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गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013

अविराम विस्तारित

अविराम का ब्लॉग : वर्ष : 2,  अंक : 6,  फरवरी  2013 

।।कथा प्रवाह।।

सामग्री  :  इस अंक में  अशोक वर्मा, डॉ. कमल चोपड़ा, कुमार नरेन्द्र, मधुकान्त, मधुदीप, विक्रम सोनी, प्रद्युम्न भल्ला, सन्तोष सुपेकर, डॉ नन्द लाल भारती व दिनेश कुमार छाजेड़ की लघुकथाएं।


{हाल ही में हमें लघुकथा का एक पुराना, चर्चित और महत्वपूर्ण संकलन पढ़ने का अवसर मिला। यह संकलन है दिशा प्रकाशन के निदेशक एवं वरिष्ठ लघुकथाकार श्री मधुदीप जी द्वारा संपादित एवं दिशा प्रकाशन द्वारा वर्ष 1988 में प्रकाशित ‘‘पड़ाव और पड़ताल’’,  जिसकी प्रति उन्होंने इस वर्ष के विश्व पुस्तक मेले में स्नेहवश मुझे भेंट की।  डॉ. कमल किशोर गोयनका जी की व्यापक भूमिका से युक्त इस संकलन में लघुकथा आन्देलन के छः महत्वपूर्ण हस्ताक्षरों सर्वश्री अशोक वर्मा, डॉ. कमल चोपड़ा, कुमार नरेन्द्र, मधुकान्त, मधुदीप एवं श्री विक्रम सोनी की प्रतिनिधि लघुकथाएं तथा इनकी लघुकथाओं का मूल्यांकन करते सर्वश्री (प्रो.) सुरेशचन्द गुप्त, (डॉ.) स्वर्ण किरण, विनय विश्वरस, (प्रो.) रूप देवगुण, भगीरथ, (डॉ.) सतीश दुबे एवं (डॉ.) सुलेखचंद्र शर्मा के आलेख शामिल हैं। इसी संकलन से इस बार हम सभी छः लघुकथकारों की एक-एक लघुकथा प्रस्तुत कर रहे हैं। प्रकाशन के पच्चीस वर्ष बाद भी इन लघुकथाओं में ताजगी का अहसास व्याप्त है, यह तथ्य लघुकथा की शक्ति को प्रदर्शित करता है।}

अशोक वर्मा





धरती घूमती है
     
      
        ‘‘परीक्षाएँ समाप्त हो गयी हैं; इसका मतलब यह तो नहीं कि सारे दिन बाहर ही खेलते रहो। कुछ पढ़ा-लिखा भी करो.....नालायक!‘’
         ‘‘यह क्या, तुम तीसरी कक्षा की किताब लेकर बैठे हो! तीसरी की परीक्षा तो इस बार दे ही दी है, फिर ये किताबें पढ़ने का लाभ?....बेशर्म कहीं के।’’
रेखा चित्र : मनीषा सक्सेना   
     ‘‘हाँ-हाँ, ला देंगे चौथी क्लास की किताबें भी। परिणाम तो आने दो। जाओ कुछ और पढ़ो।’’
     ‘‘अरे! सारा दिन कहानी-किस्से पढ़ते, तुम बोर नहीं होते! आँखों पर भी जोर पड़ता है इस तरह। खुली हवा में सुबह-शाम बाहर खेल आया करो। यही तो उम्र है खेलने-कूदने की। चलो उठो, जाओ......।’’

  • 110, लाजवन्ती गार्डन, नयी दिल्ली-46




डॉ. कमल चोपड़ा




दर

    ‘‘का बात है.....मन-मन मा मुस्कात हो....हमका भी बताव भइयन....‘‘
    ‘‘हाँ-हाँ...का बताई भैया! बातई एइसी हय....कल रात सपना में हम का देखी- अक हमें ट्रक लोड करने के दिहाड़ी में पाँच सौ रुपीया मिला रहा....और जौन हमार मालिक सगरे दिन टेलीफून करत रहा उसे सिर्फई तीन रुपीये मिल रहे....हा-हा....का बड़ा, का छोट....सबकू महनत के हिसाब से पइसा मिला रहा....हा-हा....।’’
    ‘‘का हा-हा....अबे उल्लू! का दूसरई दुनिया में जीवत हो भइयन....हाड़-तोड़ महनत, सुरती, चार रोटी और मीठे सपने...साले, कुत्ते-बिल्ली जनावर हुई गये हम! थोड़ी देर पहले राधेश्याम बतावत रहा; कल रात गल्ले के दाम पाँच रुपइया बोरी चढ़ जाने से हमार मालिक को पाँच लाख का फायदा हुई गवा हय....’’
रेखा चित्र : बी मोहन नेगी 
    ‘‘क....का....पाँच....लाखऽऽऽ, वह भी फून पर बइठे-बइठे....। वह किस रेट से..... किस दर से भइया....!’’

  • 1600/114, त्रिनगर, दिल्ली-110035




कुमार नरेन्द्र




लगाम
      
      बारात चलते-चलते अचानक रुक गयी। बैण्ड का बजना बन्द हो गया। यकायक चारों तरफ खामोशी छा गयी।
      सभी बाराती लगाम वाले को घेरकर खड़े हो गये थे, जोकि मात्र बारह वर्षीय बालक था। हुआ यूँ कि दूल्हे के बहनोई घोड़ी की लगाम पकड़कर अपना फोटो खिंचवाना चाह रहे थे।
      बालक ने नजराने के तौर पर 11 रुपये माँगे थे, जिसे देने से बहनोई साहब इन्कार कर रहे थे। बालक ने दो-तीन बार फिर आग्रह किया....। खैर! उन्होंने गुस्से में आकर दो-तीन थप्पड़ बालक के जड़ दिये और बालक की कटोरे जैसी आँखों से सहज रूप से आँसू झरने लगे। इस क्रियाकलाप को बैंडमास्टर देख रहे थे, उन्हें भी यह सब अप्रिय लगा, सो विद्रोह-स्वरूप बैंड का बजना तुरन्त बन्द हो गया।
रेखा चित्र : राजेंद्र परदेशी 
    ....झगड़ा बढ़ता देख बिचौलिये किस्म के लोग अपने-अपने छज्जों से नीचे सड़क पर उतर आये। फैसला था कि होने का नाम ही नहीं ले रहा था। अन्ततः दूल्हे के पिता ने उसे पाँच रुपये थमा दिये, जिसे लड़के ने लेने से इन्कार कर दिया। बारातियों व अन्य लोगों को लगा- लड़का बस यूँ ही समझौते के लिए तैयार हो गया है।
    ....राम-नाम लेते बैंड फिर बजने लगा। बारात आगे खिसकने लगी। ....पर यह क्या....?
    बालक ने लगाम को, एक झटका, जोर से दिया.... और देखते-ही-देखते दूल्हे मियाँ और सात वर्षीय भतीजा नीचे सड़क पर धड़ाम से आकर गिरे।
    बैंड था कि रुकने का नाम ही न ले रहा था।

  • द्वारा दिशा प्रकाशन, 138/16, त्रिनगर, दिल्ली-110035




मधुकान्त





मौसम
     
       गोपाल जैसा साधारण किसान का लड़का अपने दोस्तों के साथ यदि पिकनिक पर न जाये तो किसी को क्या ....लेकिन उसकी सुरीली आवाज को कोई न छोड़ना चाहता था इसलिए सबने आग्रहपूर्वक उसे चलने के लिए तैयार कर ही लिया।
     झील के दायें किनारे हरी-हरी घास पर दो-दो, चार-चार के समूह में बिखरकर वे आनन्द लूट रहे थे। डॉन और जोनी पॉप म्यूजिक पर थिरक रहे थे। मोना और कमल झील के किनारे बैठे पानी में कंकड़ फेंक रहे थे। कुछ ताश खेलने बैठ गये थे तथा कुछ....
     अचानक पश्चिम से एक काला बादल उठा और सूर्य को अपनी चपेट में लेता हुआ मौसम को मस्त बना गया। पॉप म्यूजिक अधिक तेज हो गया।
     अब गाने के लिए गोपाल की खोज हुई। वह एक ठूँठ के नीचे खड़ा सोच रहा था। वीणा का ग्रुप उसकी ओर भागा.... ‘‘इस मौसम ने तो हमारी पिकनिक को चार चाँद लगा दिये हैं, हो जाये कोई मस्त-मस्त गीत....।’’
     ‘‘नहीं वीणा....मन नही है’’, उसके चेहरे की रेखायें अधिक गहरा गयी थीं।
     ‘‘क्या बात है....तुम इतने उदास-उदास क्यों हो? सलिल ने निकट आकर पूछा।
     ‘‘कुछ नहीं....ऐसे ही...’’
     ‘‘फिर भी....कुछ बताओ तो सही....’’ वीणा ने आग्रह किया।
     ‘‘वीणा...बात ऐसी है कि गाँव में फसल पकी खड़ी है....।’’ एक-एक शब्द उसके तालू से चिपककर निकल रहे थे।

  • अनूप बंसल ‘मधुकान्त’, साँपला-124501, रोहतक (हरियाणा)



मधुदीप





तनी हुई मुट्ठियाँ
     
      वे चारों स्थानीय म्युनिसिपैलिटी में तीसरे दर्जे के लिपिक थे। नयी-नयी भर्ती थी, खून गर्म था। चारों ही विभाग में फैले भ्रष्टाचार से दुखी थे। उनकी रगों का जवान खून बार-बार बगावत पर उतारू हो जाता। रोज ही वे इस व्यवस्था के खिलाफ कुछ करने के लिए गुप्त मंत्रणा करते।
     धीरे-धीरे उनकी मंत्रणा के समाचार अधिकारियों त पहुँचे। अधिकारी श्रीवास्तव जी इस विभाग में पिछले बीस वर्षों से थे। आज तक उनके सामने कभी ऐसी स्थिति नहीं आयी थी। एक बार तो वे झल्लाये; लेकिन फिर उन्होंने धैर्य से काम लेना ही उचित समझा।
रेखा चित्र : के. रविन्द्र 
     अब उनमें से ‘क’ एक तथाकथित बढ़िया सीट पर लगा हुआ है। ‘ग’ को ‘क’ से झगड़ा किये जाने के अपराध में सस्पेंड कर दिया गया है। ‘घ’ को बार-बार वार्निंग दी गयी कि उसका काम ठीक नहीं है और अब उसे दूसरे विभाग में बदल दिया गया है। ‘ख’ अलबत्ता वहीं उसी विभाग में अपनी पुरानी सीट पर है। वह बार-बार संघर्ष के लिए मानसिक तनाव से मुट्ठियाँ भी उछालता है; परन्तु साथ ही वह यह भी जानता है कि उसके साथ इस संघर्ष में ‘क’, ‘ग’ और ‘घ’ अब कभी नहीं आ पायेंगे। यह सोचकर उसकी तनी हुई मुट्ठियाँ शिथिलता से नीचे की ओर झुकने ही लगी थीं कि तभी बराबर से आकर ‘च’, ‘छ’ और ‘ज’ ने उसकी मुट्ठियाँ हवा में ही थाम ली हैं।

  • निदेशक :  दिशा प्रकाशन, 138/16, त्रिनगर, दिल्ली-110035



विक्रम सोनी





बड़ी मछली का आहार
     
        आँखों के ऊपर, माथे से हथेली सटाकर सूरज की ऊँचाई नापता हुआ वह बड़बड़ाया, ‘‘हाँडी के भाग में चूल्हे की आँच और करछुल की मार ही बदी होती है। चल बेटा नटवर! बाजार-हाट का टैम हो गया है।’’
     कमर में चमड़े का पट्टा कसे, पट्टे के सहारे सात हाथ ऊँचा बाँस का डण्डा खोंसे, डण्डे पर आड़ी बँधी बाँस की कमटियाँ-सीढ़ीनुमा। कमटियों के सहारे फीता, चूड़ी, चोली, हेयर-पिन, रबर के खिलौने, फुग्गे और कई तरह की मालायें झूल रही थीं।
रेखा चित्र : डॉ सुरेन्द्र वर्मा 
     बायें हाथ से डण्डे को सँभाले, दायें हाथ से टिन का चोंगा मुँह से सटाये, धीरे-धीरे चलता हुआ, भर्रायी आवाज में वह चिल्ला रहा था, ‘‘पाँच हाथ का फीता, चाभी वाला चीता। हर माल रुपइया एक, चलते-फिरते देख।’’
     अन्ततः उसे बाजार से बाहर निकलना ही पड़ता। किसी भी दुकान के सामने नटवर के पहुँचते ही चाभी वाले चीते की तरह दुकानदार गुर्राता, ‘‘अबे ओ, फूट इहाँ से। साला गाहकी बिगाड़ता है।’’

  • बी-4, तृप्ति विहार, इन्दौर रोड, उज्जैन (म.प्र.)


कुछ और लघुकथाएँ



प्रद्युम्न भल्ला





ज़मीर
      
        होटल का वह कमरा पूरी तरह वातानुकूलित था, जहाँ वे पांचों बैठे हुए थे। सामने टेबल पर विदेशी ह्विस्की, शाही कबाब, सोडा, वर्फ, नमकीन काजू पड़े हुए थे। वे प्रान्त के विभिन्न हिस्सों से आये छंटे हुए बदमाश थे। दो-दो पैग वे लगा चुके थे।
      एक से एक खूंख़ार दुर्द्धर अपराधी थे वे। किसी के पास विदेशी पिस्तौल थी तो कोई रामपुरी का मास्टर था।
      तीसरा पैग पीकर वे कुछ सरूर में आए।
      -मैंने उस साले सेठ को दिन-दहाड़े लिटा दिया, पहले ने कहा।
      -अपुन ने उस खद्दरधारी को नरक पहुँचाया..... दूसरा बोला।
      चौथा पैग अन्दर गया तो फिर और रंग चढ़ा।
      -अबकी बार साले मंत्री को ठिकाने लगाना है...... तीसरे ने कहा।
      -अरे ये तो अपनी ही बिरादरी के हैं, मारना है तो चोर की माँ को मार.... चौथा बिगड़ा। अब तक वे दो-दो पैग और पी चुके थे।
      -क्यों वे, तू क्यों नहीं बोलता? लड़खड़ाती आवाज में पहले ने पांचवें से पूछा।
      -क्या बोलूँ मैं.... सालो.... हम भी तो मरेंगे यूँ ही एक दिन..... पांचवां बोला।
      .....ठहरो..... तुम क्या सोचते हो, तुम जिन्दा हो..... पहला भारी आवाज में बोला और उनकी कल्पनाओं में माँ, बाप, पत्नी, बच्चे, यार, रिश्तेदार सजीव हो उठे.....
      कमरे की ठंडक के बावजूद सबके चेहरों पर पसीना था।

  • 508, सेक्टर-20, अर्बन एस्टेट, कैथल-136027 (हरि.)



सन्तोष सुपेकर




अपराध बोध की दस्तक
     
कॉलोनी का शांत वातावरण एकाएक ब्रेक की तीव्र चरमराहट, जोरदार शोरगुल, बच्चे की दर्दनाक स्तब्धकारी चीख और तीव्र आक्रोश के मिले-जुले स्वरों से दहल उठा। तेजी से आ रही एक बस ने सड़क पर क्रिकेट खेलते दस वर्षीय राजू को बुरी तरह कुचल डाला था। भीड़ इकट्ठी हो रही थी, राजू की रक्तरंजित लाश के आसपास बदहवास, उसकी माँ और पड़ोसी इकट्ठे होकर बुक्का फाड़कर रो रहे थे। बस को रोक लिया गया था, उसकी सवारियां उतरकर भाग गई थीं, ड्राइवर को घंरकर बुरी तरह पीटा जा रहा था, बस के टायरों की हवा निकाल दी गई थी, उसके सारे कांच फोड़ दिये गए थे और अब उसमें आग लगाने की तैयारी चल रही थी......
छाया चित्र : उमेश महादोषी 
    सामने के भव्य काम्पलेक्स की दूसरी मंजिल पर खड़े रामस्वरूप जी सारा नजारा देख रहे थे। सबकी तरह उनकी आंखे भी यकायक हुए इस हादसे से नम हो गईं थीं लेकिन एक अपराध बोध भी उनके मन में दस्तक दे रहा था कि उस बस के ड्राइवर के स्थान पर उन्हें पीटा जाना चाहिये था, इसी बुरी तरह से.....
    उन्होंने ही तो अपने रालनैतिक प्रभाव का इस्तेमाल कर बगीचे के लिये आरक्षित कॉलोनी की भूमि पर भव्य कॉमर्शियल कॉम्पलेक्स बनवाया था...

  • 31, सुदामानगर, उज्जैन-456001 (म.प्र.)



डॉ नन्द लाल भारती





विजया
    
        विजया का एक हाथ पोलियो लील चुकी थी। उसके माता-पिता उसके भविष्य को लेकर बहुत दुखी रहते थे। विजया पढाई  के मामले अव्वल थी। एक दिन उसके माँ-बाप घर आये मेहमानों से विजया के भविष्य को लेकर चिंता जाहिर कर रहे थे। इसी बीच विजया आ गयी। उसके आते ही सन्नाटा छा गया। वह सन्नाटे को चीरते हुए बोली, ‘‘मम्मी-पापा, मैं विकलांग हूँ तो मै अपने पाँव नहीं जमा सकती। आप लोग मुझे लेकर चिंतित रहते हैं?’’
     मम्मी उषा बोली- नहीं बिटिया ......
     विजया- झूठ!
रेखा चित्र : डॉ सुरेन्द्र वर्मा 
     पापा दर्शन- सच बेटी। तू तो हमारे लिए वरदान है।
     विजया- चिंता का कारण भी।
     दर्शन विजया को छाती से लगा लिए उनकी पलकें गीली हो गयी।
     विजया बोली पापा तन से भले जमाना विकलांग कह दे पर मन से विकलांग नहीं हूँ। एक दिन साबित कर दूंगी। माँ-बाप के भरपूर सहयोग से।
     वक्त ने करवट बदला विजया डाक्टर बन गयी। वह जटिल आपरेशन भी बड़ी आसानी से कर लेती, जिसे करने में दोनों हाथ वाले डाक्टरो के हाथ काँप जाते। विजया की कामयाबी को देखकर लोग कहते सच आदमी तन से भले विकलांग हो पर मन से नहीं होना चाहिए, तभी तरक्की के पहाड़ चढ़ सकता है विजया की तरह.....

  • आजाददीप, 15-एम, वीणा नगर, इन्दौर (म.प्र.)



दिनेश कुमार छाजेड़





बोलना
    
        मनोहर लाल जी को पुत्र रत्न प्राप्त हुआ। धूमधाम से जन्मोत्सव मनाया गया। पुत्र के बड़े होने पर पता चला कि उसको बोलने में परेशानी होती है। हर शब्द अटक-अटक कर बोलता है। शब्दों का उच्चारण स्पष्ट नहीं होता है।
    पुत्र की ऐसी हालत देखकर उन्हें व उनकी पत्नी को बड़ा दुख होता था। उसके भविष्य के बारे में सोचकर चिंतित रहते थे। लेकिन वो निराश नहीं हुए। अच्छे डॉक्टरों से इलाज कराया, देवी-देवताओं की मनोतियाँ रखी। इलाज के लिए बेहिसाब धन खर्च किया। कर्जा लिया। आखिरकार मेहनत काम आई। उनके पुत्र की बोलने की क्षमता ठीक हो गई।
रेखा चित्र : डॉ सुरेन्द्र वर्मा 
    समय के साथ पुत्र बड़ा हुआ, पढ़ाई पूरी की, अच्छी कम्पनी में नौकरी लग गई। उसका विवाह भी ऊँचे परिवार में हुआ।
    ऊँचे घर की लड़की बहू बनकर आई। लेकिन परिवार में रोज खट-पट होने लगी। मनोहर लाल जी अक्सर चुपचाप रहते, लेकिन सास-बहू में झगड़ा होता रहता। पुत्र भी ऐसी स्थिति में तनाव में रहता, कभी-कभी वह भी अपनी माँ को गुस्से में अनाप-शनाप कह देता। एक दिन तो हद हो गई जब उसने माँ को कहा कि इस घर में रहना है तो जैसे हम कहेंगे, वैसे ही रहना पड़ेगा; नहीं तो शहर के वृद्धाश्रम में जाकर रहो।
    मनोहर लाल जी यह सुनकर अवाक रह गये। सोचने लगे क्या यही सुनने के लिए इसका इलाज कराया था!

  • ब्लॉक 63/395, भारी पानी संयंत्र कॉलोनी, रावतभाटा-323307 (राज.)

1 टिप्पणी:

  1. लघुकथाएँ अच्छी लगी, परंतु कुच्छ और लघुकथाएँ कोलम वाली लघुकथाओँ मेँ दम नहीँ।
    http://yuvaam.blogspot.com

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