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गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013

अविराम विस्तारित

अविराम का ब्लॉग :  वर्ष : 2, अंक : 6,  फरवरी  2013

।।कविता अनवरत।।

सामग्री : इस अंक में रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’, अमरेन्द्र सुमन, जगन्नाथ ‘विश्व’, किशोर श्रीवास्तव, अशोक अंजुम , कृष्ण स्वरूप शर्मा ‘मैथिलेन्द्र’, महावीर उत्तरांचली व दिलीप सिंह ‘दीपक’ की काव्य रचनाएँ।


रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’




दोहे

1.
तुम बिन जीने का नहीं, हो पाया अभ्यास।
तुम्हें  भूलने जो चले, दूने हुए उदास।।
2.
जो दोनों को जोड़ती,  सूख गई जलधार ।
तट सरिता के रो पड़े, अब मिलना दुश्वार’।।
3.
परकतरे  पाखी हुए, सपने सब मजबूर।
जितने पहुँचे पास हम, तुम थे उतनी दूर।।
4.
रेखा चित्र : के. रविन्द्र 
दीवारें तो बहुत हैं, लेकिन कम हैं द्वार।
कैसे पहुँचें पार हम, पहरे लगे हज़ार।।
5.
काले कोसों तुम बसे, मुश्किल है परवाज़।
पंख थके साँसें रुकी, आगे-पीछे बाज।।
6.
दो रोटी की बात थी, खेत लिये हैं लूट।
खटकर  भी भूखे मरे, मिली यही बस छूट।।
7 .
अनाचार नित बढ़ रहे, दिल है क्रूर कठोर।
शोषित बेटी, माँ, बहन, नहीं दीखती भोर।।
8 .
लगन धरा-सी है बड़ी, मन तेरा आकाश।
मिल जाएँगे एक दिन, अगर प्रेम की प्यास।।

  • फ्लैट न-76, (दिल्ली सरकार आवासीय परिसर), रोहिणी सैक्टर-11, नई दिल्ली-110085



अमरेन्द्र सुमन 



अंगुलियों को मुट्ठी में तब्दील करने की जरुरत
                            
कितनी हिफाजत से 
बचपन की दक्ष हाथों को
उसके बूढ़े होने की असमर्थता तक 
ताजा व तंदुरुस्त बनाए रखती हैं
काली चमड़ी के अन्दर की 
साफ-सुथरी सोच वाली आदिवासी युवतियाँ

झिकटी की रगड़ से देह की मैल को 
दूधिया करने की कला से अनभिज्ञ
काली चमड़ी के अन्दर की 
साफ-सुथरी सोच वाली युवतियाँ
जानती हैं गेरुए दीवारों के कलेवर पर उकेरना
वन्दना, करमा के गीतों की थिरकन के बीच
अपने भविष्य की कम महत्वाकांक्षी तस्वीरें

गंभीरता की सींक से  
वे सिलतीं हैं पलास के पत्तों को
अपने दो माहिर हाथों से
अपने जन्म की पुरानी आदतों से लाचार
संतुष्टि की धरातल पर काम करने
जमाने से प्राप्त फरेब व इल्जामों के अवसादों को 

लगातार काम करके भी
रेखा चित्र : बी मोहन नेगी  
न सुस्ताने की क्षमता वाली मानसिकता लिये
                              
वे सहती चली आ रही हैं संयमता के 
न अनुमानित कठोर नियम

गहरी सोच में डूबे अपनी परम्परा के
एकाकीपन को मिटाने
उनके हाथों को हर वक्त मालूम है
बिरादरी के लोगों के बीच उनके उत्सव की
किफायती हंड़िया (पोचई) बाँटने की
असाधारण सी तरकीबें 

स्वार्थ के बीमार अड़गड़े में कैद 
एकलव्य बिरादरी की ये सन्तानें 
दिन-प्रतिदिन बनती जा रहीं
समाज के ठेकेदारों द्वारा
उनके भरण-पोषण की स्थायी नुमाइशें
      
नौः छः के चाणक्य रहस्यों से महफूज 
बिगड़े दिमाग की अल्पकालिक विकसित 
दुनियाँ की मंडियों में आज
रेखा चित्र : शशिभूषण बडोनी 
धड़ल्ले से जारी है इनकी खरीद-बिक्री
इनके शरीर के वजन से भी 
कम गिनती के रुपयों में

एलोरा व अजंता की गुफाओं के 
भित्ति चित्रों की आँखों से 
दुनियाँ देखने को विवश
इन्हें खुद सुलझानी होगी
अपनी विस्तृत समस्याओं की अनसुलझी गुत्थी
जब तक इनमें अपने जीने की 
थोड़ी भी ललक, आकांक्षा बची हो

  • द्वारा : डॉ. अमर कुमार वर्मा, ’’मणि विला,’’ प्राईमरी स्कूल के पीछे, केवटपाड़ा (मोरटंगा रोड) दुमका झारखण्ड। पिनः-814101 



जगन्नाथ ‘विश्व’



हैरान है पूनम

रोशनी गयी कहाँ आश्चर्य चकित हम
लगता है अमावस से हैरान है पूनम

मना रही जश्न लफंगों की टोलियाँ
लजा रही हैं नंगेपन से रंगीन कोठियाँ
खिड़की में लगे परदों को आ रही शरम
लगता है अमावस से हैरान है पूनम
रेखा चित्र : महावीर रंवाल्टा 

बढ़ रही है भीड़ रोज घट रही जमी
चढ़ रही दर कीमतें, है बेहाल आदमी
भीड़ में बम फूटते, बेफिक्र बेरहम
लगता है अमावस से हैरान है पूनम

जुल्मों-सितम से तंग परेशान हैं सभी
सादगी को कितना, दफनायेंगे अभी
हरजाइयों के बीच प्रजा तोड़ रही दम
लगता है अमावस से हैरान है पूनम

  • मनोबल, 25, एम.आई.जी., हनुमान नगर, नागदा जं.-456335 (म.प्र.)



किशोर श्रीवास्तव



नए सपने

अब स्वप्न भी नहीं आते
नीले समुंदर में मछलियों
की तरह
अठखेलियॉं करने को
या
पक्षियों की तरह पंख फैलाकर
दूर गगन में उन्मुक्त
उड़ान भरने को
या
रंग-बिरंगे परिधानों में
सजी परियों के साथ
चाँद पर विचरण करने को

अब स्वप्न आते हैं भी तो बस
दो जून की रोटी के
मुन्ने की फीस
और पत्नी की फटी धोती के
दहेज़ के अभाव में
रेखा चित्र : मनीषा सक्सेना 
अनब्याही मुनिया की ढलती उम्र
स्वप्न में भी जगाए रखती है
पूरी रात
नहीं होती अब स्वप्न में भी
कोई दिल बहलाने वाली बात

बदरंग फाइलों का ढ़ेर
और कड़ी मेहनत के बावजू़द
बॉस की बेवजह गुर्राई आँखें
स्वप्न तक पहुँच जाती हैं
इस प्रकार दिन भर की
थकान
वहाँ भी नहीं उतर पाती है
खेल नहीं पाते हम वहाँ भी
सुख-सुविधाओं की कोई पारी
पीछा नहीं छोड़ती
स्वप्न में भी
भूख, ग़रीबी, बेबसी और लाचारी

  • 916-बाबा फरीदपुरी, पश्चिमी पटेल नगर, नई दिल्ली-110008



अशोक अंजुम 




ग़ज़ल 

क़दम जब डगमगाए रोशनी में
बहुत तुम याद आऐ रोशनी में

तुम्हारी याद की कौंधी यँू बिजली
हम अरसे तक नहाए रोशनी में
छाया चित्र : उमेश महादोषी 

अँधेरों का चलन उनको यूँ भाया
बुलाया, पर न आए रोशनी में

ज़रूरत थी वहाँ कोई न पहुँचा
दिए तुमने जलाए रोशनी में

ख़जाने उनके आगे सब थे मिट्टी
वो सिक्के जो कमाए रोशनी में

वो रातों को बने अपना सहारा
जो नगमे गुनगुनाए रोशनी में

  • गली-2, चन्द्रविहार कॉलोनी, (नगला डालचंद), क्वारसी रोड बाईपास, अलीगढ़-202001(उ.प्र.)



कृष्ण स्वरूप शर्मा ‘मैथिलेन्द्र’

तीन दोहे

1.
काला मुँह कर सत्य का, घुमा रहे बाजार।
झूठ सफेदी ओढ़कर, पीता दूध उधार।।
2 .
मेघ धरा पर बो रहे, अलगावों के बीज।
फसलों से अब मिल रही, सिर्फ खीज ही खीज।।
3 .
दाने खैराती बिछा, चापलूस तैयार।
बिना खौफ वे चर रहे, करते जय-जयकार।।

  • गीतांजलि-भवन, म.आ.ब. 8, शिवाजीनगर, उपनिवेशिका, नर्मदापुरम्-461001 (म.प्र.)



महावीर उत्तरांचली 




{श्री महावीर उत्तरांचली युवा एवं ऊर्जावान कवि-कथाकार हैं। उनका ग़ज़ल संग्रह ‘आग का दरिया’ वर्ष 2009 में प्रकाशित हुआ था। प्रस्तुत हैं उनके इसी संग्रह से उनकी दो प्रतिनिधि ग़ज़लें।}

दो ग़ज़ले

एक

और ग़म दिल को अभी मिलना ही था
चाक-गर्दन, चुप मगर, रहना ही था

कौन आता ज़िन्दगी भर काम यँू
आदमी को एक दिन मरना ही था

याद में जलने लगे फ़ौलाद भी
टूटकर यूँ एक दिन गलना ही था

आग का दरिया बहे दोनों तरफ़
इश्क़ में यूँ डूबके जलना ही था

जानता हूँ मैं तिरी मजबूरियाँ
बेवफ़ा को तो अलग चलना ही था

दो


छाया चित्र : डॉ बलराम अग्रवाल 
ज़िन्दगी ख़ामोश ही कटने लगी
हर खुशी गम की तरह लगने लगी

काट डालेगी मुझे अब देखना
ये हवा तलवार-सी चलने लगी

नातवानी इस कदर छाई है अब
रौशनी भी आँख में चुभने लगी

जब खुशी थी दरमियां सब ठीक था
संग मेरे रात अब जगने लगी

दोस्तो! जीने को जी करता नहीं
ज़िदगी अब मौत-सी लगने लगी 

  • बी-4/79, पर्यटन विहार, बसुन्धरा एंक्लेव, नई दिल्ली-110096


दिलीप सिंह ‘दीपक’




ग़ज़ल

आदमी खूब कसमसाता है
जब बुढ़ापा उसे सताता है

कितनी मासूमियत है चेह्रे पर
शख़्स जो शाह्र को जलाता है
रेखा चित्र : डॉ सुरेन्द्र वर्मा 

बस्तियाँ सौंप दे उसे कैसे
जो सदा खून से नहाता है

खौफ लगता है और भी जियादा
प्यार यमराज जब जताता है

यूं भी बेचैन हैं वे कब्रों में
अपने पुरखों को क्यों जगाता है

बंदगी उसकी हम किया करते
शख़्स जो पीर को मिटाता है

उस बगावत का क्या हुआ दीपक
सर अँधेरे को क्यों नवाता है

  • 1/111, हाउसिंग बोर्ड, सिरोही-307001 (राज.)

2 टिप्‍पणियां:

  1. खूबसुरत रचनाएँ।
    समस्त रचनाकारोँ को बधाई।
    http://yuvaam.blogspot.com

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  2. Sabki rachnayen bahut prbhaavshaali hain...kamboj ji ke dohon ka javaab nahi dil ka dard uker kar rakh diya hi...

    परकतरे पाखी हुए, सपने सब मजबूर।
    जितने पहुँचे पास हम, तुम थे उतनी दूर।।

    bahut gahan abhivykti in dohon men...meri hardik badhai....

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