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सोमवार, 27 फ़रवरी 2012

वैचारिक आलेख


अविराम का ब्लॉग :  वर्ष : १, अंक : ०६, फ़रवरी २०१२ 

।।अविराम विमर्श।।

सामग्री : डॉ0 मिथिलेश दीक्षित का आलेख वर्तमान परिवेश में नारी की भूमिका : विविध आयाम



डॉ0 मिथिलेश दीक्षित

वर्तमान परिवेश में नारी की भूमिका : विविध आयाम

    आज भारत, पूरे विश्व में ज्ञान, विज्ञान एवं विकास के विविध क्षेत्रों में एक प्रमुख शक्ति के रूप में उभरकर आ रहा है। अनेक क्षेत्रों में महिलाओं की भूमिका अत्यन्त महत्वपूर्ण मानी जा रही है, भले ही सदियों से भारतीय नारी की संघर्षों में पिसने की मज़बूरी रही हो, घर की चहारदीवारी में कै़द रहने की मज़बूरी रही हो, परन्तु अब उसे सम्मान प्राप्त करने का अधिकार प्राप्त है। अपनी घर-बाहर की भूमिका के प्रति भी वह सचेष्ट होने लगी है। साथ ही, यह भी सच्चाई है कि इन सभी मज़बूरियों की ज़िम्मेदार भी महिला ही अधिक रही है। नारी-अधिकार, नारी-उत्थान, नारी-उद्धार, नारी-जागृति की बात पुरूषों ने ही अधिक की थी। अनेक महापुरूषों के सद्प्रयासों से देश की महिलाओं की स्थिति में परिवर्तन और सुधार हुआ। उनसे प्रेरणा प्राप्त कर अनेक परिवारों में जागृति आयी और महिलाएँ भी अपने अधिकारों के प्रति सजग होने लगीं। तब से अब तक उन्हें अनेक सुअवसर मिलते गये कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में उनकी सहभागिता होने लगी है। 
    हमारी संस्कष्ति के समक्ष भी अनेक चुनौतियाँ हैं। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में मूल्यों का ह्रास हो रहा है। वस्तुवादी सोच और भौतिकवादी प्रवृति बढ़ती जा रही है। घर-परिवार-समाज के अन्तर्सूत्र और संवदेनात्मक रिश्ते टूटते जा रहे हैं। परिवार विखण्डित हो रहे हैं। अभद्र बातचीत, भड़कीले लिवास, भद्दे विज्ञापन, सस्ती लोकप्रियता, मूल्यहीन उथली मानसिकता और उच्छष्ंखलता को बढ़ावा मिल रहा है। मॉडलिंग, सिनेजगत्, टी0वी0, फैशन वर्ल्ड आदि में, दौलत और शोहरत के पीछे कतिपय महिलाओं में भागदौड़ मची हुई है। आज का ‘लिव इन रिलेशनशिप’ कांसेप्ट भारतीय संस्कृति और पारिवारिक मर्यादा पर करारी चोट कर रहा है। ऐसी स्थिति में, साहित्य से, समाज-सुधार से, शिक्षा से और राजनीति से जुड़ी महिलाओं के दायित्व और अधिक बढ़ जाते हैं। उन्हें स्वयं पर और घर से लेकर समाज तथा संसद तक पर अपनी दृष्टि रखनी होगी। प्रसिद्ध रचनाकार कृष्णा सोबती आशान्वित होकर कहती हैं, “भारतीय समाज में स्त्री-पुरूष-सम्बन्धों और पारिवारिक चौखटों को लेकर एक गहरी नैतिक हलचल और दूरगामी परिवर्तन और प्रभाव लक्षित है। एक तरफ स्त्री-आरक्षण की राजनीतिक चेतना और दूसरी और राष्ट्रीय स्तर पर नयी स्त्री की उपस्थिति अपनी ऊर्जा से नये उत्साह का संचार कर रही है।” (हिन्दुस्तानी ज़बान, अक्टूबर-दिस.0,2010)। 
     सामाजिक बुराइयों को दूर करने के लिए आज भी महिलाओं को अनेक क्षेत्रों में जागरूक होने की आवश्यकता है। अन्धविश्वास, मिथ्या कर्मकाण्ड, साम्प्रदायिकता आदि को दूर करने के लिए महिलाओं को पहल करनी होगी। स्वस्थ मानसिकता से कोई भी विकास शीघ्रता से होता है। मैंने एक स्थान पर लिखा था, ‘‘जागृति का अर्थ उन्मत्तता और स्वच्छन्दता नहीं हैं और न पुरूषों के बराबर, उनके जैसा होना या उनसे आगे जाना है। स्त्री का अपना स्वतन्त्र अस्तित्व भी है और उसमें प्रकृतिप्रदत्त अपने विशिष्ट सहजगुण भी हैं। साथ ही, स्त्री और पुरूष-दोनों जीवन के दो महत्वपूर्ण पक्ष हैं, जो एक-दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं। जीवन के कुछ क्षेत्रों में तो स्त्री के दायित्व पुरूष से भी बढ़कर हैं। पूरे परिवार की व्यवस्था की वह स्वामिनी होती है। राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में भी यह बात समझनी चाहिए कि सामाजिक बुराइयों को अब स्त्रीशक्ति द्वारा पहल करने पर ही आसानी से दूर किया जा सकता है। सही रूप में आधुनिक बनने के लिए फैशन व शारीरिक सज्जा आवश्यक नहीं, विचारों में परिवर्तन आवश्यक है। जहाँ तक स्त्री-पुरूष के समानाधिकार की बात है, उसके लिए कोरे उपदेश नहीं, क्रियान्वयन की आवश्यकता है’’ (साहित्य और संस्कृति, पृ0128)।
    देश के लिए भारतीय नारी ने बड़े से बड़े बलिदान किये हैं। नारियों के त्याग और बलिदान की एक गौरवशाली परम्परा भी रही है। भारत के स्वाधीनता-आन्दोलन में भारतीय युवतियों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, परन्तु प्रायः देखा गया है कि नारी-विषयक सामाजिक समस्याओं के प्रति नारिजगत् में अपेक्षाकृत अधिक उदासीनता रही है। नारी-शोषण के विरोध में भी उनका स्वर दबा हुआ रहा है। जिसके लिए न केवल पुरूष दोषी है और न केवल स्त्री। अनेक परम्परागत और मनोवैज्ञानिक कारण रहे हैं। शिक्षा का अभाव भी एक प्रमुख कारण रहा। हमारे देश के महान् चिन्तक स्वामी दयानन्द सरस्वती तथा अन्य महापुरूषों के प्रयासों से स्त्री की समुचित शिक्षा का व्यापक रूप से प्रचार-प्रसार हुआ था। अब तो विभिन्न शैक्षिक-शैक्षणिक क्षेत्रों में अपने देश की युवतियाँ भारत में ही नहीं, विश्व में अपना स्थान बना रही हैं। राष्ट्रीय साक्षरता मिशन के साथ-साथ अनेक स्वयंसेवी संस्थाएँ भी नारी-कल्याण, महिला-उत्थान, नारी-शिक्षा और जागृति के लिए कार्य करती रही हैं। महिला-साक्षरता के देशव्यापी विभिन्न कार्यक्रमों को चलाया जा रहा है, परन्तु और अधिक जागृति की आज भी आवश्यकता है। एक सच्चाई यह भी है कि नगरीय क्षेत्रों की महिलाएँ ही प्रायः विविध परिदृश्यों में अपनी भूमिका प्रत्यक्षतः निभाती आयी हैं। ग्राम्य-क्षेत्रों की महिलाओं में आज भी र्प्याप्त जागृति नहीं आयी है। उनका पूरा जीवन घर-परिवार के लिए समर्पित हो जाता है, परन्तु उन्हें उनके पूरे अधिकार नहीं मिल पाते हैं। उनकी क्षमताओं का भी सही मूल्यांकन नहीं हो पाता है। उनमें जो सहज प्रतिभा होती है, वह बिखरकर नष्ट हो जाती है। अपने देश में कृषि-व्यवसाय और खाद्य-सुरक्षा में ग्रामीण महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही हैं। यह एक बड़ा कार्य है, जिसका भारत की ग्राम्य-महिलाएँ पूरी निष्ठा से निर्वहन कर रही है। स्वर्ण जयन्ती ग्राम स्वरोज़गार योजना, राष्ट्रीय रोज़गार मिशन, जननी सुरक्षा योजना, राजीव गान्धी किशोरी सशक्तीकरण योजना, महात्मा गान्धी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी योजना आदि योजनाएँ महत्वपूर्ण हैं। ग्रामीण महिलाओं की भूमिका को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा सन् 2008 में ‘अन्तराष्ट्रीय ग्रामीण महिला दिवस’ (15 अक्टूबर) घोषित किया गया था। सन् 1975 में अन्तर्राष्ट्रीय महिला वर्ष पूरे विश्व में मनाया गया था। उसके बाद महिलाओं से सम्बन्धित अनेक संगठन बने, अनेक समितियाँ, अनेक पत्रिकाएँ प्रकाश में आयीं। स्थान-स्थान पर स्त्रीमुक्ति को लेकर समितियाँ-सम्मेलन भी होने लगे। मार्च, 1982 में प्रथम उत्तर प्रदेश महिला सम्मेलन, आगरा में हुआ था, उससे बहुत प्रचार-प्रसार हुआ। नारी की भूमिका और अधिकार के लिए महिलाओं से सम्बन्धित अनेक साहित्यिक संस्थाएँ भी स्थापित होकर सक्रिय होने लगीं। उनमें से एक अ0भा0 कवयित्री सम्मेलन संस्था भी है, जिससे देश के सभी प्रान्तों की भारी संख्या में महिला सर्जक जुड़ी हुई हैं। महिला-सुरक्षा की समस्या आज भी एक बड़ी समस्या है, जबकि भारत सरकार की ओर से ‘राष्ट्रीय महिला आयोग’ की स्थापना की गयी है और राज्य स्तर पर भी उसका क्रियान्वयन हो रहा है। इस आयोग के अतिरिक्त महिला अधिकारों की सुरक्षा हेतु तथा उनकी भूमिका के प्रति जागरूकता हेतु विगत कुछ वर्षों से गैर सरकारी संगठन भी कार्यरत हैं। 
    नारी के व्यक्तित्व के विकास, उन्नयन, उसकी शिक्षा और जागृति आदि की नींव, वस्तुतः घर से ही प्रारम्भ होती है। पुत्री के रूप में उसका पोषण मुख्य रूप से माता के द्वारा ही होता है। घर में माता की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण होती है। मैं अपना ही कथन उद्घृत कर रही हूँ, ‘‘घर एक आदर्शस्थल होता है, जहाँ बच्चों को सीखने के विविध अवसर मिलते हैं। माता पूरे घर की स्वामिनी होती है और बालक के वर्तमान तथा भविष्य की निर्मात्री भी। मनुष्य के चरित्र-निर्माण और व्यक्तितत्व-विकास की प्रक्रिया बाल्यावस्था से ही प्रारम्भ हो जाती है। संसार में, महापुरूषों से सम्बन्धित अनेक ऐसे उदाहरण हैं, जिनमें माता की भूमिका सर्वोपरि रही है। अपनी माताओं के द्वारा दी गयी उचित शिक्षा-दीक्षा और संस्कारों के कारण अनेक व्यक्ति संसार के इतिहास में महापुरूष कहलाये और प्रसिद्धि हो प्राप्त हुए। माता का जागरूक और शिक्षित होना इसलिए भी आवश्यक है, ताकि वह बच्चों में समुचित नैतिक संस्कार डाल सके। स्वस्थ विकास न होने के कारण बालक का पूरा जीवन प्रभावित होता है और जिस समाज में वह रहता है, उसमें सहयोग करना तो दूर, उसे भी दुर्बल बनाने का वह कारण बन जाता है।........उसके सम्पूर्ण विकास की नींव माता के द्वारा ही पड़ती है और घर के वातावरण का बालक के विकास पर प्रभाव पड़ता है। सन्तुलित प्रेम और सन्तुलित अनुशासन से बालक पर बहुत प्रभाव पड़ता है। प्रेमपूर्ण अनुशासित स्वस्थ वातावरण में पलकर बालक बाद में स्वस्थ व्यक्तित्व का स्वामी बनता है।’’ (आस्थावाद एवं अन्य निबन्ध पृष्ठ 132-33) । इस प्रकार शिक्षा एवं व्यक्तित्व-विकास की प्रक्रिया घर से विद्यालय तक और विद्यालय से समाज तक होती है। इसमें घर सर्वाधिक महत्वपूर्ण कड़ी है, जिसका दायित्व गृहस्वामिनी या माता का होता है। आज के मशीनी माहौल में ममता का भी मशीनीकरण होने लगा है। इस ओर भी महिलाओं को अपनी भूमिका के प्रति सचेष्ट होना है। 
    भूमण्डलीकरण के बोध ने महिलाओं की शक्ति को उभारा है, उर्मिला शिरीष का कथन बहुत सटीक है कि ‘‘इधर भूमण्डलीकरण ने सारे परिदृश्य को ही बदल दिया है। भूमण्डलीकरण बाजार ने कई चीज़ों में समानता ला दी है। पूरा विश्व एकीकृत हो गया है। जंक फूड से लेकर डिज़ाइनर कपड़ों, फैशन, सुई-धागा से लेकर एयर लाइन्स तक में स्त्री दिखायी दे रही (जनसंचार के माध्यमों में आयी क्रान्ति ने इस बदलाव को दुनिया के कोनों-कोनों में पहुँचा दिया है)। नये वैश्वीकरण ने स्त्री को अलग ढंग से स्वावलम्बी बना दिया है। आत्मविश्वास से भर दिया है। अपनी क्षमताओं, अपने अधिकारों, अपने सौन्दर्य और अपनी बुद्धि से परिचित करवा दिया है।’’ रचनात्मक दिशा में भूमण्डलीकरण के बोध ने महिलाओं की शक्ति को उभारा है। हिंसा, अन्याय, शोषण, असमानता के खिलाफ़ महिला रचनाकारों ने अपनी आवाज़ उठायी है। महिलाओं की सशक्त भूमिका के लिए और उनको केन्द्रीय धारा में लाने के लिए महिला रचनाकारों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से महत्वपूर्ण पृष्ठभूमि तैयार कर दी है। मृदुला गर्ग, उषा प्रियंवदा, चित्रा मुद्गल, 
सुधा अरोरा, ममता कालिया, कमल कपूर, मन्नू भण्डारी, मृणाल पाण्डेय आदि-आदि महिला रचनाकारों ने अपनी कहानियों और समीक्षा के माध्यम से नारी-अस्मिता एवं नारी-विमर्श पर प्रकाश डाला है। उपभोक्तावादी अपसंस्कृति में महिलाओं की उच्छृंखलता को बढ़ावा मिला है, तो उनकी असुरक्षा का खतरा भी बढ़ा है। वर्तमान भौतिकतावादी परिवेश में सम्बन्धों में टूटन, बिखराव, नैतिक मूल्यों में गिरावट, वृद्धावस्था का एकाकीपन आदि अनेक पक्षों पर महिला रचनाकारों ने अपनी लेखनी चलायी है। उर्मिला शिरीष ने स्पष्ट रूप से सचेष्ट किया है कि स्त्री कथाकारों को जेण्डर से बाहर निकलकर, धर्म, वर्ण, भाषा, प्रान्तीयता जाति तथा नस्ल से बाहर निकलकर आत्ममुग्धता, आत्मप्रशंसा, आत्मानुभवों और पुरूषों की नकल या पुरूषों के समान बनकर आगे बढ़ने की मानसिकता का परित्याग कर प्रकृति-प्रदत्त गुणों, क्षमताओं और अपनी ज़िम्मेदारियों का पालन करते हुए मानवी रूप में आगे बढ़ना होगा।
    साहित्य में नारी-लेखन नारी की अस्मिता और संघर्षों से जुड़ा है। नारी लेखिकाओं के लेखन में व्यक्त संघर्ष केवल पुरूषों के विरूद्ध ही नहीं है, नारी-चेतना को जागृत करने के लिए भी है। महादेवी वर्मा ने नारी-जागृति की बात करते हुए स्पष्ट किया कि विकास-पथ पर अग्रसर होकर नारी पुरूष का साथ देकर उसकी यात्रा को सुगम बनाती रही है। कविता के क्षेत्र में सरोजनी नायडू, महादेवी वर्मा, समुद्रा कुमारी चौहान, सुमित्रा कुमारी सिन्हा से लेकर अब तक हज़ारों कवयित्रियों ने काव्य की विविध विधाओं में अपनी पहचान बनायी है। ‘साहित्य और संस्कृति’ के एक आलेख में मैंने संक्षिप्त विवरण दिया था कि पत्रकारिता के क्षेत्र में भी देश की महिलाओं ने अनेक नवीन क्षितिज खोले हैं। अनेक बड़े पुरस्कारों को प्राप्त करने वाली प्रसिद्ध रचनाकर्त्री महाश्वेता देवी ने पत्रकारिता के क्षेत्र में आदिवासियों की समस्याओं के चित्रण से तहलका मचा दिया था। नलिनी सिंह ने टी0वी0 पत्रकारिता में तथा ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’ की संपादक मृणाल पांडे ने प्रिंट मीडिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। अरून्धती राय, जिन्हें ‘गॉड ऑफ स्मॉल थिंग्स’ पर बुकर पुरस्कार मिला था, ने भी पत्रकारिता को महत्व दिया। उपर्युक्त तीनों महिलाएँ खोजी पत्रकारिता की सशक्त हस्ताक्षार हैं। ‘ऋता’ त्रैमासिक की महिला संपादक ने पत्रकारिता के क्षेत्र में आस्थावादिता और मानवीय मूल्यों का समावेश किया तथा उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान से दो बार पुरस्कार प्राप्त किया। ‘नवभारत टाइम्स’ की संवाददाता के रूप में मणिमाला ने प्रसिद्धि प्राप्त की। साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त तेलुगु पत्रकार मालती चन्दर का नाम भी बड़े सम्मान से लिया जाता है।
    लोकतान्त्रिक दृष्टि से, हमारे देश में महिलाओं को पुरूषों के समान ही अधिकार मिले हैं, परन्तु राजनीतिक क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी अपेक्षाकृत बहुत कम है। इसमें भी सन्देह नहीं कि राजनीति में बढ़ती हुई अभिरूचि और उनका पदार्पण देश के सामाजिक उत्थान का एक बड़ा और सकारात्मक संकेत है। प्रायः महिलाओं का परिवेश ऐसा नहीं होता है, जिसमें देश की राजनीति पर विशेष चर्चा होती हो, राजनीति के सैद्धान्तिक पक्षों पर चिन्तन होता हो या देश की समस्याओं के लिए राजनीति द्वारा निराकरण के विषय निर्धारित होते हों। अपने देश में, राजनीतिक क्षेत्र में उभरकर आने वाली कतिपय महिलाएँ अपने बलबूते पर विकास के पथ पर अग्रसर होकर सक्रिय रही हैं। अधिकांश ने किसी न किसी पुरूष का मार्ग-दर्शन भी प्राप्त किया है। भारत की राजनीति में प्रथम महिला प्रधानमन्त्री रहीं श्रीमती इन्दिरा गांधी ने भारतीय राजनीति को एक नयी दिशा दी थी। यह श्रृंखला आगे ही बढ़ती रही और देश के राजनीतिक क्षितिज पर अनेक नाम उभरते रहे। 
    राजनीतिक में जुड़ने पर महिलाओं को घर की चौखट के बाहर, जनता के जुड़ने के लिए, इस संकल्प के साथ जाना होता है, ताकि वे देश, समाज और अपने क्षेत्र के जन-जन के जीवन और उनकी समस्याअें को समझ सकें और उनके निराकरण के प्रयास कर सकें। किसी समस्या या संघर्ष के लिए अब हुंकार, ललकार, आक्रोश की अपेक्षा सहयोगी भावना से, सूझबूझ के साथ सही निर्णय लेने की आवश्यकता है। संघर्ष किसी भी प्रकार का हो, नुकसान सबसे अधिक नारी का ही होता है, क्योंकि वह माता, बहन, पत्नी, पुत्री और मित्र के रूप में पुरूष से, पूरे समाज से, अनेक प्रकार से जुड़ी होती है। यदि कोई क्षति होती है, तो पूरा परिवार और समाज प्रभावित होती ही है, आगे आने वाली पीढ़ी का भविष्य भी प्रभावित हो जाता है। इसलिए महिलाओं का, उदार मानसिकता और विवकेशीलता के साथ राजनीति में आना आवश्यक है, परन्तु राजनीति की जानकारी, पूरे परिवेश की जानकारी प्राप्त करना उससे भी अधिक आवश्यक है। यह उनका कर्तव्य है। साथ ही निर्णय लेने की क्षमता प्राप्त करना उनका अधिकार भी है और कर्तव्य भी। पुरूषों का सहयोग, बाहरी क्षेत्रों से सम्पर्क और उनकी कार्यक्षमता को मज़बूत बनाता है, परन्तु यदि उनमें निर्णय लेने की समझ और क्षमता है, उनकी खुली और विस्तृत सोच है, तो पुरूष उनके लिए बैसाखी न बनकर, सच्चे सहयोगी बन सकते हैं। किसी राजनीतिक महिला का समाज से सीधा और बहुत समीप का नाता होता है। वह जनता की प्रतिनिधि बनकर समाज के पटल कर आती है, अतः जनता की विभिन्न समस्याओं का निराकरण करना-कराना उसका दायित्व बन जाता है। यह भी दायित्व बन जाता है कि वह जनता के दुःख-कष्टों की तटस्थ दर्शक न होकर सच्ची साथी और सहयोगी बने। राजनीति मनुष्य के लिए, मनुष्यता के लिए, मनुष्य के नैतिक आचरण के संवर्धन के लिए है, अतः एक राजनीतिक महिला को सर्वप्रथम अपने व्यक्तित्व को प्रभावी बनाना होगा और अपनी छवि को जनता के बीच इस प्रकार प्रस्तुत करना होगा कि जनता उसे अपना हितैषी और सहयोगी समझे। साथ ही, ऐसे अनेक निर्णयात्मक पहलू हैं, जिन्हें वह धर्म-निरपेक्ष, जाति-निरपेक्ष होकर, मानवीय मूल्यों की पक्षधर होकर, लोकतान्त्रिक दृष्टि से सुलझाने में समर्थ हो सकती है। उसे अपनी दृष्टि विस्तृत कर, दिशा सुनिश्चित कर लेनी चाहिए। तभी वह राजनीतिक के साथ-साथ राजनीतिज्ञ भी बन सकती है। अभी भले ही आरक्षण उसका कवच हो, एक दिन आवश्य आयेगा, जब पंचायत स्तर पर या अन्य क्षेत्रों में उसे किसी आरक्षण की दरकार नहीं होगी और वह अपने कर्त्तव्यों तथा अधिकारों के प्रति और अधिक जागरूक बन जायेगी।
    इसके अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों, जैसे क्रीड़ा और कार्पोरेट के क्षेत्र में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। क्रीडा-जगत् में कीर्तिमान स्थापित करने वाली भारत की प्रमुख महिलाओं में अनेक नाम उल्लेखनीय है। बैडमिंटन खिलाड़ी सायना नेहवाल सुपरसीरीज़ का खि़ताब जीतने वाली देश की प्रथम महिला है। कामनवैल्थ चैम्पियन में स्वर्णपदक जीतने वाली प्रथम वेट लिफ्टर कुंजारानी तथा ओलम्पिक में प्रथम सुपरधाविका पी0टी0 उषा का नाम उल्लेखनीय है। टेनिस में सानिया मिर्ज़ा को प्रसिद्धि मिली। झूलन गोस्वामी महत्वपूर्ण क्रिकेट खिलाड़ी हैं। तैराकी में बुला चौधरी ने नाम कमाया, तीरंदाजी में डोला बनर्जी ने, पर्वतारोहण में बछेन्द्रीपाल और सन्तोष यादव ने प्रसिद्धि पायी। 
    कॉर्पोरेट की दुनिया में भी भारत की महिलाएँ अग्रणी भूमिका निभा रही हैं। एचएसबीसी इंडिया की कण्ट्री हैड नैना लाल किदवई तथा ब्रिटानिया इंडस्ट्रीज़ की एम0डी0 विनिता बाली ने प्रसिद्धि प्राप्त की है। चन्दा कोचर ने आईसीआईसीआई बैंक की मुख्य कार्यक्रम अधिकारी और प्रबन्ध-निदेशक के रूप में अपनी भूमिका का सफलतापूर्वक निर्वहन किया है और वे इस बैंक की प्रथम महिला हैड है। प्रशासनिक सेवाओं में सुषमा नाथ आई0ए0एस0 (फाइनेंस सेक्रेटरी), सुधा पिल्लई आई0ए0एस0 (सदस्य सेक्रेटरी-योजना आयोग) आदि महत्वपूर्ण महिलाओं ने देश का मस्तक ऊँचा किया है। 
     अन्त में, अपनी बात मैं अपने ही लेख की पंक्तियों से कर रही हूँ-स्त्री-स्वतंत्रता या स्त्री-जागरण का यह अर्थ भी है कि उसे अन्याय, अत्याचार, अनैतिकता और शोषण का विरोध करना है। उचित, नैतिक, न्यायोचित विषय के लिए और श्रेयस्कर बातों के प्रति सहयोग और इनके विपरीत बातों के प्रति असहयोग भी करना है। इस प्रकार, अपने देश में महिलाओं की स्थिति, भूमिका और अधिकारों के लिए हम सबको मिला-जुला और सार्थक प्रयास करना होगा, जिससे देश में एक वैचारिक क्रान्ति आये और महिलाओं की सर्वांगीण उन्नति हो। 
  • जी-91,सी, संजय गान्धी पुरम्, लखनऊ-226016
                                                         

1 टिप्पणी:

  1. डॉ॰ मिथिलेश जी का यह वैचारिक आलेख कलम की धार सच के सामने आईं अपेष कर रहा है ""स्त्री-स्वतंत्रता या स्त्री-जागरण का यह अर्थ भी है कि उसे अन्याय, अत्याचार, अनैतिकता और शोषण का विरोध करना है। "" स्त्री सर्व गुण सम्पन्न तब ही होती है जब वह जींवन के दो छोर संभालते हुए अपनी जीवन नैया पार साहिल पर उतरे। यही उसकी पूर्णता है और गरिमा भी
    देवी नागरानी

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