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रविवार, 30 सितंबर 2018

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  08,   अंक  :  01-02,   सितम्बर-अक्टूबर 2018 


।।कथा कहानी।।


लक्ष्मी रानी लाल





आत्मसमर्पण

          शाम से ही अंधेरा गहराने लगा। वसुंधरा ने चारों ओर व्याप्त उदासी पर एक दृष्टि डालकर एप्रन उतारा। वसुंधरा ने कुर्सी पर बैठकर अपनी आंखें बंद कर लीं।
      ‘‘दीदी, चाय।’’ रूचि ने अपनी वसुंधरा दीदी को चाय देते हुए कहा।
      ‘‘मुझे आज फिर देर हो गई न। क्या करूँ मरीजों की संख्या भी तो कभी कम नहीं होती कि समय पर घर लौट सकूँ।’’ वसुंधरा ने चाय पीते हुए कहा। तभी एक करूण पुकार गूँज उठी- ...पु ..पुल ...पु ..पुल... दोनों बहनों की आँखें उस पुकार को सुनकर नम हो उठीं क्योंकि वे जानती हैं कि यह पुकार चट्टानों से टकराकर लौट आएगी। उन्हें पुरुषों की सहनशीलता पर आश्चर्य होता था। तभी तो उनके पिताजी की आँखें आसपास के जीवन से बेलाग शून्य में प्रतिफल कुछ ढूँढती रहती थीं। उसे अपनी नन्हीं बहन रिमझिम के प्रश्नों की बौछार से डर लगता था क्योंकि उसके पास कोई जवाब नहीं था।
      तभी नन्हीं सी रिमझिम ने आकर रोज की तरह पूछ ही दिया- ‘‘दीदी भैया कब आएँगे? कितने दिन हो गए अभी तक गुड़िया लेकर नहीं आए? आज आएँगे न? रोज की इस प्रतीक्षा से वह ऊब चुकी थी। अचानक बाहर के बरामदे में कुछ गिरने की आवाज आई। दोनों बहनें लपककर बरामदे में निकल आईं। एक नवयुवक बरामदे में मूचर््िछतावस्था में पड़ा था। 
      ‘‘रूचि, जरा एक तरफ से सहारा दो, बेचारा बेहोश हो गया है।’’
      ‘‘ओह दीदी, छोड़ भी दो। किसी अनजान पर भरोसा करना ठीक नहीं, ऐसा न हो कि लेने के देने पड़ जाएँ।’’ 
      ‘‘यह कौन है, तथा कैसा है, यह तो बाद की बात है पर अभी यह बेहोश है और मैं एक डॉक्टर हूँ। इस इतना ही मैं जानती हूँ।’’
      दोनों बहनें नवयुवक को सहारा देकर अंदर लाईं। वसुंधरा उनकी नब्ज देख रही थी तभी उसे होश आ गया। अचानक वह लड़खड़ाते हुए उठ खड़ा हुआ और जाने के लिए द्वार तक बढ़ा ही था कि वसुंधरा ने उसके हाथ दृढ़तापूर्वक थामकर रोक लिया।
      ‘‘कहाँ जा रहे हो, अभी चुपचाप लेटो।’’
      ‘‘मुझे जाने दें, मैं अब ठीक हो गया हूँ।’’
      ‘‘अभी तुम जा नहीं सकते, स्वस्थ्य होने के बाद ही तुम्हें इजाजत मिलेगी। अभी जो दवा दे रही हूँ, उसे खा लो।’’
नवयुवक की भृकुटि तन गई- ‘‘आप मुझे पहचानती तक नहीं, फिर जाने क्यों नहीं देगीं?’’ 
      ‘‘मैं तुम्हें पहचानती हूँ।’’ 
      ‘‘जी?’’ इस बार नवयुवक बुरी तरह से चौंका। ’‘आप मुझे पहचानती हैं?’’ 
      ‘‘हाँ, तुम इस समय एक मरीज हो तथा मैं एक डॉक्टर हूँ। इसलिए तुम्हें मेरी बात माननी चाहिए।’’
      नवयुवक ने निश्ंिचतता भरी साँस ली। वह विवशता से एक आज्ञाकारी बच्चे की भाँति पुनः लेट गया। वसुंधरा ने उसे दवा पिलाई तथा वहीं बैठकर एक पत्रिका पढ़ने लगी। पत्रिका से नजर उठाकर एक बार उसने नवयुवक की ओर देखा तभी उसकी नज़्ार नवयुवक की जेब से झाँकती हुई पिस्तौल पर पड़ी। नवयुवक के निश्छल चेहरे को देख वसुंधरा को यह सोचकर बहुत अफसोस हुआ कि ऐसे भोले एवं निष्पाक किशोरों को ही आज गुमराह किया जा रहा है। अभी इसके कुछ बनने का समय था। इसके अभिभावक अपने लाडले को डॉक्टर, इंजीनियर या कुशल प्रशासक बनाने का स्वप्न देख रहे होंगे। उनके सामने अपने बेटे का सुनहरा भविष्य होगा पर उन गुमराहों के सामने भविष्य एक प्रश्नचिन्ह बनकर खड़ा है। इसके भविष्य पर रात की कालिमा छा गई है। पता नहीं इनके जीवन में कब सवेरा होगा। 
      नवयुवक के कराहने की आवाज सुनकर वसुंधरा ने उठकर उसके सिर पर हाथ रखा। नवयुवक को काफी तेज बुखार था। 
वसुंधरा ने उसे तुरत दवा खिलाई।
      ‘‘दीदी, अब खाने भी चलोगी या इस अजनबी की सेवा ही करती रहोगी।’’ रूचि ने तंग आकर कहा। 
      ‘‘तुम चलो, मैं तुरत आ रही हूँ।’’ वसुंधरा ने उठते हुए कहा।
      खाकर लौटने पर वसुंधरा ने उसे जगा पाया।
      ‘‘तबीयत कैसी है?’’
      ‘‘जी, अब पहले से अच्छी है।’’
      ‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’
      ‘‘जी? ...जी... इंद्रजीत।’’
      नवयुवक के चेहरे पर परेशानी के भाव देख, वसुंधरा ने फिर कुछ और नहीं पूछा।
      ‘... पुपुल ... पु.. पु...ल....।’’
      वृद्धा की करूण पुकार वातावरण में गूँज उठी। किसी प्रत्युत्तर को न सुन इंद्रजीत से रहा नहीं गया।
      ‘‘पुपुल कौन है दीदी?’’
      ‘‘दीदी’’ शब्द को सुनते ही वसुंधरा के सीने में एक हाहाकार हलकोरे लेने गया। उफनते रुदन के आवेग को दबाकर उसने जवाब दिया- ‘‘मेरा छोटा भाई।’’
      क्षणभर में ही बांध तोड़कर उफनती अश्रुधारा को छिपाने के लिए वसुंधरा कमरे से बाहर चली गई। वसुंधरा की आँखों के आगे पुपुल का मासूम चेहरा बार-बार आने लगा। हलके स्पर्श का दबाव पाकर दुखता नासूर अब पुनः रिसने लगा। भाई बहनों के स्नेहसूत्र ने एक दूसरे को बाँध रखा था। पुपुल ने मेधावी तथा प्रतिभाशाली होने के कारण अपने घर को पुरस्कारों से भर दिया था। माता-पिता का आज्ञाकारी होने के साथ ही वह शिक्षकों का लाडला भी था। अवकाश प्राप्ति के बाद भी पुपुल को आगे पढ़ाने के लिए जहाँ पिताजी ने काम किया, वहीं माँ ने घर के खर्चों में कटौती करके गृहस्थी की गाड़ी को संभाले रखा। 
      माँ एक स्वनिर्मित तथा इंद्रजीत नारी थी, अपने आप में सिमटी हुई। आर्थिक अभाव में भी माता-पिता ने किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया। एक ही आशा थी कि पुपुल शिक्षा की समाप्ति के बाद परिवार को आर्थिक संकट से उबार लेगा।
      वसुंधरा की सिसकियाँ अब उसके नियंत्रण में नहीं रह सकीं। माँ-पिताजी तथा नन्हीं सिमझिम की वजह से दोनों बहनें कभी रो भी नहीं पाती थीं। सिसिकियों की आवाज सुनकर इंद्रजीत बरामदे में आया। वृद्धा की करूण आवाज का पीछा करता हुआ पहले वह बगल के कमरे में गया। एक वृद्ध कुर्सी पर बैठे हुए शून्य में निहार रहे थे तथा वृद्धा खाट पर लेटी रह-रहकर पुपुल-पुपुल पुकार उठती थी। इंद्रजीत व्याकुल हो उठा। 
      कमरे से बाहर निकला तो वसुंधरा सामने खड़ी थी। उसे व्याकुल देखकर वसुंधरा ने कहा- ‘‘औरतें अपनी माँग का दर्द किसी तरह से रो-धोकर झेल लेती हैं, पर कोख का दर्द नहीं झेल पातीं। उसकी कोख में एक ऐसी आग लग जाती है जिसकी पीड़ा से वह आजीवन मुक्त नहीं हो पाती।’’
      ‘‘दीदी, पुपुल कहाँ चला गया?’’
      ‘‘पुपुल गया नहीं। वह तो कभी हम लोगों से दूर होने की कल्पना भी नहीं कर सकता था? उसे तो किसी निर्दयी ने हम सबों से छीन लिया। मेरा पुपुल तो शहजादा था, अकेला नहीं गया पूरे लाव-लश्कर के साथ गया है।’’
      ‘‘दीदी, उस निर्दय का नाम बताओ, मैं उससे निपट लूँगा। इस हरे-भरे परिवार को उजाड़, उसे क्या मिला?’’
      ‘‘इतनी समझ उसे रहती तो वह यह रास्ता ही क्यों अपनाता। उसने इतने परिवार एक साथ उजाड़ डाले कि आँसुओं के समुद्र में वह डूब जाएगा। वसुंधरा बातें कहती हुई इंद्रजीत को पुपुल के कमरे में ले आई। पुपुल के कमरे में उसकी सारी चीजें यथावत रखी थीं। दीवार पर टँगी हुई तस्वीर को देख इंद्रजीत के दिमाग में जैसे एक धमाका हुआ। उसकी आँखों के आगे अमावस का अँधेरा छा गया और वह लड़खड़ा कर गिर पड़ा। 
      ‘‘ओह तुम अभी अस्वस्थ हो, तुम्हें बाहर नहीं निकलना चाहिए था, लगा ली न चोट।’’ वसुंधरा ने उसे सहारा देकर कमरे में लाकर लिटा दिया।
      ‘‘अब तुम आराम ले लेटो, मैं तुम्हारे लिए गर्म दूध लेकर आती हूँ।’’
      वसुंधरा के जाते ही इंद्रजीत उठकर बैठ गया। घबराहट से कंठ सूखने लगा तो उठकर पानी पी लिया। वह कभी पागलों की भाँति अपने बालों को दोनों हाथों से पकड़कर खींचने लगता तो कभी असहाय सा चारों ओर देखता। उसे ऐसा महसूस होने लगा मानों वह आँसुओं के समंदर में गोते खा रहा हो। किनारे आने के लिए लाख हाथ-पाँव पटकता पर लहरें पुनः थपेड़े देकर उसे पटक देतीं। उसका दम घुटने लगा। जिस तस्वीर को उसने देखा है उसे वह कैसे भूल सकता है? दो वर्ष पूर्व ही तो उसे बस में सफर करते देख चुका है।
बस के यात्रियों को पुपुल ने अपने सरल स्वभाव के कारण मित्र बना लिया था। उसके लतीफों का सभी बेहद आनंद उठा रहे थे। पुपुल ने अपने हाथ में एक प्यारी सी गुड़िया थाम रखी थी। इंद्रजीत तथा उसके साथियों ने अपनी बंदूकों से सारे लतीफे हवा में उड़ा दिये थे। पूरी बस खून से रंग गई थी। 
      इंद्रजीत के मस्तिष्क की शिराऐं फटने लगीं। वह एक परिवार का दर्द सहन नहीं कर पा रहा था और ऐसे कितने परिवार उसने अपने इस रक्तरंजित हाथ से मिटा डाले थे। उसने जोर लगाकर फिर अपने बालों को खींचा ही था कि वसुंधरा दूध का गिलास हाथ में लिए आ पहुँची।
      ‘‘क्या हुआ, सिर बहुत दर्द कर रहा है। तुम दूध पी लो मैं तुम्हारे सिर की मालिश कर देती हूँ। मैं तेल लेकर आ रही हूँ।’’
      वसुंधरा कमरे से बाहर निकली। रूचि की जलती हुई आँखों का उसे सामना करना पड़ा। ‘‘क्यों दीदी, तुम्हारा वह मरीज कैसा है? मरीज को दूध देते या सिर की मालिश करते किसी डॉक्टर को नहीं देखा था। दीदी, वह साँप है, दूध पीते डस लेगा। उसकी जेब में पिस्तौल देखी है न। तुम्हें तो अब तक पुलिस को सूचना दे देनी चाहिए थी।’’
      ‘‘ऐसे मुजरिमों को पुलिस की आवश्यकता नहीं होती, इन्हें प्यार से ही रास्ते पर लाया जा सकता है। इन्हें सही दिशा-निर्देश की आवश्यकता है। इन्हें गुमराह होने से बचाना आवश्यक है। आखिर क्यों ये भटक गए हैं? किसके हाथों की कठपुतली आज के नवयुवक हो गए हैं, इस बात की गहराई तक जाना चाहिए। रहा सवाल सिर की मालिश या दूध पिलाने का, तो सुनो, अभी वह एक मरीज है तथा हम लोगों का मेहमान भी।’’ वसुंधरा ने अपने तर्कसंगत उत्तर से रूचि को शांत किया।
      ‘‘ठीक है दीदी, लाओ तेल मैं सिर की मालिश कर देती हूँ। अब तुम जाकर आराम करो।’’
      रूचि तेल लेकर कमरे में पहुँची तो इंद्रजीत आँखें बंद किए पड़ा था। सिर पर स्पर्श पाकर इंद्रजीत ने उसके हाथ को पकड़ लिया।
      ‘‘दीदी... छोड़ दो। मुझे यूँ ही नींद आ जाएगी।’’
      ‘‘मैं दीदी नहीं, रूचि हूँ।’’
      ’‘ओह तुम हो। तुम जाकर सो जाओ।’’
      ‘‘मैं सिर दबा रही हूँ, गला नहीं। आप तो बहुत वीर नजर आ रहे थे पर हाथ रखते डर गये?’’
      ‘‘मैं डरता नहीं हूँ।’‘
      ‘‘बाइ द वे, ये जो जेब के अंदर से खिलौना झाँक रहा है, उसे अपनी सुरक्षा के लिए रखा है या...’’
      इंद्रजीत परेशान हो उठा था। उसने सोने की चेष्टा करते हुए रूचि को जाने के लिए आग्रह किया। 
      ‘‘ओ. के., मैं जा रही हूँ।’’
      ‘‘काश! मैं कुछ वर्ष पूर्व इस घर का मेहमान बना होता।’’ मर्माहत इन्द्रजीत लेटे-लेटे बड़बड़ाया। ‘‘...तब डॉक्टर दीदी के संपर्क में आकर मैं भी मनुष्य बन जाता।‘‘ रूचि ने जाते-जाते सुना तो ठहर गई। 
      ‘‘कुछ वर्ष पूर्व आए होते तो मेरे पुपुल भैया से मिलते, जिन्हें किसी निर्दयी ने हमसे छीनकर जीवन-भर हमें बिलखने को छोड़ दिया। उन्होंने कभी किसी का कुछ बिगाड़ा नहीं था।’’
      रूचि की सिसकियों से घबड़ाकर इंद्रजीत उठकर खड़ा हो गया। रूचि के सिर पर स्नेहिल स्पर्श रखते हुए बोला- ‘‘मैं तुम्हारे भाई की जगह लेने लायक तो हूँ नहीं, पर थोड़ी देर के लिए सही इस अनजान भाई का आदेश समझकर सोने चली जाओ।’’ रुचि सिसकियों को रोकती हुई कमरे से निकल गई।
      वसुंधरा सुबह चाय का प्याला लेकर इंद्रजीत को उठाने गई। उसने कमरे के बाहर से ही आवाज लगाई- ‘‘इन्द्रजीत उठो, सवेरा हो गया।’’
      जबाव न पाकर उसने किवाड़ को धीरे से धक्का दिया तो वह स्वयं ही खुल गया। अंदर इंद्रजीत को न पाकर वह सब ओर आश्चर्य से देख रही थी कि हाथ में अखबार लिए रूचि दौड़ती हुई आई। हाँफते हुए उसने अखबार अपनी दीदी के सामने रख दिया। मोटे-मोटे अक्षरों में मुखपृष्ठ पर ही छपा था- ‘‘कुख्यात आतंकवादी इंद्रजीत सिंह ने आत्मसमर्पण कर दिया।’’

  • 24, एम.आई.जी., आदित्यपुर-2, जमशेदपुर-831013, झारखंड/मो. 09334826858

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