आपका परिचय

मंगलवार, 22 नवंबर 2011

अविराम विस्तारित

।।कविता अनवरत।।
सामग्री : किशन कबीरा, नारायण सिंह निर्दोष, शशिभूषण बड़ोनी, रुक्म त्रिपाठी, बाबा कानपुरी, केशव शरण, डा. विजय प्रकाश,  नरेश कुमार उदास, शिवानन्द सिंह सहयोगी, त्रिलोक सिंह ठकुरेला, सत्येन्द्र तिवारी, नित्यानंद ‘तुषार’ व सनातन कुमार बाजपेयी की कवितायेँ 



।।कविता अनवरत।।
किशन कबीरा

{समकालीन कविता के सुपरिचित कवि किशन कबीरा का कविता संग्रह ‘ दलित  टोला' इसी वर्ष प्रकाशित हुआ है। प्रस्तुत है। इसी संग्रह  से उनकी एक प्रतिनिधि कविता।}

एकलव्य और अर्जुन

उसके कच्चे-कवैलू वाले घर में
न पढ़ाई के लिए कोई जगह है
नहीं बिजली के प्रकाश की कोई व्यवस्था
अल सुबह ही
जुत जाते घर की गाड़ी में
बैलों के साथ बछड़े भी

पुस्तकें आधी-अधूरी
सहपाठियों से मांगी-तागी
और स्कूल की फीस
सरकारी खाते से
तब भी
बड़ी मुश्किल से निकल पाता समय
पढ़ाई के लिये
बुझती-झपकती लालटेन के प्रकाश में
रात-रात भर पढ़कर उसे करनी है प्रतिस्पर्धा अर्जुन से

वह जानता है
उसे कभी नहीं मिला
आशीर्वाद द्रोणाचार्य का
लेकिन
मिलने पर वह
ज़रूर मांग लेगा दाहिना अंगूठा
गुरु-दक्षिणा के नाम पर

रेखांकन : सिद्धेश्वर
उसे कटे हुए अँगूठे की पीड़ा के साथ
टकराना होगा
सर्व सुविधा सम्पन्न अर्जुन से
अर्जुन जिसे शिक्षित-प्रशिक्षित करने में लगी है
द्रोणाचार्यों की पूरी जमात
सब जानते हैं
वे ही गुरु हैं उसके
और परीक्षक भी
और उनका शिष्य प्रेम जग जाहिर

  • कबीरा कॉटेज, कबूतरखाने के पास, राजसमन्द-313326 (राज.)

नारायण सिंह निर्दोष






ग़ज़ल

काटती  रितु सर्द है  यारो!
सूरज, उनके सुपुर्द है यारो!

सिगरेट तुमने पी, धुआँ-
हमारे इर्द-गिर्द है यारो!

उनको रोग पीलिया नहीं
बदन पै चढ़ी हर्द है यारो!

छोटी-बड़ी आँतें लड़ रहीं
पेट में सिर दर्द है यारो!

कविता

जब भी/मैं कुचला गया हूँ
ट्रेफिक से
अक्सर पाया गया हूँ
अपने हाथ पर चलता हुआ
(मंजिल पाने तक)
उतरना पड़ा बेशक
अपने हाथ से फुटपाथ पर
या फिर/अपने ही दूसरे हाथ पर
मंजूर है मुझे
क्योंकि/मैं जानता हूँ
नहीं होगा मेरा जिक्र
अखबार/पोस्टर
रेखांकन : डॉ.सुरेन्द्र वर्मा
या इतिहास के पन्नों पर
यही कि ‘निर्दोष’
मारा गया था कभी
अपने हाथ पर चलता हुआ।
  • सी-21, लैह (LEIAH) अपार्टमेन्ट्स, वसुन्धरा एन्क्लेव, दिल्ली-110096


शशिभूषण बड़ोनी






उन्मुक्त हँसी

मोनालिसा की मुस्कान
बनी हुई चित्र कृति को
देखने के बाद सोचता हूँ
उकेरी किस तरह होगी
उस महान कलाकार ने
वह मुस्कान
कि वह रचना अमर हो गयी

दरअसल बहुत दिनों से
देखी नहीं मैंने अपने आस-पास
किसी भी आदमी के चेहरे पर
कोई उन्मुक्त सहज मुस्कान


कई-कई दिन बीत गये
लेकिन दिखायी नहीं पड़ी
ऐसी हँसी
जिसे न सही
उस कलाकार की तरह देखें
रेखांकन : डॉ.सुरेन्द्र वर्मा
अपनी रचनाओं में
उल्लेख भर ही कर दूँ...

लेकिन हाय रे...
आजकल के आदमी की
तनाव भरी दास्तान
मिल नहीं पाती है जो कोई
सीधी सच्ची प्यारी मुस्कान!

  • आदर्श विहार, ग्राम व पोस्ट- शमशेर गढ़, देहरादून (उ.प्र.)

रुक्म त्रिपाठी


 


हे मां

मस्तक पर है मुकुट हिमालय.,
सागर सादर चरण पखारे ।
केसर गमके चंदन महके,
पवन सदा आरती उतारे ।।

शस्य श्यामला लहरे आंचल,
चंदा, सूरज नयन तुम्हारे ।
मौन तुम्हारा वंदन करते,
जगमग आसमान के तारे।।

झर झर झर झर झरना बहता,
कल कल करतीं सरिताएं ।
भोर हुई है माता जागो,
मधुर प्रभाती गीत सुनाएं ।।

हे मां ! सब तेरे अनुचर हैं,
चंवर डुलातीं पुष्प लताएं ।
पशु, पक्षी नर्तन करते हैं,
प्रहरी हैं पर्वत मालाएं ।।

अवतारों की जननी हो तुम,
राम, कृष्ण, गौतम की माई।
गोद तुम्हारी में पलते हैं,
हिंदू, मुसलिम, सिख, ईसाई।।

भेदभाव तुमको नहिं भाता,
शांति, अहिंसा तुमको प्यारी।
जग में अलग-थलग दिखती है,
इसीलिए तस्वीर तुम्हारी।।

महावीर, गांधी, सुभाष से,
द्रश्य छाया चित्र  : पूनम गुप्ता 
पुत्रों की तुम हो महतारी ।
उसका भला हुआ ना जिसने,
तुम पर बुरी नजर है डाली ।।

आये, गये विदेशी कितने,
नहीं अधिक दिन थे टिक पाये।
उन्हें भागना पड़ा एक दिन,
जो तुम पर अधिकार जमाए।।

बहक गये जो बेटे उनको,
रक्त सना आंचल दिखलाओ।
भटक गये हैं जो भी पथ से,
उनको मां सन्मार्ग दिखाओ ।।

  • 30, रामकृष्ण  समाधी रोड, ब्लाक-एच, फ्लैट-2,कोलकाता-700054

बाबा कानपुरी





हम उसी पथ के पथिक हैं

मार्ग में अवरोध पग-पग ,
कंटकों के जाल फैले
सघन तम की चादरों से
विषधरों के फन रुपहले।
              हम उसी पथ के पथिक हैं।  
आस्था के इन पगों की
रक्तरंजित एड़ियाँ क्यों?
बढ़ न पाते, स्वार्थ की
जकड़े हुए हैं बेड़ियाँ क्यों?
किन्तु है विस्वास मुण्झको
छटेंगी तम की घटाएं
भोर से कुछ ठीक वहले।
              शुष्क मत समझो रसिक हैं।
              हम उसी पथ के पथिक हैं।
श्वेत हैं परिधान, उर में
द्रश्य छाया चित्र  : अभिशक्ति 
कालिमा निकले बजकती,
रेत की दीवार सी नीयत
सहज जिनकी खिसकती।
ज्वार बन उन्माद उठते ,
ध्वंस का अवसाद लगता।
झाग के बादल विषैले,
                दीन ये होकर धनिक हैं।
                हम उसी पथ के पथिक हैं।
  • ग्राम सदरपुर, सेक्टर-45, नोएडा-201303, उ.प्र.

केशव शरण






ग़ज़ल

ये अपनी ज़िन्दगानी का सफ़र था
बुढ़ापे तक जवानी का सफ़र था

थका डाला मेरे किरदार को भी
बहुत लम्बा कहानी का सफ़र था

हवा से तेज़ गुज़रे इसके लम्हे
बहुत कम मौज-पानी का सफ़र था

हमारी एक ही मंज़िल थी लेकिन
शुरू से बदगुमानी का सफ़र था

द्रश्य छाया चित्र  : पूनम गुप्ता 
पड़े हैं फूल मुरझाये ज़मी पर
गमकता रातरानी का सफ़र था

कहां तक काग़जी कश्ती भी जाती
हिलोरदार पानी का सफ़र था

तुम्हारे गांव का टेशन था गुज़रा
मेरी जां राजधानी का सफ़र था
  • एस-2/564, सिकरौल, वाराणसी कैन्ट, वाराणसी-2 (उ0प्र0)

डा. विजय प्रकाश





अब क्या कहना है

जब कहनी थी,
नहीं कह सके,
कर गये पार पचास......
    प्रिये! अब क्या कहना है?
फूल-शूल के बँटवारे में
शूल पड़े सब हिस्से मेरे,
द्रश्य छाया चित्र  :  उमेश महादोषी
मन को समझाने के क्रम में
मैंने गढ़े अनेकों किस्से;
लेकिन किस्से गढ़ने भर से
जीवन भला कहाँ चलता है?
विधि ने जो लिख दिया उसे तो
    हँसकर या रोकर सहना है।
अपने वश में सिर्फ दौड़ना,
हार-जीत तो ईश हाथ में,
मेरे लिए यही काफी था,
खड़ी रही तुम सदा साथ में;
हीरे-पन्नों के लालच में
क्यों कर दर-दर शीश झुकाएँ?
संघर्षों का श्रम-सीकर ही
    अपने जीवन का गहना है।
  • मंत्रिमंडल सचिवालय (राजभाषा) विभाग, मुख्य सचिवालय, बिहार, पटना- 800015.

नरेश कुमार उदास





हँसी के खजाने

सूरज रोज चढ़ता है
फैलाता है अपनी रौशनी
मानों किरणों के खजाने
लुटाता है।

चहकती हैं रंग-बिरंगी चिड़ियाएँ
सुरीले गीत गाती
हर्षाती हैं

चाँद चढ़ता है
हर रात
शीतल चाँदनी बिखेरता
खिलखिलाता सा
चाँदी की हँसी लुटाता
मोहता है।

मैं
देखता हूँ
सूरज, चाँद और पक्षियों को
ढूँढ़ता हूँ
उनकी खुशी का रहस्य।

मैं हैरान हूँ
रेखांकन : डॉ.सुरेन्द्र वर्मा
यह सोचकर
कितना समय हो गया
मैं नहीं लगा पाया
ठहाके

खुलकर हँसा नहीं
न जाने कब से
कौन चुरा ले गया
मेरी हँसी के खजाने!

  • हिमाचल जैव सम्पदा प्रौद्योगिकी संस्थान, पालमपुर-176061(हि.प्र.)

शिवानन्द सिंह सहयोगी






चलता बना

समय जिस पर था भरोसा छोड़कर चलता बना
धुंध की मनहूस चादर ओढ़कर चलता बना

तिमिरमय उस रात में जो चाँद कुछ खिलता दिखा
चाल में अनहोनियों की पेड़ सा गिरता दिखा
पुस्त के जिस पृष्ठ को पढ़ता रहा मैं रात भर
सुबह का आया उजाला मोड़कर चलता बना
समय जिस पर ................................

जिस परस को नींद की लोरी सुनाता था कभी
झूलनों के प्यार की डोरी झुलाता था कभी
आड़ में निगरानियों के दर्द की गोली खिला
आवरण वह आँसुओं का चीरकर चलता बना
समय जिस पर ................................

परिकलन परिकल्पना के बंद ढीले हो गये
हृदय के अनुनाद के हर छंद गीले हो गये
भाव हर अनुबंध का अनुलंब सा लगने लगा
तोड़कर संबंध अनुक्रम जोड़कर चलता बना
समय जिस पर ................................

  • ‘शिवाभा’ ए-233, गंगानगर, मवाना मार्ग, मेरठ-250001(उ0प्र0)

त्रिलोक सिंह ठकुरेला



गांव तरसते हैं

सुविधाओं के लिए अभी भी गांव तरसते हैं।

सब कहते इस लोकतन्त्र में
शासन तेरा है,
फिर भी होरी की कुटिया में
घना अंधेरा है,
अभी उजाले महाजनों के घर में बसते हैं।

अभी व्यवस्था
दुःशासन को पाले पोसे है,
अभी द्रौपदी की लज्जा
रेखांकन : डॉ.सुरेन्द्र वर्मा
भगवान - भरोसे है,
अपमानों के दंश अभी सीता को डसते हैं।

फसल मुनाफाखोर खा गये
केवल कर्ज बचा,
श्रम में घुलती गयी जिन्दगी
बढ़ता मर्ज बचा,
कृषक सुद के इन्द्रजाल में अब भी फॅंसते हैं।

रोजी - रोटी की खातिर
वह अब तक आकुल है,
युवा बहिन का मन
घर की हालत से व्याकुल है,
वृद्व पिता माता के रह रह नेत्र बरसते हैं।

  • बंगला संख्या-एल-99,रेलवे चिकित्सालय के सामने, आबू रोड-307026 राज.

सत्येन्द्र तिवारी




शब्द तूती बज रही है

तपन से समय की झुलसा,
मन का पखेरू उड़ रहा
टीसता है दर्द रह-रह
वही हिम्मत बांधता है।

हम न उलझे जगमगाते,
लुटेरों के जाल में
नहीं दौड़े, दौड़ अंधी,
कभी भी नव चाल में
    अनथके अवरोध सारे,
    पंथ दुर्गम लांघता है।

शोर में भी नगाड़ों के
द्रश्य छाया चित्र  : पूनम गुप्ता 
शब्द-तूती बज रही
बस संसदी अखाड़ों में
नूरा कुश्ती चल रही
    न्याय की बंदर तुला पर,
    बराबर हक मांगता है।

शहर जंगल गांव पर्वत,
नदी भरती सिसकियां
भंवर में आती नजर हैं
जिन्दगी की कश्तियां
    पतवार को मन भावना की,
    शब्द-कीलें ठोंकता है।

  • 20/71, गुप्ता बिल्डिंग, रामनारायण बाजार, कानपुर-208001, उ.प्र,

नित्यानंद ‘तुषार’






ग़ज़ल
                
ये तो सोचो सवाल कैसा है
देश का आज, हाल कैसा है
                
जिससे मज़हब निकल नहीं पाते
साज़िशों का वो जाल कैसा है 
                
आए दिन हादसे ही होते हैं
सोचता हूँ ये साल कैसा है
                
जान लेता है बे-गुनाहों की
आपका ये कमाल कैसा है
                
आपने आग को हवा दी थी
जल गए तो मलाल कैसा है
                
दुश्मनी से ‘तुषार’ क्या हासिल
दोस्ती का ख़याल कैसा है
                
  • आर-64, सेक्टर-12, प्रताप विहार, गाजियाबाद-201009 (उ.प्र.)



सनातन कुमार बाजपेयी






चलो चलें अविराम

साथियो चलो चलें अविराम।
दर्द मिटाना है दुनियाँ के, नहीं क्षणिक विश्राम।।
साथियो...

दुश्मन मिलें मसल दें उनको।
कांटे मिलें कुचल दें उनको।
अब प्रमाद को त्यागें प्रियवर, करना जग में नाम।।
साथियो...

अटल हिमालय से बन जायें।
अगम सिन्धु से नित लहरायें।
सुरसरि सी पावनता लेकर, बनें त्रिवेणी धाम।।
साथियो...

रामचन्द्र आदर्श हमारे।
कृष्णचन्द्र जन-जन के प्यारे।
न्याय धर्म की रक्षा करने, करें सतत हम काम।।
साथियो...

सत्य, अहिंसा व्रत अपनायें।
घर-घर इनकी अलख जगायें।
द्रश्य छाया चित्र  : पूनम गुप्ता 
आतंकी घन गरज रहे जो, कर दें काम तमाम।।
साथियो...

पग-पग काले नाग विषैले।
भरते हैं केवल निज थैले।
पथ से इन्हें हटायें मिलकर, दें नूतन आयाम।।
साथियो...

बने विश्व सुन्दर नन्दन वन।
लहें शान्ति-सुख सारे जन-जन।
खुशियों के सागर लहरायें, प्रमुदित आठों याम।।
साथियो...

  •  पुराना कछपुरा स्कूल, गढ़ा, जबलपुर-482003 (म.प्र.)  



4 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस पत्रिका की जितनी प्रशंसा की जाये कम है …………सभी कवियो की रचनाये अति उत्तम और अनमोल हैं । हर रचना एक संदेश दे रहीहै………… और सबसे ज्यादा मुझे ये पसन्द आया कि आपने सभी कवियो की रचनाये एक ही पेज पर लगा दीं ताकि हम जैसे पाठक आसानी से आत्मसात कर सकें……………आपको इस पत्रिका की सफ़लता के लिये हार्दिक बधाई और शुभकामनाये और सभी कवियो को हार्दिक आभार्।

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  2. आपकी पोस्ट आज के चर्चा मंच पर प्रस्तुत की गई है
    कृपया पधारें
    चर्चा मंच-708:चर्चाकार-दिलबाग विर्क

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  3. यहाँ तो अद्भुत संग्रह है उम्दा रचनाओं का....
    आनंद आ गया...
    सादर आभार...

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