनता, आकारगत लघुता और प्रभाव/सम्प्रेषण की तीव्रता की उपस्थिति उन्हें एक अलग प्रकार की कविता की पहचान देती है। 
        इन दोनों ही बातों को मैंने क्षणिकायें लिखते हुए और अच्छी क्षणिकायें पढ़ते हुए भी अनुभव किया है। क्षणिका के विधागत रूप-स्वरूप और उसकी मान्यता के साथ उसकी सामर्थ्य की पहचान इन्हीं को केन्द्र में रखकर की जा सकती है। यद्यपि अच्छी क्षणिकायें लिखी जा रही हैं, तदापि क्षणिका में अनपेक्षित/अगम्भीर लेखन उसके अस्तित्व और रूप-स्वरूप के बारे में गलत धारणायें पैदा करता है। इससे न सिर्फ क्षणिका, बल्कि साहित्य की सामर्थ्य पर ही प्रश्न-चिह्न खड़े होते हैं। साहित्य समाज को जो कुछ दे सकता है, वह अपनी विभिन्न सामर्थ्यवान विधाओं, रूपों और धाराओं के माध्यम से ही दे पायेगा, जिनमें क्षणिका भी प्रमुख है। इसलिए क्षणिका की सामर्थ्य को समझना और उसे स्थापित करना जरूरी है।  

  •  एफ-488 / 2,गली सं. 11, राजेन्द्र नगर,  रुड़की,  जि.- हरिद्वार (उत्तराखण्ड)




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