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रविवार, 30 सितंबर 2018

अविराम विस्तारित

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  08,   अंक  :  01-02,   सितम्बर-अक्टूबर 2018 


।।कविता अनवरत।।


सूर्य कुमार पाण्डेय




दो गीत

01. एक डगर पर

एक डगर पर हम चलते हैं
एक डगर भीतर चलती है

जितना इस जीवन को जाना
उतना लगा नया अनजाना
पाया सब, संतुष्ट हुआ कब
जो न मिला, उसका भ्रम माना

कहीं अकर्म रहा जीवन में
नहीं नियति की यह गलती है

जब-जब अंधकार ने घेरा
मिलने आया नया सवेरा
जब भी लगा डूबने, उसने
खींचा हाथ पकड़कर मेरा

बाहर तिमिर घनेरा घिरता तब
भीतर ज्योति-शिखा जलती है

कैसा पछताना, क्या रोना
प्रतिपल अनहोनी का होना
जितना भरा, न भीतर देखा
रिक्त मिला मन का हर कोना

संग्रह की परिणति यह पाई 
इच्छा सदा हाथ मलती है।

02. यह नहीं जरूरी

हर चाँद अमावस लीलेगी
हर सूरज को ढलना होगा
हर आँख में जुगुनू चमकेंगे
हर दीपक को जलना होगा

आँधियाँ चलेंगी उपवन में
तब कुछ डालें भी टूटेंगी
जब बीज पड़ेंगे धरती में 
कोपलें नई तब फूटेंगी

यह नहीं जरूरी नदिया की
हर लहर किनारा पा जाए
रेखाचित्र : कमलेश चौरसिया 
जितनी गिनती की साँसें हैं
उन साँसों को चलना होगा

जब आँसू दिल से उमड़ेंगे
आँखें दुःख की भर आएँगी
जब आँच प्रेम की दहकेगी
सरिता सागर को जाएगी

यह नहीं जरूरी मिलना हो
इसलिए गले से लग जाना
नफरत की बर्फ जमी है जो
उसको तिल-तिल गलना होगा

यह नहीं जरूरी मेले से
तुम बिना ठगे घर आ जाओ
छलते आए हो औरों को
अब खुद को भी छलना होगा

  • 538 क/514, त्रिवेणीनगर द्वितीय, लखनऊ-226020, उ.प्र./मो. 09452756000

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