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रविवार, 30 सितंबर 2018

श्रीकृष्ण 'सरल' जन्म-शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में विशेष सामग्री

अविराम  ब्लॉग संकलन,  वर्ष  :  08,   अंक  :  01-02,   सितम्बर-अक्टूबर 2018




श्रीकृष्ण सरल जी 
श्रीकृष्ण 'सरल' स्मरण 

महान साहित्य मनीषी और तपस्वी महाकवि श्रीकृष्ण ‘सरल’जी के जीवन और कर्मगाथा से जुड़े कुछ प्रसंग हमने पिछले कुछ अंकों में  प्रस्तुत किये थे।  इस कड़ी में प्रस्तुत है-  श्री अशोक वक्त जी का आलेख ‘सरल महाकाव्यों में शहीद माताओं का पुण्य स्मरण’। आशा है नई पीढ़ी तक उनकी स्मृतियों की सुगन्ध का एक झोंका अवश्य ही पहुँचाने में हम सफल होंगे। -संतोष सुपेकर, अविराम साहित्यिकी के श्रीकृष्ण ‘सरल’ स्मरण विशेषांक के विशेष संपादक}




अशोक वक्त



सरल महाकाव्यों में शहीद माताओं का पुण्य स्मरण


      अपने साहित्य में सरलजी ने नारी की आदर्श छवि प्रस्तुत की है। उनकी महाकाव्य यात्रा का आरम्भ ही एक महान नारी के स्तवन से हुआ था, जिसने क्रान्तिनायक भगतसिंह को जन्म दिया था। सिंह जननी विद्यावती देवी का महान चरित भगतसिंह महाकाव्य में रेखांकित हुआ है। नारी की महिमा का चित्रण सरलजी ने अनेक स्थानों पर किया है। मादाम कामा पर उन्होंने अपना आठवाँ महाकाव्य लिखा और वह भी 70 वर्ष की अवस्था में। फिर जीवन की सांझ में उन्होंने रामायण की सीता पर एक और महाकाव्य लिखा- ‘सरल सीतायन’। नारी चरित्र को केन्द्र में रखकर लिखे गए इन दो महाकाव्यों के अलावा अपने अन्य महाकाव्यों में भी जहाँ कहीं अवसर मिला, उन्होंने नारी चेतना को रेखांकित किया है। उन्होंने अपने लेखन के लिए जो राष्ट्रीयता का परिवेश चुना था, उसमें समकालीन सामाजिक स्थितियों में महिलाओं की समस्याओं और संक्रमण का चित्रण करने का अवकाश उनके पास नहीं था, अतः प्रासंगिक रूप से ही, जहाँ कहीं उनके काव्यनायकों की यशश्वी गाथाओं में नारी की महत्वपूर्ण भूमिका का सन्दर्भ आया है, सरलजी ने उसे विशेष रूप से उभारने के प्रयास किए हैं।
      अपने प्रथम महाकाव्य ‘सरदार भगतसिंह’ की रचना के आरम्भ से ही वे मातृशक्ति से अभिभूत रहे। महाकाव्य लिखने से पहले वह सिंह-जननी से मिले थे और महाकाव्य पूर्ण होने पर उनके द्वारा ही लोकार्पण सम्पन्न करवाया था। महाकाव्य का आरम्भ भी भगतसिंह से नहीं, अपितु विद्यावती देवी से ही हुआ है और ‘सिंह जननी’ शीर्षक से शहीद माता से भेंटवार्ता का मार्मिक चित्र कवि ने प्रस्तुत किया है, जिसमें वीरपुत्र की वीर माँ की प्रेरक छवि से साक्षात्कार होता है। फिर ‘बुढ़िया पुराण’ शीर्षक से नारी-मनोविज्ञान और वात्सल्य का वर्णन हुआ है। दूसरे सर्ग में माँ के साथ ही चाची की गोद में भगतसिंह को राष्ट्रीयता के जो संस्कार मिले, उसका मार्मिक वर्णन है। भगतसिंह के बचपन में, घर में दो चाची अपने रणबाँकुरे पतियों की वियोगिनी बनी स्वतंत्रता संग्राम के लिए नई पौध को संस्कारित कर रही थीं, जिनके प्रेरक चित्र सरलजी ने ‘गृहणी या तपस्विनी’ शीर्षक चौथे सर्ग में प्रस्तुत किए हैं। ‘मक्खन की टिकिया या बम का गोला’ में भी क्रान्तिनायक के दुलार में माँ और चाची के महनीय चरित्र प्रकाशित हुए हैं। वास्तव में भगतसिंह महाकाव्य के आरम्भिक सर्ग वीर नारियों की आदर्श छवि का अंकन करते हैं, जिनके स्नेह-संस्कार की छाया में सिंह शावक के मन में आजादी की चिंगारी सुलगी थी। अठारहवें सर्ग में युवा भगतसिंह के ‘अन्तर्द्वन्द्व’ में नारी और परिणय का निषेध कर आजादी के लिए लड़ने के संकल्प की विजय का चित्रण है। क्रान्तिनायकों के जीवन में पत्नी, प्रेयसी आदि के रूप के लिए सरल साहित्य में अधिक अवकाश नहीं था। क्रान्तिकारियों द्वारा अपने निजी जीवन में नारी का यह निषेध परिस्थितिजन्य था और इसी रूप में सरलजी ने उसका चित्रण किया है। स्वतंत्रता समर के जिन वीरों के विवाह हो गए थे, उनकी जीवनसंगिनियों ने जो त्याग-तपस्या की है, उस मूक कहानी का एक मार्मिक चित्र ‘शहीद भगतसिंह’ महाकाव्य में अमर शहीद भाई बालमुकुन्द की पत्नी सती रामरखी के रूप में कवि ने प्रस्तुत किया है। भाईजी कारावास में थे और नई ब्याहता पत्नी रामरखी बस राम के आसरे पर ही बाहर थीं, सरलजी ने कहा है- ‘‘जब ग्रहण लगे ग्रहपति को तो फिर खिली-खिली धूप कहाँ/दर्पण ही अंधा हो जाए तो फिर मुख देखे रूप कहाँ/इसलिए खिन्न है रामरखी सचमुच ही इस युग की सीता/पति काराग्रह में घुटा करे, गृह में क्या सुख ले परिणीता।’’ 
      जब रामरखी को अपने पति को फाँसी दिए जाने का सन्देश मिला तो उसने वीरांगना का बाना पहन लिया और कलेजे पर पत्थर रखकर कहा कि मैं स्वयं शव लेने आती हूँ। घर से चलने के पहले, आँगन में तुलसी के बिरवे से लिपट गई और भाव-विह्वलता में वहीं प्राण त्याग दिए। रामरखी को सती कहकर सरलजी ने उनके प्राणार्पण का हृदयस्पर्शी चित्रण किया है और भारतीय नारी की महत्ता को उजागर किया है- ‘‘क्यों न हृदय यह स्वीकार करे, नारी गौरव-गरिमा नर की/मन-वचन-कर्म से यह सदेह छाया है उसके अन्तर की/जग के मरुथल में जीवन की नारी ज्वलंत परिभाषा है/ममता की, त्याग-तपस्या की, यह श्रद्धा की परिभाषा है।’’
      रामरखी का पति के बलिदान के साथ प्राणर्पण वास्तव में पतिपरायणा के साथ ही देशभक्ति का भी परिचायक है। रामरखी के इस मूक आत्मार्पण के बाद ‘सरदार भगतसिंह’ महाकाव्य में, स्वतंत्रता समर में प्रत्यक्ष योगदान करने वाली जिस वीरांगना का चित्र प्रस्तुत हुआ है, वे क्रान्तिकारी भगवतीचरण वोरा की जीवनसंगिनी और अन्य क्रान्तिकारियों की दुर्गा भाभी हैं। दुर्गा भाभी ने ही स्वांग बनाकर दिल्ली से कलकत्ता तक पुलिस की आँख में धूल झोंककर भगतसिंह को सुरक्षित पहुँचाया था। भगतसिंह आला अफसर बने थे, गोद में अपने नन्हें पुत्र शचीन्द्र को लिए हुए दुर्गा भाभी ने उनकी पत्नी का रूप धर कर असीम साहस और बलिदानी भावना का परिचय दिया था। जरा-सा भी शक होने पर माँ और बेटे पुलिस की गोली का शिकार बन सकते थे, पर उस दिन तो दुर्गा भाभी, सचमुच दुर्गा बन गई थीं- ‘‘संकल्प मचलते जब नारी उर में ज्वलंत/युग करवट लेता इतिहास बदलते हैं/इसके स्नेहिल उर में ढलते सौ-सौ बसंत/इसके उर में मान के सपने पलते हैं।/नारी दुर्गा का रूप सदा धरती आई/इस धरती पर जब ऐसा अवसर आया है/इस समय स्वयं दुर्गा नारी बनकर निकली/श्री भगतसिंह के सर पर शीतल छाया है।’’
      वे भगतसिंह के लिए मातृतुल्य भाभी थीं, जिन्होंने विपत्ति में प्राण जोखिम में डालकर पत्नी का अभिनय किया था। जब भगतसिंह दिल्ली असेम्बली में बम के धमाके करने निकले थे, तब दुर्गा भाभी से ‘अंतिम विदा’ में माँ के स्वरूप की ही वन्दना यहाँ की गई है। भगतसिंह कहते हैं- ‘‘माँ नहीं यहाँ तुम्हीं माँ हो, दो विदा मुझे/स्नेहिल उर का पावन आशीष लुटाओ तुम।/जो दूध पिया है माँ का, उसकी लाज रखूँ/माँ बनकर भाभी मन में यही मनाओ तुम।’’
      दुर्गा भाभी और सुशीला दीदी की स्नेहिल विदा के बाद लाड़ला क्रान्तिकारी बलिदानी राह पर चला गया। उसके आँखों से ओझल होने तक, करुणा का जो बाँध जैसे-तैसे बँधा था, वह भरभरा कर ढह गया और आँसू की गंगा प्रवाहित हो उठी। इस मार्मिक प्रसंग के अन्त में सरलजी ने नारी-मन की सहज करुणा का हृदयद्रावक चित्रण किया है- ‘‘फिर चरणों की वंदना नमित नयनों से कर/वह चला गया कर्त्तव्य और बलि के पथ पर।/सावन की बोझिल बदली से ये नयन/इधर अब बरस पड़े झर-झर-झर-झर-झर-झर।’’ 
      महाकाव्य के अन्त में, एक बार फिर शहीद जननी का अत्यन्त प्रखर राष्ट्रवादी स्वरूप सरलजी ने साकार कर दिया है। भगतसिंह ने जब स्वयं को फाँसी दिए जाने का सन्देश अपनी माँ को भेजा था, तब चरम करुणा से विलगित क्षणों में विलक्षण साहस और धीरज के साथ विद्यावती देवी ने देशभक्ति की मिसाल पेश की थी। सरलजी के शब्दों में, माँ कहती है- ‘‘देखूँ उसका रूप मुक्ति अरुणोदय की लाली में/मेरा लाल मुझको मिले धरती की खुशहाली में/माँ होकर भी कहती हूँ मैं, लाल भले झूले/आजादी की मंजिल को बलिदान किन्तु यह छू ले।’’
      मातृत्व के उदात्त बलिदानी स्वरूप को भगतसिंह की माँ के रूप में कवि ने जीवन्त कर दिया है। माँ के साथ ही वीरांगना चाचियों के चरित में भी त्याग, तपस्या और करुणा के स्वर उभरते हैं। रामरखी का प्राणार्पण नारी के सहज सतीत्व को आलोकित कर जाता है। दुर्गा भाभी के रूप में स्वयं नारी के स्वतंत्रता-समर में प्रेरक संचरण का प्रेरक चित्र उभरता है। इस तरह महाकाव्य में स्वतंत्रता-समर के युग की नारी के त्याग, करुणा और बलिदानी भावना से परिपूर्ण आदर्श चरित्र का साक्षात्कार होता है। यथार्थ का एक और करुणा कातर पहलू ‘शहीद चन्द्रशेखर आजाद’ महाकाव्य में उभरा है। चन्द्रशेखर बनारस में, पढ़ाई छोड़कर स्वातंत्र्य समर में कूद पड़े थे। तब भाभरा गाँव में, अकेली विधवा माँ ने कैसे दिन काटे होंगे, उसका मार्मिक चित्र कवि ने प्रस्तुत किया है- ‘‘लाड़ले की विविध लीलाएँ उसे जब याद आतीं/कौंध जाती वेदना, कस कर कलेजा थाम लेती/ज्योति आँखों की भटकती थी अँधेरे के वनों में/छोड़ती निश्वास, अपने लाल का वह नाम लेती।’’
      अकेली, असहाय माँ ने, आजादी के लिए लड़ते लाड़ले के वियोग में एक-एक पल जो पथरायापन जिया होगा, उसका मूल्य भला आजादी के इतिहास में कौन आँक सकता है। नारी की करुणाकातर, विवश और दुखियारे रूप की पहली अभिव्यक्ति महाकाव्य में माँ के माध्यम से ही हुई है- ‘‘याचना करती, कुशल उसकी मना, अशरण-शरण प्रभु/लौट आए, लाल मेरा, युक्ति वह उसको सिखाना/मैं अकेली ही बहुत हूँ झेलने दारुण व्यथाएँ/तू किसी माँ को दुर्दिन नहीं ऐसे दिखाना।’’
     ‘‘जय सुभाष’’ महाकाव्य के प्रथम सर्ग में सरलजी ने स्वयं सुभाष की वाणी में मातृ-महिमा की वन्दना करते हुए त्रिभुवन की सब सम्पदा को माँ की ममता के सामने नगण्य बतलाया है- ‘‘वह सर्वाधिक दुर्भाग्यपूर्ण क्षण होगा माँ/जब मुझको अपनी माँ की याद नहीं आए।/माँ के ऋण से ऋणमुक्त स्वयं को समझे जो/उस मानव का जीवन क्यों जीवन कहलाए।/माँ की ममता जिसको अनुप्राणित करे नहीं/वह जीवन, जीवन नहीं, बोझ सचमुच भारी।’’
      बलिदान की वेला में शहीदों से अपनी माँ का स्मरण कराते हुए कवि ने उन संस्कारों को श्रेय दिया है, जो क्रान्तिकारियों ने बचपन में माँ की गोद में प्राप्त किए थे। अशफाक की कुर्बानी के समय यही भावना व्यक्त हुई है- ‘‘जब माँ से रुख्सत चाही, आँखें भर आईं/बोला अम्मी ग़म करें नहीं, मैं जाता हूँ/जो दूध आपका पिया, शान उसकी रखने/जिन्दगी वतन के खातिर भेंट चढ़ाता हूँ/जो नसीहतें आपने मुझे दीं बचपन में/अंजाम उन्हीं सब ही का, यह कुर्बानी है/वायसे-फख्र है सबको मेरी खिदमत/इस वक्त जरा भी गम करना बेमानी है।’’
      कवि की दृष्टि में नारी के जीवन की चरम सार्थकता मातृत्व में ही निहित रहती है। ‘विवेक श्री’ महाकाव्य का आरम्भ कवि की मातृत्व के प्रति श्रद्धा-भावना से ही होता है- ‘‘मातृत्व सार्थकता है नारी जीवन की/कोमल फूलों की जैसे सुरभि हुआ करती/परितृप्ति हुआ करती सुन्दर नयनों की/अन्तर प्रदेश को लेकिन सुरभि छुआ करती/मातृत्व किसी नारी का उसी भाँति होता/भूमिका बीज की जैसे सफल अंकुरण है/जिस तरह प्यास की परिणति तृप्ति हुआ करती/जिस तरह किसी काया में होता जीवन है।’’
      सरलजी ने प्रायः अपने सभी महाकाव्यों के नायकों के जीवन में उनकी माँ के स्नेह और संस्कार के महत्व का चित्रण किया है। माँ की ममता की कोमलता और दृढ़ता को लक्ष्य करते हुए ‘स्वराज्य तिलक’ में कवि ने कहा है- ‘‘नारी उर में ममता-दृढ़ता दोनों पलती/आशंका से भी वह विचलित हो जाती है/यदि दृढ़ता पर उतरे, पर्वत को मात करे/जिसका जैसा हो समय, रूप दिखलाती है/संतान-वत्सला ऐसी होती आई माँ/उनके पथ में वह अपने प्राण विछा देंगी/संतान पक्ष का कोई अहित करे कैसे/वह क्रुद्ध सिंहनी जैसा रूप दिखा देंगी।’’
      ‘स्वराज्य तिलक’ में एक अनाम नारी की मातृछवि ‘अग्निपथ’ शीर्षक से प्रस्तुत की गई है, जिसे कवि के शब्दों में सब ‘माताजी’ के नाम से ही जानते-पुकारते थे और वे कलकत्ता में आदर्श विद्यालय चलाती थीं। माताजी की दुःख भरी कहानी का उल्लेख करते हुए कवि ने बताया है कि महाराष्ट्र की एक विधवा देव-दर्शन के लिए काठमाण्डू गई और नेपाल नरेश से प्रणय-विवाह हो गया। दरबारी षणयंत्र में नेपाल-नरेश की हत्या के बाद माताजी कलकत्ता में आ बसी थीं। माताजी लोकमान्य तिलक को अपना आदर्श मानती थीं और कलकत्ता कांग्रेस के समय तिलक को सशस्त्र क्रान्ति का पथ अपनाने का परामर्श उन्होंने दिया था। इस प्रसंग के बारे में सरलजी ने भूमिका में लिखा है- ‘‘कलकत्ता की माताजी द्वारा नेपाल में बन्दूकों का कारखाना खुलवाने की प्रेरणा श्री तिलक को देना कल्पित बात नहीं है। लोगों के पास उसके प्रमाण हैं।’’ सरलजी ने लिखा है तो अवश्य उन्होंने यह प्रमाण देखे होंगे, पर अगर ऐसे प्रमाणों के समुचित सन्दर्भ भी सरलजी ने प्रस्तुत कर दिए होते तो राष्ट्रनायकों के जीवन विषयक अनुसंधान में बड़ी सहायता मिल सकती थी। अब सरलजी के नहीं रहने पर उन लोगों से भी सम्पर्क नहीं किया जा सकता, जिनके पास प्रमाण होने के उल्लेख कवि ने किए हैं। बहरहाल, इस छोटी-सी घटना को अपने महाकाव्य में शामिल करके कवि ने नारी की महत्ता के वर्णन का एक और अवसर प्राप्त किया है। माताजी ने नेपाल से अपने विश्वस्त लोगों को जापान भेजकर प्रशिक्षण दिलवाने और नेपाल में बन्दूक बनाने का कारखाना खोलने का प्रस्ताव लोकमान्य के समक्ष रखा था। महाकाव्य में माताजी तिलकजी से कहती हैं- ‘‘जो भी व्यय होगा इस समग्र आयोजन में/दायित्व सभी मेरा, वह वहन करूँगी मैं।/पीछे  न हटूँगी, रण में पड़े कूदना यदि/लक्ष्मी बनकर रण में भी जूझ मरूँगी मैं।’’
      शायद माताजी जैसी देशभक्त नारी का स्मरण करते हुए ही कवि ने माण्डले जेल जाने से पूर्व काव्यनायक लोकमान्य तिलक से कहलवाया है- ‘‘नारियाँ यहाँ देवियाँ यहाँ की ललनाएँ/ममता-समता की वे साकार रूप जैसी/स्नेहिल शीतल छाया जैसी होती हैं यदि वे/तो होती हैं वे दाहक तेज धूप जैसी।/अनुराग-आग दोनों उनके उर में पलते/जब जैसा अवसर आता रूप दिखातीं वे/वे कलियों-सी कोमल, लपटों से अधिक उग्र/बलिदानी लिपि में गौरव लेख लिखातीं वे।’’
      स्वातंत्र्य-संग्राम के वीरों के जीवन पर रचित महाकाव्यों में नारी के त्याग और आदर्शमय प्रेरक जीवन के अनेक प्रसंग मौजूद हैं, परन्तु प्रेम और श्रंगार के प्रसंग गिने-चुने हैं, क्योंकि सरलजी के काव्यनायक आजादी के दीवाने, बलिपंथी हैं, जिनके जीवन में प्रियतमा के रूप में नारी की कल्पना का भी निषेध था। जैसाकि महाकाव्य में चन्द्रशेखर आजाद कहते हैं- ‘‘मेरे जीवन में नारी केवल माँ है।’’ अपने बलिदानी संकल्प के रहते क्रांतिनायकों को माया-ममता के सब सम्बन्ध छोड़ने पड़े थे, तब प्रणय और परिणय के बन्धन की प्रायः कल्पना भी नहीं की जा सकती। इसी के अनुरूप, प्रिया रूप में नारी के निषेध का चित्रण ही अधिकांश महाकाव्यों में हुआ है। आजाद अपनी प्रणय निवेदिता से कह देते हैं- ‘‘तपते जीवन को माँ शीतल छाया है/माँ से महानता ने भी बल पाया है/आना है तो अगले जीवन में आना/माँ बन कर मुझको गले लगाना।’’
  • 55, राजस्व कॉलोनी, उज्जैन-456010, म.प्र.

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