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शुक्रवार, 30 मार्च 2012

अविराम विस्तारित



अविराम का ब्लॉग :  वर्ष : १, अंक : ०७,  मार्च २०१२ 


।।जनक छन्द।।

सामग्री : डॉ. ओम्प्रकाश भाटिया 'अराज' व पं. गिरिमोहन गिरि 'नगर-श्री' के जनक छंद। 






डा. ओम्प्रकाश भाटिया ‘अराज’




पाँच जनक छंद


1. 
सज्जन ही जब डर रहा
इन्द्र, बता ये वज्र तब
तेरे कर क्या कर रहा?


2. 
मिली-जुली सरकार है
किसे लूट कितनी मिले
इस पर गहन विचार है
रेखांकन : किशोर श्रीवास्तव
3. 
दाढ़ी है, कुरआन है
कत्लो गारत कर रहा
इसका क्या ईमान है!
4. 
कैसा वीर स्वभाव है
हत्यारों का दण्ड बस
निन्दा का प्रस्ताव है
5. 
मोहक भागम-भाग है
जितना जिसका स्वार्थ है
उतना उसका राग है


(‘जनक छन्द का प्रथम सहस्त्रक’ से साभार)



  •  बी-2-बी-34, जनकपुरी, नई दिल्ली-110058



पं. गिरिमोहन गुरु ‘नगरश्री’




पाँच जनक छंद


1. 
सुबह शाम हो काम हो
धर्म ग्रन्थ सब कह रहे
लेकिन सब निष्काम हो


2. 
रातों वाली कालिमा 
जान नहीं पाई कभी
क्या है दिन की लालिमा
3. 
रेखांकन : डॉ. सुरेन्द्र वर्मा 
काँटे चुभे करील के
वचनों ने आहत किया
मानो शर हों भील के
4. 
कहते कुछ शामत हुई
लोकतन्त्र के नाम पर
लघुताएँ बहुमत हुईं
5. 
सड़कों पर बैनर मिले
राजनीति के नगर में
नारों डूबे नर मिले
(‘जनक छन्द मणि मालिका’ से साभार)

  • गोस्वामी सेवाश्रम, हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी, होशंगाबाद-461001 (म.प्र.)

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