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मंगलवार, 26 मार्च 2013

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अविराम  ब्लॉग संकलन :  वर्ष  : 2,   अंक  : 7,  मार्च  2013 

मिन्नी कहानी (लघुकथा) पर लुधियाना में सेमिनार

          17 मार्च को लुधियाना में  मिन्नी कहानी पर पंजाबी साहित्य अकादमी लुधियाना द्वारा सेमिनार का आयोजन किया गया। इममें  डा. अनूप सिंह, डा. नैब सिंह मंडेर और डा. श्याम सुंदर दीप्ति ने आलेख पढ़े, जबकि अध्यक्ष मंडल में  डा. अशोक भाटिया, प्रो. निरंजन तस्नीम, मित्तर सेनमीत और गुरपाल लिट्ट मौजूद थे।
         अकादमी के सचिव और सेमिनार के संयोजक-संचालक सुरिंदर कैले ने आगंतुकों का स्वागत करते हुए कहा कि मिन्नी कहानी के आलोचना पक्ष पर बहुत कम काम हुआ है। यह सेमिनार उसके एक पड़ाव का काम करेगा। डा. अनूप सिंह ने ‘मिन्नी कहानी में राजनीतिक व सामाजिक चेतना’ विषय  पर बोलते हुए कहा कि पंूजीवाद की चरमसीमा के दौर में मिन्नी कहानी का उभार हुआ है। मिन्नी कहानी में तनाव-लटकाव व जिज्ञासा जरूरी है, व्यंग्य जरूरी नहीं। उन्होंने कहा कि मिन्नी कहानी में सामाजिक सरोकार व प्रतिनिधि यथार्थ होना चाहिए। डा. नैब सिंह मंडेर ने ‘मिन्नी कहानी में नारी की दशा  व दिशा ’ आलेख पढ़ते हुए नारी की वर्तमान सामाजिक स्थिति पर प्रकाश  डाला। उन्होंने कहा कि पूँजीवादी युग के प्रांरभ होने से स्त्री की चेतना बढ़ी है और उसमें बराबरी की संभावनाओं ने जन्म लिया है। फिर अनेक मिन्नी कहानियों का उदाहरण देकर स्पष्ट  किया कि मिन्नी कहानी में  नारी-चेतना को संघर्ष  में तब्दील करने की कोशिश  की गई है। डा. श्यामसुंदर दीप्ति ने ‘मिन्नी कहानी में बुजुर्गों का जन-जीवन’ विशय पर बोलते हुए कहा कि एक तरफ़ अकेलापन है, तो दूसरी तरफ़ मां-बाप बच्चों को ‘सेट’ करने की लालसा में देश  के कोने-कोने ही नहीं, विदेश  में भी उन्हें खुद ही भेजते हैं। उन्होंने कहा कि विषय से पहले लेखकों को मिन्नी कहानी का रूपक स्पष्ट  होना जरूरी है। थोड़े शब्दों में अधिक करने के लिए बड़े अभ्यास की जरूरत होती है। कई लेखक मिन्नी कहानी को साहित्य में प्रवेश-द्वार की तरह लेते हैं।
         चर्चा में भाग लेते हुए हरप्रीत सिंह राणा ने कहा कि कमजोर कहानियों के बीच मॉडल मिन्नी कहानियाँ दब गई है। उन्होंने मिन्नी कहानी के काव्य षास्त्रीय पक्ष पर भी लिखे जाने पर बल दिया। हरभजन खेमकरनी ने नए मिन्नी कहानीकारों द्वारा श्रेश्ठ साहित्य न पढ़ने और छपने को बहुत महत्व देने पर चिंता जाहिर की। सूफी अमरजीत ने कहा कि हरेक लेखक का विधान-संबंधी अपना ही मापदंड होता है। मिन्नी कहानी को अन्य विधाओं की भांति महत्वपूर्ण नहीं समझा जाता, जबकि मिन्नी कहानी भी जीवन से जुड़ी है।
         अध्यक्ष मंडल से मित्तर सेन मीत ने कहा कि मिन्नी कहानी की भांति मिन्नी उपन्यास का भी विधा-विधान बनाया जाना चाहिए। प्रो. निरंजन तस्नीम ने कहा कि संक्षिप्तता ही मिन्नी कहानी का प्रमुख गुण है। उन्होंने मंटो की ‘स्याह हाशिए’ से कुछ लघुकथाएं प्रस्तुत कर मिन्नी कहानी की शक्ति को रेखांकित किया। गुरपाल लिट्ट ने कहा कि ‘अणु’ ने सबसे पहले मिन्नी कहानी को प्रकाशित किया है। इसका दूसरा अंक सन् 1972 में  ‘मिन्नी कहानी विशेषांक (विद्रोही रंग) था। 1970 के दशक में बंगाल में बांग्ला मिन्नी कहानियों की कई पत्रिकाएं आती थीं।
        अंत में मिन्नी कहानी (लघुकथा) के विशेषज्ञ डा. अशोक भाटिया ने कहा कि पंजाबी अकादमी द्वारा मिन्नी कहानी पर लगातार तीसरे वर्ष  सेमिनार का आयोजन और पढ़े गए तीन आलेख पंजाबी साहित्य में मिन्नी कहानी की मजबूत दस्तक के प्रमाण हैं। किंतु मिन्नी कहानी (लघुकथा) को शब्दों, वाक्यों या पंक्तियों जैसे बाहरी आधारों से मापना गलत है। ऐसा किसी भी विधा में नहीं होता। एक तो छोटे कैनवास के कारण मिन्नी कहानी बहुत विस्तार नहीं ले पाती, फिर उस पर रचना-विरोधी शर्तें थोपना उसके पनपने में बाधाएं खड़ी करने जैसा है। यह लघुकथा के भविष्य  के लिए अच्छा संकेत नहीं है। उदय प्रकाश  की कहानियों ‘पीली छतरी वाली लड़की’ आदि के उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि कहानी तीन-चार पृष्ठ  से करीब डेढ़ सौ पृष्ठ  तक जाती है, तो मिन्नी कहानी (लघुकथा) के लिए ही क्या मुसीबत है कि वह एक पृष्ठ  के घूँघट से बाहर झाँक भी नहीं सकती। ऐसी बाहरी शर्तें रचना और पात्रों पर दबाव बनाती हैं और उसके सहज सौंदर्य को नष्ट  करती हैं। वास्तव में रचनाएँ ही रचना-विधान बनाती और संवारती हैं। अच्छी रचना वह है जिसे पढ़कर पाठक का कद बढ़ जाए।
         इस अवसर पर सुरिंदर कैले द्वारा संपादित ‘अणु कहानियां’ पुस्तक का विमोचन भी किया गया, जिसमें चार दशकों में ‘अणु’ पत्रिका में छपी प्रतिनिधि लघुकथाएं व उन पर आलेख शामिल हैं।
      इस अवसर पर त्रिलोचन लोची, धर्मपाल साहिल, रणजीत आजाद कांझला, गुरचरण कौर कोचर, मलकीत सिंह बिलिंग, जोगिंदर भाटिया, गुरमीत सिंह बिरदी, जसबीर सिंह सोहल, इंजी. डी.एम सिंह, प्रो. उत्तमदीप कौर, दलबीर लुधियानवी, वसीम मलेरकोटला, लील दयालपुरी, करमजीत ग्रेवाल आदि बड़ी संख्या में लेखक-श्रोता उपस्थित थे।
(समाचार सौजन्य : डॉ अशोक भाटिया, करनाल)

 "आर्ट टुडे" द्वारा अखिल भारतीय आर्ट प्रतियोगिता


श्री रितेश गुप्ता के संयोजन में रुड़की की संस्था "आर्ट टुडे" द्वारा अखिल भारतीय स्तर पर एक आर्ट प्रतियोगिता करायी जा रही है। संक्षिप्त विवरण यहाँ दिए बैनर पर अंकित है।  (समाचार सौजन्य :  रितेश गुप्ता )




































अपनी माटी द्वारा चित्तौड़ में संगोष्ठी

रचनाकार को अपने वैयक्तिक जीवन के साथ ही सामाजिक यथार्थ को ध्यान में रखकर रचनाएं गढ़ना चाहिए।जो लेखक सच और सामने आते हालातो को दरकिनार कर ग़र आज भी प्रकृति और प्यार में ही लिख रहा है तो ये समय और समाज कभी उसे माफ़ नहीं करेगा।वे तमाम शायर मरे ही माने जाए जो अपने वक़्त की बारीकियां नहीं रच रहे हैं।इस पूरी प्रक्रिया में ये सबसे पहले ध्यान रहे कि कविता सबसे पहले कविता हो बाद में और कुछ।

ये विचार साहित्य और संस्कृति की ई-पत्रिका अपनी माटी के संरक्षक और हिंदी समालोचक डॉ सत्यनारायण व्यास ने नौ मार्च को चित्तौड़ में संपन्न कवि संगोष्ठी में व्यक्त किये।युवा समीक्षक डॉ कनक जैन के संचालन और गीतकार अब्दुल ज़ब्बार,वरिष्ठ कवि शिव मृदुल की अध्यक्षता में हुए इस आयोजन में नगर के चयनित कवियों ने प्रबुद्ध श्रोताओं के बीच कवितायेँ पढ़ी। संगोष्ठी की शुरुआत में नगर की लेखक बिरादरी में शामिल दो नए साथियों ने पहली बार रचनाएं पढ़ी। अरसे बाद किसी अनौपचारिक माहौल में हुए इस कार्यक्रम में प्रगतिशील युवा कवि विपुल शुक्ला ने पढ़ना, समय, सीमा, जैसी रचनाएं और कौटिल्य भट्ट 'सिफ़र' ने दो गज़लें पढ़कर वर्तमान दौर पर बहुतरफ़ा कटाक्ष किये।इससे ठीक पहले लोकगीतों की जानकार चंद्रकांता व्यास ने सरवती वन्दना सुनायी।

अपनी माटी संस्थापक माणिक ने हाशिये का जीवन जीते आदिवासियों पर केन्द्रित कविता आखिर कभी तो और व्यंग्य प्रधान कविता आप कुछ भी नहीं हैं सुनायी।सुनायी जा रही कविताओं में यथासमय श्रोताओं ने भी अपनी समीक्षात्मक टिप्पणियाँ देकर संगोष्ठी को सार्थक बनाया।दूसरे दौर में डॉ रमेश मयंक ने अजन्मी बेटी के सवाल और आओ कल बनाएँ जैसे शीर्षक की कविताओं के बहाने जेंडर संवेदनशीलता और समकालीन राजनीति पर टिप्पणियाँ की।राजस्थानी गीतकार नंदकिशोर निर्झर ने कुछ मुक्तक पढ़ने के बाद आज़ादी के बाद के पैंसठ सालों को आज़ादी के पहले के सालों पर तुलनापरक कविता सुनायी जिसे बहुत सराहा गया।

राष्ट्रीय पहचान वाले मीठे गीतकार रमेश शर्मा ने अपना नया गीत मेरा पता सुनाकर हमारे देश में ही बसे दो तबकों के जीवन में मौलिक ढंग से झांकने और उसका विवरण देने की कोशिश की। गीतों में आयी नयी शब्दावली से उनके गंवई परिवेश की खुशबू हम तक आती है। इसी बीच अब्दुल ज़ब्बार ने अपने प्रतिनिधि शेर और एक गीत गरीब के साथ विधाता है पढ़ा। उनके चंद शेर
बेकार वो कश्ती जो किनारा न दे सके
बेकार वो बस्ती जो भाईचारा न दे सके।
बेकार जवानी वो ज़ब्बार ज़हाँ में
बुढापे में जो माँ -बाप को सहारा न दे सके।।
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जब ज़िंदगी ही कम है मुहब्बत के वास्ते
लाऊँ कहाँ से वक़्त नफ़रत के वास्ते।
शराफत नाम रखने से शराफत कब मयस्यर है
शराफत भी ज़रूरी है शराफत के वास्ते।।
      इस अवसर पर कविवर शिव मृदुल ने अपने कुछ मुक्तक,छंद और दोहे प्रस्तुत किये। आखिर में आम आदमी की पीड़ा विषयक कविता सुनायी। डॉ सत्यनारायण व्यास ने अपनी पहचान के विपरीत पहली बार दो गज़लें सुनायी।जिसके चंद शेर ये रहे कि-
जंगल में जैसे तेंदुआ बकरी को खा गया
थी झोंपड़ी गरीब की बिल्डर चबा गया।
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नज़रें गढ़ी थी और फिर मौक़ा मिला ज्यों ही
बेवा के नन्हे खेत को ठाकुर दबा गया।
          उन्होंने और फिर एक कविता तू वही सुनायी जिसमें ज़िंदगी की सार्थक परिभाषाएं सामने आ सकी।इस असार संसार में उलझे बगैर हमें मानव जीवन के सार्थक होने का सोच करना चाहिए जैसा चिंतन निकल कर आया।
         अपनी माटी की इस संगोष्ठी में समीक्षक डॉ राजेश चौधरी, चिकित्सक डॉ महेश सनाढ्य, शिक्षाविद डॉ ए एल जैन, कोलेज प्राध्यापिका डॉ सुमित्रा चौधरी, कुसुम जैन, सरिता भट्ट, गिरिराज गिल, विकास अग्रवाल ने अपनी टिप्पणियों के साथ शिरकत की। आभार युवा विचारक डॉ रेणु व्यास ने व्यक्त किया।
( समाचार सौजन्य : माणिक,चित्तौड़गढ़ )

शब्द साधको को शब्द प्रवाह सम्मान से नवाजा गया
       
शब्द प्रवाह साहित्य मंच द्वारा अखिल भारतीय स्तर पर शब्द प्रवाह साहित्य सम्मान का आयोजन 24 मार्च 2013 को किया गया।
        आयोजन में वरिष्ठ साहित्यकार डा. रामसिंह यादव और मोहन सोनी को शब्द साधक की मानद उपाधि प्रदान की गई| सम्मान समारोह में संदीप राशिनकर इंदौर को शब्द कला साधक की उपाधि दी गई। सम्मानार्थ आमंत्रित कृतियों के तहत मुकेश जोशी उज्जैन, स्व. साजिद अजमेरी अजमेर, ए.एफ. नजर सवाई माधोपुर, गोविंद सेन मनावर, शिशिर उपाध्याय बढ़वाह, गाफिल स्वामी अलीगढ़, सूर्यनारायणसिंह सूर्य देवरिया, श्रीमती रीता राम मुंबई, श्रीमती सुधा गुप्ता अमृता कटनी, शिवचरण सेन शिवा झालावाड़, सुरेश कुशवाह भोपाल, श्रीमती रोशनी वर्मा इंदौर, बीएल परमार नागदा, श्रीमती दुर्गा पाठक मनावर को सम्मानित किया गया। दिनेशसिंह शिमला, श्रीमती पुष्पा चैहान नागदा, महेंद्र श्रीवास्तव, अभिमन्यु त्रिवेदी उज्जैन, अब्बास खान संगदिल छिंदवाड़ा, राधेश्याम पाठक उत्तम उज्जैन, उदयसिंह अनुज घरगांव, स्वप्निल शर्मा मनावर, राजेंद्र निगम राज गाजियाबाद, संजय वर्मा दृष्टि मनावर, सुनीलकुमार वर्मा मुसाफिर इंदौर, डा. माया दुबे भोपाल, श्रीप्रकाशसिंह शिलांग, रविश रवि फरीदाबाद, राजेश राज उज्जेन को साहित्य सेवा के लिए सम्मानित किया गया।
         समारोह मे 20 रचनाकारों के अ.भा. काव्य संकलन शब्द सागर (सम्पादक कमलेश व्यास कमल) ,महेन्द्र श्रीवास्तव की कृति दोहों की बारहखडी, कोमल वाधवानी प्रेरणा की कृति नयन नीर, यशवंत दीक्षित की कृति रेत समंदर बहा गया, अरविंद सनम् की कृति हर घर मे उजाला जाये, संदीप सृजन की कृति गाँव की बेटी का विमोचन भी किया गया | दुसरे शत्रु मे अ.भा.कवि सम्मेलन का आयोजन हुआ |
       प्रथम सत्र डा. रामराजेश मिश्र की अध्यक्षता और अनिलसिंह चंदेल, रामसिंह जादौन व डा. पुष्पा चैरसिया के आतिथ्य में संपन्न हुआ। दूसरे सत्र में डा. शैलेंद्रकुमार शर्मा की अध्यक्षता में प्रो. बी.एल. आच्छा, डा. दीपेंद्र शर्मा, श्रीमती पूर्णिमा चतुर्वेदी व डा. श्याम अटल अतिथि के रूप में उपस्थित थे। स्वागत शब्द प्रवाह के संपादक संदीप ‘सृजन‘ ने किया। संचालन डा. सुरेंद्र मीणा और डा. रावल ने किया। आभार कमलेश व्यास ने माना। (समाचार सौजन्य : संदीप ‘सृजन‘)


लाल कला मंच द्वारा रंग अबीर उत्सव-एवं सम्मान समारोह-2013 

         
लाल कला,सांस्कृतिक एवं सामाजिक चेतना मंच(रजि.) द्वारा सामाजिक भाईचारे का पावन पर्व होली के शुभ अवसर पर एक सरस काव्य गोष्ठी एवं सांस्कृतिक कार्यक्रमों का मिला जुला रुप रंग अबीर उत्सव-2013(काव्य गोष्टी एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम) का आयोजन अल्फा शैक्षणिक संस्थान,मीठापुर के प्रांगण में वरिष्ठ सामाजसेवी मास्टर डंबर सिंह की अध्यक्षता में समपन्न हुआ। इस कार्यक्रम की शुरुआत लाल बिहारी लाल के सरस्वती वंदना-ऐसा माँ वर दे/विद्या के संग-संग/सुख समृद्धि से सबको भर दे, से शुरु हुआ। कार्यक्रम के अतिथि कामरेड जगदीश चंद्र शर्मा,मीठापुर के पूर्व निगम पार्षद महेश आवाना, समाजवादी आत्मा राम पांचाल तथा गौरव बिन्दल थे। इस कार्यक्रम का संयोजन दिल्ली रत्न श्री लाल बिहारी लाल का था तथा संचालन वरिष्ठ साहित्यकार डा. ए. कीर्तिबर्धन ने किया। इस अवसर पर कवियों एवं बच्चों को संस्था द्वारा काव्य सेवी सम्मान अतिथियों द्वारा एवं अतिथियों को डा.आर कान्त एवं डा.के.के. तिवारी द्वारा समाजसेवी सम्मान से सम्मानित किया गया। सम्मान स्वरुप अंग वस्त्र एवं सम्मान-पत्र प्रदान किया गया।
     इस कार्यक्रम में स्थानीय विभिन्न स्कूलों के बच्चों द्वारा सांस्कृतिक कार्यक्रम एवं दर्जनों कवियों ने भी इस समारोह मे भाग लिया जिसमें-राकेश महतों, रवि शंकर, कृपा शंकर,दिनेश चन्द्र पाण्डेय, लाल बिहारी लाल ने कहा- होली – होली की तरह मिल के मनायें संग।
                   जतन करें मिज जूल केबिखरे शुशी के रंग।।

           इसके  अलावें डा.ए.कीर्तिबर्धन, सुश्री शिवरंजनी,,श्री के.पी. सिंह,श्री राकेश कन्नौजी, डा. सी.एन.शर्मा, हवलदाऱ शास्त्री,ब्रजवासी तिवारी मा.डंबर सिंह तनवर आदी प्रमुख थे। तुलसी शर्मा, मुरारी कुमार, महेश सिंगला, मलखान सैफी, श्रीमती शारदा गुप्ता,श्री मनोज गुप्ता सहित अनेक गन्य-मान्य ब्यक्ति मैयूद थे। अन्त में संस्था के आध्यक्ष श्रीमती सोनू गुप्ता ने कवियो, अतिथियों एवं विभिन्न स्कूल से आये हुए बच्चों को धन्यवाद दिया। (समाचार सौजन्य : लाल बिहारी गुप्ता लाल)

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