आपका परिचय

मंगलवार, 20 अगस्त 2013

अविराम विस्तारित

अविराम का ब्लॉग : वर्ष  :  2,  अंक  : 9-10,  मई-जून 2013

।।कथा प्रवाह।।

सामग्री :  इस अंक में डॉ.सतीश दुबे, श्री श्यामसुन्दर अग्रवाल, सु-श्री शोभा रस्तोगी ‘शोभा’, श्री अहफ़ाज़ अहमद कुरैशी, डॉ नन्द लाल भारती व श्री किशन लाल शर्मा की लघुकथाएं।


डॉ.सतीश दुबे




{श्री सुरेश जांगिड़ उदय ने हाल ही में वरिष्ठ लघुकथाकारों की श्रेष्ठ लघुकथाओं की एक श्रंखला का संपादन-प्रकाशन आरम्भ किया है। इस श्रंखला की प्रथम कड़ी के रूप में उन्होंने वरिष्ठतम लघुकथाकार डॉ. सतीश दुबे साहब की लघुकथाओं की पुस्तक ‘‘डॉ. सतीश दुबे साहब की श्रेष्ठ लघुकथाएँ’’ पुस्तक संपादित-प्रकाशित की है, जिसमें उन्होंने दुबे साहब की 99 चयनित लघुकथाएं शामिल की हैं। प्रस्तुत हैं इसी संग्रह से दो श्रेष्ठ लघुकथाएं।}



उत्स
     लम्बे-चौड़े पाटवाली नदी की ओर गहन-गम्भीर विचार में खोकर उन्होंने इशारा किया- ‘‘नदी की ओर देख रही हो ना? पानी सूख जाने के कारण, देखो प्रवाह, गहराई, इसके जल से अठखेलियां करती हुई तरंगे सब गायब हो गई। इसके जीवन से लुप्त हो गईं। यहाँ तक कि इस शिवालय की मूर्ति-पूजा और घंटियाँ बजना भी बंद हो गईं। न आदमी, न जानवर! पशु-पक्षी सब कन्नी काट गये। समझी ना! जीवन भी यही है। पर इससे
छाया चित्र : उमेश महादोषी 
सबक लेने की बजाय हम मोहपाश में बँधते जाते हैं। यह जानते हुए भी, पाट कितना भी चौड़ा हो, पानी सूख जाने पर अर्थ ही बदल जाता है.....।’’

    ‘‘अब मैं अपनी बात भी कहूँ....। आपकी निगाह किनारे पर खड़े हुए वृक्षों की ओर है कि नहीं? बताइये! ये हरे-भरे वृक्ष, हवा में लहराते हुए किसका गुण गा रहे हैं? नदी की ये रेत, बड़ी-बड़ी चट्टानें, नदी के उस पानी का अस्तित्व नहीं है क्या? इनका उत्स कहाँ से है? वृक्षों के पत्तों की जड़ों में पानी कौन सा कायम है? श्रीमान जी! पानी सूख जाने से अस्तित्व नष्ट नहीं हो जाता। एक बात और, किसी बढ़ई से पूछ देखिये कि, वृक्ष का डूंड या जड़ काटना आसान है कि टहनियाँ।’’ पत्नी ने गहरे चुभकर चुटकी ली।
    वे फिर अपनी पराजय अनुभव कर रहे थे। उसने उनके चेहरे को पढ़ा तथा मुस्कुराई- ‘‘यहाँ भी क्या यह खटराग लेकर बैठ गये, लीजिये मैं आपको एक गाना सुनाती हूँ....।’’
    गाना सुनकर उन्हें लगा, नदी तरल है, सूख जाने पर भी ठंडी लहरों के झोंके देने की क्षमता उसमें है।
    उनका मूड एकदम बदल गया। 


कौए
     तीर्थ यात्रा से लौटने पर पन्द्रह-बीस दिन पश्चात घर का ताला खुला था। सब कुछ यथावत व्यवस्थित करने के बाद पत्नी अपने रुटीन के काम-काज में जुट गई, और वे बाहर कुर्सी लगाकर बैठ गए। नीम के हरहराते वृ़क्ष पर निगाह पड़ते ही ओझल दृश्य आँखों के सामने बार-बार आने लगा।
रेखा चित्र : बी.मोहन नेगी  
    नीम के इसी वृक्ष पर टाउन-शिप, फ्लैट सिस्टम की तरह चार-छः चिड़िया-परिवार ने ऊपर-नीचे, आजू-बाजू अपने घोंसले बना लिए थे। उनकी चहचहाहट, फर्र-फर्र कर उड़ना परिवारों के सानिध्य सा अहसास कराता। तिनका-तिनका चुनकर बनाए घर में मेहनतकश प्रयसों से दाना बटोरकर ज़िंदगी बसर कर रहे, इन परिवारों पर एक दिन बलशाली काले कौओं ने काँव-काँव कर बिना किसी बजह के अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर हमला बोल दिया। पीड़ा भरी चीं-चीं सुन वे बाहर निकल कर कौओं का प्रतिरोध करें उसके पूर्व कौए घोंसलों को तहस-नहस, अंडों को उठा या फोड़कर, चूजों को क्षति पहुँचा कर अपने काले-रंग और दिल का परिचय देकर भाग चुके थे। कौओं की बेरहमी को कोसते तथा अपने आत्मीयों की याद कर उनकी आँखों की कौरें भीग आईं।
    मन उचट जाने पर खड़े होकर वे पीछे की अमराई की ओर निकल गए। सब वृक्षों पर निगाह फिसलते हुए आम तथा जामुन के बीच खड़े खिरनी के वृक्ष पर उनकी निगाह अचानक टिक गई।
    उन्होंने खुशी में सराबोर होते हुए देखा, आँगन के नीम वृक्ष पर बने घोंसलों की स्टाइल में ही नन्हें पक्षियों ने काले कौओं को चुनौती भरा मौन प्रत्युत्तर देते हुए अपनी नई जिन्द्रगी शुरू कर फिर से चहचहाना प्रारम्भ कर दिया है।

  • 766, सुदामा नगर, इन्दौर-452009 (म.प्र.)



श्यामसुन्दर अग्रवाल




टूटा हुआ काँच                        
     
      महीनाभर जूठे बर्तन साफ करने के पश्चात चौदह वर्षीय सोनू ने होटल के सफेद दाढ़ी वाले मालिक से अपना पहला वेतन माँगा। मालिक ने उसे खा जाने वाली निगाह से देखा। अपनी घनी मूँछों पर हाथ फेरते हुए वह कड़का, ‘‘दे देंगे, कहीं भागे तो नहीं जाते३कल गाँव से अपनी माँ को बुला लाना, हिसाब करके ले जाएगी।’’
      सुबह गया लड़का दोपहर बाद अपनी विधवा माँ को साथ ले आया।
     ‘‘अभी देता हूँ.....हिसाब करके देता हूँ।’’ कहते-कहते मालिक ने गाँव को जाने वाली आखिरी बस भी निकाल दी। विवश होकर विधवा को रात होटल में ही ठहरना पड़ा। गहरी रात के अँधेरे में बाज़ ने पंख फड़फड़ाए और निरीह चिड़िया पर झपट पड़ा। चिड़िया छटपटायी, मिन्नत की, ‘‘बाबा! मुझे
रेखा चित्र : महावीर रंवाल्टा  
छोड़ दो, तुम्हारी बेटी समान हूँ। यह क्या कर रहे हो!’’

     ‘‘करना क्या है, लड़के ने महीना भर कांच के जो गिलास तोड़े हैं, उनकी कीमत वसूल रहा हूँ। उसकी तनख्वाह से काटता तो क्या बाकी बचता!‘‘ बाज़ ने अपनी जकड़ को और मजबूत करते हुए कहा।
     उस रात लड़के ने काँच का एक गिलास और तोड़ दिया और टूटा हुआ गिलास होटल मालिक के सीने में धँस गया।

  • 575, गली नं.5, प्रतापनगर, पो.बा. नं. 44, कोटकपूरा-151204, पंजाब    



शोभा रस्तोगी ‘शोभा’ 




पापा की बेटी 

     ‘‘आ मेरी सौन चिरैया! पापा के कंधे पे बैठ। मैं घोडा बनूँ तू मेरी सवारी।’’ नाना प्रकार पापा अपनी बिटिया को खेल खिलाते, रिझाते। बेटी हंस-हंस के दोहरी हुई जाती। 
     समय के अन्तराल से यही बिटिया डाक्टर बनी। विवाह वेला ने दस्तक दी। 
     ‘‘पापा! मेरी शादी के बाद आप अकेले हो जाओगे।’’
     ‘‘बेटी तो पराई ही होती है।’’ 
     ‘‘बेटे से अधिक लाड़ प्यार दिया मुझे। आपको छोड़ नहीं जाऊँगी।’’
     ‘‘ऐसा न कह। क्वारी रहेगी ?’’
     ‘‘किसी अनाथ पर सुशिक्षित, नौकरीपेशा से करना चाहोगे मेरा विवाह?’’
छाया चित्र : रोहित कम्बोज 

     ‘‘तुझे पसंद है तो....।’’
     ‘‘ठीक है। हम दोनों आपके साथ रहेंगे।’’
     ‘‘तू मेरी बेटी नहीं बेटा है।’’
     ‘‘बेटी को बेटी कह कर सम्मान दो न पापा! आपको बेटे की कमी खलती है?’’
     ‘‘न..न..बेटी। बेटी होना तो गौरव की बात है।’’
     ‘‘आप जैसे पापा की तो और भी....’’ हँसते हुए पापा की गलबहियां डाल दीं बेटी ने। 

  • RZ&D- 208 B,  डी.डी.ए. पार्क रोड, राज नगर-2, पालम कालोनी, नई दिल्ली-110077


अहफ़ाज़ अहमद कुरैशी




इशारा
      
      सड़क पर थूकना आम बीमारी है। हर कोई बगैर सोचे-समझे कहीं भी थूक देता है। 
छाया चित्र : रितेश गुप्ता 
      एक बार दो दोस्त सड़क किनारे पुल पर बैठे थे। एक आदमी वहाँ से गुजरा। जाते-जाते उसने अपनी साइकिल रोकी और पिच्च से थूक दिया। फिर आगे बढ़ गया।
     दोनों दोस्तों ने एक-दूसरे की ओर देखा। कुछ सोचकर एक ने उसे पुकारा- ‘‘अरे भाई, सुनो!’’
     वह आदमी लौटकर आया।
     एक दोस्त- ‘‘आपका कुछ छूट गया है।’’
     उसने हैरानी से देखा, जेबें टटोलीं और कहा- ‘‘नहीं तो...।’’
     दूसरा दोस्त- ‘‘भाई साहब, आप ‘यह’ भूल गए थे। आप ही का तो है न!’’ कहते हुए उसने थूकी हुई जगह दिखाई।
     वह आदमी शर्म से पानी-पानी हो गया।

  • प्लॉट नं. 5-ए, आदर्श कॉलोनी, पुलिस लाइन टाकली के पीछे, नागपुर-440013 (महा.) 



डॉ नन्द लाल भारती




स्वर्णिम कलम

    गीली पलकें क्यों चिराग के पापा ?
    गीली पलकें नहीं खुशी कहो।
    इतनी ख़ुशी...?
    हां...स्वर्णिम कलम दिखाते हुए शब्दप्रेमी बोले बात कलम की ही नहीं है।
    और क्या है .....? यह भी लिखने के काम आयेगी।
    आएगी तो सही कलम के पीछे भावना और सम्मान जो है वह तो दुनिया भर के खजाने से नहीं ख़रीदा जा सकता। चिराग ने   मुंबई से भेजा है।
    जानती हूँ।
    जानकर भी हलके में ले रही हो।
छाया चित्र : डॉ बलराम अग्रवाल 

    क्या.........?
    हां...बेटवा का बाप के नाम गिफ्ट वह भी स्वर्णिम कलम बड़ी बात है। इसका मर्म समझती हो।
    नहीं ....तुम रचनाकार जानो। मै तो बस इतना जानती हूँ की बेटवा बड़ा और तुम्हारी तरह बुद्धिमान हो गया है, तभी तो बाप को स्वर्णिम कलम गिफ्ट किया है ताकि तुम राष्ट्र और समाज के हित में और अच्छा लिख सको। यही सोचकर तुम्हारी पलकें गीली हो रही है।
    हां चिराग की माँ, मुझ जैसे बाप को बेटवा से कलम पाकर पलकें गीली तो होगी ही; क्योंकि लेखक के लिए कलम तो अनमोल होती है। बेटवा की पहली कमाई से तो और मूल्यवान हो जाती है। लेखक के लिए बड़ी और ख़ुशी की इससे और बड़ी बात क्या हो सकती है।
    मुबारक हो गीली पलकें चिराग के पापा।
    स्वर्णिम कलम को शब्दप्रेमी माथे चढाते हुए बोले तुम्हे भी चिराग की माँ।

  • आजाददीप, 15-एम, वीणा नगर, इन्दौर (म.प्र.)



किशन लाल शर्मा



इशारा

     ‘‘न जाने काली-कलूटी पैदा हो गई, जिससे शादी करने को कोई तैयार नहीं।’’ रंग के पीछे आज फिर लतिका को देखने आया लड़का रिश्ते से इनकार कर गया तो रोमा भड़क उठी थी।
    ‘‘माँ तू गोरी है, पापा भी गोरे थे। फिर मैं काली क्यों पैदा हुयी? इसका उत्तर तू अच्छी तरह जानती है। फिर मुझ पर क्यों गुस्सा हो रही है।’’
    लतिका की बात सुनकर रोमा भौचक्की रह गई। थोड़ी देर अवाक् सी देखती रही और फिर सिर झुका लिया। वह समझ चुकी थी कि बेटी उसके पर-पुरुष से सम्बन्धों की सच्चाई जान चुकी है।

  • 103 रामस्वरूप कॉलोनी, आगरा-282010 (उ.प्र.)

1 टिप्पणी:

  1. बहुत प्रभावी और कुछ सोचने के लिए विवश करती लघु कथाएँ हैं ....बहुत बधाई ,शुभ कामनाएँ |

    सादर
    ज्योत्स्ना शर्मा

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