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गुरुवार, 28 फ़रवरी 2013

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अविराम  ब्लॉग संकलन :  वर्ष  : 2,   अंक  : 6,  फरवरी 2013 


विश्व पुस्तक मेले में दिशा प्रका. के स्टाल पर प्रज्ञा सम्मान समारोह 
{ दिशा प्रकाशन के स्टाल पर दिखा  'अविराम साहित्यकी' का लघुकथा विशेषांक}      

सुरेश यादव को प्रज्ञा सम्मान 
          


अशोक भाटिया  को प्रज्ञा सम्मान 
 दिनांक 09.02.2013   को विश्व पुस्तक मेले के अवसर पर दिशा प्रकाशन के स्टाल पर प्रज्ञा सम्मान समारोह का आयोजन किया गया। भाई मधुदीप,  मधुकांत तथा हरनाम शर्मा द्वारा सर्वश्री अशोक वर्मा,  सुरेश यादव, अशोक भाटिया, आर.के.पंकज,  उमेश महादोषी, सुरेन्द्र गोयल,  श्रीमती कांता बंसल तथा शोभा रस्तोगी को उनकी लेखकीय तथा पत्रकारिता में उपलब्धियों के लिए प्रज्ञा सम्मान से सम्मानित किया गया। सभी सम्मानित साहित्यकारों को शाल, प्रतिक चिह्न, प्रमाण-पत्र  के  साथ दिशा प्रकाशन द्वारा प्रकाशित महत्वपूर्ण पुस्तकें भी भेंट की गयीं।    
अशोक वर्मा को प्रज्ञा सम्मान 
           

शोभा भारती को प्रज्ञा सम्मान 
इस अवसर पर दिशा प्रकाशन के स्टाल पर भारी भीड़ के साथ कुमार नरेन्दर, राजकुमार निजात, शकुन्त दीप,  सुधीर कुमार तथा अनेक प्रकाशक तथा लेखक बंधु उपस्थित थे। मधुदीप ने सम्मानित लेखकों का परिचय उपस्थित सभी बन्धुओं से करवाया तथा हरनाम शर्मा ने आभार व्यक्त किया। मधुकांत जी ने सूचना प्रदान की कि प्रज्ञा मंच इस वर्ष को प्रख्यात लेखिका स्वर्गीया इंद्रा स्वप्न के जन्मशती के रूप में मना रहा है तथा उनके जन्मदिन पर भव्य समारोह का आयोजन किया जायेगा। 
    पुस्तक मेले के अवसर पर दिशा प्रकाशन ने लघु पत्रिकाओं को सहयोग देने हेतु अपने स्टाल पर कई लघु-पत्रिकाओं को प्रदर्शित किया, जिनमें अविराम साहित्यकी का लघुकथा विशेषांक भी शामिल था। पूरे (समाचार सौजन्य : मधुदीप,  निदेशक, दिशा प्रकाशन)



हिन्दी कथा साहित्य एवं स्वयं प्रकाश विषयक राष्ट्रीय सेमीनार




चित्तौड़गढ़। यथार्थ को संजोते हुए जीवन की वास्तविकता का चित्रण कर समाज की गतिशीलता को बनाये रखने का मर्म ही कहानी हैं। सूक्ष्म पर्यवेक्षण क्षमता शक्ति एक कथाकार की विशेषता है और स्वयं प्रकाश इसके पर्याय बनकर उभरे हैं। उनकी कहानियों में खास तौर पर कथा और कहन की शैली खासतौर पर दिखती हैं। यही कारण है कि पाठक को कहानियों अपने आस-पास के परिवेश से मेल खाती हुई अनुभव होती हैं। विलग अन्दाज की भाषा शैली के कारण स्वयं प्रकाश पाठकों के होकर रह जाते हैं। चित्तौड़गढ़ में आयोजित समकालीन हिन्दी कथा साहित्य एवं स्वयं प्रकाश विषयक राष्ट्रीय सेमीनार में मुख्यतः यह बात उभरकर आयी।
         सेमीनार का बीज वक्तव्य देते हुए सुखाडिया विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो माधव हाडा ने कहा कि यथार्थ के प्रचलित ढाँचे ने पारम्परिक कहन को बहुत नुकसान पहुंचाया है लेकिन अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के बावजूद स्वयं प्रकाश ऐसे कथाकार हैं जो यथार्थ के नए नए पक्षों का उद्घाटन करते हुए कहन को क्षतिग्रस्त नहीं होने देते। उन्होंने कहा कि कहानी और कथा का भेद जिस तरह से उनकी कहानियों को पढते हुए समझा जा सकता हैवैसा किसी भी समकालीन कथाकार के यहाँ दुर्लभ है। प्रो हाड़ा ने कहा कि आज के दौर में लेखक को स्वयं लेखक होने की चिन्ता खाये जा रही है वहीं मनुष्य एवं मनुष्य की चिन्ता स्वयं प्रकाश की कहानियों में परिलक्षित होती है। हिन्दू कालेज दिल्ली से आए युवा आलोचक पल्लव ने आयोजन के महत्त्व को प्रकाशित करते हुए कहा कि प्रशंसाओं के घटाटोप में उस आलोचना की बडी जरूरत है जो हमारे समय की सही रचनाशीलता को स्थापित करे। इस सत्र में कथाकार स्वयं प्रकाश ने अपनी चर्चित कहानी श्कानदांवश् का पाठ किया जो रोचक कहन में भी अपने समय की जटिल और उलझी हुई सच्चाइयों को समझने का अवसर देती है। पाठक जिसे किस्सा समझकर रचना का आनंद लेता है वह कोरा किस्सा न होकर उससे कहीं आगे का दस्तावेज हो जाती है। सत्र के समापन पर सम्भावना के अध्यक्ष डा. के.सी. शर्मा ने आगे भी इस तरह के आयोजन जारी रखने का विश्वास जताया। शुरूआत में श्रमिक नेता घनश्याम सिंह राणावत, जी.एन.एस. चैहान, जेपी दशोरा, अजयसिंह, योगेश शर्मा ने अतिथियों का अभिनन्दन किया।
       दूसरे सत्र के मुख्य वक्ता युवा कवि अशोक कुमार पांडेय ने अपने समकालीन कथा साहित्य की विभिन्न प्रवृतियों के कईं उदाहरण श्रोताओं के सामने रखे। उन्होंने समय के साथ बदलती परिस्थितियों और संक्रमण के दौर में भी स्वयं प्रकाश के अपने लेखन को लेकर प्रतिबद्ध बने रहने पर खुशी जाहिर की। उन्होंने समकाल की व्याख्या करते हुए कहा कि यह सही है कि किसी भी काल के विभिन्न संस्तर होते हैं. एक ही समय में हम आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक सभी स्तरों पर इन संस्तरों को महसूस कर सकते हैं। लेकिन जहाँ उत्तर-आधुनिक विमर्श इन्हें अलग-अलग करके देखते हैं वहीँ एक वामपंथी लेखक इन सबके बीच उपस्थित अंतर्संबंध की पडताल करता है और इसीलिए उसे अपनी रचनाओं की ब्रांडिंग नहीं करनी पडती। उसके लेखन में स्त्री, दलित, साम्प्रदायिकता, आर्थिक शोषण सभी सहज स्वाभाविक रूप से आते हैं। स्वयं प्रकाश की कहानियाँ इसकी गवाह हैं। उनकी दूसरी खूबी यह है कि वह पूरी तरह एशियाई ढब के किस्सागो हैं, जिनके यहाँ स्थानीयता को भूमंडलीय में तब्दील होते देखा जा सकता है। इस रूप में वह विमर्शों के हवाई दौर में विचार की सख्त जमीन पर खडे महत्वपूर्ण रचनाकार हैं। सत्र की अध्यक्षता करते हुए कवि और चिंतक डा. सदाशिव श्रोत्रिय ने कहा कि कोइ भी व्यक्ति दूसरों की पीड़ा और व्यथा को समझकर ही साहित्यकार बन सकता है और सही अर्थों में समाज को कुछ दे सकता हैं। उन्होंने स्वयं प्रकाश के साथ भीनमाल और चित्तौड में व्यतीत दिनों पर एक संस्मरण का वाचन किया जिसे श्रोताओं ने पर्याप्त पसंद किया। जबलपुर विश्वविद्यालय की मोनालिसा और राजकीय महाविद्यालय मण्डफिया के प्राध्यापक डा. अखिलेश चाष्टा ने पत्रवाचन कर स्वयं प्रकाश की कहानियों का समकालीन परिदृश्य में विश्लेषण किया। विमर्श के दौरान पार्टीशन, चैथा हादसा, नीलकान्त का सफर जैसी कहानियों की खूब चर्चा रही। इस सत्र का संचालन माणिक ने किया।
        तीसरे सत्र के मुख्य वक्ता डॉ कामेश्वर प्रसाद सिंह ने समाकालीन परिदृश्य में स्वयं प्रकाश की उपस्थिति का महत्त्व दर्शाते हुए कहा कि पार्टीशन जैसी कहानी केवल साम्प्रदायिकता जैसी समस्या पर ही बात नहीं करती अपितु संश्लिष्ट यथार्थ को सही सही खोलकर कर पाठक तक पहुंचा देती है। उन्होंने क्या तुमने कभी कोई सरदार भिखारी देखा है? का उल्लेख करते हुए कहा कि मध्यवर्ग का काइंयापन इस कहानी में जिस तरह निकलकर आता है वह इस एक खास ढंग से देखने से रोकता है। इस सत्र में इग्नू दिल्ली की शोध छात्रा रेखासिंह ने पत्र वाचन किया। अध्यक्षता कर रहे राजस्थान विद्यापीठ के हिन्दी विभागाध्यक्ष डॉ मलय पानेरी ने कहा कि स्वयं प्रकाश की कहानियां नींद से जगाने के साथ आँखें खोल देने का काम भी करती हैं। उन्होंने स्वयं प्रकाश की एक अल्पचर्चित कहानी ढलान पर का उल्लेख करते हुए बताया कि अधेड होते मनुष्य का जैसा प्रभावी चित्र इस कहानी में आया है वह दुर्लभ है। सत्र का संचालन करते हुए डॉ रेणु व्यास ने कहा कि स्वयं प्रकाश की कहानी के पात्रों में हमेशा पाठक भी शामिल होता है यही उनकी कहानी की ताकत होती है।
समापन सत्र में डा. सत्यनारायण व्यास ने कहा कि जब तक मनुष्य और मनुष्यता है जब तक साहित्य की आवश्यकताओं की प्रासंगिकता रहेगी। उन्होंने कहा कि मानवता सबसे बड़ी विचारधारा है और हमें यह समझना होगा कि वामपंथी हुए बिना भी प्रगतिशील हुआ जा सकता है। सामाजिक यथार्थ के साथ मानवीय पक्ष स्वयं प्रकाश की कहानियों की विशेषता है एवं उनका सम्पूर्ण साहित्य, सृजन इंसानियत के मूल्यों को बार-बार केन्द्र में लाता है। सत्र की अध्यक्षता करते हुए प्रख्यात समालोचक प्रो. नवलकिशोर ने स्वयं प्रकाश की कहानियों के रचना कौशल के बारीक सूत्रों को पकडते हुए उनकी के छोटी कहानी हत्या का उल्लेख किया।   उन्होंने कहा कि मामूली दिखाई दे रहे दृश्य में कुछ विशिष्ट खोज लाना और उसे विशिष्ट अंदाज में प्रस्तुत करना स्वयं प्रकाश जैसे लेखक के लिए ही संभव है। चित्रकार और कवि रवि कुमार ने इस सत्र में कहा कि किसी भी कहानी में विचार की अनुपस्थिति असंभव है और साहित्य व्यक्ति के अनुभव के दायरे को बढ़ाता हैं। इस सत्र का संचालन कर रहे राजकीय महाविद्यालय डूंगरपुर के प्राध्यापक हिमांशु पण्डया ने कहा कि गलत का प्रतिरोध प्रबलता से करना ही स्वयं प्रकाश की कहानियों को अन्य लेखकों से अलग खड़ा करती है।     
           रावतभाटा के रंगकर्मी रविकुमार द्वारा निर्मित स्वयंप्रकाश की कहानियों के खास हिस्सों पर केन्द्रित करके पोस्टर प्रदर्शनी इस सेमीनार का एक और मुख्य आकर्षण रही। यहीं बनास जन, समयांतर, लोक संघर्ष सहित विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं की एक प्रदर्शनी भी लगाई गई। सेमीनार में प्रतिभागियों द्वारा अपने अनुभव सुनाने के क्रम में विकास अग्रवाल ने स्वयंप्रकाश के साथ बिताये अपने समय को संक्षेप में याद किया। आयोजन में गुजरात केन्द्रीय विश्वविद्यालय के सहायक आचार्य डॉ गजेन्द्र मीणा प्रतिभागियों के प्रतिनिधि के रूप में सेमीनार पर अपना वक्तव्य दिया। इस सत्र में विकास अग्रवाल ने भी अपनी संक्षित टिप्पणी की। आखिर में आभार आकाशवाणी के कार्यक्रम अधिकारी लक्ष्मण व्यास ने दिया।
        आयोजन में उदयपुर विश्वविद्यालय से जुडे अध्यापकों एवं शोध छात्रों के साथ नगर और आस-पास के अनेक साहित्य प्रेमी उपस्थित थे। आयोजन स्थल पर चित्रकार रविकुमार द्वारा कथा-कविता पोस्टर प्रदर्शनी, ज्योतिपर्व प्रकाशन द्वारा स्वयं प्रकाश की पुस्तकों की प्रदर्शनी एवं लघु पत्रिकाओं की प्रदर्शनी को प्रतिभागियों ने सराहा। ( समाचार सौजन्य : डा. कनक जैन, संयोजक, राष्ट्रीय सेमीनार, म-16, हाउसिंग बोर्ड, कुम्भा नगर, चित्तौडगढ -312001)


विश्व पुस्तक मेले में उद्भ्रांत की पुस्तकों का लोकार्पण

    

विश्व पुस्तक मेले में गत दिनांक 07 फरवरी को अमन प्रकाशन के स्टॉल पर वरिष्ठ कवि उद्भ्रांत से सम्बंधित पांच पुस्तकों का लोकार्पण करते हुए मूर्धन्य कवि डॉ. केदारनाथ सिंह ने कहा कि एक श्रेष्ठ कवि की नई पुस्तकों का लोकार्पण करते हुए बहुत प्रसन्नता हो रही है। यह कोई औपचारिकता मात्र नहीं है, बल्कि सच्चाई है कि उद्भ्रांत की कृतियों में ऐसा बहुत कुछ है जिसकी समाज को आवश्यकता है। पाठक जब उनकी कविता को पढ़ेंगे तो उन्हें समय की बेहतर समझ मिलेगी क्योंकि उनका समग्र काव्य आज की ज़रूरत को रेखांकित करता है। वरिष्ठ आलोचक डॉ. खगेन्द्र ठाकुर ने कहा कि उद्भ्रांत हमारे समय के ऐसे महत्त्वपूर्ण कवि हैं जो हमेशा चर्चा में रहते हैं। उनकी काव्यकृतियों के नये संस्करण होना और उन पर केन्द्रित आलोचना पुस्तकों का लगातार आना यह सिद्ध करता है कि उन्हें भावक पाठक और सहृदय आलोचक दोनों ही उपलब्ध हैं। ऐसा सुयोग बहुत कम कवियों को मिलता है। आलोचक डॉ. कर्णसिंह चौहान ने कहा कि उद्भ्रांत जी से चार दशक पूर्व बाँदा के प्रगतिशील लेखक सम्मेलन में भेंट हुई थी। फिर उन्होंने कानपुर से ‘युवा’ जैसी महत्त्वपूर्ण पत्रिका निकाली जिसने देशभर के प्रगतिशील साथियों को जोड़ दिया। लगभग दो दशक पहले वे दिल्ली आये तो उनकी उपस्थिति से राजधानी की हलचलें बढ़ गईं। उनका साहित्यिक योगदान बहुत बड़ा और महत्त्वपूर्ण भी है।
जिन पुस्तकों का लोकार्पण हुआ वे क्रमशः इस प्रकार थीं-उद्भ्रांत रचित खण्डकाव्य ‘वक्रतुण्ड’ का द्वितीय संस्करण, डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय द्वारा सम्पादित समीक्षा पुस्तक ‘वक्रतुण्ड: मिथक की समकालीनता’, उद्भ्रांत द्वारा सम्पादित वाचिक आलोचना की पुस्तिका ‘लोकार्पण की भूमिका: काव्यनाटक और दलित विमर्श’, डॉ. शिवपूजन लाल का आलोचना ग्रंथ ‘उद्भ्रांत का काव्य: मिथक के अनछुए पहलू’ और उद्भ्रांत की बहुचर्चित लम्बी कविता ‘रुद्रावतार’ का मात्र दस रूपये लागत मूल्य  और पांच हजार प्रतियों का गुटका संस्करण, जिसे केदार जी ने ‘विलक्षण प्रयोग’ की संज्ञा दी। दूरदर्शन महानिदेशालय की अतिरिक्त महानिदेशक सुश्री दीपा चंद्रा के मुख्य आथित्य वाले इस कार्यक्रम में सर्वश्री दिनेश मिश्र (भूतपूर्व निदेशक, भारतीय ज्ञानपीठ), जलेस की दिल्ली इकाई के सचिव डॉ. बली सिंह, मीडिया विशेषज्ञ धीरंजन मालवे, दूरदर्शन की साप्ताहिक ‘पत्रिका’ कार्यक्रम के प्रोड्यूसर डॉ. अमरनाथ अमर, दूरदर्शन के सहायक केन्द्र निदेशक श्री पुरुषोत्तम नारायण सिंह और कवि जनार्दन मिश्र तथा अखिलेश मिश्र ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कवि को बधाईयाँ दीं। 
उसी दिन ज्योतिपर्व प्रकाशन के स्टॉल पर उद्भ्रांत के कहानी संग्रह ‘मेरी प्रिय कथाएं’ का लोकार्पण करते हुए डॉ. खगेन्द्र ठाकुर ने कहा कि उद्भ्रांत ने अनेक विधाओं में काम किया है, इसलिए स्वाभाविक है कि ‘ज्योतिपर्व प्रकाशन’ की इस चर्चित कथा श्रंृखला में उनके द्वारा चयनित उनकी कहानियों का संग्रह आता। संग्रह की कहानियां अपने समय की चर्चित कहानियां रहीं हैं किन्तु अपनी कथावस्तु के कारण निश्चय ही आज के पाठक भी उन्हें अवश्य पसंद करेंगे। (समाचार सौजन्य : सुनील, डी1/782ए, हर्ष विहार, दिल्ली-110093)



जनसुलभ साहित्यमाला की 12 पुस्तकों का विमोचन

हिंदी साहित्य निकेतन बिजनौर (उ.प्र.) द्वारा प्रकशित जनसुलभ साहित्यमाला की 12 पुस्तकों के सैट का विमोचन विश्व पुस्तक मेले में संपन्न हुआ। अनेक गणमान्य साहित्यकार और साहित्यप्रेमी उपस्थित थे। प्रत्येक पुस्तक का मूल्य पचास रुपये पूरे सैट का मूल्य कुल पाँच सौ रुपये रखा गया है। सैट में शामिल पुस्तकों में शामिल हैं-  कमरा नंबर 103 (सुधा ओम ढींगरा), इमराना हाज़िर हो  (महेशचंद्र द्विवेदी), कहानियाँ अमेरिका से (संपादक : इला प्रसाद), कुत्तेवाले पापा  (मीना अग्रवाल) व प्रेमचंद की कालजयी कहानियाँ  (संपादक : डॉ. कमलकिशोर गोयनका) {सभी कहानी संग्रह}; लघुकथाएँ मानव-जीवन की (सम्पादक : सुकेश साहनी व  रामेश्वर कांबोज 'हिमांशु'); दूध का धुला लोकतंत्र (गोपाल चतुर्वेदी), आदमी और कुत्ते की नाक  (डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल) व सच का सामना  (हरीशकुमार सिंह) {व्यंग्य संग्रह}: अफलातून की अकादमी  (डॉ. शिव शर्मा); सिनेमा, साहित्य और संस्कृति (नवलकिशोर शर्मा); मान भी जा छुटकी  (गीतिका गोयल)। (समाचार सौजन्य : रामेश्वर कांबोज 'हिमांशु' /  डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल)

 शशांक मिश्र भारती को विद्यासागर (डी.लिट.) की उपाधि

       

 गत दिनों विक्रममशिला हिन्दी विद्यापीठ के 17 वें अधिवेशन में मौनतीर्थ गंगाघाट उज्जैन पर मुख्य अतिथिश्री एस.एस. सिसौदिया रामचाकर, विशिष्ट अतिथि डा.हरीशप्रधान कुलाधिपति डा. सुमनभाई जी, कुलपति डा.तेजनारायण कुशवाहा व कुलसचिव डा. देवेन्द्रनाथ साह की उपस्थिति में शाहजहांपुर उ.0प्र. निवासी व रा.इ. का. दुबौला पिथौरागढ़ उत्तराखण्ड में शिक्षक पद पर कार्यरत श्री शशांक मिश्र भारती को उनकी कृति पर्यावरण की कविताएं के लिए विद्यासागर (डी.लिट.) की उपाधि से अलंकृत किया गया। इनके अलावा 65 हिन्दी सेवियों को विद्यासागर, 88 को विद्यावाचस्पति, 15 को भारतगौरव, 5 को अंग गौरव, 3 को महाकवि, 1 को पत्रकार शिरोमणि, 1को ज्योतिष शिरोमणि, 16 को भारतीय भाषा रत्न, 9 को साहित्य शिरोमणि और 14 को समाजसेवी रत्न से अलंकृत किया गया।
       सम्मानित होने पर अनेक साहित्यकारों शिक्षकों  गाणमान्य नागरिकों ने प्रसन्नता व्यक्त करते हुए बधाई दी है। (समाचार सौजन्य : कु. एकांशी शिखा, सम्पादन सहयोगी, देवसुधा  दुबौला-पिथौरागढ़)


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