आपका परिचय

रविवार, 30 सितंबर 2018

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  08,   अंक  :  01-02,   सितम्बर-अक्टूबर 2018 


।।कविता अनवरत।।


मनीषा सक्सेना 





वो आ गए
      बड़े बाबा के जिगरी दोस्त, छोटे चाचा यूँ तो हमारे परिवार की रिश्तेदारी में कुछ नहीं लगते पर रिश्तेदारों से बढ़कर करते हैं। घर पर कोई मौका हो, गम का या खुशी का, पिछले चालीस सालों से, वे सदैव उपस्थित रहते हैं। घर के किसी भी सदस्य का जन्मदिन हो या शादी की सालगिरह, छोटे चाचा गुलाबजामन की हंडिया लेकर आते। ढेरों आशीष तो देते ही, शेरोशायरी सुनाकर माहौल को खुशगवार बना देते। हम सब भाई-बहिन हँसते हुए आपस में कहते- “वो आये नहीं?” या “वो आ गए हैं” “वो आ रहे हैं”।
      आजकल के बच्चों व बहुओं को ये बात नागवार गुज़रती है, बिन बुलाए मेहमान, खातिर करो सो अलग, होटल में जन्मदिन मनाना हो तो जा नहीं सकते क्योंकि शाम को “वो आयेंगे”। घुमा-फिरा कर बच्चे भी उनसे कहने लगे “आजकल तो व्हाट्सेप, फोन, ईमेल की इतनी सुविधा हो गयी है। आप इतनी गर्मी में बाहर मत निकला करिए, आपकी तरफ से चिंता रहती है और आप भी धूप में परेशान होते हैं। 
      “अरे नहीं बरखुरदार, जब तक आपस में मिल-बैठकर बातचीत न कर लें, तब तक मन नहीं भरता है और तुम लोगों को देखे बिना चैन भी नहीं पड़ता है। ईमेल, व्हाट्सेप वगैरह तो बेकार की चीज़ है। हाँ दूरदराज़ में रहने वाले लोगों से वार्तालाप के लिये तो ठीक है पर इससे आत्मीय सम्बन्ध नहीं बन पाते हैं। फिर धीरे से बोले, “अच्छा अब मैं चलता हूँ।”
      अगले दिन बिट्टू का जन्मदिन, सुबह-सुबह व्हाट्सेप पर गुलाबजामुन की हंडिया के चित्र के साथ छोटे चाचा का बधाई सन्देश आया। घर में दिनभर चुप्पी का दमघोंटू माहौल रहा। सबकी निगाहें दरवाज़े पर टिकी थीं, शायद अब “वो आ गए”।


  • जी-17, बेल्वेडीयर प्रेस कम्पाउंड, मोतीलाल नेहरु रोड, इलाहाबाद-211002, उ.प्र.  

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